अंत तक नहीं छोड़ा दर्द ने दामन

कोई दर्द कहां तक सहन कर सकता है, इसकी सबसे बड़ी उदाहरण है पिछले दिनों मौत की नींद सोई बेनज़ीर भुट्टो..जो नौ वर्षों के बाद पाकिस्तान लौटी थी..सिर पर कफन बांधकर..उसको पता था कि उसकी मौत उसको बुला रही थी, मगर फिर भी क्यों उसने अपने कदमों को रोका नहीं. इसके पिछे क्या रहा होगा शोहरत का नशा या फिर झुकेंगे नहीं मर जाएंगे के कथन पर खरा उतरने की कोशिश.. कुछ भी हो, असल बात तो ये है कि दर्द ने बेनजीर भुट्टो का दामन ही नहीं छोड़ा.

स्व. इंदिरा गांधी की शख्सियत से प्रभावित और अपने पिता जुल्फिकार अली भुट्टो से राजनीतिक हुनर सीखकर राजनीतिक क्षेत्र में उतरी बेनज़ीर भुट्टो बुर्के से चेहरे को बाहर निकालकर देश की सत्ता संभालने वाली पहली महिला थी. बेनज़ीर भुट्टो स्व. इंदिरा गांधी से पहली बार तब मिली थी, जब बांग्लादेश युद्ध के बाद 1972 में जुल्फिकार अली भुट्टो शिमला समझौते के लिए भारत आए थे, इस दौरन भुट्टो भी उनके साथ थी।

बेनज़ीर की हँसती खेलती जिन्दगी में दर्द का सफर तब शुरू हुआ, जब 1975 में बेनजीर के पिता को प्रधानमंत्री पद से बर्खास्त कर दिया गया था और उनके विरुध एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की हत्या मुकदमा चलाया गया तथा उन्हें चार अप्रैल 1979 को फाँसी की सजा दे दी गई।

इसके अगले ही साल 1980 में बेनजीर के भाई शाहनवाज की फ्रांस में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। इतना ही नहीं इसके बाद 1996 में उनके दूसरे भाई मीर मुर्तजा की भी हत्या कर दी गई. इसके अलावा भुट्टो के पति जरदारी को भी काफी समय तक जेल में बंद रखा गया.

बेनजीर की माता भी इतने सदमे देखने के बाद अपनी होश खो बैठी लेकिन बेनज़ीर भुट्टो का दिल ऐसे कौन से शब्दों की देन था कि वो हर मंजर देखने के बाद भी पीछे हटने का नाम नहीं ले रही थी.

इंसान की पहचान, उसकी बातें

जैसे हीरे की पहचान जौहरी को होती है, वैसे ही इंसान की परख इंसान को. बस आप को सामने वाली बातों को ध्यान से सुनना है, जब वो किसी और से बात कर रहा हो. इस दौरान इंसान की मानसिकता किसी ना किसी रूप में सामने आई जाती है. आप ने देखा होगा कि कुछ लोगों को आदत होती है कि वो अपने एक सहयोगी या बोस के जाते उसकी बुराई करनी शुरू कर देते हैं तो उस पर आप विश्वास करके खुद को धोखा दे रहे हैं क्योंकि वो उस इंसान की फितरत है. जब आप न होंगे तो आपकी बुराई किसी और इंसान के सामने करेगा.

एक छोटी सी कहानी मेरी जिन्दगी से कहीं न कहीं जुड़ी हुई है, जो मैं इस बार आपसे सांझी करना चाहूंगा, कहते हैं जब तक आदमी किसी वस्तु को चखता नहीं तब तक उसको स्वाद का पता नहीं चलता. एक बार की बात है कि दो लड़कियां और दो लड़के आपस में बातें कर रहे थे, उसके बीच प्यार और दोस्ती का टोपिक था, लड़के कहते हैं कि प्यार और दोस्ती दिखावे की होती है जबकि लड़कियां इस बात पर अड़िंग थी कि प्यार और दोस्ती दोनों ही जिन्दगी में अहम स्थान रखतें हैं.

