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एक एक लम्‍हे से खूबसूरत जिन्‍दगी बनती है, संग्रह करो खूबसूरत लम्‍हों का

जिन्‍दगी के बारे में अक्‍सर कहा जाता है, जिन्‍दगी सफर है, मगर जब मै किसी भी भारतीय को देखता हूं तो मुझे यह दौड़ और उबाऊ पदचाल से ज्‍यादा कुछ नजर नहीं आती। प्रत्‍येक खूबसूरत लम्‍हा, एक दूसरे लम्‍हे से मिलकर एक खूबसूरत जिन्‍दगी का निर्माण करता है, लेकिन अफसोस है कि मानव को लम्‍हे की कीमत का अंदाजा नहीं, यह वैसे ही जैसे विश्‍व, दो प्राणी मिलते हैं, तो एक रिश्‍ता, और रिश्‍ता परिवार, एक समूह, समूह एक समाज, और समाज मिलकर एक विशाल विश्‍व का निर्माण करता है, वैसे ही हर एक खूबसूरत लम्‍हा जिन्‍दगी को खुशनुमा बना देता है। हमारे यहां बच्‍चों को सिखाया जाता है, देखो बेटा बूंद बूंद से तालाब भरता है, अगर तुम एक एक पैसा बचाओगे तो तुम्‍हारे पास धीरे धीरे बहुत सारे पैसे हो जाएंगे, मगर यह बात पैसों के संदर्भ में कही जाती है, कोई जिन्‍दगी के संदर्भ में नहीं कहता, कि अगर आप जिन्‍दगी के खूबसूरत लम्‍हों का संग्रह करोगे तो एक खुशहाल जिन्‍दगी जी पाओगे। मानव की इस शिक्षा ने मानव जीवन को सफर से दौड़ बनाकर रख दिया, जब आदमी भाग भागकर थक जाता है, तो कहता है जिन्‍दगी साली बेकार है, मगर वह भूल जाता है कि उसकी दौड़ खूबसूरत जिन्‍दगी के लिए नहीं, बल्‍कि पैसे के लिए थी।

चलते चलते, पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है, मगर विश्‍व में ऐसा कोई अमीर व्‍यक्‍ति नहीं, जिसने अपना गुजरा हुआ वक्‍त खरीद लिया हो।

एक विडियो सांग की बदौलत मिली 'द लॉयन ऑफ पंजाब' : दलजीत

देश विदेश में 25 फरवरी को होगी रिलीज द लॉयन ऑफ पंजाब
कुलवंत हैप्पी, बठिंडा। जल्द रिलीज होने वाली मेरी पहली पंजाबी फिल्म द लॉयन ऑफ पंजाब 'पहलां बोली द नी' गीत के विडियो की बदौलत मिली। यह खुलासा स्थानीय हरचंद सिनेमा में अपनी फिल्म के प्रोमशन के लिए पहुंचे पंजाबी संगीत प्रेमियों के दिलों की धडक़न गायक दलजीत ने किया। मुक्‍तसर मार्किञ्ट कमेटी के चेयरमैन हनी बराड़ फत्‍तणवाला के विशेष निमंत्रण पर बठिंडा पहुंचे पंजाबी गायक व अभिनेता दलजीत ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि अगर परमात्मा की दुआ से उनकी पहली फिल्म चल गई तो वह पंजाबी फिल्म प्रेमियों की झोली में और भी बेहतरीन फिल्में डालने की कोशिश को जारी रखेंगे। फिल्म में उनके किरदार के बारे में पूछे जाने पर दलजीत कहते हैं कि फिल्म में उनका किरदार अवतार सिंह नामक युवा का है, जिसका संबंध रामपुरा फूल के समीप स्थित एक गांव से है। फिल्म के विषय पर उन्होंने रहस्य कायम रखते हुए कहा कि फिल्म का विषय पंजाब की एक अहम समस्या है, जो आए दिन अखबारों में सुर्खियां बटोरती है। एक अन्य सवाल के जवाब में दलजीत कहते हैं कि वह इस फिल्म से पूर्व फिल्म निर्देशक गुड्डू धनोया से कभी नहीं मिले थे, लेकिन एक दिन उनको कॉल आया कि गुड्‌डू धनोया उनके साथ फिल्म करना चाहते हैं। दलजीत बताते हैं कि गुड्‌डू धनोया ने वो फोन पहलां बोली दा नी गीत की वीडियो देखने के बाद किया एवं कहा कि वह उसको लेकर एक फिल्म बनाना चाहते हैं, जिसकी पटकथा पंजाब की भूमि से संबंध रखती है। अन्य सवाल के जवाब में गायक दलजीत कहते हैं कि जब फिल्म की शूटिंग चल रही थी, तो उनको मजा आ रहा था एवं उसके बाद थोड़ा सुकून मिला कि कुञ्छ नया किया, लेकिन अब जब फिल्म रिलीज किनारे आ पहुंची है तो नर्वस हो रहा हूं। गौरतलब है कि इस फिल्म का निर्देशन हिन्दी फिल्म निर्देशक गुड्‌डू धनोया ने किया, जबकि फिल्म की कहानी उनकी धर्मपत्नि संतोश धनोया ने लिखी है। इसके अलावा फिल्म में एक्‍शन राम कुमार का है जबकि संगीत आनंद राज का। इस फिल्म में दलजीत के साथ बतौर नायिका जीविदा फेम मिनी पंजाब व जीविदा टंडन ने काम किया है।

