सन्‍नी लिओन घबराना मत

गालियों की पाठशाला बन चुका बिग बॉस का घर एक बार फिर चर्चाओं में आ गया, पॉर्न स्‍टार सन्‍नी लिओन के कारण, जिसको अभी अभी बिग बॉस के घर में एंट्री मिली है, वैसे भी बिग बॉस को अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ता।

सन्‍नी लिओन को शायद कल तक कोई नहीं जानता था, मैं तो बिल्‍कुल नहीं, हो सकता है बिग बॉस के घर में आने के बाद भी, मगर हिन्‍दुस्‍तानी मीडिया ने इस समाचार को इतनी गम्‍भीरता से लिया कि आज हर कोई सन्‍नी लिओन को जानने लगा है, इस तरह के समाचार को लेकर मीडिया की दिलचस्‍पी वैसे ही मीडिया की गरिमा को हानि पहुंचाती है, जैसे कि बिग बॉस के घर में हो रही गतिविधियां रियालटी शो की गरिमा को।

बिग बॉस एक बेहतरीन कांस्‍पेट हो सकता है, मगर रातोंरात टीआरपी बटोरने के चक्‍कर में इस कांस्‍पेट पर काम कर रहे लोगों ने अपनी घटिया सोच का प्रदर्शन करते हुए इसका मलियामेट कर दिया। कुछ दिन पहले बिग बॉस का घर गालियों की पाठशाला बना हुआ था, लेकिन आज कल बिग बॉस का घर पॉर्न स्‍टार के कारण चर्चाओं में है। आखिर बिग बॉस का घर, आम हिन्‍दुस्‍तानियों के घरों को क्‍यों बिगाड़ने पर तूला हुआ है, यह बात पूरी तरह समझ से परे है, यह शो उस टीवी पर प्रसारित होता है, जिसने अपने शुरूआती दौर में एक के बाद एक बुराई पर ध्‍यान केंद्रित करते हुए बेहतरीन सीरियल दिए, जिन्‍होंने सास बहू के सीरियलों की धज्‍जियां उड़ा दी थी।

मगर बिग बॉस की गतिविधियों से ऐसा लगता है, क्‍लर्स पर सीरियलों का निर्माण करने वालों की भीतरी आंख, क्‍लर्स के लोगो में लगे मयूर पंख सी हो गई है, जो अच्‍छे बुरी की पहचान से परे है। सन्‍नी लियोन को घबराने की जरूरत नहीं, उनको जितनी पब्‍लिसिटी चाहिए, हिन्‍दुस्‍तानी मीडिया मुफत में देगा, क्‍योंकि यहां का मीडिया सन्‍नी तुम्‍हारी जैसी महिलाओं पर हमेशा मेहरबान रहा है, अगर यकीन न आए तो पूछना मल्‍लिका शेरावत से, राखी सावंत से।

रियली शॉरी इम्‍ितयाज अली

रियली शॉरी इम्‍ितयाज अली, एक तो शॉरी तो इसलिए कि यह पत्र मैं तुम्‍हें सार्वजनिक तौर पर लिख रहा हूं, दूसरा शॉरी इसलिए कि मुझे तुम्‍हारा रॉकस्‍टार एक्‍सप्रीमेंट बिल्‍कुल अच्‍छा नहीं लगा, केवल हंसाने वाले एक दो दृश्‍यों के अलावा। यह आपकी तीसरी फिल्‍म थी, जो मैंने कल रात घर के समीप स्‍थित सिनेमा हाल में देखी, यह भी पहले की दो फिल्‍मों की तरह पंजाब हरियाणा बेस्‍टेड थी। अगर मैं गलत न हूं तो इम्‍ितयाज जी आप ने हीर रांझा की स्‍टोरी को ध्‍यान में रखकर रॉकस्‍टार की रचना करनी चाहिए, मगर पूरी तरह चूक गए, क्‍योंकि आपका रांझा इश्‍क मुहब्‍बत की समझ से परे था, कहूं तो केवल मनचला। यही कारण है कि हीर रांझा की तरह आपकी कहानी दिल को नहीं छूती, शायद चलती चलती कहानी में अचानक फलेश बैक का चलना, जो आपने लव आजकल में बहुत बेहतरीन ढंग से इस्‍तेमाल किया था। एक और गलती, जो लंडन ड्रीम्‍स में विपुल शाह ने दोहराई थी, एक हिन्‍दी गाने वाला विदेशी लोगों को कैसे रिझा सकता है, समझ से परे है, अगर आप पराग भेजने की जगह जॉर्डन को मुम्‍बई भेज देते तो क्‍या नुकसान हो जाता। जॉर्डन को हाईलाइट करने वाले व्‍यक्‍ित को आप स्‍टोरी टेलर के रूप में इस्‍तेमाल कर सकते थे, और हीर एवं जॉर्डन को मृत दिखाया जा सकता था, यह कहानी एक अलग ढंग में सामने आती। चलो इम्‍तियाज अली फिर मिलते, किसी नई कहानी और एक फिल्‍म के साथ, किसी नए सिनेमा हॉल में।

एक अच्‍छे जज की भांति फैसला सुनाएं

सच में, मैं कभी कोर्ट नहीं गया, लेकिन टीवी सीरियलों व फिल्‍मों के मार्फत कोर्ट कारवाई बहुत देखी है, शायद आपने भी। कोर्ट के कटहरे में एक आरोपी व्‍यक्‍ित खड़ा होता है, लेकिन जज की निगाहों के सामने दो व्‍यक्‍ित दलीलें कर रहे होते हैं, इन दलीलों के आधार पर जज को फैसला सुनाना होता है। एक व्‍यक्‍ित, कटहरे में खड़े व्‍यक्‍ित को सजा दिलवाने की पूर्ण कोशिश करता है, और दूसरा उसको बचाने के लिए पूर्ण प्रयास, लेकिन अंतिम फैसला जज को सुनाना होता है। ऐसे ही दृश्‍य मानव अपनी जिन्‍दगी में हर बार महसूस करता है, जब वह कुछ न करने का साहस कर रहा होता है, उसके दो दिमाग (कॉन्‍शीयस माइंड एवं अनकॉन्‍शीयल माइंड) आपस में बहस करते हैं, एक रोकने की कोशिश करता है तो दूसरा दिमाग आगे बढ़ाने के लिए पूर्ण प्रयास करता है। इन दोनों के बीच जज की भूमिका व्‍यक्‍ित को स्‍वयं ही निभानी होती है। कौन सा गलत है और कौन सा सही। जब भी आप कुछ नया करेंगे तो आपको अंदर से आवाज आएगी, कहीं गलत हो गया तो, तभी दूसरी तरफ से आवाज आती है, क्‍या बात करते हो, ऐसा हो ही नहीं सकता, मानव दुविधा में आ जाता है, फैसला सुनाने वाले जज की तरह। ऐसी स्‍िथति में आपको एक सुलझे हुए जज की तरफ फैसला सुनाने की जरूरत होती है।

कॉन्‍शीयस माइंड एवं अनकॉन्‍शीयल माइंड

स्‍वयं बने कृष्‍णार्जुन, चाणक्‍य चंद्रगुप्‍त

आप ने भी मेरी तरह कई घरों व मंदिरों के परिसरों में महाभारत की याद दिलाने वाली अद्भुत कलाकृति देखी होगी, जिसमें एक रथ पर महान निशानेबाज अर्जुन घुटनों के बल बैठे एवं हाथ जोड़े भगवान श्रीकृष्‍ण की तरफ देख रहे हैं, एवं भगवान श्री कृष्‍ण उनको उपदेश दे रहे मालूम पड़ते हैं, वैसे भी महाभारत में जब अर्जुन अपनों को सामने हारते हुए देख भावुक हो गए थे, तो श्रीकृष्‍ण ने उनको उपदेश देते हुए समझाया था कि यह रणभूमि है, और तुम एक योद्धा, अगर तुमने सामने वाले को खत्‍म नहीं किया तो वह तुम्‍हें खत्‍म कर देंगे। श्री कृष्‍ण भगवान के उपदेश के बाद अर्जुन ने कौरवों का अंत करने के लिए अपना धनुष्य उठाया, और इतिहास गवाह है पांडवों की जीत का। मुझे मालूम नहीं कि आपने कभी उस तस्‍वीर को मेरी नजर से देखा है कि नहीं, लेकिन मेरी नजर में, वह दृश्‍य कॉन्‍शीयस माइंड एंड अन कॉन्‍शीयस माइंड की जीती जागती उदाहरण है। कॉन्‍शीयस माइंड सिर्फ वह करता है, जो उसको फिलहाल सामने दिखाई पड़ता है, जबकि अनकॉन्‍शीयस माइंड दूरदर्शी होता है, एवं मानव का मार्गदर्शन करता है। अनकॉन्‍शीयस जिस चीज को ग्रहण कर लेता है, उसको वह निरंतर करता रहता है, जैसे के बाइक चलाते समय मानव अपनी आंखों से ब्रेक लगाने के लिए ब्रेक को ढूंढता नहीं, जरूरत पड़ने पर पांव ब्रेक खुद ढूंढ लेता है। आज के समाज में आप किसी भी व्‍यक्‍ित से आप कहो कि यह देश बदल जाएगा, वह पहली ही दृष्‍िट में न बोल देगा, क्‍योंकि उसके माइंड में वह बात घर कर चुकी है, घरवालों की वजह से, टीवी चैनलों की वजह से, लेकिन जब उसको देश बदलने के तरीके के बारे में समझाया जाएगा, तब भी वह न ही कहेगा, मगर एक दिन अचानक उसका अनकॉन्‍शीयस माइंड हां बोलेगा, क्‍योंकि वह अन स्‍टॉपेबल है। चाणक्‍य चंद्रगुप्‍त, एकलव्‍य व द्रोणचारिया की प्रतिभा भी अन कॉन्‍शीयस माइंड व कॉन्‍शीयस माइंड की झलक दिखलाते हैं। अगर आपके सामने स्‍िथतियां बेहद बुरी हैं, और आपको लग रहा है अब कुछ नहीं बदलने वाला तो, आप एक बार शांत होकर अपने अवचेतन मन को बोल दीजिए, यह स्‍िथति बहुता देर टिकने वाली नहीं, और आप देखेंगे कि आपका दिमाग आपको एक के बाद एक नए तरीके उससे निकालने के बाद बताएगा, मगर एक्‍शन आपको करना होगा अर्जुन की तरह, गुप्‍त की तरह, क्‍योंकि चाणक्‍य, श्रीकृष्‍ण तो आपको उपदेश देकर उत्‍साहित कर सकते हैं, काम तो अर्जुन या चंद्रगुप्‍त को ही होगा।

कल करे सो आज क्‍यों नहीं


ज्‍यादातर स्‍कूली बच्‍चों को छुटिटयों के बाद स्‍कूल जाना सबसे ज्‍यादा डरावना लगता है, खासकर उन बच्‍चों के लिए जिन्‍होंने हॉलिडे होमवर्क कल करेंगे करते करते पूरी छुटिटयां मौज मस्‍ती में गुजारी हों। कुछ ऐसे ही बच्‍चों की तरह व्‍यक्‍ित भी कल करेंगे कल करेंगे कहते कहते अपनी जिन्‍दगी गंवा देता है, अंतिम सांस अफसोस के साथ छोड़ता है, काश! कुछ वक्‍त और मिल जाता। आज सुबह जब मैं अपने घर के प्रांगण में टहल रहा था तो उक्‍त विचार अचानक दिमाग में आ टपका। इस विचार से पहले मेरे मास्‍टर साहिब द्वारा सुनाई एक कहानी याद आई, जिसको मैंने मानव जीवन और स्‍कूली बच्‍चों से जोड़कर देखा, वो बिल्‍कुल स्‍टीक बैठती है, जब उन्‍होंने सुनाई तब वो सिर्फ कहानी थी मेरे लिए, लेकिन आज वह मार्गदार्शिका है। सर्दियों का मौसम था, मास्‍टर साहिब कुर्सी पर, और हम सब जमीन पर बिछे टाटों पर बैठे हुए थे। मास्‍टर साहिब ने सूर्य की ओर देखते हुए कहा, आज स्‍कूली किताबों से परे की बात करते हैं। हम को लगा, चलो आज का दिन तो मस्‍त गुजरने वाला है क्‍योंकि किताबी बात नहीं होने वाली। मास्‍टर साहिब ने बोलना शुरू किया, खेतों में एक बिना छत वाला कमरा था, वहां पर एक अमली (नशेड़ी) रहता था, और सर्दी के दिन थे। जब रात के समय उसको सर्दी लगती तो वह कहता, सूर्य उगते ही इस कमरे पर छत डाल दूंगा, ताकि अगली रात को सर्दी मेरी नींद में रुकावट न डाल सके, मगर सुबह होते ही उस अमली के शब्‍द बदल जाते, कितनी प्‍यारी धूप है, मजा आ गया और वह भूल जाता जो बात उसने रात को ठिठुरते हुए कही थी। इस तरह सिलसिला चलता रहा, अमली के संवाद मौसम के साथ बदलते रहे, और अंत में सर्दी खत्‍म होने से पहले अमली खत्‍म हो गया। इतने में आधी छुटटी घोषित करने वाली बेल बजी, बेल बजी नहीं कि स्‍कूल में हलचल से मच गई, मानो कैदियों को जेल से रिहा कर दिया गया हो। मास्‍टर साहिब कहानी का अर्थ समझा पाते कमबख्‍त वक्‍त ने वक्‍त ही नहीं दिया। 
उनका एक शेयर भी मुझे बेहद याद आता है, 

वक्‍त की वक्‍त से मुलाकात थी, 
वक्‍त को मिल न मिला 
यह भी वक्‍त की बात थी

सावधान। एमएलएम बिजनस से


बढ़ती महंगाई और मिलावट से बचने के लिए एमएलएम, मतलब मल्‍टी लेवल मार्कटिंग बिजनस अच्‍छा है, मगर कोई अच्‍छी चीज गलत लोगों के हाथों में बुरे परिणाम देती है, जैसे कि पागल के हाथ में तलवार, आतंकवादियों के हाथ में गोला बारूद। बारूद तलवार बुरी चीजें नहीं, मगर गलत लोगों के हाथों में पड़ते ही गलत परिणाम देने लगती हैं। वैसे ही हिन्‍दुस्‍तान में एमएलएम बिजनस को लेकर हो रहा है। एमएलएम बिजनस के नाम पर करोड़ों रुपए की ठगी मारी जा रही है, इसलिए सावधान रहने के लिए कह रहा हूं। आज के युग में एमएलएम एक बेहतरीन बिजनस है, अगर करना है तो एक अच्‍छी एमएलएम कंपनी चुनिए। मैं आपको किसी कंपनी विशेष के लिए सिफारिश नहीं करूंगा, लेकिन एक अच्‍छी कंपनी चुनने के लिए सुझाव दे सकता हूं। सबसे पहले कंपनी के पास विजन होना चाहिए, एक बेहतर कल का। उसका प्रोडेक्‍ट बेस होना चाहिए। मार्किट भाव पर सामान उपलब्‍ध करवाए, क्‍योंकि एमएलएम को एडवाटाइजमेंट पर पैसा नहीं खर्च होता, वह ग्राहक के द्वारा भी प्रचार करवाती है। एमएलएम के लिए हिन्‍दुस्‍तान में अभी कोई लगाम कसने वाला कोई विभाग नहीं, इसलिए व्‍यक्‍ितयों खुद ही सावधान रहना होगा। 

