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70 साल की लूट, गलती से ही सही, कहीं सच तो नहीं बोल रहे नरेंद्र मोदी

आप कैशलेस को पूरे देश पर थोपना चाहते हैं। आप कैशलेस का आह्वान करते तो समझ में आता। प्रेम में प्रस्‍ताव रखे जाते हैं, और जबरी संबंधों में सबकुछ थोपा जाता है। आप कह रहे हैं कि तकनीक का जमाना है, सब कुछ ऑनलाइन हो सकता है, अब लेन देन भी ऑनलाइन करो।

मैं सहमत हूँ, लेकिन एक फोकट का सवाल है, जब तकनीक का जमाना है, जब हम सब कुछ ऑनलाइन कर सकते हैं तो आपकी रैली ऑफलाइन क्यों?

मेरे झोले में फोकट की सलाह भी है - क्यों ना आप भी रैली भाषण का वीडियो रिकॉर्ड करके यूट्यूब पर डालें, और महसूस करें कि पूरा इंडिया इसको सुन रहा है, देख रहा है, और गर्व महसूस कर रहा है। इससे कथित 4 करोड़ प्रति रैली खर्च बच सकता है, आपकी जान को भी कोई खतरा नहीं होगा, आपकी रक्षा के लिए रैली के बाहर खड़ी होने वाली पुलिस अपने रोजमर्रा के काम निबटा पाएगी।

कड़वी दवा तो नहीं कड़वा सच - जो आप जानते हैं। आपके पीआर जानते हैं कि मोबाइल अभी घर घर की जरूरत है लेकिन इंटरनेट नहीं। आपको पता है कि जो भीड़ रैली में होती है, वो वंचित है उन सुविधाओं से जिसने आपके समर्थक लैस हैं। उस भीड़ में किसी के पास डेटा पैक के पैसे नहीं, तो किसी के पास नेटवर्क नहीं। आपके समर्थक सोशल मीडिया से पढ़े लिखे और इंटरनेट यूजर्स को ख्‍वाब दिखाने का प्रयास करते हैं, और रैलियों से आप उनको जिन तक आपका सोशल मीडिया अभी पहुंचा नहीं। देश आज भी दो हिस्‍सा में बांटा हुआ भारत और इंडिया में, हालांकि, लीक बहुत ही महीन है।

समस्‍या यह है कि यूट्यूब पर आपके एक ही तरह के भाषण सुनने क्यों जायेगा? और आपका हर नया भाषण पुराने का विस्तार या विरोधाभासी होता है।

हाल के बयान को ही ले लो जो काले धन, भ्रष्टाचार और नकली करंसी के खिलाफ आया था और अंत कैशलेस और लेस कैश की ओर मुड़ गया। जैसे आपके विरोधियों के कहने अनुसार हर हर मोदी, घर घर मोदी अंत थर थर मोदी हो गया।

आप संसद में जाने को तैयार नहीं, रैली में आप लंबी लंबी हांकते हैं और नतीजन आपको बहराईच की रैली कम भीड़ के कारण रदद् करनी पड़ी, भले ही मीडिया के एक बड़े तबके ने मौसम खराब का रोना रोया हो।

भाजपा के सीनियर नेता एलके आडवाणी जो कथित तौर पर आपके मार्गदर्शक हैं, वो आज सिर्फ दर्शक हैं, बोलते हैं तो आप गौर नहीं करते, तभी तो इस्तीफा देने तक का मन बना लेते हैं। मनमोहन सिंह की चुप ने नरेंद्र मोदी का उदय किया और आज नरेंद्र मोदी की चुप्पी राहुल गांधी को बोलने का मौका दे रही है। एक हारे हुए नेता व वित्‍त मंत्री अरुण जेटली की अपनी मजबूरियां हैं, लेकिन सुना है कि अमित शाह ने बैठक में जमकर गुस्सा निकाल लिया, उसकी कोई मजबूरी नहीं, क्योंकि बीजेपी के एक बड़े तबके को सम्भल रहे हैं। गुजरात की गद्दी से आनंदीबेन का जाना, अमित की जिद्द थी और आनंदीबेन को लाना आपकी।

सवाल यह नहीं कि आपकी कुर्सी रहे या जाये, सवाल है कि आपके एक फैसले ने देश को जिस तरफ मुड़ गया है उसका क्या? आज एक बड़ा वर्ग लाइन में खड़ा है, जिसको कभी आप अपने साथ बताते हैं तो कभी काले धन वाले लाइन में हैं कहकर अपमानित करते हैं।

अगर इसने आपकी उम्मीद के उल्ट जाकर बीजेपी को अगले कुछ सालों के लिए फिर से लाइन में लगा दिया तो सोचो कि आप ने देश को क्या दिया? गलती से ही सही, लेकिन जब आप कहते हैं देश 70 साल से लूट रहा है तो उन 70 सालों में बीजेपी की सरकारों के साल भी शामिल हो जाते हैं, और आपकी मौजूदा सरकार के 3 साल भी, जिसमें से 2.5 तो हो गये, क्योंकि अगस्त 2017 में आजाद भारत अपने 70 बसन्त पूरे करेगा।

बस ध्यान रखें कि जितना 67 साल में नहीं लूटा, उतना 3 में ना लूट जाए। हम भारतीय हैं, हम तो ऐसे तैसे कर उठ जाएंगे, लेकिन आप झोला लेकर किधर जाएंगे।

जय राम जी की इसके भी दो अर्थ हैं, किसी समझदार से पूछना लेना।

और तो कुछ पता नहीं, लेकिन लोकतंत्र ख़तरे में है

जहां लोकतंत्र में सत्‍ता और विपक्ष रेल की पटरी सा होता है। तो वहीं, लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था एक रेल सी होती है। यदि दोनों पटरियों में असंतुलन आ जाए तो पटना इंदौर एक्‍सप्रेस सा हादसा होते देर नहीं लगती, सैंकड़ों जिंदगियां पल भर में खत्‍म हो जाती हैं। और पीछे छोड़ जाती हैं अफसोस कि काश! संकेतों पर गौर कर लिया होता। वक्‍त रहते कदम उठा लिये गए होते।

ये संकेत नहीं तो क्‍या हैं कि देश सिर्फ एक व्‍यक्‍ति पर निर्भर होता जा रहा है। देश में विपक्ष की कोई अहमियत नहीं रह गई। सत्‍ता पक्ष के खिलाफ बोलना अब देशद्रोह माना जाने लगा है। किसी सरकारी नीति की आलोचना करने का साहस करने पर आपको बुरा भला कहा जाता है।

दिलचस्थ तथ्‍य तो देखो कि भारत बंद की घोषणा होने के साथ ही सत्‍ता पक्ष की तरफ से कुछ दुकानों पर एक सरीखे नारे लिखे बोर्ड या बैनर टांग दिये जाते हैं। हर आदमी के गले में कड़वी बात को उतारने के लिए सेना और देशभक्‍ति का शहद की तरह इस्‍तेमाल किया जा रहा है, ताकि कड़वाहट महसूस न हो।

पहले तो ऐसा नहीं होता था, सरकार के खिलाफ भारत बंद भी होते थे। जो लोग आज सत्‍ता में हैं, वो ही लोग लठ लेकर निकला करते थे। कोई प्‍यार से बंद करे तो ठीक, नहीं तो लठवाद जिन्‍दाबाद। सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करने पर कोई किसी को देशद्रोही की संज्ञा तो नहीं देता था।

याद ही होगा, गुजरात के तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ से पहले संसद की चौखट पर शीश रखते हुए पूरे देश को भावुक कर दिया था। दरअसल, राजनीति में ऐसा ड्रामा आज तक किसी ने देखा नहीं था। ड्रामा इसलिए कह रहे हैं क्‍योंकि पिछले कई दिनों से उसी मंदिर से आवाज आ रही है कि आओ प्रधान सेवक आओ, जवाब दो हमारे सवालों के, चर्चा करो हमसे, हम भी जन-प्रतिनिधि हैं। लेकिन, प्रधान सेवक रॉक कंसर्ट को संबोधित करने में व्‍यस्‍त हैं, रैलियों में विपक्ष को काले धन का मालक बताने में व्‍यस्‍त हैं।

जो कड़वी दवा जल्‍दबाजी में दे बैठें हैं, कहीं जनता बाहर न निकाल दे, इसलिए आंसुओं व देशभक्‍ति का शहद मिलाकर निगल जाने के लिए प्रेरित करने में व्‍यस्‍त हैं। बड़ी अजीब बात है कि रैलियों से बैंक की कतारों में खड़े लोगों की तुलना सैनिक से तो कर रहे हैं, लेकिन, मन की बात प्रोग्राम में एक भी बैंक की कतार में शहादत पाए गए व्‍यक्‍ति को याद नहीं किया, और दो आंसू तक आंख से नहीं टपकाए।

आंसू टपके तो इस बात पर वो लोग मुझे नहीं छोड़ेंगें, मुझे मार देंगें। मगर, देश के प्रधान सेवक ने सदन में जाकर उन धमकाने वालों का नाम नहीं बताया, जो उनको नहीं छोड़ेंगें, जो उनको मार देंगें। विपक्ष पूछता रहा, यदि ऐसा है तो पूरा भारत आपके साथ है। लेकिन, अफसोस कि सदन में मौन है, देश का पहला बोलने वाला प्रधान मंत्री।

बहुत कम लोगों को याद होगा कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी मार्च 2016 में सदन के अंदर जबरदस्‍त वक्‍तव्‍य में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के बयान (देश में सरकारें तो आती जाती रहती हैं, लेकिन देश चलना चाहिए) की नकल करते हुए विपक्ष को महानुभवियों की संज्ञा दी थी। मगर, अफसोस कि नवंबर 2016 आते आते प्रधान मंत्री अपने ही बयान को भूल गये और उसी विपक्ष को काले धन के मालिक करार दे दिया।

अब स्‍थिति ऐसी हो चली है कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के कार्य पर उंगुली उठाना भी देशद्रोह है। हाल में ही, जब देश की सर्वोच्‍च अदालत ने सरकार से पूछा कि यदि आप भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़ने को तैयार हो तो अभी तक लोकपाल की नियुक्‍ति क्‍यों नहीं की? तो नरेंद्र मोदी समर्थक न्‍यायपालिका पर टूट पड़े और पूछा डाला कि अभी तक जो इतने केस लंबित पड़े हैं, उनका क्‍या? अजीब लोकतंत्र है कि अदालतों में जजों की नियुक्‍ति को लेकर भी सरकार और न्‍यायपालिका में ठनी हुई है।