इसमें दोनों की बात सही थी क्योंकि लड़के अपनी फितरत बता रहे थे और लड़कियां अपनी. लड़कियों को प्यार और दोस्ती में विश्वास नज़र आ रहा था जबकि उन लड़कों की निगाह में दोस्ती और प्यार पैसे अथवा स्वार्थ के लिए किया जाता है. इस छोटी सी नोंक झोंक से लड़कों की असलियत सामने आ गई कि इनकी दोस्ती केवल पैसे अथवा स्वार्थ के लिए है. ये बात सच भी निकली, जो दोनों लड़के थे, उन में दोस्ती है, पर दोस्ती वाली बात नहीं, ये हकीकत मैंने अपनी आंखों से देखी है.

दोनों एक दूसरे की मदद नहीं करते बल्कि टांग खींचने में लगे रहते हैं. जबकि वो दोनों लड़कियां कल तक एक दूसरे दूर दूर थीं, परंतु उस घटना ने दोनों को समीप पहुंचा दिया. जिस इंसान की फितरत में हो दगा देना, वो वफा अपने सगे बाप से भी नहीं कर सकता,
आभार
कुलवंत हैप्पी

कफन के जेब नहीं होती...

यहां हर इंसान को पता है कि जब वो दुनिया से जाता है तो उसके हाथ खाली होते हैं, इतना ही नहीं कभी कभी तो उसके परिजन उसके हाथों में मरते समय रह गई अंगूठियों को भी उतार लेते हैं. इस असलियत से हर शख्स अवगत है, परंतु फिर भी उसके भीतर से लोगों के साथ छल कपट करके कमाई करने की आदत नहीं जाती.

दुनिया में सिकंदर, रावण धनवान पल में राख हो गए और उनके साथ उनकी कमाई का एक हिस्सा भी नहीं गया, सिकंदर विशालतम साम्राज्य का मालिक था परंतु अंत में तो उसको दो गज ज़मीन ही नसीब हुई. मगर इंसान के भीतर दौलत कमाने की लालसा कभी कम नहीं होती, बेशक उसको पता है कि जिस सफेद कपड़े से उसका अंतिम यात्रा के वक्त शरीर ढका जाएगा, उसके परिजन जेब तक नहीं लगवाते.

उदाहरण के तौर पर आज आपको एक नौजवान को नौकरी देने की एवज में एक करोड़ रुपए की रिश्वत मिल गई है और उसके कुछ दिन बाद ही आपकी मौत हो जाती है. क्या आपके परिजन आपके साथ वो पैसे जला देंगे ?, क्या वो आपका संस्कार चंदन की लकड़ी से करेंगे ? शायद उत्तर नहीं में होगा. अब भी आपके परिजन आपका अंतिम संस्कार आम लोगों की तरह ही करेंगे, शायद आपकी मौत पर वो नौजवान आंसू न बहाए, जिस से आप ने रिश्वत ली है, क्योंकि क्या पता उसके कहां कहां से पैसे जुटाकर आपके दिए थे. अब आप सोचो आप साधारण जीवन जीते हैं और आप लोगों का दर्द बांटते हैं.

जिससे आप को सकून मिल रहा है. आपके कारण किसी और के चेहरे पर जब खुशी आती है, तो आपकी खुशी बढ़ दुगुनी हो जाती है. दूसरों का दर्द बांटते समय तुम्हारा खुद का दर्द शून्य हो जाता है और इस दौरान आपकी मौत हो गई, आपको तो सकून की मौत मिलेगी ही साथ में लोगों के दिलों से दुआएं निकलेगी कि हे भगवान इस व्यक्ति को अगले जन्म में भी इंसान बनना. आपकी मौत पर लोग ये नहीं कहेंगे कि चल अच्छा हुआ खून पीने वाला मानव रूपी जोक खत्म हो गया. बेशक इस कफन के जेब न हो, परंतु लोगों की दुआएं और स्नेह के साथ जाएगा. जब भी कहीं आपकी बात चलेगी तो प्रशंसा ही मिलेगी. पैसा कमाओ, मगर किसके साथ छल कपट करके नहीं, क्योंकि कफन के जेब नहीं होती.

