70 साल की लूट, गलती से ही सही, कहीं सच तो नहीं बोल रहे नरेंद्र मोदी

आप कैशलेस को पूरे देश पर थोपना चाहते हैं। आप कैशलेस का आह्वान करते तो समझ में आता। प्रेम में प्रस्‍ताव रखे जाते हैं, और जबरी संबंधों में सबकुछ थोपा जाता है। आप कह रहे हैं कि तकनीक का जमाना है, सब कुछ ऑनलाइन हो सकता है, अब लेन देन भी ऑनलाइन करो।

मैं सहमत हूँ, लेकिन एक फोकट का सवाल है, जब तकनीक का जमाना है, जब हम सब कुछ ऑनलाइन कर सकते हैं तो आपकी रैली ऑफलाइन क्यों?

मेरे झोले में फोकट की सलाह भी है - क्यों ना आप भी रैली भाषण का वीडियो रिकॉर्ड करके यूट्यूब पर डालें, और महसूस करें कि पूरा इंडिया इसको सुन रहा है, देख रहा है, और गर्व महसूस कर रहा है। इससे कथित 4 करोड़ प्रति रैली खर्च बच सकता है, आपकी जान को भी कोई खतरा नहीं होगा, आपकी रक्षा के लिए रैली के बाहर खड़ी होने वाली पुलिस अपने रोजमर्रा के काम निबटा पाएगी।

कड़वी दवा तो नहीं कड़वा सच - जो आप जानते हैं। आपके पीआर जानते हैं कि मोबाइल अभी घर घर की जरूरत है लेकिन इंटरनेट नहीं। आपको पता है कि जो भीड़ रैली में होती है, वो वंचित है उन सुविधाओं से जिसने आपके समर्थक लैस हैं। उस भीड़ में किसी के पास डेटा पैक के पैसे नहीं, तो किसी के पास नेटवर्क नहीं। आपके समर्थक सोशल मीडिया से पढ़े लिखे और इंटरनेट यूजर्स को ख्‍वाब दिखाने का प्रयास करते हैं, और रैलियों से आप उनको जिन तक आपका सोशल मीडिया अभी पहुंचा नहीं। देश आज भी दो हिस्‍सा में बांटा हुआ भारत और इंडिया में, हालांकि, लीक बहुत ही महीन है।

समस्‍या यह है कि यूट्यूब पर आपके एक ही तरह के भाषण सुनने क्यों जायेगा? और आपका हर नया भाषण पुराने का विस्तार या विरोधाभासी होता है।

हाल के बयान को ही ले लो जो काले धन, भ्रष्टाचार और नकली करंसी के खिलाफ आया था और अंत कैशलेस और लेस कैश की ओर मुड़ गया। जैसे आपके विरोधियों के कहने अनुसार हर हर मोदी, घर घर मोदी अंत थर थर मोदी हो गया।

आप संसद में जाने को तैयार नहीं, रैली में आप लंबी लंबी हांकते हैं और नतीजन आपको बहराईच की रैली कम भीड़ के कारण रदद् करनी पड़ी, भले ही मीडिया के एक बड़े तबके ने मौसम खराब का रोना रोया हो।

भाजपा के सीनियर नेता एलके आडवाणी जो कथित तौर पर आपके मार्गदर्शक हैं, वो आज सिर्फ दर्शक हैं, बोलते हैं तो आप गौर नहीं करते, तभी तो इस्तीफा देने तक का मन बना लेते हैं। मनमोहन सिंह की चुप ने नरेंद्र मोदी का उदय किया और आज नरेंद्र मोदी की चुप्पी राहुल गांधी को बोलने का मौका दे रही है। एक हारे हुए नेता व वित्‍त मंत्री अरुण जेटली की अपनी मजबूरियां हैं, लेकिन सुना है कि अमित शाह ने बैठक में जमकर गुस्सा निकाल लिया, उसकी कोई मजबूरी नहीं, क्योंकि बीजेपी के एक बड़े तबके को सम्भल रहे हैं। गुजरात की गद्दी से आनंदीबेन का जाना, अमित की जिद्द थी और आनंदीबेन को लाना आपकी।

सवाल यह नहीं कि आपकी कुर्सी रहे या जाये, सवाल है कि आपके एक फैसले ने देश को जिस तरफ मुड़ गया है उसका क्या? आज एक बड़ा वर्ग लाइन में खड़ा है, जिसको कभी आप अपने साथ बताते हैं तो कभी काले धन वाले लाइन में हैं कहकर अपमानित करते हैं।

अगर इसने आपकी उम्मीद के उल्ट जाकर बीजेपी को अगले कुछ सालों के लिए फिर से लाइन में लगा दिया तो सोचो कि आप ने देश को क्या दिया? गलती से ही सही, लेकिन जब आप कहते हैं देश 70 साल से लूट रहा है तो उन 70 सालों में बीजेपी की सरकारों के साल भी शामिल हो जाते हैं, और आपकी मौजूदा सरकार के 3 साल भी, जिसमें से 2.5 तो हो गये, क्योंकि अगस्त 2017 में आजाद भारत अपने 70 बसन्त पूरे करेगा।

बस ध्यान रखें कि जितना 67 साल में नहीं लूटा, उतना 3 में ना लूट जाए। हम भारतीय हैं, हम तो ऐसे तैसे कर उठ जाएंगे, लेकिन आप झोला लेकर किधर जाएंगे।

जय राम जी की इसके भी दो अर्थ हैं, किसी समझदार से पूछना लेना।

कहो..... भीड़ नहीं हम.....

आस पास के लोगों से..... सतर्क हो जाइए..... क्‍योंकि पता नहीं कौन सा नकाबपोश..... काले धन का मालिक हो..... मखौटों के इस दौर में सब फर्जी हैं..... हां..... मैं..... आप..... हम सब फर्जी हैं।

चौंकिए मत..... सच है.....। कबूतर की तरह आंखें भींचने से क्‍या होगा?.....। याद कीजिए..... 35 लाख का घर..... और 22 लाख के दस्‍तावेज..... आखिर किसने बनवाये। बेरोजगार बेटे बेटी को 3 से 5 लाख रिश्‍वत देकर..... सरकारी नौकरी किसी ने दिलवाई.....। आखिर कौन पूछता है..... दामाद ऊपर से कितना कमा लेता है.....।

ऐसे ही तो..... जमा होता है काला धन..... काले धन वाले भी..... तो शामिल हैं ईमानदारों में..... और नोटबंदी का करते हैं जमकर समर्थन..... कहते हैं..... मिट जाएगा काला धन..... और खत्‍म होगी रिश्‍वतखोरी..... हां..... स्‍लीपर सैल की तरह..... हम में भी..... कहीं न कहीं..... छुपे बैठे हैं चोर.....

दम है तो पकड़िये..... रिश्‍वत लेते..... जो पकड़ा गया..... रिश्‍वत देकर छूट जाएगा..... सड़क पर ट्रैफिक वाला रसीद काटता है..... तो आप बड़े आदमी को फोन लगा लेते हैं..... ईमानदार कर्मचारी की बैंड खूब बजती है..... और तमाश देखते हैं हम सब.....

ट्रैफिक सिग्‍नल पर खड़ा शहरी 60 सैकेंड इंतजार नहीं कर सकता..... लेकिन..... गरीबों को लाइन में लगने पर खूब ज्ञान उड़ेल रहा है.....

युवान बेटा पिता के कहने पर बिजली का बिल भरने नहीं जाता..... कहीं..... लाइन बड़ी हुई तो डार्लिंग बुरा मान जाएगी..... फेसबुक पर उस गरीब को ज्ञान बांटता है..... जो 14 घंटे मजदूरी करता है..... और मिलता है बाबा जी ठुल्‍लू.....

बुरा तो लगता है..... कड़वी बात का..... जो कल तक..... मोदी की नोटबंदी का..... सबसे बड़ा समर्थक था..... पकड़ा गया बड़े नोटों के साथ.....

सब चुप रहेंगे..... कोई नहीं बोलेगा..... क्‍योंकि..... सच बोलने के लिए..... नकाब हटाने होंगें..... अपने स्‍वार्थों की बलि..... देनी होगी.....। इसलिए..... जो चल रहा..... चलने दें..... तमाशा देखें..... क्‍योंकि..... तमाशबीन हैं हम.....

125 करोड़ जनता..... 11 क्रिकेटर..... जमकर देखते हैं..... गाली निकालते हैं..... जीते तो जश्‍न मनाते हैं..... पर्दे पर अजय मेहरा देखकर..... खून खौलने लगता है..... घर आते आते..... थका हरा घसीट पीटा आम आदमी..... भीतर से निकलता है..... जैसे अदालीन के चिराग से जिन्‍न.....