नहीं करनी, अगर कोई आपसे आकर कहे कि दस हजार लगाओ, प्रति माह इतने हजार पाओ, तो सारा गलत होगा, क्‍योंकि अगर ऐसा होता तो केंद्रीय सरकार ऐसा सिस्‍टम लागू कर हिन्‍दुस्‍तान से सीधे ही बेरोजगारी एक बार में खत्‍म कर देती, इसलिए ऐसे झांसे में न आएं, ऐसा कुछ करने से पहले आप मैक्‍स फॉरेक्‍स, गोल्‍ड अभिनव एंव अन्‍य कंपनियों के बारे में जानकारी प्राप्‍त कर ले, जो रातोंरात लोगों का पैसा लेकर रफूचक्‍कर होगी।

रिश्‍तेदार के कहने पर ज्‍वॉइन न करें, उससे पूर्ण रूप से समझे आखिर पैसा कहां से आता है, अगर उसके पास उत्‍तर न हो तो समझ लीजिए वह गलत रास्‍ते पर जा रहा है, और उसको समझाकर सही रास्‍ते पर लाएं, वरना पछतावे के अलावा कुछ नहीं बचेगा।

"हारने के लिए पैदा हुआ हूं"

नॉर्मन विन्‍सेंट पील अपनी पुस्‍तक "पॉवर आफ द प्‍लस फेक्‍टर" में एक कहानी बताते हैं, "हांगकांग में काउलून की घुमावदार छोटी सड़कों पर चलते समय एक बार मुझे एक टैटू स्‍टूडियो दिखा। टैटुओं के कुछ सैंपल खिड़की में भी रखे हुए थे। आप अपनी बांह या सीने पर एंकर या झंडा या जलपरी या ऐसी ही बहुत सी चीजों के टैटू लगा सकते थे, परंतु मुझे सबसे ज्‍यादा अजीब बात यह लगी कि वहां पर एक टैटू था, जिस पर छह शब्‍द लिखे हुए थे, "हारने के लिए पैदा हुआ हूं"। अपने शरीर पर टैटू करवाने के लिए यह भयानक शब्‍द थे। हैरानी की स्‍िथति में मैं दुकान में घुसा और इन शब्‍दों की तरफ इशारा करके मैंने टैटू बनाने वाले चीनी डिजाइनर से पूछा क्‍या कोई सचमुच इस भयानक वाक्‍य हारने के लिए पैदा हुआ हूं वाले टैटू को अपने शरीर पर लगाता है? उसने जवाब दिया, हां कई बार

मैंने कहा, परंतु मुझे यकीन नहीं होता कि जिसका दिमाग सही होगा वह ऐसा करेगा।

चीनी व्‍यक्‍ित ने अपने माथे को थपथपाया और टूटी फूटी इंग्‍लिश में कहा, शरीर पर टैटू से पहले दिमाग में टैटू होता है।

लेखक इस कहानी के मार्फत कहना चाहता है, जो हम को मिलता है, वो हमारे नजरिए की देन होता है, क्‍योंकि दुनिया में जितनी भी चीजों का अविष्‍कार हुआ, उन्‍होंने सबसे पहले आदम के दिमाग में जन्‍म लिया। इसलिए हमेशा सकारात्‍मक सोच रखो, तो सकारात्‍मक नतीजे मिलेंगे।

साभार :  जॉन सी मैक्‍सवेल की किताब "अपने भीतर छुपे लीडर को कैसे जगाएं"।

माहौल बदलो, जीवन बदलेगा

मेरा बेटा, गोल्‍ड मेडलिस्‍ट है, देखना उसको कहीं न कहीं बहुत अच्‍छी नौकरी मिल जाएगी। शाम ढले बेटा घर लौटता है और कहता है कि पापा आपका ओवर कोंफीडेंस मत खा गया, मतलब जॉब नहीं मिली। इंटरव्‍यूर, उसका शानदार रिज्‍यूम देखकर कहता है, कुनाल चोपड़ा, तुम्‍हारा रिज्‍यूम इतना शानदार है कि इससे पहले मैंने कभी ऐसा रिज्‍यूम नहीं देखा, लेकिन अफसोस की बात है कि तुमने पिछले कई सालों से कोई केस नहीं लड़ा। यह अंश क्‍लर्स टीवी पर आने वाले एक सीरियल परिचय के हैं, जो मुझे बेहद पसंद है, खासकर सीरियल के नायक कुनाल चोपड़ा के बिंदास रेवैया के कारण। कितनी हैरानी की बात है कि एक पिता अपने इतने काबिल बेटे को दूसरों के लिए कुछ पैसों खातिर कार्य करते हुए देखना चाहता है। इसमें दोष उसके पिता का नहीं बल्‍कि उस समाज, माहौल का है, जिस माहौल समाज में वह रहते हैं, कुणाल चोपड़ा गोल्‍ड मैडलिस्‍ट ही नहीं बल्‍कि एक बेहतरीन वकील है, मगर उसका परिवार तब बेहद खुद होता है, जब उसकी प्रतिभा को वही फार्म कुछ पैसों में खरीद लेती है, जिसके इंटरव्‍यूर ने कुणाल चोपड़ा को रिजेक्‍ट कर दिया था। ऐसी कई कंपनियां हैं, जहां पर एक से एक प्रतिभावान व्‍यक्‍ित बैठे हुए हैं, मगर वह मेरे दोस्‍त के मकान मालिकों के यहां रखे तोते की तरह अपने पर भरोसा खो चुके हैं। इसमें दोष उनका नहीं, बल्‍कि उस माहौल का है, जो उनको बचपन से युवावस्‍था तक मिला। जिन्‍दगी में वहीं लोग कामयाब हुए हैं, जिन्‍होंने उस माहौल को त्‍याग दिया, जहां मैं नहीं कर सकता, तुम नहीं कर सकते, जैसे वाक्‍यों का इस्‍तेमाल बचपन से युवावस्‍था तक लाखों बार होता है। समाज जानबुझकर ऐसा नहीं करता, मगर जाने अनजाने में ही ऐसा होता है, जैसे कि आपने किसी से पूछा कि मुझे बिजनस शुरू करना है, वह आपसे पूछेगा नहीं किस चीज का, वो पहले ही कह देगा तेरे बस का रोग नहीं, क्‍योंकि आपकी तरह जब उसने भी कुछ अलग करने का साहस किया होगा तो सामने से उसको यही उत्‍तर मिला होगा।

अगर आप सोचते हैं, आप करते हैं तो सचमुच आप कर सकते हैं, अगर आप सोचते हैं नहीं कर सकते तो आप नहीं कर सकते। आप बिल्‍कुल सही हैं। 

आपकी सफलता, आपकी क्षमता पर निर्भर है

उस कड़क की दोपहर में, गेहूं की कटाई के वक्‍त मेरे पिता ने मेरे एक सवाल पर, एक बात कही थी, जो मुझे आज बहुत ज्‍यादा प्रेरित करती है, और जिस बिजनस में मैं हूं उसको आगे बढ़ाने के लिए अहम योगदान अदा करती है। मैंने गेंहूं काटते हुए ऐसे पूछ लिया था, यह कितने समय में कट जाएगी, तो उन्‍होंने एक कहानी सुनाई। एक किसान था, कड़कती दोपहर में सड़क किनारे खेतों में काम कर रहा था, एक राह चलते राहगीर ने उससे पूछा कि फलां गांव कितनी दूर है, तो उसने जवाब दिया 25 मील। जवाब मिलते ही राहगीर ने दूसरा जवाब दाग दिया, मुझे पैदल चलते हुए वहां पहुंचने में कितना वक्‍त लगेगा ? राहगीर के इस सवाल पर किसान ने कोई उत्‍तर न दिया, और अपने काम में पूर्ण रूप से मस्‍त हो गया। राहीगर ने तीन दफा किसान से वही सवाल पूछा, मगर किसान ने कोई जवाब नहीं दिया। गुस्‍से में आगबगुला होकर राहगीर चल दिया, राहगीर कुछ दूर ही गया था, कि पीछे से आवाज आई कि बस इतना समय लगेगा। राहगीर मुड़कर बोला, पहले नहीं बोल सकते थे, तो किसान ने उत्‍तर दिया मुझे तुम्‍हारी रफतार का पता नहीं था। सच में जब तक आप अपनी प्रतिभा उजागर नहीं करोगे, तब तक कोई भला कैसे बता सकता है कि तुम जिन्‍दगी में कितने सफल हो सकते हो।

एक एक लम्‍हे से खूबसूरत जिन्‍दगी बनती है, संग्रह करो खूबसूरत लम्‍हों का

जिन्‍दगी के बारे में अक्‍सर कहा जाता है, जिन्‍दगी सफर है, मगर जब मै किसी भी भारतीय को देखता हूं तो मुझे यह दौड़ और उबाऊ पदचाल से ज्‍यादा कुछ नजर नहीं आती। प्रत्‍येक खूबसूरत लम्‍हा, एक दूसरे लम्‍हे से मिलकर एक खूबसूरत जिन्‍दगी का निर्माण करता है, लेकिन अफसोस है कि मानव को लम्‍हे की कीमत का अंदाजा नहीं, यह वैसे ही जैसे विश्‍व, दो प्राणी मिलते हैं, तो एक रिश्‍ता, और रिश्‍ता परिवार, एक समूह, समूह एक समाज, और समाज मिलकर एक विशाल विश्‍व का निर्माण करता है, वैसे ही हर एक खूबसूरत लम्‍हा जिन्‍दगी को खुशनुमा बना देता है। हमारे यहां बच्‍चों को सिखाया जाता है, देखो बेटा बूंद बूंद से तालाब भरता है, अगर तुम एक एक पैसा बचाओगे तो तुम्‍हारे पास धीरे धीरे बहुत सारे पैसे हो जाएंगे, मगर यह बात पैसों के संदर्भ में कही जाती है, कोई जिन्‍दगी के संदर्भ में नहीं कहता, कि अगर आप जिन्‍दगी के खूबसूरत लम्‍हों का संग्रह करोगे तो एक खुशहाल जिन्‍दगी जी पाओगे। मानव की इस शिक्षा ने मानव जीवन को सफर से दौड़ बनाकर रख दिया, जब आदमी भाग भागकर थक जाता है, तो कहता है जिन्‍दगी साली बेकार है, मगर वह भूल जाता है कि उसकी दौड़ खूबसूरत जिन्‍दगी के लिए नहीं, बल्‍कि पैसे के लिए थी।

चलते चलते, पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है, मगर विश्‍व में ऐसा कोई अमीर व्‍यक्‍ति नहीं, जिसने अपना गुजरा हुआ वक्‍त खरीद लिया हो।

ऐसे भी जाता नहीं कोई...

श्री आलोक श्रीवास्‍तव की कलम व आमीन के साभार से

मुंबई से लौटकर...
जबसे जगजीत गए तब से क़ैफ़ी साहब के मिसरे दिल में अड़े हैं - ‘रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई, तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई।’ और दिल है कि मानने को तैयार नहीं। कहता है - 'हम कैसे करें इक़रार, के' हां तुम चले गए।'

'24, पुष्प मिलन, वार्डन रोड, मुंबई-36.' के सिरहाने से झांकती 11 अक्टूबर की सुबह। अपनी आंखों की सूजन से परेशान थी। इस सुबह की रात भी हम जैसों की तरह कटी। रो-रो कर।

सूरज को काम संभाले कोई दो घंटे गुज़र चुके थे। जगजीत जी के घर 'पुष्प मिलन' के सामने गाड़ियों का शोर मचलने लगा, मगर चेहरों की मायूसी, आंखों की उदासी और दिलों के दर्द पर कोई शोर, कोई हलचल, कोई हंगामा तारी नहीं हो पा रहा था। जिस आंख में झांकों, वही कह रही थी - 'ग़म का फ़साना, तेरा भी है मेरा भी।'

चेहरों की बुझी-इबारत पढ़ता-बांचता, पैरों में पत्थर बांधे मैं जैसे-तैसे दूसरे माले की सीढ़ियां चढ़ पाया। ग़ज़ल-गायिकी का जादूगर यहीं सो रहा था। '24, पुष्प मिलन' का दरवाज़ा खुला था। भीतर से जगजीत की जादुई आवाज़ में गुरुबानी महक रही थी। म्यूज़िक रूम का कत्थई दरवाज़ा खोला तो सफ़ेद बर्फ़ की चादर में लिपटा आवाज़ का फ़रिश्ता सो रहा था । मुझे देखते ही विनोद सहगल गले लग गए और सिसकते हुए बोले - 'थका-मांदा मुसाफ़िर सो रहा है, ज़माना क्या समझ के रो रहा है।' मगर दिल इस दर्द से आंसूओं में बदल गया कि दुनिया के ज़हनो-दिल महकाने वाली एक मुक़द्दस आवाज़ ख़ामोश सो गई है। अब कोई चिट्ठी नहीं आने वाली। अब प्यार का संदेस नहीं मिलने वाला। अब दुनिया की दौलतों और शोहरतों के बदले भी बचपन का एक भी सावन नहीं मिलने वाला। न काग़ज़ की कश्ती दिखने वाली और न बारिश का पानी भिगोने वाला। अब न ग़ज़ल अपनी जवानी पर इतराने वाली और न शायरी के परस्तार मखमली आवाज़ के इस जादूगर से रूबरू होने वाले।

'हमें तो आज की शब, पौ फटे तक जागना होगा / यही क़िस्मत हमारी है सितारों तुम तो सो जाओ।' किसी सितारे को टूटते देखना कभी। आसमान के उस आंचल को पलटकर कर देखना, जहां से वो सितारा टूटा है। उस टूटे हुए सितारे की जगह झट से कोई दूसरा तारा ले लेता है। जगमगाने लगता है उस ख़ला में, जहां से टूटा था कोई तारा। मगर चांद को ग़ायब होते देखा कभी? उसकी जगह अमावस ही आती है बस। अमावस तो ख़त्म भी हो जाती है एक दिन। मगर ये अमावस तो ख़त्म होने रही- कमबख़्त।