देश में स्‍थिति ऐसी हो चुकी है कि जो नरेंद्र मोदी कहें वो ही सही है। कोई किंतु परंतु करने की जरूरत नहीं। हर बात को सेना से जोड़ा दिया जाता है क्‍योंकि पीआर जो नरेंद्र मोदी को कथित तौर पर संचालित करते हैं, वे अच्‍छी तरह जानते हैं कि किसी भी देश का नागरिक अपनी सेना का अपमान नहीं करेगा। भले ही, भारतीय जनता पार्टी के नेता भारतीय करंसी पर पैर रखकर काले धन की स्‍वच्‍छता का अभियान चलाएं, इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।

लोकतंत्र में एक व्‍यक्‍ति पर केंद्रित होना और देश के हर मामले में सेना के कंधे का इस्‍तेमाल ख़तरे की घंटियां हैं। इतना ही नहीं, आज विपक्ष बोल नहीं सकता, आज न्‍याय पालिका बोल नहीं सकती, आज मीडिया का एक तबका सरकार के खिलाफ एक शब्‍द लिख नहीं सकता।

चुटकला - 
मैं ट्रेन में सफर कर रहा था। 
मैंने बगल में बैठे व्‍यक्‍ति से कहा, 'यार कितनी ठंड पड़ रही है ना।'
तो अगले डिब्‍बे से आवाज आती है, 'क्‍या कांग्रेस के समय से ठंड नहीं होती थी?'

जब देश में ऐसे चुटकले प्रचलन में आ जाए तो एक बात अच्‍छे से समझ लेनी चाहिये कि लोकतांत्रिक देश यकीनन एक गलत दिशा में अग्रसर हो रहा है।

पहले देश हिन्‍दु मुस्‍लिम के आधार पर दो हिस्‍सों में बंट रहा था। अब देश देशभक्‍त और देशद्रोही के रूप में बंट रहा है। जो कल तक भारत बंद पर लाठियां लेकर निकलते थे, तोड़ फोड़ करते थे, आज उनके हाथों में मिठाईयां थीं। चलो मान लिया हमने कि देश बदल रहा है। जाने अनजाने में ही सही, लेकिन लोकतंत्र की पटरी से उतर रहा है।

हलके गुलाबी कुर्ते वाले प्रधानमंत्री और जियो डिजीटल लाइफ

'मन की बात' कहने वाले हमारे माननीय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी आज सुबह सुबह आपका तस्‍वीर अखबारों के पहले पृष्‍ठ पर देखा। टचवुड नजर न लग जाए। हलके गुलाबी कुर्ते पर ब्‍लू रंग की मोदी जैकेट जंच रही है, खिला हुआ चेहरा तो मशाल्‍लाह है।

मगर, एक बात खटक गई। बड़ा रोका मैंने खुद को कि चल छोड़ो जाने दो। मगर, मन की बात कहां दबी रहती है जुबां पर आ ही जाती है। मुझे समझ नहीं आया कि जियो डिजीटल लाइफ क्‍या है, जिसका आप चेहरा बने हैं इस विज्ञापन में।


क्‍या जियो डिजीटल आइडिया एयरटेल वोडाफोन टाटा डोकोमो श्रेणी में नहीं आती ? यदि आती है तो फिर क्‍यों आप ने बीएसएनएल का प्रचार करने की बजाय जियो डिजीटल पर फोटो लगाने की अनुमति दी।

हमारा बीएसएनएल मर रहा है। दम तोड़ रहा है। ऐसे हालात में आपका फोटो जियो डिजीटल लाइफ के साथ प्रकाशित होता है। मन दुखी होने लगता है। आप से कोई सवाल नहीं करेगा, क्‍योंकि आप देश के प्रधान मंत्री हैं।

टेलीकॉम कंपनियों में कोई अजय देवगन जैसा बिंदास आदमी नहीं है, वरना किसी सहयोगी से आपको फोन लगवाकर पूछ लेता कि साहेब हमने आपका का क्‍या बिगाड़ा है, जो हमको पछाड़ने के लिए जियो डिजीटल का आह्वान किए जा रहे हैं।

आपकी खूबसूरत फोटो की तारीफ जरूर करूंगा, जैसे कि ऊपर की है। मगर, जहां आपका फोटो लगा है, वहां मुझे हमेशा आपत्‍ति रहेगी क्‍योंकि जियो रियालंस कंपनी है, जो एक प्राइवेट कंपनी है, और प्राइवेट कंपनी के विज्ञापन को यदि देश का पीएम प्रचारित करेगा, तो देश को सोचना होगा।

मी​डिया को लेकर, जो AAP ने कहा, क्या झूठ है जरा बताएं ?

अपने विवादित बयानों से घिरे अरविंद केजरीवाल के बचाव में आम आदमी पार्टी ने मीडिया के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है। शुक्रवार को आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में प्रवक्ताओं की फौज के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की और मीडिया पर हमला बोला। पार्टी के प्रवक्ता मीडिया को धमकी देने वाले केजरीवाल के बयान को सही ठहराने की कोशिश करते नजर आए, तो साथ ही कुछ न्यूज चैनलों पर केजरीवाल के खिलाफ मुहिम चलाने का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग में शिकायत की धमकी भी दी। गौरतलब है कि केजरीवाल ने गुरुवार रात नागपुर में पार्टी के एक कार्यक्रम में मीडियावालों को जेल भेजने की धमकी दी थी,हालांकि बाद में वह अपने बयान से पलट गए थे।

दिल्ली में शुक्रवार को आम आदमी पार्टी अपने चार बड़े चेहरों संजय सिंह, आशुतोष, आशीष खेतान, दिलीप पांडे के साथ मीडिया के सामने आई। आप नेता संजय सिंह ने केजरीवाल के विवादित बयान पर कहा कि मीडिया पर सवाल उठाना गलत नहीं है। उन्होंने न्यूज चैनलों इंडिया टीवी, इंडिया न्यूज, जी न्यूज, टाइम्स नाउ का नाम लेते हुए आरोप लगाया कि यह आम आदमी पार्टी और केजरीवाल के खिलाफ मुहिम चलाए हुए हैं। संजय सिंह ने कहा कि पार्टी के पास इन चैनलों की फुटेज है और वे इसके खिलाफ चुनाव आयोग जाएंगे।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में आम आदमी पार्टी के नेता संवाददाताओं से उलझते रहे। आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रवक्ता और चांदनी चौक से पार्टी के प्रत्याशी आशुतोष ने केजरीवाल के मीडिया सेटिंग-गेटिंग वाले विडियो पर सफाई देते हुए कहा कि एडिटर का नेता के साथ बैठना कोई गुनाह नहीं है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ होने के नाते मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह सही खबरों को दिखाए।

आशुतोष ने कहा कि अरविंद केजरीवाल का साफतौर पर कहना है कि मीडिया और न्यूज चैनलों का एक तबका मोदी का एजेंडा चला रहा है। इसकी जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकारों के बीच में एक बड़ा तबका ईमानदार भी है। उनका मानना है कि आने वाले दिनों में काम करना मुश्किल होने जा रहा है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद पार्टी के नेता और नई दिल्ली पार्टी के उम्मीदवार आशीष खेतान ने भी मीडिया पर हमला बोलते हुए कहा कि मीडिया अरविंद केजरीवाल के पीछे पड़ा है। उन्होंने कहा कि आप के नाम पर चैनलों में खाली कुर्सी रख दी जाती है। 'नमो नमो' चलाया जाता है। जबकि नरेंद्र मोदी के विकास के दावों पर एक भी सवाल नहीं पूछा जाता है। गुजरात की सच्चाई नहीं दिखाई जाती है। अरविंद केजरीवाल जब लाइव बैठते हैं, तो उनसे सारे सवाल पूछे जाते हैं, लेकिन मोदी से पब्लिक से जुड़े सवाल नहीं पूछे जाते हैं।

एक वोटर के सवाल एक पीएम प्रत्याशी से

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश की सत्ता संभालने के लिए आतुर हैं, राजनेता हैं आतुर होना स्वभाविक है, जीवन में प्रगति किसे पसंद नहीं, खासकर तब जब बात देश के सर्वोच्च पदों में से किसी एक पर बैठने की। एक राजनेता के रूप में मेरी शुभइच्छाएं आपके साथ हैं, लेकिन अगर आप स्वयं को स्वच्छ घोषित करते हैं, देश को एक सूत्र में पिरोने की बात करते हैं, स्वयं को दूसरी राजनीतिक पार्टियों के नेतायों से अलग खड़ा करने की कोशिश करते हैं तो एक वोटर के रूप में आप से कुछ सवाल पूछ सकता हूं, सार्वजनिक इसलिए पूछ रहा हूं क्यूंकि वोटर सार्वजनिक है, हालांकि वो वोट आज भी गुप्त रूप में करता है।

पहली बात, आप अपना पूरा दांव युवा पीढ़ी पर खेल रहे हैं। जिनको अभी अभी वोट करने का अधिकार मिला है, या कुछेक को कुछ साल पहले। जहां तक मुझे याद है यह अधिकार दिलाने में कांग्रेस के युवा व स्वर्गीय प्रधान मंत्री राजीव गांधी का बड़ा रोल रहा है, युवा इसलिए, उनकी सोच एक युवा की थी, जो कुछ करना चाहता था, देश के युवायों के लिए। दूसरी बात, मैं जो सवाल आप से सार्वजनिक रूप में पूछने जा रहा हूं, यह भी उस महान व्यक्तित्व की सोच से मुहैया हुए यंत्रों के कारण।

पहला सवाल। मैं आपको वोट किस लिए करूं। व्यक्तिगत ईमानदार होने के चलते तो वो मौजूदा प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह भी हैं। लेकिन आपके निशाने पर निरंतर मनमोहन सिंह रहें हैं, यकीनन मैं आपको व्यक्तिगत ईमानदार होने के लिए तो वोट नहीं कर सकता है, क्यूंकि आपके समूह में भी येदिरप्पा जैसे महान लोग हैं, जो कभी पार्टी से बाहर होते हैं तो कभी पार्टी के अंदर। क्या आप व्यक्तिगत रूप में जिम्मेदारियों का निर्बाह करेंगे, अगर आपकी पार्टी का कोई भी नेता भ्रष्टाचार में सम्मिलित हुआ तो आप अपने पद से उसी वक्त त्याग पत्र देंगे?