बहुत कुछ कहते हैं दिल तो बच्चा है के महिला किरदार

पिछले दिनों हालिया रिलीज अजीम बाज्मी की नो प्रोब्‍लम, क्रित खुराना की टुनपुर का सुपरस्टार, फरहा खान की तीस मार खां व मधुर भंडारकर की दिल तो बच्चा है देखी। नो प्रोब्‍लम को छोडक़र बाकी सब फिल्में फिल्मी दुनिया से जुड़ी हुई थी, इनमें से मधुर भंडारकर की फिल्म हिन्दी फिल्मी फार्मुले से कुछ हटकर नजर आई, जो हर हिन्दी फिल्म की तरह सुखद अंत के साथ समाप्त नहीं होती। इस फिल्म के जरिए मधुर भंडारकर बहुत कुछ कह गए, लेकिन फिल्म समीक्षक फिर भी कहते रहे कि फिल्म में कुछ कसर बाकी है। मधुर भंडारकर ने तीन किरदारों को आपस में जोडक़र एक आधुनिक समय की तस्वीर पेश की। इस फिल्म में निक्की नारंग का किरदार अदा करने वाली श्रुति हसन, जब अभय (इमरान हश्मी) का दिल तोड़ते हुए कहती है कि यह तेरे लिए या मेरे के लिए कोई नई बात नहीं, एक लडक़ी का इस तरह उत्‍तर देना, अपने आप में चौंकने वाला था, यह वैसा ही था, जैसे फिल्म मर्डर में मल्लिका शेरावत का मेडिकल दुकान पर जाकर निरोध मांगना। इसमें कोई दो राय नहीं कि समय बदल रहा है, और बदलते समय की तस्वीर को पेश किया है मधुर भंडारकर ने। वहीं नरैन अहुजा (अजय देवगन) व उनकी पत्नि का रिश्ता टूटना भी समाज की एक नई तस्वीर पेश करता है। आज पत्नि पति इतने व्यस्त हो गए, उनको रिश्तों से ज्यादा अपने कैरियर की चिंता है, अगर र‍िश्‍ता कैरियर में रोड़ बनता है तो वह उसको भी बीच से हटाने में झिझकते नहीं। गुनगुन का मिलिंद केलकर की मासूमियत का फायदा उठाना, उन लड़कियों की तस्वीर पेश कर रहा है, जो अपना कैरियर बनाने के लिए किसी का भी जीवन बिगाड़ सकती हैं। अनुषका नारंग का किरदार, उस वर्ग का नेतृत्व करता है, जो एशोआराम की जिन्दगी जीने के लिए कोई भी समझौता कर पैसे के बल पर शरीर की भूख मिटाता है। पुरुष का चित्र तो हम सब रुपहले पर्दे पर देखते ही आ रहे हैं सदियों से, लेकिन मधुर भंडारकर ने महिला किरदारों को इस फिल्म में दयनीय स्थिति में नहीं दिखाया बल्कि उनको एक नए रूञ्प में दिखाया। मधुर भंडारकर की इस फिल्म में महिला नहीं, पुरुष लूटते हुए नजर आए। अनुषका का अभय को मुंह तोड़ जवाब देना, उसके भीतर की ऊर्जा को उजागर करता है, जबकि आज तक फिल्मकार यह ही दिखाते आए हैं कि औरत ने किसी पुरुष के साथ संभोग कर लिया तो उसके सामने आत्महत्या करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं, उसने औरत का हमेशा ही हीन दिखाया है। औरत की इस हीनता का पुरुषों ने खूब फायदा उठाया। लेकिन औरत चाहे तो वह पुरुषों को हीन भावना का शिकार बना सकती है। मधुर भंडारकर की इस फिल्म के महिला किरदार बहुत कुछ कहते थे, जिनको समझने की जरूरत है। हमारे समाज ने बॉस व अधीनस्थ महिला की निकटता को हमेशा ही गलत नजर से देखा है, लेकिन जरूरी नहीं कि उनके बीच हमेशा शारीरिक संबंध हों, इस बात को बयान करती है जून पिंटो की नरायन के साथ की निकटता। फ‍िल्‍म में बार बार बजने वाला गीत कोई होता व अभय का किरदार एक बात तो तय करता है कि जिन्‍दगी जितनी भी क्‍यों न व्‍यस्‍त व ऐशोराम भरी हो, लेकिन दिल को हमेशा प्‍यार व साथ की जरूरत रहती है।

