चैनल को नहीं उड़ाने दिया मोदी का मजाक

काठमांडू । नेपाल ने व्यंग्य पर आधारित एक मशहूर टेलीविजन कार्यक्रम के एक हिस्से के प्रसारण पर रोक लगा दी है जिसमें भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी का कथित रूप से मजाक बनाया गया था।

जानकारी के मुताबिक नेपाल टेलीविजन (एनटीवी) ने 'टिटो सत्य' नामक कार्यक्रम के एक भाग का प्रसारण करने पर रोक लगा दी है। अब इसे एडिट कर अगले हफ्ते दिखाया जाएगा।

चैनल के कार्यक्रम निदेशक प्रकाश जंग कार्की ने बताया कि एनटीवी के संपादकीय बोर्ड ने कार्यक्रम के 576वें भाग का प्रसारण नहीं करने का फैसला किया है। उनका कहना है कि इसके कुछ हिस्सों को संपादित किया जाना बाकी है।

उन्होंने कहा, 'यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। बात यह है कि संपादकीय टीम एक छोटे हिस्से को संपादित करना चाहती थी और समय के अभाव के कारण गुरुवार को कार्यक्रम के इस भाग को प्रसारण से वापस ले लिया गया।'

कार्की ने कहा कि कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर व्यंग्य है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ है जिससे भारतीय प्रधानमंत्री की छवि को धक्का लगे। उन्होंने बताया कि इस एपिसोड में को एडिट करने के बाद अगले गुरूवार को इसका प्रसारण होगा।

उधर, इस मामले पर नेपाल में आई खबरों में कहा गया है कि मोदी पर व्यंग्य के कारण कार्यक्रम के इस भाग का प्रसारण नहीं हुआ। वहीं, कार्यक्रम के निर्माता राम गिरी ने कहा, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और हमारे संवैधानिक अधिकार के खिलाफ है।

'6 महीने पार, यू टर्न सरकार' पुस्तक रिलीज

कांग्रेस ने मोदी सरकार के 6 महीने के कार्यकाल के दौरान विभिन्न मुद्दों पर यू-टर्न लेने का आरोप लगाते हुए एक बुकलेट जारी की है। इस बुकलेट में बताया गया है कि सत्ता में आने से पहले बीजेपी ने क्या-क्या वादे किए थे और सत्ता में आने के बाद कैसे वह उनसे पलट गई। '6 महीने पार, यू टर्न सरकार' टाइटल वाली इस बुकलेट में विभिन्न मुद्दों पर बीजेपी सरकार की 22 'पलटियों' का जिक्र किया गया है।

इस बुक को जारी करने के बाद कांग्रेस नेता अजय माकन ने कहा कि पिछले 6 महीने में बीजेपी सरकार 25 यू-टर्न ले चुकी है। उन्होंने कहा कि किताब में सिर्फ 22 यू-टर्न का जिक्र है, किताब छपने के लिए भेजने के बाद सरकार ने 3 और मुद्दों पर यू-टर्न ले लिया।

माकन ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को बांग्लादेश के साथ जमीन की अदला-बदली करने की बात कही, जबकि पिछले साल अरुण जेटली ने हमें चिट्ठी लिखी थी और इस कदम को राष्ट्र विरोधी करार दिया था। उन्होंने पूछा कि सोच में इतना बदलाव कैसे आ गया।

इस बुकलेट में सरकार की अहम नीतियों पर निशाना साधा गया है। रेल किराया, ब्लैक मनी, इंश्योंरेंस सेक्टर में एफडीआई 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी करने, पूरे देश में समान वस्तु और सेवा कर लाने, भूमि अधिग्रहण और फूड सिक्यॉरिटी कानून जैसे मुद्दों पर बीजेपी का घेराव किया है।

अजय माकन ने कहा कि बीजेपी ने विपक्ष में रहते हुए इश्योरेंस बिल और गुड्स ऐंड सर्विसेज़ टैक्स का विरोध किया था, मगर अब वह पार्टियों से अपील कर रही है कि राष्ट्रहित में इनका समर्थन करें। इसी तरह से बीजेपी ने पिछली यूपीए सरकार के भूमि अधिग्रहण और फूड सिक्यॉरिटी ऐक्ट का समर्थन किया था, लेकिन अब वह उन्हें दरकिनार करती दिख रही है।

राइट-टु-फूड, मनरेगा और आधार कार्ड पर सरकार के बदले हुए स्टैंड को भी निशाने पर लिया गया है। अजय माकन ने कहा कि बीजेपी सरकार नया कुछ नहीं कर रही, बस पिछली सरकार की नीतियों की नकल कर रही है। माकन ने कहा कि बीजेपी ने इलेक्शन से पहले सिर्फ सपने दिखाए थे और अब वह अपने वादों को भूल चुकी है। उन्होंने कहा कि सत्ता के लालच में बीजेपी अंधी हो गई थी।

Black Money - काला धन, मोदी सरकार और इंद्र की अप्सराएं

Publish In Swarn AaBha
भारत की जनता को लुभावना किसी बच्चे से अधिक मुश्किल नहीं और यह बात भारतीय नेताओं एवं विज्ञापन कंपनियों से बेहतर कौन जान सकता है। इस बात में संदेह नहीं होना चाहिए कि वर्ष २०१४ में हुए देश के सबसे चर्चित लोक सभा चुनाव लुभावने वायदों एवं मैगा बजट प्रचार के बल पर लड़े गए। इस प्रचार के दौरान खूबसूरत प्रलोभनों का जाल बुना गया, जो समय के साथ साथ खुलता नजर आ रहा है।

देश में सत्ता विरोधी माहौल था। प्रचार के दम पर देश में सरकार विरोधी लहर को बल दिया गया। प्रचार का शोरगुल इतना ऊंचा था कि धीमे आवाज में बोला जाने वाला सत्य केवल खुसर फुसर बनकर रहने लगा। जनता मुंगेरी लाल की तरह सपने देखने लगी एवं विश्वास की नींद गहरी होती चली गई कि अब तर्क की कोई जगह न बची। जो ऊंचे स्वर बार बार दोहराया गया, वो ही सत्य मालूम आने लगा। इस देश की जनता को पैसे की भाषा समझ आती है और विपक्षी पार्टी ने इसी बात को बड़े ऊंचे सुर में दोहराया, जो जनता को पसंद भी आ गया।

नौ जनवरी को यूट्यूब पर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक भाषण को अपलोड किया गया था, जिसमें उन्होंने तत्कालीन सरकार पर धावा बोलते हुए कुछ यूं कहा था, ‘‘ये जो चोर-लुटेरों के पैसे विदेशी बैंकों में जमा हैं न, उतने भी हम एक बार ले आये न, तो हिंदुस्तान के एक-एक गरीब आदमी को मुफ्त में 15-20 लाख रुपये यूं ही मिल जायेंगे। ये इतने रुपये हैं..। सरकार आप चलाते हो और पूछते मोदी को हो कि काला धन कैसे वापस लायें? जिस दिन भाजपा को मौका मिलेगा, एक-एक पाई हिंदुस्तान में वापस आयेगी और इस धन को हिंदुस्तान के गरीबों के काम में लगाया जायेगा।’’

मगर हैरानी उस दिन हुई जब २ नवंबर २०१४ रविवार को माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आकाशवाणी प्रसारण पर जनता से दूसरी बार रूबरू होते हुए 'मन की बात' प्रोग्राम में कहा, ''कालाधन कितना है, इसके बारे में न मुझे मालूम है, न सरकार को मालूम है, किसी को पता नहीं है। पिछली सरकार को भी इसकी जानकारी नहीं थी। मैं आंकड़ों में नहीं उलझना चाहता कि यह एक रूपया है, लाख है, करोड़ है या अरब रुपए है। बस कालाधन वापस आना चाहिए।''

उम्मीद तो यह थी कि सत्ता पाने के बाद चुनावी सभा में सुनने वाला स्वर पहले से अधिक प्रगाढ़ होगा, लेकिन मिला उम्मीद के विपरीत। सरकार में आते ही नरेंद्र मोदी के तेवरों में नरमी नजर आने लगी। समय बीतने लगा, जनता का ध्यान दूसरे मामलों की तरफ खींचने की कोशिश की जाने लगी। 'स्वच्छ भारत अभियान' उसकी कड़ी का एक हिस्सा है। मगर सरकार को समझना होगा कि काला धन, महंगाई एवं बाहरी सुरक्षा जैसे मुद्दों पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। काले धन पर तो बिल्कुल नहीं, क्योंकि सत्ता तक पहुंचाने में इस मुद्दे का बहुत बड़ा योगदान है।

राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ मीडिया कर्मी पुण्य प्रसून वाजपेयी के अनुसार आज से 25 बरस पहले पहली बार वीपी सिंह ने बोफोर्स घोटाले के कमीशन का पैसा स्वीस बैंक में जमा होने का जिक्र अपनी हर चुनावी रैली में किया था। इस काले धन के अश्वमेघ पर सवार होकर वीपी पीएम बन गए, मगर बोफोर्स घोटाले का एक भी पैसा स्वीस बैंक से भारत नहीं आया। सबसे हैरानीजनक बात तो यह है कि इस अश्वमेघ घोड़े पर सवार होकर गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश की सत्ता तक पहुंच गए। मगर अब उनकी सरकार का रवैया भी पुरानी संप्रग सरकार से अधिक अच्छा नहीं है। देश से काला धन बाहर भेजने वालों की सूची को सार्वजनिक न करने के लिए विदेशों के साथ संधि का हवाला दिया जाता है, जो केवल एक बहाना है। देश हित की बात करने वाली सरकार देश विरोधी तत्वों का नाम उजागर करने से पैर पीछे क्यों खींचती है ? इस मामले में यूटर्न क्यूं लेती है ?

जनता को काले धन का अर्थ केवल इतना समझ आता है कि घोटालों से की कमाई को विदेशों में छुपाना होता है। मगर काला धन केवल विदेशों में हो यह कहना भी उचित नहीं, देश के अंदर भी काला धन बहुत है। काला धन वो पैसा है, जो आप ने अज्ञात स्रोत से प्राप्त किया है एवं उसके सामने आप ने सरकार को कर प्रदान नहीं किया। देश के बड़े बड़े घराने अरबों का कर चोरी करते हैं, जिसको अन्य स्रोतों के जरिए पुनः अपने कारोबार विस्तार में लगाते हैं, ताकि उनका कारोबार निरंतर प्रफुल्लित हो।

एक नौकरीपेशा व्यक्ति लगभग अपने सभी कर अदा करता है, क्योंकि उसके पास कानूनविद नहीं हैं, और उसके पास इतना धन भी नहीं होता, जिसको बचाने के लिए वो किसी कानूनविद को तैनात करे। पिछले दिनों एक वकील से मुलाकात हुई, वकील के अनुसार एक बिजनसमैन अपने ग्रुप के अंतर्गत बहुत सारी कंपनियां बनाता है एवं उनमें कर्मचारियों की संख्या उन नियमों को ध्यान में रखकर करता है, जो उसको सरकारी कर अदा करने से बचाते हैं। इस तरह उसकी आमदनी में इजाफा होता है, मगर यह एक तरह से कर चोरी करने का तरीका है एवं चोरी करने वाला एक तरीके से काला धन एकत्र करता है, जिसको वो किसी बैंक में जमा नहीं करता, बल्कि किसी अन्य स्रोत के जरिये पुनः अपने कारोबार में निवेश करवाता है।

यदि देश की सरकार काले धन के खिलाफ असल रूप में काम करना चाहती है तो उसको देश के कारोबारियों के खिलाफ लोहा लेना होगा, जो कोई भी राजनीतिक पार्टी लेने से डरेगी। वर्ष २०१४ के लोक सभा चुनावों का शोर विदेशों तक में सुनाई दिया। प्रचार प्रसार पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए गए। सवाल उठता है कि आखिर प्रचार प्रसार के लिए इतना पैसा आया कहां से ? राजनीतिक पार्टियों को चंदा कहां से आता है ? इसके पीछे कौन सी लॉबी काम करती है ? अभी चुनाव कमिशन ने राजनीतिक पार्टियों को अपना चंदा सार्वजनिक करने को कहा था तो सभी विरोधी पार्टियां एक सुर में हो गई एवं चुनाव आयोग को अपना आदेश वापिस लेने के लिए कहने लगी। आखिर डर किसी बात से लगता है ? कहीं चुनाव प्रचार में लगने वाला धन काला तो नहीं ? क्योंकि ईमानदारों के पास तो जरूरतें पूरी करने के लिए पैसा नहीं, राजनीतिक पार्टियों का पेट भरने के लिए कहां से होगा ? राजनेता एक तरह से बेरोजगार एवं वालंटियर होते हैं, मगर जैसे ही नेताओं को सत्ता मिलती है तो उनके कच्चे मकान आलीशान महलों में तबदील हो जाते हैं ? यदि इस पैसे का हिसाब मांगा जाए तो शायद देश को उसका काला धन मिल सकता है ? एवं स्विस की बैंक में पड़ा काला धन, वैसा ही है,  जैसी इंद्र की अप्सराएं, जो किसी ने देखी नहीं, लेकिन उन अप्सराओं के साथ गृहस्थ जीवन भोगने के लिए लोग अपना वास्तविक गृहस्थ तक त्याग देते हैं। भारतीय जनता को उस बच्चे की भांति नहीं होना चाहिए, तो चांद को पाने की कामना करता है, उसको वास्तविकता को समझना चाहिए। काला धन देश के भीतर ही इतना घूम रहा है, यदि उसको सही व्यवस्था बनाकर रोक दिया जाए तो देश का भला हो सकता है। देश की सरकारों ने कर लगाए, लेकिन उससे बचने के लिए कुछ कानूनविद पैदा कर दिए। देश के सरकारी ही नहीं बल्कि प्राइवेट संस्थानों में निष्पक्षता के साथ सोशिल ओडिट होनी चाहिए। हिसाब किताब में पारदार्शिता होनी चाहिए। यदि ऐसा हो जाए तो शायद काला धन ढ़ूंढ़ने के लिए देश की जनता को स्विस बैंक की तरफ देखने की जरूरत न पड़े। मगर इस तरह का संभव होना मुश्किल है, क्योंकि कारोबारी परिवारों ने राजनीतिक पार्टियों को बड़े स्तर पर हाइजैक कर लिया है। यह कारण है कि चुनावी रैलियों में हुंकार भरने वाले नेता भी सत्ता में आने के बाद नरम होने लग जाते हैं।

मुझे लगता है कि काला धन किसी बैंक में नहीं मिलेगा, चाहे वो भारतीय बैंक हो या स्विस बैंक क्योंकि जिसको पैसे से पैसा बनाने की लत लग जाए, वो बैंक के मामूली ब्याज से पैसे को नहीं बढ़ाएगा, बल्कि वो अपने कारोबार में उसको निवेश कर कर दुगुना करता रहेगा। देश में बाहर से निवेश होने वाले पैसे पर भी सरकार को पैनी निगाह रखनी होगी, कहीं यह भारत में हुए घोटालों का पैसा ही तो भारत में किसी अन्य व्यक्ति द्वारा तो निवेश नहीं किया जा रहा है। भारत में यदि विदेशी कंपनी भी निवेश करती है तो उसके पैसे के स्रोत की पूरी जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए।

ध्यान रहे कि बैंकों का लेन देन तो आज नहीं तो कल ट्रेस हो सकता है, मगर दो नंबर का पैसा हमेशा बिना हिसाब किताब के गुप्त रास्तों से सीमाएं पार करता है।

रॉबर्ट वाड्रा के लिए कांग्रेस मीडिया को नसीहत क्यों देती है ?