दूसरा सवाल, आपके चेहरे का नकाब ओढ़कर भाजपा जीतने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है। हर कोई चढ़ते सूर्य को सलाम करता है, इसमें बुरी बात नहीं, लेकिन भाजपा जब कहती है कि गुजरात में गोधरा दंगों के बाद पिछले एक दशक में कोई दंगा नहीं हुआ, यह नरेंद्र मोदी सरकार की उपलब्धि है, लेकिन पिछले तीस सालों में देश के अंदर सिख दंगे भी नहीं हुए, जिसमें कांग्रेस की भागीदारी रही हो। मेरा सवाल तो यह है कि क्या आप सत्ता में आने के बाद दंगा पीड़ितों के साथ न्याय कर पाएंगे चाहे वो गोधरा के हों या चाहे दिल्ली के?

तीसरा साल। कांग्रेस आरटीआई, आरटीई, खाद्य सुरक्षा, या यूनिक कार्ड जैसी कुछ पारदर्शिता लाने वाली भी लेकर लाई, चलो आपके कहने अनुसार कांग्रेस ने यह कदम उठाकर भी कुछ अच्छा नहीं किया होगा, लेकिन अब सवाल आपके दस सालों का है, मैं इसलिए तो आपको मुबारकबाद दूंगा कि गुजरात में आपके आने के बाद कभी राष्ट्रपति शासन लागू नहीं हुआ, लेकिन क्या आप चुनावों के दौरान कांग्रेस की कमियां गिनाने की बात छोड़कर अपने दस सालों का तैयार विकास मॉडल पेश करेंगे, अपने मंच से? आपके आंकड़े तो पता नहीं कौन प्रदान करता है, लेकिन मैंने कुछ आंकड़े जुटाएं हैं, जिनको आप चुनौती दे सकते हैं, जब आपकी सरकार 2002 में आई तो आपके पास 127 सीटें थी, लेकिन 2007 में आपके पास 117 सीटें रहीं, अबकी बार आपके पास 116 सीटें। अगर विकास का ग्राफ बढ़ा है, तो सीटों में गिरावट क्यूं ?

चौथा सवाल। मैंने आपकी रैलियों को निरंतर सुना। सुनना भी चाहिए था, आ​ख़िर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार जो हैं, लेकिन आप हर राज्य में रैली करते हुए, उनकी भाषा में उतर जाते हैं, ताकि उनके दिलों में जगह बनाई जाए, कभी कभी भूल जाते हैं कि शायद कुछ बातों का आपकी राजनीति पार्टी से कोई लेन देन नहीं। मुझे याद है कि आप ने हिमाचल में कहा, जब यहां का बेटा जागता है तो पूरा भारत सोता है, शायद सीमा पर खड़े भारत के कोने कोने से नौजवान आपके इस बयान से आहत हुए होंगे, नहीं हुए तो मैं जानना चाहूंगा कि चुनावी लाभ के लिए कुछ भी कह देना जरूरी है?

fact 'n' fiction : नरेंद्र मोदी का चुनावी घोषणा पत्र

वैसे तो हर बार राजनीतिक पार्टियां या गठबंधन अपना चुनावी घोषणा पत्र चुनावों से पूर्व जारी करते हैं, लेकिन इतिहास में पहली बार 'नरेंद्र मोदी : द मैन इन पीएम रेस' की ओर से अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी किया गया है।

इस चुनावी घोषणा पत्र की एक कॉपी हमारे फर्जी सूत्रों द्वारा उपलब्‍ध करवाई गई है। केंद्र सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान करने वाले नरेंद्र मोदी की ओर से चुनावी घोषणा पत्र युवा पीढ़ी और आम जनता को ध्‍यान में रखकर बनाया गया है। विकास पुरुष की ओर से इसमें विकास संबंधी कोई घोषणा नहीं, जो है वे आपके सामने रखने जा रहे हैं।

सोशल मीडिया स्‍वतंत्रता
मैं सोशल मीडिया के अस्‍तित्‍व को बरकरार रखने के लिये पुरजोर कोशिश करूंगा। मुझे पता है कि यह एक अभिव्‍यक्‍ति का सशक्‍त प्‍लेटफॉर्म है, बशर्ते कि आप इस तरह की गतिविधियों का संचालन नहीं करेंगे, जिससे मेरी सरकार को ख़तरा पैदा हो। पहले स्‍पष्‍ट कर दूं, मैं मनमोहन सिंह की तरह बेदाग और इमानदार रहूंगा, लेकिन नेताओं की गारंटी लेना मुश्‍िकल है। पांच उंगलियां एक बराबर नहीं होती।

हर शहर में लाल किला
सोशल मीडिया के अस्‍तित्‍व को बरकरार रखने के बाद मेरा अगला कदम होगा, हर शहर में लाल किला हो। मुझे इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर में बहुत विश्‍वास है। आप गुजरात में आकर देखिये, यहां पर वैशनूदेवी से लेकर बालाजी धाम तक के प्रतिरूप मॉडल मिलेंगे। महात्‍मा गांधी मंदिर के लिये करोड़ों खर्च कर रहा हूं, यह ओर्जिनल है। लाल किला जब हर शहर में होगा, तो मैं प्रधानमंत्री के रूप में आपके शहर में 15 अगस्‍त मना पाउंगा। हालांकि दीवाली का प्रोग्राम तो सीमा पर सेना जवानों के साथ पाकिस्‍तानी सरहद पर बम फोड़कर मनाने का फिक्‍स है।

एलके आडवाणी राष्‍ट्रपति होंगे
मेरे प्रिय व भाजपा को मजबूत करने वाले मेहनतकश नेता एलके आडवाणी, जिनकी वेटिंग रद्द हो गई, को प्रमोशन देते हुए राष्‍ट्रपति नियुक्‍त किया जायेगा, बशर्ते वे मेरे साथ राज्‍यपाल कमला बेनीवाल जैसा रिलेशन न रखें। नहीं तो मजबूरन, अध्‍यादेश लाने के कानूनों में बदलाव करने होंगे, जिसके लिये मौजूदा समय में राष्‍ट्रपति की जरूरत पड़ती है।

पाकिस्‍तान विलय
हमारे लोहपुरुष सरदार पटेल का स्‍वप्‍न अधूरा रहा गया, वे चाहते थे कि भारत एक सूत्र में  बंधे, लेकिन ऐसा नहीं हो सकता, क्‍यूंकि जिन्‍ना का जिन्‍न कुछ रियासतों को अपने साथ लेकर जाने में सफल हुये। हमारी कोशिश होगी कि आतंकवाद जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे अपने पाकिस्‍तान को इस बीमारी से मुक्‍त किया जाये, और विलय से बेहतर विकल्‍प कोई नजर नहीं आता। भारत, वैसे तो इसका अर्थ प्रकाश, रत, लेकिन युवा पीढ़ी अर्थ कम ढूंढती है, उसको केवल पहले अक्षर का अर्थ भार समझ आता है, इसलिये इस भार को हल्‍का करने के लिये, भारत को 'हिन्‍दू' स्‍तान में परिवर्तित किया जायेगा, इंडिया को खत्‍म क्‍यूंकि इसके भी शुरूआती अक्षर, इंदिरा की याद दिलाते हैं।

ऑन लाइन वोटिंग सिस्‍टम

इस सिस्‍टम को लाना बहुत जरूरी है, क्‍यूंकि देश तरक्‍की की राह पर है। यहां के युवा आलसी हैं। जब से फेसबुक, टि्वटर, ऑनलाइन शॉपिंग, ऑनलाइन बिल पे सिस्‍टम शुरू हुआ है, तब से लाइनों में लगना बंद कर दिया, केवल आम आदमी लाइन में लगता है। और मेरी जीत की गारंटी फेसबुकिये और टि्वटरिये हैं। इसलिये इनके लिये ऑनलाइन वोटिंग प्रणाली जरूरी है, क्‍यूंकि यह क्‍यू में नहीं लगेंगे, और नहीं लगेंगे तो मेरा जीतना मुश्‍िकल है।

दागी नेताओं की छुट्टी
सत्‍ता में आने के बाद दागी नेताओं की छुट्टी करने पर विचार किया जायेगा। दागी नेताओं को बाहर का रास्‍ता दिखाने के लिये अदालती आदेशों को माना जायेगा, लेकिन उससे पहले सीबीआई व अन्‍य जांच एजेंसियों से बीजेपी के सभी नेताओं को क्‍लीन चिट दिलाई जायेगी। इस प्रक्रिया में विरोधी पार्टी के नेता भी शामिल हो सकते हैं, बशर्ते दिल्‍ली वाली गर्लफ्रेंड छोड़नी होगी।

बीजेपी के उच्‍च पदाधिकारियों ने इस संदर्भ में संपर्क करने पर बताया कि यह घोषणा पत्र पूर्ण रूप से फर्जी है। इसका वास्‍तविकता से कोई लेन देन नहीं, हालांकि कुछ तथ्‍य सही हो सकते हैं, बाकी कहानी काल्‍पनिक है। विश्‍वास कीजिये।

Disclaimer : fact 'n' fiction  सीरीज में व्‍यक्‍तियों के नाम असली हो सकते हैं, लेकिन इसकी लेखन शैली व कंटेंट पूर्ण रूप से काल्‍पनिक है। कुछ असली तथ्‍यों को आधार बनाकर कल्‍पना से इसकी रचना की जाती है।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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fact 'n' fiction : दिग्‍गी सुर्खियों से गैरहाजिर, तो जनपथ होना पड़ा लाइन-हाजिर

बुधवार की सुबह। सोनिया अपने आवास पर गॉर्डन में टेंशन भरी मुद्रा में घूम रही थी, मानो कोई बड़ा विज्ञापन छूटने के बाद संपादक। बस इंतजार था, बयानवीर दिग्‍विजय सिंह का। कब आयें, कब लेफ्ट राइट सेंटर किया जाये।

