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कहो..... भीड़ नहीं हम.....

आस पास के लोगों से..... सतर्क हो जाइए..... क्‍योंकि पता नहीं कौन सा नकाबपोश..... काले धन का मालिक हो..... मखौटों के इस दौर में सब फर्जी हैं..... हां..... मैं..... आप..... हम सब फर्जी हैं।

चौंकिए मत..... सच है.....। कबूतर की तरह आंखें भींचने से क्‍या होगा?.....। याद कीजिए..... 35 लाख का घर..... और 22 लाख के दस्‍तावेज..... आखिर किसने बनवाये। बेरोजगार बेटे बेटी को 3 से 5 लाख रिश्‍वत देकर..... सरकारी नौकरी किसी ने दिलवाई.....। आखिर कौन पूछता है..... दामाद ऊपर से कितना कमा लेता है.....।

ऐसे ही तो..... जमा होता है काला धन..... काले धन वाले भी..... तो शामिल हैं ईमानदारों में..... और नोटबंदी का करते हैं जमकर समर्थन..... कहते हैं..... मिट जाएगा काला धन..... और खत्‍म होगी रिश्‍वतखोरी..... हां..... स्‍लीपर सैल की तरह..... हम में भी..... कहीं न कहीं..... छुपे बैठे हैं चोर.....

दम है तो पकड़िये..... रिश्‍वत लेते..... जो पकड़ा गया..... रिश्‍वत देकर छूट जाएगा..... सड़क पर ट्रैफिक वाला रसीद काटता है..... तो आप बड़े आदमी को फोन लगा लेते हैं..... ईमानदार कर्मचारी की बैंड खूब बजती है..... और तमाश देखते हैं हम सब.....

ट्रैफिक सिग्‍नल पर खड़ा शहरी 60 सैकेंड इंतजार नहीं कर सकता..... लेकिन..... गरीबों को लाइन में लगने पर खूब ज्ञान उड़ेल रहा है.....

युवान बेटा पिता के कहने पर बिजली का बिल भरने नहीं जाता..... कहीं..... लाइन बड़ी हुई तो डार्लिंग बुरा मान जाएगी..... फेसबुक पर उस गरीब को ज्ञान बांटता है..... जो 14 घंटे मजदूरी करता है..... और मिलता है बाबा जी ठुल्‍लू.....

बुरा तो लगता है..... कड़वी बात का..... जो कल तक..... मोदी की नोटबंदी का..... सबसे बड़ा समर्थक था..... पकड़ा गया बड़े नोटों के साथ.....

सब चुप रहेंगे..... कोई नहीं बोलेगा..... क्‍योंकि..... सच बोलने के लिए..... नकाब हटाने होंगें..... अपने स्‍वार्थों की बलि..... देनी होगी.....। इसलिए..... जो चल रहा..... चलने दें..... तमाशा देखें..... क्‍योंकि..... तमाशबीन हैं हम.....

125 करोड़ जनता..... 11 क्रिकेटर..... जमकर देखते हैं..... गाली निकालते हैं..... जीते तो जश्‍न मनाते हैं..... पर्दे पर अजय मेहरा देखकर..... खून खौलने लगता है..... घर आते आते..... थका हरा घसीट पीटा आम आदमी..... भीतर से निकलता है..... जैसे अदालीन के चिराग से जिन्‍न.....

हम को अचानक..... बोलने वाला प्रधानमंत्री मिलता है..... हम खुशी के मारे झूम उठते हैं..... क्‍योंकि..... हम बोल नहीं सकते..... कोई तो आया बोलने वाला.....

फिर अचानक..... बोलना भी..... सिरदर्द करने लगता है.....

फिर..... आशावाद..... फिर..... चलो देखते हैं..... और फिर..... मैं..... आप..... सब..... तमाशबीन हो जाते हैं.....

तमाशबीन होने का भी..... अपना ही एक मजा है.....

टीवी के सामने बैठकर..... सचिन को शॉट मारना सिखाते हैं..... फिल्‍म निर्देशक को..... निर्देशन के गुर..... किसी लड़ने वाले को..... नायक से खलनायक..... खलनायक से नायक बनाते हैं.....

कोई चौपालों में..... कोई ड्राइंग रूम में..... कोई चाय के गल्‍ले पर बैठकर..... देश बदल रहा है..... पान मसाले का पीक..... मुंह से थू थू हुए..... स्‍वच्‍छता का ज्ञान झाड़ा जा रहा है..... सुन रहे हैं हम..... क्‍योंकि..... तमाशबीन हैं हम

असल जीवन में..... काले को सफेद करने की दौड़..... सोशल मीडिया पर..... ज्ञान खूब बघारा जा रहा है..... किसका दामन..... कितना मैला..... हर कोई..... लिए प्रमाण पत्र..... घूम रहा है.....

कांग्रेस के दौर में..... शहीद हुए तो एक के बदले दस..... भाजपा के दौर में शहीद हुए..... तो सवाल मत पूछिए..... रैलियों में सुर ऊंचा है..... संसद में सिर नीचा है.....

क्‍यों नहीं..... हम नेता चुनते..... क्‍यों..... हर बार हम..... कांग्रेस..... बीजेपी..... चुनें..... क्‍यों नहीं..... हम सरकार से..... तीखे सवाल करते..... चाहे कांग्रेस की हो..... चाहे बीजेपी की हो.....

क्‍यों नहीं..... हर सवाल हमारा मौलिक होता..... क्‍यों..... हम पढ़े लिखे होने के बाद भी..... कॉपी पेस्‍ट..... नकल करते हैं..... सभ्‍य समाज हैं..... फिर भी..... चर्चा नहीं..... बहस करते हैं..... तर्क नहीं दे पाते..... तो गाली गालौच करते हैं.....

भीड़ नहीं तो..... क्‍या हैं हम..... एक ने लिखा..... चोर..... तो हम भी..... लिखते हैं..... चोर..... इंटरनेट है..... पर तथ्‍य..... क्‍यों नहीं खोजते हम..... पढ़े लिखे हैं हम..... यह क्‍यों नहीं सोचते..... एक ही वीडियो..... कभी कांग्रेस का हो जाता है..... कभी भाजपा का..... और अंधे हम..... करते हैं..... फॉरवर्ड..... फॉरवर्ड..... फॉरवर्ड.....

