हे प्रभु! मेरी क्षमा याचना तो लेते जाएं।

हे प्रभु! मैं बहुत परेशान हूं। मुझे समझ नहीं आता कि मैं क्या करूं ? दिशा से उम्मीद लगाउं बदलाव की ? रोज सोचता हूं कि मेरी समस्याएं भी चर्चा का विषय बनेंगी। इस उम्मीद को दिल में लिए रोज सुबह शाम समाचार की दुनिया में नजर दौड़ाता रहता हूं। सोचता हूं कि शायद अख़बारनवीस मेरी समस्या का समाधान लाएं। कोर्इ ख़बर, खुशख़बर पाती जैसी बनकर सामने आए। जिसको पढ़कर मैं झूम उठूं। जैसे सावन में कोर्इ मोर। मगर, अब तक एेसा हुआ नहीं। रोज घिसीपिटी ख़बरों के साथ कुछ मसालेदार रोचक समाचार आते हैं। हे प्रभु! आज कल तो बाॅलीवुड गाॅशिप से ज्यादा राजनीतिक गाॅशिप को जगह दी जाती है।

पहले मन खुश तो हो जाता था। जब समाचारों में आता था कि विश्व सुंदरी ने अपने पुराने प्रेमी मित्र को छोड़कर नामी गरामी अभिनेता के पुत्र से विवाह रचा लिया। रैंप पर चलते हुए एक माॅडल टाॅप लैस हो गर्इ। आज बाॅलीवुड की बिंदास माॅडल ने भारत की जीत पर न्यूड होने की घोषणा की।

मगर, आज कल तो अजीबोगरीब समाचार आते हैं। लोक सभा में पूछा जाता है कि सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान यात्रा पर हरी साड़ी क्यों पहननी। तो सुषमा स्वराज उसके पीछे का महत्व बताती है कि बुधवार को वे ग्रीन साड़ी ही पहनती है। अच्छा होता प्रभु साथ में बता देती कि बुधवार को हरी साड़ी पहनने से क्या लाभ होता है। मेरे जैसे गरीब के भाग्य खुल जाते, क्योंकि प्रभु आप ने बुधवार का दिन तो सबके लिए बनाया है ना।

हे प्रभु! अगली ख़बर यादव सरनेम से जुड़ी है। आपको जानकार हैरानी होगी, वैसे आप तो जानीजान हैं। फिर भी बता देता हूं, मेरे मन की भड़ास निकल जाएगी। बाबूराम गौर ने यादव समाज में खुलासा किया कि बीजेपी ने उनको यादव सरनेम का इस्तेमाल नहीं करने दिया। यदि करते तो वे मुख्यमंत्री नहीं बनते, यहां तक के उनको टिकट भी नहीं मिलता। सबसे दिलचस्प बात तो यह थी कि उसी सरनेम का इस्तेमाल करने भर मध्य प्रदेश को नर्इ रेलगाड़ियां मिल सकती थी।

हे प्रभु! यदि आपकी भी कोर्इ शर्त है तो बताएं, मैं सरनेम छोड़ो। नेम बदलने को तैयार हूं। अब आप भी राजनेताआें की तरह मुंह नहीं फेरो प्रभु। मेरी अगली बात तो आप से ही जुड़ी हुर्इ है। आप सुना होगा कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं आैर आज एक मंदिर में भगवान का प्रवेश वर्जित कर दिया।

आप चकित नहीं हों, प्रभु! यह बात राहुल गांधी की है। मैं भी मानता हूं, वे युवा है। मगर, दिल्ली के मुख्यमंत्री को अड़चन है। उनको ही नहीं, अन्य राजनेताआें को भी अड़चन है। इस बात को स्वीकार करने में कि राहुल गांधी युवा हैं। मगर, यह अड़चन दुविधा बन सकती है। यदि इस बात को गंभीरता से देश की अदालत ले ले। आपको तो पता ही होगा कि नेशनल हेराल्ड केस चल रहा है। जो कभी ख़बर देने के लिए शुरू किया गया था, आज ख़बरों में है। हालांकि, उनकी कोर्इ ख़बर नहीं लेता, जिनके लिए उसको शुरू किया गया था। चकित करने वाली बात तो यह है, प्रभु। यदि राहुल गांधी को दोषी पा गया, तो उनको जज बाल सुधार गृह भेजेंगे या बड़ी जेल।