हम को अचानक..... बोलने वाला प्रधानमंत्री मिलता है..... हम खुशी के मारे झूम उठते हैं..... क्‍योंकि..... हम बोल नहीं सकते..... कोई तो आया बोलने वाला.....

फिर अचानक..... बोलना भी..... सिरदर्द करने लगता है.....

फिर..... आशावाद..... फिर..... चलो देखते हैं..... और फिर..... मैं..... आप..... सब..... तमाशबीन हो जाते हैं.....

तमाशबीन होने का भी..... अपना ही एक मजा है.....

टीवी के सामने बैठकर..... सचिन को शॉट मारना सिखाते हैं..... फिल्‍म निर्देशक को..... निर्देशन के गुर..... किसी लड़ने वाले को..... नायक से खलनायक..... खलनायक से नायक बनाते हैं.....

कोई चौपालों में..... कोई ड्राइंग रूम में..... कोई चाय के गल्‍ले पर बैठकर..... देश बदल रहा है..... पान मसाले का पीक..... मुंह से थू थू हुए..... स्‍वच्‍छता का ज्ञान झाड़ा जा रहा है..... सुन रहे हैं हम..... क्‍योंकि..... तमाशबीन हैं हम

असल जीवन में..... काले को सफेद करने की दौड़..... सोशल मीडिया पर..... ज्ञान खूब बघारा जा रहा है..... किसका दामन..... कितना मैला..... हर कोई..... लिए प्रमाण पत्र..... घूम रहा है.....

कांग्रेस के दौर में..... शहीद हुए तो एक के बदले दस..... भाजपा के दौर में शहीद हुए..... तो सवाल मत पूछिए..... रैलियों में सुर ऊंचा है..... संसद में सिर नीचा है.....

क्‍यों नहीं..... हम नेता चुनते..... क्‍यों..... हर बार हम..... कांग्रेस..... बीजेपी..... चुनें..... क्‍यों नहीं..... हम सरकार से..... तीखे सवाल करते..... चाहे कांग्रेस की हो..... चाहे बीजेपी की हो.....

क्‍यों नहीं..... हर सवाल हमारा मौलिक होता..... क्‍यों..... हम पढ़े लिखे होने के बाद भी..... कॉपी पेस्‍ट..... नकल करते हैं..... सभ्‍य समाज हैं..... फिर भी..... चर्चा नहीं..... बहस करते हैं..... तर्क नहीं दे पाते..... तो गाली गालौच करते हैं.....

भीड़ नहीं तो..... क्‍या हैं हम..... एक ने लिखा..... चोर..... तो हम भी..... लिखते हैं..... चोर..... इंटरनेट है..... पर तथ्‍य..... क्‍यों नहीं खोजते हम..... पढ़े लिखे हैं हम..... यह क्‍यों नहीं सोचते..... एक ही वीडियो..... कभी कांग्रेस का हो जाता है..... कभी भाजपा का..... और अंधे हम..... करते हैं..... फॉरवर्ड..... फॉरवर्ड..... फॉरवर्ड.....

कहो..... भीड़ नहीं हैं हम..... बताओ..... भेड़ नहीं हम..... युवा हैं हम..... किसी के गुलाम नहीं हम..... बीरबलता नहीं..... नचिकेतता चाहिये हमें..... बुरे हैं तो बुरा कहो..... सच्‍चे हैं तो सच्‍चे कहो..... झूठ के लिबास में..... तारीफ नहीं चाहिये.....

कहो..... भीड़ नहीं हम.....

और तो कुछ पता नहीं, लेकिन लोकतंत्र ख़तरे में है

जहां लोकतंत्र में सत्‍ता और विपक्ष रेल की पटरी सा होता है। तो वहीं, लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था एक रेल सी होती है। यदि दोनों पटरियों में असंतुलन आ जाए तो पटना इंदौर एक्‍सप्रेस सा हादसा होते देर नहीं लगती, सैंकड़ों जिंदगियां पल भर में खत्‍म हो जाती हैं। और पीछे छोड़ जाती हैं अफसोस कि काश! संकेतों पर गौर कर लिया होता। वक्‍त रहते कदम उठा लिये गए होते।

ये संकेत नहीं तो क्‍या हैं कि देश सिर्फ एक व्‍यक्‍ति पर निर्भर होता जा रहा है। देश में विपक्ष की कोई अहमियत नहीं रह गई। सत्‍ता पक्ष के खिलाफ बोलना अब देशद्रोह माना जाने लगा है। किसी सरकारी नीति की आलोचना करने का साहस करने पर आपको बुरा भला कहा जाता है।

दिलचस्थ तथ्‍य तो देखो कि भारत बंद की घोषणा होने के साथ ही सत्‍ता पक्ष की तरफ से कुछ दुकानों पर एक सरीखे नारे लिखे बोर्ड या बैनर टांग दिये जाते हैं। हर आदमी के गले में कड़वी बात को उतारने के लिए सेना और देशभक्‍ति का शहद की तरह इस्‍तेमाल किया जा रहा है, ताकि कड़वाहट महसूस न हो।

पहले तो ऐसा नहीं होता था, सरकार के खिलाफ भारत बंद भी होते थे। जो लोग आज सत्‍ता में हैं, वो ही लोग लठ लेकर निकला करते थे। कोई प्‍यार से बंद करे तो ठीक, नहीं तो लठवाद जिन्‍दाबाद। सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करने पर कोई किसी को देशद्रोही की संज्ञा तो नहीं देता था।

याद ही होगा, गुजरात के तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ से पहले संसद की चौखट पर शीश रखते हुए पूरे देश को भावुक कर दिया था। दरअसल, राजनीति में ऐसा ड्रामा आज तक किसी ने देखा नहीं था। ड्रामा इसलिए कह रहे हैं क्‍योंकि पिछले कई दिनों से उसी मंदिर से आवाज आ रही है कि आओ प्रधान सेवक आओ, जवाब दो हमारे सवालों के, चर्चा करो हमसे, हम भी जन-प्रतिनिधि हैं। लेकिन, प्रधान सेवक रॉक कंसर्ट को संबोधित करने में व्‍यस्‍त हैं, रैलियों में विपक्ष को काले धन का मालक बताने में व्‍यस्‍त हैं।

जो कड़वी दवा जल्‍दबाजी में दे बैठें हैं, कहीं जनता बाहर न निकाल दे, इसलिए आंसुओं व देशभक्‍ति का शहद मिलाकर निगल जाने के लिए प्रेरित करने में व्‍यस्‍त हैं। बड़ी अजीब बात है कि रैलियों से बैंक की कतारों में खड़े लोगों की तुलना सैनिक से तो कर रहे हैं, लेकिन, मन की बात प्रोग्राम में एक भी बैंक की कतार में शहादत पाए गए व्‍यक्‍ति को याद नहीं किया, और दो आंसू तक आंख से नहीं टपकाए।

आंसू टपके तो इस बात पर वो लोग मुझे नहीं छोड़ेंगें, मुझे मार देंगें। मगर, देश के प्रधान सेवक ने सदन में जाकर उन धमकाने वालों का नाम नहीं बताया, जो उनको नहीं छोड़ेंगें, जो उनको मार देंगें। विपक्ष पूछता रहा, यदि ऐसा है तो पूरा भारत आपके साथ है। लेकिन, अफसोस कि सदन में मौन है, देश का पहला बोलने वाला प्रधान मंत्री।

बहुत कम लोगों को याद होगा कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी मार्च 2016 में सदन के अंदर जबरदस्‍त वक्‍तव्‍य में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के बयान (देश में सरकारें तो आती जाती रहती हैं, लेकिन देश चलना चाहिए) की नकल करते हुए विपक्ष को महानुभवियों की संज्ञा दी थी। मगर, अफसोस कि नवंबर 2016 आते आते प्रधान मंत्री अपने ही बयान को भूल गये और उसी विपक्ष को काले धन के मालिक करार दे दिया।

अब स्‍थिति ऐसी हो चली है कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के कार्य पर उंगुली उठाना भी देशद्रोह है। हाल में ही, जब देश की सर्वोच्‍च अदालत ने सरकार से पूछा कि यदि आप भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़ने को तैयार हो तो अभी तक लोकपाल की नियुक्‍ति क्‍यों नहीं की? तो नरेंद्र मोदी समर्थक न्‍यायपालिका पर टूट पड़े और पूछा डाला कि अभी तक जो इतने केस लंबित पड़े हैं, उनका क्‍या? अजीब लोकतंत्र है कि अदालतों में जजों की नियुक्‍ति को लेकर भी सरकार और न्‍यायपालिका में ठनी हुई है।