दरवाजे खुले एक गाड़ी आई। गाड़ी में वो सवार थे, जिनका इंतजार था। पास आये, मैडम का चेहरा और आंखें लाल। साथ आये सलाहकार ने पूछा, मैडम क्‍या गुस्‍ताखी हुई ? जो इतना गुस्‍से में हैं। तुम को शर्म आनी चाहिए, अब गुस्‍ताखी पूछते हो ? अख़बार और टेलीविजन चैनलों से समझ नहीं पड़ता, आख़िर चूक कहां हो रही है ? गुस्‍से में लाल पीली मैडम ने साजो सामान समेत की चढ़ाई। मैडम आप साफ साफ बतायें बात क्‍या हुई, दिग्‍विजय सिंह का सलाहकार बोला।

नरेंद्र मोदी ने रेवाड़ी पहुंचकर हम पर हल्‍ला बोला। कोई प्रतिक्रिया नहीं, हमारी ओर से। मोदी का जन्‍मदिवस ऐसे मनाया गया, जैसे देश का कोई उत्‍सव, कोई प्रतिक्रिया नहीं हमारी ओर से। वहां नरेंद्र मोदी बयान के ड्रोन दागे जा रहा है, ताकि हमारा जनपथ ध्‍वस्‍त किया जाये, और आप गुस्‍ताखी पूछते हो ? मुझे बिल्‍कुल पसंद नहीं, पाकिस्‍तान निरंतर सीमा पर हमले करे, और आप मनमोहन सिंह जैसी चुप्‍पी धारण किये बैठे रहें।

गुस्‍ताखी, मैडम, दरअसल कुछ दिनों से दिग्‍विजय सिंह अचानक मौनव्रत में चले गये। कारण कुछ समझ नहीं आ रहा है, और हमने ऑनलाइन एचआर सिस्‍टम में सिक लिव के लिए अपलाई कर दिया था, और आपको सीसी में राहुल के साथ रखा गया था। शायद अमेरिका ने हमारा मेल आप तक पहुंचने नहीं दिया, वे अभी तक हमारी इंग्‍लिश को रीड नहीं कर पायें होंगे, वे संदिग्‍ध किस्‍म के लोग हैं, इसी कारण ब्राजीलियन राष्‍ट्रपति ने वहां का दौरा रद्द कर दिया, बेचारी के साथ भी ऐसा ही हुआ था।

अच्‍छा अच्‍छा। ठीक है। कब तक ठीक होंगे हमारे दिग्‍गी महाराज। सलाहकार ने जवाब दिया, कुछ भी कहना मुश्‍किल है, डॉक्‍टरों को समझ नहीं आ रहा है। शकील मियां बोले, कहीं किसी विरोधी पार्टी ने काला जादू तो नहीं कर दिया। मैडम ने आदेश दिया, जाओ गाड़ी से लेकर घर तक की तलाशी लो, अगर संदिग्‍ध चीज मिले तो फौर लेकर आओ। कुछ समय बाद तलाशी दल लौटा, साथ में एक टॉफी कवर लिये। कवर पर लिखा हुआ था सेंटर फ्रेश। कवर देखते ही शकील का दिमाग चकराया। मैडम समझ गया, यह काले जादू का नहीं, सेंटर फ्रेश का कमाल है। जुबान पर रखे लगाम। मैडम ने जोर से तमाचा शकील के गाल पर जड़ दिया, कमबख्‍त यह जुबान पर लगाम लगती है, हाथों पर नहीं, इससे टि्वटर तो अपडेट हो सकता था। 

जाओ, अंदर से मेटॉस मिन्‍ट लेकर आओ। शकील, मैडम गुस्‍ताखी माफ, मेटॉस मिन्‍ट तो बारा रैली पर जाने से पहले राहुल बाबा खत्‍म कर गये। ओ सिट। चलो डीएचए वाला पाउडर लाकर दूध में घोल कर पिला दीजिये। सेंटर फ्रेश की मार रहे झेल दिग्‍विजय सिंह को डीएचए वाला दूध में घोलकर पाउडर पिलाया गया, बुधवार शाम तक असर दिखा, जब दिग्‍विजय सिंह की जिज्ञासा उभरकर सामने आई, सबसे पहला सवाल दागा, अगर नरेंद्र मोदी सबसे धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति हैं, तो सबसे अधिक सांप्रदायिक व्यक्ति कौन? 

बयानवीर के के जिज्ञासा भरे सवाल के बाद मैडम का कुछ ऐसा हाल था। 


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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fact 'n' fiction : रेवाड़ी रैली, ताऊ लगता है मोदी मामू बना गया

शब्‍दी गोला बारूद लाये हो न भाई।
हरियाणा के रेवाड़ी शहर में गुजरात के मुख्‍यमंत्री व संभावित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व सैनिकों की रैली को संबोधन किया। इस रैली में नरेंद्र मोदी ने जमकर सीमा पर खड़े जवानों की तारीफ की। खुद को भी श्रेय देने से बिल्‍कुल नहीं चुके। प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार बनने के बाद ज्‍यादा गर्मजोशी में नजर आये। इस मौके पर वन रेंक वन पेंशन की बात की, लेकिन पूर्व सैनिकों को भरोसा नहीं दिलाया कि वे सरकार बनने पर उसके लिए कुछ खास करेंगे।

नरेंद्र मोदी ने पूरा ध्‍यान सीमा पर खड़े जवानों पर लगा दिया। पूर्व सैनिक सोच रहे थे, शायद आज गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी और संभावित प्रधानमंत्री कुछ ऐसी घोषणा करेंगे, जो उनके दर्द को कम करेगी, लेकिन नरेंद्र मोदी ने संप्रग को वन रेंक वन पेंशन पर श्‍वेत पत्र लाने की सलाह देने के अलावा कुछ नहीं दिया। रोजगार की बात करते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा कि हम को हथियार इम्‍पोर्ट करने बंद करने चाहिए, हमको भारत में हथियार बनाकर बेचने चाहिए। इसके लिए कॉलेजों में विशेष कोर्सों का प्रबंधन किया जाये।

नरेंद्र मोदी की इस रैली के बाद दुनिया की नम्‍बर वन फेक टॉक न्‍यूज एजेंसी से बात करते हुए कांग्रेस महासचिव दिग्‍विजय सिंह ने कहा, 'हम बहुत जल्‍द चुनाव आयोग को पत्र लिखकर निवेदन करेंगे कि आगामी चुनावों में पोलिंग बूथों पर सेना जवानों की तैनाती न की जाये, क्‍यूंकि नरेंद्र मोदी ने उनका हृदय परिवर्तन कर दिया है, ऐसे में सेना जवानों की तैनाती चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करेगी।' हालांकि हथियार वाली बात पर प्रतिक्रिया देने से दिग्‍विजय सिंह कतराते हुए नजर आये।

उधर, व्‍हाइट हाउस से बराक ओबामा के सहयोगियों ने फेक टॉक से बात करते हुए कहा कि अमेरिका कल तक सीरिया को लेकर परेशान था, लेकिन अब वे भारत को लेकर भी चिंता में है, क्‍यूंकि मौजूदा भारतीय सरकार ने उसको सीरिया पर हमला करने के लिए समर्थन नहीं दिया, और आने वाली संभावित सरकार भारत में हथियार बनाने की बात कर रही है, ऐसे में अमेरिका का बेड़ा गर्क हो जायेगा।, हालांकि गुप्‍त सूत्रों से जानकारी मिली है कि बहुत जल्‍द नरेंद्र मोदी को अमेरिका का वीजा दिया जायेगा, और उनकी हथियार निर्माण योजना में अमेरिका बहुत ज्‍यादा निवेश करने के लिए तैयार है।

नरेंद्र मोदी के करीबी फर्जी सूत्रों का कहना है कि हथियार बनाने का पूरा जिम्‍मा साधू यादव को सौंपा जायेग, जिन्‍होंने पिछले दिनों गुजरात के मुख्‍यमंत्री से मुलाकात की थी। वैसे भी नीतिश कुमार के आने से पहले बिहार के एक क्षेत्र में देशी हथियार बनाने का धंधा जोरों पर था। इतना ही नहीं, इस रैली के बाद नरेंद्र मोदी को गूगल सर्च इंजन में  बराक ओबामा से भी ज्‍यादा सर्च किया गया, बताया जा रहा है कि अमेरिकी हथियार निर्माता कंपनियों में काम कर रहे कर्मचारी अपना बायोडाटा मेल करने के लिए नरेंद्र मोदी का संपर्क एड्रेस खोज रहे थे, हालांकि उनको नतीजे में एक टेलीफोन नम्‍बर मिला, जिस पर डायल करने के बाद उनको नरेंद्र मोदी का केवल लाइव भाषण सुनाई पड़ा।
सोशल मीडिया वाले सही कहते हैं तू यार बड़ा फेकु है
समाजवादी पार्टी व जेडीयू के नेताओं ने फर्जी मीडिया एजेंसी फेकटॉक को अमरेली शहर की तस्‍वीर दिखाते हुए, ( जिसमें लोग पानी के लिए तरस रहे हैं, वहां टैंकियां तो हैं पानी नहीं) कहा कि अमरेली शहर में गुजरात के मुख्‍यमंत्री ने पानी नहीं पहुंचाया, लेकिन बॉर्डर पर पानी पहुंचा दिया, इसके पीछे की मंशा की पूर्ण रूप से स्‍वतंत्र जांच होनी चाहिये, हो सके तो इस मामले की जांच सीबीआई से होनी चाहिए। हालांकि वे समुद्री पानी को पीने लायक बनाकर भी सेना जवानों को दे सकते थे, नर्मदा का पानी खींचकर लेकर जाने की क्‍या जरूरत थी। अब तो पसीने से पानी बनाने वाली मशीनें आ गई हैं।
फेक टॉक संवाददाताओं को रैली के बाद कुछ ऐसे फर्जी टेप मिले हैं, जिसमें लोगों को कहते हुए सुना गया, ताऊ, यह तो मामू बनाकर चला गया। रैली पूर्व सैनिकों की, और बात बॉर्डर पर खड़े सैनिकों की, यह बात तो 15 अगस्‍त को भी कर लेते, और आने वाली 26 जनवरी को भी कर सकते थे, लेकिन हमारी मांगों का क्‍या ? अटलजी की सरकार का छुनछुना थमाकर चला गया, बजाते रहो। न बैटरी खत्‍म होगी, न सुर ताल बिगड़ेगा, बस बजाते रहो। जंगल में भी, घर में भी, क्‍यूंकि नेटवर्क टूटने का डर नहीं।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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82 साल पहले मनाया गया था 'स्‍वतंत्रता दिवस'

