अरविंद केजरीवाल कुछ तो लोग कहेंगे

बड़ी हैरानी होती है। कोई कुछ लेता नहीं तो भी देश के कुछ बुद्धिजीवी सवाल उठा देते हैं, अगर कोई लेता है तो भी। अब आम आदमी मुख्यमंत्री बन गया। वो आम आदमी सुरक्षा लेना नहीं चाहता, लेकिन मीडिया अब उसको दूसरे तरीके से पेश कर रहा है।

सुनने में आया है, अरविंद केजरीवाल ने सुरक्षा लेने से इंकार कर दिया। सुरक्षा के रूप में उसको दस बारह पुलिस कर्मचारी मिलते, लेकिन अब उसकी सुरक्षा के​ लिए सौ पुलिस कर्मचारी लगाने पड़ रहे हैं। अब भी सवालिया निशान में केजरीवाल हैं ?

शायद बुद्धिजीवी लोग घर से बाहर नहीं निकलते या घर नहीं आते। शायद रास्तों से इनका राब्ता नहीं, संबंध नहीं, कोई सारोकार नहीं। वरना,उनको अर​विंद केजरीवाल के शपथग्रहण कार्यक्रम की याद न आती, जहां पर सौ पुलिस कर्मचारियों को तैनात किया गया था। कहते हैं आठ दस से काम चल जाता है, अगर अरविंद सुरक्षा के लिए हां कह देते तो। सच में कुछ ऐसा हो सकता है, अगर हो सकता है तो नरेंद्र मोदी की राजधानी, मेरे घर के पास आकर देख लें।

मोदी गोवा से, दिल्ली, यूपी, बिहार से निकलता है, लेकिन मेरे शहर की सड़कों पर सैंकड़े से अधिक पुलिस कर्मचारी ठिठुरते हैं। मोदी की सुरक्षा के कारण हमको दिक्कत भी है, लेकिन फोकट की अधिक सुरक्षा भी। सड़क के दोनों तरफ पुलिस कर्मचारी होते हैं, मोदी का कोई नामोनिशां नहीं होता। जब मोदी निकलता है तो स्कोर्पियो का काफिला निकलता है, जो बख्तर बंद होता है। क्या इसका खर्च अ​रविंद केजरीवाल की सुरक्षा के लिए तैनात किए पुलिस कर्मचारियों से कम है।

पुलिस कर्मचारी, जनता के सेवक हैं। किसी मुख्यमंत्री या किसी नेता के नहीं। बंदूक रक्षा करती तो राजीव गांधी, इंदिरा गांधी सुरक्षित होती। भय किस बात का। मौत का। मौत ने तो काल को वश में करने वाले रावण को नहीं छोड़ा तो आम आदमी क्या है ? सुरक्षा का जिम्मा किसके हाथों में है, जो आम आदमी है, जिसके परिवार की सुरक्षा ऐसी पुलिस चौं​कियों के छाये में है, जहां चौंकियां तो हैं, पुलिस कर्मी नहीं।

बड़े अजीब हैं बुद्धिजीवी। कथा सुनाते हैं बैल, शिव व पार्वती की। और खुद की भूल जाते हैं। कहते हैं शिव पार्वती बैल पर बैठकर जा रहे थे। तभी रास्ते में दो लोग मिले, कहने लगे दोनों जानवर पर अत्याचार करते हैं। पार्वती ने पत्नी धर्म निभाया और नीचे उतर गई, शिव को बैठे रहने दिया। कुछ आगे गए तो कोई और मिला, उसने कहा, कैसा निर्दयी है, पत्नि चल रही है, आप आराम से बैठकर जा रहा है। शिव भी उतर गए। कुछ दूर गए तो दूसरे लोग मिल गए कहने लगे। यह लोग भी कैसे हैं, पास में सवारी है, लेकिन पैदल चलकर अपने एवं बैल के पैर थका रहे हैं। इससे अच्छा होता तो घर छोड़ आते।

सच में जितने मुंह उतनी बातें। अरविंद केजरीवाल जमाना है कुछ तो कहेगा। मैं भी तो कुछ कह रहा हूं।

लोकपाल बिल तो वॉट्सएप पर पास हो गया था

अन्ना हजारे। आज के गांधी हो गए। ठोको ताली। कांग्रेस व भाजपा समेत अन्य पार्टियों ने लोक पाल बिल पास कर दिया। कहीं, आज फिर एक बार अंग्रेजों की नीति को तो नहीं दोहरा दिया गया। गांधी को महान बनाकर सुभाष चंद्र बोस, शहीद भगत सिंह जैसे किरदारों को दबा दिया गया।

सत्ता पाने की चाह में पागल पार्टियां ​दिल्ली में बहुमत न मिलने की कहानी गढ़ते हुए सरकार बनाने से टल रही हैं। आज भी राजनीतिक पार्टियां भीतर से एकजुट नजर आ रही हैं। शायद वह आम आदमी के हौंसले को रौंदा चाहती हैं, जो आप बनकर सामने आया है।

वह चाहती हैं कि आप गिरे। डगमगाए ताकि आने वाले कई सालों में कोई दूसरा आम आदमी राजनेता को नीचा​ दिखाने की जरूरत न करे। आठ साल से लटक रहा बिल एकदम से पास हो जाता है। अन्ना राहुल गांधी को सलाम भेजता है। उस पार्टी का भी लोक पाल को समर्थन मिलता है, जिसका प्रधानमंत्री उम्मीदवार, बतौर मुख्यमंत्री अब तक अपने राज्य में लोकायुक्त को लाने में असफल रहा है।

मुझे लगता है कि शायद अन्ना ने राहुल गांधी को भेजे पत्र के साथ एक पर्ची भी अलग से भेजी होगी। जिस पर लिखा होगा। क्या एक और अरविंद केजरीवाल चाहिए? राहुल के कान खड़े हुए होंगे। यकीनन उसने वॉट्सएप के जरिए ​पर्ची का डिजीटल संस्करण राजनेतायों के ग्रुप को भेजा होगा।

वहां भी कुछ वैसा ही हुआ होगा। नेताओं ने सोचा होगा। देश में हर चीज के लिए कानून है। लेकिन अपराध कहां रूकते हैं। यहां आज भी ट्रै​फिक सिग्नल टूटते हैं। कानून बनाने से अधिक फर्क नहीं पड़ेगा। जल्द से जल्द पास करवा दो। पास तो वॉट्सएप पर ही हो गया होगा, लेकिन खानापूर्ति के लिए संसदीय कार्यवाही जरूरी है। कानून तो टूट भी सकता है, लेकिन अगर एक और केजरीवाल पैदा होगा तो हमारा बना बनाया चक्रव्यूह टूट जाएगा। भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस से बेहतर तो महात्मा गांधी को बनाए रखना आसान है। क्यूं महात्मा गांधी, सरदार पटेल को गद्दी देने की बजाय नेहरू को सौंपेगा। गांधी अहिंसावादी है। वह सिस्टम के खिलाफ शांति से लड़ता है। तब तक कई साल गुजर जाते हैं। हमारी कई पीढ़ियों का इंतजाम हो जाता है।

लोक पाल बिल पास हो गया। ठोको ताली। आज के बाद ​देश में रिश्वत, घोटाले खत्म हो जाएंगे। हम भ्रष्ट नेताओं से मुक्त हो चुके हैं। कल का इंतजार करें।

वो मासूम सी लड़की

वो मासूम सी लड़की मुझसे जुदा हो जाए।
बस ख्वाबों में आए, और खुदा हो जाए।

मैं ही जानता हूं पागल दिल को संभाला है कैसे।
उनकी चाहत को बच्चों की तरह पाला है कैसे।

कभी सूखा पड़ा तो कभी बाढ़ आई
हौंसले ​गिराने आफत हर बार आई

हा​लत देखकर आशिकों की अब मैं, हैप्पी यूं ही परेशान नहीं होता
पता है मुझे, किसी की याद में डूबकर उभरना आसान नहीं होता

आओ हंसते हुए मिलने की, दुश्मनों पर मेहरबानी करते हैं।
चलो आज हैप्पी, हम भी कुछ तूफानी करते हैं।

बंद कमरों में रोना बंद कर ​दिया, क्यूंकि नीर ए अश्क फर्श सोखता नहीं,
हैप्पी अगर जमीं पीती अश्क मेरे, तो आंखों से बहता दरिया मैं रोकता नहीं

सलमान खान के हाथ जल्‍द होंगे पीले

सच में। सलमान खान की बहुत जल्‍द शादी होने वाली है। अब सलीम खान एंड फैमिली चाहती है कि छोरे के हाथ पीले कर देने चाहिए, हालांकि लड़कियों के हाथ पीले होते हैं। हाथ पीले करने का मतलब शादी होता है, तो क्‍या फर्क पड़ता है, लड़के की हो या लड़के की। अब तो दोनों बराबर हैं। लो..... मैंने क्‍या कुछ झूठ कहा।

अभी तक लड़की तो मिली नहीं, लेकिन मिलने की जल्‍द संभावना है। सलमान खान ने परिवार को संकेत देने शुरू कर दिए हैं। हम सब जानते हैं कि बॉलीवुड में सबसे अधिक लड़कियों के साथ प्रेम प्रसंग रचाने वाला अभिनेता सलमान खान हैं। मगर उसने पिछले दिनों अपने बयान से सभी उन लड़कियों को चरित्र प्रमाण पत्र दे दिया, जो उसकी जिन्‍दगी में आकर गई हैं। 

फर्जी मीडिया कंपनी फेकटॉक फेंकु संवाददाता ने बताया कि सलमान खान के बयान के बाद अभिषेक बच्‍चन पार्टी देने के मूड में थे, लेकिन ऐश ने कहा, क्‍या हर बार सीता प्रमाण देगी, कभी राम को नहीं देना चाहिए, अभी तक करिश्‍मा कपूर या किसी अन्‍य लड़की ने सार्वजनिक तौर पर बयान नहीं दिया। तुम को भी सलमान खान की तरह बयान देकर प्रमाण देना होगा। अभी तक मामला ठंडे बस्‍ते में है, हो सकता है धूम 3 की सफलता के बाद कुछ हो पाए। वरना नरेगा योजना के तहत मिलने वाला कार्य भी बंद हो जाएगा। बहल व सिप्‍पी साहेब अब और कितनी फिल्‍में बनाएंगे, दोस्‍ती का कर्ज चुकाने के लिए। 

सलमान खान के बयान के बाद कंगना राणावत ने भी पासा फेंक दिया। कंगना राणावत ने कहा, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता अगर उसका जीवन साथी किसी अन्‍य महिला के साथ हमबिस्‍तर होता है। कंगना राणावत के बयान के बाद सलमान खान के कान खडे हो चुके हैं। सुना है कि बिग बॉस में बिजी होने के कारण सोहेल खान को जिम्‍मेदारी सौंपी है कि पता करो कि कंगना का बयान सही है या केवल मशहूरी स्‍टंट है।

अगर बयान सही है तो कंडीशन एप्‍ली वाले स्‍टार के बारे में पूछ लेना, कहीं ऐसा न हो। सन्‍नी लियोन के पति जैसा पति भी चाहती हो, जिसको उसके काम से परेशानी नहीं है। अब देखना है कि सलमान खान के संकेत कब हकीकत में बदलते हैं। यह तो पक्‍का है कि अब सलमान खान घर बसाने के करीब हैं।

सलमान खान तो शादी के बारे में विचार भी न करते, लेकिन लोग दुखी करना बंद नहीं करते। अभी कुछ दिन पहले करीना कपूर ने कटरीना कैफ को भाभी कह दिया। यहां तक कि उसके साथ समलैंगिक रिश्‍ते बनाने तक की ख्‍वाहिश प्रकट कर दी। सुनने में आया है कि सलमान खान को भी बुरा लग रहा है। उधर, आजकल पड़ोसी बब्‍बू मान का गीत बजाते रहते हैं कि मित्रां दी छत्‍तरी तो उड़ गई बेचारा सलमान खान बड़ी मुश्‍किल में है। कब तक लड़कियों को चरित्र प्रमाण पत्र बांटते रहेंगे। इस बीच नवोदित अभिनेत्री एल्ली एवराम का कहना है कि वह बॉलीवुड के स्टार सलमान खान के शादी के प्रस्ताव को गंभीरता से नहीं लेगी। सलमान रियलिटी टीवी शो 'बिग बॉस' की मेजबानी के दौरान मजाक में कई बार एल्ली से फ्लर्ट करते हुए नजर आए।

