अर्ज है, नए साल की मुबारकवाद

गैरों को, अपनों को
हकीकत व सपनों को,

किसानों को, जवानों को
गजलों और तरानों को,

ग्रंथों को, किताबों को
काँटों और गुलाबों को

ब्लॉगरों को, पत्रकारों को
ब्लॉगों और अख़बारों को

जमीं को, आसमान को
किश्ती और विमान को

परिंदों को, जानवरों को
बसते हुए एवं बेघरों को

तुझको मुझको सब को
आज, कल व अब को

दीवाने को, दीवानी को
दुनिया के किसी भी कोने में बसते
हर हिन्दुस्तानी को
मेरी ओर से नया साल मुबारक हो







"हैप्पी अभिनंदन" में मिथिलेष दुबे


आज आप जिस ब्लॉगर हस्ती को मिलने जा रहे हैं, वो पेशे तो इंजीनियर हैं, लेकिन शौक शायराना रखते हैं। इस बात का पता तो उनकी ब्लॉगर प्रोफाइल देखने से ही लगाया जा सकता है, इस हस्ती ने अपना परिचय कुछ इस तरह दिया है "कभी यूं गुमसुम रहना अच्छा लगता है, कभी कोरे पन्नों को सजाना अच्छा लगता है, कभी जब दर्द से दहकता है ये दिल तो, शब्दों में तुझको उकेरना अच्छा लगता है"। इससे आप कई दफा मिले होंगे, पर ब्लॉग की जरिए, कविताएं लिखते हैं, लेकिन उससे ज्यादा वस्तुओं, शब्दों एवं अन्य चीजों के उत्थान पर कलम घसीटते हुए ही मिलते हैं, जो उनके गंभीर व्यक्तित्व एवं एक स्पष्ट व्यक्ति होने की पुष्टि करता है। निजी जीवन में क्रिकेट देखने व खेलने, लोगों से मिलने, घूमने एवं साहित्यिक पुस्तकों को पढ़ने में विशेष रुचि लेने वाले गायत्री एवं रामायण जैसी पवित्र किताबों से बेहद प्रभावित हिन्दी पुराने एवं दर्द भरे गीत सुनने के शौकीन मिथिलेश दुबे जी आज हमारे बीच हैं।


कुलवंत हैप्पी : आप पेशे से क्या हैं बताने का कष्ट करेंगे?
मिथिलेश दुबे : मैं पेशे से सर्वर इंजीनियर हूं, एचपी में।

कुलवंत हैप्पी : एचपी मतलब?
मिथिलेश दुबे : एचपी बोले तो प्रिंटर वाले जानते हो न,

कुलवंत हैप्पी : एचपी तो शायद गैस वाले भी हैं
मिथिलेश दुबे : नहीं! नहीं! मैं गैस वाला नहीं, आईटी वाला इंजीनियर हूं।

कुलवंत हैप्पी : इंजीनियर से कवि कैसे बने?
मिथिलेश दुबे : कोई ऐसी खास बात नहीं है, बस जो महसूस होता है शब्दों में लिख देता हूं।

कुलवंत हैप्पी : आप दिल्ली निवासी हैं या मेरी तरह अन्य शहर से हैं?
मिथिलेश दुबे : जी हाँ, आप ही की तरह अपने घर से दूर हूँ। मैं वाराणसी का रहने वाला हूँ, यहाँ तो कुछ बनने और कुछ सिखने आया हूँ।

कुलवंत हैप्पी : कैसी लगती है परदेसी जिन्दगी?
मिथिलेश दुबे : मैं तो हमेशा समझौते पर विश्वास करता हूँ, वो कहते हैं ना कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता, बस यही है जो हर गम को ढक देता है।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगिंग से कितना पुराना रिश्ता है? और आपके ज्यादा तरह लेख किसी न किसी वस्तु के उत्थान को लेकर होते हैं? इसके पीछे कोई खास वजह?
मिथिलेश दुबे : ब्लॉगिंग से मैं मई 2009 से जुड़ा हूँ, नहीं कोई खास रुची नहीं है, बस एक कोशिश होती है कि जो कुछ भी लिखूं उससे एक जन संदेश पहुंचे, उस लेख को पढ़ने के बाद जो उसे पढ़े उससे उसको कुछ मिले। बस यही सब जो इस तरह के लेख लिखने को मजबूर करता है। और अपनी संस्कृति अपनी सभ्यता से प्यार है इसलिए भी लिखता हूं।

कुलवंत हैप्पी : कोई ऐसा घटनाक्रम, जो हमेशा आपके जेहन की सतह पर तैर रहता हो?
मिथिलेष दुबे : रोचक तो नहीं, लेकिन हाँ एक ऐसी घटना जरूर है जो बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती रहती है। किस्सा है तब का, जब मैं कुछ दिनों पहले बिहार यात्रा पर था, वहाँ के रेलवे स्टेशन भागलपुर से मेरी दिल्ली के लिए गाड़ी थी। रात को करिब 11 बजे की गाड़ी थी, मैं स्टेशन पर समय से पहले पहुंच चुका था, लेकिन रेल गाड़ी करीबन तीन घंटे देर से आने वाली थी, तो मैं प्लेटफार्म पर टहलने लगा, और सोचा इसी बहाने समय व्यतीत हो जाएगा। मैं घूम फिर ही रहा था कि मेरे सामने एक छोटा बच्चा, जिसकी उम्र करीबन पांच से छ: साल के बीच की होगी, उसके हाथ में एक थाली थी, जिसमें आरती जैसा कुछ जल रहा था। वह मेरे पास आकर रुक गया और बोला कि पैसे दीजिए। मैंने पूछ क्यों, पैसे का क्या करोगे, उसने कहा कि मंदीर बनवाने के लिए पैसे इकट्ठा कर रहा हूँ, मैंने कहा कि तुम मंदिर बनाओगे, उसने कहा नहीं मेरे पापा बनवाएंगे, मैंने पूछा पढ़ते हो तो वह बोला है...। फिर मैंने जेब से उसे दस रुपये निकाल कर दे दिए। उसके बाद मैं आगे की ओर चला गया, कुछ देर इधर-उधर घूमा फिर एक जगह खाली स्थान देखकर बैठ गया। तभी मैंने देखा कि वह बच्चा जिसने मुझसे पैसे लिए थे, एक गोल मण्डली के साथ कहीं जा रहा है, और उसके साथ वाले बच्चो के पास भी एक-एक आरती की थाली थी। फिर मैं उनके पीछे लग गया, काफी दूर तक जाने के बाद वे लोग किसी झोपड़ी मे चले गये, मैं भी उनके पीछे गया, उसके बाद मैंने जो कुछ भी देखा विश्वास नहीं हुआ आंखों को। मैंने देखा कि वह बच्चा जिसे मैंने पैसे दिए थे, उसने सारे पैसे एक नौजवान आदमी को दे दिए, जो वहाँ लेटा हुआ था, और उसमें से कुछ पैसे उस आदमी ने उस बच्चे को दिए, इसी तरह सारे बच्चों ने एक एक कर अपने पैसे उसे दे दिए, और फिर वे बच्चे अपने काम पर लौट गए। बाद में इधर उधर पता करने पर पता चला कि ये आदमी इन लोगों का ठेकेदार है, जो इन्हें भीख माँगने के लिए इन्हें इनके पिता से लाया है, और बच्चों को कमीशन देता है। इस घटना को मैं बहुत देर तक सोचता रहा कि कैसे कोई बाप अपने बेटों से ऐसे काम करवा सकता है ।

चलते चलते : श्रीमान शर्मा जी हाथ में दूध का बर्तन लिए दूध वाले के पास पहुंचते ही बोले "क्या बात है? आज दूध में कुछ ज्यादा ही पानी मिलाने लग गए हो"। हाजिरजवाबी दूध वाला भी झट से बोला "नहीं साहिब! आपको गलत फहमी हुई है" आपको तो पानी में दूध मिलाकर देता हूँ।

"हैप्पी अभिनंदन" में राजीव तनेजा

हम आते मंगलवार फिर मिलेंगे किसी नई ब्लॉगर हस्ती के साथ, शायद आप भी हो सकते हैं वो ब्लॉगर हस्ती। जिन्दाबाद ब्लॉगर बस्ती। यहाँ मस्ती ही मस्ती।

आओ बनाएं "ऑल इंडिया एंटी-रेप फ्रंट"

टेनिस खिलाडी रुचिका गिरहोत्रा हत्या प्रकरण पर एक लेख पढ़ने के बाद मन में खयाल आया कि रुचिका जैसी हजारों बच्चियों को इंसाफ दिलाने के लिए क्यों न एक "ऑल इंडिया एंटी-रेप फ्रंट" बनाया जाए। इस कार्य को शिखर तक केवल ब्लॉगर जगत ही लेकर जा सकता है, क्योंकि आज भारत में से ही नहीं विदेशों में बैठे हुए भारतीय भी ब्लॉगिंग के कारण एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। ब्लॉगर एकता ही बलात्कार पीड़ित महिलाओं को इंसाफ दिला सकती है और उनको जिन्दगी जीने का फिर से एक मौका दे सकती हैं, ताकि रुचिका जैसे लड़कियां अपनी जिन्दगी से हाथ न धोएं। इनके हक में कलम घसीटने के अलावा इनके के लिए जमीनी स्तर पर भी काम किया जाना चाहिए। दिल्ली, मुम्बई, छतीसगढ़, गुजरात, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, असम, पश्चिमी बंगाल भारत के हर कोने में ब्लॉगर बैठे हुए हैं, जो ऐसी घटनाओं को देखते हुए ही कलम उठा लेते हैं। इतना ही नहीं, इन ब्लॉगरों में बहुत सारे डॉक्टर, बिजनसमैन, वकील, पत्रकार आदि पेशों से जुड़े हुए हैं, जो बलात्कार पीड़ित महिलाओं को इंसाफ दिला सकते हैं, मेरी आप सब से गुजारिश है कि कहीं से भी चुनो बस एक समाज सेवक चुनो, नेता नहीं और चलो शुरू करो एक ऐसा फ्रंट जो मासूम बच्चियों की जिन्दगियों से खेलने वालों को ऐसा सबक सिखाए, आने वाले कुछ सालों में इस फ्रंट की जरूरत ही न महसूस हो और हर महिला, बच्ची आजाद परिंदों की तरह सड़कों पर घूम सके। कलम घसीटते घसीटते अब कुछ पाँव भी घसीटना शुरू कर दे, तभी आपकी ब्लॉगिंग सार्थक होगी।

शौचालय से सोचालय तक


कल शाम श्रीमती वर्मा जी का अचानक फोन आया "आप जल्दी से हमारे घर आओ"। मैं उसकी वक्त सोचते हुए दौड़ा कि आखिर ऐसी कौन सी आफत आन खड़ी हुई कि उनको मुझे फोन लगाकर बुलाना पड़ा। मेरे घर से पाँच मिनट की दूरी पर श्रीमान वर्मा जी का घर है, मैंने अपने पैरों की चाल बढ़ाते हुए शीघ्रता के साथ उनके घर की तरफ बढ़ने की कोशिश की। दरवाजा खटखटाने की जरूरत न पड़ी, क्योंकि श्रीमती वर्मा ने दरवाजा खोलकर ही रखा था। मैंने देखा उनका रंग उड़ा हुआ था, जैसे कोई बड़ी वारदात हो गई हो। घर में फैले सन्नाटे को तोड़ते हुए मेरे स्वर श्रीमती वर्मा के कानों तक गए आखिर बात क्या हुई"। मेरी तरफ देखते हुए काँपते होठों से श्रीमति वर्मा बोली "मुझे बोले चाय बनाओ, मैं अभी आया"। "आखिर गए कहां, और कुछ बताकर गए कि नहीं" मैंने बात काटते हुए झट से कहा। श्रीमति वर्मा तुरंत बोली "कहीं नहीं गए"। "अगर कहीं गए ही नहीं तो टेंशन कैसी" मैंने कहा। "टेंशन इस बात की है कि वो पिछले दो घंटों से शौचालय में घुसे हुए हैं, मैंने कई दफा दरवाजा खटखटाया, लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आ रहा" अपनी आवाज को जोर लगाकर गले से बाहर फेंकते हुए श्रीमति वर्मा ने कहा। "क्या चाय से पहले आपका उनके साथ कोई झगड़ा हुआ था या किसी बात को लेकर मनमुटाव आदि" मैंने अपने चेहरे के हावभाव बदलते हुए श्रीमति वर्मा से पूछा। "वो सुबह से कम्प्यूटर के साथ चिपके हुए थे, आजकल उनको ब्लॉगिंग का नशा जो चढ़ा हुआ है" श्रीमति वर्मा ने कुछ उखड़े अंदाज में आते हुए कहा। "क्या बात है! वर्मा जी ने भी ब्लॉग शुरू कर दी" मैंने थोड़े उत्साह के साथ पूछा। "क्यों आपको भी इसकी लत लगी हुई है" श्रीमति वर्मा ने मेरी तरफ देखते हुए कहा। "नहीं! नहीं! मेरा तो दूर दूर तक इसके साथ कोई बावास्ता नहीं" हड़बड़ाहट में उत्तर देते हुए कहा। "जाने से पहले वो क्या कर रहे थे कुछ याद है" मैंने बात को पलटते हुए पूछा। 'हाँ...हाँ..याद आया वो किसी ललित शर्मा का ब्लॉग पढ़ रहे थे" श्रीमति वर्मा ने कुछ सोचते हुए कहा। " श्रीमति वर्मा जी फिर तो मुझे निकला चाहिए" मैंने अपने बालों में हाथ फेरते हुए और मुंद मुंद मुस्कराते हुए कहा। श्रीमति वर्मा ने बिना किसी देरी के कहा "और उनको क्यों निकालेगा"। "अब वो अपने भीतर की कला को बाहर निकालकर ही बाहर निकलेंगे" मैंने दरवाजे की ओर कदम बढ़ते हुए कहा। "श्रीमान शर्मा जी मैं कुछ समझी नहीं, आप क्या कहना चाहते हैं" श्रीमति वर्मा चेहरे पर अनजाने से हाव भाव लाते हुए पूछा। "शायद आपने ललित शर्मा का लेख नहीं पढ़ा" मैंने उनकी तरफ गंभीरता से देखते हुए कहा। ' ललित शर्मा जी कौन है? आखिर उन्होंने ऐसा क्या लिख दिया, जो शौचालय के भीतर उनको पिछले दो घंटों से बंद किए हुए है" उन्होंने टेबल पर रखे चल रहे कम्प्यूटर की तरफ बढ़ते हुए कहा। 'आप निश्चिंत रहें वो जल्द ही बाहर आ जाएंगे, फिलहाल मैं जा रहा हूं" मैंने श्रीमान वर्मा के घर का दरवाजा बंद करते हुए कहा। रात निकल गई श्रीमान वर्मा के घर से कोई फोन नहीं आया, जिसका मतलब था सब ठीक है कहते हैं न नो न्यू गूड न्यूज। अगली सुबह करीबन दस बजे के आसपास ऑफिस जाने से पहले मैं श्रीमान वर्मा जी के घर गया, देखा तो वर्मा जी टेबल पर उदास बैठे थे। "अब क्या हुआ" मैंने उनके पास जाकर कहा। 'पिछले एक घंटे से शौचालय जाने के लिए तरस रहा हूं, लेकिन तुम्हारी भाभी निकलने का नाम नहीं ले रही और इधर सूली पर जान अटकी हुई है" ज्यादा जोर न लगाते हुए रोता हुआ चेहरा बनाकर श्रीमान वर्मा जी बोले..उनकी स्थिति देखने लायक थी। "आखिर हुआ क्या" मैंने श्रीमान वर्मा की बाजू को पकड़ कर हिलाते हुए पूछा। 'तुमने उसको ललित शर्मा वाला लेख "जंगल कोठा का हिट मन्तर-इस्तेमाल करके देखो!" पढ़ने के लिए कह होगा कल जब मैं शौचालय में था, बस सारा खेल बिगड़ गया" श्रीमान वर्मा ने चेहरे को टेबल पर रखी बाजू पर टिकाते हुए कहा। 'अब आप पहेली ही पाते रहोगे कि कुछ साफ साफ भी बताओगे" मैंने थोड़ा गुस्से होते हुए कहा। "उसको आज कॉलेज में भाषण देना है और वो भाषण लिखने के लिए शौचालय में घुसी बैठी है और इधर जान निकले जा रही है" बहुत दयनीय हालत में श्रीमान वर्मा ने कहा। श्रीमान वर्मा की आंखों में बस आंसू नहीं निकले थे, बाकी तो कोई कसर न बची थी रोने में। 'अच्छा! अच्छा! अब समझ आया कि तुम्हारा शौचालय अब सोचालय बन चुका है" कुछ मजा लेते हुए मैंने कहा। इतने में दरवाजा खुलने की आवाज आई, फिर क्या था श्रीमान वर्मा जी ऐसे भागे कि जैसे कि आखिर निकलती हुई ट्रेन के पीछे कोई दूर का मुसाफिर भागता है। जितना दुखदायी श्रीमान वर्मा का चेहरा था, उससे कई गुना ज्यादा खुशनुमा चेहरा लेकर श्रीमति वर्मा जी शौचालय की तरफ से आई। "देखा कितनी जल्दी पड़ी है इनको, इनके पास तो सारा दिन ही पड़ा है सोचने के लिए, मुझे तो अभी कॉलेज जाना है" श्रीमति वर्मा ने मेरी तरफ देखते हुए कहा। मैंने "हाँ...हाँ में उत्तर देते हुए मन ही मन में सोचा कि अगर श्रीमति वर्मा जी कहीं आपने थोड़ी सी भी और देर कर दी होती तो श्रीमान वर्मा जी का सारा का सारा ज्ञान यहीं पर निकल जाता और बाद में लगाते रहते पोचा कि बाहर बैठकर ही क्यों नहीं सोचा।

