तुम तो....

तुम तो दूर चली गई
लेकिन मैं तो
आज भी वहीं हूं
उन्हीं गलियों में,
उन्हीं बगीचों में,
जहां कभी हम तुम एक साथ चला करते थे/

हवाहवा दे जाती है पुरानी यादों को/
हां,आंख भर जाती है याद कर वादों को//

चुप हो जाता हूं,
जब पूछते हैं नदियां के किनारे/
कहां गए नजर नहीं आते तुम्हारे
जानशीं जान से प्यारे//

मैं खामोश हूं,
तुम ही बताओ क्या जवाब दूं/
मुझे तांकता है
किसको तोड़कर वो गुलाब दूं//

तुम्हें देखता था जहां से,
आज उसी छत पर जाने से डरता हूं/
तुम न जानो, मैं किस तरह
प्यार के गवाह सितारों का सामना करता हूं//

हँसने नहीं देती याद तेरी
रोने पर जमाना सौ सवाल करता है/
अब जाना, तुम से दूर होकर
बिरहा कितना बुरा हाल करता है//

छंटनी की सुनामी

छंटनी की सुनामी हमारे पड़ोस में रहने वाले नंबरदार के कुत्ते जैसी है, जो चुपके से राहगीर की टांग को पीछे से आकर पकड़ लेता है, जिसके बाद राहगीर की एक नहीं चलती, बस फिर इलाज के लिए टीके पर टीके लगवाने पड़ते हैं. एक डेढ़ सौ साल पुरानी बैंक लेहमन ब्रदर से शुरू ही छंटनी की सुनामी, अब तक दुनिया भर के लाखों लोगों को आपना शिकार बना चुकी है एवं करोड़ों लोग घर से दुआ करते हुए काम पर निकलते हैं, हे भगवान! उनको छंटनी की सुनामी से बचाकर रखना, क्योंकि नौकरी के अलावा उनके पास अन्य कमाई का कोई साधन नहीं.छंटनी वो सुनामी है जो अब तक करोड़ों लोगों के सपनों को रौंद चुकी है और लगातार अपना कहर बरपा रही है. कुछ दिन पहले मैं एक बड़ी कंपनी में काम करने वाले अपने एक दोस्त से मिला था, जो काम पर महीने में से केवल दस बारह दिन ही दिखाई पड़ता था, इसलिए मैंने व्यंग कसते हुए कहा कि क्या बात है, जनाब आपकी तो ऐश है, आपकी कंपनी बड़ी दियालु है, जो आपको इतने दिन की छुट्टी प्रदान कर देती है. तो उसने कहा कि उसके परिवार में कुछ ऐसे घटनाक्रम लगातार हो रहे थे, जिसके कारण उसको बार बार घर जाना पड़ रहा था. फिर उसने बड़े जोश और उल्लास के साथ कहा, लेकिन यार अब ऐसा नहीं, मैं लगातार अपने काम पर आ रहा हूं पिछले कई दिनों से. मैंने कहा दोस्त काम से बेइमानी मत करना नहीं तो मुश्किल में कभी न कभी आ जाओगे. उसने अपने बॉस की खूब प्रशंसा की क्योंकि उसने कई दफा उसकी जाती जाती जॉब बचाई. मैंने कहा अच्छी बात है, अगर तुमको ऐसा बॉस मिला है, लेकिन मुझको परसों उसके बारे में एक और एवं बुरी ख़बर मिली कि उसकी कंपनी में छंटनी का दौर शुरू हो गया, जिसके कारण उसको नौकरी से निकाल दिया गया. ये बात सुनकर मुझे बहुत दुख हुआ, शायद आपको भी उससे हमदर्दी हो, वो घर में बड़ा है, उस पर सब जिम्मेदारियां हैं क्योंकि उसके पिता की कुछ महीने पहले मौत हुई है, और वो अपने पूरे परिवार के साथ अपना राज्य, घर बार छोड़ अपनी जॉब स्थल पर आ गया. मगर उसके परिवार को उस जगह आए पंद्रह दिन भी नहीं हुए कि कंपनी ने उसको बाहर निकाल दिया, इसके कारण अब वो उस मोड़ है, जहां से उसको घर वापसी परिवार समेत करना किसी भयानक सपने से कम नहीं होगी. ऐसे ही कुछ महीने पहले मैं पंजाब गया था, मैं जब भी पंजाब जाता हूं तो अपने दोस्तों और जान पहचान वालों से मिलकर आता हूं, ज्यादातर लोग मीडिया लाइन में हैं, इस बार गया था तो पता चला कि अमर उजाला अख़बार में सिर्फ दो व्यक्ति काम कर रहे हैं, जिसमें एक रिर्पोटर मेरा दोस्त था, और दूसरा वो शख्स जिसने मुझे जिन्दगी के असली मायने बताए. उस दौरान मेरे जान पहचान वालों ने कहा कि तुम पंजाब आकर कोई न्यूज पेपर क्यों नहीं ज्वाइन कर लेते और अमर उजाला तो खाली ही पड़ा है. लेकिन मेरे दिल ने कहा, अब जहां है, वहां ठीक हैं. जब वक्त पड़ेगा देख लेंगे. पंजाब से मैं अपने काम पर लौट आया, कुछ दिन बाद मैंने अपने दोस्त को ऐसे ही हाल चाल पूछने के लिए फोन किया तो पता चला कि अमर उजाला बंद हो गया. जिससे दोस्त की नौकरी तो चली गई जबकि ब्यूरो चीफ की बदली अन्य एवं दूर जगह कर दी गई. ऐसे पंजाब में मेरे कई जान पहचान वाले पत्रकार काम से हाथ थो बैठे, जिनके बारे में सुनकर मन दुखी हो जाता है.ऐसा ही एक और किस्सा, कुछ दिन पहले मेरे पड़ोसी के पास उसके घर से फोन आया कि बेटे तुम घर कब आओगे, तुम्हारे लिए हम लड़की ढूंढ रहे हैं, तो उसका जवाब था, मां तुम फिलहाल लड़की ढूंढ़ने की बजाय मेरी नौकरी की सलामती के लिए दुआ करो. उसने युवक ने ये शब्द इस लिए कहे थे, क्योंकि उसकी कंपनी में भी छंटनी की सुनामी आ चुकी थी, कई लोगों को दफ्तर से चलता कर दिया गया. ऐसे में लाजमी है कि उसको भी डर लग रहा था कि कहीं उसकी भी गर्दन न उड़ जाए. सही कहा था उसने, आपको याद हो जब एक हवाई कंपनी से लोगों की छंटनी हुई थी तो एक लड़के की एक दिन पहले हुई सगाई टूट गई थी. सबसे ज्यादा छंटनी का डर उन लोगों को रह रहकर सता रहा है, जिन्होंने लोन पर गाड़ी, बंगला एवं अन्य वस्तुएं खरीदीं, जिसकी किश्त उनकी हर महीने आने वाली पगार से भरी जानी है. ऐसे में अगर नौकरी छीन गई तो किश्त का रुकना लाज़मी है, किश्त रुकी तो समझो उनका बंगला, उनकी गाड़ी उनकी नहीं रहेगी. इतना ही नहीं जब से छंटनी की सुनामी शुरू हुई है, दर्द निवारक गोलियों की बिक्री बढ़ चुकी है, बड़े बड़े पदों पर तैनात लोग तो छंटनी से इतने परेशान हैं कि कि एक दिन में दो दो दर्दनिवारक गोलियां खा रहे हैं. ऐसे समय में सबको ध्यान और धीरज से काम लेना होगा. लोगों के सपने चूर होने से मैनेजमेंट गुरू बचा सकते हैं. छंटनी की सुनामी का दर्द तो वही जान सकता है, जो उसका शिकार हुआ है, क्योंकि छंटनी की सुनामी से होने वाली तबाही का मंजर अन्य लोग नहीं देख सकते, जैसे दिल टूटने की पीड़ा एक आशिक ही जान सकता है.

क्या ये आतंकवाद से गंभीर विषय नहीं ?

