सावधान! गैस गीजर बन सकता है मौत का कारण


गैस गीजर ले चुका है कई लोगों की जिन्दगी : पठानियां
एनडब्‍ल्यूएस ने की लोगों को सतर्क रहने की अपील

बठिंडा। सर्दीयों के मौसम में ठंड से बचने के लिए लोगों द्वारा गर्म पानी के इस्तेमाल हेतु बाथरूम में लगे गैस गीजरों व कोयले वाली अंगीठियों का प्रयोग घरों में आम ही किया जाता है। इन दिनों में हमारी छोटी सी लापरवाही किसी बड़ी घरेलू घटना को अंजाम दे सकती है। घरों में बाथरूम में लगे गैस गीजर या सर्दियों दौरान प्रयोग की जाने वाली कोयले की अंगीठियाँ लोगों की लापरवाही तथा अज्ञानता के कारण मौत का सामान बन सकती है। इनकी इस्तेमाल संबंधी विशेष् तौर पर सावधान रहने की जरूरत है। पिछले सालों के दौरान कई लोग बाथरूम में नहाते समय बाथरूम में लगे गैस गीजरों की जहरीली गैस चढ़ने के कारण मौत के मुँह में चले गये या चलती फिरती जिन्दा लाश में तदील हो गए। यह खलासा सेंट जॉन के ट्रेनिंग सुपरवाईजर नरेश पठानिया ने समाजसेवी संस्था नौजवान वेलफेयर सोसाईटी के वालंटिरयों को जानकारी देते हुए किया। उन्होंने आगे बताया कि बंद बाथरूमों में नहाने के लिये गर्म पानी इस्तेमाल हेतु जब इन गैस गीजरों का प्रयोग कर रहें होतें हैं तो इन गैस गीजरों के बर्नरों से पैदा हो रही आग के कारण आसीजन की खपत होती है तथा कार्बन डाईआक्‍साईड की मात्रा बढ़ जाती है। तंग जगह वाले बाथरूम जिनमें ताजी हवा आने जाने के प्रबंध न हो तो वहाँ जहरीली गैस कार्बन मोनोआक्‍साईड गैस पैदा होती है। कार्बन मोनोआक्‍साईड एक रंगहीन तथा गंदहीन गैस होने के साथ बेहद जहरीली गैस है, जो इंसान के लिये मौत का कारण बन सकती है। यह जहरीली गैस खून के अंदर आसीजन को पहुँचाने की समर्था को घटाती है और शरीर के अंदर विभिन्ना अंग आसीजन की कमी के कारण प्रभावित होतें हैं। दिल तथा दिमाग को जरूरत के अनुसार आसीजन न मिलने के कारण व्यक्ति अर्द्ध या गहरी बेहोशी (कोमा) में चला जाता है और अगर देर हो जाए तो व्यक्ति की मौत तक हो सकती है। इस गैस के चढ़ने से व्यक्ति में कमजोरी, थकावट, सिर दर्द, धुंधला दिखना, चक्कर आना, दिमागी असंतुलन, छाती में दर्द, घबराहट होना, लड प्रैशर कम होना, सांस उखड़ना व उल्टी आदि लक्ष्ण पैदा होतें हैं। व्यक्ति बेहोश होकर गिर पड़ता है व सांस प्रणाली बंद हो जाने से मौत भी हो सकती है। श्री पठानिया ने बताया कि इस घरव्लू घटना का दुखदायी पहलू यह भी है कि परिवार के दूसरे सदस्यों को इस घटना का बड़ी देर के बाद पता चलता है योंकि पीड़ित धीरे धीरे बेहोशी की हालत में चला जाता है और अपनी बिगड़ती हालत के बारे में किसी को बता भी नहीं पाता। पीड़ित को परिवारिक सदस्यों द्वारा बाथरूम के दरवाजे तोड़ कर बाहर निकालना पड़ता है। इसके इलावा उन्होने बताया कि सर्दी से बचने के लिये कई बार लोग बंद कमरों के अंदर अंगीठी लगा कर सो भी जातें हैं। इसके प्रति भी हमारी अज्ञानता तथा लापरवाही मौत का कारण बन सकती है। नरेश पठानिया ने नौजवान वेलफेयर सोसाईटी के वालंटियरों को अपील की, कि इन दिनों गैस गीजरों तथा अंगीठियों से होने वाले इन घरव्लु हादसों के बचाव हेतु लोगों को जागरूक करवें ताकि किमती जानें बचाई जा सके। उन्होने वालंटियरों को ऐसी दुर्घटना घटित हो जाने के मौके पर दी जाने वाली प्राथमिक सहायता और सावधानियों के संबंध में बताया कि गैस गीजरों पर दी गई हिदायतों की पालना करवें। अगर गीजर को बाहर ही लगाया जाये तो बेहतर है। अगर गीजर बाथरूम के अंदर लगा है तो ताजी हवा के आने जाने का रास्ता आवश्य हो या आगजास्ट फैन लगा हो। बाथरूम में नहाने गये परिवारिक सदस्य के प्रति सचेत रहें। जहरीली गैस चढ़ने पर पीड़ित को तुरंत खुली जगह पर ले जाओ। गैस खुद को न चढ़े इसलिये अपना मुँह ढक कर अंदर जायें। बेहोशी की हालत में पीड़ित को टेड़ा कर दो ताकि उल्टी वगैराह अंदर जा कर सांस नली में रूकावट पैदा न करें। हर दस मिनट बाद सांस चैक करतें रहें तथा पीड़ित को शांत व गर्म रखे। बेहोश व्यक्ति के मुँह में कोई भी तरल पदार्थ पानी आदि न दें। जल्दी ही ऐम्बुलैंस का प्रबंध करके पीड़ित को नजदीकी अस्पताल में ले जायें। वेंटीलेटर की सहायता से आसीजन देने की जरूरत पड़ सकती है। बच्चों में बड़ों की अपेक्षा खतरा और अधिक होता है, इसलिये नहाते समय उनपर विशेष् ध्यान देने की जरूरत होती है। नौजवान वैल्फेयर सोसाईटी के अध्यक्ष सोनू माहेश्वरी ने लोगों से अपील की, कि सर्दियों के दिनों में बंद कमरों के अंदर कोयले वाली अंगीठियां, स्टोप, हीटर आदि का इस्तेमाल ने करें। उन्होंने नरेश पठानिया को आभार प्रकट करते हुए भरोसा दिलाया कि संस्था की ओर से द्गयादा से ज्‍यादा लोगों को ऐसे हादसों के प्रति जागरूक किया जायेगा।

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बहुत बहुत शुक्रिया...

गत दिवस मेरा जन्मदिवस था, मुझे बेहद खुशी हुई कि मेरे जन्मदिवस पर इस बार भी मुझे ब्‍लॉग जगत से जन्मदिवस की ढेर सारी शुभकामनाएं मिली। मुझे नहीं लगता था कि ऐसा होगा, क्‍योंकि पिछले लम्‍बे समय से मैंने ब्‍लॉग जगत से दूरी जो बना ली थी। मेरे जन्मदिवस की खुशी को दुगुना करने के लिए मैं ब्‍लॉग जगत का सदैव ऋणि रहूंगा, खास जन्मदिन डॉट ब्‍लॉगस्पॉट डॉट कॉम का व बीएस पाबला जी का।

मैंने ब्‍लॉग से दूरी क्‍यों की....
ऐसा नहीं कि ब्‍लॉग जगत से मन ऊब गया था, ऐसा भी नहीं कि मैं लिखना नहीं चाहता, बस जिन्दगी केञ् कुञ्छ ड्डेञ्रबदल ऐसे होते हैं, जो कुञ्छ चीजों से अचानक दूरी बनाने पर बाध्य कर देते हैं, लेकिन दूरी से कोई रिश्ता खत्म नहीं होता, विछोह तो मिलन की ललक को ज्यादा बढ़ाता है। ब्‍लॉग जगत से एक बार फिर पहले जैसे जुडऩे की कोशिश में हूं, और उम्‍मीद है कि ब्‍लॉग में एक बार फिर से अपना योगदान अदा करूंगा।

चलते चलते....
लेखिका अरुंधित रॉय, जिनके नाम के आगे अब विवादित शब्‍द जुड़ चुका है, से निवेदन है कि जो आप कहती हैं, उससे देश का कितना भला होने वाला है, और कितना नुकसान, इस बात को ध्यान में रखकर कहें तो बेहतर होगा। ध्यान रहे कि हिन्दुस्तान की जनता कम, यहां राजनैतिक रोटियां सेकने वाले आपके बयानों को बड़ी गौर से सुनते हैं, क्‍योंकि हिन्दुस्तान की जनता के पास अपने पुराने जख्‍मों पर मरहम लगाने व रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने से फूर्सत नहीं। भारत के न्यूज चैनलों, अखबारों के लिए अरुंधति रॉय का बयान पहली खबर है, लेकिन किसी गरीब के लिए मौत का कारण बन सकता है, क्‍योंकि पता नहीं, आपके बयान से दुखी राजनैतिक पार्टियों के कार्यकर्ता कब सडक़ों पर उतर आए और शहर को बंद करने के चक्कर में कितने गरीबों की जिन्दगी तबाह कर दें। जब जब देश में दंगा फसाद हुआ है, तब तब आम जन ही मरा है। अगर सच में आप हिन्दुस्तानी जनता की हितैषी हैं तो कृपया बयानों की पहले समीक्षा करें, फिर दें। हिन्दुस्तान में हाथी निकल जाता है, लेकिन कभी कभी पूंछ फंस जाती है। इस देश में छोटी छोटी बातों पर बड़े बड़े हादसे होते हैं, लेकिन कभी कभी बड़ी बातों को भी तवज्जों नहीं देता। हिन्‍दस्‍तान का भला करना है तो उसके लिए संस्‍थान खोला जा सकता है, जिसमें आप नई सोच को पैदा कर सकें, ऐसे खुले आम भाषण देकर एक सोच नहीं, देश में टकराव पैदा होगा, जिससे देश में तनाव बढेगा, जिससा का खमियाजा भुगतेगा आम गरीब जन।

..खिड़की, बंद मत करना!

आध्यत्मिक लोग दुनिया को सराय कहते हैं, और विचारक इसको रंगमंच। दोनों ही अपने जगह बिल्कुल सही हैं, क्योंकि दोनों का अपना अपना नजरिया है। कारोबारी लोग इसको रिले ट्रेक भी कहते हैं, और कुछ बाजार भी। अगर खुले दिमाग से सोचा जाए, तो सब के सब सही नजर आएं, और वो हैं भी। एक बगीचे में तीन लोग सैर के लिए गए। जब वो बाहर आ रहे थे तो बगीचे के प्रवेश द्वार पर खड़े कर्मचारी ने एक एक से पूछा, आप ने बगीचे में क्या क्या देखा? सब ने उसको बताया, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि उन तीनों ने जो देखा, वो अलग अलग था, जबकि वो गए तो एक साथ ही थे। साहित्यकार की निगाह वहां खिले रहे पड़े पौधों पर गई, उद्यमी की निगाह इसको और बेहतर कैसे बनाए जाए पर गई और जबकि तीसरे व्यक्ति की निगाह वहां की निकम्मे प्रबंधन पर गई। जैसे हाथ की उंगली एक जैसी नहीं हो सकती, वैसे ही व्यक्तियों की सोच का एक होना मुश्किल है। एक आम बात जो हम सबके साथ घटित होती है। आप कुछ नया करने की सोच रहे हैं, उदाहरण के तौर पर कारोबार ही। जैसे आप इस बात को किसी के सामने रखोगे, वो पहले ही कह देगा मत करना, बहुत मुश्किल है। सामने वाले की पहली प्रतिक्रिया कुछ ऐसी ही होगी, सचमुच। अगर आप उससे पूछेंगे कि आसान क्या है, वो बता, तो उसके पास जवाब नहीं होगा, जबकि ज्यादातर लोग पूछते ही नहीं पलटकर। जो व्यक्ति कहता है, तुम यह मत करो, जोखिम है, उसको न तो खुद पर भरोसा है और न आप पर। वो असफलता से डरा हुआ है, जबकि असफलता नामक कोई चीज दुनिया में नहीं, जो लोग आज सफल हैं, और सफलता की शिखर की तरफ बढ़ रहे हैं, वो लोगों की परवाह नहीं करते, क्योंकि उनकी निगाह लक्ष्य पर है, न कि सड़क किनारे पड़े पत्थर पर। आप देखा होगा, जब कोई व्यक्ति नया नया साईकिल चलाना सीखता है, तो उसका साइकिल पूरी सड़क छोड़कर एक सड़क किनारे पड़े छोटे से पत्थर से जा टकराता है। पता है क्योंकि उसका ध्यान उस छोटे से पत्थर पर था, न कि दस फुट चौड़ी सड़क पर। वो व्यक्ति साइकिल सीखते समय कई दफा गिरता है, लेकिन साईकिल चलाना बंद नहीं करता, क्योंकि तब उसके जेहन में असफलता नहीं अनुभव घुसा होता है। तब तक आपको कोई नहीं असफल कर सकता जब तक आप असफलता को अनुभव मानते हैं, जो एडिशन ने बल्ब बनाने के बाद कहा था, जब एडिशन से पूछा गया कि आप दस हजार बार असफल हुए, आपको कैसा लगता है, तो एडिशन का जवाब था, मैं कभी असफल नहीं हुआ, वो तो मेरे अनुभव थे, जिसके द्वारा मुझे पता चला कि इन दस हजार तरीकों से कभी भी बल्ब ईजाद नहीं किया जा सकता। इसलिए अगर सफलता की चोटी को चुंबन देना है, तो मुकाबला खुद से करना सीखो। जो कल किया है, आज उससे बेहतर करना सीखो। अगर दिल कभी हौसला हारने लगे तो बेसबॉल के उस खिलाड़ी की तरफ एक बार देख लेना, जो दस में से छह गेंदों को केवल टच कर पाता है। एक बार एक लड़का बेसबॉल का अभ्यास कर रहा था, उसने गेंद को अपने हाथों से कई दफा उछाला और खुद के बल्ले से ही टच करने की कोशिश की, वो गेंद को टच करने में विफल रहा। वो हताश होकर बैठा, जब उसने शांत दिमाग से सोचा कि आखिर गेंद किसने उछाली थी? जवाब भीतर से मिला मैंने ही, तो उसके कहा कि अगर अच्छा शॉट नहीं लगा सकता, अच्छी गेंद तो फेंक सकता हूं। ऐसी हजारों उदाहरण हैं, जो हम को बताती हैं कि लकीर का फकीर बनने बेहतर है, अपने सही हुनर को पहचानो। हिन्दी फिल्म जगत के जाने माने फिल्म निर्माता निर्देशक सुभाष घई मुम्बई में हीरो बनने गया था, लेकिन किस्मत ने कहा, तुम हीरो खुद तो नहीं बन सकते, लेकिन हीरो ईजाद कर सकते हो। सुभाष घई ने हिन्दी फिल्म जगत को ऐसे चेहरे दिए, जो कई दशकों तक फिल्म जगत पर राज करते रहे। इसलिए कहता हूँ, दोस्तो सूर्य निकलते हैं, बस सोच घर की खिड़की बंद मत करना।