एनडी तिवारी के नाम खुला पत्र

भारत का मीडिया रूसी मीडिया से बहुत अलग है। अब तक इस बात का अहसास तो श्रीमान नारायण दत्त तिवारी जी आपको हो ही गया होगा। भारतीय मीडिया ऐसी खबरों के लिए तो उतावला रहता है, वैसे तो आप भी कम नहीं हैं, सुर्खियां बटोरने के लिए क्या क्या हथकंडे नहीं अपनाते। आपका किस्सा आज पहली बार थोड़ी सार्वजनिक हुआ है, इससे पहले तो सुनना है कि मशहूर गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने भी आप पर गीत फिल्माया था, जिसके कारण उसको गाने बजाने के लिए सरकारी प्रोग्राम मिलने बंद हो गए थे। भले ही आपकी वजह से राजनेताओं की छवि धूमिल हो रही हो, लेकिन गर्भनिरोधक गोलियां बनाने वाली और कंडोम बनाने वाली कंपनियों को अच्छी कमाई हो रही है, क्या इन कंपनियों से आपको पैसा बगैरह आता है या फिर इस तरह की घटनाओं से चर्चा में आकर किसी सेक्स शक्ति बढ़ाने वाले तेल की कंपनी एवं दवाई की कंपनी के लिए ब्रांड दूत बनाने का इरादा है। अगर उक्त दोनों बातें नहीं तो यकीनन आपकी शर्त रूसी प्रधानमंत्री ब्लादिमीर पुतिन से लगी होगी, सबसे ज्यादा अपने देश में कौन बदनाम होता है। मुझे जहां तक मालूम पड़ता है उसकी राजनीतिक पहुंच आप से कुछ ज्यादा है, क्योंकि उन्होंने तो एक छोटी सी खबर प्रकाशित करने पर एक अखबार को बंद तक करवा दिया, उसने अखबार ने सिर्फ इतना लिखा था कि जिमनास्ट गर्लफ्रैंड एलिना काबाएवा के लिए वो अपनी पत्नी से तलाक ले सकते हैं। 

सुनने में तो यहां तक आया है कि पुतिन की उक्त महिला मित्र एलिना ने एक खूबसूरत बच्चे को जन्म दिया, उस अखबार के बंद होने पर दूसरों ने तो जुबां पर ताले लगा लिए, लेकिन सोशल नेटवर्किंग वेबसाईटों और ब्लॉगों ने उसकी खूब चर्चा की। तुम डर तो बिल्कुल नहीं किसी ने माना, अगर माना होता तो आपका कच्चा चिट्ठा सार्वजनिक न होता। कहीं इस बार वाला स्टिंग ऑपरेशन भी, वोट के बदले नोट की तरह तो नहीं, जो बाद में एक नियोजित स्टिंग ऑपरेशन बनकर सामने आए। मुझे लगता है कि पिछले दिनों वेश्यावृत्ति को लेकर कोर्ट ने सरकार से पूछा था, शायद आप जैसे नेताओं की हरकतों को देखते हुए लिया होगा, वरना जज को क्या जरूरत पड़ी थी। जज को समझ आ गई थी, तुम जैसे कभी सुधरने वाले तो हो नहीं, तुम्हारे केसों के चलते गरीबों को इंसाफ नहीं मिलता, उनकी फाइलें दबी रह जाती हैं और आपकी फाइलें निरंतर खुलती रहती हैं। पिछले साल तो एक बच्चे ने आपका बेटा होने का दावा किया था, शायद अब लग रहा है कि बहती गंगा में कुछ और लोग भी हाथ धोने वाले हैं।

इस शौक की वजह से आपने राज्यपाल का पद तो खो दिया, लेकिन एक राज्यपाल होते हुए सुर्खियां आपने ही बटोरी हैं, अगर वो पद अच्छा नहीं लग रहा था तो पहले ही त्याग पत्र दे देते, इतना बखाड़ा खड़ा करने की क्या जरूरत थी। मीडिया वालों के स्टिंग ऑपरेशन यकीन रहित होते जा रहे हैं, कुछ दिन टीवी वाले भी टीआरपी बढ़ा लेंगे और तुम्हारा नाम चर्चा में बना रहेगा। वैसे तो आपकी आदत ही कि बदनाम हुए तो क्या हुआ नाम तो हुआ। आपका चर्चा में आना कोई नई बात थोड़ी है, नई बात तो उस टीवी का चर्चा में आना है और उन महिलाओं का चर्चा में आना, जो तुम्हारे साथ फोटो सेशन करवा रही थी। वैसे तुम भी मुकर जाओगे तो तुम्हारा कोई क्या कर लेगा, अब कसाब को ही देखो...हाथ में हथियार लिए पकड़ गया, मगर मानता थोड़े है। वो तो कहता है कि मुझसा शरीफ ही कोई नहीं। लेकिन अंतिम आपसे निवेदन है कि आप अपने जैसे अन्य नेताओं को समझाए कि इस तरह चर्चा में मत आएं और कोर्ट का समय बर्बाद न करें। गरीबों की फाइलों को खुलने दें क्योंकि आपकी वजह से किसी गरीब परिवार की बलात्कार की शिकार लड़की को उम्र भर इंसाफ नहीं मिल पाता और वो उस इंसाफ के इंतजार में दुनिया से रुखस्त हो जाती है।

खुद के लिए कबर खोदने से कम न होगा


ऑफिस शौचाल्य के भीतर मैं आईने के सामने खड़ा अपने हाथ पोंछ रहा था कि मेरे कानों में एक आवाज आई कि कैसी है पारूल "मेरी गर्भवती पत्नी", मैंने कहा सर जी बहुत बढ़िया है और अगले महीने मैं पिता बन जाऊंगा, जो भी हो बस एक ही काफी है लड़का या लड़की। इतना सुनते ही उन्होंने कहा कि हम "हिन्दु" एक एक पैदा करेंगे और वो "मुस्लिम" चार चार पैदा करेंगे तो अपने ही देश में हम अल्पसंख्यक होकर रह जाएंगे। अब तो चुप और शांत बैठे हैं, वो हम पर भारी पड़ जाएंगे। इस बात से मुझे एक सर्वे याद आ गया, जिसमें कहा गया था कि विश्व में हर चौथे आदमी मुस्लिम है। मैंने इस बात का जिक्र किया, और हम शौचालय से बाहर आ गए, जहां सब लोग मजदूरों की तरह काम कर रहे थे, उन मजदूरों में भी शामिल हूं। सर जी द्वारा कहे शब्द मेरे दिमाग के आसमान पर बादलों की तरह मंडराते रहे, शुक्रवार "25 दिसम्बर 2009" की रात मुझे जब नींद नहीं आ रही थी, तो मैंने रात के करीब पौने दो बजे अपने पीसी को ऑन किया और लिखने बैठ गया, शायद इस बोझ को दिमाग से हटाने के बाद नींद आ जाए। मैं उनकी बात से सहमत नहीं हूं, शायद अन्य हिन्दुवादी सोच के लोग कहेंगे कि वो सही थी, वो भी सिर्फ इस लिए उनके मन में भी भय है, जो कभी दो धर्मों को एक सूत्र में नहीं बंधने देता। बिल्कुल सत्य है कि मैं उनकी बात को आज की स्थिति में स्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि जिस तरह महंगाई बढ़ रही है, जिस तरह रोजगार कम हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में बड़ा परिवार खुद के लिए कबर खोदने से ज्यादा और कुछ न होगा। बढ़ती हुई जनसंख्या किसी भी एक विशेष समुदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए खतरा है, मुझे नहीं लगता कि मेरे इस तर्क से कोई असहमत होगा। अगर मैं उक्त सीनियर पर्सन की बात को मान लूं तो मुझे बढ़ती ही मुस्लिम आबादी तो शायद न मारे, यकीनन मेरी गरीबी और बढ़ती मंहगाई ही मुझे मार डालेगी। आनी तो आखिर सबको मौत ही है, मारने वाला तो केवल साधन है। मुझे याद है, जब वो सर्वे रिपोर्ट रिलीज हुई थी तो मुस्लिम समुदाय के एक व्यक्ति ने उसको बड़े गर्व के साथ अपने ब्लॉग पर डाला था, लेकिन वो इसके दूसरे पहलू को समझ न सका। उसने एक पहलू देखा और खुशी के मारे मेंढक की तरह उछलने कूदने लगा। उसने एक बार भी न सोचा कि उसकी समुदाय के लोग महिलाओं को बच्चे पैदा करने की मशीन बनाए हुए हैं। उस समुदाय की महिलाओं के साथ अन्याय हो रहा है। वो न समझ सका कि उसकी बहन, उसकी पत्नी एवं उसकी माँ भी उसकी समुदाय का हिस्सा हैं। समुदाय कोई भी हो, प्रसव पीड़ा का दर्द तो सब महिलाओं को एक सा ही होता है। उसने उस रिपोर्ट को देखकर एक बार भी न सोचा कि उन महिलाओं के कलियों से कोमल अरमानों को कैसे कुचल दिया जाता है। जनसंख्या का बढ़ना खुशी की नहीं अफसोस की बात है। उसने कभी उन रिर्पोटों को नहीं पढ़ा होगा, जिसमें आए दिन लिखा जाता है कि पाकिस्तान में आज इतने लोग मारे गए, अफगानिस्तान में इतने मारे गए, वो भी तो उनकी समुदाय के ही लोग हैं। जब वो दूसरा पहलू देखेगा तो सोचेगा कि शायद अब अपनी समुदाय को बचाने के लिए कुछ किया जाए, उनको बढ़ती संख्या के कु-फायदे समझाए जाएं। मुस्लिम समुदाय में भी बहुत से पढ़े लिखे लोग हैं, जो जानते हैं कि बढ़ती संख्या उनके के लिए भी खतरा है। कई पढ़े लिखे एवं समझदार मुस्लिम घरों में मैंने एक दो बच्चे देखें हैं। शायद वो भी मेरी तरह ही इस स्लोगन पर विश्वास करते हो "छोटा परिवार सुखी परिवार", असल में ही जिसने भी इस स्लोगन को तैयार किया होगा, कसम से वो व्यक्ति बहुत सकारात्मक सोच रखता होगा। उसने दुनिया के लिए एक बहुत शानदार और बढ़िया काम किया है। जिस तरह जनसंख्या बढ़ रही है, उसको देखते हुए मुझे ओशो की एक किताब में दर्ज एक बात याद आती है कि अलबर्ट आइंस्टीन से पूछा गया तीसरे विश्व युद्ध के बारे में आप क्या कुछ कहना चाहते हैं? उन्होंने उत्तर दिया कि मुझे अफसोस है कि मैं तीसरे विश्व युद्ध के बारे में तो कुछ भी नहीं कह सकता, लेकिन यदि तुम चौथे के बारे में जानना चाहते हो तो मैं कुछ बता सकता हूं। प्रश्न पूछने वाले ने थोड़ी देर सोचने के बाद पूछा कि चलो आप चौथे विश्व युद्ध के बारे में ही कुछ बता दो...तो उन्होंने उत्तर दिया, उसके बारे में मैं तो इतना ही कह सकता हूं कि चौथा विश्वयुद्ध कभी नहीं होगा।

माँ


ईश्वर नहीं देखा और देखने की इच्छा भी न रही, माँ देखने बाद। सच में अगर किसी ने गौर से माँ को देखा हो, वो ताउम्र किसी भगवान के इंतजार में बर्बाद नहीं करता। अफसोस है कि ईश्वर के चक्कर में मनुष्य माँ को याद नहीं करता। जहां भी माँ शब्द आ गया, कसम खुद की, खुदा की नहीं, जो देखा नहीं उसकी कसम खाना बेफजूला लगता है मुझे, वो हर पंक्ति अमर हो गई। माँ के बारे में मशहूर शायर मनुव्वर राणा कुछ इस तरह लिखते हैं।

इस तरह मेरे गुनाहों को
वो धो देती है
माँ बहुत गुस्से में होती है
तो रो देती है।

घेर लेने को मुझे जब भी बलाएँ आ गयीं
ढाल बनकर सामने माँ की दुआएँ आ गयीं

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है

मैंने कल शब "रात" चाहतों की सब किताबें फाड़ दी
सिर्फ इक कागज पर लिक्खा लफ्ज-ए-मां रहने दिया।

मुझे माँ शब्द से इतना प्यार है कि कुछ महीने पहले मैं एक किताबों की दुकान पर गया कुछ किताबों पर सरसरी निगाह मारने के लिए, लेकिन नजर दौड़ाते मेरी नजर पुरानी सी बारिश के कारण शायद नमी लगने से खराब हो चुकी एक किताब पर पड़ी, जो कई किताबों के तले दबी हुई थी, जिसका नाम एक शब्द में था वो शब्द था माँ, जो मुझे सबसे प्यारा है। आजकल तो मेरा स्नानघर में मंत्र जाप भी माँ शब्द है। इस किताब को मैंने उस वक्त सिर्फ इस लिए खरीद लिया क्योंकि इस पर माँ लिखा हुआ था। मगर जब घर जाकर मैं इसके विस्तार में उतारा तो असल में ही रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की ने मेरी साक्षात्कार एक माँ से करवा दी। इस माँ में मुझे बस माँ ही नजर आई, और कुछ नहीं। वो माँ जो बेटे का दर्द देखते ही तिलमिला उठती है, वो माँ देखी, जिसका बेटे को अच्छाई के रास्ते पर चलते देख गर्व से सीना फूल उठता है। वो माँ देखी, जो अपने बेटे के लिए हर बला अपने सर लेने के लिए तत्पर्य है, जैसे कि ऊपर मनुव्वर राणा ने एक शेयर में अर्ज किया है। इतनी गुजारिश आपसे तुम मंदिर न जाओ भले, तुम मस्जिद और गिरजाघर न जाओ भले, बस दिन में एक बार ही सही माँ को प्रेम से देख लिया करो।