कहो..... भीड़ नहीं हैं हम..... बताओ..... भेड़ नहीं हम..... युवा हैं हम..... किसी के गुलाम नहीं हम..... बीरबलता नहीं..... नचिकेतता चाहिये हमें..... बुरे हैं तो बुरा कहो..... सच्‍चे हैं तो सच्‍चे कहो..... झूठ के लिबास में..... तारीफ नहीं चाहिये.....

कहो..... भीड़ नहीं हम.....

Standpoint - 'हिंदु परिषद' के आगे 'विश्व' क्यूं ?


आप सोच रहे होंगे। यह अटपटा सवाल क्यूं ? बिल्कुल मुझे भी 'विश्व' अटपटा लगता है, जब मैं इस संस्थान के प्रमुख के बयानों को सुनता हूं। देखता हूं या कहीं पढ़ता हूं।

बड़ी अजीब बात है कि आप भारत को एक कट्टर देश बनाने की सोच रखते हैं, लेकिन शब्द विश्व जैसा इस्तेमाल करते हैं। अगर आप भारत को सीमित रखना चाहते हैं, तो सच में 'विश्व' जैसा शब्द एक देश की ऐसी संस्था को शोभा नहीं देता।

यह शब्द वैसा ही है, जैसा दक्षिण भारत की एक राजनीतिक पार्टी indian christian secular party में 'सेकुल्यर'शब्द है। अगर सेकुल्यर हो तो क्रिचियन शब्द क्यूं ? वैसे ही अगर विश्व हिन्दु परिषद भारत को हिन्दु राष्ट्र बनाना चाहती है तो राष्ट्र शब्द स्टीक हो सकता है, लेकिन विश्व शब्द नहीं क्यूंकि राष्ट्र को विश्व की संज्ञा नहीं दी जा सकती।

31 मार्च 2013 को 'हिंदु संगम' समारोह का आयोजन हुआ। इस समारोह में विश्व हिंदु परिषद के प्रमुख प्रवीण तोगड़िया ने कहा था, ''2015 के बाद गुजरात को हिन्दु राज्य घोषित कर दिया जाएगा, क्यूंकि 18000 गांवों में विहिप की मौजूदगी हो जाएगी।''

एक अन्य ख़बर भी आई थी, जिसमें उन्होंने कहा था, अगर मैं ​देश का प्रधानमंत्री बना तो मुस्लिम समुदाय से मतदान का अधिकार छीन लूंगा। मुझे लगता है​ कि इस देश में लोकतंत्र का वो आखिर दिन होगा क्यूंकि उस दिन भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्रिक व्यवस्था वाला देश न रह जाएगा। शायद भारत में उस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी छीन जाएगी। जिसकी लाठी, उसकी भैंस की कहावत जैसी व्यवस्था बचेगी।

एक ताजे घटनाक्रम के अनुसार भावनगर में विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया ने चुनावी मौसम में मुसलमानों को निशाना बनाया है। तोगड़िया ने मुसलमानों को चेतावनी देते हुए कहा है कि वे हिंदू बहुल इलाकों से घर खाली करें। गुजरात के भावनगर में तोगड़िया ने शनिवार रात को विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर एक मुस्लिम बिजनेसमैन के घर के बाहर हंगामा भी किया। इस मुस्लिम बिजनेसमैन ने हिंदू बहुल क्षेत्र में हाल ही में घर खरीदा है। वीएचपी और बजरंग दल ऐसे सौदों का विरोध कर रहे हैं। तोगड़िया ने मुस्लिम बिजनेसमैन को 48 घंटों के भीतर खाली करने की धमकी दी और कहा यदि ऐसा नहीं किया गया तो उनके दफ्तर पर पत्थर, टायर और टमाटरों से हमला किया जाएगा। तोगड़िया ने हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं से कहा कि वे इस घर को अपने कब्जे में ले लें और इस पर बजरंग दल का बोर्ड टांग दें।

यह घटनाक्रम गुजरात का है। जहां मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जो बीजेपी की तरफ से पीएम पद के उम्मीदवार हैं, जो मुस्लिम समुदाय को साथ लेकर चलने का भरोसा दिला रहे हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों हाथों में अब लड्डू कैसे रखेंगे, जैसे वो रैलियों में कहते आए हैं। आरएसएस व विहिप की नजदीकियां किसी से छुपी नहीं, और आरएसएस का ही एक चेहरा बीजेपी है। 2015 तक गुजरात को हिन्दु राज्य घोषित करने का ऐलान भी अहमदाबाद शहर में हुआ। शायद इस मामले में गुजरात के मुख्यमंत्री को अपना स्टेंड क्लीयर करना चाहिए।

नफरत की आंधी में भारत ने हमेशा अपना गौरव खोया है। नफरत से पैदा हुए दंगों में मरने वाले चाहे हिन्दु हो, चाहे मस्लिम, लेकिन छवि देश की खराब होती है। भारत को पाकिस्तान न बनाएं। देश को विकास की जरूरत है। किसी भी धर्म के विनाश की नहीं।
प्रवीण तोगड़िया, तुम आधुनिक भारत के लिए कलंक हो। खुलेआम धमकियों और भड़काऊ टिप्पणियों को वापस लेने के लिए हम तुम्हें 48 घंटे का वक्त दे रहे हैं। 21 अप्रैल 2014

Publicly Letter : गृहमंत्री ​सुशील कुमार शिंदे के नाम

नमस्कार, सुशील कुमार शिंदे। खुश होने की जरूरत नहीं। इसमें कोई भावना नहीं है, यह तो खाली संवाद शुरू करने का तरीका है, खासकर आप जैसे अनेतायों के लिए। नेता की परिभाषा भी आपको बतानी पड़ेगी, क्यूंकि जिसको सोशल एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया के शब्दिक ​अ​र्थ न पता हों, उसको अनेता शब्द भी समझ में आना थोड़ा सा क​ठिन लगता है। नेता का इंग्लिश अर्थ लीडर होता है, जो लीड करता है। हम उसको अगुआ भी कहते हैं, मतलब जो सबसे आगे हो, उसके पीछे पूरी भीड़ चलती है।
 