रॉबर्ट वाड्रा न कांग्रेसी है और न मनमोहन सरकार के दौरान किसी मंत्री पद पर रहा। हां, रॉबर्ट वाड्रा सोनिया गांधी का दामाद है, जो अब पूरा विश्व जानने लगा है, लेकिन जब भी रॉबर्ट वाड्रा पर उंगली उठती है तो कांग्रेसी क्यों सफाई देने लगते हैं। उसको इस तरह बचाने लगते हैं, जैसे रॉबर्ट वाड्रा सोनिया गांधी का नहीं, बल्कि कांग्रेस का दामाद है।

जब मीडिया ने रॉबर्ट वाड्रा को घेरा तो रविवार को कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला और दिग्विजय सिंह ने वाड्रा का बचाव करते नजर आए। सुरजेवाला ने कहा कि रॉबर्ट वाड्रा न तो किसी सार्वजनिक पद पर हैं, न किसी राजनीतिक दल के पदाधिकारी हैं। ऐसे में उनकी निजता का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को निजी समारोहों में अप्रिय सवालों को बार-बार पूछने से बचना चाहिए।

कितनी अजीब बात है कि मीडिया को नसीहत देते हुए रणदीप सुरजेवाला स्वयं भूल गए कि रॉबर्ट वाड्रा सोनिया गांधी के दामाद है, न कि कांग्रेस के, यदि याद है तो ऐसा बयान देना बिल्कुल उचित नहीं है। मीडिया को नसीहत उस समय देनी चाहिए, जब आप स्वयं नियम का पालन करते हों।

एक अन्य बात मीडिया को एक बात समझनी चाहिए कि पत्रकारिता की गरिमा बनाए रखने के लिए संयम, समझ एवं अच्छी सोच का होना जरूरी है। वाड्रा पर आरोप हैं, जो अभी सिद्घ नहीं हुए, इस माहौल में आप हर जगह एक सवाल पर स्पष्टीकरण लेते अच्छे नहीं लगते हैं।

अब ट्विटर पर सुनिए मनपसंद गाने

वॉशिंगटन । 140 कैरेक्टर्स में आपके विचारों को समेटनेवाली माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर ने अब मनपसंद गाना सुनाने का नया फीचर शुरू किया है। ट्विटर पर आप अपने पॉडकास्ट, ऑडिओ क्लिप्स और म्यूजिक को अपनी या किसी की भी टाइमलाइन पर जाकर प्ले कर सकते हैं।

यह सुविधा ट्विटर स्ट्रीम या मोबाइल डिवाइसेज पर उपलब्ध होगी। ट्विटर ने ब्लॉग पोस्ट में जानकारी दी कि दुनिया के सर्वाधिक प्रभावशाली म्यूजिशियन और मीडिया प्रड्यूसर पहले से ही यूनीक ऑडिओ कंटेंट इस साइट के जरिए शेयर कर रहे हैं।

ऐसे में नया फीचर आपको ट्विटर पर सीधे म्यूजिक सुनने का अनुभव कराएगा। ये फीचर ट्विटर ऑडिओ कार्ड पर काम करेगा और एंड्रॉयड और आईओएस, सभी डिवाइसेज पर उपलब्ध होगा।

अब ट्विटर ब्राउज करना और गाना सुनना साथ-साथ हो सकेगा। फिलहाल ट्विटर ने पार्टनर के रूप में बर्लिन आधारित साउंडक्लाउड नाम की ऑडिओ स्ट्रीमिंग सर्विस से गठजोड़ किया है। साउंडक्लाउड से जुड़े संगठनों में नासा, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस, वाइट हाउस, डेविड गट्टा और कोल्डप्ले शामिल हैं। ट्विटर ने कहा है कि ये एक तरह से ऑडिओ कार्ड फीचर का टेस्ट रन है, ताकि भविष्य में अरबों फॉलोअर्स को बेहतर सर्विस प्रोवाइड कराई जा सके।

मीडिया कवरेज़ पर उठ रहे सवाल

हमारे प्रधानमन्त्री जी अमेरिका दौरे पर है। आइये कुछ
सच्चाइयों से अवगत कराये।

भारतीय मीडिया

1. नरेंद्र मोदी जी का भव्य स्वागत किया गया।
* जब कि स्वागत के समय मात्र भारतीय मूल के पांच अफसर
और एक अमेरिकन प्रोटोकॉल उपस्थित थे।

2. नरेंद्र मोदी जी के लिए कढ़ी सुरक्षा व्यवस्था।
* जब कि एयरपोर्ट से होटल तक मोदी जी अपनी गाडी से
अमेरिकन सुरक्षा व्यवस्था के बिना ही गए। कोई भी अमेरिकन
पुलिस की मोटर साइकिल नहीं थी।

3. मोदी जी का अमेरिकन वासियो ने आथित्य स्वागत किया।
* जब की अमेरिका दौरे का पूरा खर्च भारत ने किया। उनके ठहरने
तक का खर्चा भारतीय दूतावास ने उठाया।

4. आइये देखे वहाँ के लोग और वहाँ के अखबार क्या कहते है।
* न्यू यॉर्क टाइम्स में उनके आने का उल्लेख तक नहीं है। 2002
के दंगो के कारण वहा की कोर्ट द्वारा सम्मन दिए जाने का विवरण
है।
* वाशिंगटन पोस्ट ने उनका मज़ाक उड़ाते हुए लिखा है -
"India’s Modi begins rock star-like U.S. tour" ,
यानि हमारे प्रधानमंत्री की तुलना वहाँ के नाचने - गाने वालों से
की है।

* वाशिंगटन पोस्ट ने यह भी लिखा है की भारत के प्रधानमंत्री के
अमेरिका दौरे से कोई भी महत्तवपूर्ण समझौता (अनुबंध) होने
की संभावना नहीं है।

5. "मैडिसन स्क्वायर गार्डन" जहाँ मोदी जी ने रिवॉल्विंग स्टेज
पर एक रॉक स्टार की तरह भाषण दिया वह भारतीय मूल के
व्यक्तियों (भाजपाई) द्वारा भुकतान करके किराये पर
लिया गया है । वहाँ की सरकार का कोई योगदान नहीं है ।

6. हमारे प्रधानमन्त्री के जापान दौरे के दौरान वहाँ इसी तरह
का माहोल था। जापान के सबसे ज्यादा लोकप्रिय न्यूज़ पेपर -
टोक्यो न्यूज़ पेपर ने उनके जापान आने की खबर मात्र 80sq
cm में पूरी कर दी। हमारे मीडिया ने ऐसा दिखाया जैसे की हमारे
प्रधानमंत्री जी ने पूरा जापान फ़तेह किया है ।

*चीन के प्रधानमंत्री के भारत आने पर हमारी मीडिया ने
ऐसा दिखाया कि जैसे भगवान धरती पर आ गए है और
वो भी अंगूठा दिखा कर चले गए।
.
.
भारत का मीडिया 150 अरब लोगो को उल्लू बना रहा है किसके
इशारे पर ?

Inspiring Story— मछुआरा और बिजनैसमैन

एक बार एक मछुआरा समुद्र किनारे आराम से छांवमें बैठकर शांति से बैठा था । अचानक एक बिजनैसमैन ( कंप्यूटर/ आईटी फील्ड वाला ) वहाँ से गुजरा और उसने मछुआरे से पूछा "तुम काम करने के बजाय आराम क्यों फरमा रहे हो?"

इस पर गरीब मछुआरे ने कहा "मैने आज के लिये पर्याप्त मछलियाँ पकड चुका हूँ ।"

यह सुनकर बिज़नेसमैन गुस्से में आकर बोला" यहाँ बैठकर समय बर्बाद करने से बेहतर है कि तुम क्यों ना और मछलियाँ पकडो ।"

मछुआरे ने पूछा "और मछलियाँ पकडने से क्या होगा ?"

बिज़नेसमैन : उन्हे बेंचकर तुम और ज्यादा पैसे कमा सकते हो और एक बडी बोट भी ले सकते हो ।

मछुआरा :- उससे क्या होगा ?

बिज़नेसमैन :- उससे तुम समुद्र में और दूर तक जाकर और मछलियाँ पकड सकते हो और ज्यादा पैसे कमा सकते हो ।

मछुआरा :- "उससे क्या होगा ?"

बिज़नेसमैन : "तुम और अधिक बोट खरीद सकते हो और कर्मचारी रखकर और अधिक पैसे कमा सकते हो ।"

मछुआरा : "उससे क्या होगा ?"

बिज़नेसमैन : "उससे तुम मेरी तरह अमीर बिज़नेसमैन बन जाओगे ।"

मछुआरा :- "उससे क्या होगा ?"

बिज़नेसमैन : "अरे बेवकूफ उससे तू अपना जीवन शांति से व्यतीत कर सकेगा ।"

मछुआरा :- "तो आपको क्या लगता है, अभी मैं क्या कर रहा हूँ ?!!"

बिज़नेसमैन निरुत्तर हो गया ।

मोरल – "जीवन का आनंद लेने के लिये कल का इंतजार करने की आवश्यकता नहीं । और ना ही सुख और शांति के लिये और अधिक धनवान बनने की आवश्यकता है । जो इस क्षण है, वही जीवन है।

दोस्तों दिल से जियो"

प्रियंका की चुप्‍पी पर अटका कांग्रेस का अधिग्रहण

16वीं लोक सभा के चुनावों में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी को मिले जोरदार जनादेश के बाद राजनीति पार्टियों में उठ पटक का दौर जारी है। इस बार के चुनावों ने राजनीतिक परिदृश्‍य को बदलकर रख दिया, लेकिन ताजुब की बात है कि आज भी राजनीतिक पार्टियां उस जद हैं, जिसके कारण हारी थी। इस जनादेश में अगर सबसे बड़ा झटका किसी पार्टी को लगा है, वो है कांग्रेस। देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को विपक्ष में बैठने के लिए भी गठनबंधन की जरूरत होगी।

जब देश की सबसे बड़ी एवं लम्‍बे समय तक शासन करने वाली पार्टी की यह दुर्दशा हो जाए तो पार्टी के भीतर से विरोधी सुर उठने तो लाजमी हैं। जो नेता चुनावों से पहले दबी जुबान में बोलते थे, आज वो सार्वजनिक रूप से अपना दर्द प्रकट कर रहे हैं। और दिलचस्‍प बात तो यह है कि विरोधी सुर उनके खिलाफ हैं, जिनके इस्‍तीफे को पार्टी हाईकमान ने स्‍वीकार करने मना कर दिया।

कल जिसके नेतृत्‍व में चुनाव लड़ा जा रहा था, आज उसके खिलाफ आवाजें उठ रही हैं। बड़ी की शर्मनाक हार के बाद ऐसा होना था। लेकिन इन्‍हीं आवाजों में एक आवाज परिवार सदस्‍य प्रियंका गांधी के पक्ष में उठ रही है। यह आवाज कह रही है कि प्रियंका गांधी में संभावनाएं हैं। वो पार्टी में जान फूंक सकती हैं। हालांकि, पार्टी नेता अच्‍छी तरह जानते हैं कि इन चुनावों को नरेंद्र मोदी ने दो चीजों के आधार पर लड़ा।

एक पाकिस्‍तान और दूसरा जी। जी से मतलब है कि जीजाजी। राहुल गांधी के जीजाजी, प्रियंका के पति देव। नरेंद्र मोदी की पूरी मुहिम जीजा जी के आस पास थी। जीजा जी काफी चर्चा में रहे, हालांकि जीजा जी को कोई सरकारी जमीन अलाट नहीं की गई। जीजा जी के खिलाफ अभी जांच शुरू हुई है। ऐसे में कांग्रेस में प्रियंका वाड्रा को लेकर आना, आखिर कांग्रेस के लिए कहां तक ठीक होगा।

क्‍या इतनी बड़ी हार के बाद भी कांग्रेस वंशवाद से बाहर निकलने को तैयार नहीं ? क्‍या आज भी कांग्रेस के पास कोई ऐसा नेता नहीं, जो नरेंद्र मोदी की तरह खात्‍मे की कगार पर खड़ी कांग्रेस को जीवन दान दे सके ? इसमें कोई दो राय नहीं कि राहुल गांधी राजनीति में रस नहीं लेते। इस बात को बड़े बड़े कांग्रेसी नेता मानते हैं।

अगर राहुल गांधी को राजनीति में रस नहीं, अगर उनके भीतर क्षमता नहीं नेतृत्‍व की, तो क्‍यूं कांग्रेस गांधी परिवार से अलग नहीं होना चाहिए ? जिस तरह अब राहुल गांधी से निराश हुए कांग्रेसी नेता प्रियंका गांधी से अपनी उम्‍मीद बांध रहे हैं, उसको देखकर लगता है कि बहुत जल्‍द वाड्रा परिवार कांग्रेस का अधिग्रहण कर लेगा।

अधिग्रहण शब्‍द का इस्‍तेमाल इसलिए, क्‍यूंकि प्रियंका गांधी व रॉबर्ट वाड्रा राजनीतिज्ञ नहीं हैं, उन्‍होंने कांग्रेस में जमीन स्‍तर से काम शुरू नहीं किया। उन्‍होंने कारोबार किया। पैसे कमाए। कई निदेशक पहचान नंबरों के लिए निवेदन किया। कारोबार में किसी चीज को अपने कब्‍जे में लेना अधिग्रहण कहलाता है।

अब देखना है कि वाड्रा परिवार इस अधिग्रहण के लिए तैयार होगा कि नहीं, कांग्रेसी नेता तो अपनी तरफ से हाथ बढ़ा चुके हैं। बस डील डन होने में प्रियंका की हां बाकी है। यह सौदा भी लाभ से जुड़ा है। अगर प्रियंका अधिग्रहण करती हैं तो कांग्रेस को मुनाफा होने की संभावना है और लोक सभा चुनावों में हुए नुकसान की भरपाई हो सकती है।

नरेंद्र मोदी, मीडिया और अरविंद केजरीवाल

गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी से अधिक मीडिया पीड़ित कोई नहीं होगा। मोदी जितना तो बॉलीवुड में भी आपको मीडिया पीड़ित नहीं मिलेगा। ग्‍यारह साल तक निरंतर मीडिया के निशाने पर रहे। मीडिया का विरोधी सुर इतना कि उनको पांच इंटरव्‍यूओं को छोड़कर भागना पड़ा।

2012 ढलते वर्ष के साथ एक नए नरेंद्र मोदी का जन्‍म हुआ। यह ग्‍यारह साल पुराना नरेंद्र मोदी नहीं था। इस समय नए नरेंद्र मोदी का उदय हो रहा था। गुजरात की सत्‍ता चौथी वार संभालने की तरफ कदम बढ़ रहे थे। गुजरात की जीत उतनी बड़ी नहीं थी, जितना बड़ा उसको दिखाया गया।

इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ एपको वर्ल्‍ड, पीआर एजेंसी का, जिसने अपने हाथ में मीडिया रिमोट ले लिया था। 2012 की जीत बड़ी नहीं थी। इसका तथ्‍य देता हूं, जब नरेंद्र मोदी पहली बार गुजरात में मुख्‍यमंत्री बने तो उनकी सीटें 127 थी, दूसरी बात सत्‍ता में आए तो उनकी सीटें 117 तक घिसककर आ गई थी। अंत 2012 में यह आंकड़ा महज 116 तक आकर रुक गया।

मगर मोदी का कद विराट हो गया, क्‍यूंकि मीडियाई आलोचनाओं के बाद भी नरेंद्र मोदी निरंतर गुजरात की सत्‍ता पर काबिज होने में सफल हुए। ग्‍यारह साल का वक्‍त नरेंद्र मोदी आज भी नहीं भूलते, तभी तो उन्‍होंने न्‍यूज ट्रेडर जैसे शब्‍द को जन्‍म दिया। हालांकि दिलचस्‍प बात तो यह थी कि नरेंद्र मोदी ने हर न्‍यूज चैनल को अपना इंटरव्‍यू दिया, ताकि अपनी बात पूरे देश तक पहुंचा सके, लेकिन किसी भी न्‍यूज ट्रेडर का नाम नहीं लिया।

नरेंद्र मोदी इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया से त्रसद थे, तभी उन्‍होंने शुरू से ही सोशल मीडिया पर जोर दिया। नरेंद्र मोदी 2007 के आस पास सोशल मीडिया पर पूरी तरह सक्रिय होने लगे। अलग अलग भाषाओं में अपनी वेबसाइट का संचालन किया, ताकि लोगों से जुड़ा जाए। 2012 तक आते आते नरेंद्र मोदी मीडिया के लिए टीआरपी का सबसे बड़ा मटीरियल बन चुके थे।