औरत का दर्द-ए-बयां


शायद आज की मेरी अभिव्यक्ति से कुछ लोग असहमत होंगे। मेरी उनसे गुजारिश है कि वो अपना असहमत पक्ष रखकर जाएं। मैं उन सबका शुक्रिया अदा करूंगा। मुझे आपकी नकारात्मक टिप्पणी भी अमृत सी लगती है। और उम्मीद करता हूं, आप जो लिखेंगे बिल्कुल ईमानदारी के साथ लिखेंगे। ऐसा नहीं कि आप अपक्ष में होते हुए भी मेरे पक्ष में कुछ कह जाएं ताकि मैं आपके ब्लॉग पर आऊं। बेनती है, जो लिखें ईमानदारी से लिखें।


(1)
दुख होता है सबको
अब जब मर्द के नक्शे कदम*1 चली है औरत
क्यों भूलते हो
सदियों तक आग-ए-बंदिश में जली है औरत

*1 मर्दों की तरह मेहनत मजदूरी, आजादपन, आत्मनिर्भर

(2)
आज अगर पेट के लिए बनी वेश्या,
तुमसे देखी न जाए
जबरी बनाते आए सदियों से उसका क्या।
बनाने वाले ने की जब न-इंसाफी *1
तो तुमसे उम्मीद कैसी
तुम तो सीता होने पर भी देते हो सजा।

1* शील, अनच्छित गर्भ ठहरना

(3)
निकाल दी ताउम्र हमने गुलाम बशिंदों की तरह
चाहती हैं हम भी उड़ना शालीन परिंदों की तरह
लेकिन तुम छोड़ दो हमें दबोचना दरिंदों की तरह

(4)
घर की मुर्गी दाल बराबर तुम्हें तो लगी अक्सर
फिर भी तेरे इंतजार में रात भर हूं जगी अक्सर
न बाप ने सुनी, न पति ने और न बेटों ने
तो क्या सुननी थी मेरी चारदीवारी और गेटों ने

(5)
मैं करूं तो शील भंग होता है,
परम्पराएं टूटती हैं इस तहखाने की
काम से देर रात लौटूं,
तो निगाहें बदल जाती हैं जमाने की

(6)
तुम इंद्र बन नचाओ ठीक,
हम शौक से कदम थपथपाए
वो भी गुनाह हो गया
तुमने रखे रिश्ते हजारों से
हमने एक से बना
तो सब कुछ फनां हो गया
इस पंक्ति में मैंने हीर को देखा है, जो रांझा से बेहद प्यार करती है, लेकिन जब वो घरवालों बताती है तो उनका जवाब होता है कि हम बर्बाद हो गए। प्रेम कोई गुनाह नहीं, फिर भी अगर लड़की कहे तो गुनाह है, अगर वहां बेटा हो तो कोई बात नहीं, सोचेंगे।

ज्यादातर औरतें हमेशा एक में ही विश्वास करती हैं। उनको किसी दूसरे का प्रेम नहीं छलता। दूसरे का प्रेम उनको छलता है, जो अनदेखी का शिकार होती हैं, जिनको उनका पति केवल सेक्सपूर्ति की मशीन बनाकर रखता है।

"हैप्पी अभिनंदन" में राजीव तनेजा


'हंसते रहो' ब्लॉग के जरिए आप इस ब्लॉगर हस्ती से कई दफा मिले होंगे। इनकी लिखी कहानियां, किस्से और व्यंग पढ़कर आपको अच्छा लगा होगा। और आपके मन में कई दफा इनके बारे में जानने की इच्छा उठी हो गई, जैसे सागर में लहरें। मगर जब आप इस हस्ती की प्रोफाईल पर गए होंगे तो वहां पर आपको सिर्फ और सिर्फ ब्लॉग पते मिले होंगे या फिर उनके रहने का स्थल जहां वो रहते हैं दिल्ली। उनकी पसंदीदा फिल्में शोले एवं शक्ति, उनका पसंदीदा संगीतकार आरडी बर्मन। इसके अतिरिक्त एक बहुत शानदार पिक्चर मिली होगी, जिसमें एक शख्स चश्मा लगाए, नीचे निगाहें कर बैठा हुआ है। और उसके गोल चेहरे पर कुछ सोच रहे होने की स्थिति का वर्णन साफ नजर आ रहा होगा। आज मैं जिस ब्लॉगर हस्ती से आपको मिलवाने जा रहा हूं, वो कोई और नहीं बल्कि हम सब उनको राजीव तनेजा के नाम से जानते हैं, और उनके ब्लॉगों के जरिए उनको पहचानते हैं। पिछले दिनों उन्होंने अमिताभ बच्चन को खुल्ला पत्र लिखने का साहस किया था। बच्चन जी..आप पहले सही थे या अब गलत हैँ?



कुलवंत हैप्पी : आपको ब्लॉगिंग के बारे में कब और कैसे पता चला?
राजीव तनेजा : ब्लॉगिंग करते हुए लगभग तीन साल हो गए हैं। पहले मैं रोमन में लिखा करता था और याहू के ग्रुपस में भेजा करता था। एक दिन एक गूगल ग्रुप 'हिन्दी कविता' जॉयन कर लिया। वहाँ पर दूसरों को हिन्दी(देवनागरी) में पोस्ट करते देख हैरानी हुई। गूगल टॉक के जरिए एक मित्र बना। उसने में मेरी एक कहानी को रोमन से कनवर्ट कर देवनागरी में लिखा तो मैंने पाया कि उस कहानी का असर काफी ज़्यादा बढ़ गया है। बस फिर क्या था? उसी मित्र के ब्लॉग पर एक दिन हिन्दी टूलकिट नाम का औजार मिल गया। उसी के सहारे हिन्दी लिखना सीखा और फिर एक के बाद एक अपनी सभी पुरानी रचनाओं को थोड़े फेरबदल के बाद ठेलता गया और शुरू हो गया ब्लॉगिंग ब्लॉगिंग।

कुलवंत हैप्पी : आपकी कहानियां रोचक होती हैं, आप उनको पार्टस में क्यों नहीं देते?
राजीव तनेजा : अभी मुझे उसे किश्तों में बाँटना नहीं आया है, क्योंकि कभी कोशिश ही नहीं की, लेकिन अब करूँगा।

कुलवंत हैप्पी : आप एक अच्छे व्यंगकार भी हैं, आप सामाजिक बुराईयों पर व्यंग क्यों नहीं लिखते?
राजीव तनेजा : मेरी ज्यादातर कहानियाँ किसी ना किसी बुराई को लेकर ही लिखी हुई हैं। हां...कुछ एक अपवाद स्वरूप ज़रूर हो सकती हैं।

कुलवंत हैप्पी : एक बार आपने बताया था आप दुकानदार हैं।
राजीव तनेजा : जी हां। लकड़ी का बिज़नस है...लेकिन दातुन का नहीं।

कुलवंत हैप्पी : पेशे में कभी शौक आड़े तो नहीं आता?
राजीव तनेजा : कई बार, काम पर जल्दी पहुँचना होता है और रात को तीन-चार बजे तक लिखता रहता हूँ। लेकिन फिर भी मैं मैनेज कर लेता हूँ।

कुलवंत हैप्पी : तो ऐसे में परिवार को कब समय देते हैं?
राजीव तनेजा : श्रीमति जी मेरे आस-पास ही घूमती रहती हैं? जब मेरे काम की प्रशंसा होती है तो सबसे ज़्यादा उन्हें ही खुशी होती है। अब तो मेरी देखा-देखी बच्चे भी देवनागरी में लिखना सीख गए हैं।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगर जगत अब विशाल हो रहा है और नए नए दोस्त पाकर कैसा महसूस करते हैं आप?
राजीव तनेजा : बहुत बढ़िया! रोज समान रुचियों वाले नए साथी मिल रहे हैं। उनका स्नेह पाकर लिखने और पढ़ने की और हिम्मत बढ़ जाती है।

कुलवंत हैप्पी : आप एक नया ब्लॉग शुरू करने वाले थे ना "तनेजा जी से पूछिए" क्या हुआ?
राजीव तनेजा : बिल्कुल सही, लेकिन उसका नाम रखा था"तनेजा ही से पूछो", लेकिन फिलहाल उसे शुरू करने की अपने अन्दर हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूँ। उसमें मैं चाहता हूँ कि पाठक मुझसे सवाल पूछें और मैं उनके अजब-गजब जवाब दूँ। शायद अभी मैं खुद को इस लायक नहीं समझता कि सबकी कसौटी पर खरा उतर पाऊं।

जिन्दगी का एक हसीं पर जो आप हम सबके साथ बांटना चाहते हैं।
क्यों नहीं, बिल्कुल। मुझे जब भी वो चटनी से सरोबर गोलगप्पे वाला याद आता है तो अनायस ही चेहरे पे हँसी आ जाती है। हुआ कुछ इस तरह था कि होली से करीबन दो दिन पहले, उस समय मेरी उम्र यही कोई 12-13 बरस की रही होगी, जब मैं और मेरे बड़े भाई साहब जो मुझसे पाँच साल बड़े हैँ, अपने मकान की तीसरी मंजिल से नीचे सामने की बिल्डिंग वालों को पानी भरे गुब्बारे खींच-खींच कर मार रहे थे और वो हम पर। काफी देर से ये खेल अविराम चल रहा था। इसलिए हम दोनों भाई थक चुके थे। एक तरह से हमारा मुकाबला खत्म ही हो चुका था कि अचानक मैंने देखा कि सामने वालों के घर से एक लड़का अपने मकान के बाहर खड़ा गोलगप्पे वाले से गोलगप्पे खरीद रहा है। बस ये देखते ही मैंने झट से एक गुब्बारा खींच के उसकी तरफ मार दिया लेकिन उसकी अच्छी किस्मत और मेरी फूटी किस्मत कि वो गुब्बारा उसको लगने के बजाए सीधा जाकर गोलगप्पे वाले के सोंठ (चटनी) भरे बर्तन में धड़ाम से जा गिरा। उसके बाद तो उस बेचारे गोलगप्पे वाले का वो बुरा हाल हुआ कि बस पूछो मत। वो सर से लेकर पाँव तक चटनी से सरोबर हो गालियों पे गालियां बके जा रहा था और मैँ काटो तो खून नहीं। हाथ-पाँव फूल गए थे मेरे और भाई साहब भी घबरा कर परेशान हो उठे कि अब क्या होगा?। उन्होंने जल्दी से मुझे स्टोर रूम में छुपा दिया जहाँ पर मैं कई घंटे तक इस आस में छुपा रहा कि मामला ठन्डा हो तो मैं बाहर निकलूं। खैर! भाई साहब ने किसी तरह मामले को रफा-दफा किया। आज भी जब उस घटना के बारे में सोचता हूँ तो अनायस ही चेहरे पर हँसी आ जाती है। इसी घटना को मैँने अपनी एक कहानी"आसमान से गिरा" में भी लिखा था जो अभिव्यक्ति द्वारा प्रकाशित की गई थी और मुझे जिसके लिए पहला मानदेय भी मिला था।

चलते चलते : कल रात मेरे घर चोर आए। उन्होंने खगोल डाला घर का चप्पा चप्पा, और जाते जाते छोड़ गए एक चिट, जिस पर लिखा था "Join us"|

हम आते मंगलवार फिर मिलेंगे किसी नई ब्लॉगर हस्ती के साथ, शायद आप भी हो सकते हैं वो ब्लॉगर हस्ती। जिन्दाबाद ब्लॉगर बस्ती। यहाँ मस्ती ही मस्ती।

रंगीला गांधी पढ़ें और फैसला करें।

आप खुद ही फैसला करें। गलत है या सही। आपके समक्ष है वो किताब।

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विचलित होना छोड़ दो


तुम विचलित होना छोड़ दो। सफलता तुम्हारे कदम चुम्मेगी। कुछ ऐसा ही मेरा मानना है। तुम्हारा विचलित होना, किसी और के लिए नहीं केवल स्वयं तुम्हारे के लिए नुक्सानदेह है, जैसे कि क्रोध। विचलित होना तो क्रोध से भी बुरा है। विचलित मन तुम्हारे मनोबल को खत्म करता है। जब मनोबल न बचेगा, तो तुम भी न बचोगे। खुद के अस्तित्व को बचाने के लिए तुम को विचलित होना छोड़ना होगा, तभी तुम सफलता को अर्जित पर पाओगे।

आए दिन नए नए ब्लॉगर्स को बड़े जोश खरोश के साथ आते देखता हूं, लेकिन फिर वो ऐसे गायब हो जाते हैं, जैसे कि मौसमी मेंढ़क। इसके पीछे ठोस कारण उनके मन का अस्थिर अवस्था में चले जाना है। वो ब्लॉग ही इस धारणा से शुरू करते हैं कि हमसे अच्छा कोई नहीं। वो जैसे ही कोई पोस्ट डालेंगे तो टिप्पणियां ऐसे आएंगी, जैसे कि सावन मास में पानी की बूंदें। लेकिन ऐसा नहीं होता तो विचलित हो जाते हैं, और वहीं ब्लॉग अध्याय को बंद कर देते हैं। अगर उनका मन स्थिर हो जाए, और वो निरंतर ब्लॉगिंग करें तो शायद उनको सफलता मिल जाए, लेकिन पथ छोड़ने से कभी किसी को मंजिल मिली है, जो उनको मिलेगी। कई मित्र मेरे पास आते हैं, और कहते हैं कि ब्लॉग शुरू करना है और वो ऐसा करते भी हैं। लेकिन उक्त कारण से हताशा होकर वो ब्लॉगिंग को निरंतर नहीं रख पाते। ऐसे विचलित होते रहोगे कि तो किसी भी काम में सफलता हाथ न लगेगी।

एक किस्सा याद आता है। एक युवा गीतकार अपने हस्तलिखत गीतों की डायरी लेकर एक नामी गायक के पास गया। उसने गायक को अपने गीत दिखाए। गायक ने गीत देखे और कहा कि तुम्हारे विचार तो बहुत शानदार हैं, लेकिन इनको संवारना पड़ेगा। उस गायक ने उसके गीत न गाए। शायद वो गीत उस की गायन क्षमता के अनुकूल न थे। इस बात से युवा गीतकार हताश न हुआ, बल्कि उस युवा गीतकार ने गायक की एक बात अपने पल्ले बांध ली, जिसने उसका कभी मनोबल टूटने नहीं दिया। वो बात थी, तुम शौक से लिखते हो तो नतीजों की अपेक्षा मत करना। वरना तुम शौक से भी हाथ धो बैठोगे। कुछ दिनों बाद उस युवा गीतकर को रक्तदान पर एक गीत लिखने का ऑफर आया। उसने रक्तदान पर पांच मिनट में एक गीत लिखा, और वो रिकार्ड भी हो गया। इसके बाद उसने गीत मां शेरां वाली की भेंटें लिखी। कहते हैं कि सब का वक्त आता है, जब आता है तो तुम्हें उसकी उम्मीद भी नहीं होती। उसका लिखा गीत जब रिकार्ड हुआ तो उसको हर तरफ से वाह वाह मिलने लगी। इस गीत के बाद उसने उस सुखद पल का अहसास किया, जो उसने कभी सोचा न था। मंजिल कहती है कि तुम बढ़ो तो सही, मैं भी तेरी ओर चल दूंगी।