हे प्रभु! मुझे क्षमा करना। यदि आपको मैंने बेफिजूल की ख़बरों से प्रताड़ित किया हो। मगर, आपको पता है कि भारत की सवा सौ करोड़ आबादी का एक बड़ा हिस्सा, इस तरह की ख़बरों से रोज परेशान होता है। मगर, परेशान करने वालों को आप भी दंड़ित नहीं करते। थोड़ा सा बुरा लगता है। हे प्रभु! कहां भाग लिए। मेरी क्षमा याचना तो लेते जाएं।

क्यों मेरा रविवार नहीं आता

तुम थक कर
हर शाम लौटते हो काम से,
आैर मैं खड़ी मिलती हूं
हाथ में पानी का गिलास लिए
हफ्ते के छः दिन
फिर आता है तुम्हारा बच्चों का रविवार,
तुम्हारी, बच्चों की फरमाइशों का अंबार
मुझे करना इंकार नहीं आता
क्यों मेरा रविवार नहीं आता
मैं जानती हूं
तुमको भी खानी पड़ती होगी
कभी कभार बाॅस की डांट फटकार,
मैं भी सुनती हूं
पूरे परिवार की डांट
सिर्फ तुम्हारे लिए,
ताकि शाम ढले
तुमको मेरी फरियाद न सुननी पड़े
काम करते हुए टूट जाती हूं
बिख़र जाती हूं
घर संभालते संभालते
चुप रहती हूं,
दर्द बाहर नहीं आता
क्यों मेरा रविवार नहीं आता
तुम को भी कुछ कहती हूं,
तो लगता है तुम्हें बोलती हूं
तुम भी नहीं सुनते मेरी
दीवारों से दर्द बोलती हूं
मगर, रूह को करार नहीं आता
क्यों मेरा रविवार नहीं आता

जरूरी तो नहीं

जरूरी तो नहीं
तेरे लबों पर लब रखूं
तो चुम्बन हो
जरूरी तो नहीं
मेरी उंगलियां बदन छूएं
तो कम्पन हो
जरूरी तो नहीं
तुझे अपनी बांहों में भरूं
तो शांत धड़कन हो
एेसा भी तो हो सकता है
मेरे ख्यालों से भी
तुम्हें चुम्बन हो
मेरे ख्यालों से भी
तुम्हें कम्पन हो
मेरे ख्यालों से भी
शांत धड़कन हो

उर्दू साहित्य की बहती त्रिवेणी 'रेख़्ता''

अमेरिकी उपन्यासकार, संपादक, और प्रोफेसर टोनी मॉरिसन ने लिखा है कि जो किताब आप पढ़ना चाहते हैं, यदि बाजार में उपलब्ध नहीं है, यदि अभी तक लिखी नहीं गर्इ तो वो किताब आपको लिखनी चाहिए। यह कथन उस समय मेरे सामने सच बनकर आया, जब मैं शायरोशायरी की तलाश में भटकता हुआ रेख़्ता डाॅट ओआरजी पर पहुंचा।

दरअसल, रेख़्ता का जन्म भी कुछ इस तरह हुआ है। रेख़्ता के जनक संजीव सर्राफ, जो पेशे से व्यवसायी हैं, एक हिन्दी दैनिक समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में बताते हैं कि उनको उर्दू शायरी पढ़ने का पुराना शौक था, मगर, कुछ शब्द जब उनको समझ नहीं आते थे, तो उनको घुटन महसूस होती थी। दरअसल, यह बहुत सारे लोगों के साथ होता है, लेकिन, जो साहस संजीव सर्राफ ने किया, वो हर कोर्इ नहीं सकता।

उनके इस प्रयास ने न जाने कितने लोगों की समस्या को हल कर दिया। सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि रेख़्ता हिन्दी, इंग्लिश (लिप्यंतरण) एवं उर्दू में उपलब्ध है। इस पर गजल, कविता, शेयर, वीडियो, कहानियों सहित न जाने साहित्य कृतियों के कितने ही प्रारूप उपलब्ध हैं। यदि आप उर्दू शेयरोशायरी का शौक रखते हैं। या कभी कभार आपको उर्दू शायरी के शब्द समझ में नहीं आते तो आप बेहिचक इस वेबसाइट पर जा सकते हैं। रेख्ता डाॅट आेआरजी उर्दू साहित्य ही नहीं बल्कि उर्दू इंग्लिश शब्दकोश भी है।