शहीदे आजम व उसकी छवि

जब दिल्ली में बैठे हुक्मरान कहते हैं कि शहीदे आजम भगत सिंह हिंसक सोच के व्यक्ति थे, तो भगत सिंह को चाहने वाले, उनको आदर्श मानने वाले लोग दिल्ली के शासकों कोसने लगते हैं, लेकिन क्या यह सत्य नहीं कि शहीदेआजम की छवि को उनके चाहने वाले ही बिगाड़ रहे हैं।

अभी कल की ही बात है, एक स्कूटर की स्पिटनी वाली जगह पर लगे एक टूल बॉक्स पर भगत सिंह की तस्वीर देखी, जो भगत सिंह के हिंसक होने का सबूत दे रही थी। यह तस्वीर हिन्दी फिल्म अभिनेता सन्नी दिओल के माफिक हाथ में पिस्टल थामे भगत सिंह को प्रदर्शित कर रही थी। इस तस्वीर में भगत सिंह को निशाना साधते हुए दिखाया गया, जबकि इससे पहले शहर में ऐसी तमाम तस्वीरें आपने देखी होंगी, जिसमें भगत सिंह एक अधखुले दरवाजे में पिस्टल लिए खड़ा है, जो शहीदे आजम की उदारवादी सोच पर सवालिया निशान लगती है। जब महात्मा गांधी जैसी शख्सियत भगत सिंह जैसे देश भगत पर उंगली उठाती है तो कुछ सामाजिक तत्व हिंसक हो उठते हैं, तलवारें खींच लेते हैं, लेकिन उनकी निगाह में यह तस्वीर क्यों नहीं आती, जो भगत सिंह की छवि को उग्र साबित करने के लिए शहर में आम वाहनों पर लगी देखी जा सकती हैं।

यहां तक मुझे याद है, या मेरा अल्प ज्ञान कहता है, शायद भगत सिंह ने अपने साथियों के साथ मिलकर केवल सांडरस को उड़ाया था, वो भी शहीद लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए, इसके अलावा किसी और हत्याकांड में भगत सिंह का नाम नहीं आया। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर फिर भगत सिंह की ऐसी ही छवि क्यों बनाई जा रही है, जो नौजवानों को हिंसक रास्ते की ओर चलने का इशारा कर रही हो। ऐसी तस्वीरें क्यों नहीं बाजार में उतारी जाती, जिसमें भगत सिंह को कोई किताब पढ़ते हुए दिखाया जाए। उसको एक लक्ष्य को हासिल करने वाले उस नौजवान के रूप में पेश किया जाए, जो अपने देश को गोरों से मुक्त करवाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा चुका है। भगत सिंह ने हिंसक एक बार की थी, लेकिन उसका ज्यादातर जीवन किताबें पढ़ने में गुजरा है। भगत सिंह किताबें पढ़ने का इतना बड़ा दीवाना था कि वो किताब यहां देखता वहीं से किताब कुछ समय के लिए पढ़ने हेतु ले जाता था। जब भगत सिंह को फांसी लगने वाली थी, तब भी वो किसी रूसी लेखक की किताब पढ़ने में व्यस्त थे, भगत सिंह की जीवनी लिखने वाले ज्यादातर लेखकों का यही कहना है।

फिर भी न जाने क्यों पंजाब में भगत सिंह की उग्र व हिंसक सोच वाली तस्वीरों को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। पंजाब अपने बहादुर सूरवीरों व मेहमाननिवाजी के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है, लेकिन कुछ कथित उग्र सोच के लोगों के कारण पंजाब की साफ सुथरी छवि को ठेस लगी है, हैरत की बात तो यह कि बाहरी दुश्मनों को छठी का दूध याद करवाने वाला पंजाब अपने ही मुल्क में ब्लैकलिस्टड है, जिसके बारे में यहां के गृहमंत्री को भी पता नहीं।

हमारी राज्य सरकार, पानी की रॉल्यटी को लेकर पड़ोसी राज्यों से तू तू मैं मैं कर रही है, लेकिन वो भी उस पानी के लिए जो कुदरत की देन है, जिसमें पंजाब सरकार का कुछ भी योगदान नहीं, ताकि आने वाले चुनावों में लोगों को एक बार फिर से मूर्ख बनाया जाए कि हमारा पानी के मुद्दे पर संघर्ष जारी है। यह सरकार पंजाब को खुशहाल, बेरोजगारी व भुखमरी मुक्त राज्य क्यों नहीं बनाने की तरफ ध्यान दे रही, कल तक बिहार को सबसे निकम्मा राज्य गिना जाता था, लेकिन वहां हो रहा विकास बिहार की छवि को राष्ट्रीय स्तर पर सुधार रहा है, मगर पंजाब सरकार राज्य पर लगे ब्लैकलिस्टड के धब्बे को हटाने के लिए यत्न नहीं कर रही, यह धब्बा भगत सिंह पर लगे हिंसक सोच के व्यक्तित्व के धब्बे जैसा है, जिसको सुधारना हमारे बस में है। जितना क्रांतिकारी साहित्य भगत सिंह ने पढ़ा था, उतने के बारे में तो उनके प्रशंसकों ने सुना भी नहीं होगा। शर्म से सिर झुक जाता है, जब भगत सिंह की हिंसक तस्वीर देखता हूं, जिसमें उसके हाथ में पिस्टल थमाया होता है। चित्रकारों व अन्य ग्राफिक की दुनिया से जुड़े लोगों से निवेदन है कि भगत सिंह की उस तस्वीर की समीक्षा कर देखे व उस तस्वीर को गौर से देखें, जिसमें वो लाहौर जेल के प्रांगण में एक खटिया पर बैठा है, एक सादे कपड़ों में बैठे हवलदार को कुछ बता रहा है, क्या उसके चेहरे पर कहीं हिंसा का नामोनिशान नजर आता है। अगर भगत सिंह हिंसक सोच का होता तो दिल्ली की असंबली में बम्ब फेंककर वो धुआं नहीं फैलाता, बल्कि लाशों के ढेर लगाता, लेकिन भगत सिंह का एक ही मकसद था, देश की आजादी, सोए हुए लोगों को जगाना, लेकिन मुझे लगता है कि सोए हुए लोगों को जगाना समझ में आता है, लेकिन उन लोगों को जगाना मुश्किल है, जो सोने का बहाना कर रहे हैं, उस कबूतर की तरह जो बिल्ली को देखकर आंखें बंद कर लेते है, और सोचता है कि बिल्ली चली गई।
भगत सिंह जैसे शहीदों ने देश को गोरों से तो आजाद करवा दिया, लेकिन गुलाम होने की फिदरत से आजाद नहीं करवा सके। भगत सिंह जैसे सूरवीरों ने अपनी कुर्बानी राष्ट्र के लिए दी, ना कि किसी क्षेत्र, भाषा व एक विशेष वर्ग के लिए, लेकिन सीमित सोच के लोग, उनको अपना कहकर उनका दायरा सीमित कर देते हैं, जबकि भगत सिंह जैसे लोग यूनीवर्सल होते हैं। भगत सिंह की बिगड़ती छवि को बचाने के लिए वो संस्थाएं आगे आएं, जो भगत सिंह पर होने वाली टिप्पणी को लेकर मारने काटने पर उतारू हो जाती हैं।

बेशकीमती गाड़ियां व प्रेस लेबल

शहर में बहुसंख्या में घूम रही हैं बेशकीमती गाड़ियां, जिन पर लिखा है प्रेस। हैरत की बात तो यह है कि संवाददाता वर्ग खुद भी असमंजस में है कि आखिर इतनी बेशकीमती गाड़ियां आखिर किस मीडिया ग्रुप की हैं। शीशों पर आल इंडिया परमिट की तरह प्रेस का लेबल चस्पाकर घूमने वाली गाड़ियां, मीडिया में काम करने वालों के लिए कई सालों से अनसुलझी पहेली की तरह हैं। जी हां, शहर में घूम रही हैं ऐसी दर्जनों बेशकीमती गाड़ियां, जिन पर लिखा है प्रेस, और कोई नहीं जानता प्रेस का लेबल लगा घूम रही इन बेशकीमती गाड़ियों के काले शीशों के उस पार आखिर है कौन। यह कौन पिछले कई सालों से मीडिया कर्मियों के लिए गणित का सवाल बन चुका है।

सूत्र बताते हैं कि मीडिया जगत तो इस लिए स्तम्ब है, क्योंकि मीडिया कर्मी अच्छी तरह जानते हैं, बठिंडा के इक्का दुक्का मीडियाकर्मियों को छोड़कर बठिंडा के किसी भी मीडिया कर्मी के पास ऐसे वाहन नहीं, जिनकी कीमत सात आठ लाख के आंकड़ों को पार करती हो। इस तरह कुछ अज्ञात लोगों का प्रेस लेवल लगाकर घूमना, शहर वासियों के लिए भी किसी मुसीबत का कारण बन सकता है, क्योंकि ट्रैफिक पुलिस कर्मी गाड़ी पर प्रेस लिखा देकर वाहन को बेलगाम घूमने की आजादी दे देते हैं। डर कहीं यही आजादी, किसी दिन मुसीबत न बन जाए। याद रहे कि काफी महीने पहले दिल्ली के समीप पुलिस ने एक आतंकवादियों को जानकारी मुहैया करवाने वाले व्यक्ति को गिरफ्तार किया था, जो खुद को संवाददाता बताकर शहर में संवेदनशील इलाकों में बड़े आराम से आ जा सकता है।

अगर ऐसा दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में हो सकता है तो बठिंडे जैसे महानगर में क्यों नहीं, क्या हम सांप निकलने के बाद लकीर को पीटने की आदत त्याग के लिए तैयार नहीं। क्या हम उठते हुए धूएं को देखकर कुछ नहीं करना चाहते, जब तक वो भयानक आग में न तब्दील हो जाए। पिछले दिनों स्थानीय एक मल्टीप्लेक्स में पहुंचे फिल्म अभिनेता जिम्मी शेरगिल ने कहा था कि पायरेसी से एकत्र होने वाला पैसा आतंकवाद को जाता है, क्या प्रेस का लेबल रेवड़ियों की तरह बांटना किसी पायरेसी से कम है। क्या पता कोई प्रेस का लेबल लगाकर काले शीशों के पीछे कुछ काले कारनामों की संरचना कर रहा हो। काला धन हमेशा काले कारोबार में इस्तेमाल होता है, और काले धन ही किसी भी देश के विनाश के लिए कारण बनता है।

आज से कुछ साल पहले तत्कालीन डीआईजी ने प्रेस वालों से उनके वाहनों के नम्बर मांगे थे। मीडिया कर्मियों ने बड़े उत्साह के साथ अपने वाहनों के नम्बर उक्त विभाग को लिखकर भेजे थे, शायद तब भी मीडिया कर्मी इस समस्या को लेकर चिंतित थे। लेकिन वो योजना पूरी तरह लागू न हो सकी, कुछ मीडिया कर्मियों की बजाय से। मीडिया कर्मियों की ओर से भेजी गई सूचियों को देखने के बाद यकीनन तत्कालीन शीर्ष पदस्थ पुलिस अधिकारी हैरत में एक बार तो जरूर पड़ा होगा, यह देखकर कि जो सूची आई है, उस में ज्यादातर वाहन दो पहिया है, और उनकी गाड़ी के आगे से गुजरने वाली गाड़ियां तो बेशकीमती होती हैं, जिन पर लिखा होता है प्रेस।

इसमें भी कोई दो राय नहीं, मीडिया में काम करने वाले कुछ लोगों ने अपने रिश्तेदारों को भी प्रेस लिखवाकर घूमने का परमिट दे रखा है। कुछ ऐसे ही मीडिया कर्मी मीडिया के बुद्धजीवियों के लिए समस्या बने हुए हैं। भले ही उनकी मात्रा मीडिया कम है, लेकिन मीडिया का अक्स बिगाड़ने में वो काफी कारगार सिद्ध हो रहे हैं। मैं नितिन सिंगला, साथी कुलवंत हैप्पी के साथ गुडईवनिंग पंजाब का सच बठिंडा।

आज सफल है, मंथली गुरूमंत्र

सुबह सुबह आम आदमी एनपी अपने दूध वाले पर रौब झाड़ते हुए कहता है कि आजकल दूध काफी पतला आ रहा है और कुछ मिले होने का भी शक है। एनपी की बात को ठेंगा दिखाते हुए दूध वाला कहता है, आपको दूध लेना है तो लो, वरना किसी ओर से लगवा लो, दूध तो ऐसा ही मिलेगा। एनपी सिंह कहां कम था उसने दूध वाले के पैर निकाले के लिए कहा, तुमको पता नहीं, मैं सेहत विभाग में हूँ, तेरे दूध का सैंपल भरवा दूंगा। सेर को सवा सेर मिल गया, दूध वाला बोला...तेरे सेहत विभाग को हर महीने पैसे भेजता हूँ, मंथली देते हूँ, किसकी हिम्मत है, जो मेरे दूध का सैंपल भरे। दूध वाले के पैरों तले से तो जमीं नहीं सरकी, लेकिन एनपी के होश छू मंत्र हो गए। आज मंथली का जमाना है, आज के युग में सही काम करने वाले को भी मंथली भेजनी पड़ती है। मंथली लेने में सेहत विभाग ही नहीं, अन्य विभाग भी कम नहीं। जैसे मोबाइल के बिन आज व्यक्ति खुद को अधूरा समझता है, वैसे ही ज्यादातर सरकारी उच्च पदों पर बैठे अधिकारी खुद को मंथली बिना अधूरा सा महूसस करते हैं। बुरा काम करने वाले तो मंथली देते ही हैं, लेकिन यहां तो अच्छा उत्पाद बनाने वालों को भी मंथली देनी पड़ती है। शहर के एक व्यस्त बाजार में बेहद प्रसिद्ध मिठाई की दुकान के मालिक को केवल इस लिए मंथली देनी पड़ती है, क्योंकि वो सरकारी पचड़े में पड़ना नहीं चाहता, जबकि उसके उत्पाद अच्छे है, सर्वोत्तम हैं। मगर वो एक बात अच्छी तरह जानता है कि अगर पैसा घटिया माल को अच्छा साबित कर सकता है तो कोई भी सरकारी अधिकारी अच्छे माल को बुरा साबित कर सकता है। शहर में जाली रजिस्ट्रियों के तमाम मामले आए दिन सुर्खियों में आते हैं, वो भी तो मंथलियों के नतीजे हैं, वरना किसी की रजिस्ट्री किसी ओर के नाम कैसे चढ़ सकती है। गलती एक बार होती है, बार बार नहीं, मगर मंथली एक ऐसा गुरमंत्र है, जो गलत वस्तु को सही सिद्ध कर देगा, जिसकी लाठी उसकी भैंस साबित कर देगा। मंथली की मोह जाल से तो पत्रकारिता जगत के लोग भी अछूते नहीं, सुनने में तो यहां तक आया है कि सेहत विभाग से लेकर तहसील तक से पत्रकारिता की दुनिया के कुछ लोगों को मंथली आती है, शायद बुराई पर पर्दा डाले रखने के लिए। पैसे की दौड़ ने मानव को किसी भट्ठी में झोंक दिया, वो आज खुद भी नहीं समझ पा रहा, आखिर उनकी दौड़ कहां तक है? जबकि वो भली भांति जानता है कि अंतिम समय मिलने वाले कफन के जेब भी नहीं होती। जब एक आम आदमी ने कारोबारी रूप में मोटरसाईकल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने वाले वर्ग के एक व्यक्ति से पूछा कि तुम्हारे वाहनों की हालत इतनी खास्ता होने के बावजूद भी क्या ट्रैफिक पुलिस तुम्हारा चालान नहीं भरती, तो वो बड़े खुशनुमा मिजाज में कहता है, आप से क्या चोरी, एसोसिएशन हर महीने तीस साल रुपए का माथा टेकती है, तब जाकर हरी झंडी मिलती है सड़कों पर। ज्यादातर सरकारी विभागों का आलम तो ऐसा है कि पैसा फेंको...मैं कुछ भी करूंगा। एक किस्सा याद आ रहा है, जो पासपोर्ट विभाग से जुड़ा हुआ है। पासपोर्ट बनाने के लिए कॉमन मैन कतार में खड़ा अपनी बारी का इंतजार कर रहा था, एजेंट आते थे, और काम करवा कर चले जाते थे, लेकिन वो बाहर कतार में खड़ा इंतजार करता रहा। जब उसकी बारी आई तो उसने अपने कागजात मैडम के आगे किए, मैडम ने कागजातों को टोटलने के बाद कहा..बच्चे का पता पहचान पत्र कहां है, कॉमन मैन कहता है, मैं उसका पिता हूँ, मेरा पता ही तो उसका पता है। लेकिन हम कैसे मानें कि यह तुम्हारा सही पता है। तो कॉमन मैन कहता है कि मेरा पता इस विभाग की ओर से पहले चैक किया गया है, और पासपोर्ट भी यहां से ही जारी हुआ है। मगर वो मैडम एक बात पर ही अटकी रही, बच्चे का पता पहचान पत्र लेकर आओ। कॉमन मैन चिंता में डूब वहां से उलटे कदम निकल लिया, यह सोचते हुए आखिर कौन सा पता। सरकारी दफ्तरों में एजेंटों की घुसपैठ भी तो मंथली के गुरुमंत्र की ताजा मिसाल है। मंथली के गुरुमंत्र ने आम आदमी के हितों को पैरों तले कुचलकर रख दिया।