हैप्पी अभिनंदन में दीपक "मशाल"


हैप्पी अभिनंदन में आज आप जिस ब्लॉगर हस्ती से मिलने जा रहे हैं, वो शख्सियत अपनी माटी से शारीरिक तौर पर तो दूर है, लेकिन रूह से जुड़ी हुई है। यही जुड़ाव तो है, जो कोंच छोड़ने और बेलफास्ट, उत्तरी आयरलैंड पहुंचने के बाद भी हिन्दी ब्लॉग जगत के दीपक "दीपक मशाल' को अपने देश एवं अपनी बोली से जोड़े हुए है। इस दीपक के प्रकाश से हम सब हर रोज मसि कागद पर रूबरू होते हैं। आओ जानते हैं कि दीपक से मशाल का रूप ले रहे युवा कवि एवं ब्लॉगर दीपक मशाल से वो क्या कहते हैं, खुद के एवं ब्लॉग जगत के बारे में।

प्रेम की परिभाषा

"अगर मैं तुम्हें फोन न कर सकूँ समय पर, या फिर समय पर फोन न उठा सकूँ, तो तुम बुरा मत मनाना, और कुछ भी मत सोचना। अगर सोचना हो तो बस इतना सोचना कि मैं किसी काम में व्यस्त हूँ।" फोन पर उसने महोदयजी के कुछ कहने से पहले ही सफाई देते हुए कह दिया। अब अगर गिला करने की इच्छा भी हो, तो गिला न कर सकोगे।


इतना सुनते ही महोदयजी शुरू पड़ गए, 'तुमसे कई सालों तक बात न करूँ या हररोज करूँ, मुझे उसमें दूर दूर तक कोई फर्क दिखाई ही नहीं पड़ता। आज तुमसे ढेर सारी बातें कर रहा हूँ, आज भी तुम मेरे लिए वो ही हो, जो तुम पहले हुआ करती थी, जब  मेरे पास तेरा मोबाइल नम्बर भी न था।'

मेरा पतंगवा



चले पवन
छूए गगन
मेरा पतंगवा
(पतंगवा-पतंग)

हैप्पी अभिनंदन में अविनाश वाचस्पति


 आज जिस ब्लॉगर से आप रूबरू होने जा रहे हैं, वो हस्ती फ़िल्म समारोह निदेशालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, नई दिल्ली में कार्यरत तो है, लेकिन हमारी और उनकी मुलाकात हमेशा तेताला, बगीची, अविनाश वाचस्पति, झकाझक टाइम्स, नुक्कड़, पिताजी के अलावा भी कई जगहों पर हो जाती है। हरियाणवी फ़ीचर फ़िल्मों 'गुलाबो', 'छोटी साली' और 'ज़र, जोरू और ज़मीन' में प्रचार और जन-संपर्क तथा नेत्रदान पर बनी हिंदी टेली फ़िल्म 'ज्योति संकल्प' में सहायक निर्देशक रह चुके अविनाशजी को काव्य से इतना लगाव है कि टिप्पणी रूप में भी काव्य ही लिखते हैं और कविता अपने विभिन्‍न रूपों यथा गीत, गाना के माध्‍यम से जन-जन को सदा से लुभाती रही है।

महिलाओं की ही क्यों सुनी जाती है तब....