अब आजतक को राखी सावंत और इंडिया टीवी को भूत प्रेत दिखाने की अधिक जरूरत महसूस न हो रही थी। जी न्‍यूज के नवीन जिंदल के साथ रिश्‍ते बिगड़े, तो कांग्रेस सबसे बड़ी दुश्‍मन के रूप में जी न्‍यूज के सामने खड़ी हो गई। इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया को एक दूसरे की नकल करने की लत है।

इस लत की वजह देश में एक माहौल बनता है। उसकी माहौल में बड़े बड़े बुद्धिजीवी अपने दिमाग से कुछ नए शब्‍दों के साथ मसाले बनाते हैं, जो अख़बारों के कोरे कागजों को काले करने में अहम भूमिका निभाते हैं। इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया सोशल मीडिया पर, और प्रिंट मीडिया इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया के प्रभाव में अपना जीवन बसर कर रहा है।

जहां 2012 में डिजीटल कैंपेन व वन मैन शो के दम पर सरकार बनाने में नरेंद्र मोदी कामयाब हुए, वहीं मीडिया ने भाजपा के भीतर उनकी साख को जन्‍म दिया। अंतिम सांसों पर पड़ी बीजेपी को उम्‍मीद की किरण नजर आई। डूबते को तिनके का सहारा वाली कहावत इस समय सही समझ पड़ रही थी।

बीजेपी ने वरिष्‍ठ नेताओं की नाराजगी को मोल लेते हुए नरेंद्र मोदी को गोआ में पीएम पद का उम्‍मीदवार घोषित कर दिया। यहां पर एलके आडवाणी का विरोध सुर्खियों में रहा। जैसे कि सब जानते ही थे कि नरेंद्र मोदी यहां से पार पाएंगे एवं एक मजबूत नेता बनकर उभरेंगे। वही हुआ, अंत मीडिया ने नरेंद्र मोदी को मजबूत नेता घोषित कर दिया।

उधर, अरविंद केजरीवाल के साथ अन्‍ना अंदोलन अपनी शिखर पर था। सरकार की जड़ों को हिला चुका था। सरकार विरोधी माहौल तैयार हो चुका था। अब सरकार पूरी तरह ध्‍वस्‍त होने के किनारे थे। अनुमान लगने लगे थे कि सरकार आज गिरी या कल गिरी।

इस बीच पांच राज्‍यों के चुनाव आए। बड़ी दिलचस्‍प बात थी कि नरेंद्र मोदी को मध्‍य प्रदेश में चुनाव प्रचार के लिए नहीं जाने दिया गया, लेकिन फिर भी शिवराज चौहान की सरकार ने भाजपा को बहुत बड़ी जीत दिलाने में सफलता हासिल की, जो जीत नरेंद्र मोदी की 2012 की जीत से तो काफी बड़ी थी। मध्‍य प्रदेश के साथ साथ भाजपा ने चार राज्‍यों में अच्‍छा प्रदर्शन किया, लेकिन अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में बनी आम आदमी पार्टी ने दिल्‍ली में नरेंद्र मोदी की लहर वाली भाजपा की हवा निकाल दी। मीडिया ने अपने एग्‍जिट पोल में अरविंद केजरीवाल की पार्टी को आठ सीटें प्रदान की। नतीजे आए तो आंखें खुली की खुली रह गई। पूरा मीडिया जगत अवाक रह गया। स्‍वयं आम आदमी पार्टी को झटका लगा।

आम आदमी पार्टी 28 विधायकों के साथ दिल्‍ली विधान सभा पहुंची। आम आदमी पार्टी ने विपक्ष में बैठने की बात कही, और कहा कि बड़ी पार्टी बीजेपी सरकार बनाए। अब बीजेपी ने इंकार कर दिया। मीडिया ने ख़बर चला दी कि अरविंद केजरीवाल अपनी जिम्‍मेदारी से भाग रहे हैं, जब उनको कांग्रेस बिना शर्त समर्थन दे रही है तो सरकार बनानी चाहिए।

अरविंद केजरीवाल ने जनता के बीच जाकर समर्थन मांगा। तथाकथित कहो या असली, लेकिन अरविंद केजरीवाल ने सरकार बनाई। उम्‍मीद नहीं थी कि अरविंद केजरीवाल सत्‍ता में पहुंचते ही अपनी खांसी की परवाह किए बिना अपनी सरकार को काम में लगा देंगे। अरविंद केजरीवाल ने पुराने नेताओं की तरह किसी भी आभार रैली का आयोजन नहीं किया। सीधे काम में जुटे गए। घर पर पंचायत बुलाई तो कुछ शरारती लोगों ने हल्‍ला कर दिया। इसके बाद मीडिया को लगने लगा कि अब बीजेपी की लहर को झटका लगा सकता है।

उन्‍होंने अरविंद केजरीवाल के कुछ ऐसे वीडियो चलाने शुरू कर दिए। जैसे मैं राजनीति में नहीं जाउंगा। मैं कोई पद नहीं लाउंगा। मैं किसी सरकारी घर में नहीं रहूंगा। मैं सुरक्षा नहीं लूंगा वगैरह वगैरह। न जाने कितनी ऐसी बातें, जो आम आदमी यूं कह जाता है। यह बातें संगीन जुर्म तो नहीं हैं। काम की बात को छुपा दिया गया, अब नए शब्‍द का इस्‍तेमाल शुरू हुआ नौटंकीबाज, जो सोशल मीडिया से आया। सोशल मीडिया पर बीजेपी कार्यकर्ता सबसे तेज थे, उन दिनों। अब मीडिया का एक ही काम था, अरविंद केजरीवाल को अविश्‍वसनीय सिद्ध करना।

जो द्वेषराग नरेंद्र मोदी के प्रति था, अब को विरोधी राग अरविंद केजरीवाल के प्रति पैदा हो गया। स्‍थितियां बदल चुकी थी, अब अरविंद केजरीवाल बदलाव का चेहरा बनकर उभर रहे थे। इस बात से कोई मुकर नहीं रहा था कि अरविंद केजरीवाल नरेंद्र मोदी के लिए मुसीबत बन सकते हैं।

सरकार के विरोध में जनता हो चुकी थी। सिर्फ फैसले पर मोहर लगनी बाकी थी। अब पीआर एजेंसी भी तेज हो चुकी थी। नरेंद्र मोदी भी अपनी जीत के लिए कमर कस चुके थे। निरंतर रैलियां, उनका लाइव प्रसारण। टीवी पर निरंतर आने से तो निर्मल बाबा ने भी बड़े बड़े साधु संतों को पीछे छोड़ दिया था।

अब जनता एक प्रभाव में जीने लगी थी। अब आम आदमी पार्टी की सकारात्‍मक बाद केवल और केवल सोशल मीडिया पर थी, जो उसके समर्थक लिखते थे। और कहीं नहीं। सबसे दिलचस्‍प बात जो इस पूरे घटनाक्रम को देखने को मिली, पूरे देश में आम आदमी पार्टी के वर्करों पर तबाड तोड़ हमले हो रहे थे। मीडिया में कहीं भी चर्चा नहीं हो रही थी। सर्वे बताते हैं कि नरेंद्र मोदी से अधिक अगर मीडिया में किसी को स्‍पेस मिली वो केवल और केवल अरविंद केजरीवाल को मिली, प्राइम टाइम में। मगर सर्वे यह नहीं बताते कि मीडिया ने अरविंद केजरीवाल को लेकर नकारात्‍मक ख़बर कितनी स्‍पेस में दिखाई। इंडिया टीवी ने निरंतर प्राइम समय पर नरेंद्र मोदी को हीरो, तो केजरीवाल को जीरो दिखाया।

जी न्‍यूज का नरेंद्र मोदी के प्रति साधुवाद यह मीडिया में लम्‍बे समय तक याद रखा जाएगा। वहीं, आजतक पर भाजपा की तरफ से निशाने कसे गए, और कहा गया कि अरविंद केजरीवाल के अंदोलन के पीछे आजतक का हाथ है। सोशल मीडिया पर निरंतर हमलों के बाद आजतक ने भी अपनी ख़बरों की तस्‍वीर को बदलने की कोशिश की। एबीपी न्‍यूज ने अरविंद केजरीवाल को दिखाया, उसके दोनों पक्षों को निरंतर दिखाया।

मगर स्‍थितियां ऐसी भ्रमक हो चुकी थी कि कांग्रेस व अरविंद केजरीवाल की बात झूठी और नरेंद्र मोदी की बात सच्‍ची लगने लगी थी। अरविंद केजरीवाल की पुरानी बातों पर हो हल्‍ला करने वाले मीडिया ने नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल की खोज करने की कोशिश नहीं की, क्‍यूंकि इसकी पीआर एजेंसी आज्ञा नहीं देती थी।

मोदी की चुनावी रैलियों में आंकड़े गलत होने के बावजूद मीडिया ने उसकी निंदा नहीं की। सवाल एक ही अंत में पूछता हूं कि आखिर ग्‍यारह साल बाद नरेंद्र मोदी से मीडिया को इतना प्‍यार क्‍यूं उमड़ा ? जन अंदोलन से निकलकर आया अरविंद केजरीवाल, जिसको मीडिया ने स्‍टार बनाया, वो एकदम से नौटंकीवाला कैसे बन गया ? विशेषकर दिल्‍ली की जीत के बाद।

चलते चलते एक और दिलचस्‍प बात कहते चलूं कि ग्‍यारह साल नरेंद्र मोदी के खिलाफ ट्रायल चलाने वाला मीडिया हार गया, और अंत नरेंद्र मोदी जीत गया। दूसरे क्रम अरविंद केजरीवाल के मामले में भी कुछ ऐसा ही होने वाला है, अगर आम आदमी पार्टी यूं जुटी रही। अगर आम आदमी ने हताश होकर एक बार फिर दम तोड़ दिया तो क्‍या कहना।

उम्मीद के सूरज को सलाम

उम्मीद के सूरज को सलाम। रोशनी से जगमगा उठे मेरा महान भारत। हां, हम कर सकते हैं, इस नारे से देश को जगाया था। स्वप्न दिए। उठने की हिम्मत दी। अब वक्त है कुछ कर गुजरने का। उम्मीद करता हूं आप सौ करोड़ हिन्दुस्तानियों की उम्मीदों पर खरे उतरेंगे।

मैंने नहीं देखा, आपका भावुक होना। लाजमी दिल से हुए होंगे। उम्मीद करता हूं देश से अधिक आपकी भावना को आपके मंत्री समझें। ईमानदार तो मनमो​हन सिंह भी थे। अच्छे प्रधानमंत्री थे, लेकिन उनका संगठन कमजोर व खोखला हो चुका है। उनमें नेतृत्व की कमी थी।

अंत जो नारा आप ने मारा। वो बराक ओबामा ने भी मारा था, लेकिन कुछ दिन पहले बराक ओबामा ने खुद माना कि वो करिश्मा नहीं कर पाए। सब कुछ डिलीट कर देना चाहिए। उम्मीद है कि आप नहीं कहेंगे।

मिली ख़बरों के मुताबिक जब आज नरेंद्र मोदी पहले बार लोक सभा पहुंचे। उन्होंने लोकसभा में प्रवेश करने से पहले माथा टेका। लोक सभा पहुंचकर नरेंद्र मोदी भावुक हुए। गला तक रुंध गया।

कह सकते हैं 'मैं देशद्रोही हूं'

बड़ी अजीब स्‍थिति देश के अंदर, विशेषकर इस मंच पर, अगर आप भाजपा को छोड़कर किसी भी दल के साथ खड़े होते हैं, चाहे वो गैर राजनीतिक लोगों का समूह ही क्‍यूं न हो, तो आप देशद्रोही, या गंदी राजनीति करने वाले होंगे।

राजनीति में अब तक सभी दल एक जैसे लगते थे, लेकिन आम आदमी पार्टी के जरिए आम लोगों को राजनीति में आते देखकर आम आदमी के समर्थन में खड़ा हो गया। अगर आपको पसंद नहीं तो मैं देशद्रोही हूं।


अमिताभ बच्‍चन, शाहरुख खान, सलमान खान को पसंद करने वाले भी देशद्रोही कह सकते हैं, क्‍यूंकि मैंने बचपन से अक्षय कुमार को पसंद किया है।

हिन्‍दी संगीत में मुझे कैलाश खेर अच्‍छा लगता है। पंजाबी संगीत में गोरा चक्‍क वाला, राज बराड़ व देबी मखसूदपुरी अच्‍छा लगता है। अगर यह आपकी पसंद न हो तो आप कह सकते हैं मैं देशद्रोही हूं।

मैं रोबिन शर्मा को पढ़ता हूं, अन्‍य बहुत सारे लेखकों को पढ़ा, लेकिन मन पसंदीदा रोबिन शर्मा लगा। अगर आपको पसंद नहीं तो कह सकते हैं मैं देशद्रोही हूं।

मैंने बहुत सारे आध्‍यात्‍मिक गुरूओं को सुना और पढ़ा। ओशो की बातें ठीक लगी। कुछ सत्‍य लगी। मैंने ओशो को जब दिल किया, तब सुना। अगर आपको ओशो पसंद नहीं तो आप कह सकते हैं मैं देशद्रोही हूं।

आखिर आपकी पसंद ही तो मेरी पसंद होनी चाहिए थी। मेरे विचारों पर मेरा अधिकार नहीं होना चाहिए था। केवल आपके विचारों से सहमत होना ही तो देशभक्‍ति है।


- कुलवंत हैप्पी, ब्‍लॉग लेखक

फेसबुक की पहल, पेश किया गुमनाम लॉग-इन ऐप्लिकेशन

सैन फ्रांसिस्को। फेसबुक ने अपने एक अरब से अधिक उपयोक्ताओं का भरोसा बढ़ाने के लिए गुमनाम रहकर फेसबुक का उपयोग करने से जुड़ा ऐप्लिकेशन पेश किया है।

फेसबुक के सह-संस्थापक और प्रमुख मार्क जुकरबर्ग लंबे समय तक कहते रहे हैं कि उपयोक्ताओं को एक ऑनलाईन पहचान रखनी चाहिए लेकिन अब वे फेसबुक पर गुमनाम रहकर इस सोशल नेटवर्किंग साईट पर काम करने का मौका मिलेगा।

फेसबुक ने डाटा ऐप्लिकेशन की पहुंच को नियंत्रित करने के तरीके को भी सुव्यवस्थित किया है। जुकरबर्ग ने एक सम्मेलन में इन बदलावों और फेसबुक को ऐप्लिकेशन के लिए ज्यादा स्थिर मंच बनाने की भी घोषणा की।

जुकबर्ग ने कहा ‘‘लोगों को शक्ति और नियंत्रण देने से वे सभी ऐप्लिकेशन पर भरोसा करेंगे। यह सभी के लिए सकारात्मक पहल है।’’

कंपनी ने कहा कि गुमनाम लॉग-इन (एनॉनिमस लॉग-इन) का उपयोग करना आसान है और वे फेसबुक पर बिना व्यक्तिगत सूचना दिए इस ऐप्लिकेशन का उपयोग कर सकते हैं।

News Nation - नमो लहर — यूपी में बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता हाशिए पर

लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की कथित लहर पर सवार पार्टी के प्रत्याशियों को अब उत्तर प्रदेश के कभी दिग्गज रहे वरिष्ठ नेताओं की जरूरत नहीं है। सोशल मीडिया और मैनेजमेंट के सहारे ही उन्हें अपनी नैया पार होती दिख रही है। आलम यह है कि यूपी भाजपा के कई बड़े नेता हाशिए पर डाल दिए गए हैं या फिर वे खुद नाराज होकर नेपथ्य में चले गए हैं।

कभी भाजपा के दिग्गजों में गिने जाने वाले उत्तर प्रदेश के ये नेता क्या कर रहे हैं, खुद भाजपा कार्यकताओं को ही नहीं पता है। भारतीय जनता पार्टी में कभी यूपी के नेताओं की तूती बोलती थी। एक लंबी श्रृंखला थी मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्र, विनय कटियार, केसरी नाथ त्रिपाठी, ओम प्रकाश सिंह, सुरजीत सिंह डंग, सत्यदेव सिंह, हृदय नारायण दीक्षित, सूर्य प्रताप शाही समेत कई ऐसे नाम हैं जिनका सहयोग लेने से भाजपाई कतरा रहे हैं।