कुलवंत हैप्पी
पंजाब का सच
76967-13601

शायद उलझन में इंद्रदेव

जब वो मल्हार राग में शिव स्तुति गाती है तो इंद्रदेव इतने खुश होते हैं कि पूरे क्षेत्र को जलमग्न कर देते हैं। उसका जन्म गजियाबाद के एक अमीर परिवार में हुआ था और उसका ब्याह भी एक अमीर घर में, लेकिन वो सादगी भरा जीवन जीने में विश्वास करती थी, वो आज जिन्दा है या नहीं पता नहीं, लेकिन जब इंद्रदेव को खुश करना होता तो लोग उसके द्वार जाते थे। कुछ ऐसा ही किस्सा बता रहा था संकट मोचन मंदिर के निकट एक बिजली की दुकान पर एक भद्र पुरुष। आज से पहले तानसेन के बारे में तो सुना था कि वो दीपक राग गाकर दीए जला देते थे, लेकिन उक्त किस्सा पहली दफा सुनने में आया, हो सकता है सच भी हो और काल्पनिक भी। मगर हम इंद्रदेव को मनाने के लिए तरह तरह के ढंग तो अपनाते ही हैं। मुझे याद है जब हम गांव में रहते थे, सावन का महीना बीतते वाला होता, और गांव में एक बूंद पानी तक न टपकता, तब लोग इंद्र देव को खुश करने के लिए डेरा बाबा भगवान दास में पहुंचकर चावलों का यज्ञ करते, और इंद्रदेव खुश हो भी जाता था। इस डेरे का इतिहास भी तो बारिश से जुड़ा हुआ है। एक बार की बात है कि गांव में बारिश नहीं हो रही थी, और लोग इंद्र देव को मनाने के लिए तरह तरह के पैंतरे अजमा रहे थे। इन दिनों गांव के खेतों में एक साधु आया हुआ था, गांवों ने उनसे बिनती बगैरह किया, उन्होंने संतों के कहने अनुसार सब कुछ किया। जब गांव वासी डेरे में पहुंचे तो संत बोले 'तुम लोग छत्रियां क्यों नहीं लेकर आए, लोग चकित रह गए, धूप चढ़ी हुई है, बादलों का नामोनिशान नहीं, संत कहीं पागल तो नहीं हो गया। जैसे यज्ञ खत्म होने के किनारे पहुंचा तो बादल ऐसे बरसे कि गांव वासी संत के चरणों में जा गिरे। यह तो बस एक विश्वास की बात है, अगर विश्वास है तो धन्ने भगत जैसे पत्थरों से भगवान के दीदार कर लेते हैं। पिछले दो दिनों से इंद्रदेव बठिंडा में बरसने के लिए उतावला है, लेकिन न जाने क्या सोच कर खुद को रोके हुए है। हो सकता है कि बठिंडा नगर निगम व नहरी विभाग की खामियों से इंद्रदेव अच्छी तरह अवगत हैं। पिछले हफ्ते इंद्रदेव ने बठिंडा वासियों को खुश करने की छोटी सी कोशिश की थी, लेकिन नतीजा शहर में अधिकतर क्षेत्रों में बारिश का पानी जमा हो गया। लोगों को आने जाने में दिक्कतें पेश आने लगी। इतना ही नहीं, कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में तो बारिश के पानी के कारण रजबाहे टूट गए, किसानों की खड़ी फसलें बर्बाद हो गई। इंद्रदेव तो पिछले दो दिन से निरंतर बरसने के मूड में है, लेकिन नहरी विभाग व नगर निगम की कार्यगुजारी के चलते इंद्रदेव का बरसना भी लोगों पर भारी पड़ सकता है। वैसे इंद्रदेव ने लोगों को थोड़ी सी राहत देने के लिए हवाओं में नमी भर दी है। पंजाब में अब तक इंद्रदेव जहां जहां अभी तक बरसा है, वहां से फसलों के बर्बाद होने की ख़बर आ रही हैं, चाहे वो पटिआला हो या दोआबे का क्षेत्र। सरकारों व निगमों की कार्यगुजारी के बाद इंद्रदेव को एक कुम्हार की कहानी याद आ रही होगी, या तो बर्तन वाली या फिर फसल वाली। एक कुम्हार के दो बेटियां होती हैं, दोनों की शादी एक ही गांव में हुई होती है, एक बार उन से मिलने के लिए कुम्हार उस गांव जाता है। पहली बेटी से मिलता है जो एक कुम्हार के साथ ही ब्याही होती है, वो खुश है कि उसके बर्तन सूखने वाले हैं, और इंद्रदेव नहीं बरसे। वो यहां अपनी दूसरी बेटी के घर जाता जो एक किसान को ब्याही होती है। वो दुखी है, क्योंकि इंद्रदेव अभी तक बरसा नहीं था। वो अपने पिता से कहती है कि दुआ करो रब्ब से बारिश हो जाए। कुम्हार असमंजस में पड़ जाता है कि आखिर किस को बचा लूं और किसको डुबो दूं। कुछ ऐसी ही स्थिति में शायद इंद्रदेव उलझा हुआ है।

हल स्थाई हो, अस्थाई नहीं

कुछ महीने पहले देश की एक अदालत ने केंद्र से राय मांगी थी कि क्या वेश्यावृत्ति को मान्यता दे दी जाए, यानि इसको अपराध के दायरे से बाहर कर दिया जाए, क्योंकि देश में वेश्यावृत्ति बढ़ती जा रही है। इस मुद्दे पर अदालत द्वारा केंद्र से राय मांगने का सीधा अर्थ है, अगर किसी चीज को कानून रोकने में असफल हो रहा है तो उसको मान्य दे दी जाए, ताकि अदालत का भी कीमत समय बच जाए। किसी मुश्किल का कितना साधारण हल है, कि उसको वैध करार दे दिया जाए, जिसको रोकने में कानून असफल है। कोर्ट ने एक बार भी केंद्र से नहीं कहा कि वेश्यावृत्ति की पीछे के कारणों का पता लगाने के लिए एक टीम का गठन किया जाए। कोर्ट ने सवाल नहीं उठाया कि क्यों कभी पुलिस प्रशासन ने कोर्ट में वेश्यावृत्ति में लिप्त महिलाओं के दूसरे पक्ष को उजागर नहीं किया। आखिर वेश्यावृत्ति हो क्यों रही है? आखिर क्यों देश की महिलाएं अपने जिस्म की नुमाईश लगा रही हैं?। अगर कोर्ट इन सवालों में से एक भी सवाल को केंद्र से पूछती तो केंद्र अदालती कटघरे में आ खड़ा नजर आता, क्योंकि वेश्यावृत्ति के बढ़ते रुझान के लिए हमारी सरकारें भी जिम्मेदार हैं, जो निम्न वर्ग को केवल वोटों के लिए इस्तेमाल करती हैं और उनके उत्थान के लिए कोई कार्य नहीं करती। ऐसे में पेट की आग बुझाने के लिए गरीब घरों की महिलाएं लोगों के बिस्तर गर्म करने के लिए निकल पड़ती हैं। अब तो वेश्यावृत्ति में कालेज की लड़कियां भी शुमार हो रही हैं, कारण है कि वो सुविधाओं भरी जिन्दगी जीना चाहती हैं। हम समस्याओं को जड़ से नहीं बल्कि बाहरी स्तर से हल करने के तरीके खोजते हैं। अभी कल की ही बात है, मेरा किसी काम को लेकर धोबियाना रोड़ पर जाना हुआ, श्री गुरूनानक देव स्कूल के पास सड़क पर दोनों तरफ आने जाने के लिए एक आधिकारिक रास्ता है, लेकिन उसको प्रशासन ने बंद कर दिया। बंद करने का कोई भी छोटा मोटा कारण हो सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि किसी नेता के आगमन पर उसको बंद किया हो, और फिर प्रशासन को खुलवाना भूल गया हो। प्रशासन ने वो रास्ता तो बेरियर लगाकर बंद कर दिया, क्योंकि ट्रैफिक पुलिस के पास कर्मचारियों की कमी तो हो सकती है, पर बेरियरों की नहीं। इसका अंदाजा पॉलिथीनों की तरह जगह जगह बिखरे पड़े मुसीबतों को जन्म दे रहे बेरियरों से लगाया जा सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि वो रास्ता हादसों का कारण बन रहा हो इसलिए बंद कर दिया गया, लेकिन क्या ऐसा करना जायज है, अगर जायज है तो बरनाला रोड़ को सबसे पहले बंद कर देना चाहिए, जिसको खूनी रास्ते के नाम से भी पुकारा जाता है। प्रशासन ने उक्त दस बारह फुट के रास्ते को बंद कर दिया, लेकिन लोगों ने एक फूट चौड़ा रास्ता उससे थोड़ा से आगे डिवाईडर तोड़कर बना लिया। शायद प्रशासन भूल गया कि नदी के बहा को कभी दीवारें निकालकर नहीं रोका जा सकता, क्योंकि पानी अपने रास्ते खुद बनाना जानता है। जनता भी पानी के बहा जैसी है। गलियों में बने हम्प भी इसी बात की ताजा उदाहरण हैं। स्थानीय शहरी इलाकों की गलियों में बने हम्प लोगों के वाहनों की स्पीड को तो कम नहीं कर पा रहे, लेकिन लोगों का ध्यान जरूर खींच रहे हैं। जब मनचले वहां आकर जोर से ब्रेक मारते हैं, और ब्रेक लगने के वक्त निकालने वाली वाहन के पुर्जों की आवाज लोगों का ध्यान खींचती है। हम समस्या की जड़ को खत्म करने की बजाय बाहरी स्तर पर काम करते हैं, जिनके नतीजे हमेशा ही शून्य रहते हैं। मानो लो, देश भर के सरकारी स्कूलों की चारदीवारी को आलीशान बना दिया जाए, क्या वो देश की शिक्षा प्रणाली के दुरुस्त होने का प्रमाण होगा, नहीं क्योंकि वो सुधार केवल बाहरी रूप से हुआ है। अगर देश की शिक्षा प्रणाली का सुधार करना है तो उसकी जड़, मतलब टीचर को ऐसे प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए कि वो एक पढ़े लिखे इंसान के साथ एक समझदार व्यक्ति को स्कूल से बाहर रुखस्त करे। वरना देश की अदालत हर बार किसी न किसी अपराध को अपराध मुक्त करने पर सरकार से राय मांगेगी।

रक्षक से भक्षक तक

सर जी, वो कहता है कि उसको एसी चाहिए घर के लिए। वो का मतलब था डॉक्टर, क्योंकि मोबाइल पर किसी से संवाद करने वाला व्यक्ति एक उच्च दवा कंपनी का प्रतिनिधि था, जो शहर में उस कंपनी का कारोबार देखता था। इस बात को आज कई साल हो गए, शायद आज उसके संवाद में एसी की जगह एक नैनो कार आ गई होगी या फिर से भी ज्यादा महंगी कोई वस्तु आ गई होगी, क्योंकि शहर में लगातार खुल रहे अस्पताल बता रहे हैं कि शहर में मरीजों की संख्या बढ़ चुकी है, जिसके चलते दवा कारोबार में इजाफा तो लाजमी हुआ होगा।

आप सोच रहें होंगे कि मैं क्या पहेली बुझा रहा हूँ, लेकिन यह किस्सा आम आदमी की जिन्दगी को बेहद प्रभावित करता है, क्योंकि इस किस्सा में भगवान को खरीदा जा रहा है। चौंकिए मत! आम आदमी की भाषा में डॉक्टर भी तो भगवान का रूप है, और उक्त किस्सा एक डॉक्टर को लालच देकर खरीदने का ही तो है। कितनी हैरानी की बात है कि पैसे मोह से बीमार डॉक्टर शारीरिक तौर पर बीमार व्यक्तियों का इलाज कर रहे हैं।

इस में कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि दवा कंपनियों के पैसे से एशोआराम की जिन्दगी गुजारने वाले ज्यादातर डॉक्टर अपनी पसंदीदा कंपनियों की दवाईयाँ ही लिखकर देते हैं, जिसकी मार पड़ती है आम आदमी पर, क्योंकि दवा कंपनियां डॉक्टर को दी जाने वाली सुविधाओं का खर्च भी तो अपने ही उत्पादों से निकालेंगी।