एक ख़त आम आदमी पार्टी के नाम

नमस्कार। सबसे पहले आप को बधाई शानदार शुरूआत के लिए। कल जब रविवार को न्यूज चैनलों की स्क्रीनें, क्रिकेट मैच के लाइव स्कोर बोर्ड जैसी थी, तो मजा आ रहा था, खासकर दिल्ली को लेकर, दिल्ली में कांग्रेस का पत्ता साफ हो रहा था, तो भाजपा के साथ आप आगे बढ़ रहे थे, लेकिन दिलचस्प बात तो यह थी कि चुनावों से कुछ दिन पहले राजनीति में सक्रिय हुई पार्टी बाजी मारने में सफल रही,हालांकि आंकड़ों की बात करें तो भाजपा शीर्ष है, मगर बात आप के बिना बनने वाली नहीं है। यह बात तो आपको भी पता थी कि कुछ समीकरण तो बिगड़ने वाला है, मगर आप ने इतने बड़े फेरबदल की उम्मीद नहीं की थी। अगर आपको थोड़ी सी भी भनक होती तो यकीनन सूरत ए हाल कुछ और होता। आप प्रेस के सामने आए, बहुत भावुक थे, होना भी चाहिए, ऐसा क्षण तो बहुत कम बार नसीब होता है। अब आप को अपने कार्यालय के बाहर एक शेयर लिखकर रखना चाहिए,

मशहूर हो गया हूं तो जाहिर है दोस्तो, अब कुछ इलजाम मेरे स​र भी आएंगे
जो गुरबत में अक्सर नजर चुराते थे, अब देने बधाई मेरे घर भी आएंगे

मगर अब आप विपक्ष में बैठने की बात कर रही है, जो सही नहीं। नतीजे आप ने बदले हैं, मुख्यमंत्री को आप पार्टी ने हराया है, तो यकीनन सत्ता आप के हाथों में होनी चाहिए। गेंद को बीजेपी के पाले में धकेलने का मतलब दिल्ली की जनता के साथ किए वचनों से किनारा करना है। अगर कांग्रेस व भाजपा को उखाड़ना चाहते थे, लेकिन अब सत्ता से छीनकर दूसरे को देना चाहते हैं। न इंसाफी है। क्यूंकि आटे में नमक जितना तो गुनाह माफ है। पूरी सत्ता पुरानी पार्टी के हाथ में देने से अच्छा है, कुछ कांग्रेसियों को साथ ले लो, क्यूंकि राजनी​ति में अच्छे लोग भी होते हैं। मैं फिर कहता हूं, आप को सत्ता संभालनी चाहिए, राजनीति व जंग में सब जायज है। अगर आप अब पीछे हटते हैं तो शायद दिल्ली की जनता के साथ न इंसाफी होगी, क्यूंकि आप का विपक्ष में बैठना, स्वयं को सुरक्षित करना होगा। क्यूंकि आप के ज्यादातर राजनीतिक प्रतिनिधि राजनीति से दूर रहे हैं, उनको प्रजातंत्र में शासन करना अभी से नहीं आएगा, शायद इसलिए आप सत्ता के लोभी नजर नहीं आ रहे, या फिर वह एक माहौल बना रहे हैं, ताकि जनता का समर्थन मिल जाए, व बड़ी सुखद के साथ कांग्रेस के साथ चले जाएं।

केजरीवाल अब आप सत्ता से केवल एक फैसला दूर हैं, लेकिन मैं भी जानता हूं, और आप भी कि फैसले लेने से अधिक चुनौतीपूर्ण कार्यकाल होगा, क्यूंकि आप को उन वायदों पर पूरा उतरना होगा, जो सीना ठोक कर किए हैं, अगर भाजपा आती है तो उनको पांच साल सुरक्षित रहने का मौका मिल जाएगा, और राजनीति में स्वयं को परिपक्व कर पाएंगे। मगर मैं दूसरे नजरिये से सोचता हूं, अनाड़ी आदमी संभालकर वाहन चाहता है, तो धीमा चलता है, मगर अच्छा चलता है, अगले साल देश में क्रांति का बिगुल बज सकता है, अगर आप विपक्ष की बजाय सत्ता संभालें। आपको सकारात्मक रहना है तो विपक्ष के साथ रहें, अपनी रखें, व उनकी सुनें।   

मगर मेरा निजी ख्याल है कि आप केजरीवाल को राजनीति में उतरने के बाद, इतना स्नेह व समर्थन पाने के बाद अब कदम पीछे नहीं हटाना चाहिए, उनको कांग्रेस के साथ दिल्ली में सरकार बनाते हुए आगे बढ़ना चाहिए, इससे दो फायदे होंगे, उनके नेताओं को भी कुछ सीखने को मिलेगा, और आपको भी कांग्रेस के अनुभवियों से सीखने को मिलेगा।

आप के साहस को सलाम। मगर अब आप को वह फैसला लेना है, जो दिल्ली के लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। विपक्ष में बैठकर शायद मांगों को पूरा करवाना वैसा ही जैसे मनमोहन सिंह के निजी तरीकों को सोनिया गांधी की मंजूरी के बाद लागू करना, सत्ता आप को अपने हाथ में लेनी चाहिए। रोटी तो दिल्ली वासियों ने परोस दी है, लेकिन निवाला तोड़कर मुंह में स्वयं को डालना होगा, दिल्लीवासियों के विश्वास का कर्ज अदा करना होगा।

बाकी जीत आपकी, फैसला आपका। देश इंतजार में है। मैं भी। चलते चलते एक और शेयर आपके नाम।

हक़ीकत की तह तक पहुँच तो गए लेकिन सच में ख़ुद को उतारेंगे कैसे।
न जीने की चाहत, न मरने की हसरत यूँ दिन ज़िन्दगी के गुज़ारेंगे कैसे।

fact n fiction : जय हो का पोस्टर यूं बना

जय हो का पोस्टर रिलीज हो गया। पहले तो इसका नाम मेंटल था। लेकिन कुछ घटनाक्रम ऐसे हुए कि इसका नाम बदलकर जय हो रखना पड़ा। हमारे फिक्शन जर्नालिस्ट की रिपोर्ट ने उठाया पूरे मामले से पर्दा।

जानिए कैसे ?

हुआ कुछ यूं। सलमान खान बहुत खुश थे। दस बजे में कुछ मिनट बाकी थे। पोस्टर रिलीज होने वाला था। पोस्टर को लेकर सलमान अपने प्रशंसकों में उत्सुकता जगा रहे थे। शुक्रवार को जैसे ही दस बजे। वैसे ही पोस्टर रिलीज हुआ। सर्वर क्रैश होने की बात सामने आई।

लेकिन बात कुछ और थी। सलमान खान पोस्टर को लेकर नाराज हुए। पोस्टर देखा तो सलमान खान चौक उठे, यह कालिख क्यूं ? मेरे चेहरे पर पोती है। मैं इस ​​फिल्म में कोयला मजदूर थोड़ी हूं। राइट ब्रदर। तुम सही कह रहे हो, सोहेल खान ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा।

जब लोग इस पोस्टर को देखेंगे तो उनको कोयले की याद आएगी। कोयले घोटाले की याद आएगी। वैसे भी अगले साल चुनाव हैं। जनता कांग्रेस के चेहरे पर कालिख पोतेगी।

तुम्हारी फिल्म नहीं चलेगी सोहेल, सलमान बोले। कोई बात नहीं भैया, मैंने सौ करोड़ का इंतजाम कर लिया। सोहेल बड़े आत्मविश्वास के साथ बोले।  सलमान खान चौकते हुए बोला, कैसे ? । सोहेल बोले, मैं कांग्रेस के पास गया। मैंने उनको कहा, मैं आपका जय हो नारा अपनी फिल्म के ​टाइटल के लिए चुन रहा हूं, जिसके आपको अगले चुनावों में फायदा होगा, मुझे सौ करोड़ रुपए दो। लेकिन उसने कंगाली का रोना रोते हुए केवल पचास करोड़ दिए।

अरे छोटे, तो बाकी कि पचास करोड़ कहां से आएंगे, सलमान खान बोले। वो भी इंतजाम हो गया बड़े। मैं उसके बाद भाजपा के पास गया, उनके सामने कालिख पोते वाला कंसेप्ट रखा। मोदी तेज दिमाग के हैं, उनको आइडिया पसंद आया, पचास करोड़ का इंतजाम वहां से हो गया।

वैसे इस महीने बड़े आमिर खान की धूम 3 आ रही है। उम्मीद है कि वह शाहरुख खान का रिकॉर्ड तोड़े, हमको उसका रिकॉर्ड तोड़ना है। डर मत छोटे, नरेगा योजना है। समझा नहीं, बड़े, मतलब सरकार बेरोजगार लोगों को इस योजना के तहत काम देती है, जैसे यशराज बैनर अभिषेक बच्चन व उदय चोपड़ा को, और मैं अरबाज को, तुम आदि।

भैया तुम इस तरह हमारा मजाक उड़ायोगे, मुझे नहीं पता था। छोटे सीरियस मत हो, मैं तो मजाक कर रहा था, वैसे तुम ने भी कालिख पोत कर कम नहीं किया। आदमी तो मैं किसी औरत का नहीं बना सका, तुम ने लोगों को आदमी लिखकर नया ही जुमला बना दिया।     

भाव कृति : उलझन, उम्मीद व खयालात


उम्मीद
शाम ढले परिंदों की वापसी से
तेरे आने की उम्मीद जगाती हूं
सोच कर मैं फिर एकदम से
डर सी, सहम सी जाती हूं
कहीं बरसों की तरह,
उम्मीद इक उम्मीद बनकर न रह जाए
तुम्हारी, बस तुम्हारी

उलझन
उनकी तो ख़बर नहीं,
मैं हर रोज नया महबूब चुनता हूं
अजब इश्क की गुफ्तगू
वो आंखें कहते हैं, मैं दिल से सुनता हूं
हैप्पी मैं भी बड़ा अजीब हूं,
पुरानी सुलझती नहीं,
और हर रोज एक नई उलझन बुनता हूं

ख्यालात
लोग मेरे खयाल पूछते हैं,
लेकिन क्या कहूं, पल पल तो ख्यालात बदलते हैं
सच में मौसम की तरह,
न जाने दिन में कितनी बार मेरे हालात बदलते हैं
लोग सोचते हैं रिहा हुए
मुझे लगता है, हैप्पी लोग सिर्फ हवालात बदलते हैं

ख़त तरुण तेजपाल, मीडिया व समाज के नाम

तरुण तेजपाल, दोष तुम्‍हारा है या तुम्‍हारी बड़ी शोहरत या फिर समाज की उस सोच का, जो हमेशा ऐसे मामलों में पुरुषों को दोष करार दे देती है, बिना उसकी सफाई सुने, मौके व हालातों के समझे। इस बारे में, मैं तो कुछ नहीं कह सकता है, लेकिन तुम्‍हारे में बारे में मच रही तहलका ने मुझे अपने विचार रखने के लिए मजबूर कर दिया, शायद मैं तमाशे को मूक दर्शक की तरह नहीं देख सकता था। मीडिया कार्यालयों, वैसे तो बड़ी बड़ी कंपनियों में भी शारीरिक शोषण होता, नहीं, नहीं, करवाया भी जाता है, रातों रात चर्चित हस्‍ती बनने के लिए।

लूज कपड़े, बोस को लुभावने वाला का मैकअप, कातिलाना मुस्‍कान के साथ बॉस के कमरे में दस्‍तक देना आदि बातें ऑफिस में बैठे अन्‍य कर्मचारियों की आंखों में खटकती भी हैं। मगर इस शारीरिक शोषण या महत्‍वाकांक्षायों की पूर्ति में अगर किसी का शोषण होता है तो उस महिला या पुरुष कर्मचारी का, जो कंपनी को ऊपर ले जाने के लिए मन से काम करता है।

जब तक डील नो ऑब्‍जेक्‍शन है, तब तक मजे होते हैं, जिस दिन डील में एरर आने शुरू होते हैं, उस दिन विवाद होना तय होता है, जैसे आपके साथ हुआ। विवाद दब भी जाता, लेकिन तेरी शोहरत तुम्‍हें ले बैठी। मीडिया हाउस, तुम्‍हारे तहलकिया अंदाज से डरने लगे थे, तुम्‍हारी हिन्‍दी पत्रिका पांच साल पूरे कर चुकी है व पाठक निरंतर बढ़ रहे हैं। वैसे तुमने सही लिखा, परिस्‍थितियां सही नहीं थी, मेल से हुए खुलासे के अनुसार। मुझे भी कुछ ऐसा लगता है, क्‍यूंकि जहां हादसा हुआ, वह जगह भाजपा की है, तुम तो भाजपा के पहले शिकार हो, वो चूक कैसे कर सकती थी।

एक वेबसाइट पर प्रकाशित मेल पढ़ी, जिसमें आप दोनों के बीच की बात है, जिसको एक वेबसाइट ने प्रकाशित किया। उसमें लड़की कहती है कि तुम अक्‍सर उससे शारीरिक संबंधों से जुड़े मामलों पर बात करते थे, वो उन विषयों से भागना चाहती थी। इसमें शक नहीं होगा, आप में ऐसा होता होगा, लेकिन हैरानी तो इस बात से है कि वह फिर भी तुम्‍हारे ऑफिस में बने रहना चाहती थी, क्‍यूं, जब तुम्‍हारी सोच से वह अच्‍छी तरह परिचित हो चुकी थी। यह बात तो आम महिला भी समझ जाती है कि जहां शराब, शबाब एवं दिमाग खराब एकत्र होंगे, वहां हादसा तो होना ही है, लेकिन एक दूरदृष्‍टि रखने वाली महिला संवाददाता हालातों को भांप नहीं पाई, हद है।