मैं रेख़्ता डाॅट आेरआरजी के लाजवाब प्रयास को देखकर बेहद उत्साहित हुआ। विशेषकर इस बात से कि आज भी लोग हैं, जो लीक से हटकर करने का साहस रखते हैं। इस वेबसाइट पर एक भी विज्ञापन नहीं है, जिसको देखकर हम कह सकें कि यह तो केवल व्यावसायिक दृष्टि से खड़ी की वेबसाइट है। आपको इस वेबसाइट पर लिखित से लेकर वीडियो प्रारूप में उूर्द साहित्य उपलब्ध करवाया जा रहा है। मैं तो रेख़्ता को उर्दू साहित्य की देवनागरी, इंग्लिश एवं उर्दू में बहती त्रिवेणी कहता हूं। रेख़्ता उर्दू बोली का पुराना नाम है। यह भी मुझे इस वेबसाइट से पता चला। आप इस वेबसाइट के दशर्न कर स्वयं तय कर सकते हैं कि यह किस तरह का लाजवाब एवं सराहनीय साहस है।

राहुल गांधी बोल रहे हैं !

मेरी मां मुझे अक्सर कहती थी कि समय पर काम होते हैं आैर बे समय केवल सिर पटकना होता है। आज मां तो नहीं है, लेकिन उनकी कही बात मुझे याद आ रही है, क्योंकि कांग्रेस के उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी आज जगह जगह सिर जो पटक रहे हैं।

मैं साफ कर दूं कि राहुल गांधी की वापसी कांग्रेस के लिए उम्मीदजनक, आशा की किरण, डूबने वाले तिनके का सहारा आदि हो सकती है। मगर, देश के आम नागरिक की नजर में केवल मौकापरस्ती या अवसरवाद है।

इस बात में कोर्इ शक नहीं है कि कांग्रेस के उपाध्यक्ष वापसी के बाद काफी सक्रिय हो चुके हैं। मगर, इस बात का राष्ट्र के सुनहरे भविष्य से कोर्इ लेन देन नहीं है, क्योंकि अब तक सत्ता उसी परिवार के हाथों में रही है, जिस परिवार के उत्तराधिकारी राहुल गांधी हैं।

गत दिवस फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया के नए अध्यक्ष गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति के खिलाफ विरोध कर रहे छात्रों के समर्थन में खड़े होते हुए कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी ने कहा, ''लोकतांत्रिक रूप से अगर ज्यादातर छात्र यह कहते हैं कि उन्हें वह अध्यक्ष के रूप में स्वीकार नहीं है तो उनको वहां नहीं होना चाहिए।''

मैं सोच रहा हूं कि सच में ये राहुल गांधी बोल रहे हैं, जिनका स्वयं की पार्टी में निरंतर विरोध होता रहा है, जिनको हटाने के लिए पार्टी के भीतर जद्दोजहद चलता रहा है। क्या राहुल गांधी को उस समय लोकतंत्र की परिभाषा नहीं आती थी ? या केवल मौका देखकर शब्दों से खेलना राहुल गांधी ने भी सीख लिया है ?

राहुल गांधी भले ही वापसी के बाद चातुर या शब्दों से खेलने वाले नेता बनकर लौट आए हों, मगर, उनके भीतर एक सशक्त लीडर आज भी कहीं मरा पड़ा है। आप केवल शब्दों की हेरफेर से नेता नहीं बन सकते, नेता का अर्थ अगुआ होता है, जो एक भीड़ का नेतृत्व करता है, जो सामने से आने वाली चुनौतियों को भीड़ से पहले भांपता है, आैर उनसे निबटता है।

पहले संसद के सत्र के दौरान राहुल गांधी लापता हो गए थे। अब वापस लौटते हैं, तो संसद के सत्र की कार्यवाही आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रही। इस तरह सदन का अपमान करना किसी भी नेता या पार्टी को शोभा नहीं देता। हालांकि, विपक्ष का हमेशा एेसा ही रवैया रहा है, मगर, अच्छे नेता समय के ढांचों को बदल देते हैं। उम्मीद करता हूं कि राहुल गांधी अपनी पार्टी का नेतृत्व करते हुए संसद के सत्र की कार्यवाही को बहाल करवाएंगे। मौकापरस्ती का समय नहीं, बल्कि एक अच्छा विपक्ष बनने का समय है।