कैमरॉन की हसीं दुनिया 'अवतार'

शौचालय और बेसुध मैं

अहिंसा का सही अर्थ

'प्रेम'। जी हां, अहिंसा का सही अर्थ प्रेम है, लेकिन समाज ने इस शब्द का दूसरा अर्थ निकाल लिया कि किसी को मारना हिंसा होता है और न मारने की अवस्था अहिंसा, लेकिन गलत है। अहिंसा का अर्थ प्रेम। महावीर ने अहिंसा शब्द का इस्तेमाल किया, उन्होंने प्रेम का इस्तेमाल नहीं किया, क्योंकि प्रेम शब्द लोगों के जेहन में उस समय काम वासना के रूप में बसा हुआ था। लेकिन बाद में ओशो ने अहिंसा को प्रेम शब्द के रूप में पेश किया, क्योंकि अब स्थिति फिर बदल चुकी थी। लोगों ने अहिंसा का गलत अर्थ निकाल लिया था। मतलब किसी को नहीं मारना अहिंसा है। लेकिन ओशो कहते हैं कि अहिंसा का असली अर्थ प्रेम ही है, जो महावीर सबको समझाना चाहते थे। तुम जीव को नहीं मारते, तो मतलब तुम हिंसा नहीं कर रहे, ये तो गलत धारणा है। तुम को लगता है कि अगर तुमने जीव को मार दिया तो तुमसे जीव हत्या हो जाएगी और तुम नर्क के भोगी हो जाओगे। जहां पर तुमको दुख मिलेंगे, ये तो स्वार्थ एवं डर हुआ, अहिंसा तो न हुई। अगर तुम जीव से प्रेम करने लगो तो तुम उसके साथ इतना जुड़ जाओगे कि उसको मारे का ख्याल तक न आएगा, अब भी तो तुम अहिंसा के रास्ते पर हो। प्रेम करने से अहिंसा बदल तो न जाएगी। बस सोच बदलने की जरूरत है। अहिंसा का अर्थ प्रेम है, डर नहीं। तुम प्रेम करो। अहिंसा तो तुम्हारे साथ खुद हो लेगी। अगर तुम सोचते हो कि तुम किसी को मारते नहीं और तुम अहिंसा के पुजारी हो गए,तो तुम गलत हो। अगर कल को रास्ते में जाते हुए तुमको कोई गाली देने लगा तो तुम फिर से गुस्से हो जाओगे और उसको मारोगे। तब तो तुम हिंसक हो जाओगे। ये तो वैसा हुआ कि जैसे एक बंजर जमीं पर कुछ बीज गिरे हुए हैं, जो बारिश के आते फिर से हरे हो गए। वैसे ही तुम्हारे भीतर छुपी हुई हिंसा। तुम को अहिंसक होने के लिए प्रेम की जरूरत है। जब तुम प्रेम करने लगोगे, तो तुम खुद ब खुद अहिंसक हो जाओगे। हिंसा से बिल्कुल परे। प्रेम डर से नहीं दिल से होता है। तुम को डर से अहिंसक नहीं, प्रेम से अहिंसक बनो।

कैमरॉन की हसीं दुनिया 'अवतार'

टायटैनिक जैसी एक यादगार एवं उम्दा फिल्म बनाने वाले निर्देशक जेम्स कैमरॉन उम्र के लिहाज से बुजुर्ग होते जा रहे हैं, लेकिन उनकी सोच कितनी गहरी होती जा रही है। इस बात का पुख्ता सबूत है 'अवतार'। करोड़ रुपयों की लागत से बनी 'अवतार' एक अद्भुत फिल्म ही नहीं, बल्कि एक अद्भुत दुनिया, शायद जिसमें हम सब जाकर रहना भी पसंद करेंगे। फिल्म की कहानी का आधारित पृथ्वी के लालची लोगों और पेंडोरा गृह पर बसते सृष्टि से प्यार करने वाले लोगों के बीच की जंग है। पृथ्वी के लोग पृथ्वी के कई हजार मीलों दूर स्थित पेंडोरा गृह के उस पत्थर को हासिल करना चाहते हैं, जिसके छोटे से टुकड़े की कीमत करोड़ रुपए है, लेकिन उनकी निगाह में वहां बसने वाले लोगों की कीमत शून्य के बराबर है।

इस अभियान को सफल बनाने के लिए अवतार प्रोग्रोम बनाया जाता है। इस प्रोग्रोम के तहत पृथ्वी के कुछ लोगों की आत्माओं को पेंडोरा गृहवासियों नमुना शरीरों में प्रवेश करवाया जाता है। वो पेंडोरा गृहवासी बनकर ही पेंडोरा गृहवासियों के बीच जाते हैं, ताकि उन लोगों को समझा बुझाकर कहीं और भेजा जाए एवं पृथ्वी के लोग अपने मकसद में पूरे हो सकें। उसकी मुलाकात नाईत्रि (जो सल्डाना) से होती है, जो वहां के लोगों के मुखिया की पुत्री है, लेकिन धीरे धीरे फिल्म का नायक जैक सुली (सैम वर्थिंगटन) वहां के लोगों के बेहद प्यार करने लगता है, जो अपने विज्ञानी भाई के अधूरे मिशन को पूरा करने के लिए गया है। इस मिशन में शामिल कुछ और लोग भी जैक सुली की तरह उन लोगों को प्यार करने लगते हैं, लेकिन पृथ्वी के लालची मानवों को ये बर्दाशत नहीं होता, और शुरू होती है जंग। फिल्म आज के समाज को एक आईना दिखाती है कि कुछ कागज के टुकड़ों के लिए उन्होंने जन्नत को कैसे नर्क बना दिया। पेंडोरा गृह पर पैसा नहीं, वहां लालच नहीं। वहां तो एकता है, वहां कुदरत से प्यार करने वाले बाशिंदे हैं।

कैमरॉन ने बहुत दूर की सोची है, शायद भारतीय फिल्म निर्देशक और लेखक तो सदियों तक उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। फिल्म का नायक जैक सुली (सैम वर्थिंगटन) और नायिका जोई सलदाना (नेईत्रि) ने अपने किरदारों को बाखूबी अंजाम दिया। इसके अलावा खलनायक कर्नल मिलिज़ कैट्रिच की भूमिका निभा ने वाले सटिफ्न लैंग ने अपने किरदार में अपने उम्दा अभिनय से जान डाल दी जबकि मिशैल रोडरिग्स एवं सीगोर्नी विवर ने भी अपने किरदार को पूरी जी जान से निभाया है। वैसे असली शब्दों में तो जेम्स कैमरून नि:संदेह इस फिल्म के हीरो हैं। छोटी-छोटी बातों पर उन्होंने ध्यान रखा है और हर किरदार का ठीक से विस्तार किया है। विज्युअल इफेक्ट, कहानी और एक्शन का उन्होंने संतुलन बनाए रखा है और तकनीक को फिल्म पर हावी नहीं होने दिया है।

उन्होंने कहीं भी फिल्म को बोझिल नहीं होने दिया, जो उनकी निर्देशन कमांड का एक लाजवाब नमूना है। इस फिल्म का तकनीकी रूप से फिल्म लाजवाब है। फोटोग्राफी, स्पेशल/विज्युअल इफेक्ट, कास्ट्यूम डिजाइन, संपादन बेहतरीन है। लाइट और शेड का प्रयोग फिल्म को खूबसूरत बनाता है। इस फिल्म में सीजीआई (कम्प्यूटर जनरेटेड इमेज) के सबसे अत्याधुनिक वर्जन का प्रयोग किया गया है, जिससे फिल्म के ग्राफिक्स की गुणवत्ता और अच्छी हो गई है। जेम्स कैमरॉन की निगाह से के अद्भुत दुनिया की सैर 'अवतार'।

देख रहा हूं : काव्य रूप में कुछ चिंतन

खून खराबा होगा लाजमी,
आई पागल हाथ तलवार देख रहा हूं।

बल्बों की जगमगाहट बहुत
मगर मैं दूर तक अंधकार देख रहा हूं।

गुनगानों और विज्ञापनों से भरा
ख़बर रहित आज अखबार देख रहा हूं।

सब कुछ बदला बदला
एड मांगते दर दर पत्रकार देख रहा हूं।

न्याय के मंदिर में दबती
पैसों तले सच की पुकार देख रहा हूं।

क्रेडिट कार्डों की आढ़ में
चढ़ा सबके सिरों पर उधार देख रहा हूं।

उदास बैठा हर दुकारदार,
पर मैं भरा भरा सा बाजार देख रहा हूं।

क्या होगा मरीजों का
मैं डाक्टर को स्वयं बीमार देख रहा हूं।

तुम छोड़ो मेरे जैसों की
मैं जाते वेश्यालय इज्जतदार देख रहा हूं।

यहां बिगड़ा अनुशासन
आकाश में पंछियों की कतार देख रहा हूं।

कुदरत को रौंदा जिसने
कोपेनहेगन में उसकी आज हार देख रहा हूं।

जो निकला था सिर उठा
आईने के समक्ष खुद शर्मसार देख रहा हूं।

कल तक न पूछा जिन्होंने हैप्पी
बदला आज उनका व्यवहार देख रहा हूं।

महिलाओं की ही क्यों सुनी जाती है तब....

आज से कुछ साल पहले जब पत्रकार के तौर पर जब फील्ड में काम करता था तो बलात्कार के बहुत से केस देखने को मिलते। जब पुलिस वालों से विस्तारपूर्वक जानकारी हासिल करते तो 99.9 फीसदी केस तो ऐसे लगते थे कि जबरी बनवाए गए हैं। ज्यादातर होता भी ऐसा ही है, मेरा मानना है कि महिला के साथ सामूहिक बलात्कार होता है तो समझ आता है, या फिर एक व्यक्ति द्वारा उसको नशीले पदार्थ खिलाकर उसके साथ बलात्कार करना।

मगर जब दोनों होश में हैं लड़का और लड़की तो बलात्कार की बात समझ में नहीं आती, तब तो खासकर जब दोनों को खरोंच तक न आए। ये तो आम बात है कि जब कोई जोर जबरदस्ती करता है तो सामने वाला बचाओ करता है, उसके लिए जो बन पड़े करता है। इस लिए मेरा मानना है कि उनमें हाथपाई हो सकती है, खींचतान हो सकती है, लेकिन बड़ी आसानी से रेप तो नहीं हो सकता।

उन दिनों जब पुलिस वालों को लड़की के परिवार वालों द्वारा लिखाई रिपोर्ट पढ़ता तो पता चलता है कि असल में वो बलात्कार न थे, लड़के लड़की के अचानक पकड़े जाने पर जबरदस्ती बलात्कार केस बनवाए गए। ज्यादातर केस ऐसे ही होते थे, सामूहिक बलात्कार मामलों को छोड़कर क्योंकि वहां पर अकेली औरत का कोई बस नहीं चलता, लेकिन मेरा मानता है कि एक लड़की एक लड़के को तो आसानी से तो रेप नहीं करने दे सकती।

अगर दोनों में झड़प होती है तो दोनों का घायल होना भी लाजमी है, कपड़ों का फट जाना आदि आदि, लेकिन ज्यादातर केसों में ऐसा नहीं होता। मगर देश मे इस मामले मे विशेष महिला की सुनी गई है, बेशक वो महिला किसी के दबाव में ही क्यों न बयान दे रही हो। दूसरे पहलू को तो देखना ही नहीं, क्या पता सामने वाले का दोष हो ही न। जैसे आस्था, सत्य को न जानने की इच्छा है, वैसे ही बलात्कार मामले में महिला की सुनकर कान बंद कर लिए जाते हैं।

मुझे लगा कुछ तो लिखना चाहिए इस पर जब विदेश मंत्री कृष्णा का बयान पढ़ा, जिसमें लिखा है कि विदेशियों को सतर्क रहना चाहिए। इस बयान का मतलब है कि विदेशी हमको ऐसी नजर से देखें, जिससे हमें घृणा होने लगे। जैसे आज कुछ देशों में मुस्लमानों को देखा जाता है, जबकि सारे मुस्लमान आतंकवादी तो नहीं होते।

उनका उक्त बयान कांग्रेस सांसद शांताराम नाइक की विवादास्पद टिप्पणी "यदि एक महिला देर रात किसी अजनबी के साथ आती जाती है, तो ऐसे में बलात्कार मामलों को दूसरे तरीके से देखा जाना चाहिए" के बाद आया।


वो चाहती हैं होना टॉपलेस

पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान में आतंकवाद खत्म और स्थापित करने की बातें करने वाले अमेरिका में एक ऐसी चिंगारी सुलग रही है, जो आग का रूप धारण करते ही कई देशों के लिए खतरा बन जाएगी। जी हां, मैं तो उसको आग ही कहूंगा, क्योंकि जब मैं दूर तक देखता हूं तो मुझे उसके कारण तबाही के सिवाए और कुछ नहीं दिखाई देता, बेशक में बहुत ही खुले दिमाग का व्यक्ति हूं, शायद ओशो से भी ज्यादा फ्री माईंड का। मगर वहीं, दूसरी तरफ में उस समाज को देखता हूं जो चुनरी और बुर्का उतराने पर भी लाशों के ढेर लगा देता है। ऐसी स्थिति में उसको 'आग' ही कहूंगा। वैसे आग के बहुत अर्थ हैं। हर जगह पर उसका अलग अलग अर्थ होता है। गरीब के चूल्हे में आग जले, मतलब उसको दो वक्त की रोटी मिले। तुमको बहुत आग लगी है मतलब बहुत जल्दी है। उसमें बहुत आग है, ज्यादातर बिगड़ैल लड़की के बारे में इस्तेमाल होता है,  कहने भाव जो सेक्स के लिए मरे जा रही हों। आग को जोश भी कहते हैं, और कभी कभी कुछ लोग जोश में होश खो बैठते हैं, जैसे ज्यादा आग तबाही का कारण भी बन जाती है, वैसे ही ज्यादा जोश भी किसी आग से कम नहीं होता। मैं इसकी आग की बात कर रहा हूं। अमेरिका की कुछ महिलाओं के सीने में ऐसी चिंगारी धधक रही है, जो भयानक आग का रूप कभी भी धारण कर सकती है। इन महिलाओं की तमन्ना है कि वो सलमान खान की तरह शर्ट उतारकर घूमे। उनका मानना है कि अगर मर्द बिना शर्ट के घूम सकता है तो वो क्यों नहीं? अमेरिका जैसे शहर तो शायद इस बात को हजम कर लें, लेकिन इस्लामिक विचारधारा वाले देश और भारत जैसे देश तो ऐसी प्रथा को कभी स्वीकार नहीं करेंगे, और जहां तो खून खराबे होंगे। जिसकी मैं ऊपर बात कर रहा था। इस अधिकार की मांग करने वाला संगठन ने आने वाली 26 अगस्त 2010 को बराक ओबामा को मांग पत्र देने की ठान भी ली है, उस दिन महिलाओं को बराबरी का अधिकार मिले नौ दशक हो जाएंगे। इतना ही नहीं, इस संगठन ने 23 अगस्त के दिन को टॉपलेस डे घोषित भी कर दिया है, जिसके चलते 2009 में अमेरिका के अलावा कई अन्य देशों में उक्त तारीख को इन्होंने अपने इस अधिकार के लिए टॉपलेस होकर प्रदर्शन भी किए थे, जिनको कुछ प्रमुख अखबारों ने खूब करवेज दी थी। इतना ही नहीं, इस संगठन ने अपनी एक विशेष वेबसाईट गोटॉपलेस शुरू की हुई है, जिस पर वो इस अधिकार के पक्ष में लोगों को अपनी आवाज बुलंद करने की अपील करते हैं। जलवायु परिवर्तन से भी खतरनाक है, शायद ये सामाजिक परिवर्तण। ऐसा लग रहा है कि समाज उसी तरफ जा रहा है, जहां से वो शुरू हुआ था, बस फर्क है कि उसके छुपे के लिए जंगल न बचे, जिनमें आदि मानव जिन्दगी गुजरा करता था।