सूत्र बताते हैं कि भाजपा नेतृत्व ने इन्हें हाशिए पर डाल दिया तो अब प्रत्याशी भी इनमें से ज्यादातर लोगों के कार्यक्रमों की मांग नहीं कर रहे हैं। बनारस से कानपुर जाने के लिए मजबूर किए गए दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी की स्थिति खराब है। भाजपा के तीन शीर्ष नेताओं में शामिल जोशी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का उदय पचा नहीं पा रहे हैं। अब वह कानपुर में ही उलझे हुए हैं। सूत्र बता रहे हैं कि उनका कार्यक्रम कोई भी प्रत्याशी नहीं चाह रहा है। उसे डर है कि पता नहीं क्या बोल जाएं और बनी बनाई हवा का रुख मुड़ जाए।

कलराज मिश्र यूपी के बड़े नेता हैं। यूपी का कोना-कोना छानने वाले और कार्यकताओं को नाम से जानने वाले कलराज देवरिया तक सिमट कर रह गए हैं। देवरिया से बाहर निकल नहीं पा रहे हैं। बजरंगी नाम से प्रसिद्ध विनय कटियार अब किनारे हो गए हैं। लल्लू सिंह से शीतयुद्ध में ऊर्जा खत्म करने और लगातार तीन चुनाव हारने के बाद अब कोई प्रत्याशी उनके कार्यक्रम की मांग नहीं कर रहा है। पार्टी लगभग जबरिया उनका कार्यक्रम लगा रही है।

पटेल की प्रतिमा के लौह संग्रहण अभियान में लगाए गए ओम प्रकाश सिंह को अभियान को सफलतापूर्वक पूरा नहीं कर पाने का खामियाजा भुगतना पड़ा है। गठबंधन में उनके पुत्र अनुराग सिंह की दावेदारी वाली मिर्जापुर सीट एक विधायक वाली पार्टी अपना दल के खाते में चली गई। अनुराग ने भाजपा से इस्तीफा दे दिया और ओम प्रकाश सिंह नेपथ्य में चले गए। वैसे खबर यह भी है कि उनके कार्यक्रमों की मांग न के बराबर है। सीट न मिलने से नाराज केसरी नाथ त्रिपाठी भी कोप भवन में जा चुके हैं।

हृदय नारायण दीक्षित जैसे वरिष्ठ नेता को भी पार्टी ने राजनाथ सिंह को जिताने की जिम्मेदारी देकर बांध रखा है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही नाराज हैं। सपा में जाने की खबरें आई थीं, लेकिन मामला बन नहीं पाने की वजह से पार्टी के भीतर ही घुटन महसूस कर रहे हैं। प्रदेश में उनकी सक्रियता शून्य है। सत्यदेव सिंह एवं सुरजीत सिंह डंग जैसे नेता कहां हैं, किसी को खबर नहीं है।

बीजेपी उम्मीदवारों में भी सबसे अधिक मांग मोदी की है। उसके बाद राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह, उमा भारती और लक्ष्मीकांत वाजपेयी की। वरुण गांधी जैसा युवा और तेजतर्रार नेता भी यूपी की बजाय केवल अपने चुनाव क्षेत्र तक सिमटे हुए हैं। योगी आदित्यनाथ का इस्तेमाल भी गोरखपुर और आसपास के क्षेत्रों तक हो रहा है। भाजपा को अब नेताओं की नहीं, लहर का ही आसरा है।

आईएएनएस की रिपोर्ट

Short Story - बाबूजी की बात, और नत्‍थासिंह

नत्‍था सिंह बहुत भोला - भाला इंसान था। जब खेतों के किनारे लगे पेड़ों पर फूल आने वाले होते तो वो उनके पेड़ों के आस पास भंवरों की तरह मंडराने लगता, फूल आते ही उदास होकर घर लौट जाता। अब भी पेड़ों पर फूल आने वाले थे, और नत्‍था सिंह भी। नत्‍था सिंह आया - बाबू जी ने उससे पूछा, जब फूल आने वाले होते हैं तो तुम यहां खुशी खुशी आते हो, लेकिन फूल आने के बाद तुम उदास होकर यहां से निकल जाते हो।

नत्‍था सिंह ने कहा, मैं गुलाबी फूल लेने के लिए यहां आता हूं, लेकिन आपके पेड़ हर मौसम में पीले रंग के फूल देने लगते हैं। तो बाबूजी कहते हैं कि अरे पगले, हमने बबूल के पेड़ उगाएं हैं, तो बबूल के फूल ही आएंगे, गुलाब के कैसे आ सकते हैं। गुलाब के फूलों के लिए गुलाब का पौधा लगाना पड़ता है।

नत्‍थे को बात समझ आई या नहीं, लेकिन मुझे एक बात समझ जरूर आ रही थी। बाबूजी कह रहे थे कि अगर बबूल का पेड़ लगाएंगे तो बबूल के फूल आएंगे, और अगर गुलाब का पौधा है तो गुलाब के फूल। शायद इसका संबंध कहीं न कहीं हमारे विचारों की खेती से भी है। हम अपने भीतर जो पेड़ पौधे लगाते हैं, शायद शब्‍दों में - अपने व्‍यवहार में - उसी पौधे के फूलों को खिलते हुए देखते हैं।

Fiction - टिकट टू पाकिस्‍तान

सुबह सुबह का समय था, सूर्य निकलने में देर थी, चिड़ियां की चीं चीं सुनाई दे रही थी। देव अफीमची खुशी के मारे नाच रहा था। द्वारकी हैरान थी, आखिर आज देव अफीमची बिना चीखे चिल्‍लाए। बिना हाय बू किए। बिना काली नागिन यानि अफीम खाए कैसे उठ गया। भीतर की महिला ने द्वाकी को बेचैन कर दिया, आखिर ऐसा क्‍या हुआ कि देव अफीमची, सुबह सुबह वो भी सू्र्य निकलने से पहले बिस्‍तर से खड़ा हो गया। द्वाकी मन ही मन में सोचने लगी, जब तक पता नहीं चलेगा, तब तक किसी काम में मन नहीं लगेगा।

आज ऐसा लग रहा था, जैसे देव अफीमची को अल्‍लादीन का चिराग मिल गया, और उसकी मनोकामना पूर्ण होगी। आज देव अफीमची द्वाकी को अपने पुराने दिनों की याद दिला रहा था, जब देव अफीमची युवा था, जब दोनों की नयी नयी शादी हुई थी। देव अफीमची, दूसरे नौजवानों की तरह सुबह सुबह इस तरह बड़े शौक से खेतों की तरफ निकलता था।

आज देव अफीमची को, अपनी जवानी की दलहीज लांघे हुए साठ साल हो चले हैं। इस उम्र में जवानी वाला जोश तो भगवान को भी चिंता में डाल दे, यहां तो फिर भी द्वाकी के रूप में एक महिला थी। बिना पूछे कैसे रह सकती थी, लेकिन सीधे सीेधे तो पूछना भी न आता था, कोई तो बात चलानी पड़नी थी।

अपनी स्‍टीक के सहारे चलते हुए द्वाकी देव अफीमची के करीब पहुंची। जो एक बैग में कपड़े भर रहा था। आस पास कुछ चीजें बिखरी हुयी थी। उन चीजों को द्वाकी ने पहले कभी नहीं देखा था, भले ही इस घर में आए हुए द्वाकी को साठ साल से अधिक का समय हो चुका था। भले ही इस मकान को घर बनाने में द्वाकी ने अपने जीवन का एक एक पल लगाया, लेकिन उस बैग के आस पास बिखरी हुयी चीजें द्वाकी ने कभी नहीं देखी थी। अब उसके मन में एक नहीं, बहुत सारे अनजाने सवाल जन्‍म लेने लगे।.......... जारी है

Standpoint - 'हिंदु परिषद' के आगे 'विश्व' क्यूं ?


आप सोच रहे होंगे। यह अटपटा सवाल क्यूं ? बिल्कुल मुझे भी 'विश्व' अटपटा लगता है, जब मैं इस संस्थान के प्रमुख के बयानों को सुनता हूं। देखता हूं या कहीं पढ़ता हूं।

बड़ी अजीब बात है कि आप भारत को एक कट्टर देश बनाने की सोच रखते हैं, लेकिन शब्द विश्व जैसा इस्तेमाल करते हैं। अगर आप भारत को सीमित रखना चाहते हैं, तो सच में 'विश्व' जैसा शब्द एक देश की ऐसी संस्था को शोभा नहीं देता।

यह शब्द वैसा ही है, जैसा दक्षिण भारत की एक राजनीतिक पार्टी indian christian secular party में 'सेकुल्यर'शब्द है। अगर सेकुल्यर हो तो क्रिचियन शब्द क्यूं ? वैसे ही अगर विश्व हिन्दु परिषद भारत को हिन्दु राष्ट्र बनाना चाहती है तो राष्ट्र शब्द स्टीक हो सकता है, लेकिन विश्व शब्द नहीं क्यूंकि राष्ट्र को विश्व की संज्ञा नहीं दी जा सकती।

31 मार्च 2013 को 'हिंदु संगम' समारोह का आयोजन हुआ। इस समारोह में विश्व हिंदु परिषद के प्रमुख प्रवीण तोगड़िया ने कहा था, ''2015 के बाद गुजरात को हिन्दु राज्य घोषित कर दिया जाएगा, क्यूंकि 18000 गांवों में विहिप की मौजूदगी हो जाएगी।''

एक अन्य ख़बर भी आई थी, जिसमें उन्होंने कहा था, अगर मैं ​देश का प्रधानमंत्री बना तो मुस्लिम समुदाय से मतदान का अधिकार छीन लूंगा। मुझे लगता है​ कि इस देश में लोकतंत्र का वो आखिर दिन होगा क्यूंकि उस दिन भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्रिक व्यवस्था वाला देश न रह जाएगा। शायद भारत में उस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी छीन जाएगी। जिसकी लाठी, उसकी भैंस की कहावत जैसी व्यवस्था बचेगी।

एक ताजे घटनाक्रम के अनुसार भावनगर में विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया ने चुनावी मौसम में मुसलमानों को निशाना बनाया है। तोगड़िया ने मुसलमानों को चेतावनी देते हुए कहा है कि वे हिंदू बहुल इलाकों से घर खाली करें। गुजरात के भावनगर में तोगड़िया ने शनिवार रात को विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर एक मुस्लिम बिजनेसमैन के घर के बाहर हंगामा भी किया। इस मुस्लिम बिजनेसमैन ने हिंदू बहुल क्षेत्र में हाल ही में घर खरीदा है। वीएचपी और बजरंग दल ऐसे सौदों का विरोध कर रहे हैं। तोगड़िया ने मुस्लिम बिजनेसमैन को 48 घंटों के भीतर खाली करने की धमकी दी और कहा यदि ऐसा नहीं किया गया तो उनके दफ्तर पर पत्थर, टायर और टमाटरों से हमला किया जाएगा। तोगड़िया ने हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं से कहा कि वे इस घर को अपने कब्जे में ले लें और इस पर बजरंग दल का बोर्ड टांग दें।

यह घटनाक्रम गुजरात का है। जहां मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जो बीजेपी की तरफ से पीएम पद के उम्मीदवार हैं, जो मुस्लिम समुदाय को साथ लेकर चलने का भरोसा दिला रहे हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों हाथों में अब लड्डू कैसे रखेंगे, जैसे वो रैलियों में कहते आए हैं। आरएसएस व विहिप की नजदीकियां किसी से छुपी नहीं, और आरएसएस का ही एक चेहरा बीजेपी है। 2015 तक गुजरात को हिन्दु राज्य घोषित करने का ऐलान भी अहमदाबाद शहर में हुआ। शायद इस मामले में गुजरात के मुख्यमंत्री को अपना स्टेंड क्लीयर करना चाहिए।

नफरत की आंधी में भारत ने हमेशा अपना गौरव खोया है। नफरत से पैदा हुए दंगों में मरने वाले चाहे हिन्दु हो, चाहे मस्लिम, लेकिन छवि देश की खराब होती है। भारत को पाकिस्तान न बनाएं। देश को विकास की जरूरत है। किसी भी धर्म के विनाश की नहीं।
प्रवीण तोगड़िया, तुम आधुनिक भारत के लिए कलंक हो। खुलेआम धमकियों और भड़काऊ टिप्पणियों को वापस लेने के लिए हम तुम्हें 48 घंटे का वक्त दे रहे हैं। 21 अप्रैल 2014

Standpoint - इंटरव्यू या बेआबरू होने का नया तरीका

आज सुबह सुबह कंप्यूटर चलाया। राज ठाकरे के साथ अर्णब गोस्वामी का इंटरव्यू देखने के लिए, लेकिन बदकिस्मती देखिए, मैं आईबीएन ख़बर की वेबसाइट पर पहुंच गया, जहां सीएनएन आईबीएन के चीफ इन एडिटर राजदीप सरदेसाई राज ठाकरे का इंटरव्यू ले रहे थे।

इंटरव्यू देखते वक्त ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कि राज ठाकरे राजदीप सरदेसाई की क्लास लगा रहे हों। एक चैनल के चीफ इन एडिटर को बता रहे थे, इंटरव्यू और इंट्रोगेशन में कितना अंतर होता है।

बोलने को भौंकना जैसे शब्दों से संबोधित किया गया। इंटरव्यू में किस मुद्रा में बैठा जाता है। इंटरव्यू कर रहे हैं तो पीछे हटकर बैठें। आपको अर्णब गोस्वामी नहीं बनना है। इंटरव्यू में आवाज उंच्ची नहीं होती। इंटरव्यू चल रहा है, राजदीप सरदेसाई स्वयं को रोके हुए हैं।

राज ठाकरे अनाप शनाप बोले जा रहे हैं। सवाल तो यह है कि इस तरह का बदतमीजी पर इंटरव्यू करना चाहिए ? अगर इस इंटरव्यू को दिखाया गया तो क्यूं ? इसके पीछे की मजबूरी क्या ? क्या राज ठाकरे का इंटरव्यू इतना महत्वपूर्ण है कि चीफ इन एडिटर जैसे पद पर बैठा व्यक्ति अपनी इज्जत को दांव पर लगाए। कहीं इज्जत की ध​ज्जियां उड़ाने का हमने नया तरीका तो नहीं खोज लिया।

आज राज ठाकरे ने किया। कल कोई और करेगा। इज्जत मालिकों की नहीं, पत्रकारिता की खत्म हो रही है। सोचने की जरूरत है। मीडिया जिस तरह अपनी गरिमा को खत्म कर रहा है, ऐसा लग रहा है कि भारत में अब पत्रकार कम, और पीआर एजेंट ज्यादा होंगे।

फेसबुक पर अब बता सकेंगे दोस्तों को लोकेशन

न्यूयार्क। युवाओं में सर्वाधिक प्रचलित सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक के जरिए जल्द ही आप अपने फेसबुक मित्रों से अपनी वास्तविक भौगोलिक स्थिति भी शेयर कर सकेंगे। फेसबुक एक नया फीचर शुरू करने जा रही है, जिसकी मदद से आप जान सकेंगे कि आपका कौन सा मित्र फेसबुक पर आपसे कौन सी जगह से जुड़ा हुआ है।

इसके लिए आपको 'नीयरबाई फ्रेंड्स' नाम से शुरू किए गए नए फीचर को ऑन करना होगा। लेकिन आपको यह भी जरूर जानना चाह रहे होंगे कि आखिर यह फीचर काम कैसे करेगा। वास्तव में यह फीचर आपके मित्र के मोबाइल फोन के जीपीएस प्रणाली का उपयोग कर आपको उसकी वास्तविक स्थिति की जानकारी देगा।

इस फीचर का उपयोग कर लेकिन आप एक घंटे तक ही अपनी उपस्थिति की जगह से अपने मित्रों को अवगत करा सकेंगे। एक घंटे बाद आप इस जगह में परिवर्तन कर सकेंगे।

फेसबुक हालांकि इस फीचर को शुरुआत में सिर्फ अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए ही शुरू करेगा। इस नए फीचर की घोषणा करते हुए कंपनी ने कहा कि 18 वर्ष से कम आयु के उपयोगकर्ताओं को 'नीयरबाई फ्रेंड्स' फीचर का लाभ नहीं दिया जाएगा। इसके अलावा उपयोगकर्ता अपनी लोकेशन से अवगत कराने के लिए अपने मित्रों की सूची सीमित कर सकते हैं।

आमिर खान पर उंगली उठाने वाले कहां हैं ?