याकूब मेमन की फांसी बहाने कुछ और भी

मेमन समुदाय के सर्वश्रेष्ठ चार्टेर्ड अकाउंट याकूब मेमन को उसके जन्म दिवस के मौके पर फांसी दी गर्इ। याकूब मेमन ने सीए की डिग्री लेने के बाद एक हिन्दु मित्र के साथ कारोबार शुरू किया। मगर, जल्द ही दोनों अलग हो गए, और देखते देखते मेमन समुदाय का याकूब सर्वश्रेष्ठ चार्टेर्ड अकाउंट बन गया। याकूब मेमन के पास सब कुछ था, नाम, शोहरत, दौलत।

मगर, मृत्यु के समय उसके चरित्र पर एक काला धब्बा था, देशद्रोही होने का। हां, एक समय था, जब फांसी के रस्से चूमने वालों को भारत अपनी सर आंखों पर ही नहीं बल्कि रग रग में बसा लेता था। मगर, उस समय भारत की लड़ार्इ कुछ एेसे लोगों के खिलाफ थी, जो बर्बरता की हद पार किए जा रहे थे।

मगर, याकूब मेमन के गले में डाला फांसी का रस्सा एक समाज को शर्मिंदा कर रहा था, गर्वित नहीं क्योंकि याकूब मेमन उस साजिश का हिस्सा था, जिसने कर्इ हंसते खेलते हुए घरों को एक झटके में बर्बाद कर दिया था। याकूब मेमन, जिस आतंकवादी हमले में शामिल थे, दाउद अब्राहिम के समूह ने उसको बाबरी मस्जिद पर हमले का बदला कहा, मगर, चकित करने वाली बात तो यह थी कि बम्ब धमाकों में मरने वालों का बाबरी मस्जिद गिराने में जरा सा भी हाथ नहीं था, जिन्होंने गिरार्इ, वे आज भी खुलेआम घूमते हैं।

हां, याकूब मेमन के गले में डाला फांसी का रस्सा शायद कुछ हद तक गर्वित करता यदि याकूब मेमन बाबरी मस्जिद गिराने वाले, उस दौरान मरने वाले निर्दोष हिन्दु मुस्लिम लोगों का बदला लेते हुए उन लोगों को निशाना बनाते, जो वास्तव में बाबरी मस्जिद गिराने, मुस्लिम हिन्दु लोगों को मरवाने में शामिल थे।

शहीद उधम सिंह एवं भगत सिंह ने कभी कभी अपने जीवन की भीख नहीं मांगी, क्योंकि उन्होंने केवल उन लोगों को निशाना बनाया, जो वास्तव में घटना के दोषी थे। भगत सिंह ने असेंबली में बम्ब फेंका, मगर किसी की जान तक नहीं ली, केवल अंग्रेजों को समझाया कि कुछ भी हो सकता है। उधम सिंह ने जलियां वाले बाग के दोषी को लंडन में जाकर गोली मारी आैर स्वयं को पुलिस के हवाले कर दिया। उनका फांसी का रस्सा चूमना सार्थक था।

मैंने कहीं नहीं सुना, आैर नाहीं पढ़ा कि फांसी के वक्त भगत सिंह रोया, उधम सिंह रोया क्योंकि उन्होंने जो किया होश में रहकर किया, आैर किसी भी मासूम को नहीं मारा। जो लोग सच में गर्व करने वाला कार्य करते हैं, उनके जीवन के अंतिम पल भी अफसोसजनक नहीं होते। मगर, याकूब मेमन के दामन पर कीचड़ था, गुलाल नहीं।

अंत में, याकूब मेमन पैदा न हों, इसके लिए भी समाज को पहल करनी चाहिए। किसी भी जुर्म का अंत सजा से नहीं होता, अगर, होता तो भारत की जेलों में कैदियों की भरमार न होती। आैर अपराध के आंकड़े दिन प्रति दिन महंगार्इ की तरह उुपर न जाते। देश का कानून सभी के लिए बराबर का होना चाहिए, चाहे वो अफजल गुरू हो, चाहे वो बाबू बजरंगी, माया कोडनानी हो, चाहे बेअंत सिंह का हत्यारा हो ?

नहीं तो, असदुद्दीन ओवैसी का यह सवाल देश की न्यायव्यवस्था को कटघरे में लाकर खड़ा कर देगा, जिसमें ओवैसी पूछते हैं कि बाबू माया के लिए फांसी क्यों नहीं मांगी? ओवैसी ने दलील दी कि अगर राजीव गांधी और बेअंत सिंह के हत्यारों को फांसी नहीं दी गई तो मुंबई धमाके के सबूत देने वाले याकूब को फांसी क्यों दी जा रही है?