जगजीत सिंह, जिन्हें कबसे 'भाई' कह रहा हूं, याद नहीं। एकलव्य की तरह कबसे उन्हें अपना द्रौणाचार्य माने बैठा हूं बताना मुश्किल है। कितने बरस हुए जबसे मुरीद हूं- उनका, गिनना चाहूं भी तो नहीं गिन सकता। हां, एक याद है जो कभी-कभी बरसों की धुंधलाहट पोंछकर झांक लेती है और वो ये कि उनकी परस्तारी दिल पर तबसे तारी है जब ईपी या एलपी सुन-सुन कर घिस जाया करते थे। ग्रामोफ़ोन की सुई उनकी आवाज़ के किसी सुरमयी सिरे पर अक्सर अकट जाया करती थी और टेपरिकॉर्डर में ऑडियो कैसेट की रील लगातार चलते-चलते फंस जाया करती थी।

थोड़ा-थोड़ा ये भी याद है कि तब हमारी गर्मियों की छुट्टियां और उनकी तपती दोपहरें आज के बच्चों की तरह एसी कमरों में टीवी या कम्प्यूटर के सामने नहीं बल्कि जगजीत-चित्रा की मखमली आवाज़ की ठंडक में बीता करती थीं। उन दिनों किताबों के साथ-साथ इस तरह भी शायरी की तालीम लिया करते थे। लफ़्ज़ों के बरताओ को यूं भी सीखा करते थे। अपने अंदर एकलव्य को पाला पोसा करते थे।

भाई की किसी ग़ज़ल या नज़्म का ज़हनो-दिल में अटके रह जाने का टोटका हम अक्सर बूझते मगर नाकाम ही रहते। इस तिलिस्म का एक वरक़ तब खुला जब डॉ. बशीर बद्र की ग़ज़ल भाई की आवाज़ में महकी। 'दिन भर सूरज किसका पीछा करता है / रोज़ पहाड़ी पर जाती है शाम कहां।' मैंने फ़ोन लगाया और पूछा - 'ये ग़ज़ल तो बड़ा अर्सा हुआ उन्हें आपको दिए हुए। अब गाई?' जवाब मिला - 'ग़ज़ल दिल में उतरती है तभी तो ज़ुबान पर चढ़ती है।' ..तो ग़ज़ल को अपने दिल में उतारकर, फिर उसे करोड़ों दिलों तक पहुंचाने का हुनर ये था.! तब समझ में आया। अर्से तक गुनगुनाते रहना और फिर गाना तो छा जाना। ये था जगजीत नाम का जादू।

कोई पंद्रह बरस पहले की बात होगी। मुंबई में जहांगीर आर्ट गैलरी से सटे टेलीफ़ोन बूथ से उन्हें फ़ोन लगाया। अपने दो शे'र सुनाए - 'वो सज़ा देके दूर जा बैठा / किससे पूछूं मेरी ख़ता क्या है। जब भी चाहेगा, छीन लेगा वो / सब उसी का है आपका क्या है।' आसमान से लाखों बादलों की टोलियां गुज़र गईं और ज़मीन से जाने कितने मौसम। मगर ये दो शे'र भाई की यादों में धुंधले नहीं पड़े। तब से इस ग़ज़ल को मुकम्मल कराने और फिर एलबम 'इंतेहा' में गाने तक मुझे जाने कितनी बार उनसे अपने ये शे'र सुनने का शरफ़ हासिल हुआ। चार शे'र की इस ग़ज़ल के लिए चालीस से ज़्यादा शे'र कहलवाए उन्होंने। और मतला। उसकी तो गिनती ही नहीं। जब जो मतला कह कर सुनाता, कहते - 'और अच्छा कहो।' ग़ज़ल को किसी उस्ताद की तरह 24 कैरेट तक संवारने का हुनर हासिल था उन्हें। आप उनसे किसी ग़ज़ल के लिए या किसी ग़ज़ल में से, ख़ूबसूरत अश्आर चुनने का हुनर बख़ूबी सीख सकते थे।

'अपनी मर्ज़ी से कहां अपने सफ़र के हम हैं / रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं। वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से / किसको मालूम कहां के हैं किधर के हम हैं।' ठीक। माना। मगर इस फ़िलॉसफ़ी के पीछे भी एक दुनिया होती है। दिल की दुनिया। जहां से एक उस्ताद, एक रहनुमा और एक बड़े भाई का जाना दिल की दो फांक कर देता है। जिनके जुड़ने की फिर कोई सूरत नज़र नहीं आती। समेटना चाहो तो सैकड़ों एलबम्स, हज़ारों कॉन्सर्ट्स और अनगिनत सुरीली ग़ज़लें-नज़्मे। इतने नायाब, ख़ूबसूरत और यादगार तोहफ़ों का कभी कोई बदल नहीं हो सकता। 'जाते-जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया / उम्र भर दोहराऊंगा ऐसी कहानी दे गया।'

जिसने अपनी आवाज़ के नूर से हमारी राहें रौशन कीं। हम जैसों को ग़ज़ल की इबारत, उसके मआनी समझाए। उसे बरतना और जीना सिखाया। शायरी की दुनिया में चलना सिखाया। उसे आख़िरी सफ़र के अपने कांधों पर घर से निकालना ऐसा होता है जैसे - 'उसको रुख़सत तो किया था मुझे मालूम न था / सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला।' जग जीत कर जाने वाले जगजीत भाई हम आपका क़र्ज़ कभी नहीं उतार पाएंगे।

दशा बदलने के लिए दिशा बदलें

अगर जीवन में लाख कोशिश करने के बाद भी कोई खास सुधार नजर न आए तो दिशा बदल लेनी चाहिए, तभी दशा बदल सकती है, अगर लकीर के फकीर ही बने रहे तो स्‍िथति बदलने की कोई संभावना नहीं। हिन्‍दुस्‍तान में अमीर अमीर और गरीब होते जा रहे हैं, इसका कारण आम आदमी का जीवन व उसकी सीमाएं हैं। जैसे के जन्‍म, साधारण शिक्षा, नौकरी, शादी, खर्च/थोड़ी बचत, इस तरह से आम आदमी का जीवन चल रहा है, अगर आम आदमी ने इसमें सुधार नहीं किया तो जीवन स्‍तर में सुधार की कोई गुजाइंश नहीं। इस व्‍यवस्‍था को सुधारने की जरूरत है, जन्‍म के बाद अच्‍छी शिक्षा,  शिक्षा के बाद बेहतरीन जॉब, और खर्च/थोड़ी बचत, जो बचत है उसको निवेश में बदलना। मगर आम आदमी जितनी उम्र भर में बचत करता है, उसको सुख सुविधाओं के लिए खर्च कर देता है या फिर अंतिम समय से पहले अपने स्‍वास्‍थ्‍य पर खर्च कर देता है। निवेश होना चाहिए भले ही छोटा हो, क्‍योंकि निवेश पैसे की संतान को पैदा करना है, सुख सुविधा के लिए खर्च किया पैसा पैसे की संतान को मार देता है। जैसे दंपति के बच्‍चे होते हैं, वह उनके युवा होने पर उनकी शादी कर देता है, और फिर वह बच्‍चे नए बच्‍चों को जन्‍म देते हैं, ऐसे ही आपके द्वारा किया छोटा निवेश भी पैसे की संतान को जन्‍म देने में सहाई होगा, मगर उस संतान को खर्च करने से बेहतर होगा, उसका पुर्ननिवेश। आम आदमी को अगर अमीर बनना है तो अमीरों की तरह सोचना होगा, अपनी सीमाएं लांघकर सोचना होगा, तभी संभव हो सकता है, वरना गरीब का अपनी गरीबी से उभरना मुश्‍िकल है। कौन बनेगा करोड़पति द्वारा कई लोग करोड़पति बने, मगर बाद में उनका जीवन स्‍तर पहले जैसा हो गया, क्‍योंकि वह अपनी सीमाएं और सोच को आगे नहीं बढ़ा सके। उन्‍होंने अपना पैसा सुख सुविधाओं पर खर्च दिया, खर्च हुआ पैसा कभी कमाकर नहीं देता, निवेश किया पैसा हमारा कमाकर देता है। 

जय युवा जय हिन्‍दुस्‍तान

गधा और मैं

अखबार पढ़ने का बेहद शौक है मुझे, किसी पुराने अखबार की कीटिंग मिल गई, जिस पर गधे की विशेषताएं लिखी थी, मैं उनको पढ़कर गधे पर हंसने लगा, हंसी अभी खत्‍म नहीं हुई थी कि मेरे मन ने मुझे जोरदार तमाचा रसीद कर दिया और कहा, फिर से पढ़ो और अपने से तुलना करो, मैंने कहा, रे मन चुप रहे, कहां गधा और कहां मैं। मन ने जोर से मुझपर चिल्‍लाते हुए कहा, गौर से पढ़कर देख क्‍या लिखा है, गधे की नहीं तेरी विशेषताएं हैं। मैंने पढ़ना शुरू किया, गधे को सुबह सुबह कुम्‍हार लात मारकर जगाता है, मन ने कहा, तुम को तुम्‍हारी पत्‍नी। गधा उठने के बाद काम के लिए तैयार होता है, मन ने कहा, तुम भी, गधे के साथ दोपहर का खाना कुम्‍हार बांध देता है, तुम्‍हारे साथ भी लांच बॉक्‍स होता है, गधा दिन भरकर काम करता है, और गधा पैसे कमाकर कुम्‍हार को देता है, तुम भी दिन भर काम करते हो और पैसा कमाकर बीवी को देते हो, है कोई फर्क तुम मैं और गधे में, मुझ पर जोरदार प्रहार करते हुए मन बोला। अब मैं क्‍या कहता, चुप हो गया, मौन हो गया।

शुरूआत एक नए युग की


नमस्‍ते दोस्‍तो, आपकी ओर से मिल रहे प्‍यार और स्‍नेह ने ही मुझे ब्‍लॉग को वेबसाइट में बदलने के लिए प्रेरित किया। मैं वादा करता हूं कि आज के बाद यह पोर्टल पूर्ण रूप से युवाओं को समर्पित होगा। मेरी नजर में उम्र से युवा होना ही युवा होना नहीं है, ब्‍लकि सोच से युवा होना ही असली युवावस्‍था है. उम्‍मीद ही नहीं, यकीन भी है कि आपको मेरी ओर से उठाए गए इस कदम से बेहद खुशी खुशी होगी।

जीवन खत्‍म हुआ तो जीने का ढंग आया

जीवन खत्‍म हुआ तो जीने का ढंग आया 
 शमा बुझ गई जब महफिल में रंग आया,
मन की मशीनरी ने सब ठीक चलना सीखा, 
बूढ़े तन के हरेक पुर्जे में जंग आया, 
फुर्सत के वक्‍त में न सिमरन का वक्‍त निकाला, 
उस वक्‍त वक्‍त मांगा जब वक्‍त तंग आया, 
जीवन खत्‍म हुआ तो जीने का ढंग आया। 
जैन मुनि तरूणसागर जी की किताब से

मीडिया, किक्रेट और पब्‍लिक


पंजाब के पूर्व वित्‍त मंत्री व मुख्‍यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के भतीजे ने नई पार्टी की घोषणा करते हुए कहा कि आने वाले एक साल में वह पंजाब का नक्‍शा बदलकर रख देंगे, अगर लोग उनका साथ दें तो। आखिर बात फिर तो पर आकर अटक गई। जब तक बीच से तो व पर नहीं हटेंगे तब तक देश का सुधार होना मुश्किल। पब्‍लिक के साथ की तो उम्‍मीद ही मत करो, क्‍योंकि पब्‍लिक की याददाश्‍त कमजोर है। मनप्रीत सिंह बादल ने अपनी नई पार्टी की घोषणा तब की, जब पूरा मीडिया देश को क्रिकेट के रंग में पूरी तरह भिगोने में मस्त है। मीडिया की रिपोर्टों में भी मुझे विरोधाभास के सिवाए कुछ नजर नहीं आ रहा, चैनल वाले टीआरपी के चक्कर में बस जुटे हुए हैं। मुद्दा क्‍या है, क्‍या होना चाहिए कुछ पता नहीं। वो ही मीडिया कह रहा है कि भारत के प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को न्यौता भेजकर दोनों देशों के संबंधों में आई खटास दूर करने के लिए कदम उठाया है, लेकिन वहीं दूसरी तरफ मीडिया भारत पाकिस्तान के मैच को युद्ध की तरह पेश कर रहा है। कहीं कहता है कि दोनों देशों में दोस्ताना बढ़ेगा, वहीं किक्रेट की बात करते हुए युद्ध सी स्थिति पैदा कर देता है। मीडिया ने भारत पाकिस्तान मैच को इतना प्रमोशन दिया कि राष्ट्रीय छुट्‌टी तक रखने की बात सामने आ गई। हद है, किस के लिए छुट्टी, ताकि हम भारत को पाकिस्तान पर विजय पाते हुए दिखाना चाहते हैं, या फिर किक्रेट को खेल के नजरिए से। मीडिया की बदौलत सबसे ज्यादा सट्टा इस मेज पर लग रहा है, जिसको मीडिया भी बड़े उत्साह के साथ पेश कर रहा है, जैसे सट्टा लगाना को शुभ कार्य हो। इतना ही नहीं, कुछ दिन पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाला भारत हजारों रुपए देकर ब्‍लैक में टिकट खरीदने के लिए तैयार हो गया। क्‍या भारत व मीडिया भूल गया कि यह भी एक सामाजिक बुराई है, जिसको आज हम किक्रेट के नशे में अन्धे होकर जन्म दे रहे हैं। डेढ़ सौ रुपए की टिकट पंद्रह पंद्रह हजार में खरीदी जा रही है आखिर ऐसा क्‍या है भारत पाकिस्तान में मैच में। मैच आम मैचों सा होना चाहिए था, मीडिया को मैच का मेल युद्ध से नहीं करना चाहिए था। इस बात ने भारतीयों के दिलों में पाकिस्तान के लिए प्यार स्नेह का बीज नहीं बोया बल्कि नरफत बोई है, जो पाकिस्तान को हर हाल में हारते हुए देखना चाहेगी। मीडिया की इस तरह की न समझी भरी रिपोर्टों ने भारतीय टीम को कितने दबाव तले ला दिया होगा, इसका अंदाजा शायद ही मीडिया वाले लगा सके। जीत का जश्न तो हिन्दुस्तानी बड़े आराम से मना लेते हैं, लेकिन हार का दर्द सहना मुश्किल हो जाता है, खास कर तब जब टीम से सौ फीसदी उम्‍मीद कर बैठें। मैं किक्रेट देखता हूं बहुत कम, लेकिन खेल के नजरिए से, जो बढि़या प्रदर्शन करेगा वो जीतेगा, जो बुरा प्रदर्शन करेगा वो हारेगा, क्‍योंकि जीत के लिए दोनों ही खेलते हैं। मुझे याद है, एक मैच जब मैदान में भारत की हार पर भीड़ ने मैदान में ही हुड़दंग मचा दिया था। आज भी विनोद कांबली का वो रोता हुआ चेहरा आंखों से ओझल नहीं होता, अगर मैं कहीं गलत न हूं तो तब भारत श्रीलंका के हाथों सेमीफाइनल में हारा था। इस विश्‍वकप में क्‍वाटर फाइनल में हारकर वापिस लौटने वाली पाकिस्तानी टीम को पाकिस्तान में पब्‍लिक द्वारा उतरने नहीं दिया गया था। आखिर उनका क्‍या दोष अगर वो मैच नहीं जिता सके, मैच का जिम्‍मा किसी एक प्लेयर पर नहीं, बल्कि पूरे टीम वर्क पर निर्भर करता है। मीडिया को समझदारी से काम लेना चाहिए। खेल को खेल रहने देना चाहिए।