मीडिया, मीडिया वाले के पीछे पड़ गया। इसलिए नहीं कि वहां पर महिला कर्मचारी के साथ शारीरिक शोषण हुआ, बल्‍कि इसलिए कि सामने वाले को इतना शर्मिंदा कर दिया जाए कि वह उठने लायक न बचे। भले ही, अदालती फैसले आने में देर है। पुलिसिया काईवाई शुरू हुई है। महिला ने आरोप लगाए हैं, सत्‍य साबित होने में वक्‍त है, मगर मीडिया स्‍वयं जज बनकर बैठा है, सिर्फ टीआरपी के चक्‍कर में। नहीं, नहीं, अपने एक प्रतिद्वंद्वी को खत्‍म करने के चक्‍कर में भी।

समाज। बड़ा अजीब है समाज। इतने सारे राम। हर आदमी के अंदर राम है, लेकिन ऐसे मामले में स्‍वयं को एक झटके में राम से अलग कर देता है। वह इतनी जल्‍दी भूल जाता है कि कभी कभी महिला का भी दोष हो सकता है। समाज हूं, भावनायों में बहता हूं। नहीं, नहीं, आजकल तो फेसबुक के प्रवाह में बहता हूं। मुझे कुछ पता नहीं होता, मैं तो उस घटना के समीप भी नहीं होता, जो घटना बंद कमरे में घटती है, दो लोगों के बीच घटती है।

मैं तो बस महिला की सुनता हूं। मेरी आदत है। आम ही देखा होगा, सड़क पर जाते हुए दंपति अचानक मोटर साइकिल से गिरता है। मैं दौड़े दौड़े जाता हूं, महिला को पकड़ कर उठाने की कोशिश्‍ा करता हूं, पुरुष तो खड़ा हो जाएगा। मैं महिला को कमजोर समझता हूं, या मेरा उसके प्रति आकर्षण है, यह बात मैं नहीं जानता, लेकिन मैं समाज हूं। मुझे पता है, वह महिला हमेशा स्‍वयं को दुर्बल कमजोर बताएगी, भले ही ऐसे मौकों पर मैं उसके पक्ष में खड़ता हूं। मैं समाज हूं।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र । पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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नहीं चाहिये अंग्रेज, हमारे पास चोर नेतायों की पलटन है


हर उदय का, अंत होना पतन है।
देखो दुनिया, अंत प्यारा अपना वतन है।
हर सफलता के पीछे बेजोड़ मेहनत व यत्न है।
शादी से पहले प्रियतम, बाद में संतान उत्तम रत्न है।
धर्म का अंत, आध्यात्मिक गुरूआें का तोतारटन है।
नहीं चाहिये अंग्रेज, हमारे पास चोर नेतायों की पलटन है।
पंजा, कमल, किसी के पास साइकिल तो किसी के पास लालटन है।
तुम्हारा अनुभव तो पता नहीं, लेकिन हैप्पी का तो यह कथन है।
शेअर कोयी नहीं करेगा, कहेगा हरकोयी बात में तो वजन है।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, सामग्री लेखक Ganeshaspeaks। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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Ad Review : क्‍या देखा गूगल का यह विज्ञापन ?

आज ऑफिस से लौटकर जैसे ही टेलीविजन का स्‍विच ऑन किया तो टाटा स्‍कायी की ओर से एक विज्ञापन चलाया जा रहा था। इस विज्ञापन से आगे मेरा टेलीविजन नहीं बढ़ा। विज्ञापन इतना प्‍यार था कि दिल को छू गया। मुझे लगा कि शायद जो बात ढ़ाई से साढ़े तीन घंटे की फिल्‍म नहीं कह सकती है, वे बात इस तीन मिनट कुछ सेकेंड के विज्ञापन ने कह दी।

यह विज्ञापन था विश्‍व प्रसिद्ध सर्च इंजन गूगल का। सबसे दिलचस्‍प बात तो यह है कि इस विज्ञापन को गूगल की ओर से यूट्यूब पर भी आज ही प्रकाशित किया गया है। इस विज्ञापन से जो बात आपको जोड़ती है, वे है इसका भावनात्‍मक पहलु। भले ही देश का एक खेमा पाकिस्‍तान को पी पी कर कोसता था, लेकिन एक खेमा ऐसा भी है, जो आज भी पाकिस्‍तान की आबोहवा में सांस लेने के लिये तरसता था।
इस विज्ञापन के किरदारों भारत व पाकिस्‍तान में आज भी मौजूद होंगे। जो आज भी अपने पुराने घरों को याद करते होंगे। जो आज भी अपने दोस्‍तों से मिलने के लिये तरसते होंगे। आने वाले समय में जब हमारी पुरानी पीढ़ियां चली जायेंगी, तो हो सकता है पाकिस्‍तान के प्रति हमारा प्‍यार रखने वाला एक खेमा मर जाये। और बच जाये, वो खेमा, जो पाकिस्‍तान को सिर्फ एक दुश्‍मन के रूप में देखता है।

गूगल का यह विज्ञापन कई दिलों को छूकर गुजरेगा। आइडिया भी अक्‍सर एक अच्‍छा आइडिया लेकर आता है, लेकिन शायद इस बार गूगल वाट एन आइडिया सर जी से बाजी मार गया। इस बात को पूरे दावे के साथ कहा जा सकता है। एक और बात। शायद एक निर्देशक साढ़े तीन घंटे की फिल्‍म में जो बात नहीं कह पाता, वो बात बड़े सलीके के साथ गूगल एड के निर्देशकों ने केवल कुछ मिनटों में कह दी। इसलिये हम तो कहें, आपका पता नहीं, गूगल बाबा की जय।



कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, सामग्री लेखक GaneshaSpeaks.com। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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यहां बे 'चारे' दोषी लालू, वहां क्‍या सोचते होंगे जेपी नारायण

चारा घोटाले में दोषी पाए गए लालू प्रसाद यादव। और रिपोर्टों मुताबिक जेल जाना निश्‍चित है। लालू प्रसाद यादव के लिये जेल जाना कोई नई बात नहीं, लेकिन बस फर्क इतना है कि वे कभी जेपी अंदोलन के कारण जेल जाते थे, और अब वे चारा घोटाले के दोष में जेल जाएंगे।

कहते हैं कि लालूप्रसाद यादव, जेपी नारायण के इतने खास थे कि वे लालू प्रसाद यादव को घर चलाने के लिए आर्थिक मदद तक देते थे। इतना ही नहीं, लालू प्रसाद यादव भी जेपी पर अपना कॉपीराइट मानते हैं, तभी तो जब अन्‍ना अंदोलन को जेपी अंदोलन से जोड़कर देखने की कोशिश की जाती है तो सबसे ज्‍यादा विरोधी सुर लालू प्रसाद यादव के होते हैं।

आज एक बार फिर जेपी को याद किया जा रहा है, हालांकि जेपी नारायण का जन्‍मदिवस अकसर अमिताभ बच्‍चन के जन्‍मदिवस की सुर्खियों में कहीं छुपा रह जाता है। जेपी, जय प्रकाश नारायण। यह नाम नहीं, एक अंदोलन था। जिसने इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस की जड़ों को उखाड़ फेंका था। उसकी जगह एक गैर कांग्रेसी सरकार को देश चलाने का मौका दिया। यह सरकार जनता पार्टी की थी, जिसका भी लघु नाम लिखा जाये तो जेपी बनेगा, हालांकि इस सरकार में जेपी ने कोई पद नहीं लिया था। वे हमेशा गैर राजनीतिक रहे।

शायद, स्‍वर्ग में कहीं विराजमान जेपी को आज दुख भी हो रहा होगा, और खुशी भी। खुशी इस बात की कि उनको कभी राजनीति की लत नहीं लगी, और दुख इस बात का, जो उसका सबसे करीबी चेला था, आज वे एक घोटाले में दोषी पाया गया।

वे सोच रहे होंगे। यह तो वे ही लालू है, जो कभी मेरे भ्रष्‍टाचार विरोधी अंदोलन में, सबसे आगे होता था। भ्रष्‍टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करता था। फिर सोचते होंगे, नहीं.. नहीं.. यह वे मेरा लालू नहीं, यह तो कोई राजनेता है। यह मेरा लालू नहीं हो सकता।

वे लालू तो कदम दर कदम अंदोलन को आगे बढ़ाता था। वे लालू तो मेरे समर्थकों में जान फूंकता था। मैंने लालू प्रसाद यादव को उसी दिन खो दिया था, जब वे जनता पार्टी की टिकट से सांसद बनकर लोक सभा पहुंचे थे। जब सत्‍ता के चक्‍कर में गठजोड़ की राजनीति पर उतारू हो गए थे।

मैं उस कहावत को भूल गया था, जो कदम दर कदम पढ़ाई जाती है, सिखायी जाती है कि एक मच्‍छली पूरे जल को बिगाड़ देती है, एक सेब दूसरे सेबों को खराब कर देता है, मैंने तो खराब सेबों के बीच अपना सेब रख दिया। मैंने तो गंदे जल में अपनी एक मच्‍छली छोड़ दी। आखिर नतीजा तो कुछ निकलना था।

सोच में पड़े होंगे जेपी, और सोच रहे होंगे, जब मेरी पुण्‍यतिथि में पांच दिन शेष होंगे, तब ( 03 अक्‍टूबर 2013 ) मेरे एक शार्गिद को अदालत सजा सुनाएगी। शायद इस वक्‍त मुझे कोई याद भी न करे।

वैसे भी मेरा जन्‍म एक महानायक की जन्‍म तारीख के साथ आता है। आज वे महानायक है, भले रुपहले पर्दे का, लेकिन मुझे से अधिक नाम है उसका। धन दौलत, शोहरत सब कुछ है उसके पास। उसको चाहने वालों की लम्‍बी फेहरिस्‍त है। मेरा नाम तो सियासतदान लेते हैं, वोट बैंक को निशाना बनाने के लिये, लोगों को भ्रमित करने के लिए।

वैसे लालू प्रसाद यादव, के कारण ही सही, कुछ लोग मुझे याद तो कर रहे होंगे। मेरा उन से शिकवा नहीं, जो मुझे अपना आदर्श मानते हैं। जो मेरी बातें करते हैं, और घर के किसी कोने में बैठे देश के सिस्‍टम को कोसते हैं, और किसी अंदोलन को जन्‍म नहीं देते।

वो लोग ही तो मेरे सच्‍चे आशिक हैं। वे नहीं चाहते मेरा अस्‍तित्‍व खत्‍म हो। जेपी अंदोलन की जगह कोई और अंदोलन जन्‍म ले। वे मुझे जिन्‍दा रखना चाहते हैं। वे मेरी कदर करते हैं।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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fact 'n' fiction : सड़क मेरे मोहल्‍ले वाली

भारत में सड़क सलामत बन जाये, शायद यह उस सड़क का अपना भाग्‍य होगा, वरना यहां पर सड़क बनने के बाद उस पर कुदाल आदि चलते हैं। पिछले दिनों मेरे मोहल्‍ले वाली सड़क बन गई, सही सलामत। यह उसका अपना भाग्‍य था। सच में उसका भाग्‍य, क्‍यूंकि उसको एक सही सोच वाले अधिकारी का दिमाग मिल गया था।

यह पहली सड़क थी, जो सब रीति रिवाज पूरे होने के बाद संपन्‍न हुई। इसलिये यह सलामत बन गई। आप सोच रहे होंगे। यह कैसी पहेली है। पहेली को सुलझाने के लिये एक लघु कथा सुनाता हूं। छोटी कहानी। कहानी शुरू होती है कुछ महीने पहले। एक अख़बार में ख़बर प्रकाशित हुई, मेरे मोहल्‍ले की सड़क बन गई। इस सुर्खी ने कई विभागों की नींद उड़ा दी। बस फिर क्‍या था, दूर संचार, वॉटर सप्‍लाई और बिजली विभाग के अधिकारियों ने कमर कस ली। नई सड़क बनने के बाद के रीति रिवाज पूरे करने के लिये, दूसरे देशों का तो पता नहीं, लेकिन हमारे भारत में यही रीति है, पहले सड़क बनेगी, फिर अन्‍य रीति रिवाज विधिवत संपन्‍न होंगे, जैसे वॉटर सप्‍लाई लाइन, टेलीफोन लाइन व स्‍ट्रीट लाइटिंग पोल।

सभी विभाग के कर्मचारी नई बनी सड़क पर पहुंचते हैं। देखते हैं चादर सी पतली बंजरी व तारकोल मिश्रित पट्टी, जो पुरानी कच्‍ची सड़क के ऊपर डाली गई, देखते ही बोले, इस विभाग की चांदी है। देखो कितना घपला, केवल बीस फीसद से काम चला दिया, 80 फीसद खा गये। भ्रष्‍टाचार की बातें करते करते सभी विभागों के कर्मचारी अपने अपने काम में जुट गये। शाम होते होते कुछ पत्रकार पहुंचे, फोटो खींचे गये। अगले दिन सुर्खियों में सड़क को खोदे जाने की ख़बरें। सभी विभाग हर्ष के मारे फूले नहीं समा रहे थे। खुश थे कि इस बार भी सुर्खियां हमारे नाम रही।

कुछ दिन बीते। अख़बार में एक और सुर्खी आई। इस सड़क के संदर्भ में, जिसमें एक नगरपालिका का अधिकारी सड़क का रीबन काटते हुए उद्घाटन कर रहा है, और उसकी दाहिनी ओर एक अन्‍य फोटो प्रकाशित हुई, जिसमें नगरपालिका अधिकारी को सम्‍मानित करते हुये मोहल्‍ला वासी उपस्‍थित थे, और पीछे लगे बैनर पर लिखा था, What an Idea Sirji....पहली सड़क, जो अपने रीति रिवाज पूरे होने के बाद बनी।

चलते चलते एक चुटकला, नहीं.... नहीं... कटुकला

टीचर.... टीचर.... यह राजनीति क्‍या होती है ?