सत्यमेव जयते में आमिर खान महिलायों के साथ होने वाले अत्याचार की बात उठा रहा था तो एक विरोधी खेमा उनके निजी जीवन पर सवाल उठा रहा था, लेकिन आज वो खेमा कहां चला गया, कहां जाकर सो गया, जब नरेंद्र मोदी ने 12 साल बाद शादी की बात को स्वीकार किया।

आमिर खान ने तो कानूनी दायरे में रहकर दूसरी शादी की, पहली से तलाक लिया, लेकिन इस महाशय ने तो शादी भी नहीं निभाई और तलाक भी नहीं लिया। एक बात और कह देता हूं, दुहाई मत देना बाल विवाह था, शादी 19 साल की उम्र में हुई थी, मोदी व उनकी पत्नि तीन महीने साथ रहे थे, तीन साल के दौरान।

हल्फनामे में पत्नि की संपत्ति वाले कॉलम को खाली छोड़ा जानकारी नहीं लिखकर कितना उचित है। अगर सब यही करने लगे तो संपत्ति का ब्यौरा कौन देना चाहेगा। चुनाव आयोग चुप है हैरानी इस बात पर भी होगी। अगर वो कॉलम अनिवार्य नहीं तो उसको निकाल देना चाहिए।

आप कह सकते हैं यह नरेंद्र मोदी की निजी मामला है, लेकिन हल्फनामा किसी का निजी नहीं होता, वहां नियम देखे जाते हैं। अगर आप हल्फनामा गलत करते हैं तो देश आप पर यकीन कैसे करेगा कि आप कभी अपने फायदे के लिए गलत जानकारी नहीं देंगे।

वैसे लगता है कि आजकल मोदी एक रिकॉर्ड बनाने की होड़ में हैं। झूठ बोलने का रिकॉर्ड। मोदी का 56 इंच का सीना तो सब को याद है, लेकिन सत्य तो है कि मोदी का 44 इंच का सीना है, बाकी तो केवल उनकी लहर है। मोदी की लहर भी ऐसी है कि उनको अख़बार के फ्रंट पेज से लेकर अंदर तक के पेज अपने विज्ञापन के लिए खरीदने पड़ रहे हैं।

मेरी दुआ है।
अब की बार, मिले जशोदाबेन को प्यार
दिग्विजय सिंह हैं बधाई के हकदार


चलते चलते

नरेंद्र मोदी के शादी खुलासे के बाद भारतीय महिलाएं सतर्क हो चुकी हैं, सुनने में आया है कि उन्‍होंने फेसबुक के मालिक को पत्र लिख भेजा है कि वो भी भारतीय चुनाव आयोग की तरह थोड़े से सख्‍त नियम बनाएं। उधर, सूत्रों का कहना है कि फेसबुक के मालिक परेशान हैं, भारतीय राजनीति में तो एक आध हो सकता है, लेकिन हमारे यहां तो हर दूसरा भारतीय नरेंद्र मोदी है।

पहले ही खुलासा कर देते पांच सौ करोड़ तो बच जाते

व्हाट्सऐप पर मिलेगी वॉयस कॉलिंग सेवा

व्हाट्सऐप इस्तेमाल करने वालों के लिए खुशखबरी. अब उन्हें वहां वॉयस कॉलिंग की भी सुविधा मिलेगी. कंपनी ने फरवरी में इसकी घोषणा की थी. अब इस पर काम लगभग पूरा हो चुका है और कंपनी इसे जल्द शुरू कर देगी.

व्हाट्सऐप मोबाइल मैसेजिंग में अग्रणी है. इसे हर महीने 46 करोड़ से भी ज्यादा लोग इस्तेमाल करते हैं. फेसबुक ने हाल ही में इसका अधिग्रहण कर लिया है. कंपनी यह सुविधा शीघ्र शुरू करने जा रही है, यह बात इससे पता चली कि कंपनी ने हिंदी अनुवाद का काम शुरू कर दिया है. इस पर काम करने वाले लोगों से कंपनी ने फिर से अनुवाद का आग्रह किया है. ये वाक्य वॉयस कॉलिंग फीचर व्हाट्सऐप में इस्तेमाल होंगे.

पता चला है कि हैंगअप, इनकमिंग कॉल जैसे शब्दों के अनुवाद कराए गए हैं. यह महत्वपूर्ण इसलिए है कि डेवलपर सबसे आखिर में अनुवाद का काम करवाते हैं. यानी जब सारा काम खत्म हो जाता है तो ही डेवलपर अनुवाद का काम करवाते हैं. इसका मतलब साफ है कि वॉयस कॉलिंग फीचर जल्द ही चालू होगा.

व्हाट्सऐप के सीईओ जैन कूम ने मोबाइल वर्ल्ड कांग्रेस मं घोषणा की थी कि वॉयस कॉलिंग सुविधा पहले एंड्रॉयड और आईओएस में मिलेगी और फिर विंडोज तथा ब्लैकबेरी में. इसके पहले एक इतालवी ब्लॉग में आईओएस के लिए व्हाट्सऐप के स्क्रीनशॉट्स लीक हो गए थे. इसमें हिंदी में लिखे शब्द साफ दिख रहे हैं. फेसबुक ने हाल ही में अपनी मैसेंजर सेवा में वॉयस कॉलिंग को भी शामिल किया है, लेकिन अभी यह एंड्रॉयड के लिए ही है.

ट्विटर ने बदला अपना फेसलुक, बनने लगा फेसबुक

माइक्रो ब्लॉगिंग सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर अब नए रंग-रूप में दिखने वाला है. जल्द ही इसका लुक फेसबुक की तरह होने जा रहा है.  साइट के ब्लॉग में लिखा गया है कि इस नए बदलाव के साथ ट्विटर के यूजर्स अब खूद को ज्यादा लोगों तक पहुंचा सकेंगे.

क्या होगा नया
- अब ट्वीट वाला हिस्सा ज्यादा बड़ा दिखेगा जिससे आप ज्यादा बहेतर ढंग से लोगों के सामने रह पाएंगे.
- अब आप अपने किसी खास ट्वीट को पिन कर सकते हैं (जैसे फेसबुक में हाईलाइट करते हैं अपने पोस्ट को) ताकि अपनी खास बात अपने चाहने वालों तक पहुंचा सकें
-सबसे खास बात अब आपको अपने ट्विटर अकाउंट में फिल्टर का ऑपशन मिलेगा जिससे आप न चाहने वाले ट्वीट को आसानी से फिल्टर कर पाएंगे
- फेसबुक की तरह यूजर्स अब इसमें भी कवर फोटो लगा सकते हैं.

इसके साथ अब प्रोफाइल पिक्चर भी काफी बड़े साइज में आपको दिखेगी. हालांकि इसके लिखने में जो शब्दों की पाबंदी है उसमें फिलहाल कोई बदलाव नहीं किया गया है और न ही ये बदलाव अभी मोबाईल यूजर्स को मिल पाएगा.

कल ट्विटर के इस खास बदलाव को कुछ लोगों तक सीमित किया गया था लेकिन अब जल्द ही सबके लिए उपल्बध होगा. अमेरिका की पहली महिला साइट(फर्स्ट लेडी) पर इस बदलाव को देखा जा सकता है.

बैंड—बाजा, बारात और 'आप' की टोपी

वाराणसी में निकली आप की टोपी पहने बारात की ख़बर।
हिसार (हरियाणा) चुनाव की खुमारी अब सिर चढ़कर बोलने लगी है। राजनीतिक पार्टियों के समर्थक अपने-अपने दल के लिए प्रचार का कोई तरीका नहीं छोड़ रहे हैं। इसी कड़ी में हरियाणा में जिला सिरसा के गांव सलारपुर के एक युवक ने भी आम आदमी पार्टी के प्रचार-प्रसार के लिए अनोखा तरीका अपनाया।

आम आदमी पार्टी के इस पक्के समर्थक मुकेश धंजु ने अपनी शादी में सेहरा तो पहना, मगर उस पर टोपी पहनी 'आप' की। उसने बारात में शामिल होने वाले दोस्तों-रिश्तेदारों को भी 'आप' की टोपी पहनने का आग्रह किया। दूल्हे के आग्रह को कोई ठुकरा नहीं पाया। दूल्हे की बहनों और महिला बारातियों ने भी सिर पर टोपी पहनकर बारात में शिरकत की। गांव सलारपुर से 'आप' की टोपी पहने मुकेश धंजू की बारात ऐलनाबाद पहुंची।

दुल्हे मुकेश ने बताया कि मैं हमेशा से ही भ्रष्टाचार विरोधी विचारधारा का रहा हूं। मैं 'आप' के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल की नीतियों से प्रभावित रहा हूं। इसी से प्रभावित होकर और प्रेरणा लेकर मैं शुरू से ही केजरीवाल के साथ जुड़ा हुआ हूं और उनके आंदोलनों में बढ़चढ़ कर भाग लेता रहा हूं। जहां भी मुझे मौका मिलता है, भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाने से मैं नहीं चूकता।

अब चुनावी माहौल में सोमवार को जब मेरी शादी हुई, तो मैंने इसे भी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने और सिरसा से 'आप' प्रत्याशी का चुनाव प्रचार करने का यह अनूठा तरीका सूझा और मेरे परिवारवालों और मित्रों ने भी इसमें उसका पूरा सहयोग किया।

दूल्हे के दोस्त प्रदीप सचदेवा ने बताया कि मुकेश आम आदमी पार्टी के आंदोलन को देश के नवनिर्माण का सच्चा आंदोलन मानते हैं, इसलिए इन पलों को यादगार बनाने के लिए ही उसने यह कदम उठाया। दूल्हे के दोस्त और पार्टी के डॉक्टर कुलदीप, पंकज कामरा, प्रदीप सचदेवा और मंगल सिंह ने अपनी ओर से मुकेश के उज्जवल वैवाहिक जीवन की कामना करते हुए उसे शुभ कामनाएं दीं।

स्रोत : नवभारत टाइम्स डॉट कॉम

अरविंद केजरीवाल से नाराज श्री श्री! क्यूं ?

फेसबुक पर आजकल एक ख़बर को बड़े जोर शोर से शेयर किया जा रहा है, जिसमें अरविंद केजरीवाल की बुराई करते हुए नजर आते हैं पूजनीय श्री श्री रविशंकर जी।

अब नाराजगी का कारण बता देता हूं। मैं लम्बे समय से इस संस्थान के टच में हूं, अपरोक्ष रूप से। नरेंद्र मोदी व श्री श्री में बहुत निकटता है, जो 2012 के विधान सभा चुनावों से निरंतर जारी है।

पिछले महीने मोदी की किताब 'साक्षी भाव' को रिलीज भी श्री श्री ने किया। उसी शाम को अहमदाबाद में भोज भी रखा गया, जहां अपने भक्तों से कहा गया, लक्ष्मी कमल पर वास करती है, ध्यान रहे।

बात यहां कहां खत्म होती है, मथुरा से चुनाव मैदान में हेमा मालिनी हैं, जो गुरू की अनुयायी हैं, उनके घर अ​द्वितीय का उद्घाटन भी श्री श्री ने अपने कर कमलों से किया।

दिल्ली पूर्व चुनाव लड़ने वाले बीजेपी के उम्मीदवार महेश गिरि कौन हैं ? बता देता हूं, 16 साल की उम्र में घर छोड़कर हिमालय निकल गए। कुछ समय बाद गीर में आकर रहने लगे एवं गुरु दत्तात्रेय पीठ ​गीर के पीठ प्रमुख बने। यहां 2002 में वो श्री श्री के सन्निध्य में पहुंच गए। अध्यात्म से दिल भर गया तो राजनीति की तरफ चहल कदम शुरू कर दी।

अब चुनाव श्री श्री के शिष्य मैदान में हों, मोदी की तरफ से भोज उपलब्ध करवाया गया हो, तो लाजमी है कि नरेंद्र मोदी का राह रोकने वाला, उनको ​रास्ते से भटक गया लगेगा। हालांकि अरविंद केजरीवाल ने श्री श्री की प्रतिक्रिया को उस तरह लिया, जैसे श्री श्री अपनी सत्संग में कहते हैं। साक्षी भाव, स्वीकार करें।





लेकिन स्वयं श्री श्री साक्षी भाव का अ​र्थ क्यूं भूलते जा रहे हैं। वहां तो कोई तारंग नहीं होती, जो हो रहा होता है, वह होता है। वहां तो मौन की गूंज होती है। लेकिन राजनीति में अपने शिष्य उतारकर श्री श्री अब राजनीति में प्रवेश कर चुके हैं।

राम मंदिर के बहाने, यूं ही कुछ चलते चलते

राममंदिर, इसको अगर थोड़ा सा तोड़कर पढ़ा जाए तो शायद इसका अर्थ कुछ ऐसा होगा। राम+ मन+ अंदर। राम तो कण कण में बसता है, उसको कहां जरूरत है किस एक जगह बंधकर बैठने की।

राम मंदिर की बात करने वाले अगर अपने राम को खुश देखना चाहते हैं तो उसकी प्रजा को पेट भर भोजन दें। इंटरनेट नहीं, बिजली सुविधा दें। उनके गलों को तर करें, उनके खेतों तक पानी पहुंचाने पर माथा पच्‍ची करें। इंटरनेट तो आ ही जाएगा, जब पैसे आएंगे। वैसे भी फेसबुक वाला फ्री में नेट देने के लिए कोशिश कर रहा है, वो कामयाब हो जाएगा। आपको जरूरत नहीं। 

भावनगर जाते समय मैंने बहुत खूबसूरत मंदिर देखे, मुझे लगता है कि जितना पैसा गुजरात में मंदिर निर्माण पर खर्च होता है, उतना किसी अन्‍य जगह पर नहीं होता। वहां पर अभी तीन से चार मंदिरों का निर्माण जारी था, जो जल्‍द बनकर तैयार होंगे।

गुजरात में स्‍वामिनारायण भगवान के मंदिर, जैनों के मंदिर, अलग अलग कुल देवियों के मंदिर। शायद ही कोई ऐसा मार्ग हो जहां आपको मंदिर न मिले। मंदिर तो स्‍वयं लोग बना देंगे, जैसा आपने कल्‍पना भी नहीं की, लेकिन पहले उनकी पेट की भूख को तो खत्‍म कर दें। पहले उनको चांद तो चांद नजर आने दें। चांद में उनको महबूब, मामा तो दिखने दें।

हम ईसाईयों पर आरोप लगाते हैं उन्‍होंने हिन्‍दुओं को पैसे देकर धर्म परिवर्तन कर दिया। पैसे आज जरूरत हैं, जिसको नकारा नहीं जा सकता, मौत से बेहतर व्‍यक्‍ति किसी धर्म की छांव में बैठना चाहेगा, अगर कुछ दिन बदले में जीना मिलता हो।

मोदी के सबसे बड़े करीबी बनकर उभरे डॉक्‍टर सुब्रमण्‍य स्‍वामी कहते हैं कि हम को कोई एतराज नहीं, मुस्‍लिम इस देश में रहें, वो हिन्‍दु को स्‍वीकार लें, क्‍यूंकि उनके वंशज हिन्‍दु थे, लेकिन सवाल यह है कि धर्म स्‍वीकार लेने से क्‍या फर्क पड़ता है, अगर भीतर न बदला जा सका।

गजनबी के जब हमले होते थे, कुछ कमजोर दिल वाले अपनी जान बचाने के लिए धर्म कबूलते होंगे। बदले में उनकी जान बची होगी। धीरे धीरे उनका वो ही धर्म हो गया और उसको मानने लगे।