पिछले दिनों मुम्बई में हुए आतंकवादी हमले का विरोध तो हर तरफ हो रहा है, क्योंकि उस हमले की गूंज दूर तक सुनाई दी, लेकिन हर दिन देश में 336 आत्महत्याएं होती हैं, उसके खिलाफ तो कोई विरोध दर्ज नहीं करवाता और सरकार के नुमाइंदे अपने पद से नैतिकता के आधार पर त्याग पत्र नहीं देते. ऐसा क्यों ? क्या वो देश के नागरिक नहीं, जो सरकार की लोक विरोधियों नीतियों से तंग आकर अपनी जान गंवा देते हैं. आपको याद हो तो मुम्बई आतंकवादी हमले ने तो 56 घंटों 196 जानें ली, लेकिन सरकार की लोक विरोधी नीतियां तो हर एक घंटे में 14 लोगों को डंस लेती हैं, अगर देखा जाए तो 24 घंटों में 336 लोग अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेते हैं. मगर कभी सरकार ने इन आत्महत्याओं के लिए खुद को जिम्मेदार ठहराकर नैतिकता के तौर पर अपने नेताओं को पदों से नहीं हटाया, क्योंकि उस विषय पर कभी लोग एकजुट नहीं हुए, और कभी सरकार को खतरा महसूस नहीं हुआ.ऐसा नहीं कि मुम्बई से पहले इस साल भारत में कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ, इस साल कई बड़े बड़े शहरों को निशाना बनाया गया एवं बड़े बड़े धमाके किए, लेकिन उन धमाकों में मरने वाले ज्यादातर गरीब लोग थे, उनका बड़े घरों से कोई लेन देन नहीं था, इसी लिए धमाकों की गूंज भी उतना असर नहीं कर पाई थी, जितनी आतंकवादियों की गोलियों की आवाज ने कर दिया. करती भी क्यों नहीं, हमला जो इस बार विदेशियों एवं बड़ी हस्तियों को ध्यान में रखकर किया गया था. इस बार तो आतंकवाद के खिलाफ बॉलीवुड के बड़े बड़े सितारों ने भी आवाज बुलंद की, क्योंकि उन्हें पता है कि ये हमला उन होटलों पर हुआ, जिनमें उनका अक्सर आना जाना है. वरन उक्त मायानगरी के सितारे अहमदाबाद, बेंगलूर एवं जयपुर में हुए धमाकों के वक्त कहां सो रहे थे, सड़कों पर क्यों नहीं उतरे? ऐसे तमाम सवालात जेहन में आते हैं, लेकिन उत्तर कुछ नहीं मिलता, बिना आश्वासनों के. अहमदाबाद एवं जयपुर में हुए बम्ब धमाकों में कोई कम आदमी नहीं मरे थे, लेकिन अफसोस की बात ये थी कि उन हमलों का निशाना कोई बड़ा व्यक्ति या विदेश नहीं बना था. नैतिकता की बात करने वाली देश की सरकार तब कहां सो रही थी, जब उक्त शहरों को आतंकवादियों ने दहलाकर रख दिया था, कब तब इस सरकार के भीतर नैतिकता मरी हुई थी. क्या उन हमलों में लोगों की मौत नहीं हुई, उनकी शांति भंग नहीं हुई थी. सब हुआ मगर तब सरकार के खिलाफ ऐसे लोगों ने रोष जाहिर नहीं किया था, लोग चुप थे, सरकार ने सोचा, चल अच्छा है कोई बोला नहीं. इस बार नेताओं के बयानों ने जलती में घी का काम किया, जिसके बाद लोगों का गुस्सा फूटा.आओ चलो, उस विषय पर लौटते हैं, जहां से बात शुरू हुई थी, वो विषय भी ऐसा है, जिसके खिलाफ लोगों को मोर्चा खोलना चाहिए और सरकार को एक और आइना दिखाना चाहिए कि वो एक और मोर्चे पर भी विफल है. क्या! इसके लिए भी मुम्बई तक आने इंतजार करना पड़ेगा, वैसे महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र तो इसकी लपेट में पूरी तरह आ चुका है. विदर्भ के किसानों की स्थिति इतनी पतली हो चुकी है कि उनके पास आत्महत्या कर इस दुख भरी जिन्दगी से पीछा छुड़ने के सिवाय कोई चारा ही नहीं बचता. देश की आर्थिक तरक्की में योगदान देने वाले इस किसान को सरकार ने नजरंदाज क्यों कर रखा है. इतना ही नहीं शहर वर्ग में भी महंगाई के कारण आत्महत्याओं का सिलसिला बढ़ने लगा है, लेकिन फिर सरकार झूठे आश्वासनों के सिवाय कुछ भी नहीं करती.राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताजा रिपोर्ट में एक तथ्य उभरकर सामने आया है कि भारत में हर एक घंटे में 14 लोग आत्महत्याएं करते हैं और आत्महत्या करने वाले तीन व्यक्तियों में एक युवा है. युवा देश के विकास में योगदान डालते हैं, लेकिन सरकार की लोक विरोधी नीतियों के कारण नौजवान आत्महत्या कर मृत्यु दर में योगदान डाल रहे हैं. कहां सो रही हैं सरकारें? देश के बिगड़ते हालातों को क्यों नहीं संभालती. आज देश का युवा मरने या मारने के लिए तैयार बैठा है. बेरोजगारी का शिकार नौजवान या तो गलत रास्ते पर चले जाते हैं या फिर मौत की नींद सो जाते हैं. जो नौजवान गलत रास्ते पर निकल जाते हैं, वो कासिब जैसे नौजवान देश का भविष्य बनने की बजाय समाज के लिए नासूर बन जाते हैं. पिछले दिनों जो भी आतंकवादी हमले हुए उन सबके पीछे नौजावान थे, ये नौजवान आए कहां से ? कुछ कहेंगे पाकिस्तान से, और कुछ कहेंगे हिंदुस्तानी लगते हैं. नौजवान कहां के भी हों, सरकारों ने इनको गलत रास्ते चुनने के लिए मजबूर कर दिया. वो सरकार चाहे भारत की हो चाहे पाकिस्तान की.देश की सरकार ने आम नागरिकों की स्थिति ऐसी पैदा कर दी है कि वो कुछ पैसों के लिए अपना ईमान दांव पर लगा देते हैं और फिर मुम्बई जैसे कांड होते हैं. शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन जैसे कितने ही नौजवान देश के लिए हंसते हंसते जान कुर्बान तो कर जाते हैं, लेकिन बाद में सरकार उन शहीरों के परिवारों की बात तक नहीं पूछती. देश की सरहद पर खड़े नौजवानों के घरों में कभी जाकर देखो, वो किस कदर जिन्दगी बतीत करते हैं और नेताओं के घरों में देखो..वो कैसे जिन्दगी बतीत करते हैं. किसी रिष्ट पुष्ट व्यक्ति का बेटा फौज में शामिल नहीं होगा. क्यों ? क्योंकि वहां पर तुम को ऐशोराम नहीं मिलने वाला.आगे रिपोर्ट कहती है कि 23.8 फीसदी लोग आत्महत्या घरेलू झगड़े के कारण करते हैं एवं 22.3 फीसदी लोग आत्महत्या बीमारी से तंग आकर करते हैं. कभी सोचा है कि किन घरों में ज्यादा झगड़े होते हैं, जो पूरी तरह से रिष्ट पुष्ट नहीं, जहां पर हर व्यक्ति की तमन्नाएं पूरी नहीं होती. इसके अलावा बीमारी से तंग आकर वो लोग जान देते हैं, जिनके पास इलाज के लिए पैसे नहीं, बस एक चारपाई पर लेटे लेटे इलाज का नहीं मौत का इंतजार कर रहे होते हैं. अटल बिहारी जैसे नेता तो विदेश से इलाज करवाकर भी बुढ़ापे का आनंद लेते हैं. कब जागेगा आवाम. कब आएगी क्रांति..कब तक मरता रहे का आमजन....

आतंकियों का मुख्य निशाना

जयपुर, बैंग्लूर, अहमदाबाद, सूरत ( इस शहर में भी धमाके करने की साजिश थी), दिल्ली और अब मुम्बई को आतंकवादियों द्वारा निशाना बनना, इस बात की तरफ इशारा करता है कि आतंकवादी अब देश के लोगों को नहीं बल्कि देश की आर्थिक व्यवस्था में योगदान देने वाले विदेशियों के रौंगटे खड़े कर देश की आर्थिक व्यवस्था को तहस नहस करना चाहते हैं, जिसको वैश्विक आर्थिक मंदी भी प्रभावित नहीं कर पाई. आतंकवादी मुम्बई में एक ऐसी घटनाओं को अंजाम देने के लिए घुसे थे, जिसकी कल्पना कर पाना भी मुश्किल है, मगर आतंकवादियों ने जितना किया वो भी कम नहीं देश की आर्थिक व्यवस्था को बिगाड़ने के लिए, उन्होंने ने लगातार 50 से ज्यादा घंटों तक मुम्बई नगरी को दहश्त के छाए में कैद रखकर पूरे विश्व में भारत की सुरक्षा व्यवस्था की धज्जियां उड़ा दी. हर देश में भारत की नकारा हो चुकी सुरक्षा व्यस्था की बात चल रही है और आतंकवादी भी ये चाहते हैं. आज की तारीख में भारत विश्व के उन देशों में सबसे शिखर पर है, जिस पर वैश्विक आर्थिक मंदी का बहुत कम असर पड़ा है और अमेरिका से भारत की दोस्ती इस्लाम के रखवाले कहलाने वालों को चुभती है, जिनका धर्म से दूर दूर तक का नाता नहीं, वो चांद तो हर देश में इस्लाम मे नाम पर आतंक फैलाकर इस्लाम को बदनाम कर रहे हैं. इस हमले ने भारत और पाकिस्तान के दरमियान बढ़ते संबंधों पर विराम लगा दिया, इन अंताकवादियों ने पाकिस्तान की छवि तो पूरे देश में एक आतंकस्थली के रूप में बना दी है, जहां पर अब विदेश लोग तो क्या, विदेशी पंछी भी जाने से डरते हैं. वो चाहते हैं कि उसकी सूची में भारत आए. मुम्बई हमलों के पश्चात जैसे इंग्लैंड टीम क्रिकेट सीरीज को बीच में छोड़कर स्वदेश लौट गई और अन्य क्रिकेट टीमें भी भारत आने पर सौ बार विचार करेगी, भारतीय क्रिकेट बोर्ड सबसे ज्यादा धनी है, लेकिन अगर विदेशी क्रिकेटर इस तरह भारत आने से मना करने लगे तो भारतीय क्रिकेट बोर्ड कंगाली की कगार पर पहुंच जाएगा, इसके अलावा भारत को पर्यटन स्थलों के कारण विदेशों से आने वाले सैलानियों से भी बहुत ज्यादा आमदनी होती, मगर अब वो सैलानी भी भारत आने से कतराने लगेंगे क्योंकि वो सोचेंगे जब भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई का सबसे बड़े होटल सुरक्षित नहीं तो अन्य स्थल कैसे सुरक्षित होंगे. आतंकवादियों ने इस साल 13 मई 2008 को देश में सैलानियों को अपनी तरफ आकर्षित करने वाली गुलाबी नगरी को निशाना बनाया, जहां पर आतंकवादियों ने सात बम धमाके किए और 63 लोगों को मौत की नींद सुलाया. इसके बाद आतंकवादी 25 जुलाई 2008 को मौत का पैगाम लेकर देश की आईटी हब बंगलौर में पहुंचे, यहां पर भी सात धमाके किए, जिसमें दो लोगों की जान गई. इसके अगले दिन आतंकवादी खून की होली खेलने अहमदबाद पहुंचे, जिसको भारत का मानचेस्टर कहा जाता है. फिर उन्होंने दिल्ली और मालेगांव में धमाके किए, देश की सरकार, सुरक्षा व्यवस्था फिर भी नहीं जागी. मगर अब आतंकवादियों ने मुम्बई आतंकवाद का ऐसा चेहरा पेश किया, जिसने पूरे विश्व में भारत की सुरक्षा व्यवस्था की लहर लगाकर रख दी. इतना ही नहीं मुम्बई आतंकवादी हमले पर प्रतिक्रिया देते हुए दी टेलीग्राफ-लंदन ने लिखा है कि हमले से उद्यमी भारत में निवेश करने से कतरा सकते हैं, इससे वहां की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है. इस अखबार की ये बात बिल्कुल दुरुस्त है और किसी भी देश को बर्बाद करने के लिए उसकी अर्थ व्यवस्था को बर्बाद करना जरूरी है, वो आतंकवादी कर रहे हैं. इस दौरान एक बात और भी है, इस आतंकवादी हमले के बाद भारत पाकिस्तान में फिर दूरी बढ़ गई, शायद इसकी आड़ में कोई अन्य देश फायदा उठा रहा हो.