अब आप के बयान पर आते हैं, जिसमें आप ने कहा कुचल देंगे। इसके आगे सोशल मीडिया आए या इलेक्ट्रोनिक मीडिया। कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, क्यूंकि कुचल देंगे तानाशाही का प्रतीक है या किसी को डराने का। आपके समकालीन अनेता सलमान खुर्शीद ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को नंपुसक कहा, क्यूंकि वो दंगों के दौरान शायद कथित तौर पर अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पाए, लेकिन जब मुम्बई पर हमला हुआ था, तब आपके कुचल देंगे वाले शब्द किस शब्दकोश में पड़े धूल चाट रहे थे, तब कहां थे सलमान खुर्शीद जो आज नरेंद्र मोदी को नपुंसक कह रहे हैं।

इलेक्ट्रोनिक मीडिया को तो शायद आप पैसे खरीद लें, क्यूंकि उसको पूंजीपति चलाते हैं, जो विज्ञापन के लिए काम कर सकते हैं, लेकिन सोशल मीडिया को कुचलना आपके हाथ में नहीं, क्यूंकि इसको खरीदना आपके बस की बात नहीं। सोशल मीडिया का शब्दिक अर्थ भी समझा देता हूं, लोगों का मंच। जो लोग सरकार बनाने की हिम्मत रखते हैं, उनको कुचलना आपके लिए उतना ही मुश्किल है, जितना घोड़े का घास के साथ दोस्ताना बनाए रखना।

आपके बयान बदलने से एक बात तो पता चलती है कि आप थोथी धमकियां देते हैं। वरना, अपने बयान पर अटल रहते, और मीडिया को कुचल देते, आज तक आप गूगल व फेसबुक से जानकारियां हासिल नहीं कर पाए, कुचलने की बात करते हैं। क्या किसी की अ​भिव्यक्ति को दबाना असैवंधानिक नहीं ? आपको इलेक्ट्रोनिक मीडिया व सोशल मीडिया का अंतर पता नहीं, तो संवैधानिक व गैर संवैधानिक का अंत क्या खाक पता चलेगा।

आजकल मोदी जी ने खूब अपना पुराना धंधा पकड़ा हुआ है। अपने पुराने दिनों को याद कर रहे हैं, इससे शायद उनको चुनावी फायदा मिल जाए, लेकिन अगर आप ने गृहमंत्री होकर कांस्टेबल वाली हरकतें न छोड़ी तो कांग्रेस को भाजपा वाले कुचल देंगे। और सलमान खुर्शीद को अच्छे से उनके बयान का अर्थ भी समझा देंगे।

जय रामजी की। इसका अर्थ बात शुरू करना भी होता है और संवाद बंद करना भी। जहां लिखा है, वहां इसका अर्थ संवाद बंद करना है। फिर से जय रामजी की। 

कांग्रेस को लेकर मीडिया की नीयत में खोट, निष्‍पक्ष पत्रकारिता नहीं

मीडिया की अपनी सोच कर चुकी है। वो अब सोशल मीडिया को केंद्र में रखकर ख़बरें बनाने लगा है। हालांकि इसका असर प्रिंट मीडिया पर नहीं, बल्‍कि वेब मीडिया एवं इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया पर अधिक दिखता है। कांग्रेस का विज्ञापन शुरू हुआ तो नमो के चेलों ने लड़की हसीबा अमीन को लेकर दुष्‍प्रचार करना शुरू कर दिया। 

वेब मीडिया भी उसी धुन में निकल पड़ा। हालांकि विज्ञापन में स्‍पष्‍ट शब्‍दों में लिखा है, युवा कांग्रेस कार्यकर्ता। जो लोगों को गला फाड़कर बताने की जरूरत कहां रह जाती है, हां अगर कोई अभिनेत्री होती, स्‍वयं को कांग्रेस कार्यकर्ता कहती तो समझ में आता गला फाड़ना। अगर अमेरिकन होती तो समझ में आता गला फाड़ना। 

नंबर दो बात, राहुल गांधी की इंटरव्‍यू के बाद जो मीडिया ने समझ बनाई, वो भी हैरानीजनक है। उसका इंटरव्‍यू इतना बुरा नहीं था, सच तो यह है कि अर्नब गोस्‍वामी राहुल गांधी को सुनना नहीं चाहता था, वे तो केवल उसके गले में उंगली डालकर उलटी करवाना चाहता था, ताकि नरेंद्र मोदी के गले से भी आवाज निकल आए। राहुल गांधी की इंटरव्‍यूह पर सवाल उठाने वाले नरेंद्र मोदी का इंटरव्‍यू क्‍यूं याद नहीं कर रहे , जब वह लाइव इंटरव्‍यू क्रोधित होते हुए छोडकर भाग गया था।

भारतीय राजनीति 99 के फेर में

पिछले एक साल में भाजपा के प्रधान मंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी ने हर स्तर पर विज्ञापनों से बहुत खूबसूरत जाल बुना। असर ऐसा हुआ कि देश में एक संप्रदाय का जन्म होता नजर आया। मोदी के अनुयायी उग्र रूप में नजर आए। मानो विज्ञापनों से जंग जीत ली। सत्ता उनके हाथ में है। जो शांत समुद्र थे, एकदम तूफानी रूख धारण करने लगे। अब उनको दूसरे समाज सेवी भी अपराधी नजर आने लगे, खासकर दिल्ली में, क्यूंकि ​दिल्ली फतेह होते होते चुंगल से छूट गई।

ख़बर है कि कांग्रेस प्रधान मंत्री पद की दौड़ में राहुल गांधी को उतारने का मन बना चुकी है। कांग्रेस राहुल गांधी को ऐसे तो उतार नहीं सकती, क्यूंकि सवाल साख़ का है, मौका ऐसा है कि बचा भी नहीं जा सका। अब राहुल को उतारने के लिए कांग्रेस पीआर एजें​सियों पर खूब पैसा लुटाने जा रही है। यकीनन अगला चुनाव मूंछ का सवाल है। इस बार चुनाव को युद्ध से कम आंकना मूर्खता होगी। युद्ध का जन्म अहं से होता है। यहां पर अहं टकरा रहा है। वरना देश में चुनाव साधारण तरीके से हो सकता था। भाजपा किसी भी कीमत पर सत्ता चाहती है। अगर उसकी चाहत सत्ता न होती तो शायद वह अपने पुराने बरगद के पेड़ को न काटती। अटलजी की तबीयत ठीक नहीं, वो राजनीति को समझ भी नहीं पा रहे, लेकिन फिर भी नेता उनके साथ फोटो खिंचवाने जाते हैं, उनकी एक झलक पाने जाते हैं, लेकिन एक बरगद का पेड़ खड़ा है, जो राजनीति की चरमसीमा को देख रहा है, उसको साइडलाइन कर दिया। युद्ध के लिए युवा सेनापति की जरूरत थी, जो नरेंद्र मोदी के रूप में मिला।