बेटे राजनीति, वो लकीर है, जो दो चचेरे भाईयों को एक दूसरे के सामने खड़ा कर देती है।

टीचर.... टीचर.... example


बेटा जैसे #Sukhbir Singh Badal, #Manpreetsingh Badal #Rahulgandhi #varungandhi #udhav thackeray #raj thackeray





कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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Express Adda : राहुल गांधी के वक्‍तव्‍य - 2013

 साल 2013 में राहुल गांधी ने कब कहां, क्‍या कहा, जानिये, इस पोस्‍ट में।

राहुल गांधी  ने कहा, "कांग्रेस पार्टी दुनिया का सबसे बड़ा परिवार है लेकिन इसमें बदलाव की ज़रूरत है। मगर सोच-समझ कर। सबको एक साथ लेकर बदलाव की बात करनी है और बदलाव लाना है। प्यार से, सोचसमझ के साथ, सबकी आवाज़ को सुनकर आगे बढ़ना है। वो सबको एक ही आंख से एक ही तरीके से देखेंगे चाहे वो युवा हो, कांग्रेस कार्यकर्ता हो, बुजुर्ग हो या फिर महिला हो।'' 
राहल ने कहा, " आज सुबह मैं चार बजे ही उठ गया और बालकनी में गया। सोचा कि मेरे कंधे पर अब बड़ी जिम्मेदारी है। अंधेरा था, ठंड थी। मैंने सोचा कि आज मैं वो नहीं कहूंगा जो लोग सुनना चाहते हैं। आज मैं वो कहूंगा जो मैं महसूस करता हूं।" राहुल बोले, "पिछली रात मेरी मां मेरे पास आई और रो पड़ी क्योंकि वो जानती हैं कि सत्ता ज़हर की तरह होती है। सत्ता क्या करती है। इसलिए हमें शक्ति का इस्तेमाल लोगों को सबल बनाने के लिए करना है।"
रविवार, 20 जनवरी 2013

राहुल गांधी ने कहा, ''डरने की नहीं बल्कि लड़ने की जरूरत है ताकि सच को सामने लाया जा सके। सोच को बदलने और सकारात्मक सोच के साथ देश में बदलाव लाने की जरूरत है।''
मंगलवार, 22 जुलाई, 2013

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि गरीबी का मतलब भोजन, पैसे या अन्य भौतिक चीजों की कमी नहीं है बल्कि ये एक मनोदशा है.
मंगलवार, 6 अगस्त, 2013

राहुल गांधी ने कहा, 'मेरा अपना कोई सपना नहीं है। मैं अपने सपनों को कुचलना चाहता हूं और आपके सपनों को अपना बनाना चाहता हूं।'
बुधवार, 11 सितंबर, 2013

महाराष्‍ट्र में संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा, 'अगर कांग्रेस अपने दम पर जीतती है तो उसको एनसीपी जैसी सहयोगी पार्टियों के सहारे की जरूरत नहीं पड़ेगी''।
बुधवार, 25 सितंबर, 2013

जगदलपुर रैली में राहुल गांधी ने कहा, ''विपक्ष की सोच है कि एक या दो व्यक्ति देश चला सकते हैं जबकि कांग्रेस पार्टी आम आदमी को साथ लेकर चलती है।''
शुक्रवार, 26 सितंबर, 2013

राहुल गांधी ने कहा कि दागी नेताओं संबंधी सरकार द्वारा लाया गया अध्यादेश पूरी तरह बकवास है और इसे फाड़कर फेंक देना चाहिए।
शुक्रवार, 27 सितंबर, 2013

राहुल ने मनमोहन को लिखा है कि 'आप जानते हैं कि मेरे मन में आपके लिए बहुत ज्यादा सम्मान है। मैं ज्ञान के लिए आप ही की तरफ देखता हूं। मुश्किल हालात में जिस तरह से आप को नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं वो सराहनीय है और मैं इसका कायल हूं। उम्मीद करता हूं कि आप इस विवादित मुद्दे पर मेरे दृढ़ विश्वास को भी समझेंगे।
शनिवार, 28 सितंबर 2013


राहुल गांधी ने कहा, 'मेरी मां ने मुझे बताया कि मेरे शब्द ज्यादा कड़े थे। मैं मानता हूं कि अध्यादेश को बकवास नहीं बताना चाहिए था। मेरी भावनाएं सही थीं, लेकिन शब्द ज्यादा कड़े हो गए थे।'
गुरुवार। 2 अक्‍टूबर 2013।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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fact 'n' fiction : नरेंद्र मोदी का चुनावी घोषणा पत्र

वैसे तो हर बार राजनीतिक पार्टियां या गठबंधन अपना चुनावी घोषणा पत्र चुनावों से पूर्व जारी करते हैं, लेकिन इतिहास में पहली बार 'नरेंद्र मोदी : द मैन इन पीएम रेस' की ओर से अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी किया गया है।

इस चुनावी घोषणा पत्र की एक कॉपी हमारे फर्जी सूत्रों द्वारा उपलब्‍ध करवाई गई है। केंद्र सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान करने वाले नरेंद्र मोदी की ओर से चुनावी घोषणा पत्र युवा पीढ़ी और आम जनता को ध्‍यान में रखकर बनाया गया है। विकास पुरुष की ओर से इसमें विकास संबंधी कोई घोषणा नहीं, जो है वे आपके सामने रखने जा रहे हैं।

सोशल मीडिया स्‍वतंत्रता
मैं सोशल मीडिया के अस्‍तित्‍व को बरकरार रखने के लिये पुरजोर कोशिश करूंगा। मुझे पता है कि यह एक अभिव्‍यक्‍ति का सशक्‍त प्‍लेटफॉर्म है, बशर्ते कि आप इस तरह की गतिविधियों का संचालन नहीं करेंगे, जिससे मेरी सरकार को ख़तरा पैदा हो। पहले स्‍पष्‍ट कर दूं, मैं मनमोहन सिंह की तरह बेदाग और इमानदार रहूंगा, लेकिन नेताओं की गारंटी लेना मुश्‍िकल है। पांच उंगलियां एक बराबर नहीं होती।

हर शहर में लाल किला
सोशल मीडिया के अस्‍तित्‍व को बरकरार रखने के बाद मेरा अगला कदम होगा, हर शहर में लाल किला हो। मुझे इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर में बहुत विश्‍वास है। आप गुजरात में आकर देखिये, यहां पर वैशनूदेवी से लेकर बालाजी धाम तक के प्रतिरूप मॉडल मिलेंगे। महात्‍मा गांधी मंदिर के लिये करोड़ों खर्च कर रहा हूं, यह ओर्जिनल है। लाल किला जब हर शहर में होगा, तो मैं प्रधानमंत्री के रूप में आपके शहर में 15 अगस्‍त मना पाउंगा। हालांकि दीवाली का प्रोग्राम तो सीमा पर सेना जवानों के साथ पाकिस्‍तानी सरहद पर बम फोड़कर मनाने का फिक्‍स है।

एलके आडवाणी राष्‍ट्रपति होंगे
मेरे प्रिय व भाजपा को मजबूत करने वाले मेहनतकश नेता एलके आडवाणी, जिनकी वेटिंग रद्द हो गई, को प्रमोशन देते हुए राष्‍ट्रपति नियुक्‍त किया जायेगा, बशर्ते वे मेरे साथ राज्‍यपाल कमला बेनीवाल जैसा रिलेशन न रखें। नहीं तो मजबूरन, अध्‍यादेश लाने के कानूनों में बदलाव करने होंगे, जिसके लिये मौजूदा समय में राष्‍ट्रपति की जरूरत पड़ती है।

पाकिस्‍तान विलय
हमारे लोहपुरुष सरदार पटेल का स्‍वप्‍न अधूरा रहा गया, वे चाहते थे कि भारत एक सूत्र में  बंधे, लेकिन ऐसा नहीं हो सकता, क्‍यूंकि जिन्‍ना का जिन्‍न कुछ रियासतों को अपने साथ लेकर जाने में सफल हुये। हमारी कोशिश होगी कि आतंकवाद जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे अपने पाकिस्‍तान को इस बीमारी से मुक्‍त किया जाये, और विलय से बेहतर विकल्‍प कोई नजर नहीं आता। भारत, वैसे तो इसका अर्थ प्रकाश, रत, लेकिन युवा पीढ़ी अर्थ कम ढूंढती है, उसको केवल पहले अक्षर का अर्थ भार समझ आता है, इसलिये इस भार को हल्‍का करने के लिये, भारत को 'हिन्‍दू' स्‍तान में परिवर्तित किया जायेगा, इंडिया को खत्‍म क्‍यूंकि इसके भी शुरूआती अक्षर, इंदिरा की याद दिलाते हैं।

ऑन लाइन वोटिंग सिस्‍टम

इस सिस्‍टम को लाना बहुत जरूरी है, क्‍यूंकि देश तरक्‍की की राह पर है। यहां के युवा आलसी हैं। जब से फेसबुक, टि्वटर, ऑनलाइन शॉपिंग, ऑनलाइन बिल पे सिस्‍टम शुरू हुआ है, तब से लाइनों में लगना बंद कर दिया, केवल आम आदमी लाइन में लगता है। और मेरी जीत की गारंटी फेसबुकिये और टि्वटरिये हैं। इसलिये इनके लिये ऑनलाइन वोटिंग प्रणाली जरूरी है, क्‍यूंकि यह क्‍यू में नहीं लगेंगे, और नहीं लगेंगे तो मेरा जीतना मुश्‍िकल है।

दागी नेताओं की छुट्टी
सत्‍ता में आने के बाद दागी नेताओं की छुट्टी करने पर विचार किया जायेगा। दागी नेताओं को बाहर का रास्‍ता दिखाने के लिये अदालती आदेशों को माना जायेगा, लेकिन उससे पहले सीबीआई व अन्‍य जांच एजेंसियों से बीजेपी के सभी नेताओं को क्‍लीन चिट दिलाई जायेगी। इस प्रक्रिया में विरोधी पार्टी के नेता भी शामिल हो सकते हैं, बशर्ते दिल्‍ली वाली गर्लफ्रेंड छोड़नी होगी।

बीजेपी के उच्‍च पदाधिकारियों ने इस संदर्भ में संपर्क करने पर बताया कि यह घोषणा पत्र पूर्ण रूप से फर्जी है। इसका वास्‍तविकता से कोई लेन देन नहीं, हालांकि कुछ तथ्‍य सही हो सकते हैं, बाकी कहानी काल्‍पनिक है। विश्‍वास कीजिये।

Disclaimer : fact 'n' fiction  सीरीज में व्‍यक्‍तियों के नाम असली हो सकते हैं, लेकिन इसकी लेखन शैली व कंटेंट पूर्ण रूप से काल्‍पनिक है। कुछ असली तथ्‍यों को आधार बनाकर कल्‍पना से इसकी रचना की जाती है।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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ऑस्‍कर 2014 के लिये भेजी एशियाई फिल्‍मों के ट्रेलर

आधिकारक रूप से 86वें ऑस्‍कर पुरस्‍कार समारोह के लिये सर्वोत्‍तम विदेशी भाषा फिल्‍म श्रेणी के तहत एशियाई मूल की नौ फिल्‍में भेजी गई हैं, जो 2 मार्च 2014 को लॉस एंजिलस के हॉलीवुड जिले में स्‍थित डॉलबाय थियेटर में दिखाई जायेगी।

The Good Road
भारत की ओर से इस श्रेणी के तहत ज्ञान कोरिया के निर्देशन में बनी गुजराती 'द गुड रोड' को भेजा गया है। इस फिल्‍म की कहानी एक ट्रक चालक व दो बच्‍चों के आस पास घूमती है। ट्रक चालक अपने परिजनों को अपनी जीवन बीमा राशि दिलाने के लिये झूठे सड़क हादसे का पूरा नाटक रचता है। आदित्‍य, जो अपने माता पिता से एक ढाबे पर खाना खाते वक्‍त जुदा हो जाता है। पूनम, जो अपने किसी की तलाश में हाइवे पर पहुंच जाती है। इन दिनों किरदारों के आसपास घूमती कहानी है 'द गुड रोड'। यह राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार जीत चुकी है। अब ऑस्‍कर में कहां तक पहुंचती है, के लिये इंतजार करना होगा।