न्यू बठिंडा की तस्वीर प्रदर्शित करती घटनाएं, फिर चुप्पी क्‍यों

कुलवंत हैप्पी / गुडईवनिंग/ समाचार पत्र कॉलम
पिछले दिनों स्थानीय सिविल अस्पताल से खिडक़ी तोडक़र भागी युवती का तो कुछ अता पता नहीं, लेकिन फरार युवती पीछे कई तरह के सवाल छोड़ गई। वह युवती सहारा जनसेवा को बेसुध अवस्था में मिली थी एवं सहारा जनसेवा ने उसको इलाज हेतु सिविल अस्पताल दाखिल करवाया, तभी होश में आने के बाद युवती ने जो कुछ कहा, उसको नजरंदाज नहीं किया जा सकता, क्‍योंकि वह युवती उस क्षेत्र से संबंध रखती है, जहां शहर की ८० हजार से ज्यादा आबादी रहती है। युवती सिविल अस्पताल में उपचाराधीन पड़ी नशा दो नशा दो की रट लगा रही थी, जब मांग पूरी न हुई तो वहां से सहारा वर्करों को चकमा देकर भाग निकली। उसके बाद पता नहीं चला कि युवती आखिर गई कहां एवं प्रशासन भी कारवाई के लिए उसकी स्थिति सुधरने का इंतजार करता रहेगा। इस घटनाक्रञ्म से पूर्व स्थानीय रेलवे रोड़ स्थिति एक होटल से मृतावस्था में एक युवक मिला था, जो होटल में किसी अन्य जगह का पता देकर ठहरा हुआ था। उस युवक के पास से नशे की गोलियों के पते मिले थे, जो साफ साफ कह रहे थे कि नशे ने एक और जिन्दगी निगल ली। यह युवक भी लाइनों पार क्षेत्र से संबंधित था। इन दोनों घटनाओं के बीच कई घटनाएं घटित हुई, जो लाइनोंपार क्षेत्र में बढ़ती नशाखोरी को प्रदर्शित करती हैं। इतना ही नहीं, नशाखोरी के खिलाफ कुछ दिन पूर्व लाइनोंपार के एक क्षेत्र में महिलाओं ने रोष प्रदर्शन भी किया था एवं मौके पर पहुंचे पुलिस अधिकारियों ने नशा तस्करी के खिलाफ डटकर समर्थन देने का भरोसा दिया था, मगर भरोसा तो हमारे नेतागण भी देते हैं। इस क्षेत्र में नशे की आंधी किस तरह घरों के चिरागों को बुझा रही है, यह बात किसी से भी छुपी नहीं, मगर न जाने जिला प्रशासन व सरकार किस तूफान के आने का इंतजार कर रही है। लाइनोंपार क्षेत्र में आलम ऐसा है कि हर पांचवां व छठा युवक नशे की लत से अछूता नहीं। लाइनों पार क्षेत्र का ऐसा हाल हुआ क्‍यों? इस पर भी विचार करने की बेहद जरूरत है। नशे की लत से किसी को कैसे बचाया जा सकता है। मुझे लगता है कि बेहतर शिक्षा प्रदान कर या फिर बच्चों में खेल कूद के प्रति उत्सुकता पैदा कर, लेकिन यह बातें तभी पूरी हो सकती हैं, यदि अच्छी शिक्षा व खेल कूद के लिए कोई साधन उस क्षेत्र में हों। लाइनों पार का क्षेत्र दोनों ही चीजों से वंचित है। इस क्षेत्र में न तो बेहतर एजुकेशन के लिए कोई शैक्षणिक संस्थान है और ना ही खेल को प्रफूल्‍ल‍ित करने के लिए कोई खेल परिसर। इसके बाद बात आती सेहत सुविधाओं की, लाइनों पार क्षेत्र इस सुविधा से भी पूरी तरह वंचित है। ऐसे माहौल में एक अच्छा नागरिक पैदा करना लहरों के विपरीत तैरकर किनारों को पकडऩे जैसा मालूम पड़ता है। सवाल यह भी उठता है कि आखिर हम कब तक सरकारों को दोष देते रहेंगे व असुविधाओं का रोना रोते रहेंगे, कुछ जिमेदारियों का बीड़ा हमें खुद को भी तो उठाना होगा, तभी जाकर एक स्वच्छ समाज की कल्पना कर सकते हैं। दीया दीया जलाओ, और फिर मुडक़र देखें, अगर दीवाली सा माहौल न हो जाए तो कहना। बस जरूञ्रत है, एक दीया जलाने की, अंधकार तो डरपोक कुत्‍ते की तरह दूम टांगों के बीच दबाकर भाग जाएगा।

आखिर कहां सोते रहे मां बाप

मीडिया पर भी लगे सवालिया निशान
कुलवंत हैप्पी / गुड ईवनिंग / समाचार पत्र कॉलम
आज सुबह अखबार की एक खबर ने मुझे जोरदार झटका दिया, जिसमें लिखा था एक सातवीं की छात्रा ने दिया बच्चे को जन्म एवं छात्रा के अभिभावकों ने शिक्षक पर लगाया बलात्कार करने का आरोप। खबर अपने आप में बहुत बड़ी है, लेकिन उस खबर से भी बड़ी बात तो यह है कि आखिर इतने महीनों तक मां बाप इस बात से अभिज्ञ कैसे रहे। किसी भी समाचार पत्र ने इस बात पर जोर देने की जरूरत नहीं समझी कि आखिरी इतने लम्‍बे समय तक लडक़ी कहां रही? अगर घर में रही तो मां बाप का ध्यान कहां था ? खबर में लिख गया केवल इतना, सातवीं कक्षा की छात्रा ने दिया बच्चे को जन्म, जिसकी पैदा होते ही मौत हो गई। गर्भ धारण से लेकर डिलीवरी तक का समय कोई कम समय नहीं होता, यह एक बहुत लम्‍बा पीरियड होता है, जिसके दौरान एक गर्भवती महिला को कई मेडिकल टेस्टों से गुजरना पड़ता है। इतना ही नहीं, इस स्थिति में परिवार का पूर्ण सहयोग भी चाहिए होता है। अभिभावकों ने अपनी प्रतिक्रिया प्रकट करते हुए कहा, उनको शक है कि इसके पीछे छात्रा के शिक्षक का हाथ है, लेकिन सवाल उठता है कि शिक्षक तो इसके पास कुछ समय रूकता होगा, उससे ज्यादा समय तो बच्ची परिवार में ही गुजारती होगी। मगर मीडिया ने इस बात पर ध्‍यान देने की बजाय खबर को प्रकाशित करने में अधिक रुचि दिखाई। इस घटना से जहां शिक्षक व विद्यार्थी का रिश्ता तार तार हुआ है, वहीं यह बात भी उजागर होती है कि मां बाप बच्चों के लिए प्रति सचेत हैं। इसके अलावा समाचार ने मीडिया में बैठे बुद्धजीवियों पर भी सवालिया निशान लगा दिए, जिनको पत्रकारिता की शिक्षा में पहले दिन ही सिखाया जाता है कहां, कैसे, कब, क्‍यों क्‍या आदि, लेकिन खबर में ऐसा कुछ भी नहीं था।  समाचार यहां पढ़ें

अंक तालिका से परे जिन्दगी, जरा देखें

कुलवंत हैप्पी, गुड ईवनिंग  समाचार पत्र कॉलम
इंदौर शहर के एक मार्ग किनारे लगे होर्डिंग पर लिखा पढ़ा था, जिन्दगी सफर है, दौड़ नहीं, धीरे चलो, लेकिन बढ़ती लालसाओं व प्रतिस्पर्धाओं ने जिन्दगी को सफर से दौड़ बनाकर रख दिया। हर कोई आगे निकलने की होड़ में जुटा हुआ है, इस होड़ ने रिश्तों को केवल औपचारिकता बनाकर रख दिया, मतलब रिश्ते हैं, इनको निभाना, चाहे कैसे भी निभाएं। रिश्तों के मेले में सबसे अहम रिश्ता होता है मां पिता व बच्चों का, लेकिन यह रिश्ता भी प्रतिस्पर्धावादी युग में केवल एक औपचारिकता बनकर रह गया है। अभिभावक बच्चों को अच्छे स्कूल में डालते हैं ताकि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा ले सके, उनको अच्छे स्कूल में पढ़ाने के लिए अच्छे पैसों की जरूरत होती है, जिसके लिए ब्‍लॉक की सूईयों की तरह मां बाप चलते हैं, और पैसा कमाते हैं। उनको रूकने का समय नहीं, वह सोचते हैं बच्चों को अच्छे स्कूल में डाल दिया, दो वक्त की रोटी दे दी, और उनकी जिम्‍मेदारी खत्म हो गई। अच्छे स्कूल में डालते ही बच्चों को अच्छे नतीजों लाने के लिए दबाव डाला जाता है, बिना बच्चे की समीक्षा किए। बच्चे भी अभिभावकों की तरह अच्छे अंकों के लिए अपनी दुनिया को किताबों तक सीमित कर लेते हैं। इस तरह चलते चलते बच्चों को जिन्दगी बोझ सी लगने लगती है, दूसरी तरफ बड़े होते बच्चों से मां बाप की उम्‍मीदें बढ़ने लगती है, यही उम्‍मीद बच्चों को और मुश्किल में डाल देती हैं। ऐसे में तनावग्रस्त बच्चों के पास तनाव से मुक्‍ति पाने के लिए एक ही रास्ता बचता है, जो गत रात्रि फरीदाबाद के सेक्‍टर सात में रहने वाली दसवीं कक्षा की छात्रा दिव्या ने चुना। एग्जाम का फीवर इतना तेज हो गया कि उसने मौत को गले लगा आसान समझा। अगर प्रत्येक साल के आंकड़े देखे जाए तो हमारी आंखें खुली की खुली रह जाएगी, क्‍योंकि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो के आंकड़ों के मुताबिक प्रत्येक दिन छह छात्र असफलता के डर से आत्महत्या करते हैं, जबकि 13 छात्र किसी अन्य बजाय से। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो (एनसीआरबी) के 2009 के आंकड़ों के मुताबिक चंड़ीगढ़ में आत्महत्या के 2009 के आंकड़ों में से 24 फीसदी मामले छात्रों से जुड़े थे तो इलाहाबाद और कानपुर में यह आंकड़ा 23 फीसदी था. मेरठ में 2008 में सामने आए आत्महत्या के कुल मामलों में से 19.8 फीसदी छात्रों के ही बताए जाते हैं और लखनऊ में 2007 में यह आंकड़ा 22.6 फीसदी था. 2008 में जहां देश में 4.8 फीसदी छात्रों ने मौत को गले लगाया था, वहीं 2009 में इस कठोर कदम को उठाने वाले छात्रों का आंकड़ा 5.3 फीसदी था यानी 2008 में जहां 6,060 छात्रों ने आत्महत्या की थी, 2009-10 में यह आंकड़ा बढ़कर 6,716 हो गया। देश में प्रतिदिन 19 छात्र आत्महत्या करते हैं, जिनमें से छह यह कदम परीक्षा में असफलता के डर से उठाते हैं। और मां बाप व शिक्षकों के पास छोड़ जाते हैं केवल अफसोस। इस बाबत मनोविज्ञानियों का कहना है कि बच्चे अवसाद से भीतर ही भीतर जूझते रहते हैं एवं मां बाप के पास उनकी समस्याओं को सुनने का समय नहीं। क्‍या फायदा ऐसी शिक्षा का, जो व्यक्‍ति को जीवन जीने का सलीका नहीं सिखा सकती। अंकतालिका से परे, आपके बच्चे की जिन्दगी खड़ी है, उसको देखने की कोशिश करें। असल शिक्षा वही होती है, जो मानसिक तौर पर तंदरुस्त व एक अच्छा इंसान पैदा कर सके।

