Showing posts with label facebook. Show all posts
Showing posts with label facebook. Show all posts

13 साल से कम उम्र के लिए फेसबुक बैन!

नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को दुनिया की अग्रणी सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक से अपनी साइट के मुख्य पेज पर यह चेतावनी जारी करने के लिए कहा कि 13 वर्ष से कम आयु के बच्चे यहां अपना खाता नहीं खोल सकते।

न्यायालय की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश बी. डी. अहमद एवं न्यायाधीश विभु बाखरू की पीठ ने फेसबुक से 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों को खाता खोलने की इजाजत न देने के लिए कहा।

फेसबुक की तरफ से न्यायालय के समक्ष उपस्थित वरिष्ठ वकील पराग त्रिपाठी ने न्यायालय को आश्वासन दिया कि साइट अपने मुख्य पेज पर 13 वर्ष से कम आयु के बच्चो के खाता न खोलने से संबंधित चेतावनी जारी करेगा।

न्यायालय ने केंद्र सरकार से भी यह बताने के लिए कहा कि बच्चों को ऑनलाइन सोशल नेटवर्किग साइटों पर होने वाली अभद्रता से बचाने के लिए उसके पास क्या कानून है।

कार्टूनिस्‍ट असीम त्रिवेदी को सलाह

जनसत्ता के संपादक एवं लेखक ओम थानवी  कार्टूनिस्‍ट असीम त्रिवेदी के बारे में लिखते हैं "असीम त्रिवेदी को टीवी चैनलों पर बोलते और अपनी ही बिरादरी के लोगों यानी कार्टूनकारों से उलझते देखकर रसूल हमज़ातोव की एक सूक्ति याद आई: मनुष्य को बोलना सीखने में तीन साल लगते हैं, मगर क्या बोला जाए यह सीखने में उम्र लग जाती है!! बहादुर असीम, इस प्रसिद्धि और सहानुभूति को पहले पचाओ. कार्टून की कला अंततः विवेक और संयम से निखरती है. शब्द हों, चाहे रेखाएं. कलाकार अपने काम से पहचाना जाएगा, क्या बोलता है इससे नहीं. देशद्रोह का खेल सरकार हार गयी. पर अपनी कला की बाज़ी तुम्हें अभी जीतनी है. आकस्मिक ख्याति उसमें रोड़ा न बने. यही शुभाशंसा है।"

न्‍यूज 24 मैनेजिंग एडिटर,अजीत अंजुम
  कार्टूनिस्‍ट असीम के शब्‍दों का विश्‍लेषण करते हुए कुछ यूं लिखते हैं, "असीम त्रिवेदी देशद्रोह के आरोप में जेल क्या हो आए ....मीडिया में तीन दिनों तक छाए क्या रहे ....अपने को हीरो मानने लगे हैं ...अब उन्हें लगने लगा है कि दुनिया भर के कार्टूनिस्ट एक तरफ और वो एक तरफ ....आज शाम न्यूज 24 पर एक कार्यक्रम में असीम हमारे साथ थे...उन्होंने कहा - मैं ही अकेला ऐसा कार्टूनिस्ट हूं जो आंदोलन के लिए कार्टून बनाता हूं ...मैं ही अकेला कार्टूनिस्ट हूं जो पैसे के लिए कार्टून नहीं बनाता ....मैं ही अकेला ऐसा कार्टूनिस्ट हूं जो .......ब्लां ब्लां ब्लां.....शंकर से लेकर आर के लक्ष्मण तक और सुधीर धर से लेकर सुधीर तैलंग तक ....सब फेल हैं अब उनके आगे ....कुछ इसी अंदाज में असीन बोले जा रहे थे ....टाइम्स नाऊ पर भी असीम कुछ इसी अंदाज में थे .......असीम को देशद्रोह के मुकदमें में फंसाना सरकार और सिस्टम की फासीवादी सोच का नतीजा है ....उनकी देशभक्ति पर कतई संदेह नहीं किया जा सकता लेकिन अगर असीम अपने को दुनिया का महान कार्टूनिस्ट और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सबसे बड़े पक्षधर मानने लगे तो इसे आप क्या कहेंगे ......असीम जिंदगी भर कार्टून बनाते रहते , पता नहीं कितने लोग उन्हें जानते लेकिन तीन दिनों में उन्हें देश जानने लगा है ....अब डर है कि कहीं असीम का पांव जमीन से न उखड़ जाए ....."