पैसे के मोह से ग्रस्त डॉक्टरी पेशा भी बुरी तरह बर्बाद हो चुका है, अब इस पेशे में ईमानदार लोग इतने बचें, जितना आटे में नमक या फिर समुद्र किनारे नजर आने वाला आईसबर्ग (हिमखंड), ज्ञात रहे कि आइसबर्ग का 90 फीसदी हिस्सा पानी में होता है, और दस फीसदी पानी के बाहर, जो नजर आता है।

अब ज्यादातर डॉक्टरों का मकसद मरीजों को ठीक करना नहीं, बल्कि रेगुलर ग्राहक बनाना है, ताकि उनकी रोजी रोटी चलती रहे, और वो जिन्दगी को पैसे के पक्ष से सुरक्षित कर लें, पैसे की लत ऐसी लग गई है कि आम लोग सरकारी नौकरियाँ तलाशते हैं, डॉक्टर खुद के अस्पताल खोलने के बारे में सोचते हैं। मुझे याद है, जब मेरी माता श्री बीमार हुई थी, उसका मानसा के एक सरकारी अस्पताल से चल रहा था, वो पहले से चालीस फीस ठीक हो गई थी, अचानक उस युवा डॉक्टर ने सरकारी नौकरी छोड़कर खुद को अस्पताल खोल लिया, और मेरी माता की दवाई अब उसके अस्पताल से आनी शुरू हो गई, वो पहले महीने भर में बुलाता था, अब हफ्ते भर में। और मोटी फीस लेने लगा था, लेकिन कुछ हफ्तों बाद उसकी तबीयत फिर से पहले जैसी हो गई, क्योंकि अब उस डॉक्टर का मकसद खुद की आमदन बढ़ाना था, ना कि मरीज को तंदरुस्त कर घर भेजना।

लोगों ने डॉक्टर को भगवान की उपमा दी है, लेकिन अब उस भगवान के मन में इतना खोट आ गया है कि अब वो भगवान अपने दर पर आने वाले मानवों के अंगों की तस्करी करने से भी पीछे नहीं हट रहा। इतना ही नहीं, कभी कभी तो भगवान इतना क्रूर हो जाता है कि शव को भी बिन पैसे परिजनों के हवाले नहीं करता। और तो और रक्त के लिए भी अब वो निजी ब्लड बैंकों की पर्चियां काटने लगा है, आम आदमी का शोषण अब उसकी आदत में शुमार हो गया है। अपनी रक्षक की छवि को उसने भक्षक की छवि में बदल दिया।

पंजाबी भाषा और कुछ बातें

अपने ही राज्य में बेगानी सी होती जा रही है पंजाबी भाषा, केवल बोलचाल की भाषा बनकर रह गई पंजाबी, कुछ ऐसा ही महसूस होता है, जब सरकारी स्कूलों के बाहर लिखे 'पंजाबी पढ़ो, पंजाबी लिखो, पंजाबी बोलो' संदेश को देखता हूँ। आजकल पंजाब के ज्यादातर सरकारी स्कूलों के बाहर दीवार पर उक्त संदेश लिखा आम मिल जाएगा, जो अपने ही राज्य में कम होती पंजाबी की लोकप्रियता को उजागर कर रहा है, वरना किसी को प्रेरित करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।

पंजाबी भाषा केवल बोलचाल की भाषा बनती जा रही है, हो सकता है कि कुछ लोगों को मेरे तर्क पर विश्वास न हो, लेकिन सत्य तो आखिर सत्य है, जिस से मुँह फेर कर खड़े हो जाना मूर्खता होगी, या फिर निरी मूढ़ता होगी। पिछले दिनों पटिआला के बस स्टॉप पर बस का इंतजार करते हुए मेरी निगाह वहाँ लगे कुछ बोर्डों पर पड़ी, जो पंजाबी भाषा की धज्जियाँ उड़ा रहे थे, उनको पढ़ने के बाद लग रहा था कि पंजाबी को धक्के से लागू करने से बेहतर है कि न किया जाए, जो चल रहा है उसको चलने दिया जाए।

अभी पिछले दिनों की ही तो बात है, जब एक समारोह में संबोधित कर रहे राज्य के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को अचानक अहसास हुआ कि पाकिस्तान व हिन्दुस्तान में संपर्क भाषा पंजाबी भी है, जिसके बाद उन्होंने अपना भाषण पंजाबी में दिया, चलो एक अच्छी बात है। लेकिन ऐसा भी तो हो सकता है कि किसी ने पीछे से कह दिया हो, साहेब! आप तीसरे देश की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। दोष बादल साहेब का नहीं, दोष तो हमारा है, जो खुद की भाषा में बात करने को अपनी बे-इज्जती समझते हैं। हमारे राज्य की तो छोड़ो देश के नेता भी हिन्दी में शपथ लेने से कतराते हैं, और कहते हैं कि हिन्दुस्तान की संपर्क भाषा हिन्दी बने। इससे कुछ दिन पहले ही, राज्य के एक पंजाबी समाचार पत्र में लेखिका डा.हरशिंदर कौर का लेख प्रकाशित हुआ था, जिसमें लेखिका ने अपने साथ हुई घटना का उल्लेख करते हुए पंजाबी सेवक का पट्टा पहनकर घूमने वालों पर जोरदार कटाक्ष किया था।

पंजाबी भाषा को अगर कायम रखना है, तो सरकार को कानून बनाने की नहीं बल्कि भाषा को लोकप्रिया बनाने की जरूरत है। पंजाबी गीत संगीत ने पंजाबी को विश्वव्यापी तो बना दिया, लेकिन केवल बोलचाल में, लेखन में नहीं। अगर लेखन में भी इसको लोकप्रियता दिलानी है तो सरकार को साहित्यकारों की तरफ ध्यान देना होगा। पंजाबी फिल्मों के साथ साथ फिर से पंजाबी रंगमंच को जिन्दा करना होगा, ताकि लोगों को एक बार फिर से पंजाबी लेखन की तरफ खिंचा जा सके।

पंजाबी फिल्म एकम में जब नायिका नायक को अपने शौक के बारे में बताते हुए कुछ विदेशी लेखकों का नाम लेती है, जिन्हें वे रूटीन में पढ़ती है, तो नायक उसकी इस बात पर कटाक्ष करते हुए कहता है कि कभी पंजाबी लेखकों को भी पढ़ लिया करो। स्टेट्स सिम्बल के चक्कर में पंजाबी अपने ही राज्य में हाशिए पर खड़ी नजर आ रही है। कॉलेजों से निकलते ही विद्यार्थी भूल जाते हैं कि उन्होंने कॉलेज में किन किन पंजाबी लेखकों को पढ़ा, और आगे किन किन को पढ़ना है, क्योंकि उनके लिए पढ़ाई का मतलब डिग्री हासिल करना, और उस डिग्री के बलबूते पर नौकरी हासिल करना। ऐसे में भाषा व संस्कृति को बचा पाना बेहद मुश्किल ही नहीं, असंभव भी है।

कुलवंत हैप्पी
76967 13601

शहीदों की अर्थी पर शब्दों की वर्षा शुरू हुई

युवा कवि नितिन फलटणकर
हम भूल गए सारे जख्म
और फिर से चर्चा शुरू हुई।
शहीदों की अर्थी पर शब्दों की वर्षा शुरू हुई।

हम भूल गए माँ के आँसू
हम भूल गए बहनों की किलकारी।
बस समझौते के नाम पर फिर से चर्चा शुरू हुई।
शहीदों की अर्थी पर शब्दों की वर्षा शुरू हुई।

वो आग उगलते रहते हैं
हम आँसू बहाते रहते हैं।
बहते आँसू की स्याही से इतिहास रचने की चर्चा शुरू हुई
शहीदों की अर्थी पर शब्दों की वर्षा शुरू हुई।

वो घात लगाए बैठे हैं।
हम आघात सहते रहते हैं।
आघातों की लिस्ट बनाने नेताओं की चर्चा शुरू हुई।
शहीदों की अर्थी पर शब्दों की वर्षा शुरू हुई।

पूछो इन नेताओं को, कोई अपना इन्होंने खोया है?
बेटे के खून से माताओं ने यहाँ बहुओं का सिंदूर धोया है।
इस सिंदूर के लाली की चर्चा फिर से शुरू हुई।
शहीदों की अर्थी पर शब्दों की वर्षा शुरू हुई।

शब्द बाण कब बनेंगे।
जख्म हमारे कब भरेंगे?
नए जख्म सहने की चर्चा यहाँ शुरू हुई,
शहीदों की अर्थी पर शब्दों की वर्षा शुरू हुई।


विशाल रक्तदान शिविर...आंकड़ों की दौड़

"आप रक्तदान न करें, तो बेहतर होगा" एक चौबी पच्चीस साल का युवक एक दम्पति को निवेदन कर रहा था, जिसके चेहरे पर चिंता स्पष्ट नजर आ रही थी, क्योंकि वो जिस रक्तदाता के साथ आया था, वो एक कुर्सी पर बैठा निरंतर उल्टियाँ कर रहा था, जिसको बार बार एक व्यक्ति जमीन पर लेट के लिए निवेदन कर रहा था। युवक की बात सुनते ही महिला के साथ आया उसका पति छपाक से बोला, यह तो बड़े उत्साह के साथ खून दान करने के लिए आई है। महिला के चेहरे पर उत्साह देखने लायक था, उस उत्साह को बरकरार रखने के लिए मैंने तुरंत कहा, अगर आप निश्चय कर घर से निकले हो तो रक्तदान जरूर करो, लेकिन यहाँ का कु-प्रबंधन देखने के बाद मैं आप से एक बात कहना चाहता हूँ, अगर पहली बार रक्तदान करने पहुंचे हैं तो कृप्या रक्तदान की पूरी प्रक्रिया समझकर ही खूनदान के लिए बाजू आगे बढ़ाना, वरना किसी छोटे कैंप से शुरूआत करें। वो रजिस्ट्रेशन फॉर्म के बारे में पूछते हुए आगे निकल गए, लेकिन मेरे कानों में अभी भी एक आवाज निरंतर घुस रही थी, वो आवाज थी एक सरदार जी की, जो निरंतर उल्टी कर रहे व्यक्ति को लेट के लिए निवेदन किए जा रहा था, लेकिन कुर्सी पर बैठा आदमी आर्मी पर्सन था, वो अपनी जिद्द से पिछे हटने को तैयार नहीं था। यह दृश्य पटियाला के माल रोड स्थित सेंट्रल लाइब्रेरी के भीतर आयोजित पंजाब युवक चेतना मंच के विशाल रक्तदान शिविर का था। इस विशाल रक्तदान शिविर में जाने का मौका बठिंडा की एक प्रसिद्ध रक्तदानी संस्था के कारण नसीब हुआ, लेकिन विशाल रक्तदान शिविर के कु-प्रबंधन को देखने के बाद, मेरी आँखों के सामने उन अभिभावकों की छवि उभरकर आ गई, जो अंकों की दौड़ में बच्चों को लगाकर उनको मानसिक तौर से बीमार कर देते हैं, और उनको पढ़ाई बोझ सी लगने लगती है। इस शिविर में अंकों की नहीं, शायद आंकड़ों की दौड़ थी, दौड़ कोई भी हो, दौड़ तो आखिर दौड़ है। दौड़ में आँख लक्ष्य पर होती है, शरीर के कष्ट को रौंद दिया जाता है जीत के जश्न तले। इस शिविर में रक्तदाताओं के लिए उचित प्रबंध नहीं था, शिविर को जल्द खत्म करने के चक्कर में रक्तदातों को पूरी प्रक्रिया से वंचित रखा जा रहा था, जिसका नतीजा वहाँ उल्टियाँ कर रहे रक्तदाताओं की स्थिति देखकर लगाया जा सकता था। बाहरी गर्मी को देखते हुए भले ही रक्तदान शिविर का आयोजन एसी हाल में किया गया था, जो देखने में किसी सिनेमा हाल जैसा ही था, पुराने समय में जो स्थिति टिकट खुलते वक्त बाहर देखने को नसीब होती थी, कल वो मुझे इस एसी हाल के भीतर रिफ्रेशमेंट वितरण के मौके देखने को मिली, रक्तदाता रिफ्रेशमेंट के लिए एक दूसरे को धक्के मार रहे थे, यह विशाल शिविर के कु-प्रबंधन का एक हिस्सा था। विशाल शिविरों का आयोजन रक्तदान लहर को आगे बढ़ाने के मकसद से किया जाता है, लेकिन कल वाला रक्तदान शिविर तो रक्तदान की लहर को झट्का देने वाला ज्यादा लग रहा था, एक सौ फीसदी विकलांग रक्तदाता वहाँ की स्थिति देखकर रजिस्ट्रेशन फॉर्म भरने के बाद जमा करवाने का हौसला नहीं कर सका, जो इससे पहले दर्जनों बार खूनदान कर चुका है। ऐसे विशाल शिविर रक्तदान की लहर को प्रोत्साहन देने की बजाय ठेस पहुंचाते हैं। छोटा परिवार सुखी परिवार की तर्ज पर चलते हुए ऐसे विशाल शिविरों से तो बेहतर है कि छोटे शिविर लगाओ, ताकि रक्तदान की लहर को कभी वैसाखियों के सहारे न चलना पड़े, जो आज अपने कदमों पर निरंतर दौड़ लगा रही है। चलते चलते एक और बात जो रक्तदाताओं के लिए अहम है, "रक्तदान शिविरों में रक्तदान करने वाले व्यक्तियों को रक्तदान करने की पूरी प्रक्रिया से अवगत होना चाहिए, ताकि उक्त विशाल शिविर में हुई अस्त व्यस्तता से बचा जा सके।"

अपनों के खून से सनते हाथ

अपनों के खून से सनते हाथ, आदम से इंसान तक का सफर अभी अधूरा है को दर्शाते हैं। झूठे सम्मान की खातिर अपनों को ही मौत के घाट उतार देता है आज का आदमी। पैसे एवं झूठे सम्मान की दौड़ में उलझे व्यक्तियों ने दिल में पनपने वाले भावनाओं एवं जज्बातों के अमृत को जहर बनाकर रख दिया है, और वो जहर कई जिन्दगियों को एक साथ खत्म कर देता है।

पाकिस्तान की तरह हिन्दुस्तान में भी ऑनर किलिंग के मामले निरंतर सामने आ रहे हैं, ऐसा नहीं कि भारत में ऑनर किलिंग का रुझान आज के दौर का है, ऑनर किलिंग हो तो सालों से रही है, लेकिन सुर्खियों में अब आने लगी है, शायद अब पाकिस्तान की तरह हिन्दुस्तानी हुक्मरानों को भी चाहिए कि वो भी मर्दों के लिए ऐसे कानून बनाए, जो उनको ऐसे शर्मनाक कृत्य करने की आजादी मुहैया करवाए। पाकिस्तानी मर्दों की तरह हिन्दुस्तानी मर्द भी औरतों को बड़ी आसानी से मौत की नींद सुला सके, वो अपना पुरुष एकाधिकार कायम कर सकें।

वोट का चारा खाने में मशगूल सरकारें मूक हैं और खाप पंचायतें अपनी दादागिरी कर रही हैं। इन्हीं पंचायतों के दबाव में आकर माँ बाप अपने बच्चों को मौत की नींद सुला देते हैं, जिनको जन्म देने एवं पालने के लिए हजारों सितम झेले होते हैं।

इसको एक सभ्य समाज कैसे कहा जा सकता है, जहाँ खुद पेड़ लगाकर खुद उखड़ा फेंकने का प्रचलन हो। जब मानव ऐसे शर्मनाक कृत्य करता है तो क्या फर्क रह जाता है आदम और पशु में। जब जब ऐसे ऑनर किलिंग के मामले सामने आते हैं तो सच में एक बात तो समझ में आने लगती है कि हमारी शिक्षा प्रणाली एवं हमारी धार्मिकता कितनी कमजोर है।

हमारे धार्मिक गुरू, ग्रंथ हमको अहिंसक होने का पाठ पढ़ाते हैं, प्रेम करने का पाठ पढ़ाते हैं, हमारी शिक्षा प्रणाली हमको गंवार से पढ़ा लिखा बनाती है ताकि हम अच्छे बुरे की पहचान कर सके, लेकिन हम इन चीजों को त्याग मूड़ लोगों की भीड़ खुद को खड़ा कर लेते हैं, जो वो भीड़ कर रही है, उसको ही सही मान रहे हैं।

भीड़ में सब अनजान होते हैं एक दूसरे से, किसी को कुछ अंदाजा नहीं होता वो क्या कर रहे हैं, वो सब सोच रहे होते हैं, बस जो कर रहे हैं अच्छा ही होगा, लेकिन जब कोई खुद को भीड़ से अलग कर एकांत में सोचता है तो उसकी हिम्मत नहीं पड़ती कि वो खुद से सामना भी कर सके, वो भीतर ही भीतर टूटकर बिखर जाता है। जब तलक मानव सोच शैतानी बचपने से उभरेगी नहीं, तब तक फगवाड़ा के गांव महेड़ू में हुए प्रवासी दम्पति की हत्या (ऑनर किलिंग) जैसे शर्मनाक कृत्य घटित होते रहेंगे।

क्या देखते हैं वो फिल्में...