बच्चों को दोष देने से बेहतर होगा उनके मार्गदर्शक बने

कुलवंत हैप्पी/ गुड ईवनिंग
सेक्‍स एजुकेशन को शिक्षा प्रणाली का हिस्सा बनाया जाए, का जब भी मुद्दा उठता है तो कुछ रूढ़िवादी लोग इसके विरोध में खड़े हो जाते हैं, उनके अपने तर्क होते हैं, लागू करवाने की बात करने वालों के अपने तर्क। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि इस मुद्दे पर सहमति बन पानी मुश्किल है। मुश्किल ही नहीं, असंभव लगती है। आज के समाज में जो घटित हो रहा है, उसको देखते हुए सेक्‍स एजुकेशन बहुत जरूरी है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि इसको शिक्षा प्रणाली का ही हिस्सा बनाया जाए। इसको लागू करने के और भी विकल्प हो सकते हैं, जिन पर विचार किया जाना अति जरूरी है। अब तक समाज दमन से व्यक्‍ति की सेक्‍स इच्छा को दबाता आया है, लेकिन अब सब को बराबर का अधिकार मिल गया, लड़कियों को घर से बाहर कदम रखने का अधिकार। ऐसे में जरूरी हो गया है कि बच्चों को उनको अन्य अधिकारों के बारे में भी सजग किया जाए, और आज के युग में यह हमारी जिम्मेदारी भी बनती है, ताकि वह कहीं भी रहे, हम को चिंता न हो। वह जिन्दगी में हर कदम सोच समझ कर उठाएं। आए दिन हम अखबारों में पढ़ते हैं कि एक नाबालिगा एक व्यक्‍ति के साथ भाग गई। आखिर दोष किसका, बहकाने वाले का, अभिभावकों का या फिर उस लड़की का, जो काम में अंधी होकर घर वालों के दमन से डरती हुई, चुपचाप किसी अज्ञात के साथ भाग गई, जिसको वह कुछ समय से जानती है। प्रत्येक व्यक्‍ति को पता है कि समाज में या चल रहा है, लेकिन वह भूल जाता है कि उसका परिवार, उसके परिवार का हर परिजन इस समाज का हिस्सा है। जो घटना आज उसकी आंखों के सामने घटित हुई, वह कल उसके घर में भी हो सकती है। फिर कहें दोष किसका। दोष् हमारा ही है, हम समाज को पूरी तरह से जानते हैं, लेकिन उस समाज को बचाने के लिए कोई कदम उठाने की बजाय उदासीनता को अपनाना अधिक पसंद करते हैं। जहां तक मेरी अब तक की उम्र का तुजुर्बा कहता है, ज्‍यादातर नाबालिग लड़कियां हवश के भूखे भेड़ियों की भेंट चढ़ती हैं, खासकर आठवीं से दसवीं कक्षा की छात्राएं। इसका भी एक वैज्ञानिक कारण है, क्‍योंकि इस उम्र में लड़कियों के हर्मोन्स आदि चेंज होते हैं। उनको कुछ नया अनुभव होता है, जो उन्होंने आज तक अनुभव नहीं किया होता, जैसे ही इस दौर में वह किसी के संपर्क में आती हैं, तो बहक जाती हैं। यहां पर उनको एक दोस्त की जरूरत होती है, जो उसको सही तरह से गाइड करे, उनको सही रास्तों की पहचान करवाए। मगर हिन्दुस्तान में माताएं सदैव माताएं बनकर रहती हैं, उनको दोस्त बनने की आदत नहीं पड़ी, और बच्चे सिनेमा से जो सीखते हैं, उसको जिन्दगी में लागू करने की कोशिश करने लगते हैं, जिसके नतीजे बेहद बुरे होते हैं, योंकि हिन्दुस्तान में बनने वाली फिल्में हमेशा अधूरी होती है, भगवान श्रीकृष्ण कथा सी, जो अभिमान्यू ने मां के पेट में सुनी, और चक्करव्यू में फंस गया। हिन्दुस्तान की फिल्में हमेशा किशोर व युवा पीढ़ी को चक्करव्यूह में फंसाकर छोड़ देती है। चलते चलते इतना कहूंगा कि समाज को दमन से नहीं, बल्कि सही विचारधाराओं से बचाया जा सकता है।

पति से त्रसद महिलाएं न जाएं सात खून माफ

सात खून माफ फ‍िल्‍म से पूर्व मैंने फ‍िल्‍म निर्देशक विशाल भारद्वाज की शायद अब तक कोई फ‍िल्‍म नहीं देखी, लेकिन फ‍िल्‍म समीक्षकों की समीक्षाएं अक्‍सर पढ़ी हैं, जो विशाल भारद्वाज की पीठ थपथपाती हुई ही मिली हैं। इस वजह से सात खून माफ देखने की उत्‍सुकता बनी, लेकिन मुझे इसमें कुछ खास बात नजर नहीं आई, कोई शक नहीं कि मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक फ‍िल्‍म ने बॉक्‍स आफि‍स पर अच्‍छी कमाई की, फि‍ल्‍म कमाई करती भी क्‍यों न, आख‍िर सेक्‍स भरपूर फ‍िल्‍म जो ठहरी, ऐसी फ‍िल्‍म कोई घर लाकर कॉमन रूम में बैठकर देखने की बजाय सिनेमा घर जाकर देखना पसंद करेगा। मेरी दृष्टि से तो फ‍िल्‍म पूरी तरह निराश करती है, मैंने समाचार पत्रों में रस्‍किन बांड को पढ़ा है, और उनका फैन भी बन गया, मुझे नहीं लगता उनकी कहानी इतनी बोर करती होगी। कुछ फ‍िल्‍म समीक्षक लिख रहे हैं कि फ‍िल्‍म बेहतरीन है, लेकिन कौन से पक्ष से बेहतरीन है, अभिनय के पक्ष से, अगर वो हां कहते हैं तो मैं कहता हूं एक कलाकार का नाम बताए, जिसको अभिनय करने का मौका मिला।  अगर निर्देशन पक्ष की बात की जाए, जिसके कारण फ‍िल्‍म की सफलता का श्रेय विशाल भारद्वाज को जाता है, लेकिन निर्देशन में बिल्‍कुल भी कसावट नजर नहीं आती, फ‍िल्‍म इतनी तेजी से भागती है कि बिना सेक्‍स के कोई और बात समझ में नहीं आती। यह फ‍िल्‍म अच्‍छी बन सकती थी, अगर विशाल भारद्वाज सात खून करवाने की बजाय, कम खून करवाते, और हर हत्‍या के पीछे के ठोस कारणों को विस्‍तार से बताते। तेज रफतार दौड़ती फ‍िल्‍म में निर्देशक प्रियंका की दयनीय जिन्‍दगी को उजागर करने से कोसों दूर रह गया। अंतिम में इतना कहूंगा, पति से त्रसद महिलाएं इस फ‍िल्‍म से बचें, खासकर वो जो तलाक लेने के लिए भीतर ही भीतर पूरी तरह तैयार हो चुकी हैं। चलते चलते एक और बात, ऐसे फ‍िल्‍म निर्देशकों को समाज को सही दिशा देने वाली फ‍िल्‍में बनानी चाहिए, जिनकी काबिलयत पर फ‍िल्‍म समीक्षक आंख मूंदकर विशाल करते हों।

जनाक्रोश से भी बेहतर हैं विकल्प, देश बदलने के

कुलवंत हैप्पी / गुड ईवनिंग/ समाचार पत्र कॉलम
हिन्दुस्तान में बदलाव के समर्थकों की निगाहें इन दिनों अरब जगत में चल रहे विद्रोह प्रदर्शनों पर टिकी हुई हैं एवं कुछ लोग सोच रहे हैं कि हिन्दुस्तान में भी इस तरह के हालात बन सकते हैं और बदलाव हो सकता, लेकिन इस दौरान सोचने वाली बात तो यह है कि हिन्दुस्तान में तो पिछले छह दशकों से लोकतंत्र की बहाली हो चुकी है, यहां कोई तानाशाह गद्दी पर सालों से बिराजमान नहीं। वो बात जुदा है कि यहां लोकतांत्रिक सरकार होने के बावजूद भी देश में भूखमरी, बेरोजगारी व भ्रष्टाचार अपनी सीमाएं लांघता चला जा रहा है। इसके लिए जितनी हिन्दुस्तान की सरकार जिम्मेदार है, उससे कई गुणा ज्‍यादा तो आम जनता जिम्मेदार है, जो चुनावों में अपने मत अधिकार का इस्तेमाल करते वक्‍त पिछले दशकों की समीक्षा करना भूल जाती है। कुछ पैसों व अपने हित के कार्य सिद्ध करने के बदले वोट देती है। देश में जब जब चुनावों का वत नजदीक आता है नेता घर घर में पहुंचते हैं, लेकिन इन नेताओं की अगुवाई कौन करता है, हमीं तो करते हैं, या कहें हमीं में से कुछ लोग करते हैं, या जो समस्याएं हमें दरपेश आ रही हैं, उनको नहीं आती, जो नेताओं के लिए वोट मांगने के लिए हमारे दर आते हैं। पार्षद किसी नेता को अपनी दहलीज नहीं लाया कि हम भूल जाते हैं, यह वो शख्स है, जिसके खिलाफ जनाक्रोश के ख्वाब संजो रहे थे कुछ समय पूर्व, यह उसकी सरकार के प्रतिनिधि हैं, जिन्होंने डिग्री हाथों में लेकर नौकरी मांगने गए कुछ बेरोजगारों पर लाठियां बरसाई। यह भूलने की आदत ही तो आफत बन चुकी है। एक शहर में बहुत बड़ा बम्ब धमाका होता है, एवं कुछ घंटों बाद सुन टूटती है एवं शहर पहले सी चहल पहल का अहसास करता है। इसको साहस कहो, चाहे कमजोर याददाशत का नतीजा। पुलिस प्रशासन सांप निकालने के बाद लकीर पीटने की कहावत को सच करते हुए कुछ समय सुरक्षा कड़ी करता है, फिर वह भी अपनी जिम्मेदारी भूल जाता है। आज टीवी व समाचार पत्रों में अरब जगत में हो रहा जनाक्रोश छाया हुआ है, और कुछेक हिन्दुस्तानी शेखचिल्ली की तरह ख्यालों में हिन्दुस्तान में भी इस तरह के विद्रोह को होते हुए महसूस कर एक नए हिन्दुस्तान की कल्पना कर रहे हैं, लेकिन जैसे ही वहां सब शांत हो जाएगा, समाचार पत्र व खबरिया चैनल अपनी पेज थ्री की खबरों में व्यस्त हो जाएंगे, वैसे ही लोग भूल जाएंगे अरब देशों के जनाक्रोश को, और हिन्दुस्तान का लोकतंत्र दिन ब दिन बूढ़ा एवं बोझिल होता चला जाएगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि हिन्दुस्तान में भी जनाक्रोश फूटेगा, लेकिन सत्‍ता नहीं बदलेगी बल्कि आपराधिक गतिविधियां बढ़ेगी, रिश्ते टूटेंगे, बच्चे बिकेंगे, वेश्यवृत्ति बढ़ेगी, दंगे फसाद होंगे। अगर इन सबको होने से रोकना है तो सरकार पर उम्मीदें रखने से बजाय खुद करने की हिम्मत करो। देश को बदलने के लिए जनाक्रोश के अलावा भी कई रास्ते हैं, लेकिन उन रास्तों पर चलने के लिए स्वयं में शति की जरूरत है। फैट्री मालिक प्रशासन से सहयोग लेकर युवावस्था भिखारियों को कार्य पर रखें, भीख मांगने वाले बच्चों को बड़े बड़े स्कूल अपने हॉस्टलों में रखकर शिक्षा दें, खासकर जो मोटी दान राशि लेते हैं। आम जन अपने पुराने कपड़ों को बेचने की बजाय, गरीबों को बांट दें, होटलों में बर्बाद होते खाने को गरीबों तक पहुंचा दो, सरकार के हर कार्य पर निगाहें रखो एवं पैसे देकर काम करवाने की आदत को नकार दो, नोट के बदले वोट की बजाय विकास के बदले दो वोट देने की आदत डालो।

मनप्रीत की जनसभाएं व आमजन

कुलवंत हैप्पी /  गुड ईवनिंग/ समाचार पत्र कॉलम
'ए खाकनशीनों उठ बैठो, वो वत करीब आ पहुंचा है, जब तख्त उछाले जाएंगे, तब ताज गिराए जाएंगे' विश्व प्रसिद्ध शायर फैज अहमद फैज की कलम से निकली यह पंतियां, गत दिनों स्थानीय टीचर्ज होम के हाल में तब सुनाई दी, जब जागो पंजाब यात्रा के दौरान राद्गय में इंकलाब लाने की बात कर रहे राज्‍य के पूर्व वित्‍त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल एक जन रैली को संबोधन कर रहे थे। फैज की कलम से निकली इस पंति को कहते वत मनप्रीत को जद्दोजहद करना पड़ रहा था अपने थक व पक चुके गले से, जो पिछले कई महीनों से राद्गय की जनता को इंकलाब लाने के लिए लामबंद करने हेतु आवाज बुलंद कर रहा है। गले के दर्द को भूल मनप्रीत इस रचना की एक अन्य पंति 'अब टूट गिरेंगी जंजीरें, अब जैदांनों की खैर नहीं, जो दरिया झूम के उठे हैं, तिनकों से न टाले जाएंगे' को पढ़ते हुए पूरे इंकलाबी रंग में विलीन होने नजर आए। उनके संबोधन में उसकी अंर्तात्मा से निकलने वाली आवाज का अहसास मौजूद था, यही अहसास लोगों को इंकलाब लाने के लिए लामबंद करने में अहम रोल अदा करता है। इसमें भी कोई दो राय नहीं होनी चाहिए, जब जब किसी देश में जन अंदोलन हुआ, उसमें साहित्य ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। साहित्य के सहारे से ही लोगों की सोई हुई आत्मा को जगाया जा सकता है। पिछले दिनों मिस्त्र में जो हम सब ने देखा, वह भी सिर्फ एक विडियो लिप जरिए जारी किए एक भावनात्मक स्पीच के कारण ही हुआ। उस वीडियो में आसमा महफूज नामक लड़की ने भावनाओं से ओतपोत व अपनी अंर्तात्मा से एकजुटता बनाते हुए देश वासियों से एक अपील की, और उसी एक अपील ने पूरे मिस्त्र में जनाक्रोश पैदा कर दिया एवं उस जनाक्रोश के बाद, जो हुआ वह हम सब जानते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि विदेशियों के खिलाफ लड़ने वाले इस देश के नागरिक या अपने देश के हुकमरानों खिलाफ लड़ने के लिए लामबंद होंगे? योंकि इस देश में रूम डिस्कशन की बहुत गंदी बीमारी है। यहां के लोग कमरों में बैठकर सरकारें बदल देते हैं। एक दूसरे से जूतम जूती हो जाते हैं, लेकिन जब एकजुट होकर सरकार के खिलाफ अंदोलन चलाने की बात आती है तो सड़कों पर गिने चुने लोग नजर आते हैं, जिनको सरकार हलके से पुलिस लाठीचार्ज से दबा देती है। पिछले चार पांच महीनों से मनप्रीत सिंह बादल गली गली कूचे कूचे जाकर जन रैलियों को संबोधन कर रहे हैं एवं लोग उनके इंकलाब से लबालब भाष्णों को बड़ी गम्भीरता से सुन रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन वह लोग जब अपना प्रतिनिधि चुनने वोटिंग बूथ पर पहुंचेंगे, या तब मोहर मनप्रीत सिंह बादल के समर्थकों पर लगाएंगे। इस बात को लेकर मन में शंका है, योंकि भारत में रूम डिसशन में लोग चर्चा करते करते बहस पर उतर आते हैं, लेकिन जब रूम से बाहर आते हैं तो सब खत्म हो चुका है। विरोध की आग राख बन चुकी होती है।