आज पूरे देश में स्‍वतंत्रता दिवस मनाया गया। एक तरफ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लाल किले से राष्‍ट्र को संबोधित किया, तो दूसरी तरफ मीडिया के जरिये संभावित पीएम पद के उम्‍मीदवार गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालन कॉलेज से संबोधन किया। मनमोहन सिंह का भाषण खत्‍म हुआ तो नरेंद्र मोदी का भाषण नौ बजे शुरू हुआ, पूर्व अनुमान मुताबिक नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के भाषण पर हल्‍ला बोला। नरेंद्र मोदी ने मनमोहन सिंह पर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्‍होंने देश की आजादी में अहम रोल अदा करने वाले सरदार पटेल और महात्‍मा गांधी का जिक्र करने की बजाय एक परिवार की महिमा गाई। लेकिन मुझे दोनों नेताओं ने पूरी तरह निराश किया। माना मनमोहन सिंह गांधी परिवार से आगे नहीं बढ़े, लेकिन कल की उम्‍मीद बन चुके नरेंद्र मोदी भी तो गुजरात से आगे नहीं बढ़ सके। वे भी केवल महात्‍मा गांधी और सरदार पटेल तक सीमित रह गए। उनको भी याद नहीं आई शहीद ए आजम भगत सिंह की, सुभाष चंद्र बोस की।

सुभाष चंद्र बोस, जो एक कुलीन परिवार में पैदा हुए, लेकिन अंत तक भारत की आजादी के लिए लड़ते रहे। देश को आजाद करवाने के लिए बाहरी देशों का सहयोग मांगते रहे। अंत नतीजे एक अनसुझली पहेली पीछे छोड़ गए, जो आज तक नहीं सुलझी। जापान की मीडिया एजेंसियों ने ख़बर दी कि 18 अगस्‍त 1945 को सुभाष चंद्र बोस का एक हवाई हादसे में देहांत हो गया, हालांकि ताइवान की ओर से उस समय ऐसा कोई हादसा होने से इंकार किया जाता रहा है, रिपोर्टों के मुताबिक ताइवान में ही उनका हवाई जहाज हादसाग्रस्‍त हुआ था।

पिछले दिनों उनकी पत्‍िन और बेटी संबंधी सरकार से एक आरटीआई कार्यकर्ता ने एक रहस्‍यप्रद फाइल को सार्वजनिक करने की मांग की थी, लेकिन इसको सार्वजनिक करने से भारत के अन्‍य देशों से रिश्‍ते बिगड़ सकते हैं, कह कर सरकार ने जानकारी देने से इंकार कर दिया।

आज हम बड़े गर्व से कहते हैं जय हिंद, स्‍वतंत्रता दिवस के मौके तो खास कर, लेकिन अफसोस, जिस व्‍यक्‍ति ने इस नारे को पहचान दी, उसको देश के नेता भूल गए, क्‍यूंकि यह देश के अंदर वोट बैंक को प्रभावित नहीं करता। अगर देश में किसी ने पहली बार स्‍वतंत्रता दिवस मनाया था, तो वे थे हमारे नेता सुभाष चंद्र बॉस, जो न नरेंद्र मोदी को याद आए, और न मनमोहन सिंह को।

1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया, तब कांग्रेस ने उसे काले झंडे दिखाए। कोलकाता में सुभाषबाबू ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। साइमन कमीशन को जवाब देने के लिए, कांग्रेस ने भारत का भावी संविधान बनाने का काम आठ सदस्यीय आयोग को सौंपा। पंडित मोतीलाल नेहरू इस आयोग के अध्यक्ष और सुभाषबाबू उसके एक सदस्य थे। इस आयोग ने नेहरू रिपोर्ट पेश की। 1928 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कोलकाता में हुआ। इस अधिवेशन में सुभाषबाबू ने खाकी गणवेश धारण करके पंडित मोतीलाल नेहरू को सैन्य तरीके से सलामी दी। गाँधीजी उन दिनों पूर्ण स्वराज्य की मांग से सहमत नहीं थे। इस अधिवेशन में उन्होंने अंग्रेज़ सरकार से डोमिनियन स्टेटस माँगने की ठान ली थी। लेकिन सुभाषबाबू और पंडित जवाहरलाल नेहरू को पूर्ण स्वराज की मांग से पीछे हटना मंजूर नहीं था। अंत में यह तय किया गया कि अंग्रेज़ सरकार को डोमिनियन स्टेटस देने के लिए, एक साल का वक्त दिया जाए। अगर एक साल में अंग्रेज़ सरकार ने यह मॉंग पूरी नहीं की, तो कांग्रेस पूर्ण स्वराज की मांग करेगी। अंग्रेज़ सरकार ने यह मांग पूरी नहीं की। इसलिए 1930 में जब कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर में हुआ, तब ऐसा तय किया गया कि 26 जनवरी का दिन स्वतंत्रता दिन के रूप में मनाया जाएगा।

26 जनवरी, 1931 के दिन कोलकाता में राष्ट्रध्वज फैलाकर सुभाषबाबू एक विशाल मोर्चा का नेतृत्व कर रहे थे। तब पुलिस ने उनपर लाठी चलायी और उन्हे घायल कर दिया।
 

स्‍वतंत्रता दिवस पर लालन कॉलेज वर्सेस लाल किला

आजाद भारत का शायद पहला स्‍वतंत्रता दिवस होगा। जब राष्‍ट्र के लोग इस दिन मौके होने वाले आयोजित समारोह में अधिक दिलचस्‍प लेंगे। इसका मुख्‍य कारण मौजूदा प्रधानमंत्री और संभावित प्रधानमंत्री पद के दावेदार के बीच सीधी टक्‍कर। एक हर बार की तरह लाल किले तो तिरंगा फरहाएंगे तो दूसरे भुज के लालन कॉलेज से।
ऐसे में इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया के कैमरे दोनों तरफ तोपों की तरह तने रहेंगे। देश के प्रधानमंत्री होने के नाते मीडिया मनमोहन सिंह की उपस्‍थिति वाले समारोह को नजरअंदाज नहीं कर सकता, वहीं दूसरी तरफ संभावित प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार के रूप में उभरकर सामने आ रहे नरेंद्र मोदी को भी जनता सुनना चाहेगी, जो वैसे भी आजकल टेलीविजन टीआरपी के लिए एनर्जी टॉनिक हैं।

गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्‍वयं गुजरात के भुज में आयोजित युवाओं की एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘जब हम तिरंगा फहराएंगे तो संदेश लाल किला तक भी पहुंचेगा। राष्ट्र जानना चाहेगा कि वहां क्या कहा गया और भुज में क्या कहा गया।’

इस नरेंद्र मोदी की बात में कोई दो राय नहीं। देश की जनता बिल्‍कुल जानना चाहेगी, लेकिन उससे भी ज्‍यादा उतावला होगा भारतीय इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया। बस डर है कहीं, नरेंद्र मोदी लाइव न हो जाए, और देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का भाषण अगले दिन आने वाले समाचार पत्रों में पढ़ने को मिले।

उधर, सीधे तौर पर प्रधानमंत्री का जिक्र न करते हुए मोदी ने कहा, ‘एक तरफ वादों की झड़ी होगी तो दूसरी ओर किए गए काम का लेखा-जोखा होगा। एक तरफ निराशा होगी तो दूसरी तरफ आशा होगी।’ आपको बता दें कि गुजरात में स्वतंत्रता दिवस का आधिकारिक समारोह भुज में मनाया जाएगा जहां मोदी राष्ट्रीय ध्वज फहराएंगे।

आप इसे संयोगवश कहें या जान बुझकर चुना गया स्‍थान, लेकिन 15 अगस्‍त को आयोजित होने वाले इन दोनों समारोह को अगर कुछ जोड़ता है तो लाल। एक तरफ लाल किला, दूसरी तरफ भुज का लालन कॉलेज। दोनों में लाल शब्‍द है। इन दिनों जगहों पर तिरंगा लहराने वाले शख्‍सियतों के आगे प्रधानमंत्री शब्‍द भी जुड़ता है, एक संभावित प्रधानमंत्री पद प्रत्‍याशी हैं तो दूसरे मौजूदा प्रधानमंत्री।

अब देखना यह रहेगा कि स्‍वतंत्रता दिवस पर तिरंगा लहराने वाली दोनों शख्‍सियतों में से अगले साल लाल किले पर तिरंगा कौन फहराता है ? क्‍या लालन कॉलेज से नरेंद्र मोदी लाल किले तक पहुंच सकेंगे ?  जिन्‍होंने पार्टी की उन बाधाओं को तो पार कर लिया, जो उनके प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार बनने के रास्‍ते में थीं, क्‍यूंकि पिछले दिनों एक टेलीविजन को दिए विशेष साक्षात्‍कार में भाजपा के महासचिव राजीव प्रताप रूढ़ी ने साफ साफ कहा कि जनता की आवाज सुनी जाएगी और अगस्‍त के अंत तक नरेंद्र मोदी को पीएम पद का उम्‍मीदवार घोषित किया जाएगा। यह तो पहला साबूत है।

नरेंद्र मोदी पर मौसम साफ होने का दूसरा संकेत यूपीए के खिलाफ चार्जशीट के रूप में लॉन्‍च की अपनी वेबसाइट इंडिया 272 को करते हुए दिया। इस वेबसाइट पर गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा कोई चेहरा नजर नहीं आ रहा है। इस वेबसाइट को लॉन्‍च तो भाजपा पार्टी ने किया, लेकिन वहां चेहरा केवल नरेंद्र मोदी का, भाजपा का यह कदम उस बात को चरितार्थ कर रहा है, जिसमें कहा गया था भाजपा एकमत है।

अब एक और सवाल के साथ आपसे अलविदा लेते हैं कि क्‍या अगले साल होने वाले लोक सभा चुनावों के बाद आजाद भारत को आजाद भारत में जन्‍मे किसी नागरिक को प्रधानमंत्री बनते देखने का मौका मिलेगा या पांच साल और इंतजार करना होगा ?