देश में स्‍थिति ऐसी हो चुकी है कि जो नरेंद्र मोदी कहें वो ही सही है। कोई किंतु परंतु करने की जरूरत नहीं। हर बात को सेना से जोड़ा दिया जाता है क्‍योंकि पीआर जो नरेंद्र मोदी को कथित तौर पर संचालित करते हैं, वे अच्‍छी तरह जानते हैं कि किसी भी देश का नागरिक अपनी सेना का अपमान नहीं करेगा। भले ही, भारतीय जनता पार्टी के नेता भारतीय करंसी पर पैर रखकर काले धन की स्‍वच्‍छता का अभियान चलाएं, इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।

लोकतंत्र में एक व्‍यक्‍ति पर केंद्रित होना और देश के हर मामले में सेना के कंधे का इस्‍तेमाल ख़तरे की घंटियां हैं। इतना ही नहीं, आज विपक्ष बोल नहीं सकता, आज न्‍याय पालिका बोल नहीं सकती, आज मीडिया का एक तबका सरकार के खिलाफ एक शब्‍द लिख नहीं सकता।

चुटकला - 
मैं ट्रेन में सफर कर रहा था। 
मैंने बगल में बैठे व्‍यक्‍ति से कहा, 'यार कितनी ठंड पड़ रही है ना।'
तो अगले डिब्‍बे से आवाज आती है, 'क्‍या कांग्रेस के समय से ठंड नहीं होती थी?'

जब देश में ऐसे चुटकले प्रचलन में आ जाए तो एक बात अच्‍छे से समझ लेनी चाहिये कि लोकतांत्रिक देश यकीनन एक गलत दिशा में अग्रसर हो रहा है।

पहले देश हिन्‍दु मुस्‍लिम के आधार पर दो हिस्‍सों में बंट रहा था। अब देश देशभक्‍त और देशद्रोही के रूप में बंट रहा है। जो कल तक भारत बंद पर लाठियां लेकर निकलते थे, तोड़ फोड़ करते थे, आज उनके हाथों में मिठाईयां थीं। चलो मान लिया हमने कि देश बदल रहा है। जाने अनजाने में ही सही, लेकिन लोकतंत्र की पटरी से उतर रहा है।

'अकीरा' फिल्‍म नहीं, कहानी है एक 'लड़की' के साहस की

अकीरा फिल्‍म नहीं, एक कहानी है, एक दस्‍तां है, एक लड़की के साहस की, जोश की, हिम्‍मत की, संघर्ष की और बलिदान की, जो हमको सिल्‍वर स्‍क्रीन पर सुनाई जाती है। अकीरा सी लड़की पैदा करना हर मां बाप के बस की बात नहीं, ऐसी लड़की को ईश्‍वर किसी किसी को वरदान स्‍वरूप देता है।

अकीरा खूबसूरत है। अकीरा भी आम लड़कियों जैसी है। मगर, एक बात उसको अलग बनाती है, उसके भीतर की हिम्‍मत। फिल्‍म की शुरूआत में ही एक सूफी कहावत का जिक्र है, जिसमें फिल्‍म का पूरा निचोड़ है। ईश्‍वर आपके उस गुण की परीक्षा लेता है, जो आप में मौजूद है।

'अकीरा' की परीक्षा तो दस साल की उम्र से शुरू हो जाती है, जब अकीरा बस स्‍टैंड पर बदतमीजियां कर रहे लड़कों को निपटा देती है। अकीरा की शक्‍ति उसके पिता है, जैसे नीरजा में नीरजा की शक्‍ति उसके पिता थे। अकीरा 3 साल बाल सुधार गृह में गुजारने के बाद खूबसूरत जीवन जीने लगती है।


तभी किस्‍मत अकीरा के जीवन में मुम्‍बई जाना लिख देती है। कहते हैं ना जब पाप हद से ज्‍यादा बढ़ जाए तो पापियों का विनाश करने को एक परम-आत्‍मा जन्‍म लेती है। कुछ ऐसा ही अकीरा के बारे में कह सकते हैं, जब अकीरा मुम्‍बई को अचानक रवाना होती है।

मुम्‍बई पहुंचते ही अकीरा के जीवन में नए तूफान आने शुरू होते हैं। अकीरा की लड़ाई जाने अनजाने में पुलिस के कुछ लालची और घटिया अधिकारियों से हो जाती है, जो एक गलती को छुपाने के लिए पैर पैर नई गलती किए जाते हैं। कॉलेज में पढ़ने वाली अकीरा किस तरह पुलिस वालों के गले का फांस करती है और पुलिस वाले किस तरह अकीरा को खत्‍म करने के लिए अपनी शक्‍ति का इस्‍तेमाल करते हैं - ये फिल्‍म का वो हिस्‍सा है, जिसको प्रकट करना मतलब फिल्‍म की रोचकता या कहानी की रोचकता को मारना है।

निर्देशक एआर मुरुगदास ने अकीरा के माध्‍यम से बहुत सारे मुद्दों को उठाया। पुलिस अधिकारी किस तरह अपनी ताकत का इस्‍तेमाल कर सकते हैं या करते हैं। खूबसूरत लड़कियों के चेहरे की रौनक तेजाब कुछ बदतमीज लड़कों की हरकत के कारण किस तरह छीन लेता है। देखते समझते हुए अभिभावकों का आंख मूंद लेना, बच्‍चों को किस गर्त में फेंकता है।

सोनाक्षी सिन्‍हा, अनुराग कश्‍यप और कोंकणा सेनशर्मा मुख्‍य भूमिका में हैं, जो पूरी फिल्‍म को आगे बढ़ाते हैं। मगर, अन्‍य छोटे छोटे किरदार भी आपको प्रभावित करेंगे, चाहे अकीरा के पिता का किरदार, चाहे अकीरा के दोस्‍त किन्‍नर का किरदार, चाहे अकीरा के भाई-भाभी और भाई के साले का किरदार। हर कलाकार महत्‍वपूर्ण है और हर कलाकार अपने किरदार के साथ ईमानदारी बरतते हुए नजर आता है।

हां, चलते चलते इतना जरूर कहूंगा कि नीरजा भावनात्‍मक दास्‍तां थी जबकि अकीरा एक्‍शन दस्‍तां है।

हलके गुलाबी कुर्ते वाले प्रधानमंत्री और जियो डिजीटल लाइफ

'मन की बात' कहने वाले हमारे माननीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी आज सुबह सुबह आपका तस्‍वीर अखबारों के पहले पृष्‍ठ पर देखा। टचवुड नजर न लग जाए। हलके गुलाबी कुर्ते पर ब्‍लू रंग की मोदी जैकेट जंच रही है, खिला हुआ चेहरा तो मशाल्‍लाह है।

मगर, एक बात खटक गई। बड़ा रोका मैंने खुद को कि चल छोड़ो जाने दो। मगर, मन की बात कहां दबी रहती है जुबां पर आ ही जाती है। मुझे समझ नहीं आया कि जियो डिजीटल लाइफ क्‍या है, जिसका आप चेहरा बने हैं इस विज्ञापन में।


क्‍या जियो डिजीटल आइडिया एयरटेल वोडाफोन टाटा डोकोमो श्रेणी में नहीं आती ? यदि आती है तो फिर क्‍यों आप ने बीएसएनएल का प्रचार करने की बजाय जियो डिजीटल पर फोटो लगाने की अनुमति दी।

हमारा बीएसएनएल मर रहा है। दम तोड़ रहा है। ऐसे हालात में आपका फोटो जियो डिजीटल लाइफ के साथ प्रकाशित होता है। मन दुखी होने लगता है। आप से कोई सवाल नहीं करेगा, क्‍योंकि आप देश के प्रधान मंत्री हैं।

टेलीकॉम कंपनियों में कोई अजय देवगन जैसा बिंदास आदमी नहीं है, वरना किसी सहयोगी से आपको फोन लगवाकर पूछ लेता कि साहेब हमने आपका का क्‍या बिगाड़ा है, जो हमको पछाड़ने के लिए जियो डिजीटल का आह्वान किए जा रहे हैं।

आपकी खूबसूरत फोटो की तारीफ जरूर करूंगा, जैसे कि ऊपर की है। मगर, जहां आपका फोटो लगा है, वहां मुझे हमेशा आपत्‍ति रहेगी क्‍योंकि जियो रियालंस कंपनी है, जो एक प्राइवेट कंपनी है, और प्राइवेट कंपनी के विज्ञापन को यदि देश का पीएम प्रचारित करेगा, तो देश को सोचना होगा।

राम की रामायण होती है, किंतु रावण की रामायण नहीं हो सकती

आज सुबह दिल्‍ली के एक समाचार पत्र को देखते हुए एक विज्ञापन पर नजर गई। विज्ञापन एक नाटक के संदर्भ में था, जिसमें पुनीत इस्‍सर रावण के रूप में अभिनय कर रहे हैं। इस नाटक को निर्देशित और कलमबद्ध अतुल सत्‍य कौशिक ने किया है।

इस नाटक का नाम रावण की रामायण। हालांकि, राम की रामायण होती है, किंतु रावण की रामायण नहीं हो सकती।

पूछो क्‍यों?