आखिर पूरी हुई करिश्मा की तमन्ना



करिश्मा कपूर की तमन्ना पूरी होने जा रही है ओनीर की अगली फिल्म 'यू एंड आई' से। खुद कमाने वाली हर औरत की तमन्ना होती है कि वो परिवार को संभालने के बाद एक बार फिर से अपने काम पर लौटे, जिससे उसकी पहचान थी। जिससे उसको गर्व महसूस होता है, जिससे वो आत्मनिर्भर बनती है।

अभिनेत्री करिश्मा कपूर ने संजय कपूर के साथ शादी करने के बाद फिल्मों में काम करना बंद कर दिया था, और अपना पूरा ध्यान परिवार की देखरेख में लगा लिया था, जैसा कि जया बच्चन, श्रीदेवी, माधुरी दीक्षित, काजोल, जूही चावला, सोनाली बेंद्रे,जैसी कई और अभिनेत्रियों ने किया। करिश्मा कपूर की समकालीन अभिनेत्रियों में से माधुरी दीक्षित, काजोल और जूही चावला ने तो वापसी कर ली, लेकिन करिश्मा कपूर पिछले एक दो साल से बस एक अच्छी कहानी की तलाश में थी, जैसे कि आरके बैनर कहता है कि अच्छी कहानी मिली तो फिल्में खुद बनाएंगे। आखिर आरके बैनर को तो कोई अच्छी कहानी मिली नहीं, मगर कपूर खानदान की बेटी को ओनीर की अगली फिल्म मिल गई, इसकी कहानी अच्छी है या बुरी ये तो जानते नहीं, लेकिन कहा जा रहा है कि ये फिल्म ऑस्कर विजेता फिल्म 'लाईफ इज ब्यूटीफुल' से प्रेरित है।

करिश्मा की वापसी कैसी होगी? इसके बारे में भी कह पाना बहुत मुश्किल है, क्योंकि बड़े पर्दे पर नई अभिनेत्रियों का राज हो रहा है, ऐसे में उनको टक्कर देने के लिए बहुत कुछ चाहिए। याद रहे कि इन नई अभिनेत्रियों में उनकी बहन करीना कपूर भी शामिल है, जिसको निर्देशकों ने साईन तो कर लिया, लेकिन जीरो फिगर से लेकर बिकनी पहनने के बाद भी उनकी फिल्में नहीं चली, जबकि कैटरीना कैफ सीधे और सिम्पल रोल करने के बाद भी निरंतर सफलता बटोरती जा रही है। यहां पर भी किस्मत की जरूरत पड़ती है, ऐसे में तो ज्यादा जब आप किसी बड़े बैनर के तले काम न कर रहें हों। गौरतलब है कि काजोल और माधुरी ने यशराज फिल्म्स बैनर की फिल्मों से वापसी की, लेकिन वापसी का फायदा केवल काजोल को मिला, माधुरी को तो फिर से प्रदेस जाना पड़ा। ऐसे ही बहुत सी अभिनेत्रियां हैं, जिन्होंने बहुत यत्न किए, लेकिन दर्शकों ने भाव नहीं दिया, इनमें विशेष रूप से सौदागर गर्ल 'मनीषा कोईराला', गदर गर्ल 'अमीषा पटेल' और रंगीला गर्ल 'उर्मिला मातोंडकर' शामिल हैं।

करिश्मा कपूर की समकालीन अभिनेत्री जूही चावला ने वक्त की नब्ज को समझा, और उम्र के हिसाब से रोल करने शुरू कर दिए, जबकि करिश्मा कपूर की पिछले कुछ सालों से तमन्ना रही है, वो ही राजस्थानी हिन्दुस्तानी वाले लीड रोल करने की, लेकिन करिश्मा भूल गई कि बॉलीवुड बदल चुका है, वहां पर लोकप्रियता देखकर पैसा फेंका जाता है। वहां फिल्में नहीं, प्रोडेक्ट बनते हैं, जो बहुत महंगे होते हैं, बिकते तो बिकते,  नहीं बिकते तो डिब्बा बंद वापिस होते हैं। करिश्मा को आखिर समझ आ गया कि अब वो करीना कपूर नहीं, इसलिए तो उन्होंने ओनीर की फिल्म झटपट साईन कर ली, जिसमें में उनके सामने होंगे संजय सूरी। डरो मत करिश्मा! सब चलता है, अगर तुम्हारी किस्मत चमक गई तो फिर से गोविंदा तुम्हारे साथ होगा, जिसके साथ जवान अभिनेत्री काम करने से मना कर रही हैं। बेस्ट ऑफ लक

जन्मोत्सव पर ओशो का संदेश


मेरा संदेश छोटा सा है: आनंद से जीओ! और जीवन के समस्त रंगों को जीओ। कुछ भी निषेध नहीं करना है। जो भी परमात्मा का है, शुभ है। जो भी उसने दिया है, अर्थपूर्ण है। उसमें से किसी भी चीज का इंकार करना, परमात्मा का ही इंकार करना है, नास्तिकता है। -ओशो

ये भी आपके लिए : रूहानी प्यार कभी खत्म नहीं होता  

वेबदुनिया रोमांस में कुलवंत हैप्पी


प्यार पर एक भाषण, वो भी लिखत रूप में, अच्छा लगा तो आपका समय वसूल, वरना फजूल। लिखना है अपना असूल, माफ करना हुई हो अगर भूल, क्योंकि गिर गिर कर ही सवार सिखता है सवारी।

आओ विश्वास के साथ क्लिक करें, रामगोपाल वर्मा की आग नहीं होगा, इतना वायदा करता हूं। फोटो पर क्लिक न करें, बल्कि इस लिंक पर क्लिक करें रूहानी प्यार कभी खत्म नहीं होता


क्या आप भी तरसे हैं प्याली चाय को


पिछले दिनों एक लम्बी यात्रा के बाद इंदौर फिर वापिस आया, लेकिन इस तीन हजार किलोमीटर लम्बी रेलयात्रा में एक स्वादृष्टि चाय की प्याली को मेरे होंठ तरस गए। अगर आप चाय पीने के शौकीन हैं तो रेल सफर आपके लिए खुशनुमा नहीं हो सकता, हर रेलवे स्टेशन के आने से पहले मन खुश होता था, शायद इस रेलवे स्टेशन पर देसी चाय मिल जाएगी, जो स्टॉव या गैस पर चायपत्ती, असली दूध और चीनी डालकर बनाई गई होगी। मगर इस सफर दौरान सैंकड़ों स्टेशन इस उम्मीद के साथ गुजर गए, लेकिन एक स्वादृष्टि चाय की प्याली नहीं मिली। ये वाक्य उन राज्यों में घटित हुआ, जो दूध के पक्ष से तो बहुत मजबूत है, पहला गुजरात, दूसरा राजस्थान, तीसरा हरियाणा और चौथा पंजाब। लेकिन इन राज्यों के रेलवे स्टेशनों पर केतलियों में भरी मसाला चाय ही मिली, जिसको पीना मैंने एक साल पहले ही छोड़ा है, जिस मसाला चाय को छोड़ा वो तो कंपनी की मशीन से कर्मचारियों के लिए मुफ्त में मिलती है, अगर वो मुफ्त की अच्छी नहीं लगती तो पांच रुपए खर्च वो घटिया चाय पीने को कैसे मन करेगा। भगवान की दुआ से, इस तीन हजार किलोमीटर की लम्बी यात्रा में दो जगह रुकना हुआ, एक तो ससुराल गुजरात में और दूसरा पंजाब अपने घर में। दोनों जगह मन भरकर चाय पी ली, ताकि वापसी के वक्त इस चाय के सहारे फिर इंदौर तक पहुंच जाऊं। रेलवे स्टेशनों पर मसाला चाय का मिलना मतलब दूध की कमी है, अगर आज ये हाल है तो आने वाले दिनों में क्या होगा। इन राज्यों की सरकारों को चाहिए कि वो किसानों को कृषि के साथ साथ पशूओं को रखने की हिदायतें जारी करे, ताकि सफेद क्रांति बरकरार रहे, नहीं तो काली चाय पर जीवन बसर करना पड़ेगा। मुझे याद है कि जब सुबह सुबह मेरे पिता बिस्तर पर से उठा करते थे, तो उनकी चारपाई के तले एक लोटा चाय पड़ी होती थी, ये दृश्य मेरे घर में ही नहीं बल्कि गांव के हर घर में देखा जा सकता था, था इसलिए शायद अब तो वो रीति भी खत्म हो गई होगी। उनको कांच के गिलासों में या चीनी मिट्टी के कपों में चाय मिलने लगी होगी, जो कभी स्टील के गिलासों में चाय पीते थे।

चलो, ओबामा की तो आंख खुली


कल तक अन्य देशों की तरह बराक ओबामा को भी पाकिस्तान की ताकत पर विश्वास था, ओबामा की सुर में सुर मिलाते हुए अमेरिकी नेता एक बात पर अटल थे कि पाकिस्तान अपने प्रमाणु हथियारों की रक्षा कर सकता था। यहां तक कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री श्री गिलानी ने भी दो दिन पहले भारतीय सेना प्रमुख के बयान को गैर-जिम्मेदारना ठहरा दिया था, लेकिन आज भारतीय सेना प्रमुख से दो कदम आगे बढ़ते हुए ओबामा ने कह दिया कि पाकिस्तान साजिशों का गढ़ है, वहां के प्रमाणु हथियार सुरक्षित नहीं है। क्या आज फिर श्री गिलानी अपना पुराना बयान जारी करने वाले हैं, जो दो दिन पहले भारतीय सेना प्रमुख के आए बयान के बाद किया था?

सत्य तो ये है कि अमेरिका ने इस बात को देर से स्वीकार किया है, अमेरिका ने इस बात को तब स्वीकार किया, जब कल इस्लामाबाद स्थित नौसेना के मुख्य दफ्तर को आतंकवादियों द्वारा निशाना बनाया गया। इससे पहले तो अमेरिका के नेताओं को पाकिस्तान पर विश्वास था, जहां तक कि भारत के भी कई नेता अमेरिकी सुर में सुर मिलाते हुए नजर आए। असल में, बराक ओबामा का जो बयान आज आया है, वो विगत 23 अक्टूबर को आना चाहिए था, जब आतंकवादियों ने न्यूकलियर हथियारों तक पहुंचने के लिए वायुसेना के एक ठिकाने पर हमला किया गया। आतंकियों ने पाकिस्तान के पंजाब में स्थित इस एयरबेस में घुसने की कोशिश की, लेकिन वे इसमें कामयाब नहीं हो पाए और गेट पर ही धमाका कर दिया। याद रहे कि इसी एयरबेस में पाकिस्तान के न्यूकलियर हथियार रखे हैं। इस हवाले के लगभग पांच दिन बाद पेशावर में एक आतंकवादी हमला हुआ था, जबकि उक्त हवाले के तीन दिन पहले आतंकवादियों द्वारा एक यूनिवर्सिटी को निशाना बनाया गया था।

जब आतंकवादी अ-विराम पाकिस्तान में अपनी ताकत का खिनौना प्रदर्शन कर रहे थे, तब तो अमेरिका पाकिस्तान की पीठ ठोकने पर लगा हुआ था, क्योंकि पाकिस्तान तालिबान के गढ़ों को फतेह करने के दावे जो करता जा रहा था। आखिर आज ओबामा को क्या हो गया? जब पाकिस्तान ने तालिबान के अधिकार वाले कई क्षेत्र में कथित तौर पर कब्जा कर लिया। कहीं पाकिस्तान जो अंकड़े दिखा रहा है वो भारतीय सत्यम कम्प्यूटर्स के पूर्व मालिक रामलिंगा राजू के अंकड़ों की तरह फर्जी तो नहीं, जिसका अंदाजा अमेरिकी नेतृत्व को पता चल गया हो।

कभी कभी सोचता हूं कि अगर पुलिस सभी चोरों लुटेरों को पकड़कर जेलों में बंद कर दे तो वो खाएगी क्या? इस तरह का हाल भी पाकिस्तान का है, अगर आतंकवाद उसकी जमीं से खत्म हो गया तो वो उसको खत्म करने के नाम पर मिलने वाले अरबों डॉलरों को प्राप्त कैसे करेगा? कुत्ते की पूंछ के सीधे होने की तो उम्मीद की जा सकती है, लेकिन पाकिस्तान के सुधरने और भारतीय नेताओं के जनता के छल-रहित रिश्ते स्थापित होने की उम्मीद करना तो मूर्खता होगी। इससे एक फायदा हो सकता है, अगर आपको यमराज पूछे कि आपकी मरने से पहले आखिरी इच्छा क्या है तो उक्त बात उसके सामने रख दीजिए, शायद आपको यमराज कभी नहीं ले जा सकता।


स्कूल नहीं जाती, क्योंकि उसको एड्स है


आज नीनू नौ साल की हो गई। आज वो आम बच्चों की तरह खेलती कूदती है, लेकिन स्कूल नहीं जाती, क्योंकि कोई उसको दाखिल नहीं देता, क्योंकि उसको एड्स है। इस बीमारी ने उसको जन्म से ही पकड़ लिया था, क्योंकि उसकी माँ इस बीमारी से पीड़ित थी, जब उसने अस्पताल में दम तोड़ा तो नीना केवल दो साल की थी, उसको नहीं पता था कि जिस बीमारी से उसकी माँ चल बसी, उसी बीमारी से वो भी पीड़ित है। उस दो साल की बच्ची को बठिंडा की समाज सेवी संस्था सहारा जनसेवा के प्रमुख विजय गोयल ने गोद ले लिया, और अपनी बेटी का रुतबा दे दिया। आज वो नीनू आकांक्षा गोयल के रूप में नौ वर्ष की हो गई, वो गोयल परिवार में आम सदस्यों की तरह जिन्दगी बसर कर रही है, लेकिन आम बच्चों की तरह किसी स्कूल में नहीं जाती, क्योंकि कोई दाखिला नहीं देता उसको। एड्स से पीड़ित बहुत से बच्चे हैं, लेकिन सबको विजय गोयल जैसा शख्स नहीं मिलता। विजय गोयल आज हम सबके लिए प्रेरणेता है, विजय गोयल वो शख्स है जो सिखाया है कि मानवता से बढ़कर कुछ नहीं होता। नीनू को माता पिता का प्यार देने वाले गोयल दम्पति एड्स पीड़ित बच्चों से नफरत करने वालों के लिए एक सबक है। एड्स पीड़ित बच्चों को सच में विजय गोयल जैसे लोगों की जरूरत है, अगर कोई संकल्प करना है तो इस दिवस पर विजय गोयल बनने का संकल्प करो।