जैसे आज कल नरेंद्र मोदी की हवाओं को देखते हुए कुछ कांग्रेस बीजेपी में आ गए, तो वो बीजेपी के हो गए। अगर कल को कांग्रेस वाले कहें, उनको कांग्रेस का धर्म ही कबूलना चाहिए, क्‍यूंकि उनकी पैदाइश कांग्रेस से हुई है तो, नहीं नहीं अब दुहाई होगी धर्म व राजनीति दोनों में फर्क है।

आप अपने मंदिरों व धर्म को इतना उदार बना दीजिए कि लोगों के कदम खुद ब खुद आपके मंदिरों की तरफ चल पड़ें। मैंने बहुत सारे अंग्रेजों को हिन्‍दु चोले पहनते देखा है, वो खुशी से पहनते हैं। उनको आनंद आता है। उनके चेहरों पर अद्भुत आनंद होता है। उनको लगता है कि उनके जीवन मेंं कुछ महत्‍वपूर्ण घटा है।

लेकिन कुछ कट्टर हिन्‍दु घटाने की कोशिश करना चाहते हैं, घटना और घटाने में अंतर है। जबरदस्‍ती बलात्‍कार हो सकता है, प्‍यार नहीं। प्‍यार के लिए शरीर के भीतर की आत्‍मा को जीतना पड़ता है।

अगर भीतर उतर गए, तो बाहरी चोले से अधिक अंतर नहीं पड़ता। मगर देश का दुर्भाग्‍य है कि आज के अध्‍यात्‍म गुरू अपने राह से भटक चुके हैं। श्री गुरू नानक देव जी एक गांव में गए, उन्‍होंने गरीब लालो के घर का खाना खाया, लेकिन अमीर मालिक भागो का खाना वापिस कर दिया। गुरूजी ने कहा कि मालिक तुम्‍हारा खाना मेहनत के तैयार नहीं हुआ, बेईमानी, गरीबों के खून पसीने से लथपथ है।

मगर आज हमारे धर्म गुरू भारत में शराब बेचने वाले, नंगे कलेंडर बेचने वाले, देश का धन लुटाने वाले नेतायों के रहमोकर्म पर अधिक पलते हैं। उनके हवाई जहाजों में घूमते हैं। अध्‍यात्‍म का गिरता स्‍तर हिन्‍दुस्‍तान के लिए घातक है, न कि किसी ढांचे का गिरना।

राम मंदिर, राम तो मन के अंदर है। उसके द्वार खो दें, सब ठीक हो जाएगा। गजनबी क्‍या लेकर गया यहां से, क्‍या सिकंदर लेकर गया। सिकंदर को भारत में न घुसने देने वाले पोरस को कौन याद करता है, भारत में, क्‍यूंकि वो पाकिस्‍तान में छूट गया।

नरफत पाकिस्‍तान के खिलाफ कट्टर पंथियों के खिलाफ होनी चाहिए। आवाज में गद्दारों का नाम होना चाहिए, पूरे समुदाय का नहीं। आज मंदिर मजिस्‍द चर्चों के बीच की लड़ाई से ऊपर उठकर उन युवायों के हितों के बारे में सोचना होगा, जो नेतायों से बहुत कदम आगे हैं। जो विदेशी जीवन जीने की ललक रखते हैं, जिनको हम ने विदेशी सिनेमे के जरिए वहां के रहन सहन से तो रूबरू करवाया दिया, लेकिन वैसा कुछ भारत में बना न सके, बनाते हैं तो भारत के परंपरागत ढांचे को चोट पहुंचती है।

बाबरी मस्जिद विध्वंस को लेकर Cobra Post का खुलासा

आम चुनाव के शुरू होने से ठीक पहले 'कोबरा पोस्ट' द्वारा बाबरी मस्जिद से जुड़ा एक नया स्टिंग ऑपरेशन सामने लाया गया है। कोबरा पोस्ट के स्टिंग के सामने आने के बाद से राजनीतिक हलकों में हड़कंप मच गया है। इस स्टिंग में दिखाया गया है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस योजना पहले से बनाई गई थी। इसकी जानकारी बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं थी। बीजेपी इस स्टिंग औऱ इसके जारी करने की टाइमिंग का खुलकर विरोध कर रही है। वहीं विरोधी पार्टियों का कहना है कि इस स्टिंग में कुछ नया नहीं है।


ऑपरेशन जन्मभूमि:- कोबरपोस्ट उस षड्यंत्र की तह मे जाता है और उन लोगों से मिलता है जो दिसंबर 1992 मे हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस के पीछे थे और यह पाता है की यह एक पूर्वनियोजित साजिश थी ।
कोबरपोस्ट राम जन्मभूमि आंदोलन के उन नेताओं को बेनकाब करता है जिन्होंने षड्यंत्र रच कर 6 दिसंबर 1992 को सोलहवी शताब्दी के एक विवादित ढांचे को धूल मे मिलाने मे सफलता प्राप्त की ।एक ऐसी साजिश जिसे इतने साल बीत जाने के बाद भी सी बी आई जैसी खुफिया एजेंसी भी ना सुलझा पायी।

नयी दिल्ली: अपने एक बड़े इन्वैस्टिगेशन मे कोबरपोस्ट ने 6 दिसंबर 1992 के दिन बाबरी मस्जिद के विध्वंस के पीछे की साजिश और इस साजिश को अंजाम देने वाले लोगों को बेनकाब किया है। ऑपरेशन  जन्मभूमि मे की गयी इस तहकीकात की दौरान इस षड्यंत्र मे शामिल लोगों ने कोबरपोस्ट के सामने परत दर परत विध्वंस की योजना का खुलासा किया है। कोबरपोस्ट के खुलासे से यह बात साबित हो जाती है की बाबरी विध्वंस किसी उन्मादी भीड़ का काम नहीं था बल्कि यह एक सोची समझी रड़नीति के तहत की गयी कार्रवाई थी। इसकी योजना इतनी गुप्त रखी गयी थी की आज तक किसी भी सरकारी एजन्सि को इसकी कोई भनकी नहीं लग पायी है। बतौर मिसाल वर्षों की छानबीन के बावजूद सी बी आई को उन सभी चालीस लोगों के खिलाफ अकाट्य प्रमाण नहीं मिल पाये हैं जिन्हे उसने अपनी चार्ज शीट मे अभियुक्त करार दिया है।

कोबरपोस्ट के एसोशिएट एडिटर के॰ आशीष ने राम जन्म भूमि आंदोलन मे अगली पांत के नेता रहे 23 लोगों से मुलाक़ात की। ये सभी लोग बाबरी मस्जिद के विध्वंस मे शामिल रहे हैं। इनकी भूमिका या तो साजिशकर्ता के रूप मे थी या उस साजिश को अमली जामा पहनाने मे इनकी भूमिका थी। आशीष ने इन लोगों से एक लेखक के रूप मे मुलाक़ात की जो इनसे अयोध्या आंदोलन पर अपनी प्रस्तावित पुस्तक के बारे मे जानकारी चाहता था। आशीष ने बजरंग दल, वीएचपी और बीजेपी के चंपत राय बंसल, रामजी गुप्ता, प्रकाश शर्मा, रमेश प्रताप सिंह, विनय कटियार, जयभान सिंह पवेया, धर्मेंद्र सिंह गुर्जर, बी एल शर्मा प्रेम, ब्रिज भूषण शरण सिंह, साध्वी उमा भारती, कल्याण सिंह और लल्लू सिंह से बातचीत की। उसके बाद शिवसेना के जय भगवान गोयल, पवन पांडे, संतोष दुबे, सतीश प्रधान और मोरेश्वर सावे से बातचीत की और फिर हिंदु संत समाज के स्वामी सचिदानंद साक्षी महाराज, महंत राम विलास वेदांती, साध्वी रितमबरा, महंत अवैद्यनाथ, आचार्य धर्मेंद्र और स्वामी नृत्य गोपाल दास से बात की।
इनमे से 15 लोगों को लिब्रहान आयोग ने दोषी ठहराया है तो वहीं सी बी आई ने इनमे से 19 लोगों को अपनी चार्जशीट मे आरोपी बनाया है।  हैरानी की बात यह है की सीबीआई ने बी एल शर्मा, महंत अवैद्यानाथ, महंत नृत्य गोपाल दास और महंत राम विलास वेदांती जैसे महत्वपूर्ण किरदारों को अपनी जांच और चार्ज शीट का हिस्सा नहीं बनाया है। कुल मिला कर बाबरी विध्वंस के मामले मे 40 लोगों पर सीबीआई कोर्ट मे मुकदमा चल रहा है, जिनमे से 32 लोगों को एफ आई आर नंबर 92/197 मे साजिश को अंजाम देने वाले लोगों के रूप मे शुमार किया है। बचे 8 लोगों को एफ आई आर नंबर 92/198 साजिश कर्ता के रूप मे आरोपी बनाया गया है।

अपनी तहकीकात के दौरान आशीष ऑपरेशन जन्मभूमि के इन मुख्य किरदारों से मुलाक़ात करने के लिए उत्तर प्रदेश के  अयोध्या, फैजाबाद, टांडा, लखनऊ, गोरखपुर, मथुरा और मुरादाबाद, राजस्थान के जयपुर, महाराष्ट्र के औरंगाबाद और मुंबई, और मध्य प्रदेश के ग्वालियर जैसे शहरों मे गए। इत्तेफाक से इस गुप्त योजना को ऑपरेशन जन्मभूमि का नाम इन्ही षड्यंत्रकारियों से मिला था कोबरपोस्ट ने अपने इस खुलासे के लिए इस नाम को अपना लिया।

कोबरपोस्ट की तहकीकात मे जो बातें उभर कर सामने आई हैं उनमे से कुछ इस प्रकार हैं:-


•बाबरी विध्वंस का षड्यंत्र दो उग्र हिंदुवादी संगठनो विश्व हिन्दू परिषद और शिव सेना ने अलग अलग रचा था।
•इन दोनों संगठनो ने 6 दिसंबर से काफी समय पहले अपनी कार्ययोजना के तहत अपने कार्यकर्ताओं को इस मकसद के लिए प्रशिक्षण दिया था।
•आरएसएस के प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं का एक आत्मघाती दस्ता भी बनाया गया था जिसको बलिदानी जत्था भी कहा गया।
•विहिप की युवा इकाई बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने गुजरात के सरखेज मे इस मकसद के लिए एक महीने का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया था। दूसरी ओर शिवसेना ने भी अपने कार्यकर्ताओं के लिए ऐसा ही एक प्रशिक्षण कैंप भिंड मोरेना मे आयोजित किया था।
•इस प्रशिक्षण मे लोगों को पहाड़ियों पर चड्ने और खुदाई करने का प्रशिक्षण देने के साथ साथ शारीरिक व्यायाम भी कराया जाता था।
•6 दिसंबर को विवादित ढांचे को तोड़ने के मकसद से छैनी, घन, गैंती, फावडा, सब्बल और दूसरी तरह के औजारों को ख़ासी तादाद मे जुटा लिया गया था।
•6 दिसंबर को ही लाखो कारसेवकों को एक संकल्प भी कराया गया था। इस संकल्प मे विवादित ढांचे को गिरा कर उसकी जगह एक भव्य राम मंदिर बनाने की बात कही गयी थी। राम कथा मंच से संचालित इस संकल्प मे आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अशोक सिंघल, गिरि राज किशोर और आचार्य धर्मेंद्र सहित कई जाने माने नेता और संत लोग थे। यह संकल्प महंत राम विलास वेदांती ने कराया था। कहा जाता है की संकल्प के होते ही बाबरी मस्जिद को तोड़ने का काम शुरू कर दिया गया था।
•विहिप के नेताओं ने बाबरी विध्वंस के मकसद से कुछ दिन पहले अलग अलग अंचलों के 1200 संघ कार्यकर्ताओं को मिला कर एक सेना का गठन किया था। इस गुप्त सेना का नाम लक्ष्मण सेना था। इस सेना को सभी सामान उपलब्ध कराने और दिशानिर्देश का जिम्मा राम जी गुप्ता को सौपा गया था। इस सेना का नारा जय शेशावतार था।
•दूसरी ओर शिवसेना ने भी इसी तर्ज पर अयोध्या मे अपने स्थानीय कार्यकर्ताओं की एक सेना बना रखी थी। इसका नाम प्रताप सेना था। इसी सेना ने शिवसेना के बाबरी मस्जिद विध्वंस के अभियान को जरूरी सामान और सहायता उपलब्ध कराई थी।
•आरएसएस, विहिप और बजरंग दल के नेताओं ने विध्वंस से एक दिन पहले अयोध्या के हिन्दू धाम मैं एक गुप्त मीटिंग की थी। इस मीटिंग मे अशोक सिंघल, विनय कटियार, विष्णु हरी डालमिया, मोरो पंत पिंगले और महंत अवैध्यनाथ ने शिरकत की थी। इसी बैठक मे दूसरे दिन होने वाली कारसेवा के दौरान बाबरी मस्जिद को गिराने का फैसला किया गया था।
•आरएसएस और बीजेपी ने भी एक गुप्त बैठक हनुमान बाग मे की थी। इस मीटिंग मे आरएसएस के एच वी शेषाद्री समेत उस समय अयोध्या मे मौजूद विनय कटियार, उमा भारती और एल के आडवाणी जैसे नेताओं ने भाग लिया था।
•इधर शिवसेना ने बाबरी विध्वंस से एक महीने पहले दिल्ली के नॉर्थ एवेन्यू मे एक गुप्त बैठक की थी। इस बैठक मे जय भगवान गोयल, मोरेश्वर सावे, आनन्द दिघे समेत कई वरिष्ठ नेताओं ने हिस्सेदारी की थी। इस बैठक मे अयोध्या कूच से पहले पूरी रणनीति तय की गयी थी। बाला साहब ठाकरे और राज ठाकरे दोनों इन सारी गतिविधियों के दौरान इन नेताओं से संपर्क मे थे।
•अगर पारंपरिक तरीके कामयाब नहीं हो पाते तो शिवसेना ने बाबरी मस्जिद को डायनमाईट से उड़ाने का फैसला भी किया था।
•पारंपरिक औजारों के अलावा बजरंग दल की बिहार की टोली ने बाबरी को गिराने के लिए पेट्रोल बमो का भी इस्तेमाल किया था।
•स्थानीय प्रशासन ने अपनी संवैधानिक ज़िम्मेदारी निभाने के बजाय उन्मादित कार सेवकों को बाबरी ढांचे को ध्वस्त करने के लिए उकसाया और इस काम मे उनकी मदद भी करी। जैसे पी ए सी के जवानो को ये कहते सुना गया की इस “सरदर्द” को हमेशा के लिए खत्म कर दो।
•बाबरी विध्वंस के बाद वहाँ से कई पुरातन महत्व की चीजों को चुपचाप निकाल लिया गया। जैसे शिवसेना के नेता पवन पांडे के पास 1528 के शिलालेख के दो टुकड़े मौजूद हैं, जिसमे मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद के निर्माण की घोषणा की थी। पवन पांडे अब इन दो टुकड़ों को बेचना चाहते हैं।

लक्ष्मण सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राम जी गुप्ता का कहना है कि उनकी सेना को एक स्पष्ट  निर्देश दिया गया था की जैसे ही वो तीन बार जय शेशावतार का नारा लगाएंगे उस सेना के सभी लोग कारसेवकों की भीड़ का फायदा उठा कर बाबरी पर हमला बोल देंगे। इसके बाद अगर कोई भी नेता उनसे रुकने के लिए कहता है तो वो नहीं रुकेंगे जब तक की बाबरी का काम तमाम ना हो जाए।
कोबरपोस्ट की पड़ताल मे दो महत्वपूर्ण किरदारों का नाम भी उभर कर आया है जिन्होने बाबरी विध्वंस मे अपने तरीके से भूमिका निभाई। इनमे से एक कल्याण सिंह हैं जो बाबरी विध्वंस के समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। कोबरपोस्ट को कम से कम दो महत्वपूर्ण नेताओं ने ये खुलासा किया है कि कल्याण सिंह को अयोध्या मे चल रहे हर घटनाक्रम की जानकारी थी। वो अच्छी तरह से जानते थे की दिसंबर 6 को क्या होगा। महंत राम विलास वेदांती के अनुसार उन्हे दिसंबर 5 की रात को ही दो टूक शब्दों मे बता दिया गया था कि ढांचा तोड़ दिया जाएगा। वेदांती कहते हैं “पाँच दिसंबर की रात को ही कल्याण सिंह के पास समाचार भेज दिया गया था और उसमे ये कहा गया था की यदि आवश्यकता पड़ती है तो ढांचा भी तोड़ दिया जाएगा आपको क्या भूमिका निर्वाह करनी है विचार कर लीजिए।“ सिर्फ यही नहीं साक्षी महाराज का भी दावा है की वो कल्याण सिंह को अयोध्या मे चल रहे घटनाक्रम की मिनट दर मिनट जानकारी दे रहे थे। इसके बावजूद भी कल्याण सिंह ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।