जब सूर्य उत्‍तर दिशा की तरफ सरकने लगता है तो उस समय स्‍थिति को उत्‍तरायण कहा जाता है क्‍योंकि उस समय सूरज का उत्‍तर दिशा की तरफ बढ़ता है।

डॉ. विद्यानिवास मिश्र का एक संदर्भ लेते हुए बात करूं तो अयन के दो अर्थ हैं - 'घर' भी है और 'चलना' भी है। बिलकुल सही और स्‍टीक हैं। रामायण देखा जाए तो पूर्ण रूप से राम का घर है और यात्रा भी है, चलना भी यात्रा से जोड़ा जा सकता है।

राम कथा को रामायण इसलिए कहा जाता है क्‍योंकि उसमें पूर्ण राम समाए हैं। रामायण का अर्थ कहानी या दास्‍तां नहीं होता। हालांकि, लोग आप बोल चाल की भाषा में कहते जरूर हैं कि तेरी रामायण बंद कर।

इसलिए रावण की रावणायण तो सकती है। मगर, रावण की रामायण होना मुश्‍किल है। इस शब्‍द को लेकर हो सकता है बहुत सारे लोगों को भ्रांतियां हों।

इस लेखक का प्रयास किसी को नीचा दिखाना या बुरा साबित करना नहीं बल्‍कि एक सही शब्‍द से अवगत करवाना है, जो रोजमर्रा के जीवन में शामिल है।

...लो बूटी और बेस हमारे गीतों में शामिल हो गए

आज कल ट्विटर पर बीट पे बूटी चैलेंज चल रहा है। बहुत सारे लोग बीट पे बूटी चैलेंज एक दूसरे को आगे बढ़ा रहे हैं। बड़ी अजीब बात है कि आजकल "बेस" और "बूटी" आम सी बात होगी, जैसे मेरी तो फट गई। यह हमारी भाषा तो नहीं, ये तो रोड़ किनारे खड़े, टी स्‍टॉल पर खड़े, टपोरी लोगों की भाषा है।

मगर, हमको आज कल 'बीट पे बूटी' और 'बेबी को बेस पसंद है' ही अच्‍छा लगने लगा है या यो यो हनी सिंह '* में दम है तो बंद कर लो'। बड़ा अजीब लगता है, कोई कहता है कि मेरी तो फटती है, चाहे लड़का हो चाहे लड़की। जब उनसे फटती का अर्थ पूछो तो जुबां पर लगाम लग जाती है। क्‍या यह नहीं कह सकते ? मुझे डर लगता है। मैं डर गया। मैं डर गई। मैं घबरा गई। मेरे तो हाथों के तोते उड़ गए। तेरे तो पसीने छूट रहे हैं।

बूटी का हिन्‍दीकरण पिछवाड़ा हालांकि उर्दूकरण थोड़ा सा सलीके वाला है, तरशीफ। इस गीत में जैकलीन फर्नांडीज ने जमकर बूटी थिरकाई है। जैकलीन फर्नांडीज श्रीलंकाई हैं। आप जैकलीन फर्नांडीज के जितने गाने देखेंगे, आपको बूटी के सिवाय शायद ही कोई अन्‍य मूवमेंट नजर आए।

ए फलाइंग जट्ट का गाना भी शायद जैकलीन फर्नांडीज की बूटी मूवमेंट को देखकर लिखा गया है। आज कल कुछ भी लिख सकते हो, कौन मना करने वाला है। हम मॉर्डन जो हो रहे हैं, जो एतराज जताएं, वो रूढ़िवादी पुराने जमाने के समझे जाएंगे। बेबी को बेस पसंद है, अगर गीत सुनेंगे तो अच्‍छा लगेगा। समझदार बंदा समझ लेगा कि अनुष्‍का शर्मा कौन से बेस की बात कर रही है। यदि आप गीत गीत का वीडियो देखने बैठेंगे तो सलमान ख़ान का नृत्‍य  बताएगा, बेबी को कौन सा बेस पसंद है।

हिन्‍दी सिनेमा हिन्‍दी भाषा विस्‍तार का एक बड़ा साधन है। मगर, इसने भाषा को इतना बिगाड़ दिया है कि कहना पड़ रहा है कि ऐसा विस्‍तार न हो तो अच्‍छा है। दरअसल, बॉलीवुड में अब बाहर के या कान्‍वेंट स्‍कूलों के पढ़े लिखे लेखक आ चुके हैं, जिनका हिन्‍दी ज्ञान चाय की स्‍टॉल से शुरू होता है। हमने गंभीर हिन्‍दी को लेकर हिन्‍दी फिल्‍मों में ही हास्‍य दृश्‍य रचे हैं क्‍योंकि लोगों को कठिन शब्‍दों से परहेज होता है। आम बोल चाल को अधिक पसंद करते हैं। मगर, इसका मतलब यह तो नहीं कि आप कुछ भी करें।

ए फलाइंग जट्ट एकता कपूर के प्रोडक्‍शन की फिल्‍म है, जिसको कुछ भी करना बुरा नहीं लगता। इसलिए एकता कपूर जो चाहे बना सकती है चाहे वे मस्‍तीजादे बनाए, चाहे ग्रेट ग्रांड मस्‍ती बनाए और चाहे क्‍या सुपर कूल हैं हम बनाए। उड़ता पंजाब के जरिये वो लोगों को गंदी गालियां देना भी सिखा सकती है, पंजाबियों की तरह।

ग्‍लोबलाइजेशन हो रहा है, तो क्‍यों न भाषा का विस्‍तार गंदी बातों से किया जाए। जब बीट पे बूटी पहली बार देखा तो लगा कि डांस और जड़ी बूटी का संगम होगा, क्‍योंकि टाइगर श्रॉफ जंगलनुमा जगह पर खड़े डांस कर रहे हैं।

मगर, ट्विटर पर चल रहे बीट पे बूटी चैलेंज को देखा तो समझ आया कि यह बाबा रामदेव की बूटी नहीं बल्‍कि यह तो ब्राजीलियन या विदेशी अदाकारों वाली बूटी है, जो बीट पर आम थिरकती नजर आती है।

सावधान! पीवी सिंधू

प्रिय पीवी सिंधु,

बधाई हो तुम्‍हें, शानदार प्रदर्शन और रजत हासिल करने की।

19 अगस्‍त 2016 की रात भारतीयों ने तुमको खूब सारी बधाईयां दी क्‍योंकि तुमने अपने बेहतरीन प्रदर्शन से चांदी जो जीती, हालांकि, हम सोने तक नहीं पहुंच सके। कोई बात नहीं, फिर भी तुम दिल जीतने में कामयाब रही।

तुम भाग्‍यशाली हो कि हार के बावजूद तुम्‍हारे साथ भारतीय क्रिकेटरों सा व्‍यवहार नहीं हुआ, बल्‍कि तुम्‍हारी हार को भी सकारात्‍मक रूप से लिया गया। इस बात से अधिक खुश मत होना। हम भारतीय हैं, भीड़ में चलते हैं। हमसे से कुछ ऐसे भी हैं, जो खाली हाथों से तालियां जरूर बजा रहे हैं, मगर जेबें पत्‍थरों से भरे हुए हैं।

तुमको याद होगा, युवराज सिंह, भारतीय युवा क्रिकेटर। उसके छह छक्‍के आज तक लोगों के जेहन में जिन्‍दा हैं। रातों रात हीरो बन गया। हर कोई युवराज सिंह बनने की होड़ में दिखने लगा। अचानक जिन्‍दगी ने दांव पलटा।

वो ही युवराज सिंह आंख की किरकिरी बन गया। खेल प्रदर्शन में चूकने लगा तो लोगों ने उसके घरों पर पत्‍थर बरसा दिए। ये वो ही लोग थे, जो युवराज को सर आंखों पर बिठाए हुए थे।