रैली समीक्षा - नरेंद्र मोदी एट हैदराबाद विद यस वी कैन

भाजपा के संभावित नहीं, बल्‍कि पक्‍के प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार नरेंद्र मोदी ने आज हैदराबाद में एक रैली को संबोधन किया, कहा जा रहा था कि यह रैली आगामी लोक सभा चुनावों के लिए शुरू होने वाले अभियान का शंखनाद है।

 राजनेता के लिए रैलियां करना कोई बड़ी बात नहीं। रैलियां तो पहले से होती आ रही हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी की रैली को मीडिया काफी तरजीह दे रहा है, कारण कोई भी हो। संभावित अगले प्रधानमंत्री या पैसा। नरेंद्र मोदी की रैली का शुभारम्‍भ स्‍थानीय भाषा से हुआ, जो बड़ी बात नहीं, क्‍यूंकि इटली की मैडम हर बात हिन्‍दी में बोलती हैं, भले शब्‍द उनके अपने लिखे हुए न हों।

नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा का नारा इस्‍तेमाल किया, यैस वी कैन। इस बात से ज्‍यादा हैरान होने वाली बात नहीं, क्‍यूंकि नरेंद्र मोदी की ब्रांडिंग का जिम्‍मा उसी कंपनी के हाथों में है, जो बराक ओबामा को विश्‍वस्‍तरीय ब्रांड बना चुकी है, और जो आज भी अपनी गुणवत्‍ता साबित करने के लिए संघर्षरत है। ज्‍यादातर अमेरिकन का उस पर से भरोसा उठा चुका है। अफगानिस्‍तान से सेना वापसी, वॉल स्‍ट्रीट की दशा सुधारने, आतंकवाद के खिलाफ लड़ने जैसे मोर्चों पर ओबामा पूरी तरह असफल हैं।

विज्ञापन कंपनियों का काम होता है, उत्‍पाद को बाजार में पहचान दिलाना, उस पहचान को बनाए रखना शायद उत्‍पाद निर्माता के हाथ में होता है। विज्ञापन हमेशा दिल को लुभावने वाले बनाए जाते हैं, अगर वे आकर्षक न होंगे, तो ग्राहक नहीं जाएगा उसको खरीदने के लिए।

यस वी कैन पर एक बार फिर लौटता हूं, यह शब्‍द सुनने भर से अगर आपको लगता है कि बहुत बड़ा करिश्‍मा हो गया है तो हर रविवार आपके शहर में किसी न किसी एमएलएम, नेटवर्किंग कंपनी की बैठक आयोजित होती होगी, उसमें जाइए, इससे भी ज्‍यादा आपको मोटिवेशन का नशा पिला दिया जाएगा, लेकिन जब उतरेगा तो आप पहले से भी ज्‍यादा खुद को कमजोर पाएंगे।

नरेंद्र मोदी ने कहा, किसी भी सरकार का पहला मजहब होता है राष्‍ट्र, जबकि नरेंद्र मोदी ने तो इंडिया कहा, और सरकार का ग्रंथ होता है संविधान। मोदी की तैयारी बहुत सही थी, लेकिन अगर गुजरात के अंदर लोकायुक्‍त के लिए युद्ध न चल रहा होता तो। सुप्रीम कोर्ट तक जाने की क्‍या जरूरत थी, संविधान को मानते, और राज्‍य में लोकायुक्‍त को नियुक्‍त करते।

बीजिंग की तारीफ पर नरेंद्र मोदी ने एक नेता को निशाने पर लिया। किसी शहर या देश की तारीफ करना बुरी बात नहीं, लेकिन नरेंद्र मोदी खुद को भूल गए, जब वे पुणे में विद्यार्थियों को शिक्षा पर भाषण दे रहे थे तो उन्‍होंने भी चीन की तारीफ की थी, वहां के आंकड़े पेश किए थे, जो वहां की सरकारों के पास भी नहीं। हो सकता है अधिक काम और जिम्‍मेदारियों के चलते खुद की गलतियां याद न रहीं हो, जैसे आज विपक्ष में बैठी एनडीए को अपने कार्यकाल के दौरान हुए आतंकवादी हमले, पाकिस्‍तान से दोस्‍ताना संबंध याद नहीं रहे। और आरोपों से बचने के लिए कहते हैं, देश की जनता ने तब हम को नकार दिया था, मतलब गंगा नहा लेने से किए पाप धुल गए, तो चालीस साल के गुनाह तो कांग्रेस के भी धुल चुके हैं, जो आपके आने सत्‍ता से उतर गई थी। अगर आपकी भाषा में सत्‍ता से उतरना पाप धूलना होता है तो।

यह एक युवा रैली थी। उम्‍मीद थी संभावनाओं का माया जाल बुनने वाले नरेंद्र मोदी युवा पीढ़ी के लिए कुछ खास बात लेकर आने वाले हैं, लेकिन अफसोस के रैली में नरेंद्र मोदी ने सरकार विरोधी अख़बार का संपादकीय पन्‍ना ही पढ़ डाला। सरकार की बुराईयां तो अख़बारों में हर रोज सुर्खियां बनती हैं, उनको गिनाकर देश की जनता को लुभावना, ठगने जैसा लगा। मुझे लगता है कि आंध्र प्रदेश में अख़बार निकलते होंगे, हर रोज नेताओं के सरकार विरोधी बयानों को जगह मिलती होगी।

नरेंद्र मोदी को इस रैली में समस्‍याएं और कांग्रेस को नीचा दिखाने की बजाय अपने भीतर के लीडर की उन योजनाओं से अवगत करवाना चाहिए था, जिसको लेकर युवा पीढ़ी सोच सके कि नरेंद्र मोदी को वोट किया जाए। मंच पर ऊंचे सुर में बोलने से कुछ सच्‍चाईयां नहीं बदलती। शराब का नशा सुबह तक रहता है। नशा मत पिलाइए, कोई देश बदलने का सुझाव बतलाइए। वो कौन सी बातें हैं, जो देश को नये आयाम तक लेकर जा सकती हैं। नरेंद्र मोदी राष्‍ट्रवाद की बात कर रहे हैं, लेकिन उनकी सरकार की टशन हमेशा पड़ोसी राज्‍यों से चलती रहती है। वहां पर नरेंद्र मोदी राष्‍ट्रहित क्‍यूं नहीं देख पाते ? वहां पर एक क्षेत्रीय प्रतिनिधि का फर्ज ही अदा क्‍यूं करते हैं ?

सवाल बहुत हैं, लेकिन चलते चलते इतना कहूंगा कि नरेंद्र मोदी के पास 11 साल का अनुभव है, एक राज्‍य को चलाने का, वे संभावनाओं का खुला आसमान दिखाते हैं। उधर, राहुल गांधी के पास विरासत में मिली कांग्रेस की रियासत है, लेकिन वे सकारात्‍मकता की किताब को बीच में से पढ़ने की कोशिश करते हैं। दोनों राजनीति तो सकारात्‍मक सोच से कर रहे हैं, लेकिन कहीं कहीं उलझ जाते हैं।

आज की रैली एक राजनेता की रैली थी, नरेंद्र मोदी बतौर एक मार्गदर्शक, देश के प्रधानमंत्री पूरी तरह पिछड़ते नजर आए। 

आप अपनी राय जरूर रखें, ताकि रैली समीक्षा को समझने में मुझे और आसानी हो।

राहुल गांधी : तुम आये तो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला

राहुल गांधी, युवा चेहरा। समय 2009 लोक सभा चुनाव। समय चार साल बाद । युवा कांग्रेस उपाध्‍यक्ष बना पप्‍पू। हफ्ते के पहले दिन कांग्रेस की मीडिया कनक्‍लेव। राहुल गांधी ने शुभारम्‍भ किया, नेताओं को चेताया वे पार्टी लाइन से इतर न जाएं। वे शालीनता से पेश आएं और सकारात्‍मक राजनीति करें। राहुल गांधी का इशारा साफ था। कांग्रेसी नेता अपने कारतूस हवाई फायरिंग में खत्‍म न करें। राहुल गांधी, जिनको ज्‍यादातर लोग प्रवक्‍ता नहीं मानते, लेकिन वे आज प्रवक्‍तागिरी सिखा रहे थे।

दिलचस्‍प बात तो यह है कि राहुल गांधी ख़बर बनते, उससे पहले ही नरेंद्र मोदी की उस ख़बर ने स्‍पेस रोक ली, जो मध्‍यप्रदेश से आई, जिसमें दिखाया गया कि पोस्‍टर में नहीं भाजपा का वो चेहरा, जो लोकसभा चुनावों में भाजपा का नैया को पार लगाएगा। सवाल जायजा है, आखिर क्‍यूं प्रचार समिति अध्‍यक्ष को चुनावी प्रचार से दूर कर दिया, भले यह प्रचार लोकसभा चुनावों के लिए न हो। कहीं न कहीं सवाल उठता है कि क्‍या शिवराज सिंह चौहान आज भी नरेंद्र मोदी को केवल एक समकक्ष मानते हैं, इससे अधिक नहीं। सवाल और विचार दिमाग में चल रहे थे कि दूर से कहीं चल रहे गीत की धुनें सुनाई पड़ी, ‘तुम आये तो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला, जाने कितने दिनों के बाद, गली में आज चाँद निकला’ चांद से याद आता है राहुल गांधी का चेहरा, जो कुछ महीने पहले जयपुर में नजर आया था, और आज सोमवार को नजर आ रहा है। शायद दूर कहीं ये गीत सही वक्‍त पर बजा रहा है। काश यह गीत राहुल गांधी के समारोह के आस पास बजता तो राहुल आज की होट स्टोरी होते।