तुम पूछते हो तो बताता हूं, मेरे किस काम आती हैं किताबें

तुम पूछते हो तो बताता हूं, मेरे किस काम आती हैं किताबें
जिन्दगी की राहों में जब अंधकार बढ़ने लगता है,
जुगनूआें की तरह राहों में रोशनियां बिछाती हैं किताबें
दुनिया की भीड़ में जब तन्हा होने लगता हूं मैं
तो चुपके से मेरे पास आकर समय बिताती हैं किताबें
सिर से इक छत का छाया जब छीनने लगता है,
तो खुले आसमां की आेर नजर करवाती हैं किताबें
मैं कली से फूल हो जाता हूं पल भर में 
भंवरों की तरह जब मेरे आस पास गुनगुनाती हैं किताबें
चिंता की कड़कती धूप जब चेतन पर करती है वार
बरगद के पेड़ सी अपनी छांव में बुलाती हैं किताबें
अक्कड़ जाती हैं जब बांहें किसी आलिंगन को
सीने से मेरे बच्चे की तरह लिपट जाती हैं किताबें
मेरी जिन्दगी निकल जाए जिसे सीखने में
बस कुछ घंटों महीनों में वे सब सिखाती हैं किताबें
राॅबिन, कार्नेगी, पोएलो आैर गोर्की तो चंद नाम हैं
न जाने आैर कितनी हस्तियों से रूबरू करवाती हैं किताबें 
हां, मैं रहता हूं इक छोटे से आशियाने में हैप्पी,
मुझे भारत से रशिया फ्रांस तक घुमा लाती हैं किताबें 
तुम पूछते हो तो बताता हूं, मेरे किस काम आती हैं किताबें

'प्रभु की रेल' से अच्छी है 'रविश की रेल'

जब सुरेश प्रभु रेल बजट पेश कर रहे थे, उसी समय एनडीटीवी के चर्चित पत्रकार एवं समाचार प्रस्तोता रवीश कुमार एक नई रेल चलाने में मशगूल थे। उम्मीद है कि रवीश की रेल, प्रभु की रेल से अधिक मजेदार लगेगी, क्योंकि में स्वाद, बेस्वाद, खट्टे मीठे स्वाद को शामिल किया गया है।   

नई दिल्ली : रेल बजट का दिन आमतौर पर रोने-धोने में ही गुज़र जाता है। रेल अपने आप में किसी कथाकार से कम नहीं है। रोज़ अनगिनत कहानियां रचती चली जाती है। लेट होने से लेकर टिकट न मिलने के बीच कुछ अच्छी यादें भी हैं, जिन्हें यात्री अपने साथ किसी धरोहर की तरह संभालकर रखते हैं। इसी खयाल से आज मैंने अपने ट्विटर खाते पर पूछ लिया कि बताइए, किस स्टेशन का खाना आपको पसंद आता है और आप सफर के दौरान उस स्टेशन के आने का इंतज़ार करते हैं। इन व्यंजनों और स्टेशनों के नाम पढ़ते-पढ़ते मिनट भर में टाइमलाइन पर रेल का एक ऐसा नक्शा बना, जिससे पढ़ने वालों के मुंह में पानी भर आय़ा। मैं भी उनके जवाब को री-ट्वीट करने लगा।

देखते-देखते मेरी टाइमलाइन पर सुरेश प्रभु से अलग ही रेल दौड़ने लगी। मैंने सोचा कि क्यों न व्यंजनों के हिसाब से इन्हें सजाकर देखा जाए, ताकि एक लिस्ट हम सबके पास हो कि क्या खाने के लिए कहां जाना चाहिए। यह लेख ट्विटर के हमारे मित्रों के सहयोग से तैयार हुआ है। इसके रेलमंत्री वही हैं। मैं तो बस सेवक हूं जी। लेख लंबा हो गया है, लेकिन क्या करें।

सबसे पहले वड़ा-पाव। नमिता ने ट्वीट किया है कि ठाणे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर तीन पर वड़ा-पाव बढ़िया है। रत्नागिरी का वड़ा-पाव खाकर देखें। चालीसगांव, भुसावल, करजत स्टेशनों के वड़ा-पाव का भी सुझाव आया है। उबैदुल्ला ने ट्वीट किया है कि कोंकण रेलवे स्टेशन पर चिपलुन का वड़ा-पाव खाना चाहिए। एलिफिस्टन रोड स्टेशन मुंबई का वड़ा-पाव भी खाने के लिए कहा गया है। बेलगाम ज़िले के घटाप्रभा स्टेशन के मेदूवड़े खाने के लिए सुझाए गए हैं।