भारतीयों का सम्‍मान और प्‍यार बड़ा अनूठा है। तुम अख़बार तो पढ़ती होगी। ख़बरें भी पढ़ी होगी कि एक लड़की को प्रेमी ने तेजाब से जला दिया, क्‍योंकि अब वे किसी और से शादी करने वाली थी। जब मुहब्‍बत करते हैं तो यार को खुदा बना देते हैं, जैसी ही टूटी तो उसको कहीं का नहीं छोड़ते। हमने तो प्‍यार को भी रोमांस, जिस्‍मानी संबंध और प्रभुत्‍वता तक सीमित कर दिया है।

यकीनन, बहुत सारे दर्शक तुम्‍हारा प्रदर्शन लंबे समय से देखते आ रहे होंगे। मगर, बहुत सारे लोगों ने इस बार पहली बार तुम को खेलते हुए देखा। जैसे कि मैंने पहले ही कहा ना, भारत में भीड़ है। सोशल मीडिया पर लहर चली तो हर कोई तेरे रंग में रंग गया। भले ही उसको बैडमिंटन की एबीसीडी न आती हो, लेकिन, तुम्‍हें खेलते हुए जीतते हुए देखना चाहता था।

भारत में बैडमिंटन हर घर में मिल जाएंगे। लेकिन, वो हम शौक के लिए या बच्‍चों के लिए लेकर आते हैं। भले ही हम टीवी पर क्रिकेट के सिवाय कोई खेल देखें या न देखें। कबड्डी का प्रचार बड़े स्‍तर पर हुआ तो हम प्रो-कबड्डी के हो लिए। हम पर भूत सवार होता है। फिर वो मुहब्‍बत का हो या नरफत का।

दरअसल, चौराहों पर, चाय की स्‍टॉलों पर, बातें उसकी की होती हैं, जिसकी लहर हो, और हम लहर का हिस्‍सा न हो तो, बात कैसे बनेगी। हमको तो पुराने जमाने का समझ लिया जाएगा, हमारे तो अहंकार को चोट पहुंच जाएगी। उदासीनता बिलकुल पसंद नहीं।

हम तो टीवी के एंकर्स को नहीं छोड़ते। हम तो बॉलीवुड के सितारों को जमीं दिखा देते हैं। हां, बस एक भीड़ सामने आकर कुछ करने का साहस करे। हम भी शामिल हो जाते हैं, क्‍योंकि भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता। मगर, हमारे सामने दुश्‍मन का चेहरा होता है या सम्‍मानित व्‍यक्‍ति का चेहरा होता है।

अपनी प्रेमिका या जीवन साथी के साथ घूमने फिरने जाने का हर दूसरा व्‍यक्‍ति पहाड़ों पर खड़ा होकर, सड़क के किनारे खड़ा होकर, शाह रुख़ ख़ान का बांहें फैलाने वाला पोज देता है। मगर, वो ही व्‍यक्‍ति शाह रुख़ ख़ान के खिलाफ भी खड़ा हो जाता है, बस थोड़ी सी भीड़ की जरूरत होती है, उसको।

इसलिए कहता हूं, चमक धमक से दूर, अपने खेल पर ध्‍यान देना। जैसे ही तुम भारत आओगी। तुमको कपिल शर्मा के शो में प्रवेश और कुछ विज्ञापन मिलने की संभावनाएं पक्‍की हैं। इसलिए नहीं कि तुमने चांदी जीत ली। बल्‍कि इसलिए कि तुम सोशल मीडिया पर इतना घूम चुकी हो कि अब तुम एक आइकन बन गई हो। तुम वो चेहरा बन गई जो किसी भी उत्‍पाद के साथ जुड़ेगा तो देर सवेर उस उत्‍पाद की बाजार में कीमत बढ़ जाएगी।

तुम्‍हें लग सकता है कि ऐसा थोड़ी होता है। मेरे उत्‍पाद के साथ जुड़ने से कुछ नहीं हो सकता। तुम को पता होगा कि नहीं, मैं नहीं जानता। लेकिन जब आमिर ख़ान ने अपनी पत्‍नी का हवाला देते हुए कुछ कहा था तो उसके बाद आमिर ख़ान को कितनी कंपनियों से नाता तोड़ना पड़ा, ये तो आमिर ख़ान ही जानते हैं। यह वे ही आमिर ख़ान हैं, जिनका सत्‍यमेव जयते देखने के बाद लोग आमिर ख़ान के फैन हो गए थे। स्‍क्रीन के सामने बैठकर आमिर के आंसूओं के साथ अपने आंसू तक बहा देते थे।

भवदीय
एक भारतीय

मुसीबत! फिल्‍मों में बढ़ता चुम्‍बन चलन

पिछले दिनों ड्राइव इन सिनेमा में मोहनजो दरो देखने गए। शादीशुदा आदमी बहुत कम अकेले जाता है, जब भी जाता है परिवार सहित जाता है। सवाल परिवार के साथ जाने या न जाने का तो बिलकुल नहीं। सवाल है कि आप अचानक फिल्‍म देखते देखते असहज हो जाते हो। हालांकि, चुम्‍बन करना बुरा नहीं। मगर, इस तरह चुम्‍बन को बढ़ावा देने उचित भी नहीं, जब सिनेमा घर में परिवार सहित बच्‍चे भी आए हों, जिनको कुछ भी पता नहीं होता।

मेरी छह साल की बच्‍ची है, सिनेमा घर हो या टेलीविजन की स्‍क्रीन, लड़का लड़की के बीच रोमांटिक सीन उसको बिलकुल नहीं अच्‍छे लगते। वो अपना ध्‍यान इधर उधर भटकाने पर लग जाती है। उसको अन्‍य बच्‍चों की तरह डॉरेमन जैसे कार्टून देखने अच्‍छे लगते हैं, जो शायद एक तरह से अच्‍छा भी है। कार्टून चैनलों पर अभी इतना फूहड़ता नहीं आई है।

मोहनजो दरो में एक चुम्‍बन दृश्‍य है, जो काफी बेहतरीन है। मगर, आपको असहज बना देता है क्‍योंकि जब फिल्‍म पूरी तरह सामाजिक सीमाओं में बंधकर चल रही हो और अचानक यूं दृश्‍य आ जाए। अब इसका चलन दिन प्रति दिन बढ़ता चला जाएगा। बड़े बैनर भी अब चुम्‍बन बाजी पर ध्‍यान दे रहे हैं।

आदित्‍य चोपड़ा अपनी अगली फिल्‍म बेफिक्रे में चुंबन दृश्‍यों की सेल लगाने वाले हैं। अब तक फिल्‍म के जितने भी पोस्‍टर आए, जब में रणवीर सिंह और वाणी कपूर खुलकर चुंबन करते नजर आए हैं। ख़बर है कि बार बार देखो में भी चुंबन सीनों पर विशेष ध्‍यान दिया गया है। फिल्‍म के ट्रेलर में ही 5 चुंबन सीन हैं, और ट्रेलर हर कुछ मिनटों पर टेलीविजन की स्‍क्रीनों पर नजर आता है। म्‍यूजिक चैनलों घर में खुले आम देखना, मतलब समय से पहले बच्‍चों को अर्ध ज्ञान के साथ अंधेर गुफा में धकेलने सा है। हालांकि, चुंबन, प्‍यार, रोमांस मानवीय जीवन का हिस्‍सा हैं। इन रंगों के बिना मानवीय जीवन बेरंग, बंजर सा है।

मगर, कच्‍ची उम्र की नादानियां, उम्र भर का दर्द लेकर आती हैं। आज समाज का दायरा विशाल हो चुका है और आज कल बच्‍चे पहले से नहीं रहे। हालांकि, हर मां बाप अपने बच्‍चे को दुनिया से हर बच्‍चे से अलग मानता है और हर मां बाप सोचता है कि उनके बच्‍चे कभी गलती नहीं कर सकते। आज के समय में बच्‍चों को लेकर सतर्क रहने की जरूरत है और उनकी गतीविधियों को समझने की जरूरत है।


चलते चलते। आज कल बॉलीवुड गीतों के वीडियो देखने असंभव है। एमपी 3 में बजाते रहो तो ठीक है। हमारे जमाने में तो इतनी शर्म होती थी कि ब्‍लैक एंड व्‍हाइट टीवी के आगे भी शटर होता है, जैसे महिलाओं के चेहरों पर घुंघट।