नरेंद्र मोदी ने पूरा देश में अपना प्रभाव छोड़ने के लिए विज्ञापनों पर दिल खोलकर पैसा खर्च किया। कांग्रेस ने एक भी पत्ता बाजार में नहीं फेंका। वो सिर्फ मूक दर्शक की भांति देखती रही। मगर जब बात राहुल गांधी वर्सेस नरेंद्र मोदी की आई तो कांग्रेस ने बख्तर कस लिए। अब युद्ध में युवराज है तो बिना तैयारी के युद्ध लड़ा नहीं जा सकता, अगर मोदी को बाजार से चेहरा संवारने वाले मिल सकते हैं तो कांग्रेस को भी मिल सकते हैं। देश अगर प्रभावित होता है तो विज्ञापनों से। उसकी खुद की सोच कभी काम करती, तो शायद छह दशक बाद आजादी का रोना न रो रहा होता।

इस युद्ध में पीआर एजें​सियों की चांदी होने वाली है। जन साधारण का तो पता नहीं। उसको तो उम्मीदों व झूठे वादों का अंबार जरूर मिल सकता है। शाहरुख खान की चैन्ने एक्सप्रेस ने जब बॉक्स आ​फिस पर दो करोड़ बटोरे तो आमिर खान पर तीन सौ करोड़ कमाने का दबाव था। एक समय सफलता व प्रतिष्ठा आपको गुलाम नजर आती है, लेकिन वास्तव में अगर देखें तो यह आपको अपना गुलाम बना लेती है। शीर्ष पाने में दिक्कत कम है, शीर्ष पर बने रहने के लिए दिक्कत ज्यादा।

शीर्ष को बचाने में जीवन खत्म हो जाता है। कहते हैं कि सम्राट की मालिश करने एक नाई आता था, जिसको मालिश के बदले सम्राट एक सिक्का देता था। नाई बहुत खुश रहता था। उसकी खुशी से सम्राट को जलन होने लगी। सम्राट ने अपने वजीर को कहा, उसकी खुशी का कारण बताओ, मुझे उसकी खुशी से जलन होने लगी है। वजीर तेज दिमाग था। रात को नाई के घर पर 99 सिक्कों से भरा थैला फेंक आया। अगली सुबह नाई उठा, उसने सिक्कों से भरा थैला उठाया। गिने तो 99 सिक्के थे। अब नाई ने सोचा, अगर आज एक सिक्का मैं बचाने में सफल हुआ तो मेरे पास 100 सिक्के हो जाएंगे। धीरे धीरे धन का संग्रह हो जाएगा। नाई अब सिक्के जुटाने के लिए सोचने लगा, जो परेशानी का सबब बना। सम्राट उसको परेशान देखकर पूछता है, तुम्हारी परेशानी का कारण तो बताओ। उसने कहा, कुछ नहीं, मैं ठीक हूं। सम्राट ने कहा, पहले जैसी खुशी नहीं है। कहीं वजीर ने तो कुछ नहीं कहा। अब नाई को समझ आया कि उसको जो एक थैला मिला था, वह वजीर द्वारा फेंका गया होगा। इस फेर से बाहर निकला मुश्किल है, जो निकल गया वह खुश हो गया। 

राहुल-कांग्रेस की छवि चमकाने को 500 करोड़ का ठेका

अरविंद केजरीवाल कुछ तो लोग कहेंगे

बड़ी हैरानी होती है। कोई कुछ लेता नहीं तो भी देश के कुछ बुद्धिजीवी सवाल उठा देते हैं, अगर कोई लेता है तो भी। अब आम आदमी मुख्यमंत्री बन गया। वो आम आदमी सुरक्षा लेना नहीं चाहता, लेकिन मीडिया अब उसको दूसरे तरीके से पेश कर रहा है।

सुनने में आया है, अरविंद केजरीवाल ने सुरक्षा लेने से इंकार कर दिया। सुरक्षा के रूप में उसको दस बारह पुलिस कर्मचारी मिलते, लेकिन अब उसकी सुरक्षा के​ लिए सौ पुलिस कर्मचारी लगाने पड़ रहे हैं। अब भी सवालिया निशान में केजरीवाल हैं ?

शायद बुद्धिजीवी लोग घर से बाहर नहीं निकलते या घर नहीं आते। शायद रास्तों से इनका राब्ता नहीं, संबंध नहीं, कोई सारोकार नहीं। वरना,उनको अर​विंद केजरीवाल के शपथग्रहण कार्यक्रम की याद न आती, जहां पर सौ पुलिस कर्मचारियों को तैनात किया गया था। कहते हैं आठ दस से काम चल जाता है, अगर अरविंद सुरक्षा के लिए हां कह देते तो। सच में कुछ ऐसा हो सकता है, अगर हो सकता है तो नरेंद्र मोदी की राजधानी, मेरे घर के पास आकर देख लें।

मोदी गोवा से, दिल्ली, यूपी, बिहार से निकलता है, लेकिन मेरे शहर की सड़कों पर सैंकड़े से अधिक पुलिस कर्मचारी ठिठुरते हैं। मोदी की सुरक्षा के कारण हमको दिक्कत भी है, लेकिन फोकट की अधिक सुरक्षा भी। सड़क के दोनों तरफ पुलिस कर्मचारी होते हैं, मोदी का कोई नामोनिशां नहीं होता। जब मोदी निकलता है तो स्कोर्पियो का काफिला निकलता है, जो बख्तर बंद होता है। क्या इसका खर्च अ​रविंद केजरीवाल की सुरक्षा के लिए तैनात किए पुलिस कर्मचारियों से कम है।

पुलिस कर्मचारी, जनता के सेवक हैं। किसी मुख्यमंत्री या किसी नेता के नहीं। बंदूक रक्षा करती तो राजीव गांधी, इंदिरा गांधी सुरक्षित होती। भय किस बात का। मौत का। मौत ने तो काल को वश में करने वाले रावण को नहीं छोड़ा तो आम आदमी क्या है ? सुरक्षा का जिम्मा किसके हाथों में है, जो आम आदमी है, जिसके परिवार की सुरक्षा ऐसी पुलिस चौं​कियों के छाये में है, जहां चौंकियां तो हैं, पुलिस कर्मी नहीं।