अब बाट जोहने का वक्त नहीं...

दिक्कत यही है कि आप राजनीति का दामन भले ही छोड़ दें, राजनीति आपका दामन नहीं छोड़ती. या तो आप राजनीति को चलाएंगे या फिर राजनीति आपको अपनी मर्जी से घुमाएगी. राजनीति की दलदल में उतरे बिना इस परनाले की धुलाई सफाई का कोई जरिया नहीं है. इस सफाई के लिए कृष्ण या किसी गांधी की बाट जोहने से काम नहीं चलेगा. यह काम हम सबको ही करना पड़ेगा. उक्त लाईनें एक प्रसिद्ध लेखक चुनाव विश्लेषक और सामयिक वार्ता के संपादक योगेंद्र यादव के द्वारा लिखे एवं दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुए वोट देना लोकतंत्रिक धर्म है आलेख की हैं. इन चांद लाइनों में लेखक ने राजनीति को गंदी कहकर मतदान नहीं करने वाले लोगों को एक मार्ग दिखाने की कोशिश की है. ये एक ऐसा सच है, जिससे ज्यादातर लोग मुंह फेर कर खड़े हैं, जिसके कारण देश में बदलाव नहीं आ रहा, देश की राजनीति देश को दिन प्रतिदिन खोखला किए जा रही है. देश को खोखला बना रही इस गंदी राजनीति को खत्म करने के लिए युवाओं को सोचना होगा, न कि राजनीति को गंदा कहकर इसको नजरंदाज करना. अगर देश में बदलाव चाहिए, अगर देश को तरक्की के मार्ग पर लेकर जाना है तो युवाओं को अपनी सोई हुई जमीर और सोच को जगाना होगा. मंजिल की तरफ निकलने के लिए सूर्य के उदय होने का इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि अंधेरे में निकलकर सूर्यादय होने से पहले मंजिल को फतेह करना चाहिए. कब तक भीड़ में शामिल होकर किसी एक के आगे बढ़ने का इंतजार करोगे, कब तक भीड़ से अलग एकांत में बैठकर देश के बुरे सिस्टम को कोसते हुए अपना खून जलाओगे. योगेंद्र जी ने सही लिखा है कि अब देश के लोगों को कृष्ण और गांधी जी की बाट जोहने की बजाय खुद निकलना होगा, क्योंकि इस इंतजार ने देश को खोखला बना दिया. भगवान कृष्ण जी ने अपने समय में समाज को बुरी से बचाया और गांधी जी ने अपने वक्त में, अब हमारा वक्त है, अब इस समाज को बचाना हमारा धर्म है, हम बचपन से श्री कृष्ण, गांधी और भगत सिंह की कहानियां सुनते आ रहे हैं, लेकिन फिर भी हम आगे बढ़कर बुराई से लड़ने का फैसला नहीं कर पाते, क्योंकि देश के सिस्टम ने हमको नेताओं कोई तरह सिर्फ भाषण देने लायक बनाया, जिनकी करनी और कथनी में जमीं आसमां का अंतर होता है. आज समस्या राजनीति नहीं बल्कि हमारे समाज में फैले वैचारिक व्यक्ति हैं, जो बस एकांत में बैठकर सोचते हैं, भीड़ बैठकर लम्बी लम्बी हांकते हैं, लेकिन आगे बढ़कर करने से कतराते हैं. एक नवोदित समाज बनाने का देशहितैषियों को संकल्प लेना होगा. अमेरिका में तो होगा परिवर्तन, गोरे की जगह एक काला आ गया, उम्मीद है कि वहां का भविष्य उज्जवल है. लेकिन वो परिवर्तन हिंदुस्तान में कब आएगा ? कब सफेद लिबास पहनकर घूमने वाले काले विचारों और काले दिल के लोगों को हिंदुस्तान से खदेड़ेंगे ? फिर देरी कैसी, चलो मिलकर एक कदम उठाएं, भारत के हर नागरिक को कुम्भकर्णी नींद से जगाएं, वो चांद नेताओं दिए गए लोभवन में फंसकर खुद का और हमारा भविष्य बिगाड़ रहा है. ऐसा हक किसी के पास नहीं, उसको समझाएं कि तुम्हारा वोट तुम्हारे नहीं बल्कि पूरे हिन्दुस्तान के भविष्य को तय करता है, हम वोट नहीं, तो चुनाव रद्द नहीं होते, लेकिन हमारे आस पास के दूसरे व्यक्ति द्वारा दिया वोट हमारा भविष्य लिखता है, इस लिए हमको भी वोट डालना चाहिए और दूसरे को भी सही जगह वोट डालने के लिए समझाना चाहिए. अगर हम को गांधी जिन्दा करना है तो उसके विचारों को करो, जो हिन्दुस्तानियों ने बहुत पहले मार दिए, अहिंसा के पुजारी के देश में हिंसा है, क्या वो महात्मा को मार देने से कम है, हम उसकी प्रतिमा पर तो फूल साल में दो बार चढ़ाते हैं, लेकिन उसके विचारों का कत्लेआम तो हम हर रोज करते हैं.

जागो..जागो..हिंदुस्तानियों जागो....

अफजल को माफी, साध्वी को फांसी ।आरएसएस पर प्रतिबंध, सिमी से अनुबंध ।अमरनाथ यात्रा पर लगान, हज के लिए अनुदान।ये है मेरा भारत महान। जागो...जागो...शायद ये मोबाइल एसएमएस आपके मोबाइल के इंबॉक्स में पड़ा हो, ये मोबाइल एसएमएस भारत के भीतर पनप रहे मतभेद को प्रदर्शित कर रहा है. इस तरह की बनती विचार धारा देश को एक बार फिर बंटवारे की तरफ खींचकर ले जा रही है, इस एसएमएस में एक बात अच्छी वो है, 'जागो जागो', आज भारत की धरती पर रहने वाले हर व्यक्ति को जागने की जरूरत है, भले वो हिंदु है, भले वो मुस्लिम है, भले वो सिख है, भले वो ईसाई है, क्योंकि भारतीय राजनीति इस कदर गंदी हो चुकी है, वो किसी भी हद तक जा सकती है. देश की दो बड़ी पार्टियां देश को दो हिस्सों में बांटने पर तुल चुकी हैं, ऐसा ही कुछ आज से काफी दशक पहले अंग्रेजों कारण महात्मा गांधी और जिन्ना के बीच हुए मतभेदों के कारण हुआ था. हिंदुस्तान दूसरी बार न टूटे तो हर हिंदुस्तानी को जागना होगा औत इसमें हर हिंदुस्तानी की भलाई होगी. राजनीतिक पार्टियों के झांसे में आकर हर हिंदुस्तानी को ये बात नहीं भूलनी चाहिए कि आतंकवाद का किसी भी मजहब से कोई लेन देन नहीं होता, क्योंकि आतंकवादी गतिविधियों के दौरान मरने वाले व्यक्ति हिंदु मुस्लिम सिख और ईसाई समुदाय के ही होते हैं, किसी एक समुदाय के नहीं, इसमें दिलचस्प बात ये है कि आतंकवादी गतिविधियों में कोई राजनीतिक समुदाय का व्यक्ति नहीं मरता, कोई किसी राजनेता को निजी रंजिश के चलते उड़ा दे तो क्या कहना. वैसे आम होने वाले बंब धमाकों में राजनीतिक पार्टियों के नेता शिकार नहीं होते. इनमें तो केवल आम आदमी मरता है. लेकिन राजनीतिक पार्टियां लोगों के बीच अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए एक समुदाय को जिम्मेदार ठहराती हैं, देश की बड़ी पार्टियों में आने वाली भाजपा आतंकवाद को इस्लाम का नाम देती है तो कांग्रेस और उसकी सहयोगी अन्य पार्टियां हिंदु संगठनों को आतंकवाद फैलाने के लिए दोषी ठहराती हैं. ऐसा करके हिंदु समुदाय की नजर में इस्लाम को और मुस्लिम समुदाय की नजर में हिंदुओं को बदनाम करके पार्टियां अपना असितत्व कायम रखना चाहती हैं. देश के नेता भालीभांति जानते हैं कि इस देश में मुस्लिम समुदाय के लोगों की संख्या इतनी है कि उनको किसी अन्य मुलिस्म देश में नहीं भेजा जा सकता और पाकिस्तान में इतने हिंदु हैं जिनको भारत अपने देश में जगह नहीं दे सकता. बस इस देश के नेता अपनी कुर्सी बचाने के लिए आम जनता को आपस में भिड़ा रहे हैं मजहब के नाम पर..जब के आतंकवादियों का कोई मजहब नहीं होता, उनका मकसद केवल देश में आतंक, अशांति फैलाना होता है. कभी कभी लगता है कि देश में होने वाली आतंकवादी गतिविधियां देश के नेता करवाते हैं, तांकि वो एक समुदाय को बदनाम कर अपनी कुर्सी बचाने के लिए वोट बैंक जुटा पाएं. हिंदुस्तानियों को जागना होगा..देश को बचाना होगा...इस साल में हुई आतंकवादी गतिविधियों में देश की सरकार क्या प्रगति कर पाई, सिर्फ मृतकों का एक लाख रुपए मूल्य पाने के अलावा कुछ नहीं..और कुर्सी पाने के लिए एक लाख रुपया तो कुछ भी नहीं. उदाहरण के तौर पर जब से साध्वी मालेगांव बंब धमाकों के मामले में गिरफ्तार हुई है, तब से भाजपा को हाथों पैरों की पड़ गई, कल तक जो भाजपा साध्वी से रिश्ता न होने की बातें करती थी, वो भाजपा अब उसको बचाने के लिए, उसको निर्दोष सिद्ध करने के लिए ऐडी चोटी का जोर लगा रही है. अफजल को अभी तक फांसी नहीं दे सकीं सरकार. क्या पता अफजल कांग्रेस की देन हो..वैसे भी राजनीति और अपराध का तो भारत में बहुत पुराना रिश्ता है..

भगत सिंह और भोला हलवाई....