2007 ने किसको क्या दिया, किसी से क्या छीना

किसी ने ठीक ही कहा है कि समय से बलवान कोई नहीं और समय से पहले किसी को कुछ नहीं मिलता, ये बात बिल्कुल सत्य है, अगर आप आपने आसपास रहने वाले लोगों या खुद के बीते हुए दिनों का अध्ययन करेंगे तो ये बात खुदबखुद समझ में आ जाएगी. चलो पहले रुख करते हैं बालीवुड की तरफ क्योंकि ये मेरा पसंदीदा क्षेत्र है. जैसे ही 2007 शुरू हुआ छोटे बच्चन यानी अभिषेक के दिन बदल गए, उनकी इस साल की पहली फिल्म 'गुरू' रिलीज हुई, इस फिल्म ने अभिषेक को सफलता ही नहीं बल्कि करोड़ों दिलों की धड़कन 'ऐश' लाकर इसकी झोली में डाल दी, इसके बाद आओ हम चलते खिलाड़ी कुमार की तरफ ये साल उनके लिए बहुत ही भाग्यशाली साबत हुआ क्योंकि उनकी इस साल रिलीज हुई हर फिल्म को दर्शकों ने खूब प्यार दिया, जिसकी बदौलत अक्षय कुमार सफलता की सीढ़ियों को चढ़ते हुए सफलता की शिख़र पर जाकर बैठ गए. इस साल भारी झटका बालीवुड के प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली को लगा क्योंकि उनकी पिछले दिनों रिलीज हुई फिल्म को इस साल की सबसे फ्लाप फिल्मों में गिना जा रहा है, बेशक संजय मानते हैं कि उनकी फिल्म बहुत अच्छी थी लेकिन समीक्षाकारां ने फिल्म की आलोचना इस स्तर पर की कि उनकी फिल्म को मिलने वाले दर्शक दूर चले गए, इस बाद ये साल यशराज फिल्म बैनर के लिए भी बहुत अच्छा नहीं रहा क्योंकि उनकी इस साल रिलीज हुई फिल्मों में ज्यादातर फ्लाप फिल्में शामिल हैं. इसके अलावा 'जब वी मेट' में नज़र आए शाहिद-करीना कपूर एक दूसरे से दूर हो गए, पिछले करीबन चार सालों से चला आ रहा रिश्ता इस साल के अंतिम पड़ाव में पहुंचते ही दम तोड़ गया. अब बात करते खेल की दुनिया की, ये क्षेत्र भी लोगों का बहुत प्रिया है, सबसे पहले क्रिकेट जगत की बात करते हैं, इस बार काफी उलटफेर हुआ क्योंकि बुरे दौर से गुजर रहे राहुल द्रविड़ ने जैसे ही कप्तानी छोड़ती, वैसे महेंद्र सिन्ह धोनी की किस्मत ने पलटी खाई, वैसे भी धोनी खुद को किस्मत वाला मानते हैं, धोनी की अगुवाई में भारतीय टीम ने ट्वेंटी-20 चैंपियनशिप जीतकर बहुत बड़ी सफलता को छूआ है, इसके अलावा भारत के माईंड मास्टर यानी विश्वनाथन आनंद ने भी दूसरी बार शतरंज में विश्वविजेता का रुतबा हासिल किया है. ये बात तो कुछ पाने की अब खोने की बात करें तो भारत के महान क्रिकेटरों में शुमार कपिल देव को एक निजी संस्थान के साथ जुड़ने के लिए बीसीसीआई से संबंधित एक प्रशिक्षण संस्थान के प्रमुख्य का पद छोड़ना पड़ा, इसके बाद दलीप वैंगसरकर का बोर्ड के साथ पंगा चल रहा है क्योंकि बोर्ड