बड़े अजीब हैं बुद्धिजीवी। कथा सुनाते हैं बैल, शिव व पार्वती की। और खुद की भूल जाते हैं। कहते हैं शिव पार्वती बैल पर बैठकर जा रहे थे। तभी रास्ते में दो लोग मिले, कहने लगे दोनों जानवर पर अत्याचार करते हैं। पार्वती ने पत्नी धर्म निभाया और नीचे उतर गई, शिव को बैठे रहने दिया। कुछ आगे गए तो कोई और मिला, उसने कहा, कैसा निर्दयी है, पत्नि चल रही है, आप आराम से बैठकर जा रहा है। शिव भी उतर गए। कुछ दूर गए तो दूसरे लोग मिल गए कहने लगे। यह लोग भी कैसे हैं, पास में सवारी है, लेकिन पैदल चलकर अपने एवं बैल के पैर थका रहे हैं। इससे अच्छा होता तो घर छोड़ आते।

सच में जितने मुंह उतनी बातें। अरविंद केजरीवाल जमाना है कुछ तो कहेगा। मैं भी तो कुछ कह रहा हूं।

लोकपाल बिल तो वॉट्सएप पर पास हो गया था

अन्ना हजारे। आज के गांधी हो गए। ठोको ताली। कांग्रेस व भाजपा समेत अन्य पार्टियों ने लोक पाल बिल पास कर दिया। कहीं, आज फिर एक बार अंग्रेजों की नीति को तो नहीं दोहरा दिया गया। गांधी को महान बनाकर सुभाष चंद्र बोस, शहीद भगत सिंह जैसे किरदारों को दबा दिया गया।

सत्ता पाने की चाह में पागल पार्टियां ​दिल्ली में बहुमत न मिलने की कहानी गढ़ते हुए सरकार बनाने से टल रही हैं। आज भी राजनीतिक पार्टियां भीतर से एकजुट नजर आ रही हैं। शायद वह आम आदमी के हौंसले को रौंदा चाहती हैं, जो आप बनकर सामने आया है।

वह चाहती हैं कि आप गिरे। डगमगाए ताकि आने वाले कई सालों में कोई दूसरा आम आदमी राजनेता को नीचा​ दिखाने की जरूरत न करे। आठ साल से लटक रहा बिल एकदम से पास हो जाता है। अन्ना राहुल गांधी को सलाम भेजता है। उस पार्टी का भी लोक पाल को समर्थन मिलता है, जिसका प्रधानमंत्री उम्मीदवार, बतौर मुख्यमंत्री अब तक अपने राज्य में लोकायुक्त को लाने में असफल रहा है।

मुझे लगता है कि शायद अन्ना ने राहुल गांधी को भेजे पत्र के साथ एक पर्ची भी अलग से भेजी होगी। जिस पर लिखा होगा। क्या एक और अरविंद केजरीवाल चाहिए? राहुल के कान खड़े हुए होंगे। यकीनन उसने वॉट्सएप के जरिए ​पर्ची का डिजीटल संस्करण राजनेतायों के ग्रुप को भेजा होगा।

वहां भी कुछ वैसा ही हुआ होगा। नेताओं ने सोचा होगा। देश में हर चीज के लिए कानून है। लेकिन अपराध कहां रूकते हैं। यहां आज भी ट्रै​फिक सिग्नल टूटते हैं। कानून बनाने से अधिक फर्क नहीं पड़ेगा। जल्द से जल्द पास करवा दो। पास तो वॉट्सएप पर ही हो गया होगा, लेकिन खानापूर्ति के लिए संसदीय कार्यवाही जरूरी है। कानून तो टूट भी सकता है, लेकिन अगर एक और केजरीवाल पैदा होगा तो हमारा बना बनाया चक्रव्यूह टूट जाएगा। भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस से बेहतर तो महात्मा गांधी को बनाए रखना आसान है। क्यूं महात्मा गांधी, सरदार पटेल को गद्दी देने की बजाय नेहरू को सौंपेगा। गांधी अहिंसावादी है। वह सिस्टम के खिलाफ शांति से लड़ता है। तब तक कई साल गुजर जाते हैं। हमारी कई पीढ़ियों का इंतजाम हो जाता है।

लोक पाल बिल पास हो गया। ठोको ताली। आज के बाद ​देश में रिश्वत, घोटाले खत्म हो जाएंगे। हम भ्रष्ट नेताओं से मुक्त हो चुके हैं। कल का इंतजार करें।

ख़त तरुण तेजपाल, मीडिया व समाज के नाम

तरुण तेजपाल, दोष तुम्‍हारा है या तुम्‍हारी बड़ी शोहरत या फिर समाज की उस सोच का, जो हमेशा ऐसे मामलों में पुरुषों को दोष करार दे देती है, बिना उसकी सफाई सुने, मौके व हालातों के समझे। इस बारे में, मैं तो कुछ नहीं कह सकता है, लेकिन तुम्‍हारे में बारे में मच रही तहलका ने मुझे अपने विचार रखने के लिए मजबूर कर दिया, शायद मैं तमाशे को मूक दर्शक की तरह नहीं देख सकता था। मीडिया कार्यालयों, वैसे तो बड़ी बड़ी कंपनियों में भी शारीरिक शोषण होता, नहीं, नहीं, करवाया भी जाता है, रातों रात चर्चित हस्‍ती बनने के लिए।

लूज कपड़े, बोस को लुभावने वाला का मैकअप, कातिलाना मुस्‍कान के साथ बॉस के कमरे में दस्‍तक देना आदि बातें ऑफिस में बैठे अन्‍य कर्मचारियों की आंखों में खटकती भी हैं। मगर इस शारीरिक शोषण या महत्‍वाकांक्षायों की पूर्ति में अगर किसी का शोषण होता है तो उस महिला या पुरुष कर्मचारी का, जो कंपनी को ऊपर ले जाने के लिए मन से काम करता है।