मार्टिन ने बताया कि महाराष्ट्र के नंदुरबार स्टेशन पर मिलने वाला दही-चावल शानदार है। संग्राम गावडे ने लिखा कि सतारा का कंदी-पेढ़ा खाइये। कंदी-पेढ़ा मुझे नहीं मालूम, क्या है। मधु का सुझाव है कि राजकोट स्टेशन का डोसा टेस्ट करना कभी, बहुत टेस्टी है। हितेश पटेल का दावा है कि सूरत का लोचा सूरती की शान है।

समोसे कहां अच्छे मिलते हैं, इसकी भी एक जानकारी मिली। अंकिता मौर्या के अनुसार लखनऊ से जौनपुर के बीच निहालगढ़ के समोसे इतने अच्छे हैं कि ट्रेन रुकने से पहले ही सारे खत्म हो जाते हैं। माही का दावा है कि राजस्थान के सूरतगढ़ के समोसे बेहतरीन हैं। उन्नाव स्टेशन के समोसे की भी तारीफ हुई है। बाराबंकी स्टेशन के बाहर विश्वनाथ के समोसे खाकर देखिए। नदीम सिद्दीकी का दावा है। समोसे के मामले में दिल्ली के शकूरबस्ती स्टेशन का भी नाम आ गया। रेवाड़ी स्टेशन के समोसे की भी तारीफ हुई है। गौरव का कहना है कि हापुड़ स्टेशन के समोसे और कॉफी दिलचस्प हैं। हापुड़ की कॉफी के बारे में कई लोगों ने लिखा है।

मुरादाबाद के संदीप चौधरी ने ट्वीट किया है कि फुलेरा स्टेशन पर आमलेट कमाल का बनता है। मुरादाबाद के अन्य व्यंजनों की भी तारीफ हुई है। पल्लव अग्रवाल ने ट्वीट किया है कि मुरादाबाद में सब बकवास ही मिलता है। बाड़मेर के पास समदरी की पूड़ी-सब्ज़ी का 50 बरस से वही टेस्ट है। यहां से पाकिस्तान जाने वाली ट्रेन भी गुज़रती है। विकास जैन का ट्वीट है यह। मलम रानावत ने ट्वीट किया है कि जोधपुर का मिर्ची-बड़ा तो राज्य का व्यंजन बन गया है।

दीप ने बताया कि झांसी कानपुर के बीच एक स्टेशन है ओरई। ओरई के रसगुल्ले बेहद इतने मज़ेदार कि खाते ही आप सारे व्यंजन भूल जाएंगे। ओरई के रसगुल्ले की तारीफ़ में कई ट्विटर मिले। लोकेश दवे ने ट्वीट किया कि इंदौर के रूट पर मीटर गेज लाइन में फतेहाबाद स्टेशन आता है। वहां का गुलाब जामुन। कोई मुकाबला नहीं है उनका। कौशल ने ट्वीट किया है कि महाराष्ट्र के अकोला के नज़दीक शेगाव रेलवे स्टेशन कैंटीन की कचौरी बहुत अच्छी है। राहुल ने लिखा है कि बरौनी के ब्रेड-पकौड़े के सब दीवाने हैं।

सचिन तो विशाखापत्तनम के प्लेटफार्म नंबर एक पर ही ले गए और कहा कि यहां जो फलों का जूस मिलता है, उसे कौन भूल सकता है। भुसावल का केला तो जगतप्रसिद्ध है ही। सिद्धार्थ ने लिखा कि झारखंड के चक्रधरपुर स्टेशन का स्वीट पुलाव खाकर देखिए तो शाहिद ने बताया कि बलिया स्टेशन पर लिट्टी-चोखा बहुत फेमस है। बलिया स्टेशन का लिट्टी-चोखा हमने भी खाए हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान स्टेशन के बाहर लिट्टी-चोखा नाश्ते ने तबीयत हरी कर दी थी। आज़मगढ़ की चोटिया जलेबी क्या है भाई सौरभ अस्थाना। कन्नौज स्टेशन पर देसी घी का गट्टा मिलता है। कुलदीप सिंह यादव ने ट्वीट किया है कि 'गट्टा गटको, गटा गट'। विवेक ने लिखा कि लिच्छवी एक्सप्रेस से चल रहे हों तो भटनी जंक्शन पर जलेबी ज़रूर खा लेना। अंकुर निगम के अनुसार झांसी के प्लेटफार्म पर पूरी-सब्ज़ी ज़रूर खाएं। अजातशत्रु शर्मा का दावा है कि ग्वालियर स्टेशन के बाहर बृजवासी की कचौरी हरी चटनी खाइएगा। गोटेगांव मध्यप्रदेश के आलू-बड़े और अलवर का कलाकंद। जबलपुर स्टेशन से पहले श्रीधाम के आले-बड़े भी मुंह में पानी ला देते हैं।