Television

बंग्‍लादेश की ओर से इस श्रेणी के लिये टेलीविजन नामक फिल्‍म भेजी गई है, जो एक हिन्‍दु परिवार के संघर्ष पर आधारित है। यह हिंदु परिवार एक अच्‍छे क्षेत्र में रहता है, जहां पर इस्‍लामिक धर्मगुरू ने टेलीविजन देखने पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। बच्‍चों की जिद्द के आगे परिवार वाले टेलीविजन लेकर आते हैं, और शुरू होता है संघर्ष। इस फिल्‍म का निर्देशन मुस्‍तफा सारवार ने किया है। इस फिल्‍म में शाहिर हुदा रूमी, चंचल चौधरी, मुशर्रफ करीम और नुर्सत इमरोज तीशा ने मुख्‍य भूमिकायें अदा की हैं।
 

Soongava: Dance of the Orchids

नेपाल की ओर से इस कैटेगिरी के लिये सूनगावा: डांस ऑफ द ओर्चिड्स नामक फिल्‍म भेजी गई है। यह फिल्‍म समलैंगिक रिश्‍तों पर आधारित है। इस फिल्‍म में दो लड़कियां मुख्‍य किरदारों में हैं, जो आपस में प्‍यार कर बैठती हैं। अचानक एक लड़की की शादी हो जाती है, लेकिन दोनों एक दूसरे के इतनी करीबी आ चुकी होती हैं कि शादी के बाद भी अपने रिश्‍ते को खत्‍म नहीं कर पाती, और धीरे धीरे यह रिश्‍ता जगजाहिर हो जाता है, और उनकी जिन्‍दगी में मुश्‍िकलें व समाज की चुनौतियां दस्‍तक देती हैं। इस फिल्‍म को कुछ अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में अच्‍छा रिस्‍पॉन्‍स मिला है। 

 

Zinda Bhaag
पाकिस्‍तान की ओर से 'जिन्‍दा भाग' को इस श्रेणी के लिये भेजा गया है। इस फिल्‍म में नसीरुद्दीन शाह मुख्‍य किरदार में हैं। उन्‍होंने इस फिल्‍म में एक लाहौरी रसोइये व विलेन का किरदार अदा किया है। फिल्‍म की कहानी विदेश जाने के इच्‍छुक युवाओं से शुरू होती है, जो विदेश में जिन्‍दगी जीने का सपना देखते हैं। अचानक स्‍थितियां उनको गलत रास्‍ते पर खींचकर ले जाती हैं। इस संघर्ष का नाम है 'जिन्‍दा भाग'। 


Juvenile Offender
दक्षिण कोरिया की ओर से इस श्रेणी के लिये 'जुवेनाइल ओफेंडर' नामक फिल्‍म भेजी गई है, जो एक ऐसे बच्‍चे पर है, जिसको उसकी मां जन्‍म देने के बाद छोड़ती है, और वे एक लम्‍बे समय बाद अपनी मां से मिलता है। बीमार दादा की देखभाल और घर में अकेलापन महसूस करने वाला यह किशोर एक आपराधिक मामले में गिरफ्तार होता है। दादा की मौत के बाद वे अपनी मां की तलाश करता है। उसके साथ रहने लगता है, अचानक दोनों में पुरानी बातों को लेकर झगड़ा होता है, और इस कहानी का एक अहम हिस्‍सा किशोरी की गर्लफ्रेंड भी है। फिल्‍म की पुरस्‍कार जीत चुकी है।
 

ILO ILO

सिंगापुर की ओर से इस श्रेणी के लिये आईएलओ आईएलओ नामक फिल्‍म भेजी गई है, जो एक मां बेटे के रिश्‍ते पर आधारित है। इस फिल्‍म का ट्रेलर देखने के बाद महसूस होता है कि बच्‍चा अपने परिवार से नफरत करता है, वे अपने दादा से प्‍यार करता है। वे अपने परिवार से दूर भागता है। ऐसे में वे एक हादसे का शिकार हो जाता है। इस हादसे में बाद उनकी जिन्‍दगी में कुछ परिवर्तन आते हैं, इनको दर्शाती फिल्‍म है आईएलओ आईएलओ। यह फिल्‍म घर में होम सिक फील करने वाले बच्‍चों पर आधारित है। कई फिल्‍म फेस्‍टीवलों में यह फिल्‍म अपना परचम लहरा चुकी है।
 
Transit
फ़िलिपीन की ओर से इस श्रेणी के तहत भेजी गई फिल्‍म ट्रांजिस्‍ट, एक पिता के संघर्ष पर है, जो इजरायली लॉ के कारण अपने बच्‍चे को अपने से दूर न होने के लिये करता है। पिता अपने बच्‍चे का जन्‍मदिवस मनाने के लिये घर पहुंचता है, तो उसको पता चलता है कि इजरायल में एक नया लॉ आया है, जिसके तहत विदेशी बाल मजदूरों को विदेश भेजा रहा है। इस आदेश के बाद शुरू होती है एक पिता के संघर्ष की कहानी। इस फिल्‍म का निर्देशन हन्‍ना इस्‍पिया की ओर से किया गया है।


The Great Passage

द ग्रेट पैसेज, जापान की ओर से इस श्रेणी में भेजी गई एक फिल्‍म है। यह फिल्‍म एक नौजवान के आसपास घूमती है, जो किताबों से बेहद प्‍यार करता है। वे एक असफल सेल्‍समैन है, लेकिन उसको एक शब्‍दकोश तैयार करने वाली टीम के लिये चुन लिया जाता है। इस दौरान उसकी मुलाकात एक खूबसूरत लड़की से होती है, और उसका दिल जीतने के लिए वे अपनी पूरी जान लगा देता है। शब्‍दकोश कंपनी का मालिक उससे प्‍यार शब्‍द की परिभाषा देने के लिये पूछता है।
 

The Grandmaster

चीन ने इस श्रेणी के लिये अपनी 'द ग्रेंडमास्‍टर' मार्शल आर्ट्स आधारित एक फिल्‍म को चुना है। यह असल जिन्‍दगी से प्रेरित एक फिल्‍म है, जैसे भाग मिल्‍ख भाग 'मिल्‍खा सिंह' से प्रेरित है। इस फिल्‍म की कहानी 1930 के प्रसिद्ध मार्शल आर्ट्स किंग विंग चुन पर आधारित है, जिसकी एक हवाई यात्रा के दौरान मौत हो जाती है।






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fact 'n' fiction : राहुल गांधी को लेने आये यमदूत

सुबह सुबह का समय था। राहुल गांधी अपने बिस्‍तर पर नींदफरमा थे। आंख खुली तो देखा, उसके बिस्‍तर के पास दो लोग खड़े हैं। राहुल ने चौकते हुए पूछा, आप कौन हैं ? सामने से उत्‍तर आया .. यम ऐम्‍बेसी से आये हैं। राहुल तपाक से बोले ... क्‍या मैं प्रधान मंत्री बन गया ?

नहीं.. नहीं.. यमन ऐम्‍बेसी से नहीं, यम लोक वाली ऐम्‍बेसी से आये हैं। तो आप यहां क्‍यूं आये ? राहुल ने परेशानी वाले लिहाजे में पूछा। दरअसल हमारे लोक में एक रियालिटी शो का आयोजन होने जा रहा है। उसी के सिलसिले में आपको लेने आये हैं, आपका नाम राहुल है न ? यम दूतों ने पूछा।

राहुल ने हौसला भरते हुये कहा, हां मेरा नाम राहुल है, लेकिन मुझे पता है, आप बिग बॉस बना रहें हैं, जहन्‍नुम का अओ, और जन्‍नत का वओ कंसेप्‍ट पर, लेकिन इस शो में पहले भाग ले चुका राहुल मैं नहीं, वे राहुल महाजन हैं।

नहीं.. नहीं ... वो नहीं चाहिए। हम को ऐसा प्रतिभागी चाहिये जो लम्‍बा खेल सके। अच्‍छा.. अच्‍छा.., आपको राहुल द्राविड़ की तलाश कर रहे हैं। हां.... हां... मुझे पता है वे अच्‍छा क्रिकेट खेलते हैं। टेस्‍ट में तो उनको द वॉल का टैग भी मिला हुआ है, तो क्‍या आपको उसका एड्रेस दूं।

नहीं... नहीं... खिलाड़ी नहीं चाहिए, हम को संजीदगी भरा अभिनय करने वाला चाहिये, जो चेहरे से गंभीर नजर आये। अच्‍छा.... अच्‍छा.... अब समझा। आपका को राहुल बॉस की तलाश है, लेकिन वो तो बॉम्‍बे रहते हैं, और आप गलती से दिल्‍ली आ गये। कहो तो वीआईपी कोटे में रिजर्वेशन करवा दूं।

नहीं.... नहीं..... ऐसा प्रतिभागी चाहिए, जो लीड कर सके। जिसमें लीडरशिप क्‍वालिटी हो, जैसे एक सफल बिजनसमैन में होती है। ओके... ओके.... देट्स गूड। आपको राहुल बजाज की जरूरत है। हां, उनके पास राजनीति और सफल बिजनसमैन का अनुभव है। वे आपके लिये बिल्‍कुल शूट हैं। तो आप उनसे मिलना चाहेंगे।

नहीं.... नहीं... हम को ये क्‍वालिटी किसी एक ही व्‍यक्‍ति में चाहिये। हमको  इतने सारे प्रतिभागियों की जरूरत नहीं। हमें तो बस ऑल इन वन चाहिये।

सुझाव दे दे तंग आ चुके राहुल गांधी ने दूतों के हाथों से वारंट पेपर छीना और टुकड़े टुकड़े कर दिया। सालो ! सुबह सुबह बनाने के लिये मैं ही मिला आपको। सालो ! पप्‍पू समझा, क्‍वालिटियां नरेंद्र मोदी की, और नाम राहुल का।

हंसते हंसते यमदूत दौड़ गये। पीछे एक चिट छोड़ गये। हम तो फर्जी यमदूत थे। भले ही सीबीआई से जांच करवा लेना।

Disclaimer : fact 'n' fiction  सीरीज में व्‍यक्‍तियों के नाम असली हो सकते हैं, लेकिन इसकी लेखन शैली व कंटेंट पूर्ण रूप से काल्‍पनिक है। कुछ असली तथ्‍यों को आधार बनाकर कल्‍पना से इसकी रचना की जाती है।



कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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frank talk : मुजफ्फरनगर दंगों के छींटे दुर्गा एक्‍सल से नहीं जायेंगे अखिलेश

मुजफ्फरनगर में भड़काऊ भाषण देने के आरोपी बीजेपी विधायक संगीत सोम ने शनिवार को सरेंडर करते हुए नरेंद्र मोदी को प्रचार हथकंडा अपनाने के मुकाबले में पीछे छोड़ दिया। बीजेपी विधायक संगीत सोम ने ऐसे सरेंडर किया, जैसे वे किसी महान कार्य में योगदान देने के बाद पुलिस हिरासत में जा रहे हों। गिरफ्तारी के वक्‍त हिन्‍दुओं का हृदयसम्राट बनने की ललक संगीत सोम में झलक रही थी। शायद संगीत सोम को यकीन हो गया कि लोक सभा चुनावों के बाद नरेंद्र मोदी सत्‍ता में आयेंगे, जैसे नरेंद्र मोदी एलके आडवाणी के अवरोधों को तोड़ते हुए पीएम पद उम्‍मीदवार (एनडीएम) बने हैं।

बीजेपी के विधायक संगीत सोम ने गिरफ्तारी के बाद कहा, मैं अपने धर्म की रक्षा के लिए लड़ता रहूंगा। शायद किसी ने संवाददाता ने पूछने की हिम्‍मत नहीं की कि आखिर आपका धर्म खतरे में कहां है ? अगर भारत में बहुसंख्‍यक धर्म संकट में है तो अल्‍पसंख्‍यक लोगों  में तो असुरक्षा का भाव अधिक होगा। जहां असुरक्षा का भाव है, वहां सुरक्षा के लिए तैयारियां होती हैं, और नतीजा हवा से दरवाजा बजने पर भी अंधेरे में तबाड़तोड़ गोलियां चल जाती हैं।

इस नेता की गिरफ्तारी उसी मामले में हुई है, जिसकी आग समाजवादी पार्टी को अपनी लपटों में लिये हुए है। एक ख़बरिया चैनल ने स्‍टिंग ऑपरेशन किया, तो समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान से मिलता जुलता नाम सामने आया, लेकिन स्‍टिंग ऑपरेशन पर मोहर उस समय लगती नजर आई, जब आनन फानन में आजम खान ने स्‍टिंग ऑपरेशन के तुरंत बाद प्रेस से मुखातिब होना लाजमी समझा।