इससे पहले उन्‍होंने लिखा था, "असीम त्रिवेदी ने कार्टून बनाकर ऐसा कोई जुर्म नहीं किया है कि उन पर देशद्रोह का मुकदमा चले और उन्हें जेल में भेज दिया जाए ...लेकिन जो लोग सोशल मीडिया पर कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को क्रांतिकारी कार्टूनिस्ट और उनके कार्टून को सही ठहराने में जुटे हैं , उनसे पूरी तरह असहमत हूं ....क्या आपने उनके सभी कार्टून देखे हैं ....अभिव्यक्ति की आजादी का ये मतलब नहीं कि संविधान पर मूतने लगें और .......प्लीज आप उ
नके हर कार्टून को देखिए ...उनका गुस्सा भ्रष्ट सिस्टम से हो सकता है ..सरकार से हो सकता है ...इनके खिलाफ जैसे चाहे कार्टून बनाएं लेकिन उनके इस तरह के कार्टून को सही तो बिल्कुल नहीं ठहराया जा सकता ....प्लीज मेरे स्टेटस पर राय देने से पहले और आंख मूंदकर असीम के कार्टून का समर्थन करने से पहले उनके सभी कार्टून जरुर देख लें ....फिर भी अगर लगता है कि वो क्रांतिकारी कार्टूनिस्ट हैं और उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इस हद तक हासिल होना चाहिए तो ......मैं फिर कह रहा हूं कि मैं उनके जेल भेजे जाने और देशद्रोह के मुकदमे के सख्त खिलाफ हूं लेकिन संविधान पर मूतने वाले कार्टून के भी खिलाफ हूं."

रविश कुमार, एनडीटीवी न्‍यूज एंकर। असीम को नसीहत देते हुए कुछ इस तरह लिखते हैं "असीम से यही गुज़ारिश कर रहा हूं कि समझ का निरंतर विकास करते रहें । कुछ स्वीकार भी करें कुछ का परित्याग भी । वरना महादेव बनने के चक्कर में माटी के माधो बनकर रह जायेंगे । टीवी अंधा कुआं है । ये सिर्फ़ चमकता है।"

"सत्यमेव जयते" को लेकर फेसबुक पर प्रतिक्रियाओं का दौर


Ajit Anjum
स्टार प्लस पर सत्यमेव जयते देख रहा हूं ....जिंदगी लाइव की ऋचा अनिरुद्ध की याद आ रही है ....कंसेप्ट के लेवल पर बहुत कुछ मिलता जुलता ...एंकर , गेस्ट से लेकर दर्शकों को रोते देख रहा हूं ...इमोशनल और शॉकिंग मोमेंट ....कोख में बेटियों के कत्ल की दास्तां ....

आमिर चाहते तो वो भी दस का दम वाला पॉपुलर फार्मेट चुन सकते थे ...चाहते तो गेम शो कर सकते थे ...लेकिन आमिर ने ऐसा शो करने का फैसला किया है ..इसलिए वो बधाई के पात्र हैं ...अब ये शो हिट हो या न हो ( तथाकथित रेटिंग के पैमाने पर ) मैं अपनी राय नहीं बदलूंगा ......सत्यमेव जयते बहुतों को अच्छा लगा होगा ...बहुतों तो चलताऊ ...बहुतों को ऐवैं ....कुछ साथियों ने मेरे स्टेटस के जवाब में ये भी लिखा है कि इसे रेटिंग नहीं मिलेगी ...... न मिले ..लेकिन क्या उसके आधार पर आप मान लेंगे कि ऐसे शो की जरुरत नहीं ...तो फिर क्या सिर्फ लोग दस का दम या नच बलिए या नाच गाने वाला ही शो देखना चाहते हैं ...अगर यही सच है कि तो फिर क्यों कहते हैं कि कोई चैनल गंभीर मुद्दों को उठाने वाला शो नहीं बनाता ....मैं तो स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर को भी इसके लिए बधाई देता हूं ..जिन्होंने हर हफ्ते चार करोड़ ( शायद ) खर्च करने ये जोखिम लिया है ...चाहते तो इससे आसान रास्ता पकड़ सकते थे ...दस का दम या नच के दिखा जा या फिर कोई गेम शो बना सकते थे ...लेकिन सत्यमेव जयते बनाया ...ये एंटरटेनमेंट चैनल का सरोकारी चेहरा है ...