अगर नहीं देखी तो 'बोल' देखिए

कुछ दिन पहले पाकिस्‍तानी फिल्‍म बोल देखने को मिली, जो वर्ष 2011 में रिलीज हूई थी, जिसका निर्देशन शोएब मंसूर ने किया था। एक शानदार फिल्‍म, जो कई विषयों को एक साथ उजागर करती है, और हर कड़ी एक दूसरे से बेहतरीन तरीके से जोड़ी है।

कहानी एक लड़की की है, जो अपने पिता के कत्‍ल केस में फांसी के तख्‍ते पर लटकने वाली है। एक लड़के के कहने पर लड़की फांसी का फंदा चूमने से पहले अपनी कहानी कहने के लिए राष्‍ट्रपति से निवेदन करती है। राष्‍ट्रपति उस लड़की के निवेदन को स्‍वीकार करते हैं और वे लड़की अपनी मीडिया से कहानी कहती है।

लड़की के पिता हकीम हैं, जिनका धंधा दिन प्रति दिन डूब रहा है, और हकीम साहेब बेटे की चाह में बेटियां ही बेटियां पैदा किए जा रहे हैं। अंत उनके घर एक बच्‍चे का जन्‍म होता है, जो लड़की है न लड़का। किन्‍नर संतान से हकीम नफरत करने लगते हैं।



लेकिन परिवार के अन्‍य सदस्‍य किन्‍नर को आम बच्‍चों की तरह पालने कोशिश में लग जाते हैं। सालों से घर की चारदीवारी में बंद किन्‍नर बाहरी दुनिया से अवगत हो, खुशी से जीवन जीए, यह सोचकर उसको बाहर भेजा जाता है, मगर, कुछ हवस के भूखे लोगों की निगाह में आ जाता है। एक रात हकीम अपनी ही किन्‍नर संतान को मार देते हैं।

मुसीबत कम होने की जगह बढ़ जाती है। पुलिस वाले हकीम को ब्‍लैकमेल कर उससे मोटी रकम उतरवा लेते हैं, जो मस्‍जिद के चंदे के लिए हकीम के पास आई हुई थी। अब दूसरी तरफ मस्‍जिद प्रबंधन हकीम से धन वापस चाहता है तो ऐसे में हकीम एक पुराने ग्राहक के यहां मदद के लिए जाते हैं, जो कोठा चलाता है।

कोठा चलाने वाला चौधरी हकीम को मदद देने के लिए राजी होता है। मगर, शर्त रखता है कि हकीम चौधरी की पत्‍नी मीना से संबंध बनाए और बेटी जने। अंत मजबूरी में हकीम करने को राजी हो जाते हैं। कुछ महीने बाद चौधरी के घर में लड़की की किलकारी सुनाई देती है।

कहानी के अंत से पहले हकीम के गुप्‍त विवाह का राज खुल जाता है, जब हकीम अपनी नई जन्‍मीं बच्‍ची को मारने का प्रयास करने लगता है तो उसकी बड़ी बेटी जैनब अपने पिता की ही हत्‍या कर देती है और खुद का गुनाह कबूल कर जेल चली जाती है।

कहानी दिखाती है कि एक समाज है जहां लड़कियां चाहिए, और दूसरा समाज जहां लड़कियां बोझ हैं। एक किन्‍नर को समाज किस तरह देखता है, और मानव मानव के साथ भी नीचता करने से नहीं टलता है। मजबूरी से बड़ा कभी आपका धर्म नहीं हो सकता। सबसे बड़ी बात तो लड़की अंत में कहती है कि अगर मारना अपराध है तो बच्‍चे पैदा करना भी गुनाह होना चाहिए, यदि आप खिलाने की क्षमता न हो।

बोल जैसी फिल्‍मों को बड़े स्‍तर पर रिलीज करना चाहिए। ऐसी फिल्‍मों का प्रचार प्रसार हद से ज्‍यादा करना चाहिए, शायद ऐसी फिल्‍मों के कारण फिल्‍म की शुरूआत में कहा जाने वाला संवाद सच साबित हो जाए, और आपके कारण किसी की जिन्‍दगी संवर जाए।

Cast
Manzar Sehbai as Hakim Sahib (Father)
Shafqat Cheema as Ishaq "Saqa" Kanjar (Panderer)
Iman Ali as Sabina (Meena)
Mahira Khan as Ayesha (Second sister)
Humaima Malik as Zainub (eldest sister)
Atif Aslam as Mustafa
Zaib Rehman as Suraiya (Mother)
Amr Kashmiri as Saifi (Brother/hijra)
Irfan Khoosat as Mustafa's father
Rashid Khawaja as the President of Pakistan
Meher Sagar as Young Saifi
Mahnoor Khan as Mahnoor (Third sister)
Gulfam Ramay as GuL G (Ayesha's friend)

मोहनजो दरो से मेलूहा वाया बाहुबली

मोहनजो दरो अमरी गांव के एक युवक और मगरमच्‍छ के बीच होने से टकराव से शुरू होती है। अमरी का युवा श्‍रमन गांव वालों के लिए नायक है, जैसे बाहुबली का शिवा, मुट्ठी भर लोगों के लिए। एक सपना श्‍रमन को एक अनजान शहर की तरफ खींचता है, जैसे पर्वत की ऊंचाई शिवा को।

श्‍रमन का पालन पोषण श्‍रमन के चाचा चाची करते हैं, तो शिवा का पालन पोषण भी उनके माता पिता द्वारा नहीं होता। दोनों अभिभावकों की जिद्द के विपरीत अपने सपनों के शहर जाने के लिए उत्‍सुक होते हैं। दोनों का युद्ध एक करूर राजा या प्रधान से होता है।

सेंसर बोर्ड की गरिमा का ख्‍याल तो करें

निर्देशक अभिषेक चौबे निर्देशित फिल्‍म 'उड़ता पंजाब' को सेंसर बोर्ड ने हरी झंडी दिखाने से मना कर दिया क्‍योंकि फिल्‍म में गाली गालौज बहुत था। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने इस फिल्‍म को हरी झंडी देना बेहतर नहीं समझा। भारतीय सेंसर बोर्ड पिछले कुछ महीनों से चर्चा का केंद्र बना हुआ।

कभी सेंसर बोर्ड में पदाधिकारियों की अदला बदली को लेकर तो कभी सेंसर बोर्ड की गैर एतराजजनक आपत्‍तियों के कारण। ऐसा नहीं कि सेंसर बोर्ड ने उड़ता पंजाब को बैन कर पहली बार दोहरे मापदंड अपनाने की बात जग जाहिर की। सेंसर बोर्ड इससे पहले भी ऐसा कर चुका है।

जाने माने फिल्‍मकार राजकुमार हिरानी की फिल्‍म 'साला खाडूस' को बिना एतराज के पास कर दिया गया जबकि विकास राव द्वारा निर्मित फिल्‍म ‘बेचारे बीवी के मारे’ से साला शब्‍द हटाने का आदेश दिया गया। इस फिल्‍म के निर्माता विकास राव ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड पर भेदभाव भरा सलूक करने का आरोप तक लगाया था।

एक तरफ 'ग्रांड मस्‍ती' और 'मस्‍तीजादे' जैसी फिल्‍मों को रिलीज करने की अनुमति है और वहीं दूसरी तरफ 'उड़ता पंजाब' को इसलिए रोक लिया जाता है कि फिल्‍म में गाली गालौच है। दिलचस्‍प बात तो यह है कि बुद्धा इन ए जाम को इस सेंसर बोर्ड ने पास किया है, जिसमें भी गाली गालौज की कोई कमी नहीं है। मगर, इस फिल्‍म के अभिनेताओं में अनुपम खेर का नाम शामिल था, जो बीजेपी सरकार के सबसे करीब हैं।

इतना ही नहीं, सेंसर बोर्ड ने हाल में मुजफ्फरनगर के दंगों की सच्‍चाई को कथित तौर पर बयान करती फिल्‍म शोरगुल को यू/ए प्रमाण पत्र दिया, जबकि हिंसाग्रस्‍त फिल्‍मों के लिए ए प्रमाण पत्र दिया जाता है, या उनको काफी हद तक साधारण बनाने के आदेश दिए जाते हैं। मगर, इस फिल्‍म के साथ ऐसा नहीं हुआ, क्‍योंकि इस फिल्‍म में यूपी सरकार का चेहरा नंगा किया जाएगा। जैसे उड़ता पंजाब से पंजाब सरकार की खटिया खड़ी होने की संभावना है। पंजाब की मौजूदा सरकार में भाजपा की हिस्‍सेदारी है। दोनों संघी साथी हैं।

इतना ही नहीं, पंजाब में जल्‍द चुनाव होने वाले हैं। यदि उड़ता पंजाब बॉक्‍स ऑफिस पर हिट हो गई तो बीजेपी और शिअद को लेने के देने पड़ सकते हैं क्‍योंकि पंजाब मंत्रियों और पुलिस अधिकारियों पर नशा तस्‍करी में शामिल होने के आरोप लग चुके हैं।

पिछले कुछ सालों में पंजाब ने जो नशे का कहर झेला है, उसको नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। यह तो एक फिल्‍म है, मगर, पंजाब के लोगों ने तो युवा संतानों की अर्थियों को कंधे दिए हैं। सेंसर बोर्ड का कथित राजनीति से लबरेज एकपक्षीय नजरिया सेंसर बोर्ड की गरिमा को गिराएगा।

सैफ से शादी, अर्जुन से हनीमून !