रणभूमि की चलत-तस्वीर 'सेविंग प्राइवेट रेयान'


जज्बा किस चिड़िया का नाम है? युद्ध किसे कहते हैं? देश के लिए लड़ने वालों की स्थिति मैदान जंग में कैसी होती है? युद्ध के समय वहां पर क्या क्या घटित होता है? युद्ध सेनाओं से नहीं, हौंसलों से भी जीता जा सकता है। कुछ तरह की स्थिति को बयां करती है 1998 में प्रदर्शित हुई 'सेविंग प्राइवेट रेयान'।

फिल्म की कहानी शुरू होती है ओमाहा बीच जर्मनी से, जहां जर्मन फौजें और अमेरिकन फौजें आपस में युद्ध कर रही होती हैं। ओमाहा बीच पर उतरी अमेरिकन फौज की टुकड़ी की स्थिति बहुत नाजुक हो जाती है, पूरी टुकड़ी हमलावरों के निशाने में आने से लगभग खत्म सी हो जाती है। कुछ ही जवान बचते हैं, जो हौंसले के साथ आगे बढ़ते हुए दुश्मनों पर फतेह हासिल कर अपने मशीन को आगे बढ़ाते हैं। ओमाहा बीच पर उतरी टुकड़ी की अगवाई कर रहे कैप्टन जॉहन एच मिलर (टॉम हंक्स) को हाईकमान से आदेश मिलता है कि एक जवान को ढूंढकर उसके घर पहुंचाना है। उसके लिए कैप्टन मिलर को एक टीम मिलती है। युद्ध चल रहा है, लेकिन कैप्टन अपनी ड्यूटी निभाते हुए उस नौजवान जेम्स फ्रांसिस रेयान (मैट डॉमन) को ढूंढने निकल पड़ता है। इस दौरान उसको कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जो उसके जज्बे के आगे ढेर हो जाती है, प्रस्त हो जाती हैं। आखिर वो अपने दो साथियों को खोने के बाद जेम्स फ्रांसिस रेयान तक पहुंच जाता है और उसको वापिस जाने के लिए कहता है, मगर जेम्स अपने फर्ज को बीच में छोड़कर जाने के लिए तैयार नहीं होता। आखिर जंग के मैदान में दुश्मनों से लड़ते लड़ते कैप्टन मिलर और उसके अन्य आठ साथी अपनी जान गंवा देते हैं, जो रेयान को बचाने के लिए निकले थे।

युद्ध भूमि के दृश्यों को बहुत ईमानदारी के साथ फिल्माया गया है। युद्ध के दौरान सैनिकों की मनोवृत्ति किस तरह की हो जाती है, उसको भी खूब दिखाया है। साथियों की मृत्यु के बाद कैसे जवानों को आगे बढ़ना पड़ता है। कम गोला बारूद और औजारों के बिना भी दुश्मनों के साथ कैसे लोहा लेना पड़ता है को भी निर्देशक स्टीविन स्पीलबर्ग ने बहुत उम्दा ढंग से प्रस्तुत किया है। फिल्म की कहानी को पूरी कसावट के साथ निर्देशक आगे बढ़ाता है। हिन्दुस्तान में भी युद्ध पर काफी फिल्में बनी है, लेकिन हमारे यहां कुछ नियमों के चलते फिल्म निर्देशक युद्धभूमि को उतनी नजदीक से नहीं दिखा पाए, जितना कि स्टीविन ने अपनी फिल्म सेविंग प्राइवेट रेयान में दिखाया है। अगर अभिनय की बात की जाए तो टॉम हंक्स, मैट डॉमन, एडवर्ड बर्नस, जर्मनी डेविस, बेरी पाईपर, विन डीज़ल ने बहुत उम्दा अभिनय किया है।

एंजेल्स एडं डिमोंस - एक रोचक फिल्म



बाल दिवस-विशेष कविता

आज के बच्चे
कल के नेता
स्कूलों की सफेद दीवारों पर
नीले अक्षरों में लिखा पढ़ा अक्सर।

लेकिन अभिभावकों से सुना अक्सर
बनेगा मेरा बेटा बड़ा डॉक्टर,
इंजीनियर, या फिर कोई ऑफिसर।

किसी ने नहीं जाना
क्या चाहते हो तुम,
और कौन सी प्रतिभा है तेरे अंदर।

कभी टीचर ने, कभी अभिभावकों ने
बस नचाया
जैसे मदारी नचाए कोई बंदर।

हूं तो हिन्दुस्तानी
बीच में पढ़ाई छुड़वाती
बोली इंग्लिश्तानी

क्योंकि हिन्दी नहीं,
पास होना है तो इंग्लिश जरूरी

इस लिए न चाहते है
उसको पढ़ना है अपनी मजबूरी

एंजेल्स एडं डिमोंस - एक रोचक फिल्म


अगर आप एक रहस्यमयी, एक्शन एवं गंभीर विषय की फिल्में देखना पसंद करते हैं या हॉलीवुड अभिनेता टॉम हंक्स की अदाकारी के कायल हैं तो आपके लिए 'दी दा विंची कोड' से विश्व प्रसिद्धी हासिल कर चुके डान ब्राउन के उपन्यास आधारित फिल्म 'एंजेल्स एंड डिमोंस' एक बेहतरीन हो सकती है, इस फिल्म का निर्देशन 'दी दा विंची कोड' बना चुके हॉलीवुड फिल्म निर्देशक रॉन होवर्ड ने किया है।

कहानी : फिल्म की कहानी ईसाई धर्म के आसपास घूमती है। रोम कैथोलिक चर्च के पोप की मृत्यु के बाद नए पोप के चुनाव के लिए रीति अनुसार समारोह आयोजित होता है। नया पोप बनने के लिए मैदान में चार उम्मीदवार होते हैं, जिनका अचानक समारोह से पहले ही अपहरण हो जाता है। उनका अपहरण ईसाई धर्म से धधकारे गए इल्यूमिनाटी समुदाय के लोग करते हैं, जो विज्ञान में विश्वास रखते हैं। इल्यूमिनाटी चेतावनी देते हैं कि चार धर्म गुरूओं की बलि चढ़ा दी जाएगी और वैटीकन सिटी को रोशनी निगल जाएगी, मतलब विशाल धमाका होगा, जिसे वैटीकन सिटी तबाह हो जाएगी। उन दुश्मनों तक पहुंचने के लिए चिन्ह विशेषज्ञ प्रो. रोबर्ट लैंगडन (टॉम हंक्स) को बुलाया जाता है। उसकी मदद के लिए अभियान में विक्टोरिया (अयेलीट यूर्र) भी शामिल हो जाती है, जो सीईआरएन की सदस्य है, जहां से इल्यूमिनाटी परमाणु कैमिकल चुराते हैं, वैटीकन सिटी को उड़ाने के लिए। प्रो.रोबर्ट एवं विक्टोरिया दोनों मिलकर सुरागों के सहारे आगे बढ़ते हुए दुश्मनों तक पहुंचते हैं, इस दौरान कई रहस्य खुलकर सामने आते हैं। जो कहानी में रोचकता बरकरार रखते हैं।

कुछ खास : टॉम हंक्स एवं अयेलीट यूर्र ने अपनी अपनी भूमिका को जानदार बनाने के लिए जी जान से काम किया है, वो उनके चेहरों पर आते भावों से ही बयां होता है। एक उपन्यास को फिल्म में ढाल पाना बहुत मुश्किल होता है, लेकिन रॉन हावर्ड ने बहुत ही रोचक ढंग से इसको संभव कर दिखाया है। फिल्म की पटकथा में पूरी तरह कसावट है, कहीं भी फिल्म पकाऊ या बकवास नहीं लगती। फिल्म निरंतर अपनी रोचकता को लेकर आगे बढ़ती है। फिल्म की बैकराउंड में बजने वाला संगीत भी स्थितियों के बिल्कुल अनुकूल है। फिल्म के हर दृश्य को बहुत ही ध्यानपूर्वक फिल्माया गया है।

यादगर पल : जैसे कि प्रोफेसर का चिन्हों को देखकर इल्यूमिनाटी के इतिहास के बारे में बताना, दुश्मनों तक पहुंचने वाले संकेतों के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी देना, वैटीकन की ईसाई लाईब्रेरी की किताब से विक्टोरिया का पन्ना फाड़ना, लाईब्रेरी में लाईट का जाना प्रोफेसर का कांच तोड़ बाहर निकलना, अंत में इल्यूमिनाटी समुदाय की साजिश में शामिल लोगों का बेनकाब होना एवं धर्म गुरू पैट्रिक का आत्मदाह करना।


शब्द लापता हैं

कुछ लिखना चाहता हूं, पर शब्द लापता हैं
आते नहीं जेहन में कुछ इस तरह खफा हैं

चुप क्यों हो मां
कुछ तो बोलो
कहां से लाऊं वो शब्द
जो तेरा दर्द बयां करें

कहां से लाऊं पापा
बोलो ना
दर्द निवारक वो शब्द
जो तेरी पीड़ा को हरें

कहां से लाऊं वो शब्द
जो घर में हर तरफ
खुशी खुशी कर दें

कहां से लाऊं वो शब्द
जो भारत मां के जख्मों को
इक पल में भर दें

कहां से लाऊं वो शब्द
ए जान-ए-मन
जो तेरे मुझराए चेहरे को खिला दें

कहां से लाऊं वो शब्द
जो इक पल में
हिन्दु-मुस्लिम का फर्क मिटा दें

कहां से लाऊं वो शब्द
जो मेरे ख्यालों को
हर शख्स का ख्याल कर दें

कहां से लाऊं वो शब्द
जो कुलवंत हैप्पी को

सिद्ध 'मां का लाल' कर दें

आज की सबसे बड़ी खबर

आज की सबसे बड़ी ख़बर लेकर हाजिर हूं, मैं "खुसर फुसर", वैसे तो बड़ी खबरों को प्रस्तुत करने के लिए बड़े बड़े न्यूज एंकर होते हैं, लेकिन वेतन न मिलने के कारण सब के सब जेट एयरवेज के पायलटों से प्रेरित होकर अचानक सामूहिक छुट्टी पर चले गए। ऐसे में चैनल को चलाने के लिए मालिक ने मुझे एंकर बना दिया। कहीं जाईएगा मत, क्योंकि हम भी कहीं जाने वाले नहीं, ब्रेक तो तब ही आएगा, जब विज्ञापन होगा। विज्ञापन ही नहीं तो ब्रेक कैसा। हां हां हां... आज की बड़ी खबर है, जो कि है डंके की चोट पर लिखने वाले प्रभाष जोशी नहीं रहे! कलम में सियाही नहीं शब्दी बारूद रखने वाले प्रभाष जोशी लम्बी प्रवास पर चले गए, लेकिन उन्होंने जो अब तक पत्रकारिता को दिया है, वो उनकी मौजूदगी को सदैव जमीन पर कायम रखेगा। और जानकारी लेने के लिए सीधा चलते हैं...उनके घर पर नहीं बल्कि इधर उधर से जानकारी एकत्र करने के लिए, क्योंकि हमारे पास रिपोर्टर भी नहीं, जो सीधा प्रसारण करने में हमारी मदद करें। ऐसे में हमको सहारा लेना पड़ेगा ब्लॉग जगत का..वैसे भी तो हमारे चैनल वालों के पास रह ही क्या गया है? आप बस बने रहें, वरना मुझे न्यू एंकर बनने का जो मौका मिला वो भी चला जाएगा। राजीव के मिश्रा से मिली जानकारी क़िस्सागोई...कहानी अपनी-अपनी, वहीं विरोध से अम्बरीश कुमार का कहना है कि पत्रकारिता के एक युग का अंत , मीडिया मार्ग द्वारा प्रदान की गई जानकारी पत्रकारिता के भीष्म पितामह कहे जाने वाले देश के वरिष्ठतम पत्रकार प्रभाष जोशी का निधन, इंदौर में होगा अंतिम संस्कार , जब दिल्ली निवासी अविनाश वाचस्पति से संपर्क हुआ तो उन्होंने कहा कि प्रभाष जोशी यहीं हैं और यहीं रहेंगे (अविनाश वाचस्प्ति) , अभी अभी हमारे साथ जुड़े अलबेला अत्री की विशेष रिपोर्ट जब के के नायकर ने हँसा हँसा कर लोट पोट कर दिया पुरोधा पत्रकार प्रभाष जोशी को, गाहे-बगाहे पर प्रसारित रिपोर्ट के अनुसार बुजुर्ग पत्रकार प्रभाष जोशी नहीं रहे, बतंगड़ का कहना है कि अमर प्रभाष जोशी। चलो चलते हैं, नहीं नहीं रुकिए और एक ब्लॉगर भी जुड़े हैं हमारे साथ उनसे भी जानते हैं कुछ इस बारे में समकालीन जनमत का कहना भी है कि प्रभाष जोशी का निधन। अब तक मिली जानकारी कुछ इस प्रकार थी, अगर कोई ब्लॉगर इस नादान नवनियुक्त न्यूज एंकर से छूट गया हो तो भाई माफ करे।

सवारी अपने सामान की खुद जिम्मेदार

"सवारी अपने सामान की खुद जिम्मेदार" भारतीय बसों एवं रेलगाड़ियों में लिखा तो सबने पढ़ा ही होगा क्योंकि भारत में 99.9 फीसदी बसों रेलगाड़ियों पर ऐसा लिखा तो आम मिल जाता है। बसों व रेल गाड़ियों में लिखी ये पंक्ति आपको सफर करते वक्त चौकस रहने के लिए प्रेरित करती है और कहती है कि अगर आपका सामान गुम होता है तो उसकी जिम्मेदारी आपके सिर होगी। इस पंक्ति के चलते शायद हम सब चौकस हो जाते हैं, और अपने सामान को बहुत ध्यान के साथ रखते हैं।

पिछले दिनों सादगी के चक्कर में राहुल गांधी एवं अन्य सियासतदानों ने रेलगाड़ी में यात्रा की, शायद उन्होंने भी इस पंक्ति को पढ़ लिया है। यकीन नहीं होता तो याद करो गृह मंत्री पी.चिदंबरम के बयां को, याद करो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बयां को और कल आए सेना प्रमुख दीपक कपूर के बयां को।

इन सभी के बयां एक ही बात कह रहे हैं कि भारत पर फिर से मुम्बई आतंकवादी हमले जैसे हमले हो सकते हैं। बसों एवं रेलगाड़ियों में लिखी पंक्ति भी यही कहती है, लेकिन कहने का ढंग कुछ अलग होता है। वहां पर अगर ऐसा लिख दिया जाए कि आपका सामान चोरी हो सकता है, आपकी जेब कट सकती है, मगर वहां ऐसा नहीं लिखते, वहां लिखते समय शिष्टाचार की पालना की जाती है।

मगर सरकार इसके विपरीत जाते हुए सीधा कह रही है कि विस्फोट हो सकते हैं, आतंकवादी हमले हो सकते हैं, जिसका मतलब एक ही निकलता है कि देश में रहने वाले नागरिक अपनी सुरक्षा के खुद जिम्मेदार हैं, और उनको सुचेत रहने की जरूरत है।