ने पदाधिकारियों पर कुछ पाबंदियां लगाई हैं जोकि दलीप वैंगसरकर गले नहीं उतर रहीं. इसके अलावा यह साल भारतीय क्रिकेट बोर्ड के लिए काफी दयनीय रहा क्योंकि इस साल भारतीय टीम को कोच नहीं मिल पाया, लेकिन अब जाकर जब कोच मिला तो वह मार्च 08 से आपना कार्यकाल शुरू करेगा. अब बात करते हैं कोर्ट कचहरी की कि कौन हुआ अन्दर और कौन बाहर, सबसे पहले इस साल का सबसे बड़ा फैसला था स्टाम्प घोटाले से संबंधित मामला, इस साल स्टाम्प घोटाले के मुख्य आरोपी अब्दुल करीम तेलगी को अदालत ने दोषी ठहराते हुए 13 साल कैद की सजा सुनाई है और इसके साथ ही 102 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया है. तेलगी के खिलाफ यह मामला पुणे रेलवे स्टेशन के पास इंडिका कार में नकली स्टाम्प पेपर पुलिस द्वारा जब्त किए जाने के बाद सात जून 2002 को मामला दर्ज किया गया था। इसके अलावा बालीवुड के सितारे संजय दत्त को गैरकानूनी तौर पर हथियार रखने आरोप में छ: साल कारावास की सजा हुई है, जिसके चलते उनकी आंखों को इस बार दीपावली की रोशनी देखनी नसीब नहीं हुई जबकि मोनिका बेदी को जाली पासपोर्ट मामले में बरी होने से राहत मिलगी, इसके अलावा लाल किले पर हमला करने के आरोपी मुहम्मद अशफाक की फांसी पर भी सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है, अब थोड़ी सी उसकी बात कर लें, जिसने भारत रूपी पेड़ को दीमक की तरह खा लिया है, ये है दीमक भारतीय राजनीति है. इस बार जहां एक तरफ भारत अमरीका प्रमाणु करार सत्ताधारी संप्रग के गले का फांस बन गया, वहीं दूसरी तरफ नंदीग्राम ने पच्छिमी बंगाल सरकर की नींद हाराम कर दी, प्रतिभा पाटिल के लिए यह साल अच्छा रहा क्योंकि वह राजस्थान के राज्यपाल के पद से सीधी राष्ट्रपति पद पर पहुंच गई, इस बार भाजपा का पहली बार दक्षिणी भारत में कोई मुख्यमंत्री बना था, लेकिन सात दिन तक भी वहां सरकार नहीं टिक पाई. इस साल कांग्रेस पार्टी पंजाब, उत्तर प्रदेश जैसे अहम राज्यों से उड़ गई जबकि उत्तर प्रदेश के शासन पर मायावती का राज हुआ तो पंजाब की सत्ता पर बादल साहब का. आजकल पूरी राजनीति गुजरात के अंदर हो रही है क्योंकि गुजरात विस चुनाव जो होने वाले हैं. इस हिंसा की बात करें तो नंदीग्राम हिंसा की आग में लगातार जल ही रहा है, इसके अलावा असम में इस साल सैंकड़े हिंदुभाषियों को मौत की नींद सुला दिया गया जबकि अतंकवादियों ने हैदराबाद मस्जिद, उत्तर प्रदेश को अपना निशाना बनाया. आखर में बात करें तो सैंसेकस की जिसने इस साल 20000 के आंकड़े को छूकर एक नया रिकार्ड कायम किया है. 
आभार
कुलवंत हैप्पी