अनित तो हमें छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के पास चंपा स्टेशन ले गए और बताया कि वहां का बड़ा-चटनी कमाल का है। गुरुराज़ हमें बंगलुरू के पास अरसीकेरे स्टेशन ले गए और कहा कि बढ़िया इडली-चटनी मिलती है। हुबली में मटका दही तो सकलेशपुर का सांबर-चावल बेजोड़ है। प्रतीक ने दावा किया है कि विजयवाड़ा स्टेशन का ब्रेड-आमलेट, वड़ा और फलों का जूस आज़माकर देखिएगा। आशीष तो कहते हैं कि जालंधर स्टेशन पर फ्रूट चाट अच्छा मिलता है।

रतलाम का सेव भुजिया भी पसंदीदा व्यंजनों की लिस्ट में चोटी पर रहा। कई लोगों ने ट्वीट कर बताया कि रतलाम का सेव भुजिया खाने के लिए रातभर जागे रहते थे कि कहीं स्टेशन न निकल जाए। संजीव झा ने ट्वीट किया है कि रतलाम जैसा सेव भुजिया कहीं नहीं मिलेगा। एक सज्जन ने ट्वीट किया है कि ग्वालियर से भिंड के बीच एक शनिचरा स्टेशन है, यहां के शुद्ध देसी घी के बेसन के लड्डू बहुत फेमस है। ऋचा अनिरुद्ध से लेकर कई लोगों ने आबू रोड की रबड़ी की तारीफ की है।

अंबाला कैंट के कुलचे-चने, इगतपुरी का तीखा चाट, जालंधर का फ्रूट चाट, बांदीकुई स्टेशन की कचौरी, गोमोह स्टेशन का आलू चाप, जमालपुर स्टेशन पर पकौड़ी-चटनी, ऊहा का घाटी, पनियहवा का मछरी-भूजा। मोतिहारी रेलवे स्टेशन का भूजा, बंगाल के खड़गपुर स्टेशन का आलू चाप, लुची घुघनी। प्रदीप ने लिखा है कि नसीराबाद का कचौरा फेमस है। कचौरी नहीं कचौरा। अर्चना के अनुसार इटारसी के छोले और चावल खाकर देखना चाहिए। आदित्य के अनुसार सिकंदराबाद स्टेशन के बाहर अल्फा होटल की बिरयानी बहुत फेमस है। तमिलनाडु के स्टेशनों की बिरयानी की तारीफ हुई है। अनुराग श्रीवास्तव ने ट्वीट किया है कि रामपुर स्टेशन पर दस रुपये में काऊ (कौवा) बिरयानी मिलती है, कभी खाकर देखिएगा। राम जाने, यह कौवा बिरयानी क्या है। मैंने तो पहली बार सुनी है। मध्यप्रदेश के नागदा के पोहे। लोग ट्रेन रुकते ही दौड़ पड़ते हैं।

ऐसा नहीं है कि सारे अनुभव अच्छे ही हैं। कुछ ख़राब भी है। पंकज सिंह ने ट्वीट किया है कि बिलासपुर स्टेशन की नज़दीक करीगरोड में मिलने वाली सबसे खराब चाय का जवाब नहीं है। हरियाणा में भिवानी के पास दादरी स्टेशन पर हर रोज़ यात्रियों को स्वयंसेवक फ्री में दौड़-दौड़कर पानी पिलाते थे। इऱफान खान ने ट्वीट किया है कि सर कानपुर स्टेशन पर उल्लू अच्छा बनाते हैं और गन्दगी के साथ परोसते हैं। गाज़ियाबाद और धनबाद की चाय के बारे में भी ऐसी राय आई है। तो मज़ा आया कि नहीं इस लंबे लेख को पढ़कर। भूख लग गई हो तो माफ कर दीजिएगा।

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कोई मेरे भी कपड़े नीलाम करा दे!