भोला हलवाई की एक हिंसक भीड़ में कुचले जाने से मौत हो गई और वो भी यमराज की कोर्ट में पहुंच गया. भोला हलवाई को गलती से यमराज के दूत ले गए थे जबकि लेकर तो भोला सिंह को जाना था. यमराज ने कहा इसको फौरन जमीन पर भेज दो..तो इतना सुन भोला हलवाई बोला. जब यहां तक आ ही गया हूं तो क्यों न इस लोक की यात्रा ही कर ली जाए. यमराज उसकी बात सुनकर दंग रह गया कि पहला मानस है जो इस लोक की सैर करना चाहता है. दूतों को यमराज ने आदेश दिया कि इसको घूमने के लिए इसकी मर्जी के वाहन मुहैया करवाए जाए..भोला तुरंत बोला नहीं..नहीं यमराज...मैं तो पैदल ही अच्छा हूं...उसको कुछ दिन वहां पर घूमने फिरने के लिए मिल गए, बस फिर क्या था. जमीन पर बेरोजगार घूमने वाले भोला हवलाई को यमराज लोक में सब सुविधाएं मिल गई. भोला सिंह ने देखा कि लोगों पर तरह तरह के जुल्म किए जा रहे थे...लोगों की चीखें, भोला हलवाई के कानों को फाड़ रही थीं. जिनको सुनकर भोला हलवाई डर गया, उसने स्वर्ग की तरफ जाने का मन बनाया, उसको लगा कि स्वर्ग में सब खुश होंगे. इतने में चलते चलते भोले के कानों में किसी के रोने के आवाज पड़ी. भोला हलवाई रूका और उसने आवाज की दिशा को महसूस किया और उस दिशा की तरफ चला..उसकी नजर के एक सफेद कपड़े पहने हट्टा कट्टा नौजवान पर पड़ी, जिसके सिर पर पगड़ी थी. भोला हलवाई धीरे धीरे उस नौजवान की तरफ बढ़ा और उसकी पीठ पर हाथ रखा और बोला. तुम नौजवान हो,, तुम स्वर्ग में हो..फिर भी क्यों रो रहे हो...तुमको यहां पर क्या तकलीफ है..मुझको बताओ...यमराज अपना दोस्त है...भोला हलवाई ने शेखी मारी...उस नौजवान ने जब पीछे मुड़कर देखा तो भोला हलवाई के पांव से यमराज लोक खिसक गया..क्योंकि वो स्वर्ग में रोने वाला नौजवान कोई और नहीं बल्कि भगत सिंह था..भोला ने पूछा, तुम भगत सिंह हो..जिसने अंग्रेजों की नींदें हराम कर दी थी तो ये यमराज तुम्हारे आगे क्या है..तुम क्यों रो रहे हो..हिंदुस्तान में तुम्हारी बहादुरी की बातें होती हैं...मुझे यहां पर कोई समस्या नहीं..मैं तो जमीं की हालात देखकर रो रहा हूं..क्या तुम यहां पर भी खेती करते हो..नहीं भोला हलवाई...जिस लोक से तुम आए हो..उसकी बात कर रहा हूं..हम लोगों ने देश को आजाद इस लिए करवाया था कि हिंदुस्तान के लोग एक होकर रहें..वो आजाद हों..उनका अपना एक राष्ट्र..आज वहां हालात ऐसे हैं कि एक राज्य वाला दूसरे राज्य वाले को देखना पसंद नहीं करता...इन लोगों को देखकर लगता है कि अंग्रेजों की गुलामी अच्छी थी..चल छोड़ो तुम सुनाओ भोला हलवाई..यहां कैसे आना हूं....कुछ नहीं घर से राशन लेने के लिए निकला था..रास्ते में पुलिस वालों और लोगों के बीच झड़प शुरू हो गई. और भागती हुई भीड़ ने मुझको कुचल दिया..मैं यमराज में पहुंच गया...और यहां पर पहुंचकर पता चला कि यहां पर किसी और भोला सिंह की जरूरत थी....यहां पर इमानदारी तो जिन्दा है....

ऐश्वर्या के आगे चुनौती

जब पिछले दिनों अमिताभ बच्चन अस्पताल में दाखिल हुए तो ना जाने कितने लोगों ने उनके स्वास्थ्य होने की दुआ की होगी, इन दुआ करने वालों में कुछ ऐसे लोग भी थे, जो खुद शायद पूरी तरह स्वस्थ नहीं थे, लेकिन फिर भी उन्होंने बॉलीवुड के इस महानायक की सलामती के लिए दुआ की. वहीं अमिताभ बच्चन को स्वास्थ्य करने के लिए घरवालों ने पैसे भी पानी की भांति बहाए होंगे, इस में कोई दो राय नहीं. अमिताभ का तंदरुस्त होकर घर आना एक खुशी का लम्हा है, घरवालों और प्रशंसकों के लिए. लेकिन इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि अब अमिताभ साठ के पार पहुंच चुके हैं, इस पड़ाव के बाद आदमी सोचता है कि उसके बच्चे खुश रहें और उसके घर में उसके पोते पोतियां खेलें. इसमें कोई शक नहीं होगा कि अब अमिताभ का भी ये सपना होगा, अमिताभ का ही क्यों, जया बच्चन का भी तो वो घर है, क्या होगा वो टेलीविजन पर ऐश, अभि और अमित जी की तरह हर रोज दिखाई नहीं देती, किंतु हैं तो बिग बी की पत्नी, वे भी इस सपने से अछूती न होंगी. आज अमिताभ के पास दौलत है, शोहरत है, लेकिन जब उसके मन में उक्त ख्याल उमड़ता होगा, कहीं न कहीं वो खुद को बेबस लाचार पाते होंगे, क्योंकि इसको पूरा करने लिए जया अमिताभ का फैसला नहीं बल्कि एश्वर्या राय की हां जरूरी है, बेशक अभिषेक इस बात को स्वीकार ले. प्रश्न तो तब उठता है जब ऐश का नाम आता है, क्या एश्वर्या इस बात को स्वीकार करेगी? ये सवाल इस लिए भी पैदा होता है क्योंकि ज्यादातर लोग तो अभिषेक बच्चन और एश्वर्या राय की शादी को एक सौदा ही मानते हैं, इतना ही नहीं पिछले दिनों एक मैगजीन को दिए साक्षात्कार में जया बच्चन ने कहा था कि उनकी तमन्ना थी कि उनका पुत्र एक संस्कारी लड़की से शादी करता, इस बात से एक जवाब तो मिल जाता है कि एश्वर्या जया बच्चन की पसंदीदा बहू तो नहीं, क्यों जया बच्चन चाहती थी कि उसकी बहू उसकी भांति परिवार को संभाले, जैसे जया ने अपने परिवार को ज्यादा अहमियत दी, फिल्मी कैरियर दरकिनार कर अपने परिवार को अहमियत दी. ऐश्वर्या राय पहले केवल एक सुंदरी थी, लेकिन अब वो बचन परिवार की बहू बन गई. ऐसे में कुदरती है कि उसके पास निर्माता निर्देशकों की तो कतार लगी होगी, और ऐसे में उसके नखरे भी बढ़ें होंगे. जिनको न चाहते हुए भी निर्माता निर्देशक और परिवार वाले झेलते होंगे, जया बच्चन और अमिताभ ने कभी तो हंसते हंसते ऐश के आगे अभी उक्त इच्छा जाहिर की होगी, बेशक ऐश ने भी हंसते हंसते कह दिया हो गया अभी नहीं डैडी जी मम्मी जी. ऐसे में अमिताभ और जया दबाव भी तो नहीं बना सकते कि वो गर्भ धारण करें. इस बात से तो सब भांति जानूं होंगे कि अभिषेक की सगाई करिश्मा कपूर से हुई थी, जो टूट गई, करिश्मा ने उसके बाद कपूर से शादी की और एक बच्चे को जन्म दिया. आज फिर वो दूसरी पारी शुरू करने के लिए हाथ पैर मार रही है. ऐश्वर्या राय को कैरियर की फिक्र छोड़कर अपने परिवार की इच्छापूर्ति पर ध्यान देना होगा. ऐसे समय पर अमिताभ को ऐश्वर्या को अपनी फिल्म वक्त दिखानी चाहिए, जिसमें अमिताभ अपने पोते को देखने के लिए तरसता है. उस फिल्म में अक्षय कुमार ने अमिताभ के बेफिक्र बेटे की भूमिका निभाई जबकि उस फिल्म में शैफाली शाह ने ऐसी माता की जो बेटे के कैरियर को लेकर चिंतित है, जिसको देखकर जया बच्चन की संजीदगी कहीं न कहीं नजर आती है. ऐश्वर्या के लिए यह समय एक चुनौती से कम नहीं, क्योंकि अब उसको सोचना होगा कि वो कैरियर को अहमियत दें या फिर अपने परिवार पर ध्यान केंद्रित करे.