मंगलवार को एक काम से चंडीगढ़ जाना हुआ, बठिंडा से चंडीगढ़ तक का सफर बेहद सुखद रहा, क्योंकि बठिंडा से चंडीगढ़ तक एसी कोच बसों की शुरूआत जो हो चुकी है, बसें भी ऐसी जो रेलवे विभाग के चेयर कार अपार्टमेंट को मात देती हैं। इन बसों में सुखद सीटों के अलावा फिल्म देखने की भी अद्भुत व्यवस्था है।

इसी व्यवस्था के चलते सफर के दौरान कुछ समय पहले रिलीज हुई पंजाबी फिल्म मिट्टी देखने का मौका मिल गया, जिसके कारण तीन चार घंटे का लम्बा सफर बिल्कुल पकाऊ नहीं लगा।

पिछले कुछ सालों से पुन:जीवित हुए पंजाबी फिल्म जगत प्रतिभाओं की कमी नहीं, इस फिल्म को देखकर लगा। फिल्म सरकार द्वारा किसानों की जमीनों को अपने हितों के लिए सस्ते दामों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले करने जैसी करतूतों से रूबरू करवाते हुए किसानों की टूटती चुप्पी के बाद होने वाले साईड अफेक्टों से अवगत करवाती है।

फिल्म की कहानी चार बिगड़े हुए दोस्तों से शुरू होती है, जो नेताओं के लिए गुंदागर्दी करते हैं, और एक दिन उनको अहसास होता है कि वो सही अर्थों में गुंडे नहीं, बल्कि सरदार के कुत्ते हैं, जो उसके इशारे पर दुम हिलाते हैं।

वो इस जिन्दगी से निजात पाने के लिए अपने अपने घरों को लौट जाते हैं, लेकिन वक्त उनके हाथों में फिर हथियार थमा देता है, अब वो जंग किसानों के लिए लड़ते हैं, अपनों के लिए लड़ते हैं, सरकार के विरुद्ध संघर्ष अभियान चलाते हैं, और सरकार के खिलाफ चलाई इस मुहिम में तीन दोस्त एक एक कर अपनी जान गंवा बैठते हैं, लेकिन अंत तक आते आते फिल्म अपनी शिखर पर पहुंच जाती है। फिल्म का अंतिम सीन आम आदमी के भीतर जोश भरता है। इस दृश्य में किसान सति श्री अकाल और इंकलाब के नारे लगाते हुए पुलिस का सुरक्षा चक्र तोड़ते हुए नेता एवं फैक्ट्री मालक को मौत के घाट उतार देते हैं, और अपनी जमीन को दूसरे हाथों में जाने से रोक लेते हैं।

यह पिछले दिनों देखी गई पंजाबी फिल्मों में से दूसरी पंजाबी फिल्म थी, जो किसान हित की बात करते हुए सरकार के विरुद्ध आवाज बुलंद करने के लिए अपील करती है, आह्वान करती है। इससे कुछ दिन पहले पंजाबी गायक से अभिनेता बने बब्बू मान की फिल्म एकम - सन ऑफ सॉइल देखी। इस फिल्म में भी नायक एकम किसान वर्ग की अगुवाई करते हुए सरकार के विरुद्ध एक लड़ाई लड़ता है। इस फिल्म में बब्बू मान को देखकर पुरानी फिल्मों के अमिताभ बच्चन के उन दमदार किरदारों की याद आ गई, जो गरीब वर्ग की अगुवाई करते हुए गरीबों को उनके हक दिलाता था।

जैसे ही मिट्टी फिल्म खत्म हुई, तो एक के बाद एक सवाल दिमाग में आकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने लगे, क्या इन फिल्मों को उन्होंने देखा, जिन लोगों की स्थिति को पर्दे पर उभरा गया है, जिनके सवालों को बड़े पर्दे पर उठाया गया है। क्या सरकार के प्रतिनिधियों के पास सिनेमा देखने की फुर्सत है, वो भी ऐसी फिल्में, जो वास्तिवकता से रूबरू करवाती हों?

दिमाग को सवाल मुक्त करते हुए बस के भीतर बैठी सवारियों को एक नजर देखा, और पाया कि सब लोग नौकरी पेशा हैं, जिनके पास शायद चैन से बैठकर साँस लेने की फुर्सत भी न होगी, वो सरकार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए लामबंद कैसे हो सकते हैं, शायद उनके लिए तो बस में चल रही फिल्म भी कोई मतलब न रख रही होगी।

जिनको सरकार के विरुद्ध लामबंद करने के लिए फिल्म बनाई गई, वो तो बेचारे रोड़्वेज की उन बसों में भी बामुशिक्ल चढ़ते होंगे, जिन बसों में पुर्जों के खटकने की आवाजें कानों को पका देती हैं, सीटें माँस में चूंटी काट लेती हैं, और सफर खत्म होने तक जान मुट्ठी में रहती है, कहीं ब्रेक फेल न हो जाएं, वगैरह वगैरह।

किसान एवं टुकड़े दो रचनाएं

किसान

फटे पुराने
मटमैले से कपड़े
टूटे जूते
मटमैले से जख्मी पैर
कंधे पर रखा परना
ढही सी पगड़ी
अकेले ही खुद से बातें
करता जा रहा है
शायद
मेरे देश का कोई किसान होगा।

परना- डेढ़ मीटर लम्बा कपड़ा

टुकड़े

बचपन में
जब एक रोटी थी,
तो माँ ने दो टुकड़े कर दिए,
एक मेरा, और एक भाई का
लेकिन जब हम जवान हुए,
तो हमने घर के दो टुकड़े कर दिए
एक पिता का, और एक माई का।




नोट :- उत्सव परिकल्पना 2010 में पूर्व प्रकाशित रचनाएं।

कितने और हैं पैसे और शहीदी ताज?

कुलवंत हैप्पी
कितने शहीदी ताज और मुआवजा देने के लिए पैसे हैं, शायद सरकार के लेखाकार और नीतिकार सोच रहे होंगे? साथ में यह भी सोच रहे होंगे कि बड़ी मुश्किल से हवाई हादसे की ख़बर के कारण जनता का ध्यान बस्तर से हटा था, नक्सलवाद से हटा था। चलो अफजल गुरू को फाँसी भले ही अब तक नहीं दे सके, लेकिन कसाब को फाँसी की सजा सुनाकर जनता की आँख में धूल तो झोंक ही दी, जो आँखें बंद कर जीवन जीने में व्यस्त है। आजकल तो हमारे पास कोई नेता भी नहीं बचा, जो मीडिया में गलत सलत बयानबाजी कर निरंतर हो रहे नक्सली हमलों से मीडिया का और जनता का ध्यान दूर खींच सके। देखो न कितना कुछ है सोचने के लिए सरकार के सलाहकारों के पास। आप सोच रहे होंगे क्या सलाहकार सलाहकार लगा रखी है, बार बार क्यों लिख रहा हूँ सलाहकार। लेकिन क्या करूं, देश के उच्च पदों पर बैठे हुए नेतागण भी फैसला लेने से पहले अपने सलाहकारों
से बात करते हैं, सलाहकार भी नेताओं से चालू हैं, वो भी वहाँ बैठे बैठे ही टेबल स्टोरी जर्नलिस्ट की तरह बैठे बैठे लम्बी चौड़ी स्टोरियों सी सलाहें नेताओं के दे डालते हैं, जो वास्तविकता से कोसों दूर होती हैं।

जनता की आँख में धूल झोंकने के लिए मुआवजा एवं शहीद जैसे सबसे बढ़िया हथियार सरकार के हाथ में हैं। शहीदों की संख्या दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है। कहीं सरकार गिनीज बुक में रिकार्ड तो दर्ज नहीं करवाना चाहती कि भारत में सबसे ज्यादा शहीद हैं, अपनी मिट्टी को प्यार करने वाले, देश पर मिटने वाले। आख़र कब तक नेताओं की लापरवाहियों के कारण नवविवाहितें जिन्दा लाश बनती रहेंगी? कब तक माँओं की कोखें उजड़ती रहेंगी? कब तक बूढ़े बाप के सहारे गँवाते रहेंगे? हम सुरक्षा की उम्मीद आख़र किस से कर रहे हैं, जो हमारे बीच आते हुए भी अपने साथ बंदूकधारी लेकर आते हैं। जो आलीशान घरों में उच्चस्तीय सुरक्षा घेरे के बीच सुख की नींद सोते हैं। किसी ने कहा है, सरकारें तब तक ताकतवर हैं, जब तक जनता सोई हुई है।

कारगिल फतेह करने वाला भारत आज अपनी माटी पर क्यों बार बार मुँह की खा रहा है? क्यों नैतिकता के नाम पर अस्तीफे देकर नेता लोग सिस्टम में रहकर सिस्टम को सुधारने जैसे जिम्मेवार काम से भागते हैं? आख़र अब कोई मोमबत्तियाँ जलाकर संसद तक क्यों नहीं आ रहा? मुम्बई हमले की गूँज अगर विदेशों तक पहुंच सकती है, तो क्या नक्सली हमले की गूंज बहरे हो चुके हिन्दुस्तानी आवाम के कानों तक नहीं पहुंच सकती?

कब बोलेंगे सरकार के खिलाफ हल्ला? कब जागेगी भारतीय जनता? कब गली गली से आवाज आएगी हमें इंसाफ चाहिए? आख़र कब समझेगी सरकार जनता की ताकत को? कब करेगी अपनी जिम्मेदारियों का अहसास? तमाम सवालात दिमाग में आ खड़े हो जाते हैं, जब देश में मौत का तांड़व देखता हूँ।

बुजुर्ग की खुशी का रहस्य

मैं कभी नहीं भूल सकता, एक बड़ा सा घर, और वो बुजुर्ग, जो सुबह सुबह मुझे गैलरी में खड़ा मिलता है। मैं उसको देखता हूँ, वो मुझे देखता है। हल्की सी मुस्कान का आदान प्रदान होता है दोनों में, और फिर मैं आगे बढ़ जाता हूँ, बिना कुछ बोले। इस तरह की वार्तालाप कई दिनों तक चलती है हम दोनों में, लेकिन एक दिन होठों की मुस्कान छोटे से बोलते संवाद में बदलती है, और मैं पूछ बैठता हूँ, आपकी खुशी का राज क्या है? मैं जानना चाहता हूँ, दुनिया में मुझे हर शख्स दुखी मिलता है, लेकिन आपका चेहरा देखते ही दुनिया भर के दुखी लोग मेरी आँख से ओझल हो जाते हैं, क्यों?। जवाब में वो बुजुर्ग उंगली का इशारा सामने की ओर करता है, यहाँ पर सरकारी जमीं पर एक झुग्गी बनी हुई है, जिसमें कम से कम पाँच लोग रहते हैं मुर्गे मुर्गियों (कॉक एंड हैनकॉक) के साथ।

हैप्पी अभिनंदन में दीपक "मशाल"


हैप्पी अभिनंदन में आज आप जिस ब्लॉगर हस्ती से मिलने जा रहे हैं, वो शख्सियत अपनी माटी से शारीरिक तौर पर तो दूर है, लेकिन रूह से जुड़ी हुई है। यही जुड़ाव तो है, जो कोंच छोड़ने और बेलफास्ट, उत्तरी आयरलैंड पहुंचने के बाद भी हिन्दी ब्लॉग जगत के दीपक "दीपक मशाल' को अपने देश एवं अपनी बोली से जोड़े हुए है। इस दीपक के प्रकाश से हम सब हर रोज मसि कागद पर रूबरू होते हैं। आओ जानते हैं कि दीपक से मशाल का रूप ले रहे युवा कवि एवं ब्लॉगर दीपक मशाल से वो क्या कहते हैं, खुद के एवं ब्लॉग जगत के बारे में।

एक खत कुमार जलजला व ब्लॉगरों को

कुमार जलजला को वापिस आना चाहिए, जो विवादों में घिरने के बाद लापता हो गए, सुना है वो दिल्ली भी गए थे, ब्लॉग सम्मेलन में शिरकत करने, लेकिन किसी ढाबे पर दाल रोटी खाकर अपनी काली कार में लेपटॉप समेत वापिस चले गए, वो ब्लॉगर सम्मेलन में भले ही वापिस न जाए, लेकिन ब्लॉगवुड में वापसी करें।

हैप्पी अभिनंदन में इंदुपुरी गोस्वामी

हैप्पी अभिनंदन में आज, आप जिस ब्लॉगर शख्सियत से रूबरू होने जा रहे हैं, वो पेशे से टीचर, लेकिन शौक से समाज सेविका एवं ब्लॉगर हैं। वो चितौड़गढ़ की रहने वाली हैं, ब्लॉगिंग जगत में आए उनको भले ही थोड़े दिन हुए हैं, लेकिन सार्थक ब्लॉगिंग के चलते बहुत जल्द एक अच्छा नाम बन गई हैं। जी हाँ, आज आप हैप्पी अभिनंदन में कान्हा की दीवानी यानी आज की मीरा एवं मेरी निगाह में दूसरी मदर टरेसा इंदुपुरी गोस्वामी से मिलने जा रहे हैं। आओ जाने, वो क्या कहती हैं ब्लॉग जगत एवं अपने बारे में :-