आज से कुछ साल पहले जब पत्रकार के तौर पर जब फील्ड में काम करता था तो बलात्कार के बहुत से केस देखने को मिलते। जब पुलिस वालों से विस्तारपूर्वक जानकारी हासिल करते तो 99.9 फीसदी केस तो ऐसे लगते थे कि जबरी बनवाए गए हैं। ज्यादातर होता भी ऐसा ही है, मेरा मानना है कि महिला के साथ सामूहिक बलात्कार होता है तो समझ आता है, या फिर एक व्यक्ति द्वारा उसको नशीले पदार्थ खिलाकर उसके साथ बलात्कार करना।

मगर जब दोनों होश में हैं लड़का और लड़की तो बलात्कार की बात समझ में नहीं आती, तब तो खासकर जब दोनों को खरोंच तक न आए। ये तो आम बात है कि जब कोई जोर जबरदस्ती करता है तो सामने वाला बचाओ करता है, उसके लिए जो बन पड़े करता है। इस लिए मेरा मानना है कि उनमें हाथपाई हो सकती है, खींचतान हो सकती है, लेकिन बड़ी आसानी से रेप तो नहीं हो सकता।

उन दिनों जब पुलिस वालों को लड़की के परिवार वालों द्वारा लिखाई रिपोर्ट पढ़ता तो पता चलता है कि असल में वो बलात्कार न थे, लड़के लड़की के अचानक पकड़े जाने पर जबरदस्ती बलात्कार केस बनवाए गए। ज्यादातर केस ऐसे ही होते थे, सामूहिक बलात्कार मामलों को छोड़कर क्योंकि वहां पर अकेली औरत का कोई बस नहीं चलता, लेकिन मेरा मानता है कि एक लड़की एक लड़के को तो आसानी से तो रेप नहीं करने दे सकती।

अगर दोनों में झड़प होती है तो दोनों का घायल होना भी लाजमी है, कपड़ों का फट जाना आदि आदि, लेकिन ज्यादातर केसों में ऐसा नहीं होता। मगर देश मे इस मामले मे विशेष महिला की सुनी गई है, बेशक वो महिला किसी के दबाव में ही क्यों न बयान दे रही हो। दूसरे पहलू को तो देखना ही नहीं, क्या पता सामने वाले का दोष हो ही न। जैसे आस्था, सत्य को न जानने की इच्छा है, वैसे ही बलात्कार मामले में महिला की सुनकर कान बंद कर लिए जाते हैं।

मुझे लगा कुछ तो लिखना चाहिए इस पर जब विदेश मंत्री कृष्णा का बयान पढ़ा, जिसमें लिखा है कि विदेशियों को सतर्क रहना चाहिए। इस बयान का मतलब है कि विदेशी हमको ऐसी नजर से देखें, जिससे हमें घृणा होने लगे। जैसे आज कुछ देशों में मुस्लमानों को देखा जाता है, जबकि सारे मुस्लमान आतंकवादी तो नहीं होते।

उनका उक्त बयान कांग्रेस सांसद शांताराम नाइक की विवादास्पद टिप्पणी "यदि एक महिला देर रात किसी अजनबी के साथ आती जाती है, तो ऐसे में बलात्कार मामलों को दूसरे तरीके से देखा जाना चाहिए" के बाद आया।


आखिर पूरी हुई करिश्मा की तमन्ना



करिश्मा कपूर की तमन्ना पूरी होने जा रही है ओनीर की अगली फिल्म 'यू एंड आई' से। खुद कमाने वाली हर औरत की तमन्ना होती है कि वो परिवार को संभालने के बाद एक बार फिर से अपने काम पर लौटे, जिससे उसकी पहचान थी। जिससे उसको गर्व महसूस होता है, जिससे वो आत्मनिर्भर बनती है।