बनते बनते बिगड़ी किस्मत

गज्जन सिआं वो देख बस आ रही है, बस नहीं निहाले, वो तो रूह की खुराक है. पास बैठा करतारा बोलिया. ऐसा क्या है बस में, बूढ़ी उम्र में भी आंखें गर्म करने से बाज नहीं आते, ओ नहीं करतारिया, उस बस में गांव के लिए एकलौता समाचार पत्र आता है, जिसको सारा दिन गांव के पढ़े लिखे लोग पढ़कर देश के हालात को जानते हैं, अच्छा अच्छा, ओ गज्जन सिआं माफ करी, ऐसे ही गलत मलत बोल गया था, नहीं नहीं इसमें तेरा कोई कसूर नहीं, टीवी वालों ने बुजुर्गों का अक्स ही ऐसा बना दिया है. गुफ्तगू चल ही रही थी कि बस पास आई और ले लो बुजुर्ग रूह की खुराक ड्राईवर ने बोलते हुए अख्बार बुजुर्गों की तरफ फेंका. गज्जन सिआं ने अख्बार की परतें खोलते हुए कहा, आज तो पहले पन्ने पर किसी नैनो की खबर लगी है, जल्दी पढ़ो गज्जन सिआं, कोई आँखों का मुफ्त कैंप लगा होगा आस पास में कहीं, समीप बैठा करतारा बोलिया..चुटकी लेते हुए गज्जन सिआं ने कहा नहीं ओ मेरे बाप, ये ख़बर आंखों से संबंधित नहीं बल्कि टाटा ग्रुप द्वारा बनाई जा रही नैनो कार के बारे में है, करतारा नजर झुकाते हुए बोला, चल आप ही बताएं खबर में क्या लिखा है, गज्जन सिआं बोला कि अख्बार में लिखा है कि नैनो अब गुजरात में बनेगी, इसके लिए के वहां पर सरकार ने टाटा को काफी जमीं दे दी है. फिर बीच में कूदते हुए करतारा बोलिया, ये सरकारें भी अपने स्वार्थ के लिए किसानों की जमीं बड़े बड़े उद्योगपतियों को सौंप देती हैं, और किसान न घर के रहते हैं न घाट के, ऐसा कुछ नहीं करतारिया निहाला बोलिया. तुमको पता है कि पहले टाटा इस संयंत्र को पश्चिमी बंगाल में लगाने वाला था. लेकिन तेरे जैसे गंवार किसानों को बातों में उलझाकर ममता बैनरजी ने वहां से प्रोजेक्ट को हटवा दिया, बात अभी खत्म नहीं हुई कि करतारा फिर बोलिया कि ममता ने अच्छा किया, गज्जन सिआं ने अखबार एक तरफ रहते हुए कहा, तेरी मां का सिर अच्छा किया, तुमको पता है, वहां कारखाना लगने से कितने किसानों के बच्चों को नौकरी मिल जाती, इतना ही नहीं कारखाने के वहां लगने से कुछ और भी कारखाने वहां पर लगने की संभावना पैदा हो सकती थी, किसानों की जमीनों के दाम बढ़ जाते, तुम खेती से कितनी कमाई कर पाते हो, पूरा परिवार खेतों में उलझे रहते थे, हां हां बोलते हो तुम गज्जन, हम किसानों को ज्यादा सोच समझ होती थी, पल में किसी की बातों में आ जाते थे, मुझे याद है, मेरे ससुराल के सपीम एक तेल शोधक कारखाना लगा है, जिसके लगने से गांव के नौजवानों को नौकरी तो मिली ही, भूखे मर रहे मेरे सुसराल वाले रातों रात अमीर बन गए, तुमको पता है उन्होंने अपनी पांच एकड़ जमीन कितने रुपयों में एक होटल के लिए बेची है, गज्जन बोलिया हां मुझे बताया था लज्जो ने, एक करोड़ रुपए से उपर में बिकी है. बातचीत चल रही थी कि गज्जन का पोतरा उसको खाना खाने के लिए बुलाने वहां पर आ गया. आज हर तरफ ऐसी ही वार्तालाप हो रही है, ममता ने जो वहां अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के किया वो बहुत निंदनीय है, वहां के किसानों की बन रही किस्मत को बर्बाद करके रख दिया. जैसे बंगाल से टाटा दुखी होकर निकला है, लगता नहीं कि कोई और कंपनी इस राज्य की तरफ जाने की बात करेगी, टाटा के इस फैसले से केवल किसानों को ही नहीं, बल्कि भूमाफिया को बहुत बड़ा झटका लगा है

सिनेमे को समझो, केवल देखो मत

इस साल भी बहुत सारी फिल्में रिलीज हुई, हर साल की तरह. लेकिन साल की फिल्मों में एक बात आम देखने को मिली, वो थी आम आदमी की ताकत, जिसके पीछे था तेज दिमाग, जिसके बल पर आम आदमी भी किसी बड़ी ताकत को घुटने टेकने पर मजबूर कर सकता है. इस साल रिलीज हुई एकता कपूर की फिल्म 'सी कंपनी' ने बेशक बॉक्स आफिस पर सफलता नहीं अर्जितकी, लेकिन फिल्म का थीम बहुत बढ़िया था, घर में होने वाली अनदेखी से तंग आकर कुछ लोग मजाक मजाक में 'सी कंपनी' बना बैठते हैं, 'सी कंपनी' की दहश्त शहर में इस कदर फैलती है कि बड़े बड़े गुंडे और सरकारें भी उनके सामने घुटने टेकने लगती हैं, वो लोग बस फोन पर ही धमकी देते हैं, सब काम हो जाते हैं, वो लोग आम जनता के हित में काम करते हैं. फिल्म कहती है कि अगर बुरे काम के लिए 'डी कंपनी' का फोन आ सकता है तो अच्छे काम करवाने के लिए 'सी कंपनी' क्यों नहीं बन सकती.'सी कंपनी' को छोड़कर अगर हम इस साल सबसे ज्यादा समीक्षकों के बीच वाह वाह बटोरने वाली फिल्म 'ए वेनसडे' की बात करें तो वो फिल्म भी एक आम आदमी की ताकत को रुपहले पर्दे पर उतारती है. लेकिन इस फिल्म के नायक को मैं आम आदमी नहीं बल्कि जागरूक नागरिक की उपाधि देता हूं. फिल्म में एक व्यक्ति कम्यूटर और मोबाइल फोन का सहारा लेकर पूरे सिस्टम को हिलाकर रख देता है. पुलिस भी कठपुतली बनकर नाचती है. पुलिस उसके इशारे पर चार आतंकवादियों को रिहा करती है, जिसमें तीन को वो उड़ा है और एक को पुलिस उड़ा देती है. इस फिल्म में दिखाया गया है, जिस व्यक्ति की पुलिस थाने में दो कौड़ी की औकत नहीं होती, वो आदमी जब आतंक फैलाने की धमकी देता है तो पुलिस उसको जी-जी कहती है. मौत के आगे कौन न नाचे भाई. इस फिल्म को देखने के बाद ज्यादातर फिल्म समीक्षकों ने नायक को आम आदमी कहा, लेकिन मैं इस को आम आदमी नहीं, बल्कि एक जागरूक नागरिक की उपाधि देता हूं, एक आम नागरिक आज भी अपने घर से बाहर निकलकर दूर की बात सोच ही नहीं सकता, फिल्म में भी शायद निर्देशक ने इस बात को ध्यान में रखा, तभी तो नायक बोलता है, आई एम स्टुपिड कॉमन मैन. इसके बाद एक और फिल्म रिलीज हुई, जो बेशक एक निजी दुश्मनी पर थी, लेकिन उसमें एक नौजवान अपने दिमाग से एक अरबपति को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया. यह फिल्म संजय गड़वी की किडनैप है, जिसको ज्यादातर फिल्म समीक्षकों ने सिरे से नाकार दिया जबकि फिल्म की कहानी अद्भुत है, हां संजय ने एक जगह गलती कर दी, वो कलाकार के चयन में, अगर हम कलाकारों की उम्र को नजरंदाज करते हुए फिल्म देखें तो पता चलता है कि आज के युवा क्या नहीं कर सकते, आज आतंकवादी हर जगह विसफोट करने से पहले मेल भेजकर सबको चौंका देते, इसमें चौंकने वाली कोई बात नहीं, क्योंकि आज की युवा पीढ़ी में एक से बढ़कर एक हीरे हैं, लेकिन जो आतंकवादियों के हत्थे चढ़कर अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करते हैं. इसका भी एक कारण है, देश में होनहार युवकों की कदर भी तो नहीं होती, कितने ही डिग्री होल्डर नौजवान सड़कों पर नौकरी की तलाश में दिन रात भटकते फिरते रहते हैं, उसमें से कुछ तो जीवनलीला समाप्त कर लेते हैं, या कुछ अपनी डिग्री को एक तरफ रखकर अपने परिवार का पेट पालने के लिए जो काम मिलता कर लेते हैं, काम तो वो करते हैं, लेकिन उनके मन में जो तमन्नाएं होती हैं, जो अकांशाएं होती हैं, वो कभी नहीं मरती, ऐसे में शरारती अनसरां उनका फायदा उठाते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि फिल्में समाज का आइना हैं, लेकिन फिर दूसरी तरफ इस बात को खारिज नहीं किया जा सकता कि फिल्म की कहानी भी समाज में पैदा होती है, वो समाज का कल होता है, जो आने वाले कल को संवारने के लिए मददगार हो सकता है. लेकिन आज की तेज जिन्दगी में किसके पास समय है कि वो इन बातों को देखे, वो तो सोचता है कि रविवार है, फिल्म देखकर बस दिमाग तारोताजा कर लें...यहां पर मेरा आपको सुझाव है कि सिनेमे को समझो, केवल देखो मत..

कैसे निकलूं घर से...

रेलवे स्टेशन की तरफ,
बस स्टैंड की तरफ,
आफिस की तरफ
घर से बाहर की तरफ
बढ़ते हुए कदम रुक जाते हैं,
और पलटकर देखता हूं घर को,
अपने आशियाने को,
जिसको खून पसीने की कमाई से बनाया है,
जिसमें आकर मुझे सकून मिलता है,
सोचता हूं,
क्या फिर इस घर लौट पाउंगा
कहीं किसी बम्ब धमाके में उड़ तो न जाउंगा
या फिर किसी भीड़ में कुचला तो न जाउंगा,
रुकते हैं जब कदम
दौड़ने लगता है तब जेहन,
असमंजस में पड़ जाता है मन,
बेशक जान हथेली पर रखने का है जज्बा,
लेकिन बे-मतलबी और अनचाही मौत से डरता है मन
भीड़ को देखकर भी मन घबराता है
कुचले जाने का डर सताता है
कैसे निकलूं बेफ्रिक बेखौफ घर से
लबालब हूं आतंक मौत के डर से