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगिंग के अलावा आप असल जिन्दगी में क्या करती हैं, और कुछ अपने बारे में बताएं?
इंदुपुरी गोस्वामी :
सरकारी स्कूल में टीचर हूँ। हिंदी और इंग्लिश लिटरेचर में एम.ए. हूँ। बचपन से लिखने का शौक था और पढ़ने का तो इतना कि बहुत जल्दी उसमें डूबना सीख गई थी। दसवी ग्यारहवी कक्षा तक आते आते मैंने साहित्य की प्रसिद्ध रचनाओं के अलावा रूसी, अंग्रेजी, उर्दू, और संस्कृत साहित्य के अलावा खलील जिब्रान को खूब पढ़ चुकी थी।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग जगत में आपने कदम कब और कैसे रखा?
इंदुपुरी गोस्वामी :
ब्लॉग की दुनिया में आए बहुत कम समय हुआ है। कब आई ये तो देख कर बताना पड़ेगा। इक्कतीस अगस्त दो हजार नौ तक मुझे कम्यूटर का माऊस भी चलाना नहीं आता था तो ये तो पक्की बात है कि उसके बाद ही आई हूँ। ब्लॉग की दुनिया में आने के लिए कीर्ति जी ने ही मुझे कहा कि आप अपना ब्लॉग बनाइये आप कई लोगों को नेक कामों से जोड़ सकती हैं, उन्हें मोटिवेट कर सकती हैं और लिख भी सकती हैं। और मैं आ गई ब्लॉग की दुनिया में।

कुलवंत हैप्पी : समाज सेवा के क्षेत्र में कैसे आई एवं सेवा करते हुए कैसा महसूस करती हैं?
इंदु गोस्वामी :
लोगों की छोटी मोटी मदद करा करती थी, उसी के चक्कर में दैनिक भास्कर के सम्पादक श्री कीर्ति राणा जी से परिचय हुआ, उन्हीं ने मेरा परिचय उदयपुर, जयपुर, दिल्ली, मुंबई के कई एडिटर्स और दयालु लोगों से मिलाया, जो जरुरतमंदों को मदद करने में मेरा हाथ बंटाते थे। वैसे मैं आज तक मिली उनमें से किसी से भी नहीं। मेरा सारा काम फोन से होता है और लोग मुझ पर यकीन करते हैं, डोनर्स भी। वे न पूछे पर मैं उन्हें एक एक पैसे का हिसाब बताती हूँ. उनकी भी मेहनत का पैसा है भाई। समाज सेवी और मैं? बिलकुल नहीं भैया। सच कहूँ, असली समाज सेवी तो वो होते हैं, जो एक 'एप्पल' किसी गरीब को देते हैं और दस व्यक्ति मिल कर फोटो खिंचवाते हैं, पेपर्स में देते हैं। मैंने तो कहीं कुछ किया तो अगले रोज किसी और नेता, समाजसेवी का फ़ोटो अखबार में उस काम का क्रेडिट लेते हुए देखा एवं पढ़ा।

लगभग बीस साल पहले मेरे पति श्री कमल पुरी गोस्वामी जी यहाँ से जॉब छोड़ कर विदेश चले गये थे। जॉब भी अच्छा था पैसे भी। बच्चे बड़ी क्लासेस में आ गए थे मेरा इंडिया छोड़ना पॉसिबल नहीं था। गवर्नमेंट जॉब था मेरा कैसे जाती? इनके बिना कभी रही नहीं। लोगों की मदद करने की आदत...तो बस अपने आपको इसी में व्यस्त कर लिया। अब घर, बच्चे, मेरी नौकरी और मेरा ये काम.....सुकून मिलने लगा। जीने का एक मकसद सा मिल गया। धीरे धीरे पति, बच्चे और कई ऐसे लोग जुड़ गए जो मेरे लिए फील्ड में काम करने लगे।

जहाँ भी रही, आस पास के बेरोजगार इधर उधर भटकते रहने वाले नौजवान को भी जोड़ लिया, जो मोहल्ले, शहर, आस पास के गांवों के विकास के लिए काम करने लगे। विकलांगों, विधवाओं की पेंशन से लेकर, इंटेलिजेंट बच्चे जो 'डिजर्विंग' थे और आगे पढ़ नहीं पा रहे थे। उनके लिए फीस, ड्रेस, बुक्स सबके खर्च के लिए दानदाताओं से रूपये इक्कठे करना, सामान कलेक्ट करना, पहुँचाना सब काम मेरे ऐसे ही नौजवान करते हैं। हा हा हा.. बहुत सुकून है बाबू इसमें।

लगभग ढाई सौ तीन सौ स्टुडेंट्स को मदद दी जाती है। जानते हो उसमें से कुछ ऑफिसर्स बन चुके हैं। एक विशाल बारेगामा एयर क्राफ्ट मेंटिनेंस का कोर्स करके बेंगलोर में जॉब कर रहा है, रत्न वैष्णव जिंक में ऑफिसर है, जिंक, सीमेंट इंडस्ट्रीज़, टीचिंग में कई बच्चे पहुँच गये। आ कर मिलते है, बताते हैं कि मैं मिलती भी नहीं इन 'डिजर्विंग' बच्चों से। सीधे किसी डोनर को सौंप देती हूँ। 'ये' बच्चा है आप जब तक उनकी पढाई का खर्च उठा सकें. पार्ट टाइम जॉब भी दिलवा देते हैं जिस से खुद कमा कर पढाई कर सके। मदद का मतलब लोगों को निक्कमा बनाना भी नहीं। केंसर पीड़ित कुछ बच्चों के लिए कई लोग आगे आए, इसमें दैनिक भास्कर के सर्कल इंचार्ज राजेश पटेल, यही नाम है शायद। उन्होंने बहुत मदद की।

इसके अलावा मुंबई के नेलेक्तेद चिल्ड्रन को निःसन्तान दम्पत्तियों को गोद दिलवाना भी मेरे जीवन का मकसद है। कई बच्चे बहुत ही अच्छे परिवारों में गए हैं। कई है बाबू मददगार भी और काम भी क्या क्या बताऊँ छोडो, बस लोगों को कहूँगी अपने बच्चों के लिए करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी या मजबूरी पर किसी एक बच्चे को काबिल बनाने में मदद कर दीजिये, बहुत बहुत सुकून मिलेगा। नेत्र-दान, देह-दान करने और मृत्यु भोज न करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करती हूँ, इनकी शुरुआत पहले खुद से फिर अपने परिवार से करने के बाद लोगों को कहती हूँ। नहीं कहती नहीं एक्सामपल रख दिया, लोग फोलो कर रहे हैं। मैं अपने जीवन से बहुत खुश हूँ अपने पापा की लाडली थी और ईश्वर की भी मैं अपने दोनों 'बापों' को शर्मिंदा नहीं होने दूँगी। ऊपर जाते ही गले लगायेंगे मुझे. हम सब 'ऐसा' जी सकते हैं ,हैप्पी।

कुलवंत हैप्पी : श्री कृष्ण भगवान की प्रतिमाएं एवं उनको समर्पित कविताएं बताती हैं आप कृष्ण भगत हैं, क्या कभी उन्होंने कोई करिश्मा दिखाया?
इंदुपुरी गोस्वामी :
मैं क्या बताऊँ? हाँ जीवन मैं ऐसा थोडा बहुत जरूर किया है कि तुम जैसा नन्हा सा दोस्त और वे लोग जो मुझे प्यार करते है वे गर्व कर सकते हैं। मैं नास्तिक नहीं हूँ, पर पूजा पाठ नहीं होता मुझसे। कृष्ण.. नाम न लो उस दुष्ट का। इतना प्यारा दोस्त और प्रियतम है मेरा कि आवाज भी नहीं देती कि ऐसे आ खड़ा होता है, जैसे मुझ पर ही नजर गडाए बैठा रहता है। जासूसी करता है रात दिन मेरी दुष्ट कहीं का। एक बार नहीं बाबू कई बार अलौकिक अनुभव दिए इस अब कहोगे कितनी गालियाँ देती है अपने दोस्त को और जाने कितने सन्गठन खड़े हो जायेंगे 'ऐसा' बोला, पर...जब भी परेशान होती हूँ बुला कर कह देती हूँ 'लल्ला। इस परेशानी को पकड़ तो, सुबह दे देना, अभी सोने दे, और 'वो' शायद मेरे लिए रात भर जागता भी होगा। मेरे आंसू उसकी आँखों से बहते हैं, ये भी मैं जानती हूँ कि विकट से विकट परिस्थिति में जब लगा ये इंसानों के बस की बात नहीं उसमें से उसने यूँ निकाल लिया कि हम आश्चर्यचकित रह गए। हर बार किसी न किस रूप में वो मेरे साथ था कभी, कहीं मिलता है तो उसके गले लग कर खूब रोती हूँ और झगडती हूँ' दुष्ट। तू मेरे आस पास ही मंडराता रहता है क्या? मेरी आँखों में से वो झांकता है, मुझ में सांस लेता है।

बस अगरबत्ती भी नहीं जलाती. नाराज तो होता होगा। पर....उसे बहुत बहुत प्यार करती हूँ दोस्त की तरह, माँ की तरह, प्रेमिका की तरह तो कभी छोटी सी 'छुटकी' बन कर। मत पूछो, वो मेरा क्या है? सशरीर होता तो जाने कितनी अंगुलियां उठ चुकी होती अब तक मुझ पर। हा हा हा.. इश्वर ने एक पत्ता भी व्यर्थ नहीं बनाया। उसकी सर्वश्रष्ठ कृति 'मनुष्य' है। उसे वो यूँ ही थोड़े भेजेगा दुनिया में? नाम, प्रसिद्धि सब समय के साथ मिट जाते हैं, मगर कुछ ऐसा जरूर है करने को सबके लिए जिससे सुकून मिलता है। बस उसी के लिए करें पर ...करें जरूर और दिल की आवाज सुने वो कभी 'मिस गाईड' नहीं करती।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग जगत को आप क्या मानती हैं सोशल नेटवर्किंग या अभिव्यक्ति का प्लेटफार्म?
इंदुपुरी गोस्वामी :
ब्लॉग की दुनिया सोशल नेटवर्किंग और अभिवक्ति का सबसे प्यारा, खूबसूरत और सशक्त माद्यम है। यहाँ अच्छे लोगों की कोई कमी नहीं और अच्छे साहित्य की भी। मैंने कई ऐसा लोगों को पढा, जिन्हें कोई नहीं जानता, जिनके ब्लॉग पर दो तीन कमेंट्स भी नहीं पर कमाल लिखा था। जिन्हें पढ़ते हुए कब मेरी आँखों से आंसू बह निकलते थे पता ही नहीं चलता था। अरे बाबा! इसी ब्लॉग ने मुझे पद्म सिंह श्रीनेत जैसा प्यारा बेटा दिया, समीरजी जैसा दादा, ललितजी पाबला भैया जैसे भी, अनामिका जैसी बेटी महेश सिन्हा, मुकेश जी, हेप्पी जैसे छोटे छोटे प्यारे दोस्त दिए और....अपना ई-गुरु जैसा भतीजा दिया।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग जगत में होने वाली गुटबाजी पर आप क्या कहना चाहेंगी?
इंदुपुरी गोस्वामी :
बस फालतू की गुटबाजी, विवाद अपने बस की बात नहीं। सब मेरे मैं सबकी। कोई मेरा नही मैं किसी की नहीं। हा हा हा।

कुलवंत हैप्पी : कोई विशेष संदेश देना चाहेंगी?
इंदुपुरी गोस्वामी :
ईश्वर की शुक्रगुजार हूँ। उसने मुझे जीवन में बहुत अच्छे अच्छे लोगों से मिलाया। जिंदगी से या' उससे' कोई शिकायत नहीं।
 
चक्क दे फट्टे : सुनो शयाम (नेता का प्रेस सचिव), कल एक प्रेस नोट तैयार किया था "आतंकवादियों पर सरकार कारवाई करे'। हाँ जी। फ्यूड से आतंकवादी हटाकर वहाँ नक्सली लिखकर मेरी ओर से रिलीज कर देना।

नो एंट्री, वेलकम और थैंक यू

कुलवंत हैप्पी
आप ने अक्सर देखा होगा कि आप "थैंक्स" कहते हैं तो सामने से जवाब में "वेलकम" सुनाई पड़ता है, मेंशन नॉट तो गायब ही हो गया। ये ऐसे ही हुआ, जैसे अमिताभ के स्टार बनते ही शत्रूघन सिन्हा एवं राजेश खन्ना की स्टार वेल्यू। कभी कभी थैंक्स एवं वेलकम का क्रम बदल भी जाता है, वेलकम पहले और थैंक्स बाद में आता है। शायद फिल्म निर्देशक अनीस बज्मी दूसरे क्रम पर चल रहे हैं, तभी तो उन्होंने पहले कहा, "नो एंट्री", फिर कहा, "वेलकम" और अब कह रहे हैं "थैंक यू"। अनीस के नो एंट्री कहने पर भी हाऊसफुल हो गए थे, और वेलकम कहने पर भी, लेकिन सवाल उठता है कि क्या दर्शक उनके थैंक यू कहने पर वेलकम कहेंगे?

सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि इस बार अक्षय कुमार के साथ उनकी लक्की गर्ल कैटरीना नहीं, और उनका वक्त वैसे भी ख़राब चल रहा है, फिल्म आती है और बिन हाऊसफुल किए चली जाती है, वो बात जुदा है कि अक्षय कुमार ने इससे भी ज्यादा बुरा वक्त देखा है, और वो इस स्थिति को संभाल लेंगे, मगर लगातार दो फिल्म फ्लॉप देने वाली अनिल कपूर की बेटी का कैरियर धर्मेंद्र की बेटी ईशा देओल की तरह लटक सकता है, क्योंकि फिल्मी दुनिया में चढ़ते सूरज को सलाम होता है।

अगर अनीस जी अपने निर्देशन के बल पर फिल्म को हिट करवा गए तो अक्षय की असफल फिल्म यात्रा थम जाएगी, जो चाँदनी चौंक टू चाईना से शुरू हुई है और अभी तक अविराम जारी है। इतना ही नहीं, साँवरिया गर्ल एवं दिल्ली छ: की मसककली का नसीबा खुल जाएगा। नो एंट्री के बाद अनीस बज्मी पर हास्यस्पद फिल्म निर्देशक का ठप्पा लग गया, और सिंह इज किंग ने जहाँ अक्षय कुमार को शिखर पर खड़ा किया, वहीं अनीस बज्मी का हौसला बढ़ाया, जबकि अनीस जी ने अपने कैरियर के शुरूआती दिनों में प्रेम रोग, हलचल, प्यार तो होना ही था जैसी एक्शन, गम्भीर और रोमांटिक फिल्म निर्देशित की। अक्षय कुमार की तरह अनीस को हास्यस्पद फिल्में भी रास आई, और उनको सफल निर्देशकों की कतार में लाकर खड़ा कर दिया।

जैसे जैसे आप शिखर की तरफ जाते हैं, लोगों की उम्मीद आपसे ज्यादा होने लगती हैं। वो आप से और बेहतर की उम्मीद करते हैं, और वैसे ही जैसे रियालटी शो के जज प्रतिभागियों से करते हैं। रामगोपाल वर्मा एवं संजय लीला भंसाली ने एक से एक बेहतर दी, लेकिन जैसे ही उनकी क्रमश: आग और साँवरिया फ्लॉप हुई, तो उनको आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा, उनकी फिल्में फ्लॉप श्रेणी से निकल सुपर फ्लॉप श्रेणी में पहुंच गई। जब आप शिखर की तरफ जाते हैं, तो आपकी छोटी सी चूक भी बहुत बड़ी हो जाती है, ऐसे में शिखर की तरफ जाते हुए बहुत सावधान रहना पड़ता है। पहाड़ पर चढ़ते हुए, आप जितने नीचे होते हैं, उतना जोखिम कम, और जितना ऊपर पहुंचते हैं उतना जोखिम ज्यादा।

ऐसे में अनीस को चौकसी बरतनी होगी? खासकर तब तो विशेष जब फ्लॉप सितारों के साथ आप फिल्म बना रहें हो, अनीस की थैंक यू में अक्षय कुमार, सोनम कपूर के अलावा बॉबी दिओल भी हैं। सोनम, बॉबी दिओल कॉमेडी सितारे नहीं, स्टार कास्ट देखकर लग रहा है कि वो हास्यरहित फिल्म बनाने का जोख़म उठाने जा रहे हैं, ऐसे में तो और भी ज्यादा गम्भीर रहना होगा। वैसे अब तक के लिए अनीस जी को थैंक यू कहा जा सकता है।

दिलों में नहीं आई दरारें

लेखक : कुलवंत हैप्पी
पिछले कई दिनों से मेरी निगाह में पाकिस्तान से जुड़ी कुछ खबरें आ रही हैं, वैसे भी मुझे अपने पड़ोसी मुल्कों की खबरों से विशेष लगाव है, केवल बम्ब धमाके वाली ख़बरों को छोड़कर। सच कहूँ तो मुझे पड़ोसी देशों से आने वाली खुशखबरें बेहद प्रभावित करती हैं। जब पड़ोसी देशों से जुड़ी किसी खुशख़बर को पढ़ता हूँ तो ऐसा लगता है कि अलग हुए भाई के बच्चों की पाती किसी ने अखबार के मार्फत मुझ तक पहुंचा दी। इन खुशख़बरों ने ऐसा प्रभावित किया कि शुक्रवार की सुबह अचानक लबों पर कुछ पंक्तियाँ आ गई।

दिल्ली से इस्लामाबाद के बीच जो है फासला मिटा दे, मेरे मौला,
नफरत की वादियों में फिर से, मोहब्बत गुल खिला दे, मेरे मौला,

सच कहूँ, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच अगर कोई फासला है तो वो है दिल्ली से इस्लामाबाद के बीच, मतलब राजनीतिक स्तर का फासला, दिलों में तो दूरियाँ आई ही नहीं। रिश्ते वो ही कमजोर पड़ते हैं, यहाँ दिलों में दूरियाँ आ जाएं, लेकिन यहाँ दूरियाँ राजनीतिज्ञों ने बनाई है। साहित्यकारों ने तो दोनों मुल्कों को एक करने के लिए अपनी पूरी जान लगा दी है। अगर दिलों में भी मोहब्बत मर गई होती तो शायद श्री ननकाणा साहिब जाने वाले सिखों का वहाँ गर्मजोशी से स्वागत न होता, गुजरात की सीमा से सटे पाकिस्तान में खण्डहर बन चुके जैन मंदिरों को मुस्लिम अब तक संभाले न होते, शोएब के मन में सानिया का घर न होता, जाहिदा हीना जैसे लेखिका कभी पाकिस्तान की डायरी न लिख पाती और नुसरत फतेह अली खाँ साहिब, साजिया मंजूर, हस्न साहिब दोनों मुल्कों की आवाम के लिए कभी न गाते।

दिल चाहता है कि दोनों मुल्कों की सरकारों में साहित्यकार घूस जाएं, और मिटा दें राजनीतिज्ञों द्वारा जमीं पर खींची लकीर को। एक बार फिर हवा की तरह एवं अमन पसंद परिंदों की तरह सरहद लाँघकर बेरोक टोक कोई लाहौर देखने जाए, और कोई वहाँ से दिल्ली घूमने आए। पंजाब में एक कहावत आम है कि जिसने लाहौर नहीं देखा, वो पैदा ही नहीं हुआ, ऐसा होने से शायद कई लोगों का पैदा होना होना हो जाए। जैन समाज खण्डहर हो रहे अपने बहुत कीमती मंदिरों को फिर से संजीवित कर लें, हिन्दु मुस्लिम का भेद खत्म हो जाए और बाबरी मस्जिद का मलबा पाकिस्तान में बसते हिन्दुओं पर न गिरे। हवाएं कुछ ऐसी चलें कि दोनों तरह अमन की बात हो, वैसे भी पाकिस्तानी आवाम भारत को अपने बड़े भाईयों के रूप में देखती है।

जी हाँ, जब हिन्दुस्तान में महिला आरक्षण बिल पास हुआ था, तो पाकिस्तानी महिलाओं ने अपने हकों के लिए वहाँ आवाज़ बुलंद की, और दुआ की कि भारत की तरह वहाँ भी महिला शक्ति को अस्तित्व में ला जाए। भारत में जब अदालत का फैसला 'गे समुदाय' के हक में आया तो पाकिस्तान में 'गे समुदाय' भी आवाज बुलंद कर उठा, जो कई वर्षों से चोरी चोरी पनप रहा था, किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि भारतीय अदालत का फैसला पाकिस्तान में दुबक कर जीवन जी रहे गे समुदाय में भी जान फूँक जाएगा।

पाकिस्तानी आवाम व हिन्दुस्तानी जनता के दिलों में आज भी एक दूसरे के प्रति मोहब्बत बरकरार है, शायद यही कारण है कि पाकिस्तान में संदेश नामक सप्ताहिक अखबार की शुरूआत हुई, जो सिंध में बसते हिन्दु समाज की समस्याओं को पाकिस्तानी भाषा में उजागर करता है। पाकिस्तानी मीडिया हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचारों को ज्यादा अहमियत नहीं देता, लेकिन संदेश ने हिन्दु समाज के लिए वो काम किया, जिसकी कल्पना कर पाना मुश्किल है। इतना ही नहीं, पंजाबी बोली को बचाकर रखने के लिए पाकिस्तानी पंजाब में भी कई संस्थाएं सक्रिय हैं।

पाकिस्तान की सीमा से सटे पंजाब में कबूतर पालने का चलन आज भी है। लेकिन कबूतर पालकों की खुशी तब दोगुनी हो जाती है, जब कोई पाकिस्तानी अमन पसंद परिंदा उनकी छत्री पर एकाएक आ बैठता है। उनको वैसा ही महसूस होता है जैसा कि सरहद पार से आए किसी अमन पसंद व्यक्ति को मिलकर। काश! इन परिंदों की तरह मानव के लिए भी सरहदें कोई अहमियत न रखें। लेखक की दिली तमन्ना है कि एक बार फिर से Diwali में अली और Ramjan में राम नजर आएं।

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वरना, रहने दे लिखने को

रचनाकार : कुलवंत हैप्पी

तुम्हें बिकना है,
यहाँ टिकना है,
तो दर्द से दिल लगा ले
दर्द की ज्योत जगा ले
लिख डाल दुनिया का दर्द, बढ़ा चढ़ाकर
रख दे हर हँसती आँख रुलाकर
हर तमाशबीन, दर्द देखने को उतावला है
बात खुशी की करता तू, तू तो बावला है
मुकेश, शिव, राजकपूर हैं देन दर्द की
दर्द है दवा असफलता जैसे मर्ज की
साहित्य भरा दर्द से, यहाँ मकबूल है
बाकी सब तो बस धूल ही धूल है,
संवेदना के समुद्र में डूबना होगा,
गम का माथा तुम्हें चूमना होगा,
बिकेगा तू भी गली बाजार
दर्द है सफलता का हथियार
सच कह रहा हूँ हैप्पी यार
माँ की आँख से आँसू टपका,
शब्दों में बेबस का दर्द दिखा
रक्तरंजित कोई मंजर दिखा
खून से सना खंजर दिखा
दफन है तो उखाड़,
आज कोई पंजर दिखा
प्रेयसी का बिरह दिखा,
होती घरों में पति पत्नि की जिरह दिखा
हँसी का मोल सिर्फ दो आने,
दर्द के लिए मिलेंगे बारह आने
फिर क्यूं करे बहाने,
लिखना है तो लिख दर्द जमाने का
वरना, रहने दे लिखने को

20 साल का संताप, सजा सिर्फ दो साल!

देश का कानून तो कानून, सजा की माँग करने वाले भी अद्भुत हैं। बीस साल का संताप भोगने पर सजा माँगी तो बस सिर्फ दो साल। जी हाँ, हरियाणा के बहु चर्चित रूचिका गिरहोत्रा छेड़छाड़ मामले जिरह खत्म हो चुकी है, और फैसला 20 मई को आना मुकर्रर किया गया है, लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि सीबीआई एवं गिरहोत्रा परिवार ने मामले के मुख्य आरोपी को दोषी पाए जाने पर सजा अधिकतम दो साल माँगी। बीस साल का संताप भोगने के बाद जब इंसाफ मिलने की आशा दिखाई दी तो दोषी के लिए सजा दो साल माँगना, ऊंट के मुँह में जीरे जैसा लगता है।

- कुलवंत हैप्पी
उल्लेखनीय है कि रूचिका के साथ 12 अगस्त, 1990 को तत्कालीन आईजी व लोन टेनिस एसोसिएशन के अध्यक्ष एसपीएस राठौर ने छेड़छाड़ की थी। आज उस बात को दो दशक होने जा रहे हैं। इन दो दशकों में गिरहोत्रा परिवार ने अपनी लॉन टेनिस खिलाड़ी बेटी खोई, अपना सुख चैन गँवाया, गिरहोत्रा परिवार के बेटे ने चोरी के कथित मामलों में अवैध कैद काटी, पुलिस का जुल्म ओ सितम झेला, लेकिन जिसके कारण गिरहोत्रा परिवार को इतना कुछ झेलना पड़ा वो आजाद घूमता रहा बीस साल, अब जब उसके सलाखों के पीछे जाने का वक्त आया तो सजा माँगी गई दो साल।

हो सकता है कि जो धाराएं पूर्व हरियाणा पुलिस महानिदेशक एसपीएस राठौर के खिलाफ लगाई गई हैं, वो इससे ज्यादा सजा दिलाने के योग्य न हो, लेकिन हैरत की बात यह है कि दो साल तक की सजा दिलाने के लिए बीस साल तक संघर्ष करना पड़ा। अगर कोर्ट आरोपी को दोषी मानते हुए उक्त सजा सुना भी देती है तो गिरहोत्रा परिवार के साथ इंसाफ न होगा, क्योंकि गिरहोत्रा परिवार ने बीस साल संताप की सजा सलाखों के बाहर बिना किसी जुर्म के काटी है। हाँ, अगर गिरहोत्रा परिवार ने जुर्म किया तो वो यह है कि उसने एक रसूखदार व्यक्ति के विरुद्ध आवाज उठाई। सवाल तो यह उठता है कि इस केस को कोर्ट तक लाने वाली रुचिका की सहेली, जो विदेश में रहती है, और अपने पति के साथ आरोपी को सजा दिलाने के लिए अपनी जान जोखम में डाल भारत आती रही को क्या राठौर को मिलने वाली कुछ सालों की सजा सुकून मिलेगा?

राठौर को मिलने वाली इतनी कम सजा, किसी के लिए सबक नहीं बन सकती, बल्कि दुस्साहसियों के दुस्साहस को बढ़ाएगी। रसूखदारों ने कानून को कैसे रौंद दिया, इसकी उदाहरण बनेगी। क्या अब फिर उठेगी भारत की जनता राठौर के खिलाफ या फिर चुपचाप होते तमाशे का आनंद उठाएगी?

ब्लॉगी पत्रकारिता पीत पत्रकारिता?

नेट पर पीत पत्रकारिता
ब्लॉग जगत को आए दिन प्रिंट मीडिया के धुरंधर निशाना बनाते हैं। कागजों को काला करते हैं। क्या सच में ब्लॉग जगत के भीतर पीत पत्रकारिता होती है? जहाँ लिखने की आजादी हो, यहाँ लिखने वाला खुद संपादक हो? वहाँ ऐसी बात लागू होती है क्या? हो सकता है कि कुछ व्यक्ति विशेष ऐसा कर रहे हैं, लेकिन क्या पूरे ब्लॉग जगत पर पीत पत्रकारिता का ठप्पा लगाना सही है? आखिर क्यों बार बार ब्लॉग जगत को निशाना बनाया जा रहा है? ब्लॉग जगत को बार बार निशाना बनाया जाना, प्रिंट मीडिया के धुरंधरों की हड़बड़ाहट को झलकता है। ब्लॉगर साथियों में इस विषय पर कुछ भी लिखना नहीं चाहता था, लेकिन रहा न गया। आखिर आप ही बताएं क्या? ब्लॉग जगत में केवल पेज थ्री का मेटर आता है? क्या यहाँ अच्छी कहानियाँ, कविताएं, अद्भुत लेख प्रकाशित नहीं होते? क्या यहाँ छापने वाले व्यंग अखबारों में जगह नहीं बनाते? अगर हाँ तो फिर ब्लॉग को क्यों बार बार ऐसे मजाक बनाकर पेश किया जा रहा है। या तो फोकी शोहरत के लिए चाँद पर थूका जा रहा है। आपका सोचते हैं, अपनी प्रतिक्रियाएं दर्ज करवाएं।

हैप्पी अभिनंदन में शिवम मिश्रा

ब्लॉग ने पूरे हिन्दुस्तान को एक मंच पर ला खड़ा किया है, ब्लॉगिंग के बहाने हमको देश के कोने कोने का हाल जानने को मिल जाता है। देश का कितना बड़ा भी न्यूज पेपर हो, लेकिन आज वो ब्लॉग जगत के मुकाबले बहुत छोटा है। अखबार गली कूचों में बांट कर रह गया है, कारोबार ने उसकी सीमाएं बहुत छोटी कर दी। अखबार का दायरा जितना छोटा हुआ है, ब्लॉग जगत का दायरा उतना ही बड़ा हुआ है। जम्मू कश्मीर से मदरास तक और असम से गुजरात तक ही नहीं बल्कि हिन्दी ब्लॉगिंग का नेटवर्क तो सरहद पार विदेशों तक फैला हुआ है। इस नेटवर्क को एक एक ब्लॉगर ने बनाया है, ब्लॉग नेटवर्क एक माला की तरह है, जो एक एक मोती से बनती है। इस ब्लॉग रूपी माला में बहुत से मोती हैं, उन्हीं मोतियों में से एक मोती शिवम मिश्रा के साथ आज हैप्पी अभिनंदन में आप सबको रूबरू करवाने जा रहा हूँ, जो उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले से बुरा भला एवं जागो सोने वालों ब्लॉग को संचालित करते हैं। आओ आगे पढ़ें, कुलवंत हैप्पी  के सवाल और शिवम मिश्रा के जवाब।