एक विडियो सांग की बदौलत मिली 'द लॉयन ऑफ पंजाब' : दलजीत

देश विदेश में 25 फरवरी को होगी रिलीज द लॉयन ऑफ पंजाब
कुलवंत हैप्पी, बठिंडा। जल्द रिलीज होने वाली मेरी पहली पंजाबी फिल्म द लॉयन ऑफ पंजाब 'पहलां बोली द नी' गीत के विडियो की बदौलत मिली। यह खुलासा स्थानीय हरचंद सिनेमा में अपनी फिल्म के प्रोमशन के लिए पहुंचे पंजाबी संगीत प्रेमियों के दिलों की धडक़न गायक दलजीत ने किया। मुक्‍तसर मार्किञ्ट कमेटी के चेयरमैन हनी बराड़ फत्‍तणवाला के विशेष निमंत्रण पर बठिंडा पहुंचे पंजाबी गायक व अभिनेता दलजीत ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि अगर परमात्मा की दुआ से उनकी पहली फिल्म चल गई तो वह पंजाबी फिल्म प्रेमियों की झोली में और भी बेहतरीन फिल्में डालने की कोशिश को जारी रखेंगे। फिल्म में उनके किरदार के बारे में पूछे जाने पर दलजीत कहते हैं कि फिल्म में उनका किरदार अवतार सिंह नामक युवा का है, जिसका संबंध रामपुरा फूल के समीप स्थित एक गांव से है। फिल्म के विषय पर उन्होंने रहस्य कायम रखते हुए कहा कि फिल्म का विषय पंजाब की एक अहम समस्या है, जो आए दिन अखबारों में सुर्खियां बटोरती है। एक अन्य सवाल के जवाब में दलजीत कहते हैं कि वह इस फिल्म से पूर्व फिल्म निर्देशक गुड्डू धनोया से कभी नहीं मिले थे, लेकिन एक दिन उनको कॉल आया कि गुड्‌डू धनोया उनके साथ फिल्म करना चाहते हैं। दलजीत बताते हैं कि गुड्‌डू धनोया ने वो फोन पहलां बोली दा नी गीत की वीडियो देखने के बाद किया एवं कहा कि वह उसको लेकर एक फिल्म बनाना चाहते हैं, जिसकी पटकथा पंजाब की भूमि से संबंध रखती है। अन्य सवाल के जवाब में गायक दलजीत कहते हैं कि जब फिल्म की शूटिंग चल रही थी, तो उनको मजा आ रहा था एवं उसके बाद थोड़ा सुकून मिला कि कुञ्छ नया किया, लेकिन अब जब फिल्म रिलीज किनारे आ पहुंची है तो नर्वस हो रहा हूं। गौरतलब है कि इस फिल्म का निर्देशन हिन्दी फिल्म निर्देशक गुड्‌डू धनोया ने किया, जबकि फिल्म की कहानी उनकी धर्मपत्नि संतोश धनोया ने लिखी है। इसके अलावा फिल्म में एक्‍शन राम कुमार का है जबकि संगीत आनंद राज का। इस फिल्म में दलजीत के साथ बतौर नायिका जीविदा फेम मिनी पंजाब व जीविदा टंडन ने काम किया है।

उंगली उठाने से पहले जरा सोचे

बुधवार को स्थानीय फायर बिग्रेड चौंक पर समाज सेवी संस्थाओं की ओर से हिन्दुस्तानी भ्रष्टाचार के खिलाफ जागरूकता रैली का आयोजन किया गया, जिसमें मैं भी शामिल हुआ। हाथों में जागरूकता फैलाने वाले बैनर पकड़े हम सब सडक़ के एक किनारे खड़े थे, और उन बैनरों पर जो लिखा था, वह आते जाते राहगीर तिरछी नजरों से पढ़कर अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे। इतने में मेरे पास खड़े एक व्यक्‍ति की निगाह सामने दीवार पर लटक रहे धार्मिक संस्था के एक फलेक्‍स पर पड़ी, जिस पर लिखा हुआ था, हम बदलेंगे युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा, उन्होंने मेरा ध्यान उस तरफ खींचते हुए कहा कि वह शब्‍द बहुत कम हैं, लेकिन बहुत कुछ कहते हैं। अपने लेखन से सागर में गागर तो कई लेखकों ने भर दिया, लेकिन हमारा जेहन उनको याद कितनी देर रखता है, अहम बात तो यह है। हमारे हाथों में पकड़े हुए बैनरों पर लिखे नारों की अंतिम पंक्‍ति भी कुछ यूं ही बयान करती है, न रिश्वत लें, न रिश्वत दें की कसम उठाएं, जो बैनर तैयार करते समय मेरे दिमाग से अचानक निकली थी। किसी पर उंगली उठानी, सडक़ों पर निकल कर प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करनी हमारी आदत में शुमार सा हो गया था, लेकिन हम क्‍यों नहीं सोचते के जब हम किसी पर उंगली उठाते हैं तो तीन उंगलियां हमारी तरफ होती हैं, जो हमको याद करवाती हैं कि कुछ दोष तो हमारा भी है, सारा दोष सरकारी सिस्टम का नहीं। हम सिस्टम का बहुत बड़ा हिस्सा हैं, अगर हम सिस्टम को बरकरार रखते हैं, तो ही सिस्टम ठीक रह सकता है, क्‍योंकि सिस्टम बनाने वाले मुट्‌ठी भर लोग हैं, लेकिन उसको संभालकर रखने वाले व बिगाडऩे वाले करोड़ों में हैं। अगर हम रिश्वत देते हैं, तो सामने वाला रिश्वत लेता है। हम अगर नशा पैदा करते हैं, तो हमीं से कुञ्छ लोग बेचते हैं, कुछ लोग खाते हैं। गलियों में सीवरेज का पानी फैल जाता है, तो लोग सडक़ों पर उतर आते हैं, नगर पालिकाओं, नगर निगमों व सरकारों के खिलाफ नारेबाजी करते हैं। लेकिन नारेबाजी करने से पूर्व वह एक दफा भी नहीं सोचते हैं कि आखिर नालियां व सीवरेज बंद क्‍यों होते हैं। प्लास्टिक के लिफाफे इस्तेमाल करने के बाद हम कहां फेंकते हैं? कभी सोचा है! वह लिफाफे ही सीवरेज व्यवस्था को प्रभावित कर देते हैं। जरा सोचो, सीवरेज व्यवस्था प्रभावित होने से हम इतने क्रोधित हो जाते हैं तो जिस तरह भूमि में प्लास्टिक दिन प्रति दिन फेंके जा रहे हैं, एक दिन धरती की सोखने की क्षमता खत्म हो जाएगी, तब क्‍या होगा, किसके खिलाफ नारेबाजी करेंगे। सिस्टम केञ् खिलाफ, कौन से सिस्टम के खिलाफ, जो हम से बनता है, जिसका हम हिस्सा हैं। बेहतर होगा, धार्मिक बोर्ड पर लिखी पंक्‍तियों का अनुसरण करें, जिसमें लिखा था, हम बदलेंगे युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा।

'मिस्त्र में जनाक्रोश जिम्मेदार कौन' विषय पर विचार गोष्ठी आयोजित


जिम्मेदार : अमेरिकी रणनीति व अन्य अरब देशों में फैला जनाक्रोश
बठिंडा। बठिंडा विकास मंच द्वारा 'मिस्त्र में जनाक्रोश जिम्मेदार कौन' विषय पर विचार गोष्ठी शिव मंदिर स्ट्रीट में लेखक व समाज शास्त्री राजिंदर चावला की अध्यक्षता में आयोजित की गई, जिसमें प्रोफेसर एन के गोसाई मुख्य प्रवक्‍ता के तौर पर उपस्थित हुए। विचार चर्चा शुरू करते हुए बठिंडा विकास मंच के अध्यक्ष राकेश नरूला ने कहा कि वर्तमान राष्ट्रपति के दिन अब गिने चुने रह गए लगते हैं, पिछले तीन दशकों से उन्होंने फौलादी मुट्ठी व फौजी बूट का इस्तेमाल कर विपक्ष को दबाया है, वहां आज स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि आम आदमी जी जान पर खेलकर सड़कों पर उतर आया है। प्रिंसिपल एनके गोसाई ने कहा कि एक जमाने में मिस्त्र की साख अंतर्राष्ट्रीय मंच पर थी, मिस्त्र के राष्ट्रपति नासिर ने न सिर्फ स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण किया बल्कि उसके बाद हुए हमलों में साम्राज्‍यवादियों के दांत खट्टे किए, जबकि मिस्त्र ने आसवान बांध का निर्माण किया तो अरबों का सिर गर्व से उंच्चा हो गया। हजारों साल पहले बने पिरामिड इस बात के गवाह हैं कि मिस्त्र की संस्कृति प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है, उपनिवेशिक काल में मिस्त्र पर फ्रांसीसी व ब्रिटिश प्रभाव पड़ा, इसलिए वह पश्चिमी तौर तरीकों वाला बना, इस कारण उसे अमरीकी दलाल कहा जाने लगा, अब वहां आपातकाल जैसी स्थिति बन गई है एवं उद्योग पूरी तरह अस्त व्यस्त हो गया, जिसका बुरा प्रभाव अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पड़ा है। सबसे बड़े कपास उत्पादक देश में अब यह आलम है कि जनता राष्ट्रपति हुस्‍नी मुबारक के खून की प्यासी हो गई है, इसके पीछे कट्टर पंथी इस्लामिक बिरादरी का हाथ भी हो सकता है, क्‍योंकि लेबनान में हिजबुला की सक्रियता मिस्त्र को आशंकित करती रही है, मिस्त्र में ही नहीं अन्य अरब देशों में जैसे अलजीरिया, मौरक्को, जार्डन आदि में भी जनता जागरूक होकर तानाशाही विरूद्ध आजादी का बिगुल बजा चुकी है, इस सभी का प्रभाव मिस्त्र पर पड़ा, जिसके कारण मिस्त्र में जनाक्रोश हुआ। राजिंदर चावला ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि मौजूदा हालात के लिए कुटिल अमेरिकी रणनीति भी जिम्मेदार है, अमरीका अब समझ चुका है कि भ्रष्ट व कुनबाप्रस्त हुस्नी मुबारक अब अधिक दिन सत्‍ता में रहने वाले नहीं, इसलिए अब उन्हें अमेरिकी सहयोग नहीं मिल रहा है, यह तो तय है कि अमेरिकी हकूमत हुस्नी मुबारक के जाने के पक्ष में है, वह यह भी प्रयास करेंगे कि नया राष्ट्रपति आए वह उनके कहने में हो व उनके इशारों पर चले। अमेरिका के करीबी माने जाने वाले मिस्त्र के वैज्ञानिक नॉबेल पुरस्कार विजेता अल वरदोई मिस्त्र में सक्रिय हो गए हैं, वे कह रहे हैं कि यदि मिस्त्र की जनता उन्हें राष्ट्रपति की जिम्मेदारी सौंपेगी तो वे इसे स्वीकार करेंगे। सेवा राम सिंगला ने कहा कि मिस्त्र की बरबादी के लिए अमेरिकी नीतियां भी जिम्मेदार हैं। मध्यपूर्व के तेल भंडार पर कब्‍जा बनाए रखने की अमेरिकी रणनीति से मिस्त्र में इस तरह के हालात पैदा हुए हैं। इस समय बहुत सारे अरब देशों में जनाक्रोश फैला हुआ है, जिसका फायदा सीधे तौर पर अमेरिका को होगा।

बहुत कुछ कहते हैं दिल तो बच्चा है के महिला किरदार

पिछले दिनों हालिया रिलीज अजीम बाज्मी की नो प्रोब्‍लम, क्रित खुराना की टुनपुर का सुपरस्टार, फरहा खान की तीस मार खां व मधुर भंडारकर की दिल तो बच्चा है देखी। नो प्रोब्‍लम को छोडक़र बाकी सब फिल्में फिल्मी दुनिया से जुड़ी हुई थी, इनमें से मधुर भंडारकर की फिल्म हिन्दी फिल्मी फार्मुले से कुछ हटकर नजर आई, जो हर हिन्दी फिल्म की तरह सुखद अंत के साथ समाप्त नहीं होती। इस फिल्म के जरिए मधुर भंडारकर बहुत कुछ कह गए, लेकिन फिल्म समीक्षक फिर भी कहते रहे कि फिल्म में कुछ कसर बाकी है। मधुर भंडारकर ने तीन किरदारों को आपस में जोडक़र एक आधुनिक समय की तस्वीर पेश की। इस फिल्म में निक्की नारंग का किरदार अदा करने वाली श्रुति हसन, जब अभय (इमरान हश्मी) का दिल तोड़ते हुए कहती है कि यह तेरे लिए या मेरे के लिए कोई नई बात नहीं, एक लडक़ी का इस तरह उत्‍तर देना, अपने आप में चौंकने वाला था, यह वैसा ही था, जैसे फिल्म मर्डर में मल्लिका शेरावत का मेडिकल दुकान पर जाकर निरोध मांगना। इसमें कोई दो राय नहीं कि समय बदल रहा है, और बदलते समय की तस्वीर को पेश किया है मधुर भंडारकर ने। वहीं नरैन अहुजा (अजय देवगन) व उनकी पत्नि का रिश्ता टूटना भी समाज की एक नई तस्वीर पेश करता है। आज पत्नि पति इतने व्यस्त हो गए, उनको रिश्तों से ज्यादा अपने कैरियर की चिंता है, अगर र‍िश्‍ता कैरियर में रोड़ बनता है तो वह उसको भी बीच से हटाने में झिझकते नहीं। गुनगुन का मिलिंद केलकर की मासूमियत का फायदा उठाना, उन लड़कियों की तस्वीर पेश कर रहा है, जो अपना कैरियर बनाने के लिए किसी का भी जीवन बिगाड़ सकती हैं। अनुषका नारंग का किरदार, उस वर्ग का नेतृत्व करता है, जो एशोआराम की जिन्दगी जीने के लिए कोई भी समझौता कर पैसे के बल पर शरीर की भूख मिटाता है। पुरुष का चित्र तो हम सब रुपहले पर्दे पर देखते ही आ रहे हैं सदियों से, लेकिन मधुर भंडारकर ने महिला किरदारों को इस फिल्म में दयनीय स्थिति में नहीं दिखाया बल्कि उनको एक नए रूञ्प में दिखाया। मधुर भंडारकर की इस फिल्म में महिला नहीं, पुरुष लूटते हुए नजर आए। अनुषका का अभय को मुंह तोड़ जवाब देना, उसके भीतर की ऊर्जा को उजागर करता है, जबकि आज तक फिल्मकार यह ही दिखाते आए हैं कि औरत ने किसी पुरुष के साथ संभोग कर लिया तो उसके सामने आत्महत्या करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं, उसने औरत का हमेशा ही हीन दिखाया है। औरत की इस हीनता का पुरुषों ने खूब फायदा उठाया। लेकिन औरत चाहे तो वह पुरुषों को हीन भावना का शिकार बना सकती है। मधुर भंडारकर की इस फिल्म के महिला किरदार बहुत कुछ कहते थे, जिनको समझने की जरूरत है। हमारे समाज ने बॉस व अधीनस्थ महिला की निकटता को हमेशा ही गलत नजर से देखा है, लेकिन जरूरी नहीं कि उनके बीच हमेशा शारीरिक संबंध हों, इस बात को बयान करती है जून पिंटो की नरायन के साथ की निकटता। फ‍िल्‍म में बार बार बजने वाला गीत कोई होता व अभय का किरदार एक बात तो तय करता है कि जिन्‍दगी जितनी भी क्‍यों न व्‍यस्‍त व ऐशोराम भरी हो, लेकिन दिल को हमेशा प्‍यार व साथ की जरूरत रहती है।