अभिनेत्री करिश्मा कपूर ने संजय कपूर के साथ शादी करने के बाद फिल्मों में काम करना बंद कर दिया था, और अपना पूरा ध्यान परिवार की देखरेख में लगा लिया था, जैसा कि जया बच्चन, श्रीदेवी, माधुरी दीक्षित, काजोल, जूही चावला, सोनाली बेंद्रे,जैसी कई और अभिनेत्रियों ने किया। करिश्मा कपूर की समकालीन अभिनेत्रियों में से माधुरी दीक्षित, काजोल और जूही चावला ने तो वापसी कर ली, लेकिन करिश्मा कपूर पिछले एक दो साल से बस एक अच्छी कहानी की तलाश में थी, जैसे कि आरके बैनर कहता है कि अच्छी कहानी मिली तो फिल्में खुद बनाएंगे। आखिर आरके बैनर को तो कोई अच्छी कहानी मिली नहीं, मगर कपूर खानदान की बेटी को ओनीर की अगली फिल्म मिल गई, इसकी कहानी अच्छी है या बुरी ये तो जानते नहीं, लेकिन कहा जा रहा है कि ये फिल्म ऑस्कर विजेता फिल्म 'लाईफ इज ब्यूटीफुल' से प्रेरित है।

करिश्मा की वापसी कैसी होगी? इसके बारे में भी कह पाना बहुत मुश्किल है, क्योंकि बड़े पर्दे पर नई अभिनेत्रियों का राज हो रहा है, ऐसे में उनको टक्कर देने के लिए बहुत कुछ चाहिए। याद रहे कि इन नई अभिनेत्रियों में उनकी बहन करीना कपूर भी शामिल है, जिसको निर्देशकों ने साईन तो कर लिया, लेकिन जीरो फिगर से लेकर बिकनी पहनने के बाद भी उनकी फिल्में नहीं चली, जबकि कैटरीना कैफ सीधे और सिम्पल रोल करने के बाद भी निरंतर सफलता बटोरती जा रही है। यहां पर भी किस्मत की जरूरत पड़ती है, ऐसे में तो ज्यादा जब आप किसी बड़े बैनर के तले काम न कर रहें हों। गौरतलब है कि काजोल और माधुरी ने यशराज फिल्म्स बैनर की फिल्मों से वापसी की, लेकिन वापसी का फायदा केवल काजोल को मिला, माधुरी को तो फिर से प्रदेस जाना पड़ा। ऐसे ही बहुत सी अभिनेत्रियां हैं, जिन्होंने बहुत यत्न किए, लेकिन दर्शकों ने भाव नहीं दिया, इनमें विशेष रूप से सौदागर गर्ल 'मनीषा कोईराला', गदर गर्ल 'अमीषा पटेल' और रंगीला गर्ल 'उर्मिला मातोंडकर' शामिल हैं।

करिश्मा कपूर की समकालीन अभिनेत्री जूही चावला ने वक्त की नब्ज को समझा, और उम्र के हिसाब से रोल करने शुरू कर दिए, जबकि करिश्मा कपूर की पिछले कुछ सालों से तमन्ना रही है, वो ही राजस्थानी हिन्दुस्तानी वाले लीड रोल करने की, लेकिन करिश्मा भूल गई कि बॉलीवुड बदल चुका है, वहां पर लोकप्रियता देखकर पैसा फेंका जाता है। वहां फिल्में नहीं, प्रोडेक्ट बनते हैं, जो बहुत महंगे होते हैं, बिकते तो बिकते,  नहीं बिकते तो डिब्बा बंद वापिस होते हैं। करिश्मा को आखिर समझ आ गया कि अब वो करीना कपूर नहीं, इसलिए तो उन्होंने ओनीर की फिल्म झटपट साईन कर ली, जिसमें में उनके सामने होंगे संजय सूरी। डरो मत करिश्मा! सब चलता है, अगर तुम्हारी किस्मत चमक गई तो फिर से गोविंदा तुम्हारे साथ होगा, जिसके साथ जवान अभिनेत्री काम करने से मना कर रही हैं। बेस्ट ऑफ लक