खटिया पर किसी भी तरफ सिर रखकर सो जाओ, मगर कमर तो बीच में ही आएगी, अगर यकीन न आए तो खटिया पर लेटकर देखें। मानो या न मानो सरकार प्रेरित तो रेलों बसों में लिखी इस पंक्ति से ही है, लेकिन कहने का अंदाज कुछ अलग है। कहते हैं कि समझदार को इशारा ही काफी, न-समझ से माथापच्ची करने से क्या फायदा।

अगर 400 करोड़ रुपए का सुरक्षा बजट भी हमारी सुरक्षा नहीं कर सकता तो उस सुरक्षा बजट को पूरे भारतवासियों में बांट दिया जाए और जगह जगह लिख दिया जाए आप कभी भी कहीं भी आतंकवाद का शिकार हो सकते हैं।

मां और पत्नी के बीच अंतर

मां बन बिगाड़ती है औरत।
पत्नी बन संवारती है औरत॥

सत्य है या कोरा झूठ। मुझे नहीं पता, लेकिन पिछले सालों में जो मैंने देखा और महसूस किया। उसको समझने के बाद मुझे कुछ ऐसा ही लगा। मां भी एक औरत है और पत्नी भी, इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है, फर्क है।

बतियाने से कुछ नहीं होने वाला, चलो फर्क ढूंढने निकलते हैं। एक बच्चे का बाप बोल रहा "ये क्या कर रहे हो, हैप्पी! बस्ता सही जगह रखो" अब मां और एक पत्नी बोली "बच्चा है, कोई बात नहीं जाने दो"। हैप्पी अब जवान हो गया, किसी का पति हो गया। अब फिर एक पत्नी बोली "तुमने ये ऑफिस बैग कहां रखा है, तुमको बिल्कुल समझ नहीं"। याद रहे कि अब वो अकेली पत्नी है। अब हैप्पी सोचता है कि मां तुमने पहले बिगाड़ क्यों था, क्या पत्नी की डाँट खाने के लिए।

समीर तुमको कितने बार कहा है कि जूते सही जगह रखा करो और जहां वहां मत फेंका करो। एक पत्नी बोल रही है। अब उसको भी मां की याद आ रही है, जो कहती थी, कोई बात नहीं जब समीर एक जूते को इस कोने में तो दूसरे जूते को किसी ओर कोने में फेंक देता था और सुबह होते ही दोनों जूते एक जगह मिलते थे।

क्या ऑफिस जाने के जल्दी पड़ी रहती है, दो मिनट अविनाश लेट नहीं जा सकते, हमेशा ही आग लगी रहती है तुमको जल्दी जाने की। पत्नी की इन बातों को सुनते हुए अविनाश अतीत के पन्ने पलटता हुआ, बचपन के उन दिनों में पहुंचता है जब वो बिस्तर में पड़ा होता था। मां उसको लोभ देकर उठाती थी, जल्दी स्कूल चलो, नहीं तो बेटा लेट हो जाओगे। तुम पीछे रह जाओगे औरों से। तब सब कहते थे कितना समय का पाबंद है, लेकिन अब कहते हैं कभी तो समय पर आओ यार। यहां पर कौन गलत था मां या फिर पत्नी, सोचते सोचते दिन निकल रहे हैं।

राजीव तुमको खाने का सलीका भी नहीं, खाना कैसे खाते हैं? मैं तो पिछले कई सालों से ऐसा खा रहा हूं, किसी ने नहीं टोका। लेकिन मैं तुम्हें आज टोक रही हूं। इस पर ध्यान दो, आज तक की छोड़ो। राजीव दुखी है और सोचता है क्या मां कितने साल तुम अपने हाथों से खिलाती रही और कई साल तक मैं तेरे पास बैठकर खाता रहा। तुमने कभी मुझे इस तरह टोका नहीं। अगर मैं गलत था तो तुमने सुधार क्यों नहीं। तुम टोक देती तो पत्नी की डांट न खानी पड़ती। पता नहीं फिर कहां से एक आवाज आती, तुम फिक्र मत करो..वो संपादक जैसी है, जिसको कांट छांट करने की आदत है, वरना उसके संपादक होने का क्या मतलब।

याद है तुमको शादी के बाद से आपको बदलने लगती है वो, और अब हर रोज खुद ही कहती है कि तुम पहले से नहीं रहे। उसको पसंद पहले वाला ही है, लेकिन बदलाव करना उसकी फिदरत है। स्वीकार करो...वो जैसी भी है प्यार करो।



लंडन ड्रीम्स- द बेस्ट मूवीज


विपुल अमृतलाल शाह मेरी उम्मीदों पर खरा उतरा, बाकी का तो पता नहीं, बेशक हाल में तालियों की गूंज सुनाई दे रही थी और ठहाकों की भी। आँखें, वक्त, नमस्ते लंडन, सिंह इज किंग के बाद विपुल शाह की लंडन ड्रीम्स को भी शानदार फिल्मों की सूची में शुमार होने से कोई नहीं रोक सकता, खासकर मेरी मनपसंद शानदार फिल्मों की सूची से। सिंह इज किंग भले ही अनीस बज्मी ने निर्देशित की हो, लेकिन विपुल शाह का योगदान भी उसमें कम नहीं था, क्योंकि एक अच्छा निर्माता एक निर्देशक को अपने ढंग से काम करने के लिए अवसर देता है। लंडन ड्रीम्स शुरू होती है अजय देवगन (अर्जुन) से, जो संघर्ष कर सफलता की शिखर पर है, लेकिन वो अपने सपनों के लिए अपनों को खोने से भी भय नहीं खाता। वो बचपन से माईकल जैक्सन बनना चाहता है, लेकिन उसके पिता को गीत संगीत से नफरत है। वो भगवान से दुआ करता है कि उसके रास्ते की सब रुकावटें दूर हो जाएं। अचानक उसके पिता की मौत हो जाती है और उसका चाचा ओमपुरी उसको लंडन ले जाता है, जो उसका ख्वाब है। वो एयरपोर्ट से ही अपने चाचा का साथ छोड़कर सपनों को पूरा करने के लिए निकल पड़ता है। संघर्ष करते करते वो अपने सपने की तरफ अग्रसर होता है। इस दौरान उसको अपने दोस्त की याद आती है, जो पंजाब के एक गांव में रहता है। अर्जुन अपने दोस्त मनु को मिलने के लिए गांव आता है, अजुर्न ने संगीत सीखने के लिए संघर्ष किया। मगर मनु (सलमान खान) को गाने की कला भगवान ने गिफ्ट में दी है, लेकिन मस्तमौला स्वभाव का मनु अपने हुनर को नहीं जानता, वो गांव में ही अन्य नौजवानों की तरह मस्ती करते हुए ही जीवन गुजार देना चाहता है। जैसे ईगल साँप को अपने पंजों में फंसाकर आस्मां में ले जाती है, वैसे ही मनु का दोस्त अर्जुन अपने दोस्त को लंडन ले जाता है और शामिल कर लेता है लंडन ड्रीम्स बैंड में। ये बात तो कुदरती ही है कि कुदरत द्वारा बख्सी गई कला तालीम द्वारा हासिल की गई कला से बेहतर होती है। वो बिना मिलावट के होती है। मनु की सफलता अर्जुन के लिए जहर बनती जा रही थी। ये जहर ही मनु और अजुर्न की दोस्ती के बीच दरार बन जाता है। वो मनु को नशे की आदत डलवा देता है, तांकि वो गाना गा न सके और मनु को चाहने वाली असिन भी उसको छोड़ दे। आखिर राज खुल जाता है, सत्य सामने आ जाता है। जिसके बाद मनु अपने गांव वापिस आ जाता है और अर्जुन विदेश में अकेला पड़ जाता है। फिल्म का अंत आम फिल्मों की तरह सुखद होता है, लेकिन एक संदेश छोड़ते हुए। उस संदेश को समझने के लिए फिल्म देखनी होगी मेरे यारों। सलमान खान ने पंजाब के गांवों में बसने वाले मस्तमौला युवकों का रोल खूब निभाया तो अजय देवगन ने गंभीर रोल अदा करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी, गंभीर किरदारों में जान डालना तो अजय की खासियत है। फिल्म में असिन ने काम पूरी ईमानदारी के साथ किया है, वो भी बिल्कुल बिना ओवरएक्टिंग के। ओमपुरी का रोल छोटा है। सलमान खान और असिन पर निर्देशिक ने ज्यादा ध्यान दिया। फिल्म संगीत में थोड़ी मार खाती है, लेकिन कलाकारों के लिए पहनावा बिल्कुल को सही चुना गया है।


जाने अनजाने में ही सही, लेकिन विपुल शाह ने एक सच तो सबके सामने रख दिया है कि पंजाब के युवाओं में कला की कोई कमी नहीं, लेकिन इनको शराब और लापरवाहपने ने मार डाला।


गुरदास मान वो दीया है जो तूफानों में....

दूसरा माइकल जैक्सन, दूसरा अमिताभ बच्चन, दूसरा सचिन तेंदुलकर जैसे मिलना मुश्किल है, वैसे ही पंजाबी संगीतप्रेमियों को दूसरा गुरदास मान मिलना मुश्किल है। मुश्किल ही नहीं मुझे तो नामुमकिन लगता है। आने वाली 4 जनवरी 2010 को गुरदास मान 53 वर्ष के हो जाएंगे, लेकिन उनकी स्टेज पर्फामेंस (लाईव शो) आज भी युवा गुरदास मान जैसी है। वर्ष 1980 को पंजाबी संगीत जगत में कदम रखने वाले गुरदास मान ने पिछले तीन दशकों में पंजाबी संगीत को इतना कुछ दिया है, जिसकी कल्पना कर पाना भी मुश्किल है। गीतों में खुद को 'मरजाना मान' कहने वाले गुरदास मान ने अपनी आवाज और अपने लिखे हुए गीतों की बदौलत पंजाबी संगीत में वो रुतबा हासिल कर लिया है जो यमले जट्ट ने हासिल किया था। जट्ट यमला की तूंबी की तरह गुरदास की डफली भी संगीत में अपनी अनूठी छाप छोड़ चुकी है। उसके गाए हुए गीत लोकगीत बनते जा रहे हैं, यमले जट्ट के गाए गीतों की तरह। इन तीन दशकों में पता ही नहीं कितने गायक आएं और चले गए, मगर गुरदास मान समय के साथ साथ सफलता की शिखर की तरफ बढ़ता चला गया।

इन दशकों में ड्यूट का आंधी आई, पॉप की आंधी आई, फिर ड्यूट की आंधी, लेकिन गुरदास मान ने सोलो गीत गाए, वो भी लीक से हटकर। गुरदास मान वो दीया है जो तूफानों में भी जगमगाना नहीं छोड़ता। गुरदास मान ने पैसा कमाने के लिए या सफलता अर्जित करने के लिए नंगेज का सहारा नहीं लिया, बल्कि उसने तो पंजाबी मां बोली का सिर ऊंचा करने के लिए साफ सुथरी भाषा का उपयोग किया।

समय बदल गया, वक्त बदल गया लेकिन गुरदास मान नहीं बदला, वो आज भी वैसा है जैसा पंजाबी संगीत जगत को मिला था। हाथ में डफली, कमर पर कमरकस्सा (देसी बेल्ट), पंजाबी चादरा (जिसको हिन्दी में धोती कह सकते हैं), कुर्ता, शानदार जॉकेट, नंगे पांव और दाएं पैर में घुंघरू स्टेज पर गुरदास मान की स्टेजी पहचान है।

पंजाबी गीतकार लड़के लड़की के प्रेम संबंधों पर गीत लिखने की प्रथा या चक्रव्यूह से बाहर निकल ही नहीं पाए, जिसे तोड़कर गुरदास मान तीन दशक पहले ही बाहर निकल आया। गुरदास का हर गीत कुछ न कुछ संदेश देता है, किसी न किसी समस्या को उभरता है। मुझे याद है कि जब बाबरी मस्जिद को लेकर भारत में हंगामा हुआ था तो गुरदास की कलम ने एक ऐसे गीत को जन्म दिया, जिसको सुनने वाले कहते हैं वाह गुरदास वाह। वो था 'अल्लाह वालों राम वालों, राजनीति से अपने मजहब को बचा लो' । इसके अलावा भारत विभाजन का दर्द भी गुरदास मान ने अपनी कलम से खूब बयान किया 'मैं बसदी उजड़ गई' के जरिए। गुरदास मान का ये गीत जब पंजाब की किसी स्टेज पर बजता है तो अच्छे अच्छों के रौंगटे खड़े हो जाते हैं।

युवाओं के दिलों पर ही नहीं बुजुर्गों के दिलों पर भी राज करता है पंजाबी मां बोली का सेवादार गुरदास मान। पंजाबी साहित्य में खुद को बड़ा तीस खां मार समझे वाले भी गुरदास मान की कलम के आगे बौने पड़ जाते हैं। एक साक्षात्कार में गुरदास मान ने कहा था कि जब वो शिमला प्रोग्राम करने के लिए जा रहे थे तो सुबह के चार बजे उनके दिमाग में एक खयाल आया। असल में जब वो खयाल गीत 'कुड़ीए नी किस्मत पुड़ीए नी' बनकर सबके सामने आया तो सब भौंचक्के रह गए। गुरदास मान ने इस गीत में एक औरत का दर्द इस तरह पेश किया है कि पत्थर दिल भी रोने पर मजबूर हो जाएं। इस गीत को गाने के लिए गुरदास मान ने सबसे नीचले सुर पर गाया, जो उनके कैरियर में सबसे पहली बार हुआ।

गुरदास की गायकी के लोग इस तरह मुरीद है कि गुरदास का लाईव शो ( जिसे पंजाबी में अखाड़ा कहते हैं) देखने के लिए कहीं भी जा सकते हैं, पंजाब में जब कभी गुरदास का स्टेज शो होता है तो उसको सुनने के लिए कोई दो तीन सौ नहीं बल्कि लाखों की तादाद में श्रोते उठकर चल देता है। गुरदास के गीतों पर केवल पंजाबी लोग ही नहीं बल्कि अन्य राज्यों के लोग भी नाच उठतें हैं। गुरदास ने जिस क्षेत्र में भी कदम रखा, उस में सफल होकर दिखा दिया, अगर उसके अभिनय की बात करें तो भी वह सफलता की शिखर पर बैठे हुए हैं।

अगर पंजाब में पंजाबी अभिनेता स्वर्गीय वरिन्दर के बाद लम्बे समय तक कोई अभिनेता टिक पाया है तो वह गुरदास मान है। गुरदास ने अभी तक पंजाबी फिल्म प्रेमियों की झोली में डेढ़ दर्जन के करीबन फिल्में डाली हैं जोकि हिट और सुपरहिट रही हैं। इसके अलावा उनकी शहीद-ए-मुब्बहत को राष्ट्रीय अवार्ड भी मिला तो फिल्म वारिस शाह इश्क दा वारिस को चार राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। गुरदास मान ने एक हिन्दी फिल्म 'जिन्दगी खूबसूरत है' बनाई थी, जिसमें उसके साथ तब्बू ने काम किया। यहां पर गुरदास इस लिए मात खा गए क्योंकि उनको बालीवुड में फिल्म प्रचार करना नहीं आता था। गुरदास ने हिन्दी फिल्म वीरजारा और सिर्फ तुम के लिए भी गाया।

गुरदास मान का एक और हिन्दी गीत

बे-लिबास बेबो, बुरे वक्त की निशानी


"पैसा मारो मुंह पर, कुछ भी करूंगा" यह संवाद अरुण बख्सी छोटे पर्दे पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक 'जुगनी चली जलंधर' में बोलते हैं, ये वो ही अरुण बख्सी हैं जो कभी 'अजनबी' नाम के एक हिन्दी धारावाहिक में "बोल मिट्टी दे बावेया" गुनगुनाते हुए नजर आते थे। उस संवाद में भी एक खरा सत्य था और इस नए संवाद में भी बहुत सत्य है।

किसी दूसरे पर यह संवाद फिट बैठे न बैठे, लेकिन कपूर खानदान की बेटी करीना कपूर पर तो बिल्कुल सही बैठता है। यकीनन न आता हो तो पिछले कुछ सालों पर निगाह मारो। शाहरुख के साथ डॉन में फिल्माया गया गीत हो, या अजनबी में अक्षय कुमार के साथ फिल्माए कुछ दृश्य। यशराज बैनर्स की सुपर फ्लॉप फिल्म टश्न में बिकनी पहनकर सबको हैरत में डाल देने वाली करीना ने इस पर आलोचना होते देख कहा था कि अब को बिकनी नहीं पहनेगी।

देखो वादे की कितनी पक्की हैं, बिल्कुल सही, उन्होंने बिकनी पहनना भी छोड़ दिया। अब तो वो टॉपलेस हो गई हैं। कमबख्त इश्क में अक्षय के साथ कई किस सीनों से जब मन नहीं भरा तो कुर्बान में सैफ अली खान के साथ सब से लम्बा किस और फिल्म की चर्चा के लिए टॉपलेस फोटो दे दिया।

ये पैसे कमाने का जरिया भी हो सकता है और अपनी स्टार्डम को बचाने का फंडा भी। या फिर इसे बॉलीवुड में एक काले युग की नई शुरूआत भी कह सकते हैं। जब कपूर खानदान की बेटी इस राह पर चल सकती है तो मायानगरी में सफलता के लिए संघर्ष कर रही गैर-फिल्मी घरानों से आई अभिनेत्रियां गुरेज क्यों करेगी?