श्रीराम चाचा के बहुत दिन बाद दर्शन हुए. वे मस्त मुद्रा में थे. मिलते ही बोले, ‘‘भतीजे कोई मेरी चड्ढी-बनियान नीलाम पर चढ़ा दे, तो मेरा काम बन जाये, बहुत कड़की चल रही है. नीलामी से नाम भी होगा और दाम भी मिल जायेंगे.’’ मुङो तुरंत समझ में आ गया कि चाचा नवलखा मोदी सूट से प्रभावित हो गये हैं.

मैं कुढ़ कर बोला, ‘‘चाचा तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे मैंने कोई नीलामघर खोल रखा हो! और अगर खोल भी रखा हो तो तुम्हारे चड्ढी-बनियान को पूछेगा कौन? तुम सलमान खान हो या फिर तुम्हारे चड्ढी-बनियान में मोदी सूट की तरह सोने के तार बुने हैं?’’ चाचा तपाक से बोले, ‘‘भतीजे, सोने के तार नहीं हैं, पर यह तार-तार तो है.’’ फिर उन्होंने चुटकी से पकड़ कर बनियान को लहराया और कहा, ‘‘देख लो इसमें ‘मेड इन इंडिया’ से लेकर ‘मेक इन इंडिया’ तक!’’ उनकी बनियान में इतने छेद थे जितने कि मच्छरदानी में होते हैं. मैंने समझाने की कोशिश की, ‘‘क्यों अपनी इज्जत नीलाम करने पर तुले हो?’’ मगर चाचा टस से मस न हुए, बोले- ‘‘यहां तो लोग खुद नीलाम हो रहे हैं. देखो अभी आइपीएल में युवराज की 16 करोड़ रुपये की बोली लगी. जब इनसान की नीलामी में कोई शर्म नहीं, तो फिर कपड़ों को नीलाम करने में कौन सी इज्जत चली जायेगी?

असल बात तो यह है कि दाम कितने मिलते हैं. दाम अच्छे लग जायें तो अपने आप इज्जत बढ़ जाती है. और अगर न भी बढ़े तो तुम जैसे पत्रकार किसलिए हैं? प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक से लेकर सोशल मीडिया तक में कलम चला कर मेरी इज्जत में चार चांद लगा देना.’’ मैं समझ गया कि चाचा जिद पर अड़े हैं. वैसे ही जैसे बिहार में मांझी अड़े थे. सो, मैंने चाचा के आगे हथियार डाल दिये और कहा, ‘‘मगर यह चड्ढी-बनियान नहीं चलेगी, कोई सूट-वूट हो तो निकालो.’’ मगर फौरन ख्याल आया कि हमारे चाचा तो उन हिंदुस्तानियों में हैं जिन्हें आज भी तन ढकने को ढंग के कपड़े नसीब नहीं हैं, सूट कहां से होगा. तभी रहीम चाचा नमूदार हुए और मुङो धौल जमाते हुए पूछा, ‘‘क्या खिचड़ी पक रही है?’’

मुझसे पूरा माजरा समझने के बाद बोले, ‘‘श्रीराम का दिमाग गड़बड़ा गया है. हम ‘हिंदुस्तान’ वाले ‘इंडिया’ वालों की नकल क्यों करें? वो तो अच्छा हुआ मोदीजी सूट के साथ पगड़ी पहन कर ओबामा से नहीं मिले थे. नहीं तो आज पगड़ी भी नीलाम हो जाती.’’ इस पर श्रीराम चाचा ठठा कर हंसे, ‘‘किस पगड़ी की बात कर रहे हो रहीम मियां? वह तो उसी दिन नीलाम हो गयी जब उदारीकरण के बाद हमारी आर्थिक और विदेश नीति वर्ल्ड बैंक, आइएमएफ और अमेरिका के इशारों पर तय होने लगी. तब से सब कुछ नीलाम ही हो रहा है. निजी कंपनियों के लिए कोयला और 2जी-3जी का स्पेक्ट्रम नीलाम हो रहा है, तो उच्च शिक्षण संस्थानों में डिग्री नीलाम हो रही है. पैसा फेंको और तमाशा देखो.. लगता है पूरा देश नीलाम पर चढ़ा है.

जावेद इस्लाम
प्रभात खबर, रांची
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