सत्यमेव जयते जैसे शो के लिए आमिर को सलाम ....ऐसे शो की जरुरत थी ... कम से कम ऐसे लोग तो शर्मिंदा हों जो बेटियां को दुनिया में आने से पहले मार देते हैं ...कोख में कत्ल करते हैं क्योंकि उन्हें बेटा चाहिए ....और हां , ऐसे काम सासु माएं ज्यादा करती हैं और करवाती है ...जो खुद भी एक मां होती है ...औरतों की कंडिशनिंग ऐसी होती है कि जब वो बहु होती तो उसकी भूमिका अलग होती है ..बेटी होती है तो अलग होती है और सास होती है तो अलग होती है ...हमने बचपन से अपने आस पास ऐसे माहौल को देखा है , जहां बेटा चाहिए ..बेटा ही होना चाहिए ..बेटी से वंश कैसे चलेगा ..जैसे गूंजते सवालों के बीच गर्भ में बच्चा पलता है .....

पहले तो लोग कहते हैं कि चैनलों पर कोई गंभीर कार्यक्रम नहीं होते ...समाज को झकझोरने वाले मुद्दों पर शो नहीं बनते ..चैनलों पर सरोकार वाले शो नहीं दिखते ...जब बनते हैं तो कहते हैं बहुत घिसा -पिटा था ...नया क्या है ..बहुत गरिष्ठ है ...अपच है ..बहुत गंभीर है ...इतना बोझिल शो इंटरटेनमेंट पर कोई क्यों देखेगा ...अरे भाई साहब , भ्रूण हत्या से जुड़े शो में आप दस का दम या केबीसी का मजा क्यों तलाश रहे हैं ...ये तो वही बात हुई न कि पी साईनाथ के लेख में रागदरबारी या पेज थ्री का मजा खोज रहे हैं ...तो फिर हिन्दू नहीं , दिल्ली टाइम्स ही पढ़िए न ....



Shivam Misra 
‎"सत्यमेव जयते" मे आज अमीर खान ने एक बेहद जरूरी मुद्दे को अपनी आवाज़ दी है ... एक सार्थक प्रस्तुति जो हमारे समाज के एक बेहद दुखद और घिनोने रूप को सामने लाती है|

यह कैसी हवस है ... कैसी चाहत है 'कुल दीपक' पाने की जो हर साल लगभग दस लाख बेटियों की हत्या कर रही है ... उनके पैदा होने से पहले ही ????

मैं अमीर खान और उनकी पूरी टीम को इस सार्थक प्रयास के लिए साधुवाद देता हूँ !

समय आ गया है जब हमे मिल कर अपनी खुद की और समाज की यह घिनोनी सोच बदलनी होगी !

बेटियों की हत्या बंद करनी ही होगी !

Sachin khare
मित्रों,
मैं नहीं जानता आमिर खान को किन्तु मैं बस एक बात जानता हूं उन 100 डाक्टरों को जेल में होना चाहिये और उनकी दुकान बंद होनीं चाहिये जिन्हें #Satyamevjayate की उस डाक्यूंमेंट्री में दिखाया गया है..