राहुल गांधी ने जमीनी राजनीति पर उतर कर बेटिंग करने को कहा। यकीनन कांग्रेस के लिए यह बहुत बेहतरीन सुझाव है, वैसे भी कहते हैं कि सुबह का भूला शाम को घर आए तो उसको भूला नहीं कहते, अगर कांग्रेस आज भी अपने ग्रामीण क्षेत्र के वोटरों को संभाल ले तो हैट्रिक लगा सकती है। कांग्रेस ने जयपुर में मंथन किया था, शायद वे जमीनी नहीं था। अगर होता तो कांग्रेस अपने कारतूसों को हवाई फायरिंग में खराब करने से बेहतर सही दिशा में खर्चती। कांग्रेस के दामन में दाग बहुत हैं, लेकिन कांग्रेस अपनी योजनाओं के सर्फ एक्‍सल से धो सकती है।

कांग्रेस केंद्र में है। उसके द्वारा शुरू की गई, योजनाएं एक अच्‍छी पहल हैं। केंद्र सरकार ने इन योजनाओं को लागू करने के लिए करोड़ों रुपए राज्‍य सरकारों को दिए, लेकिन राज्‍य सरकारों की गड़बड़ियों के कारण योजनाएं पिट गई, और दोष पूरा कांग्रेस के सिर मढ़ दिया गया। मिड डे मिल, जो आज चर्चा का कारण है, क्‍या उसमें केंद्र का दोष है ? नहीं, दोष है राज्‍य सरकारों का जो उसको अच्‍छी तरह से लागू नहीं कर पा रही। मनरेगा, रोजगार की गारंटी भी निश्‍चत एक अच्‍छी पहल है, लेकिन राज्‍य सरकारों की अनदेखी के कारण धूल फांक रही है, बदनामी की कल्‍ख कांग्रेस के माथे, हालांकि कुछ घोटालों के आरोपी नेता या मंत्री जेल की हवा तक खा चुके हैं।

कांग्रेस की समस्‍या है कि वे सोशल मीडिया को समझ नहीं पा रही। दरअसल कांग्रेस पुराने ढर्रे पर चल रही है, और भाजपा इस कमजोरी का फायदा उठाते हुए पूरी तरह सोशल मीडिया को कैप्‍चर कर रही है। कहते हैं कि सोशल मीडिया 160 लोकसभा सीटों को प्रभावित करता है। उसकी पहुंच 12 करोड़ भारतीयों तक है। मगर सोशल मीडिया पर एक बाज की नजर है, जो देश के 80 करोड़ लोगों तक पहुंच बनाए हुए है। जी हां, इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया। आज देश का इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया, मोदी की ब्रांडिंग कर रहा है। कांग्रेस किसी सहमे हुए बच्‍चे की तरह, डरी हुई किसी कोने में खड़ी पूरा तमशा देख रही है।

उसके कई कारण हैं। सबसे पहले कांग्रेस के पास एक दमदार प्रवक्‍ता नहीं। राहुल गांधी युवा पीढ़ी को प्रेरित करता था, लेकिन पिछले कुछ समय से उसकी चुप्‍पी ने युवा पीढ़ी को निराश किया, और युवा पीढ़ी का बहाव नरेंद्र मोदी की तरफ ऑटोमेटिक मुड़ गया। नरेंद्र मोदी के पास राजनीति में लम्‍बा संघर्ष, एक आदर्श राज्‍य की पृष्‍ठभूमि, 11 साल का नेतृत्‍व अनुभव है। राहुल के पास एक मां है, जो उसकी दादी की तरह दमदार प्रवक्‍ता नहीं। संप्रग के पास प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह है, जिसको लोग कथित तौर पर सोनिया गांधी संचालित टेलीविजन कहते हैं। जब भी उनसे राहुल गांधी के पीएम बनने के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब एक था आज कहो, आज पीछे हट जाता हूं, मतलब साफ है, वे केवल मास्‍क हैं।

राहुल गांधी की कलावती पटकथा हिट हुई तो युवा आइकन बन गए। कलावती के बाद राहुल गांधी की कोई पटकथा हिट नहीं हुई। उसका प्रभाव खत्‍म होने लगा। सोशल मीडिया ने उसको पप्‍पू करार दे दिया। राहुल गांधी ने जो कदम आज उठाया है, उस बच्‍चे की तरह, जो पेपरों से कुछ दिन पहले तैयारी करने बैठता है, नतीजा जो भी आए, अगर राहुल का मंत्र सफल हुआ तो शायद 2014 में अख़बारों की सुर्खियां यह शीर्षक बन सकता है ‘पप्‍पू पास हो गया”।

ईद के चांद की तरह नजर आने वाला राहुल गांधी शायद आम चांद की तरह नजर आए, और जो सोच वे कभी कभी जनता के सामने रखते हैं, वे प्रत्‍येक दिन रखे, हफ्ते, महीने में रखे तो स्‍थितियां बदल सकती हैं।

और वे गीत भी शायद कभी इतना रिलेवेंट न लगे, जो आज कहीं दूर से कानों में पड़ रहा है, जख्‍म फिल्‍म का पूजा भट्ट पर फिल्‍माया गया गीत ”तुम आये तो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला जाने कितने दिनों के बाद, गली में आज चाँद निकला”

राजनाथ सिंह, नरेंद्र मोदी और भाजपा की स्‍थिति

''राह में उनसे मुलाकात हो गई, जिससे डरते थे वो ही बात हो गई''  विजय पथ फिल्‍म का यह गीत आज भाजपा नेताओं को रहकर का याद आ रहा होगा, खासकर उनको जो नरेंद्र मोदी का नाम सुनते ही मत्‍थे पर शिकन ले आते हैं।

देश से कोसों दूर जब न्‍यूयॉर्क में राजनाथ सिंह ने अपना मुंह खोला, तो उसकी आवाज भारतीय राजनीति के गलियारों तक अपनी गूंज का असर छोड़ गई। राजनाथ सिंह, भले ही देश से दूर बैठे हैं, लेकिन भारतीय मीडिया की निगाह उन पर बाज की तरह थी। बस इंतजार था, राजनाथ सिंह के कुछ कहने का, और जो राजनाथ सिंह ने कहा, वे यकीनन विजय पथ के गीत की लाइनों को पुन:जीवित कर देने वाला था।

दरअसल, जब राजनाथ सिंह से पीएम पद की उम्‍मीदवारी के संबंधी सवाल पूछा गया तो उनका उत्तर था, मैं पीएम पद की उम्‍मीदवारी वाली रेस से बाहर हूं। मैं पार्टी अध्‍यक्ष हूं, मेरी जिम्‍मेदारी केवल भाजपा को सत्ता में बिठाने की है, जो मैं पूरी निष्‍ठा के साथ निभाउंगा। यकीनन, नरेंद्र मोदी आज सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं, अगर भाजपा सत्ता हासिल करती है तो वे पीएम पद के उम्‍मीदवार होंगे।

दूर देश में बैठे राजनाथ सिंह को इस बात का अंदाजा भी नहीं होगा, ऐसे कैसे हो सकता है कि उनके मुंह से निकले यह शब्‍द भारत में बैठे उनके कुछ मित्रों को अग्‍निबाण से भी ज्‍यादा नागवार गुजरेंगे। क्‍यूंकि भूल गए वे गोवा बैठक के बाद की उस हलचल को, जो एलके आडवाणी के इस्‍तीफे से पैदा हुई थी।

भारतीय मीडिया के बीच अक्‍सर इस बात संबंधी पूछे सवाल पर पार्टी बैठकर फैसला करेगी कह निकले वाले राजनाथ सिंह क्‍यूं भूल गए कि आज का मीडिया सालों पुराना नहीं, जो ख़बर को प्रकाशित करने के लिए किसी बस या डाक खाने से आने वाले तार का इंतजार करता रहेगा, आज तो आपने बयान दिया नहीं कि इधर छापकर पुराना, और चलकर घिस जाता है।

राजनाथ सिंह, ने पहले पत्ते दिल्‍ली की बजाय गोवा में खोले, शायद राजनाथ सिंह ने उनके लिए विकल्‍प खुला रखा था, जो इस फैसले से ज्‍यादा हताश होने वाले थे, क्‍यूंकि तनाव के वक्‍त खुली हवा में सांस लेना, टहलना, बीच के किनारे जाकर मौज मस्‍ती करना बेहतर रह सके।

अब वे न्‍यूयॉर्क पहुंचकर अपने पत्‍ते खोलते हैं, ताकि उनके भारत लौटने तक पूरा मामला किसी ठंडे बस्‍ते में पड़ जाए, और वे नरेंद्र मोदी को दिए हुए अपने वायदे पर कायम रह सकें। शायद अब तो सहयोगी पार्टियों को अहसास तो हो गया होगा कि नरेंद्र मोदी के अलावा भाजपा के पास 2014 के लिए कोई और विकल्‍प नहीं है।

अगर अब भी किसी को शक है तो वे अपना भ्रम बनाए रखे, क्‍यूंकि भ्रम का कोई इलाज नहीं होता, और अंत आप ठंडी सांस लेते हुए पानी की चंद घूंटों के साथ, कुर्सी पर पीठ लगाकर गहरी ध्‍यान अवस्‍था में जाकर, विजय पथ के उस गीत को आत्‍मसात करें, ''राह में उनसे मुलाकात हो गई, जिससे डरते थे वो ही बात हो गई''।

भाजपा का खेल, टेस्‍ट मैच के अंतिम दिन सा

क्रिकेट के मैदान पर अक्‍सर जब दो टीमें होती हैं, खेलती हैं तो यकीनन दोनों टीमें अपना बेहतर प्रदर्शन देने के लिए अपने स्‍तर पर हरसंभव कोशिश करती हैं, ताकि नतीजे उनकी तरफ पलट जाएं, लेकिन भारतीय राजनीति की पिच पर वैसा नजारा नहीं है। यहां तो केवल भारतीय जनता पार्टी, जो एनडीए की सबसे बड़ी और अगुवाईकर्ता पार्टी है, खेल रही है, पूरा ड्रामा रच रही है। अहम मुद्दों पर चर्चा कर पक्ष को हराने की बजाय उसका पूरा ध्‍यान मैच के अंदर खलन पैदा कर सुर्खियां बटोरना है, वे एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाते हुए नजर नहीं आ रही, वे केवल एक राज्‍य के विकास के दम पर राजनीति ब्रांड बना चुके चेहरे के इस्‍तेमाल पर सत्ता हथियाना चाहती है। भाजपा का रवैया केवल उस टेस्‍ट टीम सा है, जो टेस्‍ट मैच के अंतिम दिन समय बर्बाद करने के लिए हर प्रकार का हथकंड़ा अपनाती है।