बाक्स आफिस पर अपनों से टक्कर


बालीवुड के लिए पिछले छ: महीने कैसे भी गुजरें हो, मगर इस साल के आने वाले छ: महीने दर्शकों एवं कलाकारों के लिए बहुत ही रोमांच भरे हैं। अगर हम फिल्म निर्माता एवं निर्देशकों द्वारा फिल्म रिलीज करने की तारीखों पर नजर डालें तो पता चलता है कि इस साल बाक्स आफिस पर प्रेमी प्रेमिका को, मामा भांजे को, बाप बेटे को टक्कर देगा। इसमें कोई शक नहीं की बाक्स आफिस पर अब मुकाबलेबाजी बढ़ने लगी है, यह बात तो 'सांवरिया' एवं 'ओम शांति ओम' के एक साथ रिलीज होने पर ही साबित हो गई थी. उसके बाद 'तारे जमीं पर' एवं 'वैकलम' एक साथ रिलीज हुई, बेशक यहां पर त्रिकोणी टक्कर होने वाली थी, मगर उस दिन अजय देवगन की फिल्म 'हल्ला बोल' को रिलीज नहीं किया गया था.
बाक्स आफिस पर टक्कर होने से फिल्मी सितारों का मनोबल भी बढ़ता है और उनको भी खूब मजा आता है, जब सामने वाले किसी सितारे की फिल्म पिटती है। जुलाई महीने में भी दो नए सितारे बाक्स आफिस पर टकराने वाले हैं, हरमन बावेजा और इमरान खान. वैसे तो यह टक्कर कोई खास न होती, मगर यह टक्कर खास इस लिए हो गई क्योंकि दोनों के पीछे बड़े बैनर हैं. हरमन बावेजा को उनके पिता हैरी बावेजा और इमरान खान को उनके मामा आमिर खान लेकर आ रहे हैं. इमरान की जाने तू या जाने ना और हरमन की लव स्टोरी 2050 एक साथ 4 जुलाई को रिलीज हो रही है.
इसके बाद 18 जुलाई को कंट्रैक्ट एवं किस्मत कनेक्शन रिलीज हो रही है, जहां कंट्रैक्ट को रामगोपाल वर्मा लेकर आ रहे हैं, तो वहीं पर किस्मत कनेक्शन में शाहिद कपूर और विद्या बालन की जोड़ी को अजीज मिर्जा लेकर आ रहे हैं। जुलाई महीने के अंत में बालीवुड के बड़े सितारों को मल्लिका शेरावत बाक्स आफिस पर टक्कर देते हुए नजर आएगी, दरअसल 25 जुलाई को मिशन इस्तांबुल, मनी है तो हनी एवं अगली और पगली रिलीज होने जा रही हैं. जहां मिशन इस्तांबुल में जैयाद खान, विवेक ओबराय, सुनील शैट्टी और मनी है तो हनी है में गोविंदा, आफताब शिवदासानी जैसे कलाकार हैं, वहीं दूसरी ओर अगली और पगली में अकेली मल्लिका शेरावत रणबीर शौरी के साथ दिखाई देगी.
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सलमान खान, अमिताभ बच्चन, प्रियंका चोपड़ा 'गॉड तुसी ग्रेट हो' फिल्म के जरिए यशराज फिल्मज की फिल्म 'बचना ए हसीनों' को टक्कर देगी, जिसमें रणबीर कपूर, दीपिका पादुकोण की जोड़ी होगी। इस साल का सबसे दिलचस्प दिन हो सकता है 20 अगस्त, क्योंकि इस दिन कम से कम आठ फिल्में रिलीज होने की संभावना है और दिलचस्प बात यह है कि इस दिन दिओल परिवार की ही चार फिल्में रिलीज हो सकती है, जैसे कि चमकू, हीरोज, राईट एंड रोंग, एक- द पावर आफ वन. वैसे इस दिन उक्त चार फिल्मों के अलावा चल चला चल, दो और दो पांच, हरी पुत्र, मुंबई कटिंग, ओह माई गॉड, फिर कभी, रूबरू, द ग्रेट इंडियन बटरफ्लाई. ऐसा भी हो सकता है कि इन तारीखों के नजदीक आते, फिल्म निर्देशक दियोल परिवार के कहने पर फिल्मों कोई तारीखों को आगे खिसका दें.
इसके बाद महात्मा गांधी की जन्मतिथि पर मामा भांजा बाक्स आफिस पर टकरा सकते हैं क्योंकि इस दिन जहां आमिर खान की गजनी रिलीज होगी, वहीं संजय दत्त एवं उनके भांजे की किडनैप रिलीज होगी, इसके अलावा इसी दिन जूनियर बच्चन बाक्स आफिस पर द्रोणा के रूप में उतरेंगे और सलमान खान को बोनी कपूर 'वांटेड: डैड एंड अलाईव' घोषित करेंगे, जिससे यह दिन फिल्मी दीवानों के लिए बहुत दिलचस्प हो जाएगा. जब बात प्यार को जीताने की हो तो सभाविक है कि प्रेमिका अपने दीवाने का साथ देगी, बेशक अक्षय कुमार को 'सिंह इज किंग' से कैटरीना कैफ बालीवुड का किंग बनाने जा रही हो, मगर 24 अक्टूबर को बाक्स आफिस पर कैटरीना कैफ अपने दिलबर सलमान खान को 'युवराज' साबित करने में पूरी ताकत झोंक देगी क्योंकि इस दिन अक्षय कुमार भी 'चांदनी चौक टू चाईना' लेकर बाक्स आफिस पर उतरेंगे. इतना ही नहीं इसी दिन अजय देवगन की 'गोलमल रिटर्नज' और यशराज फिल्मज की 'रोड साईड रोमियो' भी रिलीज होगी. इसके बाद ठीक 14 नवंबर को प्रियंका चोपड़ा अपने प्रेमी हरमन बावेजा को टक्कर देगी, दरअसल हरमन की विकट्री और प्रियंका की 'फैशन' फिल्म रिलीज होगी. जहां आज प्रियंका अपने प्रेमी को बालीवुड में जबरदस्त एंट्री दिलाने के लिए बेचैन है, वहीं उक्त तारीख को वह उसकी प्रेमी की फिल्म पर भारी पड़ेगी. इस प्रेमी प्रेमिका की टक्कर के बाद बाप बेटे अमिताभ अभिषेक की टक्कर देखने को मिलेगी. जहां इस बाप बेटे ने सरकार राज में एक साथ काम करके राम गोपाल वर्मा की डुबती हुई नौका को किनारे लगाया, वहीं 21 नवंबर को बाप बेटा बाक्स आफिस पर आमने सामने होंगे, दरअसल अलादीन एंड द मिस्ट्री आफ द लैम्प में अमिताभ हैं तो दोस्ताना अभिषेक बच्चन है, दोनों फिल्में एक दिन रिलीज होंगी.

बालीवुड को जोरदार झट्के


चमक दमक भरी मायानगरी यानी बालीवुड में कुछ पता नहीं चलता, कब किसको आसमां मिल जाए और न जाने कब किसको जमीन पर आना पड़ जाए। जब बालीवुड की बात चल रही हो तो यशराज फिल्मस बैनर का नाम तो लेना स्वाभिक बात है क्योंकि इस बैनर का नाम तो बच्चा बच्चा जानता है। सफलता की सिख़र पर पहुंचे इस बैनर को लोगों की नजर लग गई और अब यह बैनर फलक से जमीं तलक आ गया। पिछले साल यशराज ने पांच फिल्में रिलीज की, मगर सफलता का परचम केवल एक लहरा पाई, वो फिल्म थी किंग खान की 'चक दे! इंडिया. यह फिल्म सफलता की सीढ़ियां चढ़ पाएगी यशराज बैनर को उम्मीद नहीं थी, जिसके चलते उन्होंने फिल्म को सस्ते दामों में बेचा, मगर जो फिल्में यशराज बैनर ने महंगे दामों पर बेची थी वो सब सुपर फ्लाप साबित हुई, जिसके चलते सिनेमा मालिकों को घाटा झेलना पड़ा. यशराज ने इस साल की शुरूआत 25 अप्रैल को 'टशन' से की, उन्होंने इस फिल्मों को भी महंगे दामों पर बेचना चाहा, मगर पहले ही नुकसान झेल चुके सिनेमा मालिकों ने इस बार यशराज फिल्मस की फिल्म को अहमियत नहीं दी, जिसके चलते यह फिल्म कुछ सिनेमा घरों में रिलीज नहीं हुई. फिल्म रिलीज होने के एक दो दिन बाद ही सुपर फ्लाप घोषित हो गई और यशराज बैनर को इस साल का सबसे बड़ा जोरदार झटका लगा. इस झटके के बाद यशराज चोपड़ा भी सख्ते में आ गए. इसके बाद बात करते हैं पिछले साल की सबसे बड़ी फ्लाप फिल्म की, जिसका नाम था 'आग', जिसको बनाया था पिछले साल लगातार तीन फ्लाप देने वाले रामगोपाल वर्मा ने, कहते हैं कि रामू 'आग' को 'शोले' की सफल रीमेक बनाने जा रहे थे, मगर इस रामू इस आग में जलकर राख हो गए, अब उनका कैरियर आने वाली फिल्म 'सरकार राज' पर टिका हुआ है, जिसमें अभिषेक बच्चन, अमिताभ बच्चन और उनकी बहू एशवर्या नजर आने वाली है.

'सरकार राज' ठाकरे को नसीहत


फिल्म निर्देशक राम गोपाल वर्मा की उम्दा पेशकारी 'सरकार राज' देखते हुए दर्शकों को पिछले दिनों महाराष्ट्र में महाराष्ट्र नव निर्माण सेना की ओर से उत्तर भारतीयों को निशान बनाने की घटनाओं की याद आई होगी। राज ठाकरे ने महाराष्ट्र में खुद को स्थापित करने लिए उत्तर भारतीयों को निशाना बनाया था, विशेषकर अमिताभ बच्चन को, जहां बड़े पर्दे के मैगास्टार अमिताभ बच्चन ने पर्दे के पीछे राज ठाकरे के शब्दी निशानों का खूब जोरदार जवाब दिया, वहीं पर अमिताभ बच्चन एवं उनके बेटे अभिषेक बच्चन ने 'सरकार राज' में महाराष्ट्र का नेतृत्व कर बड़े पर्दे पर खूब वाह वाह बटोरी है। उल्लेखनीय है कि इस फिल्म को आईफा अवार्ड समारोह में दिखाया गया था, फिल्म को इतना बड़ा समर्थन मिला कि पुलिस को भी भीड़ के साथ दो चार होना पड़ा. मेरे ख्याल से महाराष्ट्र को राम गोपाल वर्मा का आभार प्रकट करना चाहिए जिन्होंने महाराष्ट्र की एकता को पर्दे पर दर्शाया एवं महाराष्ट्र की एकता के नाम पर लोगों को तालियां बजाने लिए मजबूर कर दिया. वैसे तो सुनने आया है कि राज ठाकरे एवं राम गोपाल वर्मा में बहुत गहरी दोस्ती है एवं राज राम की फिल्म को रिलीज होने से पहले देखते हैं. अगर ऐसी बात है तो राज को फिल्म से सीख तो जरूर मिली होगी कि अगर बाल ठाकरे एवं राज ठाकरे का मकसद एक है तो रास्ते अलग अलग क्यों, अगर दोनों ही महाराष्ट्र का विकास चाहते हैं तो गद्दी पाने लिए उत्तर भारतीयों को निशाना क्यों बनाया जा रहा है. राम गोपाल वर्मा ने अपनी फिल्म को महाराष्ट्र की पृष्ठभूमि पर फिल्माया, इस फिल्म में एक नागरे परिवार है, जिसकी पूरा महाराष्ट्र मानता है. इसमें कोई शक नहीं कि फिल्म देखने वाले नागरे परिवार में ठाकरे परिवार की छवि कहीं न कहीं तलाशने की कोशिश करेंगे. जिस तरह नागरे परिवार महाराष्ट्र का भला चाहता एवं उसके लिए अपने निजी हित छोड़कर मानवता की भलाई में काम करता है. अगर राज एवं बाल ठाकरे ऐसा करते हैं तो किसी को भी ऐतराज नहीं होना चाहिए.