जब तक डील नो ऑब्‍जेक्‍शन है, तब तक मजे होते हैं, जिस दिन डील में एरर आने शुरू होते हैं, उस दिन विवाद होना तय होता है, जैसे आपके साथ हुआ। विवाद दब भी जाता, लेकिन तेरी शोहरत तुम्‍हें ले बैठी। मीडिया हाउस, तुम्‍हारे तहलकिया अंदाज से डरने लगे थे, तुम्‍हारी हिन्‍दी पत्रिका पांच साल पूरे कर चुकी है व पाठक निरंतर बढ़ रहे हैं। वैसे तुमने सही लिखा, परिस्‍थितियां सही नहीं थी, मेल से हुए खुलासे के अनुसार। मुझे भी कुछ ऐसा लगता है, क्‍यूंकि जहां हादसा हुआ, वह जगह भाजपा की है, तुम तो भाजपा के पहले शिकार हो, वो चूक कैसे कर सकती थी।

एक वेबसाइट पर प्रकाशित मेल पढ़ी, जिसमें आप दोनों के बीच की बात है, जिसको एक वेबसाइट ने प्रकाशित किया। उसमें लड़की कहती है कि तुम अक्‍सर उससे शारीरिक संबंधों से जुड़े मामलों पर बात करते थे, वो उन विषयों से भागना चाहती थी। इसमें शक नहीं होगा, आप में ऐसा होता होगा, लेकिन हैरानी तो इस बात से है कि वह फिर भी तुम्‍हारे ऑफिस में बने रहना चाहती थी, क्‍यूं, जब तुम्‍हारी सोच से वह अच्‍छी तरह परिचित हो चुकी थी। यह बात तो आम महिला भी समझ जाती है कि जहां शराब, शबाब एवं दिमाग खराब एकत्र होंगे, वहां हादसा तो होना ही है, लेकिन एक दूरदृष्‍टि रखने वाली महिला संवाददाता हालातों को भांप नहीं पाई, हद है।

मीडिया, मीडिया वाले के पीछे पड़ गया। इसलिए नहीं कि वहां पर महिला कर्मचारी के साथ शारीरिक शोषण हुआ, बल्‍कि इसलिए कि सामने वाले को इतना शर्मिंदा कर दिया जाए कि वह उठने लायक न बचे। भले ही, अदालती फैसले आने में देर है। पुलिसिया काईवाई शुरू हुई है। महिला ने आरोप लगाए हैं, सत्‍य साबित होने में वक्‍त है, मगर मीडिया स्‍वयं जज बनकर बैठा है, सिर्फ टीआरपी के चक्‍कर में। नहीं, नहीं, अपने एक प्रतिद्वंद्वी को खत्‍म करने के चक्‍कर में भी।

समाज। बड़ा अजीब है समाज। इतने सारे राम। हर आदमी के अंदर राम है, लेकिन ऐसे मामले में स्‍वयं को एक झटके में राम से अलग कर देता है। वह इतनी जल्‍दी भूल जाता है कि कभी कभी महिला का भी दोष हो सकता है। समाज हूं, भावनायों में बहता हूं। नहीं, नहीं, आजकल तो फेसबुक के प्रवाह में बहता हूं। मुझे कुछ पता नहीं होता, मैं तो उस घटना के समीप भी नहीं होता, जो घटना बंद कमरे में घटती है, दो लोगों के बीच घटती है।

मैं तो बस महिला की सुनता हूं। मेरी आदत है। आम ही देखा होगा, सड़क पर जाते हुए दंपति अचानक मोटर साइकिल से गिरता है। मैं दौड़े दौड़े जाता हूं, महिला को पकड़ कर उठाने की कोशिश्‍ा करता हूं, पुरुष तो खड़ा हो जाएगा। मैं महिला को कमजोर समझता हूं, या मेरा उसके प्रति आकर्षण है, यह बात मैं नहीं जानता, लेकिन मैं समाज हूं। मुझे पता है, वह महिला हमेशा स्‍वयं को दुर्बल कमजोर बताएगी, भले ही ऐसे मौकों पर मैं उसके पक्ष में खड़ता हूं। मैं समाज हूं।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र । पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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राहुल गांधी : तुम आये तो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला

राहुल गांधी, युवा चेहरा। समय 2009 लोक सभा चुनाव। समय चार साल बाद । युवा कांग्रेस उपाध्‍यक्ष बना पप्‍पू। हफ्ते के पहले दिन कांग्रेस की मीडिया कनक्‍लेव। राहुल गांधी ने शुभारम्‍भ किया, नेताओं को चेताया वे पार्टी लाइन से इतर न जाएं। वे शालीनता से पेश आएं और सकारात्‍मक राजनीति करें। राहुल गांधी का इशारा साफ था। कांग्रेसी नेता अपने कारतूस हवाई फायरिंग में खत्‍म न करें। राहुल गांधी, जिनको ज्‍यादातर लोग प्रवक्‍ता नहीं मानते, लेकिन वे आज प्रवक्‍तागिरी सिखा रहे थे।

दिलचस्‍प बात तो यह है कि राहुल गांधी ख़बर बनते, उससे पहले ही नरेंद्र मोदी की उस ख़बर ने स्‍पेस रोक ली, जो मध्‍यप्रदेश से आई, जिसमें दिखाया गया कि पोस्‍टर में नहीं भाजपा का वो चेहरा, जो लोकसभा चुनावों में भाजपा का नैया को पार लगाएगा। सवाल जायजा है, आखिर क्‍यूं प्रचार समिति अध्‍यक्ष को चुनावी प्रचार से दूर कर दिया, भले यह प्रचार लोकसभा चुनावों के लिए न हो। कहीं न कहीं सवाल उठता है कि क्‍या शिवराज सिंह चौहान आज भी नरेंद्र मोदी को केवल एक समकक्ष मानते हैं, इससे अधिक नहीं। सवाल और विचार दिमाग में चल रहे थे कि दूर से कहीं चल रहे गीत की धुनें सुनाई पड़ी, ‘तुम आये तो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला, जाने कितने दिनों के बाद, गली में आज चाँद निकला’ चांद से याद आता है राहुल गांधी का चेहरा, जो कुछ महीने पहले जयपुर में नजर आया था, और आज सोमवार को नजर आ रहा है। शायद दूर कहीं ये गीत सही वक्‍त पर बजा रहा है। काश यह गीत राहुल गांधी के समारोह के आस पास बजता तो राहुल आज की होट स्टोरी होते।