कुलवंत हैप्पी : सबसे पहले जानना चाहेंगे कि आपकी जन्मस्थली कौन सी है और आपका जन्म कब हुआ?
शिवम मिश्रा : मेरा जन्म 15 मई, 1977 कों कोलकत्ता में हुआ। मैं 1997 तक कोलकत्ता में ही रहा और अपनी 12वीं तक की पढाई वहाँ की। इसे साल हम लोग मैनपुरी आ बसे यहाँ हमारी पुश्तैनी जमीन और मकान है।

कुलवंत हैप्पी : मिश्रा जी आपने ब्लॉग जगत में कब और कैसे आए?
शिवम मिश्रा : ब्लॉग जगत में मेरे खास दोस्त हिर्देश सिंह के प्रोत्साहन से आया। हिर्देश मैनपुरी एक जाने माने युवा पत्रकार है और अपना एक न्यूज़ चैनल चलाते हैं- सत्यम न्यूज़ के नाम से। मैंने अपनी पहली पोस्ट 31/03/2009 को लिखी थी। ब्लॉग जगत में आने का प्रमुख्य कारण यही था कि अपने मन की भावनायों को सब तक पहुंचाऊं अपने शब्दों में।

कुलवंत हैप्पी : आप ने बीच में ब्लॉगिंग से दूरी बना ली थी, कोई विशेष कारण?
शिवम मिश्रा : जी हाँ बीच में ब्लॉग जगत से दूर था, इस का केवल यही कारण था कि मेरे internet service provider द्वारा ब्लॉगर.कॉम तक मेरी पहुच बंद कर दी गई थी किसी तकनीकी कारण की वजह से वैसे अब जब लौटा हूँ तो आप जैसे मित्रों से पता चला है कि उन दिनों ब्लॉग जगत में काफी घमासान हुआ तो सोचता हूँ अच्छा ही हुआ कि दूर था।
 
कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग जगत में आपका अब तक का सफर कैसा रहा?
शिवम मिश्रा : अब तक का ब्लॉग जगत का सफ़र तो काफी बढ़िया रहा आगे खुदा मालिक।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगिंग के अलावा असल जिन्दगी में आजीविका के लिए क्या करते हैं आप?
शिवम मिश्रा : असल जीवन में ब्लॉगिंग के आलावा मैं एक investment consultant के रूप में कार्य कर रहा हूँ ख़ासकर बीमा क्षेत्र में।

कुलवंत हैप्पी : कोई ऐसा लम्हा जिसने कुछ अलग करने के लिए प्रेरित किया हो, और हमारे साथ बाँटना चाहते हों?
शिवम मिश्रा : देखिए अलग तो हम सब ही करना चाहते हैं पर सब से बहेतर यह होता है कि हम जो कर सकते है उसको ही और बहेतर तरीके से करे। मेरा तो मानना यही है।

चक्क दे फट्टे : शिवम : गधा मिठाई को देखकर क्या सोचता होगा? यार, हैप्पी : काश! यह मिठाई घास होती।

आज भी हीर कहाँ खड़ी है?

कुलवंत हैप्पी
समय कितना आगे निकल आया, जहाँ साइंस मंगल ग्रह पर पानी मिलने का दावा कर रही, जहाँ फिल्म का बज़ट करोड़ों की सीमाओं का पार कर रहा है, जहाँ लोहा (विमान) आसमाँ को छूकर गुजर रहा है, लेकिन फिर भी हीर कहाँ खड़ी है? रांझे की हीर। समाज आज भी हीर की मुहब्बत को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं। भले ही हीर के पैदा होने पर मातम अब जश्नों में तब्दील होने लगा है, लेकिन उसके ख़ाब देखने पर आज भी समाज को एतराज है। जी हाँ, बात कर रहा हूँ निरुपमा पाठक। जिसको अपनी जान से केवल इसलिए हाथ धोना पड़ा, क्योंकि उसने आज के आधुनिक जमाने में भी हीर वाली गलती कर डाली थी, एक लड़के से प्यार करने की, खुद के लिए खुद जीवन साथी चुनने की, शायद उसको लगा था कि डीडीएल की सिमरन की तरह उसके माँ बाप भी अंत में कह ही डालेंगे जाओ जाओ खुश रहो..लेकिन ऐसा न हुआ निरुपमा के साथ।

वारिस शाह की हीर ने अपने घर में भैंसों गायों को संभालने वाले रांझे से मुहब्बत कर ली थी, जो तख्त हजारा छोड़कर उसके गाँव सयाल आ गया था। दोनों की मुहब्बत चौदह साल तक जमाने की निगाह से दूर रही, लेकिन जैसे ही मुहब्बत बेपर्दा हुई कि हीर के माँ बाप ने उसकी शादी रंगपुर खेड़े कर दी। कहते हैं कि एक दिन रांझा खैर माँगते माँगते उसके द्वार पहुंच गया था, रांझे ने हीर के विवाह के बाद जोग ले लिया था। फिर से हुए मिलन के बाद हीर रांझा भाग गए थे और आखिर में हीर रांझे ने जहर खाकर जिन्दगी को अलविदा कह मौत को गले लगा लिया था। समाज भले ही कितना भी खुद में बदलाव का दावा करे, लेकिन सच तो यह है कि हीर आज भी इश्क के लिए जिन्दगी खो रही है। सुर्खियाँ तैयार करने वाली निरुपमा तो सुर्खियों में आ गई, लेकिन कितनी ही हीरें हैं जो सुर्खियों से दूर अतीत की परतों में दफन होकर रह जाती हैं।

मुझे याद है, वो कृष्णा गली, जिससे मैं रोज़ गुजरता था, ऑफिस जाते हुए और घर आते हुए। वहाँ एक लड़की रहा करती थी, जिसकी उम्र उस समय बड़ी मुश्किल से सोलह साल के आसपास होगी। काफी सुंदर थी, उसके चाँद से चेहरे पर कोई दाग नहीं था, शायद तब तो उसके किरदार पर भी कोई धबा न होगा। फिर मैंने वो गली छोड़ दी, गली ही नहीं शहर भी छोड़ दिया। लेकिन जब कुछ समय बाद मैं अपने शहर लौटा और उस गली से गुजरा वो चेहरा वहाँ न था। उसकी गली से दो तीन दफा गुजरा, लेकिन वो चेहरा नजर नहीं आया, बाकी सब चेहरे नजर आए।

किसी ने कहा है कि जिसकी हमें तलाश होती है, हवाएं भी उसकी ख़बर हम तक ले आती हैं। ऐसे हुआ इस बार भी। मैं घर में बैठा था, और पास में महिलाएं बैठी बातें कर रही थी, महिलाएं चुप बैठ जाएं होना मुश्किल है। बातों से बात निकल आई कि उस गली में से एक लड़की ने कुछ पहले आत्महत्या कर ली, एक लड़के के साथ मिलकर। उनके मुँह से निकली इस बात ने मुझे जोर का झटका बहुत धीरे से दिया।

मैंने सोचा उसकी गली में बहुत सी लड़की हैं, वो तो अभी बहुत छोटी है, और उसका परिवार भी तो रूढ़िवादी सोच का नहीं हो सकता, लेकिन उनकी बातों से जो संकेत मिल रहे थे, बार बार उसकी तरफ इशारा किए जा रहे थे, जिसकी तस्वीर मेरे जेहन में थी। उसके साथ कोई रिश्ता भी नहीं, और बनाने की तमन्ना भी न थी, बस आसमान के चाँद की तरह उसको देखकर खुश हो लेना ही मेरे लिए काफी था। मैंने आस पास से जानकारी हासिल की तो पता चला कि उसने मेरे ही पड़ोस में रहने वाले लड़के के साथ नहर में कूदकर जान दे दी, उनकी मुहब्बत ट्यूशन में साथ पढ़ते-पढ़ते शुरू हुई, और नहर में डूबकर जान देने पर मुकम्मल।

एक और किस्सा याद आ रहा है, एक मित्र का, वो भी प्रियभांशु की तरह पत्रकार था, उसको भी किसी से प्यार था। कई सालों तक मुहब्बत पलती रही, एक दिन चोरी छिपे शादी भी हो गई, लेकिन लड़की के घरवालों को भनक लग गई, उन्होंने प्यार से लड़की को घर बुलाया और उसके बाद उसको ऐसा हिप्नोटाईज किया कि पत्रकार पर बलात्कार, बहकाकर शादी करने जैसे मुकद्दमे दायरे होने की नौबत आ गई, लेकिन पत्रकारिता के कारण बने रसूख ने उसको बचा लिया, और हीर दूसरे घर का श्रृंगार बनकर चली गई।

आखिर कब तक हीर ऐसे रांझे का दामन छोड़ दूसरे घर का श्रृंगार बनती रहेगी? आखिर कब तक हीर को मौत यूँ ही गले लगाती रहेगी? हीर को कब दुनिया खुद का जीवनसाथी चुनने के लिए आजादी देगी? कब सुनी जाएगी खुदा की दरगाह में इनकी अपील? कब मिलेगी इनको आजादी से हँसने और रोने की आजादी?

माँ दिवस पर "युवा सोच युवा खयालात" का विशेषांक

अगर आसमाँ कागद बन जाए, और समुद्र का पानी स्याही, तो भी माँ की ममता का वर्णन पूरा न लिख होगा, लेकिन फिर शायरों एवं कवियों ने समय समय पर माँ की शान में जितना हो सका, उतना लिखा। शायरों और कवियों ने ही नहीं महात्माओं, ऋषियों व अवतारों ने भी माँ को भगवान से ऊंचा दर्जा दिया है। आज माँ दिवस है, ऐसे शुभ अवसर पर विश्व की हर माँ को तहेदिल से इस दिवस की शुभकामनाएं देते एवं उनके चरण स्पर्श करते हुए उनकी शान में कवियों शायरों द्वारा लिखी रचनाओं से भरा एक पन्ना उनको समर्पित करता हूँ, एक छोटे से तोहफे के तौर पर।


खट्टी चटनी जैसी माँ।-निदा फाज़ली
बेसन की सौंधी रोटी पर,
खट्टी चटनी जैसी माँ।
याद आती है चौका बासन,
चिमटा फूँकनी जैसी माँ।
बाँस की खुर्री खाट के ऊपर,
हर आहट पर कान धरे। आगे पढ़ें

चार दीवार-इक देहरी माँ - सुधीर आज़ाद
चार दीवार-इक देहरी माँ
इक उलझी हुई पहेली माँ।
सारे रिश्ते उस पर रक्खे,
क्या क्या ढोए अकेली माँ।
सर्द रातों का ठंडा पानी,
जून की दोपहरी माँ। आगे पढ़ें 

आलोक श्रीवास्तव की रचना-अम्मा
धूप हुई तो आंचल बन कर कोने-कोने छाई अम्मा,
सारे घर का शोर-शराबा, सूनापन तनहाई अम्मा।
सारे रिश्ते- जेठ दोपहरी, गर्म-हवा, आतिश, अंगारे,
झरना, दरिया, झील, समंदर, भीनी-सी पुरवाई अम्मा।

सोनू उपाध्याय की रचना - माँ
तुम्‍हारी पहनी हुई इच्‍छाओं को माँ अक्‍सर तकता हूं
कांच में और नापता रहता हूं समय,
कि कितना शेष है मुझमें तेरे साथ।
वैसे समय के जिस्‍म में काफी बदलाव आएं हैं माँ
अक्‍सर छोटा और तंग पड़ जाता है माँ
अभी परसों ही तो दोपहर बनकर रिस गया था आंखों से.आगे पढ़ें


माँ याद आई व बरसात : समीर लाल "समीर"
आज फिर रोज की तरह
माँ याद आई!!
माँ
सिर्फ मेरी माँ नहीं थी
माँ
मेरे भाई की भी
मॉ थी
और भाई की बिटिया की
बूढ़ी दादी..
और

कैसे कहूँ कि माँ तेरी याद नहीं आती
चोट मुझे लगती, रक्त तेरी की आँख से बहता था
मेरे घर आने तक, साँस गले में अटका रहता था
कैसे कहूँ कि माँ तेरी याद नहीं आती
कैसे कहूँ कि माँ तेरी याद नहीं रुलाती

माँ, एक पवित्र नाम है : विनोद कुमार पाण्डेय
माँ, ममता का असीम स्रोत है
माँ, नश्वर जीवन की, अखंड ज्योत है
माँ, एक पवित्र नाम है,
माँ, के बिना जिन्दगी गुमनाम है।

हे माँ तेरी शान में
स्कूल से आते जब देरी हो जाती थी।
चिंता में आंखें नम तेरी हो जाती थी।
मेरी देरी पर घर में सबसे अधिक
माँ तू ही तो कुरलाती थी।
गलती पर जब भी डाँटते पिताश्री
तुम ही तो माँ बचाती थी।


पिता जी की ''अंतिम नसीहत ''
आपस में तुम अपने प्यार ,एकता ,हार हाल रखना '
बस तुम सब मिलकर 'अपनी माँ का ख्याल रखना '

तब, माँ, तेरी याद आती है : इंद्रानील भट्टाचार्यजी
जब संकट सामने होता है
जब झंझाबात घिर आता है
जब चारों ओर अंधेरा हो
तब, माँ, तेरी याद आती है

माँ : दीपक मशाल
आज भी तेरी बेबसी
मेरी आँखों में घूमती है
तेरे अपने अरमानों की ख़ुदकुशी
मेरी आँखों में घूमती है..
तूने भेदे सारे चक्रव्यूह
कौन्तेयपुत्र से अधिक
जबकि नहीं जानती थी
निकलना बाहर
या शायद जानती थी
पर नहीं निकली हमारी खातिर
अपनी नहीं अपनों की खातिर

लिखने कुछ और बैठा था...लिख बैठा माँ के बारे में।
गाँव के कच्चे रास्तों से निकलकर शहर की चमचमाती सड़कों पर आ पहुंचा हूँ। इस दौरान काफी कुछ छूटा है, लेकिन एक लत नहीं छूटी, फकीरों की तरह अपनी ही मस्ती में गाने की, हाँ स्टेज से मुझे डर लगता है। गाँवों की गलियाँ, खेतों की मिट्टी, खेतों को गाँवों से जोड़ते कच्चे रास्ते आज भी मुझे मेरी इस आदत से पहचान लेंगे, भले ही यहाँ तक आते आते मेरे रूप रंग, नैन नक्श में काफी बदलाव आ गए हैं। आगे पढ़ें