धन काला है या नहीं पहले इसकी जांच हो - बूटा सिंह

बठिंडा। पंजाब की बिहार से तुलना किसी भी स्तर पर हो ही नहीं सकती, वहां और यहां के हालातों में जमीं आसमान का फर्क है, यह शब्‍द बिहार के पूर्व राज्यपाल व एनसीएससी के चेयरमैन बूटा सिंह ने स्थानीय सर्किट हाउस में समाचार पत्र टरूथ वे के प्रतिनिधि कुलवंत हैप्‍पी से हुई विशेष बातचीत के दौरान कहे, जोकि बलराम जाखड़ के बेटे सुरेंद्र जाखड़ के भोग में शामिल होने के लिए आए थे। शिरोमणि अकाली दल के तेज तर्रार नेता व पंजाब उप मुख्‍यमंत्री सुखबीर सिंह बादल द्वारा पंजाब में बिहार की तर्ज पर दोहराव की बात कहे जाने के संबंध में जब बूटा सिंह से सवाल पूछा गया तो उन्होंने अपने पुराने दिनों की तरफ लौटते हुए कहा कि बिहार और पंजाब में तुलना करना गलत है। बिहार की तुलना तो अन्य राज्यों से भी नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि बिहार पर सबसे लम्‍बे समय तक राज लालू व उसके रिश्तेदारों ने किया, वहां की सरकारी संपत्‍त‍ि पर उनका एकाधिकार था एवं वहां नीतिश कुमार के आने से पूर्व कानून नाम की कोई चीज नहीं थी, जबकि पंजाब व अन्य राज्यों में किसी भी पार्टी की सरकार के दौरान ऐसे हालात पैदा नहीं हुए, जो लालू व उसके रिश्तेदारों के शासनकाल दौरान बिहार में पैदा हो गए थे, नीतिश कुमार के आने के बाद बिहार में कानून व्यवस्था सुचारू हुई एवं उसी के कारण नीतिश कुमार ने वहां पर वापसी की। उन्होंने अपने पुराने दिन याद करते हुए कहा, 'उन्हें याद है कि जब वह राज्यपाल थे तो बिहार में सरकार के नुमाइंदों को शपथ दिलाने के लिए राज्यभवन के दरवाजे खोलकर कई दिनों तक बैठे रहे थे, लेकिन वहां शपथ ग्रहण करने के लिए कोई भी नुमाइंदा नहीं पहुंचा एवं बिना शपथ ग्रहण किए सरकार चलती रही, जिसके बाद उन्होंने राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजी। ऐसे हालातों देश भर के किसी भी राज्य में पैदा नहीं हुए। ऐसे में पंजाब से बिहार की तुलना दूर दूर तक सही नजर नहीं आती।' सुलग रहे काले धन के मुद्दे पर कांग्रेस का बचाव करते हुए श्री सिंह ने कहा, 'कौन कहता है कि केंद्र में कांग्रेस सरकार है, ध्यान से देखें, वहां कांग्रेस सरकार नहीं बल्कि यूपीए सरकार है, और ऐसे में अकेली कांग्रेस पर उंगली उठाना जायज नहीं।' उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, यह जरूरी नहीं कि विदेशों में पड़ा हुआ पैसा काला धन ही हो, इस की सीबीआई व अन्य जांच एजेंसियों से जांच करवानी चाहिए कि वह धन काला है या नहीं। उन्होंने कहा कि स्विस की बैंकों को विश्‍व बैंक से गोपनीयता कायम रखने के अधिकार प्राप्त हैं, ऐसे में वहां की बैंकें किसी भी व्यक्‍ति की जानकारी डिस्कलोज नहीं कर सकती, और जो जानकारी सरकार को मिली है, वह किसी व्यक्‍ति द्वारा लीक की हुई जानकारी है, जिसको किसी भी स्तर पर सही नहीं ठहराया जा सकता, इसलिए इस मामले में सरकार थोड़ी सी सर्तकता बरत रही है। एक अन्य सवाल का जवाब देते हुए बूटा सिंह ने कहा कि कांग्रेस का भविष्य उज्जवल है, क्‍योंकि कांग्रेस ही भारत में सबसे बड़ी पार्टी है, जबकि अन्य राजनीतिक पार्टियों का दायरा सीमित है। कुछ खत्म हो चुकी हैं एवं कुछेक राज्यों तक सीमित है। उन्होंने कहा कि अगर हिन्दुस्तान में संविधान को जीवंत रखना है तो केंद्र में एकल सरकार का आना जरूरी है, एवं यह कांग्रेस पार्टी के बिना कोई और कर नहीं सकता। इसके अलावा कांग्रेस पार्टी की अपनी विचारधारा है एवं कांग्रेस पार्टी आज भी उन्हीं सिद्धांतों पर अग्रसर है, जिनको स्वराज से पूर्व पार्टी संस्थापकों ने स्थापित किया था। इस मौके पर उनके साथ राजीव गांधी लोक भलाई मंच के चेयरमैन डॉक्‍टर सतपाल भटेजा, कांग्रेस प्रदेश कमेटी सचिव टहल सिंह संधू, सुखजीत सिंह नीना आदि उपस्थित थे।

संक्रांति है संस्कार-क्रांति

त्सव और त्योहार किसी भी देश और जाति के रहन-सहन, चरित्र, मूल्य, मान्यता, धर्म, दर्शन आदि का परिचय कराते हैं। कुछ त्योहार परमात्मा से, कुछ धर्मस्थापकों से, कुछ देवी-देवताओं से, कुछ विजय के अवसरों से और कुछ लोगों की मानवीय भावनाओं और कुछ प्रकृति के परोपकारों के प्रति कृतज्ञता भाव से जुड़े होते हैं। इन त्योहारों पर की जाने वाली सब प्रकार की पूजा, ध्यान, अनुष्ठान, पकवान, साज-सज्जा, सज-धज, राग-रंग के पीछे मूल उद्देश्य आत्मा का परमात्मा से मंगल मिलन कराना और आत्मा को ईश्‍वरीय विरासत से भरपूर करना ही होता है। त्योहार न हों तो जन-जीवन सूखा, बासी, रसहीन, सारहीन और उबाऊ हो जाए। लेकिन यह भी एक साथ तथ्य है कि विदेशी आक्रमणों, आपसी फूट, नैतिकता की उत्‍तरोत्‍तर गिरावट और धर्मग्रन्थों में क्षेपक और मिलावट हो जाने के कारण आज त्योहार विशुद्ध भौतिक आधार पर मनाए जाने लगे हैं। इसी कारण से समाज को वो लाभ नहीं दे पाते हैं जो कि ये दे सकते थे। अतः इनके विरुद्ध आध्यात्मिक अर्थ को समझकर उसमें टिकना हमारे लौकिक और पारलौकिक जीवन की उन्नति के लिए अति अनिवार्य, लाभकारी और मंगलकारी है। त्योहारों की कड़ी में, कड़ाके की सर्दी के बीच आता है मकर संक्रांन्ति का त्योहार जिसे सनातन धर्म के लोग बड़े उमंग के साथ मनाते हैं। भारत के विभिन्न राज्यों में इस त्योहार को भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है जैसे पंजाब में इसे 'लोहड़ी' कहा जाता है तथा गुजरात में इसे 'उत्‍तरायण' कहा जाता है। यह देसी मास के हिसाब से पौष महीने के अंतिम दिन तथा अंग्रेजी महीने की 12,13,14 जनवरी को आता है। इस समय सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में जाता है अर्थात् उत्‍तरायण होता है इसलिए इसे संक्रमण काल भी कहा जाता है। संक्रमण काल अर्थात्‌ एक दशा से दूसरी दशा में जाने का समय। वास्तव में, यह एक दिन मनाया जाने वाला संक्रमण काल उस महान संक्रमण काल की यादगार है जो कलियुग के अंत और सतयुग के आरंभ में घटता है। इस संक्रमण काल (संगमयुग) पर ज्ञान-सूर्य भगवान भी अपनी राशि बदलते हैं। वे परमधाम को छोडक़र साकार वतन में अवतरित होत हैं एक साधारण वृद्ध ब्राह्माण के तन में अर्थात्‌ प्रजापिता ब्रह्मा के तन में और कलियुगी मनुष्यों को पुराने संस्कार छोडक़र नए सतयुगी संस्कार धारण करने की श्रीमत देते हैं। उसी ईश्‍वरीय कर्त्‍ताव्‍य को एक दिवसीय यादगार बनाकर संक्रांति के रूप में याद किया जाता है, मनाया जाता है। संसार में आज तक अनेकों क्रांतियां हुई हैं। कभी सशस्त्र क्रांति, कभी हरित क्रांति, कभी श्‍वेत क्रांति आदि-आदि। हर क्रांति के पीछे उद्देश्य होता है, परिवर्तन। सशस्त्र क्रांति में हथियारों के बल पर परिवर्तन लाने की कोशिश की गई, आंशिक परिवर्तन हुआ, पूर्ण नहीं। हरित क्रांति द्वारा भूमि की हरियाली अर्थात् हरे-भरे खेतों ने मानव जीवन को खुशहाल बनाने की कोशिश की। श्‍वेत क्रांति द्वारा दूध तथा डेयरी उत्पादन ने लोगों को समृद्ध करने की कोशिश की। इन सबसे लाभा हुआ परंतु संपूर्ण लाभ और संपूर्ण परिवर्तन को आज भी मानव तरस रहा है। वह बाट जोह रहा है ऐसी क्रांत‍ि की जिसके द्वारा आमूल-चूल परिवर्तन हो जाए। कोई भी त्योहार परम्‍परागत नहीं है। भगवान कहते हैं सृष्टि के आदि काल अर्थात्‌ सतयुग तथा त्रेतायुग में दैवी मानव आज की तरह त्योहार नहीं मनाता था। वहां के देवी देवताओं के संस्कारों में, स्वभाव में हंसी, खुशी प्यार सम्‍मान, राग रंग इस प्रकार से रमे हुए थे कि वे 24 घंटे स्वाभाविक उमंग उल्लास और आनंद में रहते थे। ऐसा स्वभाव अथवा संस्कार उन्हें एक महान क्रञंति अर्थात्‌ संस्कार क्रञंति के फलस्वरूप मिला था। यह क्रांति आदि युग अर्थात् सतयुग से पहले के युग, संगमयुग में परमपिता परमात्मा शिव की अध्यक्षता में हुई थी। इस संस्कार क्रांति के फलस्वरूप, 100 फीसदी पवित्रता, दिव्यता, हर्षितमुखता, संतुष्टता, नम्रता, सत्यता के संस्कारों से विभूषित देवी देवताओं की हम आज भी मंदिरों में पूजा करते हैं और उन्हें अपना आदर्श मानते हैं। इस क्रञंति के बाद सृष्टि पर 2500 वर्षों तक कोई क्रांत‍ि नहीं हुई। लेकिन 2500 वर्षों के बाद दैवी सृष्टि का परिवर्तन, मानवीय सृष्टि के रूप में हो गया। मानव स्वाभाव पर शनैः शनैः काम क्रोध की धूल जमने लगी। उसे उतारने के लिए समय समय पर त्योहार व उत्सव आयोजित किए जाने लगे। संक्रांति‍ का त्योहार भी संगमयुग पर हुई उस महान क्रांति की यादगार में मनाया जाता है, लेकिन यादगार मनाने मात्र से मानव काम क्रोध के जमावड़ों की हटा न सका। हर वर्ष यह त्योहार मनाए जाने पर भी मानव हृदय की कल्मश में कोई कभी नहीं आई। इसीलिए कहा गया, दर्द बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की। क्‍योंकि आज यह त्योहार विशुद्ध भौतिक रूप धारण कर गया है और इस दिन किए जाने वाले अनुष्ठानों के आध्यात्मिक अर्थ को भुला दिया गया है। इससें संबंधित हर क्रिया कलाप, आडम्‍बरों से, बाह्यमुखता से और सथूलता से भर गए हैं। इस दिन संसकार परिवर्तन, संस्कार परिशोधन, संस्कार दिव्यीकरण जैसा न तो कोई कार्यक्रम होता है, न लोगां को जागृति दी जाती है और न हीं संस्कारों की महानता की तरफ किसी को आकर्षित किया जाता है। अब परमात्मा पिता पुनः अवतरित होकर, कल्प पूर्व के ईश्‍वरीय कर्त्‍तव्यों की यादगार के रूप में मनाए जाने वाले इस त्योहार के विभिन्न क्रिया कलापों का आध्यात्मिक अर्थ समझा रहे हैं।

स्नान : इस दिन लोग ब्रह्मामुहूर्त में उठकर अपने घर में स्नान करते हैं। कई लोग तीर्थों पर जाकर भी डुबकी लगाते हैं। यह जल स्नान वास्तव में ज्ञान स्नान की यादगार है। संक्रमण काल में ज्ञान सागर भगवान के दिए ज्ञान से अलसुबह ही स्वयं को भरपूर करने वाली आत्मा पुण्य की भागी अर्थात्‌ सतयुगी सृष्टि में उच्च पद की अधिकारी बनती है।