यदी आपके पास उनके नाम और अन्य जानकारियां हैं तो साझा कीजिये.. उन्हें उनके अंजाम तक अब हम पहुंचायेंगे.. कानूंन को जो करना है करता रहे किन्तु तबतक उनकी दुकान बंद करनीं ही होगी..

इस विचार को फेसबुक पर अपनें तरीके से फैला दीजिये.. छोड़ना नहीं है इन कसाइयों को..

वन्दे मातरम..

अजय कुमार झा
आज भांड बन चुके टीवी चैनलों और जोकर बन चुके समाचार चैनलों की चौबीस घंटों की बकर से , अलग तो निश्चित रूप से लगा "सत्यमेव जयते " । मुद्दा - कन्या भ्रूण हत्या ..समस्या , पीडित , विशेषज्ञों , खबरनवीसों , आरोपियों से सीधे बात करने के साथ बहुत सारा दृश्य फ़िल्मांकन भी ..और आखिर में कम से कम एक प्रयास भी ..,,मुझे तो प्रभावित किया , इस कार्यक्रम ने, लेकिन बहुत से अन्य पहलू भी हैं अभी इस मुद्दे से जुडे हुए ..... जल्दी ही लिखूंगा

नई दुनिया के संपादक  Jaideep Karnik
आमिर खान ने बता दिया की आज देश को सपने दिखाने की बजाय सच दिखाकर जगाना जरूरी है!  

Srijan Shilpi
आमिर खान ने जो पहल की है, देश के मानस को जगाने की, अपने दौर की सबसे अहम समस्याओं को समझने और उनका हल तलाशने की वह न सिर्फ काबिलेतारीफ है, बल्कि उसमें हम सब का सहयोग अपेक्षित है। एक कलाकार वह करके दिखाने जा रहा है, जो वास्तव में लोकतंत्र के चारों स्तंभों को मिलकर बहुत पहले कर लेना चाहिए था, पर वे विफल रहे। आमिर की पहल सफल हो.....सार्थक हो!

@Ravish Kumar NDTV
जितना दर्शकत्व को समझा है उससे यही जाना है कि बड़ा ही निष्ठूर तत्व है । सत्यमेव जयते इसलिए नहीं देखेगा कि आमिर ने बनाया है या इरादा नेक है। ग़रीबी दूर करने का एक ही जादू , दूरदृष्टि पक्का इरादा जैसे स्लोगनों की हालत देख चुका है । हाँ अगर बात में दम है, कहने के तरीके में दम है तो वह सिर आँखों पर लेगा । आमिर ने एक बड़ी चुनौती उठाई है और हमें दी भी है । मैं देख नहीं सका हूं । प्रतिक्रियाओं में आए उतार चढ़ाव के आधार पर कह रहा हूं । एक ही नाकामी समझ आ रही है । लोग आमिर के बारे में ज़्यादा बातें कर रहे हैं, कन्या भ्रूण हत्या के बारे में कम । अगर यही हकीकत है तो सत्यमेव जयते फेल । दिल पे लगेगी तभी बात बनेगी । दिल पे आमिर को नहीं लगाना था, मुद्दे को लगना था । वर्ना ग्रामीण मंत्रालय के तहत आने वाले तमाम मुद्दों के ब्रांड एंबेसडर की तरह बनकर रह जायेंगे । उम्मीद तो यही है कि सत्यमेव जयते सफल हो । पैसे की दरिद्रता का रोना रोने वाले नूझ पैनलों के दौर में आमिर के नाम पर करोड़ों रुपये लगाने का इरादा एक नई उम्मीद है । बेहतर कंटेंट पर मार हो तो लड़ाई जमेगी वर्ना इसलिए लोग प्राइमटाइम नहीं देखेंगे कि रवीश कुमार सो काॅल्ड अच्छा बंदा है बल्कि तभी देखेंगे जब इसमें दम होगा । देखने की रोचकता होगी । सत्यमेव जयते देखने के लिए बेचैन हूं । इसे चलना चाहिए । टीवी का भला होगा और कमाई भी । फिर जल्दी ही आप चिरकुट भौकालेंकरों से मुक्त हो जायेंंगे । देखिये प्राइमटाइम अजय देवगन के साथ । आमिर को शुभकामनायें ।