राहुल गांधी ने जमीनी राजनीति पर उतर कर बेटिंग करने को कहा। यकीनन कांग्रेस के लिए यह बहुत बेहतरीन सुझाव है, वैसे भी कहते हैं कि सुबह का भूला शाम को घर आए तो उसको भूला नहीं कहते, अगर कांग्रेस आज भी अपने ग्रामीण क्षेत्र के वोटरों को संभाल ले तो हैट्रिक लगा सकती है। कांग्रेस ने जयपुर में मंथन किया था, शायद वे जमीनी नहीं था। अगर होता तो कांग्रेस अपने कारतूसों को हवाई फायरिंग में खराब करने से बेहतर सही दिशा में खर्चती। कांग्रेस के दामन में दाग बहुत हैं, लेकिन कांग्रेस अपनी योजनाओं के सर्फ एक्‍सल से धो सकती है।

कांग्रेस केंद्र में है। उसके द्वारा शुरू की गई, योजनाएं एक अच्‍छी पहल हैं। केंद्र सरकार ने इन योजनाओं को लागू करने के लिए करोड़ों रुपए राज्‍य सरकारों को दिए, लेकिन राज्‍य सरकारों की गड़बड़ियों के कारण योजनाएं पिट गई, और दोष पूरा कांग्रेस के सिर मढ़ दिया गया। मिड डे मिल, जो आज चर्चा का कारण है, क्‍या उसमें केंद्र का दोष है ? नहीं, दोष है राज्‍य सरकारों का जो उसको अच्‍छी तरह से लागू नहीं कर पा रही। मनरेगा, रोजगार की गारंटी भी निश्‍चत एक अच्‍छी पहल है, लेकिन राज्‍य सरकारों की अनदेखी के कारण धूल फांक रही है, बदनामी की कल्‍ख कांग्रेस के माथे, हालांकि कुछ घोटालों के आरोपी नेता या मंत्री जेल की हवा तक खा चुके हैं।

कांग्रेस की समस्‍या है कि वे सोशल मीडिया को समझ नहीं पा रही। दरअसल कांग्रेस पुराने ढर्रे पर चल रही है, और भाजपा इस कमजोरी का फायदा उठाते हुए पूरी तरह सोशल मीडिया को कैप्‍चर कर रही है। कहते हैं कि सोशल मीडिया 160 लोकसभा सीटों को प्रभावित करता है। उसकी पहुंच 12 करोड़ भारतीयों तक है। मगर सोशल मीडिया पर एक बाज की नजर है, जो देश के 80 करोड़ लोगों तक पहुंच बनाए हुए है। जी हां, इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया। आज देश का इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया, मोदी की ब्रांडिंग कर रहा है। कांग्रेस किसी सहमे हुए बच्‍चे की तरह, डरी हुई किसी कोने में खड़ी पूरा तमशा देख रही है।

उसके कई कारण हैं। सबसे पहले कांग्रेस के पास एक दमदार प्रवक्‍ता नहीं। राहुल गांधी युवा पीढ़ी को प्रेरित करता था, लेकिन पिछले कुछ समय से उसकी चुप्‍पी ने युवा पीढ़ी को निराश किया, और युवा पीढ़ी का बहाव नरेंद्र मोदी की तरफ ऑटोमेटिक मुड़ गया। नरेंद्र मोदी के पास राजनीति में लम्‍बा संघर्ष, एक आदर्श राज्‍य की पृष्‍ठभूमि, 11 साल का नेतृत्‍व अनुभव है। राहुल के पास एक मां है, जो उसकी दादी की तरह दमदार प्रवक्‍ता नहीं। संप्रग के पास प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह है, जिसको लोग कथित तौर पर सोनिया गांधी संचालित टेलीविजन कहते हैं। जब भी उनसे राहुल गांधी के पीएम बनने के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब एक था आज कहो, आज पीछे हट जाता हूं, मतलब साफ है, वे केवल मास्‍क हैं।

राहुल गांधी की कलावती पटकथा हिट हुई तो युवा आइकन बन गए। कलावती के बाद राहुल गांधी की कोई पटकथा हिट नहीं हुई। उसका प्रभाव खत्‍म होने लगा। सोशल मीडिया ने उसको पप्‍पू करार दे दिया। राहुल गांधी ने जो कदम आज उठाया है, उस बच्‍चे की तरह, जो पेपरों से कुछ दिन पहले तैयारी करने बैठता है, नतीजा जो भी आए, अगर राहुल का मंत्र सफल हुआ तो शायद 2014 में अख़बारों की सुर्खियां यह शीर्षक बन सकता है ‘पप्‍पू पास हो गया”।

ईद के चांद की तरह नजर आने वाला राहुल गांधी शायद आम चांद की तरह नजर आए, और जो सोच वे कभी कभी जनता के सामने रखते हैं, वे प्रत्‍येक दिन रखे, हफ्ते, महीने में रखे तो स्‍थितियां बदल सकती हैं।

और वे गीत भी शायद कभी इतना रिलेवेंट न लगे, जो आज कहीं दूर से कानों में पड़ रहा है, जख्‍म फिल्‍म का पूजा भट्ट पर फिल्‍माया गया गीत ”तुम आये तो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला जाने कितने दिनों के बाद, गली में आज चाँद निकला”

राजनाथ सिंह, नरेंद्र मोदी और भाजपा की स्‍थिति

''राह में उनसे मुलाकात हो गई, जिससे डरते थे वो ही बात हो गई''  विजय पथ फिल्‍म का यह गीत आज भाजपा नेताओं को रहकर का याद आ रहा होगा, खासकर उनको जो नरेंद्र मोदी का नाम सुनते ही मत्‍थे पर शिकन ले आते हैं।

देश से कोसों दूर जब न्‍यूयॉर्क में राजनाथ सिंह ने अपना मुंह खोला, तो उसकी आवाज भारतीय राजनीति के गलियारों तक अपनी गूंज का असर छोड़ गई। राजनाथ सिंह, भले ही देश से दूर बैठे हैं, लेकिन भारतीय मीडिया की निगाह उन पर बाज की तरह थी। बस इंतजार था, राजनाथ सिंह के कुछ कहने का, और जो राजनाथ सिंह ने कहा, वे यकीनन विजय पथ के गीत की लाइनों को पुन:जीवित कर देने वाला था।

दरअसल, जब राजनाथ सिंह से पीएम पद की उम्‍मीदवारी के संबंधी सवाल पूछा गया तो उनका उत्तर था, मैं पीएम पद की उम्‍मीदवारी वाली रेस से बाहर हूं। मैं पार्टी अध्‍यक्ष हूं, मेरी जिम्‍मेदारी केवल भाजपा को सत्ता में बिठाने की है, जो मैं पूरी निष्‍ठा के साथ निभाउंगा। यकीनन, नरेंद्र मोदी आज सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं, अगर भाजपा सत्ता हासिल करती है तो वे पीएम पद के उम्‍मीदवार होंगे।