• हसन की 'दशावतारम' संकट में

• संघर्ष का दूसरा नाम 'अक्षय'

2007 ने किसको क्या दिया, किसी से क्या छीना


किसी ने ठीक ही कहा है कि समय से बलवान कोई नहीं और समय से पहले किसी को कुछ नहीं मिलता, ये बात बिल्कुल सत्य है, अगर आप आपने आसपास रहने वाले लोगों या खुद के बीते हुए दिनों का अध्ययन करेंगे तो ये बात खुदबखुद समझ में आ जाएगी। चलो पहले रुख करते हैं बालीवुड की तरफ क्योंकि ये मेरा पसंदीदा क्षेत्र है. जैसे ही 2007 शुरू हुआ छोटे बच्चन यानी अभिषेक के दिन बदल गए, उनकी इस साल की पहली फिल्म 'गुरू' रिलीज हुई, इस फिल्म ने अभिषेक को सफलता ही नहीं बल्कि करोड़ों दिलों की धड़कन 'ऐश' लाकर इसकी झोली में डाल दी, इसके बाद आओ हम चलते खिलाड़ी कुमार की तरफ ये साल उनके लिए बहुत ही भाग्यशाली साबत हुआ क्योंकि उनकी इस साल रिलीज हुई हर फिल्म को दर्शकों ने खूब प्यार दिया, जिसकी बदौलत अक्षय कुमार सफलता की सीढ़ियों को चढ़ते हुए सफलता की शिख़र पर जाकर बैठ गए. इस साल भारी झटका बालीवुड के प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली को लगा क्योंकि उनकी पिछले दिनों रिलीज हुई फिल्म को इस साल की सबसे फ्लाप फिल्मों में गिना जा रहा है, बेशक संजय मानते हैं कि उनकी फिल्म बहुत अच्छी थी लेकिन समीक्षाकारां ने फिल्म की आलोचना इस स्तर पर की कि उनकी फिल्म को मिलने वाले दर्शक दूर चले गए, इस बाद ये साल यशराज फिल्म बैनर के लिए भी बहुत अच्छा नहीं रहा क्योंकि उनकी इस साल रिलीज हुई फिल्मों में ज्यादातर फ्लाप फिल्में शामिल हैं. इसके अलावा 'जब वी मेट' में नज़र आए शाहिद-करीना कपूर एक दूसरे से दूर हो गए, पिछले करीबन चार सालों से चला आ रहा रिश्ता इस साल के अंतिम पड़ाव में पहुंचते ही दम तोड़ गया. अब बात करते खेल की दुनिया की, ये क्षेत्र भी लोगों का बहुत प्रिया है, सबसे पहले क्रिकेट जगत की बात करते हैं, इस बार काफी उलटफेर हुआ क्योंकि बुरे दौर से गुजर रहे राहुल द्रविड़ ने जैसे ही कप्तानी छोड़ती, वैसे महेंद्र सिन्ह धोनी की किस्मत ने पलटी खाई, वैसे भी धोनी खुद को किस्मत वाला मानते हैं, धोनी की अगुवाई में भारतीय टीम ने ट्वेंटी-20 चैंपियनशिप जीतकर बहुत बड़ी सफलता को छूआ है, इसके अलावा भारत के माईंड मास्टर यानी विश्वनाथन आनंद ने भी दूसरी बार शतरंज में विश्वविजेता का रुतबा हासिल किया है. ये बात तो कुछ पाने की अब खोने की बात करें तो भारत के महान क्रिकेटरों में शुमार कपिल देव को एक निजी संस्थान के साथ जुड़ने के लिए बीसीसीआई से संबंधित एक प्रशिक्षण संस्थान के प्रमुख्य का पद छोड़ना पड़ा, इसके बाद दलीप वैंगसरकर का बोर्ड के साथ पंगा चल रहा है क्योंकि बोर्ड ने पदाधिकारियों पर कुछ पाबंदियां लगाई हैं जोकि दलीप वैंगसरकर गले नहीं उतर रहीं. इसके अलावा यह साल भारतीय क्रिकेट बोर्ड के लिए काफी दयनीय रहा क्योंकि इस साल भारतीय टीम को कोच नहीं मिल पाया, लेकिन अब जाकर जब कोच मिला तो वह मार्च 08 से आपना कार्यकाल शुरू करेगा. अब बात करते हैं कोर्ट कचहरी की कि कौन हुआ अन्दर और कौन बाहर, सबसे पहले इस साल का सबसे बड़ा फैसला था स्टाम्प घोटाले से संबंधित मामला, इस साल स्टाम्प घोटाले के मुख्य आरोपी अब्दुल करीम तेलगी को अदालत ने दोषी ठहराते हुए 13 साल कैद की सजा सुनाई है और इसके साथ ही 102 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया है. तेलगी के खिलाफ यह मामला पुणे रेलवे स्टेशन के पास इंडिका कार में नकली स्टाम्प पेपर पुलिस द्वारा जब्त किए जाने के बाद सात जून 2002 को मामला दर्ज किया गया था। इसके अलावा बालीवुड के सितारे संजय दत्त को गैरकानूनी तौर पर हथियार रखने आरोप में छ: साल कारावास की सजा हुई है, जिसके चलते उनकी आंखों को इस बार दीपावली की रोशनी देखनी नसीब नहीं हुई जबकि मोनिका बेदी को जाली पासपोर्ट मामले में बरी होने से राहत मिलगी, इसके अलावा लाल किले पर हमला करने के आरोपी मुहम्मद अशफाक की फांसी पर भी सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है, अब थोड़ी सी उसकी बात कर लें, जिसने भारत रूपी पेड़ को दीमक की तरह खा लिया है, ये है दीमक भारतीय राजनीति है. इस बार जहां एक तरफ भारत अमरीका प्रमाणु करार सत्ताधारी संप्रग के गले का फांस बन गया, वहीं दूसरी तरफ नंदीग्राम ने पच्छिमी बंगाल सरकर की नींद हाराम कर दी, प्रतिभा पाटिल के लिए यह साल अच्छा रहा क्योंकि वह राजस्थान के राज्यपाल के पद से सीधी राष्ट्रपति पद पर पहुंच गई, इस बार भाजपा का पहली बार दक्षिणी भारत में कोई मुख्यमंत्री बना था, लेकिन सात दिन तक भी वहां सरकार नहीं टिक पाई. इस साल कांग्रेस पार्टी पंजाब, उत्तर प्रदेश जैसे अहम राज्यों से उड़ गई जबकि उत्तर प्रदेश के शासन पर मायावती का राज हुआ तो पंजाब की सत्ता पर बादल साहब का. आजकल पूरी राजनीति गुजरात के अंदर हो रही है क्योंकि गुजरात विस चुनाव जो होने वाले हैं. इस हिंसा की बात करें तो नंदीग्राम हिंसा की आग में लगातार जल ही रहा है, इसके अलावा असम में इस साल सैंकड़े हिंदुभाषियों को मौत की नींद सुला दिया गया जबकि अतंकवादियों ने हैदराबाद मस्जिद, उत्तर प्रदेश को अपना निशाना बनाया. आखर में बात करें तो सैंसेकस की जिसने इस साल 20000 के आंकड़े को छूकर एक नया रिकार्ड कायम किया है।
• चोली दामन का रिश्ता राखी और विवाद में
http://liveindia.mywebdunia.com/2007/12/27/1198752900000.html

लाजवाब है 'सरकार राज'

निर्देशकः राम गोपाल वर्मा
कलाकारः अमिताभ बच्चन, अभिषेक बच्चन, ऐश्वर्य राय बच्चन, गोविन्द रामदेव, सुप्रिया पाठक, राजेश श्रृगांरपुरी, रवि काले, उपेन्द्र लिमाए।




पिछले साल फ्लाप हैट्रिक मारने वाले राम गोपाल वर्मा ने इस साल की शुरूआत 'सरकार राज' से की. इसमें कोई शक नहीं कि इस फिल्म में रामगोपाल वर्मा ने अपने आपको फिर से साबित करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी. वर्मा ने इस फिल्म को बहुत बढ़िया ढंग से बनाया है ताकि दर्शक उनकी पुरानी फिल्म 'सरकार' से भी तुलना करना चाहें तो बढ़े शौक से करें क्योंकि यह फिल्म पुरानी सरकार से काफी ज्यादा अच्छी है. इतना ही नहीं रामू गोपाल वर्मा ने फिल्म को इस ढंग से तैयार किया कि दर्शक एक बार भी नजर इधर उधर चुरा नहीं पाते.
फिल्म ‘सरकार राज’ को देखकर कहा जा सकता है, कि राम गोपाल वर्मा ने बॉलीवुड के सफल निर्देशकों के कतार में धमाकेदार वापसी की है. उनके द्वारा बनाई गई ‘सत्या’ और ‘कंपनी’ जैसी फिल्मों की तुलना में कई गुणा बेहतरीन फिल्म है ‘सरकार राज’. फिल्म के सभी पहलू उसे बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त हिट बनाने में मददगार तो होंगे ही, साथ ही इसके तमाम कलाकारों के फिल्मी करियर में यह फिल्म मील का पत्थर जैसी साबित होगी.
फिल्म ‘सरकार राज’ की कहानी का अहम सूत्र है अनिता राजन (ऐश्वर्य राय बच्चन), जो एक अंतर्राष्ट्रीय कम्पनी की मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) है। अनिता महाराष्ट्र में एक बिजली प्लांट लगाना चाहती है, जिसके लिए नागरे परिवार से मंजूरी मिलनी बहुत लाजमी होती है. सुभाष नागरे को यह बात कुछ जमती थी, मगर उसके बेटे शंकर नागरे को लगता है कि इस प्लांट के लगने से महाराष्ट्र का फायदा होगा, तो वो प्लांट लगवाने लिए जिम्मा उठाता है. इस दौरान उसके रास्ते में कई रुकावटें आती हैं. जिसमें उसको अपनी पत्नी एवं खुद को भी खोना पड़ता है. शंकर की मौत के बाद खुलकर सामने आती है एक रणनीति एवं साजिश. जो दर्शक को हैरान कर देती है.