करीना कपूर जिस युग की शुरूआत करने जा रही है उसको बॉलीवुड की तरक्की या प्रगति नहीं माना जा सकता, उसको दुर्गति कहा जा सकता है। बॉबी से ऋषि कपूर ने एक नए युग की शुरूआत की थी, उस युग ने कपूर खानदान की बेटियों को तो अपने चुंगल में लेना ही था। समय हिसाब किताब बराबर ही रखता है, इसका उदाहरण है करीना और करिश्मा कपूर। कल तक कपूर खानदान के छोकरे दूसरे घरों की लड़कियों को अपने इशारों पर नचाते थे, आज उनकी बेटियां अपने दिलों की हरसतें पूरी कर रही हैं। बिकनी पहनकर, किस देकर जीरो फिगर करके देख लिया, लेकिन नतीजा जीरो। अब तो लास्ट दाँव है टॉपलेस।

इसके बाद करीना के लिए बची हैं ए ग्रेड की फिल्में है, जिसमें वो अपना भविष्य तलाश सकती है। अब तो प्रसारण मंत्रालय भी रात को इन फिल्मों को प्रसारित करने की मंजूरी देने के करीब है। लगी रहो करीना लगी रहो। आग तो तुम्हारे ही घर से शुरू हुई थी।


क्या है राहुल गांधी का उपनाम?

सुबह उठा तो सिर भारी भारी था, जैसे किसी ने सिर पर पत्थर रख दिया हो। सोचते सोचते रात को सो जाना भी कोई सिर पर रखे पत्थर से कम नहीं होता। रात ये सोचते सोचते सो गया क्यों न राहुल गांधी को खत लिखा जाए कि मैं कांग्रेस में शामिल होना चाहता हूं, मैं राजनीति में नहीं जननीति में आना चाहता हूं और मैं राजनेता नहीं जननेता बनना चाहता हूं। आती 27 तिथि को मैं 26 का हो जाऊंगा, इतने सालों में मैंने क्या किया कुछ नहीं, अब आने वाले सालों में कुछ करना चाहता हूं। ये सोचते सोचते सो गया या जागता रहा कुछ पता नहीं। सुबह उठा तो सिर भारी भारी था जैसे कि शुरूआत में बता चुका हूं। मैंने कम्प्यूटर के टेबल से पानी वाली मोटर की चाबी उठाई और मोटर छोड़ने के लिए नीचे चल गया, वहां पहुंचा तो दैनिक भास्कर पड़ा हुआ था, मेरा नवभारतटाईम्स के बाद दूसरा प्रिय अखबार। मोटर छोड़ने से पहले अखबार उठाया। मुझे खबरें पढ़ने का बिल्कुल शौक नहीं, इसलिए सीधा अखबार के उस पन्ने पर पहुंच जाता हूं, जहां बड़े बड़े लेखक अपनी कलम घसीटते हैं। आज जैसे ही वहां पहुंचा तो देखा कि रात को जो मन में सवाल उठ रहा था, उसका उत्तर तो यहां वेद प्रताप वैदिक ने लिख डाला। सवाल था कि राहुल का उपनाम क्या है? आप सोचोगे कि राहुल गांधी तो है। पर नहीं, सच तो कुछ और ही है। सत्य तो ये है कि उनका नाम राहुल घंदी है, जो उनके पारसी दादा फिरोजशाह घंदी लिखा करते थे। इस उत्तर देखते ही दिलखुश हो गया। आप सोच रहे हैं कि उपनाम का सवाल मेरे जेहन में कैसे आया। राहुल युवा है, वो सबसे अलहिदा है। उसमें मुझे धीरे धीरे लाठी लेकर चलने वाला महात्मा नहीं बल्कि तेज रफतार क्रांति का प्रतीक भगत सिंह नजर आता है। जो कुछ कर गुजरना चाहता है, जो अपने बलबूते पर कुछ करना चाहता है। शायद इसलिए भी अच्छा लगता है कि वो इंडिया से निकलकर भारत में घुस रहा है, जबकि आज की युवा पीढ़ी इंडिया में घुस रही है। चेतन भगत, अरविंद अडिगा जैसे उपन्यासकार भारत के लिए नहीं बल्कि इंडिया के लिए लिखते हैं, बेशक इंडिया 70 करोड़ लोगों को छोड़कर बनता है, लेकिन फिर भी युवा लेखक इंडिया के लिए लिखते हैं। राहुल उन 70 करोड़ तक पहुंचने के लिए मचल रहा है जो भारत में बसते हैं।


आखिर ये देश है किसका

1.
दूर है मंजिल, और नाजुक हालात हैं
हम भी चल रहें ऐसे ही दिन रात हैं

फिर आने का वायदा कर सब चले गए
न भगत सिंह आया, न श्रीकृष्ण
बस इंतजार में हम रेत बन ढले गए

जहर का प्याला लबों तक आने दो
और मुझे फिर से सुकरात होने दो
झूठ का अंधेरा अगर डाल डाल
तो रोशनी बन मुझे पात पात होने दो



2.
कैसे हो..घर परिवार कैसा है
तुम्हारा यार वो प्यार कैसा है

भाई बहन की पढ़ाई कैसी है
मां बाप की चिंता तन्हाई कैसी है

तुम्हारा ऑफिस में काम कैसा चल रहा है
ये जीवन तुम्हारा किस सांचे में ढल रहा है

3. महाभारत में पांडवों की अगुवाई करने वाले कृष्णा का
या यौवन में हँस हँसकर फांसी चढ़ने वाले भगत का
या फिर लाठी ले निकलने वाले महात्मा गांधी का
आखिर ये देश है किसका

श्री कृष्णा का लगता नहीं
ये देश
क्योंकि दुश्मन पर वार करने से कतराता है
जैसे देख बिल्ली कबूतर आंखें बंद कर जाता है

भगत सिंह का भी ये देश नहीं
वो क्रांति का सूर्य था,
यहां तो अक्रांति की लम्बी रात है

ये देश गांधी का भी नहीं
बाबरी हो, या 1984
लाशें ही लाशें
बिखरी जमीं पर
आती हैं नजर
आखिर ये देश है किसका




वो क्या जाने

सोचते हैं दोस्त जिन्दगी में, बड़ा कुछ पा लिया मैंने।
वो क्या जाने इस दौड़ में कितना कुछ गंवा लिया मैंने॥

मशीनों में रहकर, आखिर मशीन सा हो गया हूं।
मां बाप के होते भी एक यतीम सा हो गया हूं।।
बचपन की तरह ये यौवन भी यूं ही बिता लिया मैंने।
वो क्या जाने इस दौड़ में कितना कुछ गंवा लिया मैंने॥

खेतों की फसलों से खेलकर अब वो हवा नहीं आती।
सूर्य किरण घुसकर कमरे में अब मुझे नहीं जगाती॥
मुर्गे की न-मौजूदगी में सिरहाने अलार्म लगा लिया मैंने
वो क्या जाने इस दौड़ में कितना कुछ गंवा लिया मैंने॥

छूट गई यारों की महफिलें, और वो बुजुर्गों की बातें
कच्ची राहों पे सायों के साथ चलना, वो चांदनी रातें
बंद कमरों में कैद अंधेरों की अब हमराही बना लिया मैंने
वो क्या जाने इस दौड़ में कितना कुछ गंवा लिया मैंने॥

मेरे सपनों में नहीं आते गांधी

कुछ दिन पहले एक ब्लॉग पढ़ रहा था, मैं ब्लॉगर के लेखन की बेहद तारीफ करता हूं क्योंकि असल में ही उसने एक शानदार लेख लिखा। मैं उस हर लेख की प्रशंसा करता हूं जो मुझे लिखने के लिए उत्साहित करता है या मेरे जेहन में कुछ सवाल छोड़ जाता है। लेखक के सपने में गांधीजी आते हैं, सत्य तो ये है कि आजकल गांधी जी तो बहुत से लोगों के सपनों में आ रहे हैं, बस मुझे छोड़कर। शुरू से अंत तक गांधी जी मुस्कराते रहते हैं और लेखक खीझकर मुंह मोड़कर बैठ जाता है। जब अब युवा गुस्से होकर मुड़कर बैठ गया तो गांधी जी बोलना शुरू ही करते हैं कि उसका सपना टूटता है और लेख समाप्त हो जाता है। आखिर में लेखक पूछता है कि आखिर गांधी जी क्या कहना चाहते थे? मुझे लगता है कि इस देश को देखने के बाद गांधीजी के पास कहने को कुछ बचा ही नहीं होगा।

हर सरकारी दफतर में तस्वीर रूप में, हरेक जेब में नोट रूप में, हर शहर में गली या मूर्ति के रूप में महात्मा गांधी मिल जाएंगे। इतना ही नहीं, पूरे विश्व में अहिंसा दिवस के रूप में फैल चुके हैं गांधी जी, कितना बड़ा आकार हो गया गांधी जी। कितनी खुशी की बात है कि कितना फैल गए हैं भारत के राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी, लेकिन कितनी शर्म की बात है कि अहिंसा का कोई नामोनिशान नहीं मिल रहा। जिसके लिए महात्मा गांधी को याद किया जाता है, उनका आदर सम्मान से नाम लिया जाता है।

जब चीन भारत को निगलने की बात करता है, जब पाकिस्तान अपने वायदों से मुकरता है, तो शायद हर भारतीय कह उठता है कि कुचल डालो चीनी एवं पाकिस्तान के नाग इस फन को। तब हर भारतीय क्यों नहीं कहता कि शांति रखो, धैर्य रखो, हमारा राष्ट्रपिता अहिंसावादी था। हम हिंसावादी कैसे हो सकते हैं? हमको तो अहिंसा के पथ पर चलना चाहिए। एक थप्पड़ पड़े तो दूसरा करना चाहिए। गांधी जी ने तो पूरा देश लाठी और चरखे से आजाद करवा दिया था, लेकिन कितनी शर्म की बात है कि उस आजादी को कायम रखने के लिए इस साल आर्थिक तंगी के बावजूद रक्षा खर्च अप्रत्याशित तौर पर 34.4 प्रतिशत बढ़ाकर 1,41,703 करोड़ रुपये कर दिया है।

शायद गांधीजी उस लेखक के लेख में इस लिए मुस्करा रहे थे कि उनको अपने बेटों पर नाज नहीं शर्म आ रही थी, उन बेटों पर जो अपने राष्ट्रपिता को स्वदेशी लिबासों में देखकर गर्व से सिर ऊंचा करते हैं, लेकिन उसी बापू के लिए वो एक विदेशी पुरस्कार की लालसा रखते हैं। जिसने अंग्रेजों को दौड़ाने के लिए स्वदेशी वस्तुओं को स्वीकार लिया था, उसके लिए के एक विदेशी पुरस्कार चाहिए। है ना कितनी शर्म की बात।

कभी कभी सोचता हूं कि गांधी जी का नाम विदेशी पुरस्कार के लिए पांच बार को भेजा गया, और स्वदेशी वस्तुओं से प्यार करने वाले हमारे महात्मा जी ने भेजने वाले को रोका भी नहीं।

क्यों?
ये आपके लिए


दीवाली की शुभकामनाएं





काव्य रूप में कुछ सुलगते सवाल

नाक तेरी तरह थी, लेकिन ठोडी थोड़ी सी लम्बी, मेरी तरह..मैं सिनोग्राफी की बात कर रहा था। अगर ऐसा हुआ तो मैं उसको दबा दबा उसका चेहरा गोल कर दूंगी..पत्नी बोली। फिर मैं चुप हो गया। उसको मुझे से दूर रखना, क्योंकि उसका पिता सनकी है, पागल है..कुछ देर के बाद मैं चुप्पी तोड़ते हुए बोला। मैं उसको उसके नाना के घर छोड़ आऊंगी..वहीं पढ़ लिखकर बड़ा आदमी बन जाएगा..पत्नी थोड़े से रौ में आते हुई बोली। ठीक है तुम भी वहीं को जॉब बगैरा कर लेना, तुम बहुत समझदार हो..तुम को अब मेरी जरूरत नहीं। अब देश को मेरी जरूरत है, मैं चला जाऊंगा..अब मैं बोल रहा था। उसने बात काटते हुए कहा..कल क्यों अभी जाओ ना। मैंने कहा कि नहीं उसका चेहरा देखकर जाऊंगा। शायद मेरी ऊर्जा में इजाफा हो जाए। अब बातें खत्म हुई और मैं सो गया...मुझे नहीं पता कि मैं सोया या फिर रात भर जागता रहा। जब सुबह होश आई तो एक तरफ आलर्म बज रहा था और दूसरी तरह मेरे जेहन से कुछ शब्द निकलकर मेरी जुबां पर दौड़ रहे थे। मुझे लग रहा था कि मैं रात भर सोया नहीं और किसी ध्यान में था।..वो शब्द आपकी खिदमत में हाजिर हैं।

आंखों में है समुद्र अगर, तो आंसू कोई ढलकता क्यों नहीं।
भूखे सोते हैं करोड़ों लोग, मगर कोई बिलकता क्यों नहीं॥

जिन्दा है अगर पाश युवाओं में, तो कोई आग लिखता क्यों नहीं।
गर गांधी की हैं नाती हम, तो लाठी ले कोई निकलता क्यों नहीं।।

अगर आदर्श है शहीद-ए-आजम, तो खून उबलता क्यों नहीं।
जागृत है अगर भारत मेरा, तो अंधेरे को निगलता क्यों नहीं॥

पैसा हमारा, ऐश वो करते हैं मगर ये हमें अखरता क्यों नहीं।
सोचते हैं कुत्ते की नस्ल वाले कि ये 'हैप्पी' मरता क्यों नहीं।।