कल रात आर.बाल्‍की निर्देशित फिल्‍म 'की एंड का' देखने के बाद पहला वन लाइन यह ही नहीं निकला। इसमें कोई दो राय नहीं है कि निर्देशक आर.बाल्‍की ने एक बेहतरीन विषय को नए तरीके से पेश किया। मगर, फिल्‍म का एक बड़ा हिस्‍सा करीना कपूर के हनीमून सा लगा।

बात बात पर चूम्‍मा चाटी। अंतरंग सीन । ऐसा लग रहा था कि करीना कपूर ने आर.बाल्‍की की फिल्‍म को इस शर्त पर साइन किया होगा कि उनका हनीमून समय चल रहा है, इस बात का उनको ख्याल रखना होगा।

फिल्‍म की शुरूआत एक शादी समारोह से होती है। इस शादी में करीना कपूर अकेली अकेली खड़ी होती है तो हर कोई उसको नाचने के लिए बुलाता है। पहली हंसी दर्शकों को तब आती है, जब वे अपने पीरियड में होने की बात चीख कर कहती है। दूसरी बार जब वो शादी के प्रति अपनी राय प्रकट करती है।

शादी में सरदार जी करीना को शराब ऑफर करते हैं, जो शायद पंजाब का वास्‍तविक कल्‍चर नहीं लेकिन बॉलीवुड का कल्‍पित कल्‍चर। शादी में बड़बोली करीना शादी के प्रति अपनी राय प्रकट कर निकलती है तो उसकी मुलाकात होती है अर्जुन कपूर से।

बस, यहां से शुरू हो जाती है दोनों की लव स्‍टोरी। अर्जुन कपूर (कबीर) अमीर बाप का बेटा और करीना कपूर (कीया) एक महत्‍वाकांशी कामकाजी महिला। जैसे कि अर्जुन कपूर पहले ही कहे चुके हैं कि फिल्‍म संदेश देने के लिए नहीं बनाई, बल्‍कि मनोरंजन के लिए बनाई है। अर्जुन कपूर सही कह रहे हैं।

अर्जुन करीना कपूर की शादी के दौरान आपको चुटीले संवाद सुनने को मिलेंगे। सिने प्रेमी इस पर गुदगुदाते हुए नजर आएंगे। एक मां का अपनी बेटी से पूछना बेटी सेक्‍स तो कर लिया ना। एक पिता का अपने बेटे से कहना, अगर मर्द होने पर शक हो तो अपनी चड्ढी खोलकर देख ले।

इंटरवल तक तो जीवन में मस्‍त चलता है। इंटरवल के बाद हाउस हस्‍बैंड और काममकाजी पत्‍नी के बीच संबंध वैसे ही हो जाते हैं, जैसे आम विवाहों में। अब शुरू होता है। आर. बाल्‍की का संदेश। दरअसल, आर. बाल्‍की कहना चाहते हैं कि वैवाहिक जीवन में उतार चढ़ाव केवल व्‍यक्‍ति की व्‍यक्‍तिगत सपनों, अहं और जीवन की भाग दौड़ के कारण आते हैं। इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि घर को कौन चला रहा है, महिला या पुरुष।

व्‍यावसायिक दृष्‍टि से तैयार फिल्‍मों को पूरी तरह संदेशवाहक बनाना मुश्‍किल होता है। इन फिल्‍मों में आटे में नमक सा संदेश और बाकी सारा लटरम पटरम होता है। फिल्‍म को देखते हुए दिमाग में ख्‍याल दौड़ रहे थे कि इस फिल्‍म को देखने के लिए बच्‍चे भी आए हैं, जो छह से दस के हैं, उनके दिमाग में संदेश कम, करीना कपूर और अर्जुन कपूर के रोमांस भरपूर सीन ज्‍यादा उतरेंगे।

सिनेमा सी तेजी से बोल्‍ड सीनों और दोअर्थी संवादों के सहारे आगे बढ़ रहा है। उसको देखकर भारतीय सिनेमा में पॉर्न स्‍टारों का कैरियर बनने की संभावनाएं अधिक होती जा रही हैं।

'की एंड का' एक मनोरंजक रोमांस भरपूर फिल्‍म है। अगर, यह निकाल दिया जाएं तो फिल्‍म दस बीस मिनट की भी नहीं बचेगी। अगर, उपरोक्‍त बातों के लिए आप तैयार हैं तो फिल्‍म देखने के लिए जाना चाहिए। मगर, फिल्‍म संदेशवाहक है, तो बिल्‍कुल नहीं सोचें।

अर्जुन कपूर करीना कपूर का अभिनय शानदार है। अन्‍य कलाकारों ने भी अपने किरदार बेहतरीन तरीके से निभाएं हैं। अमिताभ बच्‍चन और जय बच्‍चन की आपसी नोंक झोंक मजेदार है।

'भारत मां की जय' पर बहस बवाल क्‍यों ?

'भारत मां की जय' बोलने और न बोलने को लेकर बड़ा युद्ध छिड़ चुका है। हालांकि, इस तरह के मामले व्‍यक्‍तिगत सोच पर छोड़ने चाहिए। किसको क्‍या बोलना चाहिए या नहीं, यह व्‍यक्‍तिगत मामला होना चाहिए। मगर, भारत में हर चीज को व्‍यक्‍तिगत स्‍वार्थों से जोड़कर बड़ा मामला बना दिया जाता है।

एक तरफ शिवसेना ओवैसी के बयान पर गंभीरता दिखाते हुए भारत मां की जय नहीं बोलने वालों की सदस्‍यता रद्द करने का आह्वान कर रही है। वहीं, दूसरी तरफ हैदराबाद में इस्लामिक संगठन जामिया निजामिया ने भारत माता की जय बोलने के खिलाफ फतवा जारी किया है। हैदराबाद के इस संगठन के मुताबिक, इस्लाम मुस्लिमों को इस नारे की इजाजत नहीं देता।

यदि एक दृष्‍टिकोण से देखा जाए तो अपने देश की जय बुलाने में किसी तरह की शर्म नहीं आनी चाहिए। यदि आप अपने देश को सम्‍मान नहीं दे सकते, तो दूसरे देश को कभी भी सम्‍मान नहीं दे पाएंगे। दूसरा दृष्‍टिकोण यह कहता है कि किसी भी व्‍यक्‍तिगत पर विचारों को थोपा नहीं जाना चाहिए।

ओवैसी ने पिछले दिनों संसद में अपना भाषण जय हिन्‍द के साथ खत्‍म किया। मगर, भारत मां की जय बोलने में एतराज जता दिया। बात समझ से परे है कि जय हिन्‍द क्‍या है ? और भारत मां की जय क्‍या है ? दोनों शब्‍द देश के सम्‍मान को ऊंचा उठाते हैं। बस शब्‍दों का फेरबदल है।

कुछ दिनों पहले दिल्‍ली में एक विशाल धार्मिक समारोह हुआ। इस समारोह में पाकिस्‍तान से भी धार्मिक नेता आए हुए थे। पाकिस्‍तानी धर्मगुरू ने अपना भाषण खत्‍म करते हुए श्रीश्री रविशंकर के पास जाकर घुसर फुसर करते हुए कुछ कहा, जो 'पाकिस्‍तान जिन्‍दाबाद' था।

बड़ी अजीब बात है, विश्‍व को एक करने की सोच लेकर चलने वाले धर्म गुरू भी इस तरह की तुच्‍छ बातों से चूकते नहीं बड़ी हैरानीजनक बात है। वहीं, श्री श्री रविशंकर ने भी बात को संभालते हुए जय हिंद कहा। उनसे भी पाकिस्‍तान जिन्‍दाबाद नहीं कहा गया।