एक परिवार की ताकत को उभारती ‘सरकार राज’ की असली कामयाबी इसके संवादों और पटकथा में है। तेजी से बढ़ती घटनाओं के बीच सिनेप्रेमियों को चौंकाने के लिए कुछ कहानी में कुछ दिलचस्प मोड़ भी देखने को मिलेंगे, जो फिल्म के आखिरी 20-25 मिनट में नजर आएंगे. फिल्म ‘सरकार राज’ का अंतिम हिस्सा सबसे बेहतरीन है. राम गोपाल वर्मा ने जहां इस फिल्म के विषय को बड़ी संजीदगी के साथ पेश किया है, वहीं फिल्म ‘सरकार राज’ के कुछ दृश्य गहरी छाप छोड़ते हैं.

इसके अलावा, ‘सरकार राज’ का फिल्मांकन भी बहुत उम्दा है. फिल्म के हर दृश्य पर राम गोपाल वर्मा के निर्देशन की पैनी पकड़ साफ नजर आती है. ‘सरकार राज’ को एक बेहतरीन फिल्म बनाने का श्रेय इसके कहानीकार प्रशांत पांडे को भी जाता है, जिन्होंने पटकथा में कहीं भी ठहराव नहीं आने दिया है.
पूरे फिल्म के बीच में ‘गोविंदा’ के नारे इसके प्रभाव को और गंभीर बनाते हैं।

अमित रॉय की सिनेमाटोग्राफी और अल्लान अमीन का एक्शन भी उम्दा है। फिल्म ‘सरकार राज’ में अदाकारों का अभिनय बेमिसाल है. फिल्म के अंत में उनका वैसा ही कठोर रुप देखने को मिलेगा, ठीक जैसी एक घायल शेर की होती है. इन दृश्यों के जरिए वह फिल्मों को कामयाबी की बुलंदियों पर पहुंचा देते हैं.

‘गुरु’ और ‘युवा’ जैसी फिल्मों में अभिनय करने के बाद अभिषेक बच्चन फिल्म ‘सरकार राज’ में फिल्म जगत के सबसे महान अभिनेता की बराबरी में खड़े नजर आते हैं और हर दृश्य में जान डालते हैं. अभिनय के मामले में दोनों पिता-पुत्र एक दूसरे की बराबरी में नजर आते हैं. वहीं ऐश्वर्य राय बच्चन भी फिल्म ‘सरकार राज’ में अपने पूरे करियर के दौरान सबसे बेहतरीन अंदाज में अभिनय करती नजर आई है. इस फिल्म में दिलीप प्रभावालकर, गोविन्द रामदेव, शयाजी शिंदे, रवि काले और सुप्रिया पाठक सभी कलाकारों ने अपना किरदार बखूबी निभाया है.

कुल मिलाकर कहा जाए तो सरकार राज राम गोपाल वर्मा की एक बेहतरीन पेशकारी है, जिसको देखकर दर्शक वाह वाह कहते हुए नजर आएंगे।

छोटे आसमां पर बड़े सितारे


शाहरुख खान छोटे पर्दे से बड़े पर्दे पर जाकर बालीवुड का किंग बन गया एवं राजीव खंडेलवाल आपनी अगली फिल्म 'आमिर' से बड़े पर्दे पर कदम रखने जा रहा है, मगर वहीं लगता है कि बड़े पर्दे के सफल सितारे अब छोटे पर्दे पर धाक जमाने की ठान चुके हैं। इस बात का अंदाजा तो शाहरुख खान की छोटे पर्दे पर वापसी से ही लगाया जा सकता था, मगर अब तो सलमान खान एवं ऋतिक रोशन भी छोटे पर्दे पर दस्तक देने जा रहे हैं. इतना ही नहीं पुराने समय के भी हिट स्टार छोटे पर्दे पर जलवे दिखा रहे हैं, जिनमें शत्रुघन सिन्हा एवं विनोद खन्ना प्रमुख है. बालीवुड के सितारों का छोटे पर्दे की तरफ रुख करने के दो बड़े कारण हैं, एक तो मोटी राशी एवं दूसरा अधिक दर्शक मिल रहे हैं. इन सितारों के अलावा अक्षय कुमार, अजय देवगन, गोविंदा भी छोटे पर्दे के मोह से बच नहीं सके. अभिनेताओं की छोड़े अभिनेत्रियां भी कहां कम हैं उर्मिला मातोंडकर एवं काजोल भी छोटे पर्दे पर नजर आ रही हैं.

छोटे पर्दे पर भी आना बुरी बात नहीं लेकिन जब आप बड़े पर्दे पर सफलता की शिखर पर बैठे हों तो छोटे पर्दे की तरफ रुख करना ठीक नहीं, इस सबूत तो शाहरुख खान को मिल गया, उसके नए टीवी शो 'पांचवीं पास॥' की टीआरपी इतनी कम है कि शाहरुख को अपनी लोकप्रियता पर शक होने लगा है। शाहरुख ने छोटे पर्दे पर वापसी अमिताभ बचन के नकशे कदम पर चलते हुए की थी, मगर स्थिति बिल्कुल विपरीत थी, अमिताभ को तो मजबूरी में छोटे पर्दे का सहारा लेना पड़ा, मगर शाहरुख खान ने सफलता की शिखर पर बैठे हुए छोटे पर्दे पर वापसी की. अमिताभ को छोटे पर्दे ने एक बार फिर बड़े पर्दे पर जाने के लायक बनाया क्योंकि अमिताभ काफी कर्ज में डुब चुके थे क्योंकि उनकी हर बाजी उलटी पर रही थी, मगर छोटे पर्दे 'कौन बनेगा करोड़पति' में क्या आए वो एक बार फिर करोड़पति बन गए. छोटे पर्दे ने काफी फिल्मी सितारों को बचाया है जिनमें मुकेश खन्ना, अजूब खान, विनोद खन्ना, हेमा मालनी, शेखर सुमन, पंकज कपूर आदि, इतना ही नहीं शाहरुख खान, ग्रेसी सिंह आदि भी तो छोटे पर्दे की देन हैं. शाहरुख खान, सलमान खान, अक्षय कुमार, ऋतिक रोशन जैसे सितारों को सोचना चाहिए कि अगर सब कुछ वो करने लगेंगे तो विचार फ्लाप स्टारों का क्या होगा.
इतना ही नहीं रोज रोज टैलीविजन पर दिखने से इज्जत भी कम होती है, यह बात तो बेचारे शाहरुख खान से पूछ लो, जिनके टीवी शो ने उनकी नींद उड़ा दी. चलो शाहरुख खान को तो हर जगह टांग आड़ने के आदत है, अन्य स्टारों को तो सोचना चाहिए. फिलहाल तो हमको देखना है कि आखिर किस में है कितना दम, दस का दम में हैं सलमान खान, तो जानून कुछ कर दिखाने का में ऋतिक रोशन एवं फीयर फैक्टर में अक्षय कुमार हैं.

क्रिकेट पर नस्लीय टिप्पणियों का काला साया

क्रिकेट खेल मैदान अब धीरे धीरे नस्लीय टिप्पणियों का मैदान बनता जा रहा है. आज खेल मैदान में खिलाड़ी खेल भावना नहीं बल्कि प्रतिशोध की भावना से कदम रखता है. वो अपने मकसद में सफल होने पर सम्मान महसूस करने की बजाय अपने विरोधी के आगे सीना तानकर खड़ने में अधिक विश्वास रखता है. यही बात है कि अब क्रिकेट का मैदान नस्लवादी टिप्पणियों के बदलों तले घुट घुटकर मर रहा है. इसके पीछे केवल खिलाड़ी ही दोषी नहीं बल्कि टीम प्रबंधन और बाहर बैठे दर्शक भी जिम्मेदार हैं.

अगर टीम प्रबंधन खिलाड़ियों के मैदान में उतरने से पहले बोले कि खेल को खेल भावना से खेलना और नियमों का उल्लंघन करने पर कड़ी सजा होगी तो शायद ही कोई खिलाड़ी ऐसा करें. लेकिन आज रणनीति कुछ और ही है मेरे दोस्तों. आज की रणनीति 'ईंट का जवाब पत्थर' से देने की है. जिसके चलते आए दिन कोई न कोई खिलाड़ी नस्लवादी टिप्पणी का शिकार होता है. यह समस्या केवल भारतीय और आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों की नहीं बल्कि इससे पहले दक्षिण अफ्रीका के खिलाड़ी हर्शल गिब्स ने भी पाकिस्तानी खिलाड़ियों पर टीका टिप्पणी की थी.

खेल की बिगड़ती तस्वीर को सुधारने के लिए खेल प्रबंधन को ध्यान देने की जरूरत है, वरना क्रिकेट का मैदान एक दिन युद्ध का मैदान बन जाएगा और खिलाड़ियों के लवों से नस्लीय टिप्पणियों नहीं निकलेगी बल्कि विकेटें और बल्ले चलेंगे जो कि खेल मैदान की परिभाषा ही बदल देंगे. खेल मैदान में होने वाली तकरार को कोई और जन्म नहीं देता बल्कि खिलाड़ी ही देते हैं. कुछ समय पहले भारतीय खिलाड़ी श्रीसंथ द्वारा किए गए मैदान में बर्ताव को आस्ट्रेलियाई कप्तान रिक्की पोंटिंग और पाकिस्तान के पूर्व कप्तान इंजमाम उल हक ने आक्रमकता का नाम देकर खिलाड़ियों को हल्लाशेरी प्रदान की है.
आभार
कुलवंत हैप्पी