दूर देश में बैठे राजनाथ सिंह को इस बात का अंदाजा भी नहीं होगा, ऐसे कैसे हो सकता है कि उनके मुंह से निकले यह शब्‍द भारत में बैठे उनके कुछ मित्रों को अग्‍निबाण से भी ज्‍यादा नागवार गुजरेंगे। क्‍यूंकि भूल गए वे गोवा बैठक के बाद की उस हलचल को, जो एलके आडवाणी के इस्‍तीफे से पैदा हुई थी।

भारतीय मीडिया के बीच अक्‍सर इस बात संबंधी पूछे सवाल पर पार्टी बैठकर फैसला करेगी कह निकले वाले राजनाथ सिंह क्‍यूं भूल गए कि आज का मीडिया सालों पुराना नहीं, जो ख़बर को प्रकाशित करने के लिए किसी बस या डाक खाने से आने वाले तार का इंतजार करता रहेगा, आज तो आपने बयान दिया नहीं कि इधर छापकर पुराना, और चलकर घिस जाता है।

राजनाथ सिंह, ने पहले पत्ते दिल्‍ली की बजाय गोवा में खोले, शायद राजनाथ सिंह ने उनके लिए विकल्‍प खुला रखा था, जो इस फैसले से ज्‍यादा हताश होने वाले थे, क्‍यूंकि तनाव के वक्‍त खुली हवा में सांस लेना, टहलना, बीच के किनारे जाकर मौज मस्‍ती करना बेहतर रह सके।

अब वे न्‍यूयॉर्क पहुंचकर अपने पत्‍ते खोलते हैं, ताकि उनके भारत लौटने तक पूरा मामला किसी ठंडे बस्‍ते में पड़ जाए, और वे नरेंद्र मोदी को दिए हुए अपने वायदे पर कायम रह सकें। शायद अब तो सहयोगी पार्टियों को अहसास तो हो गया होगा कि नरेंद्र मोदी के अलावा भाजपा के पास 2014 के लिए कोई और विकल्‍प नहीं है।

अगर अब भी किसी को शक है तो वे अपना भ्रम बनाए रखे, क्‍यूंकि भ्रम का कोई इलाज नहीं होता, और अंत आप ठंडी सांस लेते हुए पानी की चंद घूंटों के साथ, कुर्सी पर पीठ लगाकर गहरी ध्‍यान अवस्‍था में जाकर, विजय पथ के उस गीत को आत्‍मसात करें, ''राह में उनसे मुलाकात हो गई, जिससे डरते थे वो ही बात हो गई''।

घोष्ट राइंटिंग - हमें सोचना होगा

'पाखी' पत्रिका ने महुआ माजी के द्वारा लिखे गए उपन्यास की चोरी का विवाद खड़ा किया उससे बहुत सारे प्रश्न उठते हैं। अंग्रेजी में भी ऐसी घटनाओं के कारण बहसें हुई हैं और लेखन की मौलिकता संदेह के घेरे में आयी और उन्हें रचनाकार की सम्मानित सूची से हटा दिया गया।

लेकिन हिंदी में यह ताजा प्रकरण इसलिए महत्वपूर्ण है कि पिछले दिनों लेखन में महत्वाकांक्षियों की एक पूरी फौज आ गयी है और वे साहित्य के इतिहास में 'महान्' हो जाना चाहते हैं। इसमें फिर चाहे तन, मन के अलावा धन ही क्यों न लगाना पड़ें। इसमें पत्रिका के सम्पादकों के साथ एक गठजोड़ की भूमिका भी देखी जानी चाहिए। कई बार प्रकाशकों के साथ इस गठजोड़ की भूमिका की जांच भी की जा सकती है।

पश्चिम में तो अब आलोचक की हैसियत रही नहीं कि उसके 'कहे बोले' गए से कोई लेखक महान हो जाए या उसकी महानता की चौतरफा स्वीकृति हो जाए। वहां प्रकाशनगृह ही लेखक पैदा करते हैं वे ही उन्हें महान भी बनाते हैं। अब माना जा रहा है कि यह सिलसिला यहां हिंदी में भी चल पड़ा है।

आलोचक का प्रभाव धुंधला गया है और प्रकाशक ही अब लेखक को 'आइकनिक' बना सकता है। हिंदी में ऐसे कई उदीयमान और चम‍कीले लेखक हो रहे हैं, जो वे किसी न किसी के डंडे पर चढ़कर, झंडे की तरह लहरा सकने की स्थिति में आ गए हैं। लिखने-पढ़ने की बिरादरी वाले लोगों के बीच

होने के नाते हम भी जानते हैं कि प्रभु जोशी ने न केवल कुछेक घोष्ट पेंटर बना दिए हैं बल्कि घोष्ट कहानीकार भी। अब वे ही घोष्ट खूब छप रहे हैं और पुरस्कार हथिया रहे हैं। और भी कोई प्रभु हो सकता है। ऐसी स्थिति इसलिए भी बनने लगी है कि पत्रिकाओं की तादाद बढ़ी और लेखक संघों का भी विघटन हो चुका है। इसलिए अब गुट है। गुटों की अपनी अपनी पत्रिकाएं हैं। अपने अपने लेखक है ही, पत्रिका के अपने अपने महान है। ऐसे महान भी हैं जो ‍किसी न किसी की 'घोष्ट राइंटिंग' के कारण सांस ले रहे हैं।

सवाल यह उठता है कि क्या हम अब यह मान लें ‍कि भारत का साहित्य मर गया है? उसकी मौलिकता के कोई मायने नहीं? अब साहित्य का भी राजनीति की तरह पतन हो चुका है? क्या ऐसे माहौल में हम कभी अमेरिकन और रशियन के समकक्ष खड़े हो पाएंगे? वह कौन सी वहज है जिसके

कारण हम भारत के साहित्य और साहित्यकारों को महान मानकर अपना आदर्श बनाएं, जबकि साहित्य भी अब बाजार की राह पर चल पड़ा है।

लेखक - अनिरुद्ध जोशी, वेब दुनिया हिन्‍दी डॉट कॉम,