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82 साल पहले मनाया गया था 'स्‍वतंत्रता दिवस'

आज पूरे देश में स्‍वतंत्रता दिवस मनाया गया। एक तरफ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लाल किले से राष्‍ट्र को संबोधित किया, तो दूसरी तरफ मीडिया के जरिये संभावित पीएम पद के उम्‍मीदवार गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालन कॉलेज से संबोधन किया। मनमोहन सिंह का भाषण खत्‍म हुआ तो नरेंद्र मोदी का भाषण नौ बजे शुरू हुआ, पूर्व अनुमान मुताबिक नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के भाषण पर हल्‍ला बोला। नरेंद्र मोदी ने मनमोहन सिंह पर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्‍होंने देश की आजादी में अहम रोल अदा करने वाले सरदार पटेल और महात्‍मा गांधी का जिक्र करने की बजाय एक परिवार की महिमा गाई। लेकिन मुझे दोनों नेताओं ने पूरी तरह निराश किया। माना मनमोहन सिंह गांधी परिवार से आगे नहीं बढ़े, लेकिन कल की उम्‍मीद बन चुके नरेंद्र मोदी भी तो गुजरात से आगे नहीं बढ़ सके। वे भी केवल महात्‍मा गांधी और सरदार पटेल तक सीमित रह गए। उनको भी याद नहीं आई शहीद ए आजम भगत सिंह की, सुभाष चंद्र बोस की।

सुभाष चंद्र बोस, जो एक कुलीन परिवार में पैदा हुए, लेकिन अंत तक भारत की आजादी के लिए लड़ते रहे। देश को आजाद करवाने के लिए बाहरी देशों का सहयोग मांगते रहे। अंत नतीजे एक अनसुझली पहेली पीछे छोड़ गए, जो आज तक नहीं सुलझी। जापान की मीडिया एजेंसियों ने ख़बर दी कि 18 अगस्‍त 1945 को सुभाष चंद्र बोस का एक हवाई हादसे में देहांत हो गया, हालांकि ताइवान की ओर से उस समय ऐसा कोई हादसा होने से इंकार किया जाता रहा है, रिपोर्टों के मुताबिक ताइवान में ही उनका हवाई जहाज हादसाग्रस्‍त हुआ था।

पिछले दिनों उनकी पत्‍िन और बेटी संबंधी सरकार से एक आरटीआई कार्यकर्ता ने एक रहस्‍यप्रद फाइल को सार्वजनिक करने की मांग की थी, लेकिन इसको सार्वजनिक करने से भारत के अन्‍य देशों से रिश्‍ते बिगड़ सकते हैं, कह कर सरकार ने जानकारी देने से इंकार कर दिया।

आज हम बड़े गर्व से कहते हैं जय हिंद, स्‍वतंत्रता दिवस के मौके तो खास कर, लेकिन अफसोस, जिस व्‍यक्‍ति ने इस नारे को पहचान दी, उसको देश के नेता भूल गए, क्‍यूंकि यह देश के अंदर वोट बैंक को प्रभावित नहीं करता। अगर देश में किसी ने पहली बार स्‍वतंत्रता दिवस मनाया था, तो वे थे हमारे नेता सुभाष चंद्र बॉस, जो न नरेंद्र मोदी को याद आए, और न मनमोहन सिंह को।

1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया, तब कांग्रेस ने उसे काले झंडे दिखाए। कोलकाता में सुभाषबाबू ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। साइमन कमीशन को जवाब देने के लिए, कांग्रेस ने भारत का भावी संविधान बनाने का काम आठ सदस्यीय आयोग को सौंपा। पंडित मोतीलाल नेहरू इस आयोग के अध्यक्ष और सुभाषबाबू उसके एक सदस्य थे। इस आयोग ने नेहरू रिपोर्ट पेश की। 1928 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कोलकाता में हुआ। इस अधिवेशन में सुभाषबाबू ने खाकी गणवेश धारण करके पंडित मोतीलाल नेहरू को सैन्य तरीके से सलामी दी। गाँधीजी उन दिनों पूर्ण स्वराज्य की मांग से सहमत नहीं थे। इस अधिवेशन में उन्होंने अंग्रेज़ सरकार से डोमिनियन स्टेटस माँगने की ठान ली थी। लेकिन सुभाषबाबू और पंडित जवाहरलाल नेहरू को पूर्ण स्वराज की मांग से पीछे हटना मंजूर नहीं था। अंत में यह तय किया गया कि अंग्रेज़ सरकार को डोमिनियन स्टेटस देने के लिए, एक साल का वक्त दिया जाए। अगर एक साल में अंग्रेज़ सरकार ने यह मॉंग पूरी नहीं की, तो कांग्रेस पूर्ण स्वराज की मांग करेगी। अंग्रेज़ सरकार ने यह मांग पूरी नहीं की। इसलिए 1930 में जब कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर में हुआ, तब ऐसा तय किया गया कि 26 जनवरी का दिन स्वतंत्रता दिन के रूप में मनाया जाएगा।

26 जनवरी, 1931 के दिन कोलकाता में राष्ट्रध्वज फैलाकर सुभाषबाबू एक विशाल मोर्चा का नेतृत्व कर रहे थे। तब पुलिस ने उनपर लाठी चलायी और उन्हे घायल कर दिया।