ऐसा कहा जाता है कि कल्याण सिंह दिसंबर 6 की सुबह अपना त्यागपत्र देने पर आमादा हो गए थे लेकिन उन्हे अयोध्या से मुरली मनोहर जोशी और शेषाद्री ने तब तक इस्तीफा ना देने के लिए माना लिया जब तक कि कारसेवक बाबरी ढांचे को ज़मींदोज़ ना कर दे। इन नेताओं को ये डर था कि अगर मुख्यमंत्री ने समय से पहले इस्तीफा दे दिया तो उत्तर प्रदेश मे तत्काल राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाएगा और तत्काल सेना बुला ली जाएगी तो ऐसे मे भारी संख्या मे कारसेवक मारे जाते।

बाबरी विध्वंस मे तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव का हाथ होने की बार बार आशंका जताई जाती रही है। कोबरपोस्ट की पड़ताल मे यह आशंका सही साबित हुई है। विनय कटियार, बी एल शर्मा, संतोष दुबे, साक्षी महाराज और महंत राम विलास वेदांती जैसे राम जन्म भूमि आंदोलन के शीर्ष नेता बड़ी बेबाकी से नरसिंह राव की भूमिका को स्वीकारते हैं। यहाँ यह बताना जरूरी है कि बाबरी मस्जिद को तोड़ने के लिए दो बार द्रढ़ प्रयास हुआ था। एक 1990 मे और दूसरा 1992 मे पहली कोशिश पुलिस की कार्रवाही के कारण कामयाब नहीं हो पायी। पुलिस की कार्रवाई मे कई कारसेवकों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। मगर साक्षी महाराज उन कारसेवकों की मौत के लिए आंदोलन के कुछ नेताओं को दोषी ठहराते हैं जो आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए कारसेवकों की बलि देना चाहते थे। साक्षी महाराज कारसेवकों की मौत के लिए अशोक सिंघल को जिम्मेदार ठहराते हुए कहते हैं “तो मेरे सामने अशोक सिंघल जी ने कहा महाराज कुछ लोग नहीं मरेंगे तो आंदोलन ऊपर नहीं उठेगा तो आप आज्ञा दो जाने की तो अशोक सिंघल जी ने कहा ... वामदेव जी ने कहा बच्चे मरेंगे तो बहुत काम खराब हो जाएगा ...बोले महाराज जब तक नहीं मरेंगे तब तक कुछ होगा नहीं आंदोलन तभी बढ़ेगा।”

साक्षी की तरह साध्वी उमा भारती विनय कटियार को कोठारी बंधुओं की मौत के लिए जिम्मेदार मानती है। 30 अक्टूबर 1990 के घटनाक्रम को याद करते हुए उमा भारती कहती हैं, “जो लोग मरे थे वो विनय की गलती से .... गलती भी नहीं वो भगदड़ मची वो गली छोटी थी ...गलती मतलब वो भाग गया छोड़कर भाग गया।”

इस तरह के आरोप अयोध्या षड्यंत्र को एक नया आयाम देते हैं और इस आंदोलन के शीर्ष नेताओं की नियत को लेकर सवाल खड़े करते हैं। क्या वाकई वे युवा कारसेवकों की अपने निहित राजनैतिक स्वार्थों की बेदी पर बलि चढ़ाना चाहते थे।

इसी तरह बजरंग दल के एक और अग्रणी नेता धर्मेंद्र सिंह गुर्जर आंदोलन के पूरे नेत्रत्व की नियत पर सवाल खड़े करते हैं, “ये सब बेवकूफ बनाने वाली बातें हैं इसीलिए तो हमारा देश बेवकूफ बनता आ रहा है ... पहले हम जवानी की जोश मे थे ... जुनून मे थे एक जुनून था गुजर गया ... लोगों ने उपयोग किया और छोड़ दिया यूज करके।”

हिन्दुत्व और उसके नेत्रत्व का यह निर्मम चेहरा कोबरपोस्ट रिपोर्टर की एक और मुलाक़ात मे उभर कर आता है। इस मुलाक़ात के दौरान रिपोर्टर ने महंत अवैध्यनाथ को विनोद वत्स जैसे उत्साही कारसेवक के बलिदान की याद दिलाई। विनोद वत्स के बूढ़े माता पिता बदहाली का जीवन जी रहें हैं। महंत अवैध्यनाथ का जो कहना था वो वाकई शर्मनाक है, “सब को मरना है तुमको भी है मुझे भी मरना है मृत्य को कौन रोक सकता है।“ उसके बूढ़े निराश्रय माँ बाप के लिए महंत अवैध्य नाथ का भी यही दर्शन है, “वो भी मरेंगे उनको भी मरना है।”

कोबरपोस्ट की पड़ताल एक और सच्चाई को फिर से स्थापित करती है कि इस झगड़े की बुनियाद मे 1949 की एक घटना है जब रामलला की मूर्ति को गुपचुप तरीके से बाबरी मस्जिद मे स्थापित कर दिया गया था। इस घटना के चश्मदीद गवाह कोई और नहीं बल्कि रामजन्म भूमि आंदोलन मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बी एल शर्मा प्रेम हैं। शर्मा का कहना है कहना है कि वो तब अयोध्या मे मिलिट्री पुलिस मे एक वारंट आफिसर के रूप मे तैनात थे। यह सब उनकी आँखों के सामने हुआ। तब अयोध्या के पुजारी रामचंद्र दास उनकी यूनिट मे बराबर आया जाया करते थे एक दिन राम चन्द्र दास ने उन्हे बताया कि रामलला अमुक दिन ऐसे प्रकट होंगे। तो वहाँ अपने साथियों को लेकर आना। शर्मा के अनुसार रामलला का प्रकट होना कोई दैवीय चमत्कार नहीं था। उनका कहना है, “अरे जी काहे के प्रकट होने वाले... प्रकट किया है ... वो तो महाराज का काम था न रामचंद्र परमहंस।“ राम जन्म भूमि आंदोलन इसी झूठ की बुनियाद पर खड़ा किया गया था। (प्रैस विज्ञप्ति)

बकवासवाणी केंद्र : ''द्वारकी - देव अफीमची'' की बकवास बातचीत - मोर खाया बिल्‍ली ने, पुलिस वाले हुए सस्‍पेंड

द्वारकी : पाकिस्‍तानी प्रधान मंत्री नवाज शरीफ के मोर को बिल्‍ली खा गई और पुलिस वाले हो गए सस्‍पेंड

देव अफीमची : यह गलत हुआ, ऐसा नहीं होना चाहिए था, बेचारे पुलिस वालों का क्‍या दोष, नवाज शरीफ को नौ सौ चूहे पालने चाहिए, और हज वाले रास्‍तों पर नाकाबंदी करनी चाहिए, जैसे नौ सौ चूहे खाने के बाद बिल्‍ली हज के लिए निकले तो उसको गिफ्तार करना चाहिए।

द्वारकी : इसका फायदा क्‍या होगा

देव अफीमची : प्‍लैग की बीमारी जाने के बाद पाकिस्‍तानी में चूहे पकड़ने का रिवाज कम हो गया, लोग खुद को बेरोजगार महसूस कर रहे हैं, इससे उनको रोजगार मिलेगा, और नौ सौ चूहे खाने के बाद बिल्‍ली भी शेर सी हो जाएगी, बिल्‍ली मार खाकर खाने वालों के लिए कई दिनों का भोजन एक साथ तैयार हो सकता है।

द्वारकी : हमारे देव अफीमची की बकवासवाणी आपने सुनी, लेकिन आप क्‍या कहते हैं, अपनी राय हमें, नीचे प्रतिक्रिया बॉक्‍स में लिखकर भेज सकते हैं, या फिर एक कागज पर लिखकर अपने पास सकते हैं। इसके साथ #बकवासवाणी केंद्र का यह प्रोग्राम समाप्‍त होता है।

अब हिन्‍दुओं की भावनाएं आहत नहीं हुई


आजकल बाजार में एक नया नारा गूंज रहा है '' हर हर मोदी, घर घर मोदी'' अगर इस नारे को पहले कांग्रेस ने उठा लिया होता, और कहा होता कि ''हर हर गांधी, घर घर गांधी'', सच में हिन्‍दुयों की भावनाएं आहत हो जाती, लेकिन अब ऐसा नहीं, क्‍यूंकि हर हर महादेव की जगह मोदी को रखा है, और जिनकी भावनाएं आहत होती हैं, वो कथित हिन्‍दु इस नारे को बड़े शौक से लगा रहे हैं, शायद बोलने से झूठ सच हो जाए, लेकिन असंभव है।
अगर भाजपा के कुछ मोदीवादियों ने मोदी को महादेव की जगह फिट कर ही दिया है तो मुझे इससे एक अन्‍य बात भी याद आ रही है। शायद हर हिन्‍दु भाई को ज्ञात होगी कि हिन्‍दु धर्म में 'त्रिदेव' का सर्वाधिक महत्व है यानि ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश, दूसरे क्रम में कहूं तो निर्माता, पालक व विनाशक।

इस क्रम में अगर मोदी को महादेव कहा जाता है, तो बीजेपी के तीन शीर्ष नेता हुए, पहला अटल बिहारी वाजपेयी, जिन्‍होंने बीजेपी को एक अलग पहचान दी, स्‍वयं लोगों के प्रधान मंत्री होकर विदा हुए, दूसरा जो बीजेपी को आगे लेकर चले, जिनको पालक कहा जा सकता है यानि एलके आडवाणी, अब बीजेपी का पूरा भार, तीसरे कंधे पर है, जिसको नरेंद्र मोदी के नाम से जाना जाता है, जिसको उनके दीवानों ने हर हर महादेव वाले जयघोष में फिट कर दिया।

इसमें कोई दो राय नहीं कि दूसरे राजनीतिक दल अब मोदी को बीजेपी का विनाशक मान रहे हैं, एनडीए की बड़ी पार्टियां दूर हो चुकी हैं। अब देखना है कि मोदीवादियों के हर हर मोदी, घर घर मोदी, बीजेपी को किस डगर पर लेकर जा रहे हैं।

नोट :- यहां मैंने केवल अपने विचार रखें हैं, हो सकता है कि दूसरों से मेरे विचार मेल न खाएं, लेकिन आप अपने विचार रख सकते हैं, जिनका मैं पूरा सम्‍मान करूंगा।

fact-n-fiction - राजू श्रीवास्‍तव पहुंचे कॉमेडी नाइट्स विद कपिल

मैं आपका हरमन प्‍यारा दिल अजीज क्‍यूट सा कपिल शर्मा, और आप देख रहे हैं कॉमेडी नाइट्स विद कपिल। आज हमारे बीच कांग्रेस की तरह अपनी छवि गंवा चुके राजू श्रीवास्‍तव, मैं नरेंद्र मोदी की तरह उभरता कपिल शर्मा, उनसे पूछेंगे, राजनीति में उनके कदम के बारे में। तो दोस्‍तो तैयार हो जाए।

नवजोत सिंह सिद्धू का शेयर :-

 जब थक अक यक कर कुछ न मिले तो कर लो राजनीति,
अब कहेंगे गजोदर बाबू आप बीती। ठोको ताली।

राजू श्रीवास्‍तव जी, यहां आने पर आपका स्‍वागत है, मुझसे पहले कथित तौर पर आप ही टेलीविजन पर हंसाने का एक मात्र साधन हुआ करते थे, अचानक आप गायब हुए तो मैंने जगह बना ली। जनता जानना चाहती है कि आप राजनीति में अचानक कैसे आए।

देखो कपिल भैया। कोई काम धंधा तो था नहीं, जो था, वो आप छीन ले गए। अब शहर में संघर्ष कर रहे थे, गांव से बाबूजी, चच्‍चा,  लल्‍लन भैया पैसा भेजते थे, हम खाते थे। कुछ दिन पहले चच्‍चा का फोन आया, बोले बेटा मनोज तिवारी, रवि किशनवा को टिकट मिल गया, अबे हमको भी कर्ज चुकाना है। मोबाइल नेटवर्क के बारे में तो आप जानते हैं, कैसा है भारत में। फोन कट गया।

बार बार मिलाएं चच्‍चा को फोन, फोन लगा नहीं। हमने भी ठान ली। कर्ज चुकाना है,चलो राजनीति में। सोचा जो केआरके को टिकट दे सकता है, वो हमका भी टिकट देदेई सकत। बस हम यूपी पहुंच गया, वहां अखिलेश बाबू से मिले। उन्‍होंने साइकिल पर बिठा दिया।

गांव से फोन आने लगे, लेकिन फिर चच्‍चा का फोन आया। बेटा, कर्ज चुकाना है, यात्रा नहीं करनी। मैंने कहा, भूमि का कर्ज चुकाने के लिए तो समाजवादी पार्टी ज्‍वाइन की है। चच्‍चा गर्म होकर बोले, भूमि का कर्ज चुकाना है तो आम आदमी पार्टी ज्‍वाइन कर लो, अगर हमरी जमीं का कर्ज चुकाना है तो कमल पकड़, नरेंद्र मोदी जी कहते हैं कि लक्ष्‍मी कमल पर बैठती है।

जैसे ही हमे चच्‍चा की बात समझ में आई, हम साइकिल से उतरे, सीधा पहुंच गए, फूलवा पार्टी के पास। बोले हमका भूमि का कर्ज चुकाना है, भैया टिकट चाहिए। उनकी लहर भी अजब है, जो जाता है टिकट थमा देते हैं, मनो चुनाव का टिकट न हो, रामलीला का टिकट हो।

कपिल भैया टिकट से फायदा हुआ। वो कैसे हुआ गजोदर बाबू ? साल्‍ला इसके कारण हम चर्चा में आ गए। लगता है जल्‍द हमारा भी शो आएगा कॉमेडी नाइट्स विद गजोधर।

चलते चलते एक चुटकले के साथ

मार्च अंत विशेष

युवती प्रेमी से :- सप्‍ताह अंत पर क्‍या प्रोग्राम बना रहे हो ?
युवक प्रेमिका से :- इन्‍कम टैक्‍स रिटर्न्‍स
प्रेमिका प्रेमी से :- हाय, पहला पार्ट कब आया था ? मैंने तो अभी तक नहीं देखा।

मी​डिया को लेकर, जो AAP ने कहा, क्या झूठ है जरा बताएं ?