इससे पूर्व यूपी के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव ने मुजफ्फरनगर के दंगा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया, तो लोगों ने उनको काले झंडे दिखाये और स्‍वागतम कहा। एक अख़बार का शीर्षक तो यह भी था कि हमको लेपटॉप नहीं, सुरक्षा चाहिए। शायद सुरक्षा की गारंटी देना अखिलेश यादव के हाथ में नहीं है, क्‍यूंकि अगर वे फैसला लेने का मादा रखते तो आजम खान को मनाने जाने की बजाय वे दंगा प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के पास जाते। हद है एक मुख्‍यमंत्री पहले अपने नेता को मनाने जाता है। शायद जनता को सुरक्षा का भरोसा दिलाने से ज्‍यादा जरूरी है, कि वे अपनी पार्टी को सुरक्षा का भरोसा दिलाये। शायद ऐसा भी लगा हो, कहीं लोक सभा चुनावों में आजम खान की नाराजगी पापा का पीएम कुर्सी वाला स्‍वप्‍न न तोड़ दे।

जब हर ओर से थू थू होने लगी तो जनाब को खयाल आया, दुर्गाशक्‍ति नागपाल का, जिसको कुछ महीने पहले निलंबित कर दिया गया था, क्‍यूंकि उसके द्वारा एक अवैध इमारत गिरा देने से दंगे होने की आशंका थी, लेकिन मुजफ्फरनगर में दुर्गाशक्‍ति नागपाल नहीं थी, फिर पचास के करीब जिन्‍दगियां चली गई और एक लाख के करीब लोग घरों से बेघर हो गये, बिना किसी घर को गिराये।

जो अखिलेश यादव मीडिया के सामने चीख चीख कर कह रहे थे, सरकार का फैसला सही है, दुर्गा शक्‍ति निलंबन संबंधी, लेकिन सवाल है कि आज अचानक उसी सरकार का फैसला अखिलेश यादव को गलत कैसे लगने लगा। सफेद रंग का कुर्ता जब ज्‍यादा मैला होने लगा तो अखिलेश यादव ने सोचा होगा, चलो दुर्गा शक्‍ति सरफ एक्‍सल से धो लिया जाये।

जो उत्‍तर प्रदेश में हुआ, शायद मुलायम सिंह यादव के कहने अनुसार वह केवल जातीय झड़प होती, लेकिन अगर राजनेता अपनी राजनीतिक रुतबे का इस्‍तेमाल न करते। 99.9 फीसद पुलिस विभाग नेताओं में दबाव में काम करता है, इस बात की पुष्‍टि के लिए किसी से प्रमाण पत्र लेने की जरूरत नहीं, और जो 0.1फीसद सरकारी विभाग का नौकर सरकार के खिलाफ काम करता है, वे दुर्गाशक्‍ति नागपाल की तरह निलंबित कर दिया जाता है।

अखिलेश यादव की सरकार का पुलिस विभाग में कितना हस्‍तक्षेप है। इस बात का अंदाजा तो एडीजी(लॉ एंड ऑर्डर) अरूण कुमार की उस गुहार से लगाया जा सकता है, जिसमें अरुण कुमार ने उत्‍तर प्रदेश से बाहर जाने की राज्य सरकार के सामने अपनी मंशा जाहिर की।

पुलिस विभाग का सामने आया स्‍टिंग ऑपरेशन सौ फीसद न सही, लेकिन कुछ फीसद तो सही होगा, अगर वो सही है तो सरकार और जनप्रतिनिधि दोनों मुजफ्फरनगर जन संहार के लिये जिम्‍मेदार हैं।

ऐसा नहीं कि यह दंगे केवल समाजवादी पार्टी के कारण हुये, यह दंगे सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक हितों के कारण हुये। इस बात की स्‍पष्‍टता तो संगीत सोम की ड्रामामय गिरफ्तारी से हो गई, वे हिन्‍दुओं का नया सितारा बनकर उभरना चाहता है। चाह बहुत कुछ करवा देती है।

अखिलेश यादव तुम्‍हारे दाग दुर्गा शक्‍ति नागपाल सरफ एक्‍सल से तो न जाये, लेकिन हो सकता है कि हिन्‍दुत्‍व पक्षियों का एक झुंड जब सत्‍ता में आयेगा तो किसी बड़े जन संहार से तुम्‍हारा छोटा गुनाह छुप जाये, और यकीनन भविष्‍य में ऐसा होगा, स्‍थितियों का आकालन बता रहा है, क्‍यूंकि यहां पर एक सांप फन उठा रहा है।

बस डर है, शाइनिंग इंडिया मिशन, कहीं मिस्र मिशन न बन जाये। जहां पर लोगों ने मुबारक हुस्‍नी को उतार कर मोहम्‍मद मर्सी को देश की कमान सौंपी, लेकिन विकास का एजेंडा किसी कोने में सिसकता रहा, और देश में इस्‍लामिक मत पैर पसारने लगा, एक भीड़ ने मिस्र में एक नये अंदोलन को जन्‍म दे दिया, जो मुर्सी से आजादी चाहता था।

कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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विश्‍व की सबसे बड़ी दस कंपनियां

हम सब ग्‍लोबल इकोनॉमी में रहते हैं। 1962 में कानेडियन दार्शनिक मार्शल मैकलुहान अपनी परिभाषा को 'ग्‍लोबल विलेज' के साथ आगे बढ़े। उन्‍होंने अपनी किताब में इस बात पर प्रकाश डाला कि किस तरह ग्‍लोबल और एक गांव के बीच संबंध स्‍थापित हो रहा है, एक इलेक्‍ट्रोनिक तकनीकी के कारण और जानकारी के तात्कालिक आंदोलन के कारण हर तिमाही पर हर जगह से एक ही समय पर सूचना उपलब्‍ध हो जाती है। इंटरनेट ने हमारे सोचने और सूचना प्राप्‍त करने का तरीका बदल दिया। हम बिजनस कर रहे हो या ट्रेवल, हमको हमेशा एक बात दिमाग में रखनी चाहिए कि हम ग्‍लोबल नेटवर्क में सक्रिय हैं। औद्योगिक क्रांति के कारण बढ़े कंप्यूटर के व्‍यापाक स्‍तर पर इस्‍तेमाल और बढ़ती जरूरतों के लिए व्‍यापाक पैमाने पर बढ़ी माल उत्‍पादन जरूरत ने छोटी कंपनियों को पीछे धकेल दिया, और इस क्रांति के कारण वे विश्‍व की सबसे बड़ी कंपनियों और फैक्‍ट्रियों के समूह बन गये। आज उनके पास लाखों कर्मचारी हैं, और अरबों में उनकी कीमत है। आज आप की मुलाकात विश्‍व की ऐसी दस बड़ी कंपनियों से करवाने जा रहे हैं, जिनका राजस्व बताता है कि उनकी हैसियत कितनी है।

वॉक्‍सवैगन {वॉल्क्सवेज़न} ग्रुप
राजस्‍व - 250 बिलियन डॉलर
वॉक्‍सवैगन ग्रुप की स्‍थापना 1937 में नेशनल सोशलिस्‍ट पार्टी की ओर से छोटी कार बनाने के लिए हुई थी, लेकिन मौजूदा समय में कंपनी के पास विश्‍व के 27 देशों में 100 ज्‍यादा फैक्‍ट्रियां हैं, और फैक्‍ट्रियों में पांच लाख से अधिक लोग कार्यरत हैं। इस कंपनी का मुख्‍यालय जर्मनी के वोल्फ़्सबर्ग में है। कंपनी का बिजनस 153 देशों में विस्‍तार कर चुका है। कंपनी का राजस्‍व 2012 में 250 बिलियन डॉलर था।

स्‍टेट ग्रिड कोर्पोरेशन ऑफ चाइना
राजस्‍व : 290 बिलियन डॉलर
यह विश्‍व की सबसे बड़ी बिजली वितरित करती कंपनी है। इस कंपनी में कर्मचारियों की संख्‍या 15 लाख से भी ज्‍यादा है। यह कंपनी पूरे चाइना में बिजली सप्‍लाई देती है। इस कंपनी की स्‍थापना 2002 में उस समय हुई, जब स्‍टेट पॉवर कोर्पोरेशन ऑफ चाइना का विभाजन हुआ। साल 2012 में कंपनी का राजस्‍व 290 बिलियन डॉलर था।

विटोल ग्रुप
राजस्‍व : 303 बिलियन डॉलर
विटोल ग्रुप डच स्वामित्व वाली बहुराष्ट्रीय व्यापार कंपनी है। इस कंपनी की स्‍थापना 1966 में रोर्टडम में की गई। विटोल समूह कच्‍चे तेल, कार्बन उत्सर्जन, कोयला, प्राकृतिक गैस, कृषि से जुड़े उत्‍पादों का व्‍यापार करता है। कंपनी के जहाज 400 मिलियन टन कच्‍चा तेल प्रति वर्ष ढोहते हैं। यह दुनिया में सबसे बड़ी ऊर्जा व्यापारी कंपनी है। विटोल एक निजी कंपनी है, जहां पर लगभग 2800 कर्मचारी काम करते हैं। इस कंपनी का 2013 जनवरी में राजस्‍व 303 बिलियन डॉलर था।

साउदी अमैर्को
राजस्‍व : 365 बिलियन डॉलर
साउदी अरबिया के डाहरान स्‍थित साउदी अमैर्को, का आधिकारिक नाम साउदी अरबियन ऑयल कंपनी है। यह प्राकृतिक ऑयल और गैस आधारित कंपनी है। यह कंपनी आज विश्‍व की सबसे बड़ी कंपनी है, जिसके पास सबसे बड़ा तेल भंडार क्षेत्र है। इस कंपनी की कीमत दस ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर कीमत हो चुकी है। साल 2011 में इसका राजस्‍व लगभग 365 बिलियन डॉलर था।

ब्रिटिश पेट्रोलियम
राजस्‍व : 370 बिलियन डॉलर
ब्रिटिश पेट्रोलियम बीपी ब्रिटिश ऑयल और गैस कंपनी, जिसका मुख्‍यालय लंडन में है, और आज कंपनी का कारोबार लगभग 80 देशों में चल रहा है। कंपनी प्रति दिन 3.3 मिलियन बैरल ऑयल का उत्‍पादन करती है। कंपनी के पास 20 हजार से अधिक सर्विस स्‍टेशन हैं। कंपनी का 2012 में रेवन्‍यु 370 बिलियन डॉलर था।

सिनेपॉक ग्रुप
राजस्‍व : 411 बिलियन डॉलर
चाइना पेट्रोकैमिकल कॉर्पोरेशन ऑयल रिफाइनिंग और पेट्रोकेमिकल एंटरप्राइजेज के रूप में एशिया की सबसे बड़ी कंपनी है। साल 2007 में यह कंपनी चाइना के 500 एंटरपाइजेस में नंबर वन थी। साल 2012 में इस कंपनी का राजस्‍व 411 बिलियन डॉलर रहा।

चाइना नेशनल पेट्रोलियम कंपनी
रेवन्‍यु : 425 बिलियन डॉलर
चाइना नेशनल पेट्रोलियम कंपनी, सरकारी स्‍वामित्‍व वाला ऑयल और गैस निगम है। इस कंपनी में 4 लाख से अधिक कर्मचारी काम करते हैं और कंपनी 30 से अधिक अंतरराष्‍्ट्रीय अन्‍वेषण और उत्‍पादन परियोजनाओं को ऑपरेट कर रही है। कंपनी का साल 2012 में वाली 425 बिलियन डॉलर रहा।

एक्सॉन मोबिल
वाली : 453 बिलियन डॉलर
एक्सॉन मोबिल कॉर्पोरेशन अमेरिकी बहुराष्ट्रीय तेल और गैस निगम है। इसका मुख्‍यालय इरविंग, टेक्सास में है। इस कंपनी की सबसे बड़ी शेयरधारक बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन है। यह कंपनी इंपीरियल तेल के साथ जुड़ी हुई है, जो कनाडा से ऑपरेट होती है।  2012 में, इस कंपनी का राजस्‍व 453 बिलियन डॉलर था। एक्‍सॉन मोबिल कॉर्पोरेशन का गठन 1999 में हुआ, जब एक्‍सॉन और मोबिल का विलय हुआ, जिसका पूर्व नाम क्रमश: स्‍टैंडर्ड ऑयल ऑफ न्‍यू यॉर्क और स्‍टैंडर्ड ऑयल ऑफ न्‍यूजर्सी था।

रॉयल डच शैल
राजस्‍व : 467 बिलियन डॉलर
रॉयल डच शैल कंपनी का गठन 1907 में दो प्रतिद्वंद्वियों रॉयल डच पेट्रोलियम कंपनी और यूके की शैल ट्रांसपोर्ट एंड ट्रेडिंग कंपनी के विलय से हुआ। कंपनी विश्‍व के 90 देशों में 40 हजार से अधिक सर्विस स्‍टेशन ऑपरेट करती है। कंपनी 3.1 मिलियन बैरल ऑयल के आस पास प्रतिदिन उत्‍पादन करती है। कंपनी का साल 2012 में 467 बिलियन डॉलर राजस्‍व था।