तिल खाना : इस दिन तिल भी खाते हैं और खिलाते भी हैं। तिल का दान भी करते हैं। जब किसी बहुत छोटी चीज के बारे में बताना हो तो उसकी तुलना तिल से करते हैं। सुक्ष्म चीज को स्पष्ट करने के लिए उसे तिल समान कहा जाता है। आत्मा भी अति सूक्ष्म है अतः तिल समान कही जाती है और उसका आकार भी बिल्कुल गोल न होकर तिल की तरह ओवल अंडकार सा होता है। अतः तिल आत्मा का प्रतीक है और तिल खाना अर्थात्‌ तिल स्वरूप बनना अर्थात्‌ तिल सी सूक्ष्म आत्मा के स्वरूप में टिकना।

पतंग उड़ाना : जब आत्मा हल्की हो जाती है तो पतंग की तरह उडऩे लगती है। पतंग की तुलना आत्मा से की जाती है क्‍योंकि देहभान वाला उड़ नहीं सकता, वह जमीन पर रहता है, पर आत्मा के भान वाला पतंग की तरह, अपनी डोर भगवान को अर्पण कर तीनों लोकों की सैर कर सकता है। अत : आत्म उड़ान का प्रतीक है पतंग उड़ान।

तिल के लड्‌डू : तिल अकेले, खाओ तो थोड़ी कड़वाहट आती है, परंतु मिठास के साथ उन्हें संग्रहित कर लड्‌डू बना दिया जाए तो खाने में स्वादिष्ट लगते हैं। इसी प्रकार अकेली आत्मा, अध्यात्म के मार्ग पर चले तो उसे अकेलापन, भारीपन आता है, परंतु जब आपसी प्यार रूपी मिठास से भरपूर संगठन मिल जाता है तो आगे बढ़ना सरल और सहज जाता है। अतः लड्डू एकता, मिठास तथा संगठन का प्रतीक है। एकता में ही बल है और सफलता है। मधुरता के साथ जब एक दूसरे के संबंध में आते हैं तो हम श्रेष्ठ बन जाते हैं।

तिल का दान : जैसे दीपदान होता है ऐसे ही तिलों का दान भी किया जाता है। दान से भाग्य बनता है, ग्रहण छूटता है, परंतु कई बार मनुष्य को दान देना भारी लगता है। धन का दान बड़ी बात नहीं है, परंतु बुराइयों का दान, काम क्रञेध का दान करना मुश्किल लगता है। इस मुश्किल को आसान करने का तरीका है कि जो भी कमजोरी है, उसे तिल समान समझकर दे दो, बड़ी बात नहीं समझो, छोडऩा पड़ेगा, देना पड़ेगा, ऐसे नहीं समझो, तिल के समान छोटी सी बात ही तो दान में देनी है, ऐसे समझो। खुशी खुशी छोटी सी बात समझकर दे दो। बड़ी बात को छोटा समझकर समाप्त करना ही तिल का दान करना है।

आग जलाना- इस दिन सामूहिक आग जलाई जाती है। इतिहास की दृष्टि से आग का बहुत महव है। प्राचीन काल में माचिस नही होती थी। घरों में आग का प्रयोग करने के पश्चात्‌ इस प्रकार दबा दिया जाता था कि वह जीवित रहे। सर्दियों में तो आग की आवश्यकता अधिक हो जाती थी। इसलिए गांव में संयुक्त रूप से ईधन इकट्ठा कर बड़ी आग जलाई जाती थी। इससे भ्रातृत्व भाव बना रहता था और उसी आग के चारों ओर बैठकर इक्‍ट्ठे खाने से स्नेह, सौहार्द भी निखर उठता था। आध्यात्मिक दृष्टि से आग या अग्रि शब्‍द का महव और भी अधिक है। अग्नि में डलने से कोई भी वस्तु पूरी तरह बदल जाती है। पुराने रूप का अंश भी नहीं बचता। सामूहिक आग वास्तव में सामूहिक योग-ज्वाला का प्रतीक है। जब योगीजन संगठित होकर एक ही संकल्प से ईश्‍वर की स्मृति में टिकते हैं तो उससे जो शक्ति आत्मा को मिलती है उससे पुराने संस्कार दग्ध हो जाते हैं, आत्मा आदि-अनादि रूप को पुनः प्राप्त कर लेती है। अतः अग्रि, परिवर्तन का प्रतीक है। पंजाब में इस त्योहार को 'लोहड़ी' नाम से मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि एक देवी थी जिसका नाम लोहई था। इस देवी ने एक जालिम दैत्य को जलाकर भस्म कर दिया था और लोगों को जलाकर भस्म कर दिया था और लोगों को उस के प्रकोप से बचा लिया था, तभी से लोग इसे 'लोहड़ी' नाम से पुकारते हैं। लोहड़ी शब्‍द का संबंध 'लौ' अर्थात्‌ प्रकाश से अधिक लगता है। ज्ञान प्रकाश फैलने से अज्ञान अंधकार मिट जाता है। कलयुग रूपी रात में ज्ञान की लौ प्रज्वलित कर संसार में फैले अज्ञान अंधकार को समाप्त कर सद्भगुण और ज्ञान के प्रकाश से भरपूर कर देने का प्रतीक है लोहड़ी का त्योहार। आइये, हम सभी इसे खाने, खिलाने भर का त्योहार न मानें बल्कि इसमें समाए आध्यात्मिक रहस्यों को आत्मसात् कर जीवन को महान बनाने का दृढ़ संकल्प लें।

प्रस्तुति :- बीके शिखा

सुंदर मुंदरीए को मिले गए दुल्ला भट्टी

सुंदर मुंदरीए हो, तेरा कौन बेचारा, ओ दुल्ला भट्टी वाला। यह लोहड़ी का लोकप्रिय गीत तो लोहड़ी के त्योहार के आस पास आम सुनाई पड़ता है, लेकिन पिछले कई दशकों से यह गीत केवल एक औपचारिकता मात्र बना हुआ था, क्‍योंकि सुंदर मुंदरियां तो हर वर्ष पैदा होती रहीं, लेकिन उनकी कदर करने वाला दुल्ला भट्‌टी किसी मां की कोख से नहीं जन्मा। किसी ने सच ही कहा कि आखिर बारह वर्ष बाद तो रूढ़ी की भी सुन ली जाती है, यह तो फिर भी कन्याएं हैं, इनकी तो सुनी जानी जायज थी। दुल्ले भट्टी की मृत्यु के दशकों बाद ही सही, लेकिन इन सुंदर मुंदरियों को दुल्ले भट्टी जैसे महान लोग मिलने शुरू हो गए। लड़कों की लोहड़ी, नव विवाहित जोड़ों की लोहड़ी तो पंजाब में हर लोहड़ी के दिन मनाई जाती है, लेकिन दुल्ले भट्टी के बाद लड़कियों की लोहड़ी मनाने का रुझान मर गया, क्‍योंकि लड़कियों को लड़कों से कम आंका जाने लगा, जबकि गुरूओं पीरों ने इनकी कोख से जन्म लिया एवं उन गुरूओं पीरों ने भी औरत को पूजनीय तक बताया, मगर समाज ने समाज को चलाने वाली कन्या को ही भुला दिया। समय ने करवट बदली, आज से करीब चार पांच साल पहले बठिंडा की समाज सेवी संस्था सुरक्षा हेल्पर रजि. बठिंडा के चेयरमैन शाम कुमार शर्मा ने लोहड़ी को एक अलहदा ढंग से मनाने का फैसला लिया, उस फैसले ने लोहड़ी धीयां दी उत्सव को जन्म दिया, और इस संस्था की ओर से हर साल लोहड़ी धीयां दी उत्सव मनाना शुरू क्‍या किया गया कि शहर की आबोहवा बदलने लगी, आज आलम यह है कि लोग लड़कों की लोहड़ी कम व लड़कियों की लोहड़ी सामूहिक तौर पर द्गयादा मनाने लगे हैं। साल 2010, 9 जनवरी को स्थानीय बहमन दीवाना रोड़ स्थित गुडविल पलिक स्कूल के प्रांगण में सुरक्षा हेल्पर, बठिंडा विकास मंच व गुडविल सोसायटी की ओर से एक लोहड़ी धीयां दी पांचवां लोहड़ी उत्सव मनाया गया। इस समारोह में करीब 150 के करीब कन्याओं को उपहार देकर सम्मानित किया गया एवं उनकी सामूहिक लोहड़ी बड़ी हर्षेल्लास के साथ मनाई। यह समारोह तो केवल एक शुरूआत थी, इसके बाद महानगर में अन्य संस्थाओं ने भी लोहड़ी धीयां दी मनाने के लिए बीड़ा उठा लिया। बठिंडा महानगर में एक छोटी सी संस्था के द्वारा शुरू किए इस प्रयत्न ने बहुत जल्द अपना असर दिखाया और लोगों में लड़की के प्रति भी सम्मान पैदा किया। इतना ही नहीं, गत दिवस गांव नथाना में पहुंची सांसद बीबी हरसिमरत कौर बादल ने भी समाज से अपील की कि लड़कियों की लोहड़ी मनाने वाले लोगों को उत्साहित करें एवं वहीं लड़कियों की पहली लोहड़ी मनाने वाले दम्पतियों को सम्मानित किया जाए। श्रीमति बादल की इस अपील से कयास लगाया जा सकता है कि लोहड़ी धीयां दी किस तरह समाज का हिस्सा बनती जा रही है। लड़कियों की लोहड़ी मनाने की कड़ी को आगे बढ़ाते हुए मालवा हेरिटेज फाउंडेशन की ओर से स्थानीय खेल परिसर के समीप स्थित बनावटी गांव जयपालगढ़ में 105 कन्याओं की लोहड़ी बड़ी धूमधाम से मनाई गई। वहीं दूसरी तरह नवयुग स्पोर्ट्स कल्चर एंड वेलफेयर सोसायटी बठिंडा की ओर से 13 जनवरी को जीटी रोड़ स्थित समरहिल कान्वेंट स्कूल में 31 कन्याओं की लोहड़ी मनाई जा रही है। इस तरह के प्रयत्न यहां लड़कियों को समाज में बनता सम्मान दिलाने के लिए कारगार सिद्ध होंगे, वहीं दूसरी तरफ कन्या भ्रूण हत्या व दहेज जैसी सामाजिक बुराईयों को भी खत्म करेंगे। सुरक्षा हेल्पर की ओर से जो कदम कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए उठाया गया था, वह आज सार्थक सिद्ध हो रहा है। ऐसे में सुरक्षा हेल्पर के लिए यह पंक्‍ित कहना कोई गलत बात न होगी कि मैं तो अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर लोग मिलते गए और कारवां बनता गया।

लोहड़ी उत्सव 'लोहड़ी धीयां दी' छोड़ गया अमिट छाप



कन्या भ्रूण हत्या को रोकने का प्रयास था 'लोहड़ी धीयां दी' : शर्मा
बठिंडा । सुरक्षा हैल्पर 'रजि.', बठिंडा विकास मंच, गुडविल सोसायटी बठिंडा ने शहर की अन्य समाज सेवी संस्थाओं के साथ मिलकर लोगों को कन्या भ्रूण के नुक्‍सान प्रति जागरूक करने के लिए गत रविवार को यहां गुडविल पलिक हाई स्कूल परस राम बठिंडा में लोहड़ी धीयां दी नामक लोहड़ी उत्सव का आयोजन किया। यह आयोजन रविवार सुबह 11 बजे से दोपहर दो बजे तक चला। कार्यक्रम में सुरक्षा हैल्पर के चेयरमैन व टरूथ वे टाइम्स के संपादक शाम कुमार शर्मा व बठिंडा विकास मंच के अध्यक्ष राकेश नरूला ने बताया कि कार्यक्रम में एक वर्ष से कम आयु की सौ के लगभग परिवारों की बच्चियों को तोहफे दिए गए। इस अवसर पर मुख्यातिथि नेशनल अवार्डी अनिल सर्राफ ने कहा कि हम लोग भ्रूण हत्या रोकने की बात तो करते हैं परन्तु उस पर खुद अमल करने से कतराते हैं। अगर सही तरीके से हमें भ्रूण हत्या रोकनी है तो महिलाओं को आगे आना होगा। इसके लिए त्याग की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अगर आज किसी बहन के भाई नहीं तो उसकी शादी में कई रूकावटें पैदा होती हैं ऐसा यों? रूकावटें खड़ी करने वाली भी हमारी माताएं व बहनें ही हैं। यह पाप भी भ्रूण हत्या से कम नहीं। दहेज लेना भी भ्रूण हत्या को बढ़ावा देना है। समाजसेवी पवन सिंगला ने कहा कि अगर हमने भ्रूण हत्या रोकनी है तो कन्यायों को समाज में लड़के से बढ़कर सम्मान देना होगा। उसे शिक्षित करना होगा ताकि शादी के बाद अगर जरूरत पड़े तो वह अपना परिवार चला सके या अपने परिवार को सहारा दे सकें। 

इस मौके पर एक सवाल का जवाब देते हुए टरूथ वे टाइम्स के संपादक व सुरक्षा हेल्पर के चेयरमैन शाम कुमार शर्मा ने बताया कि आज से करीबन पांच साल पूर्व कन्या भ्रूण हत्या होने के कारण पंजाब भर में लिंग अनुपात अंतर बढ़ता जा रहा था, आए दिन अखबारों की सुर्खियों में लिंग अनुपात के अंतर संबंधी खबरें पढ़ने के बाद कन्या भ्रूण हत्या के विरोध में कदम उठाने का विचार मन में उपजा और इस विचार की उपज थी लोहड़ी धीयां दी। इस समारोह में सेवानिवृत अधीक्षक अभियंता आर सी लूथरा, योग शिक्षक राधे श्याम, बाबा हरी हर, गुडविल के पी के बांसल, इन्द्रजीत गुप्ता, भाविप के प्रो. गुप्ता, प्रिंसीपल एन के गोसांईं, आसरा वेल्फेयर सोसायटी के संस्थापक रमेश मेहता, जसपा के सुरव्श गोयल, भाजपा के नवीन सिंगला एडवोकेट , बठिंडा विकास मंच के नवनीत सिंगला , विनोद गुप्ता , रमेश सरडाना आईसी -स्पाईसी होटल वाले, अशोक कुमार धुन्‍नीके वाले , गुरमीत सिंह सिधू , पूर्व पार्षद विजय शर्मा , स्कूल की प्रिंसीपल शिमला सिंगला , सभ्याचारिक कार्यक्रम प्रभारी श्रीमति राजवीर कौर, स्कूल स्टाफ व अनरू लोग उपस्थित थे। स्कूल के प्रांगण में लोहड़ी डाली गई व आए अतिथियों व परिवारों के लिये जलपान का प्रबंध भी किया गया।