अपने विवादित बयानों से घिरे अरविंद केजरीवाल के बचाव में आम आदमी पार्टी ने मीडिया के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है। शुक्रवार को आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में प्रवक्ताओं की फौज के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की और मीडिया पर हमला बोला। पार्टी के प्रवक्ता मीडिया को धमकी देने वाले केजरीवाल के बयान को सही ठहराने की कोशिश करते नजर आए, तो साथ ही कुछ न्यूज चैनलों पर केजरीवाल के खिलाफ मुहिम चलाने का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग में शिकायत की धमकी भी दी। गौरतलब है कि केजरीवाल ने गुरुवार रात नागपुर में पार्टी के एक कार्यक्रम में मीडियावालों को जेल भेजने की धमकी दी थी,हालांकि बाद में वह अपने बयान से पलट गए थे।

दिल्ली में शुक्रवार को आम आदमी पार्टी अपने चार बड़े चेहरों संजय सिंह, आशुतोष, आशीष खेतान, दिलीप पांडे के साथ मीडिया के सामने आई। आप नेता संजय सिंह ने केजरीवाल के विवादित बयान पर कहा कि मीडिया पर सवाल उठाना गलत नहीं है। उन्होंने न्यूज चैनलों इंडिया टीवी, इंडिया न्यूज, जी न्यूज, टाइम्स नाउ का नाम लेते हुए आरोप लगाया कि यह आम आदमी पार्टी और केजरीवाल के खिलाफ मुहिम चलाए हुए हैं। संजय सिंह ने कहा कि पार्टी के पास इन चैनलों की फुटेज है और वे इसके खिलाफ चुनाव आयोग जाएंगे।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में आम आदमी पार्टी के नेता संवाददाताओं से उलझते रहे। आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रवक्ता और चांदनी चौक से पार्टी के प्रत्याशी आशुतोष ने केजरीवाल के मीडिया सेटिंग-गेटिंग वाले विडियो पर सफाई देते हुए कहा कि एडिटर का नेता के साथ बैठना कोई गुनाह नहीं है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ होने के नाते मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह सही खबरों को दिखाए।

आशुतोष ने कहा कि अरविंद केजरीवाल का साफतौर पर कहना है कि मीडिया और न्यूज चैनलों का एक तबका मोदी का एजेंडा चला रहा है। इसकी जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकारों के बीच में एक बड़ा तबका ईमानदार भी है। उनका मानना है कि आने वाले दिनों में काम करना मुश्किल होने जा रहा है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद पार्टी के नेता और नई दिल्ली पार्टी के उम्मीदवार आशीष खेतान ने भी मीडिया पर हमला बोलते हुए कहा कि मीडिया अरविंद केजरीवाल के पीछे पड़ा है। उन्होंने कहा कि आप के नाम पर चैनलों में खाली कुर्सी रख दी जाती है। 'नमो नमो' चलाया जाता है। जबकि नरेंद्र मोदी के विकास के दावों पर एक भी सवाल नहीं पूछा जाता है। गुजरात की सच्चाई नहीं दिखाई जाती है। अरविंद केजरीवाल जब लाइव बैठते हैं, तो उनसे सारे सवाल पूछे जाते हैं, लेकिन मोदी से पब्लिक से जुड़े सवाल नहीं पूछे जाते हैं।

केजरीवाल से इ​सलिए नाराज!

एक थका मंदा आदमी नौकरी से घर पहुंचा। पत्नि ने ठंडे पानी का गिलास मुस्कराते हुए दिया। पति ने गिलास को पकड़ा, जैसे थका मंदा आदमी पकड़ता है। थोड़ी देर बाद पत्नि चाय लेकर आई और बोली। बड़े दिनों से मेरा मन कर रहा है कि आप एक दिन के लिए नौकरी से छुट्टी ले लेते, तो हम यहां आस पास किसी पि​कनिक वाली जगह पर घूम आते।

पति ने कहा, बॉस छुट्टी नहीं देगा। तुम को पता है कि इन दिनों मुझे ​आफिस में बहुत अधिक काम रहता है। पत्नि बोली, 365 दिनों में से सिर्फ इन्हीं दिनों काम रहता है, तो दूसरे दिन तुम क्या करते हो, अगर मुझे पहले बताया होता तो वो दिन चुन लेती, नहीं नहीं ऐसा नहीं, काम तो हर रोज रहता है। पत्नि तपाक से बोली, यही तो मैं भी कहना चाहती हूं, काम तो हर रोज रहता है, लेकिन छुट्टी तो कभी कभार ली जाती है।

नहीं, छुट्टी नहीं मिलेगी। बॉस मुझे आफिस से निकाल देगा। बाद में इतनी अच्छी जॉब भी नहीं मिलेगी। अच्छा तो यह बात है, हम से ज्यादा नौकरी प्यारी है। जब तुम दोस्त की पंचायत बिठाते हो, और अरविंद केजरीवाल को भगोड़ा कहते हो तो तब तुम को समझ नहीं आती कि उसने तो आपसे भी बड़ी कर्सी छोड़ी केवल देश में बदलाव के लिए, जो आज तक प्रधानमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदार ने नहीं छोड़ी और तुम से अपनी पत्नि की खुशी के लिए बॉस की नाराजगी मोल नहीं ली जा सकती।

भगोड़ा वो नहीं तुम हो! जो अपनी सुविधा के लिए मोह पाल लेते हो, वो तो मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर फिर भाग दौड़ में लग गया, हालांकि उसको पता भी नहीं कि उसकी पार्टी लोक सभा चुनावों में टिकेगी कि नहीं, लेकिन विश्वास है कि हम लौटेंगे, अच्छे बहुमत से!

दूसरे को गाली देने से बेहतर है कि आप कुछ करने की क्षमता व विश्वास रखें। अगर काबिलयत हुई तो हजारों राहें होंगी, नहीं तो एक दिन वो भी छूट जाएगा, जो तुम्हारे पास है। यूं गुस्से में बुड़बुड़ाते हुए पत्नि वहां से निकल गई। पति सोच रहा था, सच में मैं इसको खुश नहीं कर पा रहा, तो केजरीवाल पूरे इंडिया को किस तरह खुश रख सकता है।

उसने फालूत की पंचायत करनी छोड़ दी और घर के बाहर लिखकर लगा दिया, अगर मैं नहीं कर सकता तो यह न सोचें कि कोई दूसरा भी नहीं कर सकता।



Chauraha Express 

मोदी काठमांडू सीट से लड़ेंगे !

पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश के प्रधान मंत्री पद के लिए उम्मीदवार चुने गए। इस बात से देश को खुशी होनी चाहिए थी, लेकिन अफसोस के देश के भीतर राजनीतिक पार्टियां उनको रोकने के लिए चुनाव मैदान में उतर गई। बड़ी हैरानीजनक बात है, भला कोई इस तरह करता है। माना कि देश में लोकतंत्र है, लेकिन किसी की भावनायों को भी समझना लोकतंत्र का फर्ज है कि नहीं।

बेचारे मोदी कहते हैं कि भ्रष्टाचार रोको। तो विरोधी कहते हैं मोदी रोको। मोदी कहते हैं कि गरीबी रोको तो विरोधी कहते हैं मोदी रोको। कितनी नइंसाफी है। वाराणसी से चुनाव लड़ने का मन बनाया था लेकिन मुरली मनोहर जोशी कहने लगे पाप कर बैठे जो वाराणसी से लड़ बैठे।​ स्थिति ऐसी हो चुकी है कि भाजप से न तो मुरली मनोहर जोशी को पाप मुक्त करते बनता है न ही पाप का भागीदार बनाते बनता है।

राजनाथ सिंह : आप बनरास से लड़े
नरेंद्र मोदी : जीतने की क्या गारंटी है ?
राजनाथ सिंह : गारंटी चाहिए तो arise इनवेटर ले आएं।

भाई गारंटी तो चाहिए क्यूंकि मुरली मनोहर जोशी के दीवाने भी अड़चन पैदा कर सकते हैं। अंत नरेंद्र मोदी ने फैसला किया है कि वो काठमांडू से चुनाव लड़ेंगे। वहां शांति हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि वहां उनको कोई रोकने वाला भी नहीं है। सबसे सुरक्षित सीट। फिर क्या हुआ अगर काठमांडू नेपाल में है। अब भारत में तो सभी बेचारे मोदी को रोक रहे हैं, यह भी कोई लोकतंत्र है।

सही। नरेंद्र मोदी को काठमांडू से चुनाव लड़ना चाहिए।

Publicly Letter : गृहमंत्री ​सुशील कुमार शिंदे के नाम

नमस्कार, सुशील कुमार शिंदे। खुश होने की जरूरत नहीं। इसमें कोई भावना नहीं है, यह तो खाली संवाद शुरू करने का तरीका है, खासकर आप जैसे अनेतायों के लिए। नेता की परिभाषा भी आपको बतानी पड़ेगी, क्यूंकि जिसको सोशल एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया के शब्दिक ​अ​र्थ न पता हों, उसको अनेता शब्द भी समझ में आना थोड़ा सा क​ठिन लगता है। नेता का इंग्लिश अर्थ लीडर होता है, जो लीड करता है। हम उसको अगुआ भी कहते हैं, मतलब जो सबसे आगे हो, उसके पीछे पूरी भीड़ चलती है।
 
अब आप के बयान पर आते हैं, जिसमें आप ने कहा कुचल देंगे। इसके आगे सोशल मीडिया आए या इलेक्ट्रोनिक मीडिया। कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, क्यूंकि कुचल देंगे तानाशाही का प्रतीक है या किसी को डराने का। आपके समकालीन अनेता सलमान खुर्शीद ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को नंपुसक कहा, क्यूंकि वो दंगों के दौरान शायद कथित तौर पर अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पाए, लेकिन जब मुम्बई पर हमला हुआ था, तब आपके कुचल देंगे वाले शब्द किस शब्दकोश में पड़े धूल चाट रहे थे, तब कहां थे सलमान खुर्शीद जो आज नरेंद्र मोदी को नपुंसक कह रहे हैं।

इलेक्ट्रोनिक मीडिया को तो शायद आप पैसे खरीद लें, क्यूंकि उसको पूंजीपति चलाते हैं, जो विज्ञापन के लिए काम कर सकते हैं, लेकिन सोशल मीडिया को कुचलना आपके हाथ में नहीं, क्यूंकि इसको खरीदना आपके बस की बात नहीं। सोशल मीडिया का शब्दिक अर्थ भी समझा देता हूं, लोगों का मंच। जो लोग सरकार बनाने की हिम्मत रखते हैं, उनको कुचलना आपके लिए उतना ही मुश्किल है, जितना घोड़े का घास के साथ दोस्ताना बनाए रखना।

आपके बयान बदलने से एक बात तो पता चलती है कि आप थोथी धमकियां देते हैं। वरना, अपने बयान पर अटल रहते, और मीडिया को कुचल देते, आज तक आप गूगल व फेसबुक से जानकारियां हासिल नहीं कर पाए, कुचलने की बात करते हैं। क्या किसी की अ​भिव्यक्ति को दबाना असैवंधानिक नहीं ? आपको इलेक्ट्रोनिक मीडिया व सोशल मीडिया का अंतर पता नहीं, तो संवैधानिक व गैर संवैधानिक का अंत क्या खाक पता चलेगा।

आजकल मोदी जी ने खूब अपना पुराना धंधा पकड़ा हुआ है। अपने पुराने दिनों को याद कर रहे हैं, इससे शायद उनको चुनावी फायदा मिल जाए, लेकिन अगर आप ने गृहमंत्री होकर कांस्टेबल वाली हरकतें न छोड़ी तो कांग्रेस को भाजपा वाले कुचल देंगे। और सलमान खुर्शीद को अच्छे से उनके बयान का अर्थ भी समझा देंगे।

जय रामजी की। इसका अर्थ बात शुरू करना भी होता है और संवाद बंद करना भी। जहां लिखा है, वहां इसका अर्थ संवाद बंद करना है। फिर से जय रामजी की। 

एक वोटर के सवाल एक पीएम प्रत्याशी से

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश की सत्ता संभालने के लिए आतुर हैं, राजनेता हैं आतुर होना स्वभाविक है, जीवन में प्रगति किसे पसंद नहीं, खासकर तब जब बात देश के सर्वोच्च पदों में से किसी एक पर बैठने की। एक राजनेता के रूप में मेरी शुभइच्छाएं आपके साथ हैं, लेकिन अगर आप स्वयं को स्वच्छ घोषित करते हैं, देश को एक सूत्र में पिरोने की बात करते हैं, स्वयं को दूसरी राजनीतिक पार्टियों के नेतायों से अलग खड़ा करने की कोशिश करते हैं तो एक वोटर के रूप में आप से कुछ सवाल पूछ सकता हूं, सार्वजनिक इसलिए पूछ रहा हूं क्यूंकि वोटर सार्वजनिक है, हालांकि वो वोट आज भी गुप्त रूप में करता है।

पहली बात, आप अपना पूरा दांव युवा पीढ़ी पर खेल रहे हैं। जिनको अभी अभी वोट करने का अधिकार मिला है, या कुछेक को कुछ साल पहले। जहां तक मुझे याद है यह अधिकार दिलाने में कांग्रेस के युवा व स्वर्गीय प्रधान मंत्री राजीव गांधी का बड़ा रोल रहा है, युवा इसलिए, उनकी सोच एक युवा की थी, जो कुछ करना चाहता था, देश के युवायों के लिए। दूसरी बात, मैं जो सवाल आप से सार्वजनिक रूप में पूछने जा रहा हूं, यह भी उस महान व्यक्तित्व की सोच से मुहैया हुए यंत्रों के कारण।

पहला सवाल। मैं आपको वोट किस लिए करूं। व्यक्तिगत ईमानदार होने के चलते तो वो मौजूदा प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह भी हैं। लेकिन आपके निशाने पर निरंतर मनमोहन सिंह रहें हैं, यकीनन मैं आपको व्यक्तिगत ईमानदार होने के लिए तो वोट नहीं कर सकता है, क्यूंकि आपके समूह में भी येदिरप्पा जैसे महान लोग हैं, जो कभी पार्टी से बाहर होते हैं तो कभी पार्टी के अंदर। क्या आप व्यक्तिगत रूप में जिम्मेदारियों का निर्बाह करेंगे, अगर आपकी पार्टी का कोई भी नेता भ्रष्टाचार में सम्मिलित हुआ तो आप अपने पद से उसी वक्त त्याग पत्र देंगे?

दूसरा सवाल, आपके चेहरे का नकाब ओढ़कर भाजपा जीतने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है। हर कोई चढ़ते सूर्य को सलाम करता है, इसमें बुरी बात नहीं, लेकिन भाजपा जब कहती है कि गुजरात में गोधरा दंगों के बाद पिछले एक दशक में कोई दंगा नहीं हुआ, यह नरेंद्र मोदी सरकार की उपलब्धि है, लेकिन पिछले तीस सालों में देश के अंदर सिख दंगे भी नहीं हुए, जिसमें कांग्रेस की भागीदारी रही हो। मेरा सवाल तो यह है कि क्या आप सत्ता में आने के बाद दंगा पीड़ितों के साथ न्याय कर पाएंगे चाहे वो गोधरा के हों या चाहे दिल्ली के?

तीसरा साल। कांग्रेस आरटीआई, आरटीई, खाद्य सुरक्षा, या यूनिक कार्ड जैसी कुछ पारदर्शिता लाने वाली भी लेकर लाई, चलो आपके कहने अनुसार कांग्रेस ने यह कदम उठाकर भी कुछ अच्छा नहीं किया होगा, लेकिन अब सवाल आपके दस सालों का है, मैं इसलिए तो आपको मुबारकबाद दूंगा कि गुजरात में आपके आने के बाद कभी राष्ट्रपति शासन लागू नहीं हुआ, लेकिन क्या आप चुनावों के दौरान कांग्रेस की कमियां गिनाने की बात छोड़कर अपने दस सालों का तैयार विकास मॉडल पेश करेंगे, अपने मंच से? आपके आंकड़े तो पता नहीं कौन प्रदान करता है, लेकिन मैंने कुछ आंकड़े जुटाएं हैं, जिनको आप चुनौती दे सकते हैं, जब आपकी सरकार 2002 में आई तो आपके पास 127 सीटें थी, लेकिन 2007 में आपके पास 117 सीटें रहीं, अबकी बार आपके पास 116 सीटें। अगर विकास का ग्राफ बढ़ा है, तो सीटों में गिरावट क्यूं ?

चौथा सवाल। मैंने आपकी रैलियों को निरंतर सुना। सुनना भी चाहिए था, आ​ख़िर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार जो हैं, लेकिन आप हर राज्य में रैली करते हुए, उनकी भाषा में उतर जाते हैं, ताकि उनके दिलों में जगह बनाई जाए, कभी कभी भूल जाते हैं कि शायद कुछ बातों का आपकी राजनीति पार्टी से कोई लेन देन नहीं। मुझे याद है कि आप ने हिमाचल में कहा, जब यहां का बेटा जागता है तो पूरा भारत सोता है, शायद सीमा पर खड़े भारत के कोने कोने से नौजवान आपके इस बयान से आहत हुए होंगे, नहीं हुए तो मैं जानना चाहूंगा कि चुनावी लाभ के लिए कुछ भी कह देना जरूरी है?

तेलंगाना बिल पास बंद कमरे में, कुछ ​िट़्वटर पर चर्चा​