वॉल मार्ट स्‍टार्स इंक
राजस्‍व : 469 बिलियन डॉलर
वॉल-मार्ट स्‍टोर्स इंक, जो वॉलमार्ट के नाम से विश्‍व भर में प्रसिद्ध है। यह एक अमेरिकी बहुराष्‍ट्रीय रिटेल कंपनी है, जो रियायत दर वाले बड़े बड़े करियाणा स्‍टोर व गोदाम चलाती है। 2013 की फॉर्च्‍यून ग्‍लोबल 500 रैंकिंग के अनुसार, यह कंपनी विश्‍व का दूसरा सबसे बड़ा सार्वजनिक निगम है, और दो मिलियन कर्मचारियों के साथ दुनिया का सबसे बड़ा निजी नियोक्‍ता है। इसके अलावा दुनिया का सबसे बड़ा खुदरा व्‍यापारी है। कंपनी का 2012 में राजस्‍व 469 बिलियन डॉलर था।

स्रोत : क्‍लिक टॉप टेन डॉट कॉम व अन्‍य स्रोत


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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movie review : संतोषी का अंदाज फटा पोस्‍टर निखरा शाहिद

भले ही फिल्‍म 'फटा पोस्‍टर निकला हीरो' के पोस्‍टर पर गलती से निकला 'निखला' हो गया हो, लेकिन फिल्‍म बनाते वक्‍त फिल्‍म निर्देशक राजकुमार संतोषी ने कोई चूक नहीं की, इसलिये 'फटा पोस्‍टर निकला हीरो' में सब कुछ निखरा निखरा नजर आया।

निर्देशक राजकुमार संतोषी, जिनकी 'अंदाज अपना अपना' के दूसरे भाग के लिए दर्शक आंखें बिछाये बैठे हैं, ने एक बार फिर साबित कर दिया कि आज के समय में भी दो अर्थ वाली शब्‍दावली के इस्‍तेमाल के बगैरह एक अच्‍छी कॉमेडी फिल्‍म का निर्माण हो सकता है। आज भी किरण खेर जैसी मॉर्डन ओवर एक्‍टिंग वाली मां के बिना मां बेटे के रिश्‍ते पर एक फिल्‍म बन सकती है।

राजकुमार संतोषी ने पुराने समय की कहानी को चुना, लेकिन स्‍थितियां आज की रखी, और पूरा फोक्‍स महिला शक्‍तिकरण की तरफ था। एक नौजवान को किस तरह दो महिलायें एक योग्‍य पुलिस अधिकारी बनने में मदद करती हैं। फिल्‍म में एक नायक विश्‍वास राव (शाहिद कपूर) की मां पद्मिनी कोल्हापुरे, तो दूसरी प्रेमिका काजल ( इलियाना डीक्रूज )। नायक की मां नायक को इमानदार पुलिस अधिकारी बनते हुये देखना चाहती है, लेकिन बेटा हीरो बनना चाहता है। अंत में प्रेमिका के सहयोग से नायक की मां का सपना पूरा होता है। सुखद अंत के साथ फिल्‍म खत्‍म होती है। मगर फिल्‍म के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचने के दौरान का जो रोमांच है, वे बेहद दिलकश है। उस में एक्‍शन भी है, रोमांस भी है, उसमें हंसी के ठहाके भी हैं।

फिल्‍म की शुरूआत एक इमानदार महिला ऑटो चालक से होती है, जो ट्रैफिक पुलिस वाले को सिग्‍नल तोड़ने का जुर्म स्‍वयं स्‍वीकार करते हुए सौ का नोट देती है, और रसीद भी गर्व से मांगती है। यह महिला एक बेईमानी पुलिस कर्मचारी की पत्‍िन है, जो एक हादसे में मारा जा चुका है। अब इस सपना है कि उसका बेटा अपने नाना की तरह इमानदार पुलिस ऑफिसर बने। बेटा हीरो बनना चाहता है, पुलिस मेडिकल चेकअप के दौरान उलटी पुलटी हकरत करता है, ताकि किस तरह रिजेक्‍ट हो जाये। अंत तक आते आते फिल्‍मी हीरो असली हीरो बनकर उभरता है। इसको कहते हैं 'फटा पोस्‍टर निकला हीरो'।

शाहिद कपूर ने कॉमेडी और एक्‍शन दोनों रंगों को खुद को खूब रंगा है। शाहिद ने साबित कर दिया कि अच्‍छी कहानी व अच्‍छा निर्देशक अगर उनको मिलता रहे, तो वे खुद को बॉलीवुड में बतौर सुपर स्‍टार स्‍थापित कर सकते हैं। नायिका इलियाना डी क्रूज ने एक बिंदास बाला का रोल अदा किया, जो समाज सेवा के लिये मुम्‍बई की सड़कों पर दौड़ती रहती है, और अन्‍य कलाकारों संजय मिश्रा, दर्शन जरीवाला, पद्मिनी कोल्‍हापुरे, सौरभ शुक्‍ला, मुकेश तिवारी ने भी अपने अपने किरदारों को बेहतरीन तरीके से निभाया। इनके सहयोग के बिना शाहिद कपूर भी कुछ नहीं कर सकते थे, क्‍यूंकि कॉमेडी सीन हमेशा ट्यूनिंग मांगते हैं। सलमान खान छोटी भूमिका में हैं, लेकिन राजकुमार संतोषी ने अपने पुराने कलाकार सलमान खान से इस छोटी सी भूमिका को भी शानदार बनवा लिया।

स्‍क्रीन प्‍ले, संवाद, स्‍टोरी और निर्देशन सब कुछ राजकुमार संतोषी के हाथों में था। शायद फिल्‍म के लिए यह सबसे अच्‍छी बात थी। राजकुमार संतोषी ने 'अजब प्रेम की गजब कहानी' के चार साल बाद रुपहले पर्दे पर दस्‍तक दी। घायल, दामिनी, बरसात, द लीजेंड शहीद भगत सिंह जैसी फिल्‍मों का निर्माण करने वाले राजकुमार संतोषी ने इस फिल्‍म से साबित कर दिया कि वे आज भी 'अंदाज अपना अपना' के निर्माण का मादा रखते हैं। फिल्‍म में हंसी पैदा करने के लिए उन्‍होंने दो अर्थी शब्‍दों का इस्‍तेमाल नहीं, बल्‍कि घटनाओं और हावभावों का अधिक इस्‍तेमाल किया। अंत में दर्शक तो कंफ्यूज्‍ड हो सकते हैं, यह सोचकर कि संतोषी ने अंत बनाते वक्‍त अपना ध्‍यान एकाग्र कैसे किया हो गया। 'अगल बगल' गीत बेहतरीन है, लेकिन अन्‍य गीतों की जरूरत नहीं थी, और यह फिल्‍म का मूड तोड़ते हैं।

चलते चलते इतना ही कहूंगा, परिवार के साथ जाइये, हंसी ठिठोली का खूब मजा उठाइए क्‍यूंकि फटा पोस्‍टर निकला हंसी का फुव्‍वारा।



कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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fact 'n' fiction : सोनिया गांधी के नाम मल्‍लिका शेरावत का पत्र

नमस्‍कार, सोनिया गांधी जी। आज सुबह जब दरवाजे के नीचे से कुछ अख़बार आये, हर सुबह की तरह। मैंने उनको दौड़कर उठाया। शायद किसी सुर्खी में मेरा नाम हो, लेकिन एक सुर्खी ने मुझे पत्र लिखने के लिए मजबूर कर दिया। उस सुर्खी में पूर्व सेना अध्‍यक्ष वीके सिंह का नाम था, और उन पर किसी गुप्‍तचर एजेंसी की स्‍थापना व गलत इस्‍तेमाल करने का आरोप था।

सोनिया जी, यह वीके सिंह वहीं हैं ना, जो पिछले दिनों मेरे मूल राज्‍य हरियाणा के रेवाड़ी शहर में नरेंद्र मोदी के साथ नजर आये थे, एक पूर्व सैनिक रैली में। मुझे लगता है शायद उसी कार्य के लिए वीके सिंह सम्‍मानित किये जाने के प्रयासों का हिस्‍सा है यह सुर्खी। और एक संकेत है कि इस तरह के कार्य करने वाले अन्‍य लोगों को भी किसी न किसी रूप से सम्‍मानित किया जा सकता है, मैं सम्‍मानित नहीं होना चाहती, मुझे सम्‍मान पसंद नहीं, क्‍यूंकि मैं तो पहले ही बेरोजगारी का शिकार हूं, सम्‍मान वाले व्‍यक्‍ति तो छोटा मोटा काम नहीं कर सकते। रोजगार पाने के मकसद से तो गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्‍मदिवस पर गीत गाया था, शायद किसी को मेरी आवाज पसंद आ जाये, और किसी रैली में मुझे नृत्‍य प्रदर्शन के लिये बुला लिया जाये, क्‍यूंकि अमीरों के लिए मेरा ठुमका अब काम का नहीं रहा, उनको सनी लियोन के ठुमके अच्‍छे लगते हैं, करोड़ों रुपये खर्च कर देते हैं, दुबई तक बुला लेते हैं।

इस सदी की शुरूआत में मैंने घर छोड़ा, शादीशुदा जीवन छोड़ा, क्‍यूंकि आम जिन्‍दगी जीना मेरे के लिए मुश्‍िकल था, और आपकी मनरेगा योजना तो मेरी कमर तोड़कर रख देती, इतनी नाजुक हूं, इतना वजन नहीं उठा सकती, पौष्‍टिक आहार उतनी लेबर में नहीं मिलता। अधिक लेबर के लिए कभी कभी यौन शोषण से भी गुजरना पड़ता है, लेकिन मुम्‍बई की चमकीली दुनिया में होने वाले यौन शोषण जितना मेहनताना और नाम नहीं मिलता। यहां नाम के साथ इज्‍जत मिलती है।

इस ख्‍वाहिश में मुम्‍बई आई। पहली फिल्‍म ख्‍वाहिश ही करने को मिली। इस फिल्‍म में चुंबन से काम चल गया। कहते हैं कि अगर गुड देने से बंदा मर जाये तो जहर देने की जरूरत क्‍या, अगर किस देकर इज्‍जत बच जाये, और पैसा मिल जाये तो बुराई क्‍या है ?


पहली फिल्‍म में 17 चुंबन देकर रिकॉर्ड बनाया। कुछ और फिल्‍में मिल गई। मर्डर से मैंने तलाकशुदा स्‍त्री रीमा लांबा का मर्डर कर दिया, और मल्‍ल्‍िका शेरावत बनकर उभरी। अब 17 चुंबन का असर खत्‍म हो चुका है, क्‍यूंकि यहां पर 27 चुंबन वाली मॉर्डन जमाने की गर्ल परिणीति चोपड़ा आ गई। अब तक की सभी फिल्‍मों में चुंबन और अंतरंग सीन दिये हैं, आप घर लाकर अकेले में देख सकती हैं।

मैं चुंबन से आगे बढ़ने का प्रयास करती कि उस जगह को सनी लियोन नामक एक विदेशी बाला ने भर दिया। अच्‍छा खासा उसको वहां काम मिल रहा था, लेकिन भट्ट परिवार उसको भारत खींच लाया, यह वही परिवार है, जिसने मुझे मार्डर जैसी फिल्‍म से बॉलीवुड में इतने साल रहन बसर करने का लाइसेंस दिला दिया, वरना इस शहर में टिकना बेहद मुश्‍िकल था।

अब मैं बेरोजगार हूं, केआरके की तरह। नाम तो सुना होगा केआरके। एसआरके नहीं, केआरके, इस बंदे का पूरा नाम है कमाल राशिद ख़ान। यह भोजपुरी फिल्‍मों में नहीं चले, तो बॉलीवुड चले आये, देशद्रोही पहली फिल्‍म बनाई, आज तक उसकी का दूसरा भाग बना रहे हैं। बनाने की गति इतनी धीमी कि एक्‍टर यूट्यूब के जरिये एक फिल्‍म क्रिटिक्‍स बन गया। वैसे भी हमारे धर्म गुरू कहते हैं खाली दिमाग शैतान का घर। ऐसे में कोई न कोई शैतानी तो होई जाती है। जैसे पिछले दिनों नरेंद्र मोदी के जन्‍मदिवस पर मुझे से हुई,  आप तो समझदार हैं, समझ ही गई होंगी, क्‍यूंकि आपका विपक्ष के साथ अच्‍छा अनुभव रहा है।