अनावश्यक इच्छाएं त्यागो, खुशी आपके द्वार

ज़िन्दगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए' ये पंक्तियां एक गीत की हैं, परंतु एक हकीकत को दर्शाती हैं. इस छोटी सी पंक्ति में शायर ने बहुत बड़ी बात कह दी थी, इंसान की फिदरत है कि वो खुशी पाने की तलाश में निकल पड़ता है और बदलें में गम मिलते हैं, जैसे पहले धार्मिक प्रवृत्ति के लोग प्रभु पाने के लिए जंगल की तरफ निकल जाते थे परंतु भगवान कहां मिलता है. जब खुशी ढूंढने की तलाश में इंसान निकलता है तो वह उसके विपरीत जाता है, जैसे आप सोचते हैं कि आपको वो चीज मिल जाए तो खुशी मिल जाएगी परंतु ऐसा कद्यापि नहीं होता क्यों कि जैसे जैसे इंसान चीजों को पाता जाता है वैसे वैसे उसकी लालसा बड़ती जाती है और एक दिन उसकी इच्छाएं और लालसाएं इतनी बढ़ जाती हैं कि वह दुखी रहने लगता है. 

अगर खुश रहना है तो इच्छाओं का त्याग करो, अब यहां पर सवाल आ खड़ा हो जाता है कि अगर इंसान इच्छाओं का त्याग कर देगा तो जिन्दा कैसे रहेगा क्योंकि इच्छाओं के चलते ही तो इंसान जीता है, जैसे मनुष्य की शादी होती है तो उसकी अगली इच्छा है कि उसके घर कोई संतान हो, जैसे ही संतान का जन्म होता है तो उसकी जिम्मेवारी बढ़ जाती है और उसके जीवन में बदलाव आता है, फिर वह संतान की परवरिश में जुट जाता है और उनके जवान होने की राह तांकता है, फिर संतान की शादी के बाद उससे आपने पोते पोतियों की इच्छा करता है, ये इच्छाएं गलत नहीं क्योंकि ये इच्छाएं जीने के लिए उत्सुक करती हैं. गलत ये है कि शादी के वक्त हम सोचे हमारी शादी तो बड़े लोगों की तरह क्यों नहीं हुई, मुझे खूबसूरत हमसफर क्यों नहीं मिला, मेरी पहली संतान लड़का क्यों नहीं था, मेरे पड़ोसी के पास दुनिया की सबसे महंगी गाड़ी है मेरे पास क्यों नहीं, हां इच्छाएं रखें लेकिन उनको पूरा करने लिए आप अत्यंत परिश्रम भी तो करें ताकि आप आपनी उम्मीदों पर खड़े उतर सकें, किसी ने कहा है कि हर कहानी का खूबसूरत अंत होता है, इस लिए बुरा होने पर उदास होने की बजाय सोचो कि अभी मेरी कहानी का अंत नहीं हुआ और मन को शांत रखकर आपने लक्ष्य की तरफ बेफिक्र होकर बढ़ो आपकी इच्छाएं भी पूर्ण होंगी और आपका मन अशांत भी नहीं होगा. लेकिन इच्छाओं को मन के ही रख़कर औरों के प्रति अक्रोश मत रखो क्योंकि ये बात आपको दुख पहुंचाती है. 

आप किसी चीज की तलाश करने की बजाय जो आपके पास है उसको स्वीकारो और जिसकी इच्छा है वो चीज धीरे धीरे आपके पास चलकर आ जाए, कहते हैं ना कि भगवान के घर देर है अंधेर नहीं, परंतु ये मत सोचो के प्यास लगने पर कुएं के पास जाने की जरूरत नहीं और कुआं आपके पास चलकर आ जाएगा, हां ये गलत धारणा है क्योंकि कुछ पाने के लिए कुछ करना पड़ता है. आपने देखा होगा के कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनको अगर आप चांद गिफ्ट में दें देते हैं, मगर वो कहेंगे सितरे कहां हैं, ऐसे लोग कभी खुश नहीं रह पाते और किसी को खुश रहने भी नहीं देते, इस लिए बुजुर्ग लोग कहते हैं कभी लकीर के फकीर मत बनो दर्द मिलेगा. खुश रहना है तो संतुष्ट रहना सीखो, अगर आप संतुष्ट नहीं तो दुख आपको हर मोड़ पर मिलेगा. 