याहू चैट से फेसबुक तक

एक समय था, जब इंटरनेट यूजर्स yahoo व Rediff मैसेजर द्वारा किसी chat room में घुसे रहते थे। इस दौर में साइबर कैफे खूब कमाई का धंधा था, लोग इंटरनेट पर चैट व गेम खेलने में व्‍यस्‍त रहने लगे थे। फिर लोगों ने साइबर कैफे को अलविदा कहते हुए कम्‍प्‍यूटर व इंटरनेट को घर के किसी कोने में रख लिया और की बोर्ड कूटना शुरू कर दिया। जैसे जैसे इंटरनेट यूजर्स की संख्‍या बढ़ने लगी, वैसे वैसे इंटरनेट पर कंटेंट की मात्रा में भी भारी इजाफा होने लगा। इंटरनेट यूजर्स की बढ़ती संख्‍या को देखते हुए Google ने orkut को जन्‍म दिया। orkut ने बहुत जल्‍द लोकप्रिय हासिल कर ली, क्‍योंकि बहुत आसान जो था, इसमें यूजर्स को खाता बनाना और उसको चलाना।

मगर mozilla आने के बाद जो दुर्गति Internet Explorer हुई, वह दुर्गति facebook आने के बाद orkut की हुई। जो पाइप लाइन गूगल ने orkut द्वारा बिछाई थी, उस पर कब्‍जा facebook ने कर लिया।

मुझे याद है, जब मैंने पहली बार कुछ साल पहले इस पर लॉगिन किया था, एक बड़े संवाददाता से बात करने की कोशिश की थी, मगर बुरी तरफ असफल भी रहा, इतना ही नहीं उसने तो मेरा खाता ब्‍लॉक भी कर दिया था। इसके बाद मैंने कई महीनों तक facebook नहीं खोला, मगर एक दिन फेसबुक पर फिर लौटा, और महसूस हुआ कि यह पॉश इलाका है, और ओर्कुट नॉर्मल रेजीडेंसी वाला इलाका।

मगर धीरे धीरे ऑर्कुट वाले लोग पॉश एरिए में अपनी पैठ बनाने लगे, हर कोई एक दूसरे को friend request भेजने लगा। फेसबुक पर चाहने वालों का एक बड़ा ग्रुप सर्कल बनने लगा। अब लोग फेसबुक को एक प्रचार का बेहतरीन माध्‍यम मानने लगे। यहां पर हर कोई अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने लगा। उसको पूर्ण आजादी थी, status updates करने की। अपने फोटो अपलोड करने की। उनको एक दूसरे से share करने की। अब हर किसी का friend request स्‍वीकार होने लगी, बशर्ते उसके खाते में अशलील सामग्री न हो। अब टीवी से पहले फेसबुक पर खबरें प्रकाशित होने लगी। जिन्‍दगी में कितने उतार चढ़ाव हैं का जिक्र होने लगा।

यहां पर page create होने लगे, बड़ी बड़ी हस्‍ितयां यहां पर विराजमान होने लगी। फैन्‍स क्‍लब बनने लगे। आज फेसबुक गीतों में, समाचारों में, ख्‍यालों में व शायरोशायरी में शुमार होने लग गया। कुछ लोगों ने अपनी दुकानों के नाम फेसबुक रख दिए। आज facebook सबसे बड़ा ब्रांड बन चुका है। इतना बड़ा ब्रांड के किसी की जान भी ले रहा है और किसी की जान बचा भी रहा है।

चलते चलते इतना ही कहूंगा कि टाइमपास, बिजनस व प्रचार का एक अच्‍छा माध्‍यम है, फेसबुक। इसके हिट होने का यह कारण है, हर कोई अपना बिजनस बढ़ाना चाहता है, टाइम पास करना चाहता है, और प्रचार करना चाहता है। हम सब यहां इनमें से कुछ न कुछ तो करते हैं।