भाजपा ने पहला ड्रामा रचा। जब राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक गोवा में होनी थी। कुछ नेताओं ने वहां जाने से इंकार कर दिया, तो कुछ ने अनचाहे मन से वहां जाना बेहतर समझा। ख़बरों में थी भाजपा, और विरोधी टीम के इक्‍का दुक्‍का बयानबाज नेता। इस बैठक के साथ भाजपा को मीडिया सामान्‍य भाव से लेता कि एलके आडवाणी ने इस्‍तीफे का पैंतरा चल दिया। मीडिया के अगले कुछ दिन और उसकी भेंट चढ़ गए। अंत होते होते एलके आडवाणी अपने फैसले से पलटे, किसी टीवी सीरियल के किरदार की तरह।

नरेंद्र मोदी की एलके आडवाणी से दूरियां, करीबियां चर्चा में बनीं रही। इस दौरान किसी बेहतर प्रदर्शन कर रहे गेंदबाज की तरह नरेंद्र मोदी मीडिया में स्‍पेस बनाते चले गए। कहते हैं कि जब वक्‍त अच्‍छा हो तो दूसरों की गलतियां भी आपके उभार के लिए कारगार सिद्ध होती हैं, खास नरेंद्र मोदी के मामले में कुछ ऐसा ही हुआ है। वे एक अच्‍छे मुख्‍यमंत्री हैं, कोई शक नहीं, लेकिन क्‍या कांग्रेस के पास ऐसे मुख्‍यमंत्री नहीं, बिल्कुल हैं, लेकिन उसके पास मीडिया में हौवा पैदा करने वाले नेता नहीं।

उसके नेता मीडिया में आने से डरते हैं, जो आते हैं, उनकी बोल चाल इतनी खराब है कि उनके मुंह से निकले बोल भाजपा को कम कांग्रेस को ज्‍यादा नुकसान पहुंचाते हैं। लादेन जी, आपदा पर्यटन या मौत का सौदागर जैसे शब्‍द भाजपा की नहीं, बल्‍कि कांग्रेसी नेताओं की देन हैं, जो सोशल मीडिया में कांग्रेस की खिल्‍ली उड़ाने के लिए काफी हैं।

वहीं, मीडिया नरेंद्र मोदी के बयानों पर ध्‍यान देने की बजाय उनके मुंह से निकले शब्‍दों के पीछे की सोच को पकड़ने की कोशिश करता है, जो ख़बर की शकल ले लेते हैं। बुर्के की जगह नरेंद्र मोदी शायद घुंघट भी कह सकते थे, लेकिन नहीं, उन्‍होंने बुर्का कहा, बुर्का उस समुदाय से जुड़ा है, जिसका नरेंद्र मोदी को सबसे कट्टर माना जाता है, भले ही नहीं, मोदी कहते हों कि वे देश को एक साथ आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं।

पिछले कई महीनों से चल रहे ड्रामे के आज वाले एपिसोड में नरेंद्र मोदी को 19 टीमें और मिल गई, हालांकि भाजपा इस की घोषणा बीते हुए कल में कर सकती थी, लेकिन उसने धारावाहिक की तरह, अपने फैसले पर रहस्‍य बनाए रखा, ताकि कांग्रेस के खाते से एक दिन हो छीन लिया जाए। कुल मिलाकर भाजपा टेस्‍ट मैच के अंतिम दिन वाली गेम खेल रही है, कैसे भी रहता वक्‍त गुजर जाए, और मैच उनके खाते में पहुंच जाए।

मैन ऑफ द वीक नरेंद्र मोदी

खुदी को कर बुलंद इतना की खुदा बन्दे से ये पूछे की बता तेरी रजा क्या है, शायद कुछ इसी राह पर चल रहे हैं गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी। वक्‍त भी कदम दर कदम उनका साथ दे रहा है, उनकी तरफ विरोधियों द्वारा फेंका गया पासा भी उनके लिए वरदान साबित होता है।

इस महीने की शुरूआत से नमो या कहूं नरेंद्र मोदी सुर्खियों में हैं, क्‍यूंकि कर्नाटका में भाजपा की हार के बाद लोगों की निगाह टिकी थी कि गुजरात में नमो मंत्र का क्‍या हश्र होगा, 2 तारीख को चुनाव हुए, नमो बेफिक्र थे, मानो उनको पता हो कि नतीजे मेरे पक्ष में हैं।

नमो पर वक्‍त मेहरबान तो उस समय हुआ, जब भाजपा के सीनियर नेता व वेटिंग इन पीएम लालकृष्‍ण आडवानी मध्‍यप्रदेश के ग्‍वालियर पहुंचे, और उन्‍होंने गंगा गए गंगाराम, जमुना गए जमुना राम, की कहावत को चरितार्थ करते हुए कह दिया, गुजरात से अच्‍छे तो मध्‍यप्रदेश और छतीसगढ़ हैं, क्‍यूंकि इनकी हालत बेहद खराब थी, जब भाजपा सत्‍ता में आई, हैरानी की बात तो यह है कि सीनियर नेता अपना लोक सभा का चुनाव निरंतर डेढ़ दशक से गुजरात की राजधानी गांधीनगर से लड़ते आ रहे हैं।

वेटिंग इन पीएम की वाणी ने राजनीति में हलचल पैदा कर दी और भाजपा नेताओं को नरेंद्र मोदी का समर्थन करते हुए पाया गया, नमो के लिए इससे अच्‍छा क्‍या था कि वे बिना कुछ कहे, चर्चा में आए, उनको पार्टी का भी समर्थन मिल गया।

इसके बाद 5 तारीख आई, जिसका नरेंद मोदी से ज्‍यादा विरोधियों को इंतजार था, क्‍यूंकि उन्‍हें उम्‍मीद थी कि इस बार नरेंद्र मोदी को जमीन पर पटकने का एक अच्‍छा मौका मिलेगा, अफसोस कि नमो मंत्र ने काम किया, गुजरात में दो लोकसभा सीटों समेत छह सीटों पर भाजपा कब्‍जा करने में सफल हुई, इतना ही नहीं, नीतीश कुमार को मिली हार के पीछे उनकी नमो के प्रति दिखाई बेरुखी को ठहराया गया।

इत्‍तेफाक देखिए, जिस दिन नतीजे आने थे, उसी दिन आंतरिक सुरक्षा मामले में मुख्‍यमंत्रियों की बैठक का आयोजन नई दिल्‍ली में किया गया। इस बैठक में बिहार मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार पहले से मौजूद थे, लेकिन नमो उनके बाद पहुंचे, नमो ने उनको देखना तक गवारा न समझा, नमो को नीतीश को खासकर उस समय नजरअंदाज करना खटकता है, जब वे नरेंद्र मोदी के प्रिय और छत्तीसगढ़ के मुख्‍यमंत्री रमन सिंह से बातचीत कर रहे थे।

इस दौरान नमो टेलीविजन की स्‍क्रीन पर कब्‍जा जमाने में कामयाब हुए, क्‍यूंकि गुजरात में हुए उपचुनावों नतीजे आ चुके थे। बिहार में नीतीश बुरी तरह पिट चुके थे, और इतना ही नहीं, मीटिंग में भी नमो के भाषण पर सबकी निगाह थी, हर बार की तरह नमो यहां पर केंद्र को पटकनी देते हुए नजर आए।

ये कारवां यहां कहां रुकने वाला था, नरेंद्र मोदी ने गुजरात की जीत का जश्‍न दिल्‍ली में मनाना बेहतर समझा। वे पार्टी अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह से मिले, जिनका नरेंद्र मोदी को पूरा पूरा समर्थन है, फिर मिले लालकृष्‍ण आडवानी से, सारे गिले शिकवे एक किनारे कर, मिलते भी क्‍यूं न अटल और आडवानी की छात्रछाया में तो नमो ने राजनीति के गुरमंत्र सीखे। वे बात जुदा है कि आडवानी का सर्गिद आज उससे कहीं ज्‍यादा लोकप्रिय है।

फिर समुद्री किनारे ठंडे मौसम में मंथन के लिए पार्टी ने प्रोग्राम बनाया, तो पब्‍लिक डिमांड आई कि नमो भी इसमें शिरकत करें, जनता की मांग को भाजपा कैसे ठुकरा सकती थी, मोदी के जाने की ख़बर सुनते समारोह में कांग्रसी, वामपंथी तो किनारा करते सुने थे, लेकिन पहला मौका था कि भाजपा के कई नेताओं ने इस अहम मीटिंग से  किनारा कर लिया, राजनीति को और गर्मा दिया, नतीजा चर्चा में रहे नरेंद्र मोदी।

कहते हैं कि गोवा में आयोजित होने वाले एक अन्‍य प्रोग्राम के लिए भी नरेंद्र मोदी को आमंत्रित किया गया था, लेकिन नरेंद्र मोदी से पहले गोया में उनका संदेश पहुंच गया था। गोया के रोमानियत भरे मौसम में भाजपा किसी नतीजे पर पहुंचे या न, लेकिन नमो के लिए दिल्‍ली में मैराथन का आयोजन किया जा रहा है। इससे पहले उनके लिए रॉक कंसर्ट का आयोजन किया गया था।

आज शनिवार, आठ तारीख। 2 से 8 जून तक कई बड़ी ख़बरें आई, लेकिन नमो मंत्र, कांग्रेस की माने तो नमो वायरस को टेलीविजन स्‍क्रीन से हटा नहीं पाई, वैसे कहते हैं कि सिनेमा हाल से हर शुक्रवार, और टीवी स्‍क्रीन से हर घंटे एक ख़बर लापता हो जाती है, लेकिन नमो पूरा हफ्ता टीवी स्‍क्रीन पर बने रहे, चाहे इस दौरान जिया ख़ान आई, चाहे आईपीएल में सट्टेबाजी, चाहे कोई अन्‍य मामला, लेकिन शाम तक टेलीविजन स्‍क्रीन पर नमो लौट आते, सुबह का भूला शाम को लौट आए, तो उसको भूला नहीं कहते। आप कुछ भी कहें, लेकिन हम नरेंद्र मोदी को मैन ऑफ द वीक कहते हैं।