सवाल तो यह है कि सिर्फ शब्‍दों से देश प्रेम पनपना चाहिए। दिल से नहीं। केवल शब्‍दों से हम दुनिया जीत लेंगे। कदापि भी नहीं। जब तक मन छोटे हैं, तब तक एकता का नारा मारा या थोपना बेईमानी होगी। स्‍वयं को धोखा देना होगा। इसके लिए तो विराट हृदय की जरूरत होगी।

कुछ युवक खड़े होकर भारत को गालियां देने लगते हैं। भारत को बुरा भला कहने लगते हैं। हम तिलमिला उठते हैं। मगर, क्‍यों ? क्‍या उनकी आवाज हमारे हृदय में छुपे देश प्रेम से ज्‍यादा ताकतवर है ? नहीं, बिलकुल भी नहीं, बस सबको बेकार के मुद्दे चाहिए, ताकि देश प्रगति से जुड़े मुद्दों पर चर्चा ना कर सके।

ये मस्‍त हाथी की चाल वाले विकासशील देश की स्‍थिति तो नहीं है। हम तो हाथी से भी गए गुजरे हो चलें हैं, जो एक व्‍यक्‍ति के भौंकने पर पत्‍थर उठाकर खड़े हो जाते हैं। भारत अपनी गति से आगे बढ़ेगा। और हर भारतीय गर्व से कहेगा, मैं भारतीय हूं।

थोपने की जरूरत नहीं। बस, कुछ बेहतर करते हुए चलो।

महिला दिवस - बराबरी की दौड़ में दोहरापन क्‍यों ?

अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस के मौके पर पहले तो देश विदेश की हर महिला को बधाई हो। और उनको भी जो महिला हितैषी का मॉस्‍क लगाकर व्‍यावसायिक लाभ ले रहे हैं।

भारत में महिलाओं के हकों के लिए लड़ने वाले हमेशा चीख चीख कहते हैं, महिलाओं को बराबरी के अधिकार नहीं हैं। उनको बराबरी के अधिकार मिलने चाहिए। मैं ही नहीं, देश के बहुत सारे युवा सोचते होंगे, महिलाओं को ही नहीं, बल्‍कि देश के हर नागरिक को बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए।

मगर, सवाल तो यह है कि क्‍या दोहरी सोच समाज में इस तरह का हो पाना संभव है। वीआईपी संस्‍कृति से लेकर महिलाओं को विशेष अधिकार देने तक की प्रथा ही बराबरी के राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। पिछले दिनों मुझे किसी काम से इंदौर जाना था। मैंने अहमदबाद के बस स्‍टैंड तक जाने के लिए बीआरटीएस को चुना। बीआरटीएस के स्‍टैंड पर मैं बस का इंतजार कर रहा था। मेरी मंजिल तक जाने वाली बस आई, जो खाली थी, मगर जैसे ही उसके भीतर बैठने के लिए कदम आगे बढ़ाए तो अंदर से महिला चीखी, ये महिला बस है। ऐसा एक नहीं तीन बार हुआ, थोड़े थोड़े अंतराल पर।

इतना ही नहीं, एक लड़की अपने पुरुष दोस्‍त के साथ खड़ी थी। जब वे भी बस में चढ़ने लगी तो उसको भी चढ़ने को नहीं मिला, क्‍योंकि उसका साथी पुरुष था। मैंने पुरुष विशेष बस नहीं देखी। महिला विशेष बस देखी। उन 20 मिनटों के दौरान 4 महिला बसें देखी, जो भीतर से खाली थी। इतना ही नहीं, सामान्‍य बस में भी महिलाओं के लिए कुछ सीटें रिजर्व कर दी जाती हैं। उन सीटों पर पुरुष जाकर बैठ जाए तो महिलाएं ऐसे देखती हैं, जैसे पुरुष ने कोई गुनाह कर दिया। जबकि बस की महिला अरक्षित सीटें भरी हों, वे ही महिलाएं पुरुषों की सीटों पर कब्‍जा जमाकर बैठ जाती हैं।

रेलवे में भी महिलाओं के लिए विशेष कोटा। कहीं किसी कतार में लगें तो भी महिलाओं के लिए विशेष कोटा। बराबरी का रोना तो झूठा है, सच तो यह है कि हर कोई यहां अधिक की उम्‍मीद लिए घूमता है। हर कोई अपने लिए विशेष सुविधाएं चाहता है।

दिल्‍ली सरकार सम विषम ट्रैफिक नियम लागू करती है तो महिलाओं को विशेष छूट दे दी जाती है। ट्रैफिक नियमों में भी महिलाओं को पुरुषों से अधिक छूट मिल जाती है, भावनात्‍मक रूप से या कानूनी रूप से। देश की अदालतों में करोड़ों ऐसे केस हैं, जहां केवल महिला होना फायदेमंद हुआ।

बराबरी का अधिकार कानूनों से नहीं, बल्‍कि सोच में बड़े बदलाव से आएगा। जब तक सोच में बदलाव नहीं आएंगे, तब तक बराबरी का ख्‍वाब बेईमानी है। सोच में बदलाव केवल महिलाएं करें ऐसा नहीं पुरुषों को भी करना होगा।

मुझे याद है कि एक दिन इसी तरह के मामले पर एक परिचित महिला से संवाद हो रहा था। उसने बोला, मैं बस सफर में खड़ी रहती हूं, महिला हुई तो क्‍या ? मैं नहीं चाहती कोई जगह ये सोच कर दे कि मैं महिला हूं ? मैं जानती हूं कि महिलाएं पुरुषों से अधिक मजबूत होती हैं, विशेषकर सहनशीलता के मामले में।

मगर, वहां एक दूसरी दिक्‍कत खड़ी हुई, वे सोच की। यदि महिला पुरुषों की भीड़ में अकेली खड़ी हो जाए तो पुरुषों के दिमाग में पहले विचार चलने लगते हैं कि इसको पुरुषों में रहकर अधिक मजा आता है। इस तरह के ख्‍याली पुलाव बनाने वाले पुरुष महिलाओं को विशेष अधिकार की तरफ दौड़ा देते हैं।

इसलिए यदि बराबरी के अधिकार लागू करने हैं तो सोच में परिवर्तन भी जरूरी होगा। महिलाएं भी विशेषाधिकारों को छोड़कर सही तरीके से बराबरी का मार्ग चुनें। यकीनन मुश्‍किल है क्‍योंकि महिलाओं और पुरुषों की लाइन एक हो जाएगी। महिला के लिए स्‍पेशल बस, स्‍पेशल लाइन, स्‍पेशल रूल नहीं होंगे।

पति पीड़ित लड़की की दास्‍तां भी है 'नीरजा'

राम माधवानी निर्देशित 'नीरजा' में सोनम कपूर ने शानदार अभिनय किया। यह फिल्‍म केवल प्‍लेन हाइजैक घटना आधारित नहीं है। इस फिल्‍म के जरिये राम माधवानी ने फ्लैशबैक का सहारा लेते हुए नीरजा भनोट के उस पक्ष को भी उभारा है, जिससे देश की बहुत सारी नीरजाएं परेशान हैं।

एयरप्‍लेन हाइजैक के दौरान लड़की नीरजा आतंकवादियों के चुंगल से तो सैंकड़े जानें बचाने में सफल हुई। मगर, विवाहित जीवन में एक दहेज लोभी पति के उत्‍पीड़न का शिकार होकर जीना भूल गई थी। इस तरह के हजारों मामले हमारी आंखों के सामने घटित होते हैं। हम आंख मूंद लेते हैं।

मगर, अब आंख खोलने की जरूरत है। घर परिवार में कहीं भी नीरजा उदास नहीं होनी चाहिए। जरूरी तो नहीं कि नीरजा आपकी बेटी हो, तभी आवाज उठाएंगे। कभी नीरजा भाभी का पक्ष भी लिया जा सकता है। कभी नीरजा मां का समर्थन भी किया जा सकता है।

यदि नीरजा की बहादुरी पर आप ने तालियां बजाई हैं। कोई नीरजा मर मर नहीं जीए, यह संकल्‍प लें। नीरजा एक बहादुर फ्लाइट अटेंडन्‍ट होने के कारण साथ एक आम लड़की भी थी, जो अपने पति के लिए सब कुछ करने के लिए तैयार थी। मगर, पति को अहं से आगे सूझती नहीं थी।

लड़कियां ही समझौता करें। इसको सोच को भी बदलना होगा। मगर, झूठे अहं के कारण भी रिश्‍ते नहीं टूटें, इसको भी समझना होगा।