एक समय था, जब राम गोपाल वर्मा का नाम चलता था। आजकल उनका केवल टि्वट खाता चलता है। उनकी हालत भी मेरी जैसी है। कल तक हीरोइनें उनकी फिल्‍म में आने के लिए तरसती थीं, लेकिन अब स्‍थिति वैसी तो नहीं, अब वे हीरोइनें के लिए तरसते हैं। तभी तो उन्‍होंने पिछले दिनों मिस अमेरिका नीना दावुलूरी की तारीफ करने के बजाय सनी लियोन की तारीफ की, क्‍यूंकि उनको पता है चांद की तारीफ करने से चांद जमीन पर नहीं आयेगा, लेकिन जो पास है उसको कह दे दिया जाये, शायद कोई मौका हाथ लग जाये। राम गोपाल वर्मा को भी उम्‍मीद होगी कि इस टि्वट के बाद उनके बेरोजगारी भरे दिन खत्‍म हो जायेंगे और सनी लियोन उनको अपनी किसी विदेशी फिल्‍म के लिए बतौर एक्‍टर साइन कर लेगी, वैसे भी एक्‍टर डायरेक्‍टर बन रहे हैं, और डायरेक्‍टर एक्‍टर बन जायें तो इसमें बुराई क्‍या है।

सोनिया जी, इस सुर्खी से पहले भी मुझे संकेत मिल गये थे, जब आपने अदानी समूह को 200 करोड़ के जुर्माने वाला प्रेम पत्र भेजा था। उससे पहले इंफोसिस को 582 करोड़ का, और बाबा रामदेव के नाम तो काफी पैसा बोलता है, यह सभी लोगों ने वो ही भूल की, जो पिछले दिनों वीके सिंह ने रेवाड़ी में की। आप समझदार हैं, अब विस्‍तार से लिखूंगी, तो ज्‍यादा स्‍याही और पेज बिगड़ेगा।

मेरे पास इन दिनों काम नहीं, और जो कमाया था, उसको रोजगार पाने के लिए उड़ा रही हूं, उम्‍मीद है कि एक औरत होकर एक औरत की मजबूरी को समझेंगी। मैं सब कुछ रोजगार के लिए कार रही हूं, जब राहुल बाबा का जन्‍मदिवस आयेगा, मैं तब भी गाउंगी, अगर आप मुझे कहीं से लोक सभा की टिकट देना चाहें तो मैं चुनाव भी लड़ना चाहुंगी, लेकिन सीट पर जीत कंफर्म हो। ख़तरे वाली सीट पर बैठना, और सफर करना मुझे पसंद नहीं, क्‍यूंकि स्‍थिति पहले ही खराब है।

मुझे उम्‍मीद है कि मेरे द्वारा पिछले दिनों किये गए नरेंद्र मोदी संबंधित कार्यों के लिए आप मुझे सम्‍मानित नहीं करेंगी।
Disclaimer : fact 'n' fiction सीरीज में व्‍यक्‍तियों के नाम असली हो सकते हैं, लेकिन इसकी लेखन शैली व कंटेंट पूर्ण रूप से काल्‍पनिक है। कुछ असली तथ्‍यों को आधार बनाकर कल्‍पना से इसकी रचना की जाती है।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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fact 'n' fiction : दिग्‍गी सुर्खियों से गैरहाजिर, तो जनपथ होना पड़ा लाइन-हाजिर

बुधवार की सुबह। सोनिया अपने आवास पर गॉर्डन में टेंशन भरी मुद्रा में घूम रही थी, मानो कोई बड़ा विज्ञापन छूटने के बाद संपादक। बस इंतजार था, बयानवीर दिग्‍विजय सिंह का। कब आयें, कब लेफ्ट राइट सेंटर किया जाये।

दरवाजे खुले एक गाड़ी आई। गाड़ी में वो सवार थे, जिनका इंतजार था। पास आये, मैडम का चेहरा और आंखें लाल। साथ आये सलाहकार ने पूछा, मैडम क्‍या गुस्‍ताखी हुई ? जो इतना गुस्‍से में हैं। तुम को शर्म आनी चाहिए, अब गुस्‍ताखी पूछते हो ? अख़बार और टेलीविजन चैनलों से समझ नहीं पड़ता, आख़िर चूक कहां हो रही है ? गुस्‍से में लाल पीली मैडम ने साजो सामान समेत की चढ़ाई। मैडम आप साफ साफ बतायें बात क्‍या हुई, दिग्‍विजय सिंह का सलाहकार बोला।

नरेंद्र मोदी ने रेवाड़ी पहुंचकर हम पर हल्‍ला बोला। कोई प्रतिक्रिया नहीं, हमारी ओर से। मोदी का जन्‍मदिवस ऐसे मनाया गया, जैसे देश का कोई उत्‍सव, कोई प्रतिक्रिया नहीं हमारी ओर से। वहां नरेंद्र मोदी बयान के ड्रोन दागे जा रहा है, ताकि हमारा जनपथ ध्‍वस्‍त किया जाये, और आप गुस्‍ताखी पूछते हो ? मुझे बिल्‍कुल पसंद नहीं, पाकिस्‍तान निरंतर सीमा पर हमले करे, और आप मनमोहन सिंह जैसी चुप्‍पी धारण किये बैठे रहें।

गुस्‍ताखी, मैडम, दरअसल कुछ दिनों से दिग्‍विजय सिंह अचानक मौनव्रत में चले गये। कारण कुछ समझ नहीं आ रहा है, और हमने ऑनलाइन एचआर सिस्‍टम में सिक लिव के लिए अपलाई कर दिया था, और आपको सीसी में राहुल के साथ रखा गया था। शायद अमेरिका ने हमारा मेल आप तक पहुंचने नहीं दिया, वे अभी तक हमारी इंग्‍लिश को रीड नहीं कर पायें होंगे, वे संदिग्‍ध किस्‍म के लोग हैं, इसी कारण ब्राजीलियन राष्‍ट्रपति ने वहां का दौरा रद्द कर दिया, बेचारी के साथ भी ऐसा ही हुआ था।

अच्‍छा अच्‍छा। ठीक है। कब तक ठीक होंगे हमारे दिग्‍गी महाराज। सलाहकार ने जवाब दिया, कुछ भी कहना मुश्‍किल है, डॉक्‍टरों को समझ नहीं आ रहा है। शकील मियां बोले, कहीं किसी विरोधी पार्टी ने काला जादू तो नहीं कर दिया। मैडम ने आदेश दिया, जाओ गाड़ी से लेकर घर तक की तलाशी लो, अगर संदिग्‍ध चीज मिले तो फौर लेकर आओ। कुछ समय बाद तलाशी दल लौटा, साथ में एक टॉफी कवर लिये। कवर पर लिखा हुआ था सेंटर फ्रेश। कवर देखते ही शकील का दिमाग चकराया। मैडम समझ गया, यह काले जादू का नहीं, सेंटर फ्रेश का कमाल है। जुबान पर रखे लगाम। मैडम ने जोर से तमाचा शकील के गाल पर जड़ दिया, कमबख्‍त यह जुबान पर लगाम लगती है, हाथों पर नहीं, इससे टि्वटर तो अपडेट हो सकता था। 

जाओ, अंदर से मेटॉस मिन्‍ट लेकर आओ। शकील, मैडम गुस्‍ताखी माफ, मेटॉस मिन्‍ट तो बारा रैली पर जाने से पहले राहुल बाबा खत्‍म कर गये। ओ सिट। चलो डीएचए वाला पाउडर लाकर दूध में घोल कर पिला दीजिये। सेंटर फ्रेश की मार रहे झेल दिग्‍विजय सिंह को डीएचए वाला दूध में घोलकर पाउडर पिलाया गया, बुधवार शाम तक असर दिखा, जब दिग्‍विजय सिंह की जिज्ञासा उभरकर सामने आई, सबसे पहला सवाल दागा, अगर नरेंद्र मोदी सबसे धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति हैं, तो सबसे अधिक सांप्रदायिक व्यक्ति कौन? 

बयानवीर के के जिज्ञासा भरे सवाल के बाद मैडम का कुछ ऐसा हाल था। 


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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fact 'n' fiction : entrance exam बाबाओं के लिए 'न बाबा न'

Picture From myindiapictures.com
आध्‍यात्‍िमक गुरूओं पर लग रहे यौन शोषण के आरोपों के कारण कहीं देश की सर्वोच्‍च अदालत वेश्‍यावृत्‍ति संबंधी पूछे गये सवाल की तरह सरकार से इस बार भी न पूछ ले कि अगर आध्‍यात्‍मिक गुरूओं द्वारा किये जा रहे यौन शोषण को रोकना संभव नहीं तो इसको वैधता दे दी जाये।

इस बात से डरते हुए देश की सरकार ने इस मामले पर गंभीरता से सोचने का विचार किया है। सरकार चाहती है कि बाबाओं को भी entrance exam से गुजरना चाहिए। इस प्रस्‍ताव पर काल्‍पनिक लोक सभा में पहली बार में नेताओं की राय मांगी गई।

मलंगनगर से सांसद मलंग दास ने सुझाव देते हुए कहा कि बाबाओं को कुछ महीनों तक रेड लाइट इलाकों में रखा जाये, और उनके व्‍यवहार पर पैनी निगाह रखी जाये। अगर बाबा बनने के इच्‍छुक आवेदनकर्ता यहां से पास होते हैं तो उनको जर्मनी के उन बीचों पर तीन महीने के लिए छोड़ा जाये, जहां पर महिलायें व पुरुष नग्‍न अवस्‍था में मौज मस्‍ती करते हैं। जर्मन में ऐसे बीच हैं, जहां पर महिलायें और पुरुष नग्‍न अवस्‍था में घूमते मिल जाते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह महिला पुरुष बराबरता के विचार को प्रत्‍साहित करने के लिये अपनाया गया तरीका है। ऐसे बीचों पर तीन महीने गुजराने पर अगर बाबा बनने की तीव्र इच्‍छा खत्‍म नहीं होती तो उनको बाबा बनने का आज्ञा पत्र दिया जाये।

ग्रामीण क्षेत्र से आये सांसद ने अपने बैल का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे हमारे गांव में साँड़ से बैल बनाने के लिए साँड़ को नसबंदी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, वैसे ही बाबाओं को भी नसबंदी प्रक्रिया से गुजारना चाहिए। सांड से बैल बनाये पशु को हम भैंसों और गायों के बीच रखते हैं, वहां ऐसी शिकायत नहीं आती, लेकिन साँड़ को वहां पर रखना हमेशा रिस्‍की रहता है।

एक अन्‍य सांसद ने सुझाव दिया कि हर बार की तरह इस बार भी क्‍यूं नहीं महिलाओं के लिए लक्ष्‍मण रेखा खींच दी जाये। अगर छोटा सुखी परिवार चाहिये तो ऑपरेशन महिलायें करवाती हैं, अगर अनचाहा गर्भ ठहर जाये तो गर्भनिरोधक गोलियां, महिलाओं के लिए। बाबाओं के मामले में ऐसा किया जा सकता है कि अगर महिलायें बाबाओं से एकांत में मिलती हैं, और उनके साथ रेप होता है तो उसकी जिम्‍मेदार महिला होगी, और उसके खिलाफ बाबा के ब्रह्माचार्य तोड़ने के आरोप में केस चलाया जायेगा।
महिला सांसद ने इस बात पर कड़ा एतराज जताते हुए संसद में हंगामा कर दिया और सुझाव प्रतिक्रियाओं का दौर थम गया व लोक सभा की कार्यवाही अगले सेशन तक के लिए स्‍थगित कर दी गई।

फेक टॉक के फर्जी सूत्रों से ख़बर मिल रही है कि अगर 2014 लोक सभा चुनावों के बाद भाजपा की अगुवाई वाली सरकार सत्‍ता में आई तो नरेंद्र मोदी अपने खास समर्थक बाबा रामदेव को मंत्री पद देने के लिये एक नये मंत्रालय को अस्‍तित्‍व में लायेंगे। इस मंत्रालय का नाम धर्म मंत्रालय होगा, और नये बाबाओं को यहां से स्‍वीकृति लेनी होगी।

यहां उल्‍लेखनीय है कि दिग्‍विजय सिंह के बयान के अनुसार बाबा रामदेव के पास आज से दस साल पहले साइकिल को पंक्‍चर लगवाने के पैसे नहीं थे, लेकिन आज उनके पास 11 सौ करोड़ की संपत्‍ति है। कहीं न कहीं,  दिग्‍विजय सिंह का यह बयान युवा पीढ़ी को बाबा बनने की तरफ प्रेरित करता है, राजनीति में भी इतनी ग्रोथ मिलना मुश्‍िकल है।

बाबा के करीबी फर्जी सूत्रों से सुनने में आया है कि बाबा यौन शोषण मामले को लेकर बेहद संवेदनशील हैं, उन्‍होंने अभी से इसके लिए खाका तैयार कर लिया है। अगर कोई बाबा यौन शोषण में लिप्‍त पाया गया तो उसको अगले 5 साल तक निरंतर 24घंटे कपाल भाति  प्राणायाम व भस्त्रिका प्राणायाम करना होगा, बिना कुछ खाये पीये। अगर बीच में रूका तो उसके ऊपर एक डंडे वाला पहरेदार होगा, जो रूकने पर लठ का इस्‍तेमाल करने के लिए स्‍वतंत्र होगा।

अगर आपके पास हैं कुछ बेहतरीन सुझाव हैं तो नीचे टिप्‍पणी बॉक्‍स में लिख सकते हैं।


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