पंजाब में राजनीति और बाबावाद

वैसे तो पूरे भारतवर्ष में ही बाबावाद फैला हुआ है, किंतु पंजाब की राजनीति तो चलती ही बाबावाद से, इसमें कोई शक नहीं कि पंजाब की राजनीति में बाबावाद का हस्तक्षेप है, पंजाब में जिनते भी साधू संत प्रसिद्ध हुए वे सब राजनीति में आए और राजनीति में जगह पाने के बदले कई साधू संतों को जान देकर कीमत चुकानी पड़ी है, बेशक वे संत हरचंद सिन्ह लौंगवाल हों, चाहे फिर विश्वप्रसिद्ध जरनैल सिन्ह भिंडरांवाला हों. इसके अलावा पंजाब में जब भी किसी बाबा के खिलाफ दुष्प्रचार होता है तो पंजाब की राजनीतिक पार्टियों को बहुत नुकसान होता है क्योंकि जिन बाबाओं के खिलाफ दुष्प्रचार होता है, उनके बल तो राजनीति चलती है. उदाहरण के तौर पर कुछ महीने पहले पंजाब में हुए डेरा सच्चा सौदा सिरसा और शिरोमणि गुरूद्बारा प्रबंधक कमेटी के बीच हुए संघर्ष को ही लें, इसके पीछे भी तो राजनीति थी. शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस पंजाब में दो बड़े दल हैं, अकाली दल की समर्थक भाजपा है. दोनों पार्टियों के नेताओं का डेरा सच्चा सौदा सिरसा में आना जाना है क्योंकि डेरा सच्चा सौदा के पंजाब में काफी श्रद्धालु हैं, लेकिन अकाली दल का इस बार डेरा के प्रति रोष इसलिए था क्योंकि डेरा प्रमुख ने कथित तौर पर इस बार कांग्रेस की मालवा क्षेत्र में मदद की थी जोकि शिअद के सुप्रीमो का मुख्य क्षेत्र है. जिसके चलते शिअद सुप्रीमो डेरे से बेहद नाराज़ थे और दूसरी तरफ श्री गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी शिअद की बहुत करीबी कमेटी है, कहा जाए तो शिअद बादल चलता है एसजीपीसी के बलबूते पर, डेरे और एसजीपीसी के विवाद के चलते जैसे पंजाब और अन्य राज्यों के हालात बिगड़ने लगे तो शिअद सुप्रीमो व पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिन्ह बादल ने एसजीपीसी को अंदरखाते कथित तौर पर मामला निपटाने को कहा, जैसे ही ये मामला ठन्डा हुआ तो अब एसजीपीसी ने अब फिर से 1984 के दौरान हुए ब्लू सटार के शहीद भिंडरांवाले का प्रचार शुरू कर दिया, इतना ही नहीं पिछले दिनों भिंडरांवाला की तस्वीर को श्री हरमंदर साहिब के म्यूज़ियम में स्थापित किया है. इसके अलावा पंजाब के कुछ शहरों में भी भिंडरावाला के पोस्टर लगाए गए, जिसको देखकर लगता है कि मानो पंजाब को एक बार फिर से खालिस्तान के रंग में रंगने की तैयारी है. याद रहे कि जरनैल सिंह को पंजाब में वोट बैंक बनाने के लिए कांग्रेस पार्टी ने तैयार किया था लेकिन एक दिन ऐसा समय आया कि कांग्रेस का ये सिपाही जरनैल सिन्ह कांग्रेस के लिए एक बड़ी सम्स्या बन गया और खालिस्तान की मांग को लेकर चर्चा का केंद्र बनते बनते जरनैल सिन्ह भिंडरांवाला बन गया. जिसको खत्म करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सिक्खों के पवित्र स्थान श्री हरमंदर साहिब पर हमला करवाना पड़ा. यह दिन पंजाब के लिए बहुत बुरा था क्योंकि गुरुद्वारा साहिब पर हुए हमले ने धार्मिक भावनाओं को कुचल दिया था. इस बात से दुखी कुछ लोगों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या भी कर दी थी. अब फिर पंजाब में अपना रौब बनाने के लिए शिअद हर हथकंडा अपनाएगी. इसके अलावा कुछ लोगों का मानना है कि डेरा सिरसा के चलते पंजाब के कुछ लोगों का ध्यान श्री गुरूद्वारा साहब से हटकर डेरे की तरफ चला गया था, जिसके चलते एसजीपीसी को गुरुद्वारा साहबों से होने वाली आमदनी कम हुई और कुछ लोगों का कहना है डेरे के चलते बहुत से लोगों ने शराब पीनी छोड़ दी, जिसके चलते शराब के ठेकेदारों को भारी झटका महसूस हुआ, वहीं कुछ लोगों का कहना है कि शिअद बादल को विस चुनावों के दौरान डेरा सिरसा की ओर से कोई समर्थन नहीं मिला, मिलता भी कैसे, कांग्रेसी नेता जस्सी डेरा प्रमुख के रिश्तेदार जो ठहरे. पंजाब की राजनीति में बाबावाद तो कूटकूट कर भरा हुआ है, इसमें तो जरा सा भी शक नहीं, इससे पहले अकाली दल को संत फतह सिन्ह व चन्नण सिन्ह शिख़र पर ले गए थे, तब से ही राजनीति में साधू संतों की हिस्सेदारी रही है कभी सीधे तौर पर तो कभी अप्रत्यक्ष रूप में. अब अकाली दल को पता चल गया कि अगर पंजाब में राज करना है तो एसजीपीसी को साथ लेकर चलना होगा. बेशक डेरा सच्चा सौदा सिरसा से पहले शिअद ने बाबा प्यारा सिन्ह भनियारे वाले से नजदीकियां बढ़ाईयां थी, जैसे अकाली दल को पता चला कि बाबा के पास कुछ नहीं तो एसजीपीसी ने उस बाबा पर हल्ला बोल दिया. एक बात की समझ किसी को नहीं आई कि आख़र जैसे ही किसको बादल साहब छोड़ते हैं तो उसके बाद उसका टकराव एसजीपीसी से क्यों होता है?

आभार
कुलवंत हैप्पी