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कहो..... भीड़ नहीं हम.....

आस पास के लोगों से..... सतर्क हो जाइए..... क्‍योंकि पता नहीं कौन सा नकाबपोश..... काले धन का मालिक हो..... मखौटों के इस दौर में सब फर्जी हैं..... हां..... मैं..... आप..... हम सब फर्जी हैं।

चौंकिए मत..... सच है.....। कबूतर की तरह आंखें भींचने से क्‍या होगा?.....। याद कीजिए..... 35 लाख का घर..... और 22 लाख के दस्‍तावेज..... आखिर किसने बनवाये। बेरोजगार बेटे बेटी को 3 से 5 लाख रिश्‍वत देकर..... सरकारी नौकरी किसी ने दिलवाई.....। आखिर कौन पूछता है..... दामाद ऊपर से कितना कमा लेता है.....।

ऐसे ही तो..... जमा होता है काला धन..... काले धन वाले भी..... तो शामिल हैं ईमानदारों में..... और नोटबंदी का करते हैं जमकर समर्थन..... कहते हैं..... मिट जाएगा काला धन..... और खत्‍म होगी रिश्‍वतखोरी..... हां..... स्‍लीपर सैल की तरह..... हम में भी..... कहीं न कहीं..... छुपे बैठे हैं चोर.....

दम है तो पकड़िये..... रिश्‍वत लेते..... जो पकड़ा गया..... रिश्‍वत देकर छूट जाएगा..... सड़क पर ट्रैफिक वाला रसीद काटता है..... तो आप बड़े आदमी को फोन लगा लेते हैं..... ईमानदार कर्मचारी की बैंड खूब बजती है..... और तमाश देखते हैं हम सब.....

ट्रैफिक सिग्‍नल पर खड़ा शहरी 60 सैकेंड इंतजार नहीं कर सकता..... लेकिन..... गरीबों को लाइन में लगने पर खूब ज्ञान उड़ेल रहा है.....

युवान बेटा पिता के कहने पर बिजली का बिल भरने नहीं जाता..... कहीं..... लाइन बड़ी हुई तो डार्लिंग बुरा मान जाएगी..... फेसबुक पर उस गरीब को ज्ञान बांटता है..... जो 14 घंटे मजदूरी करता है..... और मिलता है बाबा जी ठुल्‍लू.....

बुरा तो लगता है..... कड़वी बात का..... जो कल तक..... मोदी की नोटबंदी का..... सबसे बड़ा समर्थक था..... पकड़ा गया बड़े नोटों के साथ.....

सब चुप रहेंगे..... कोई नहीं बोलेगा..... क्‍योंकि..... सच बोलने के लिए..... नकाब हटाने होंगें..... अपने स्‍वार्थों की बलि..... देनी होगी.....। इसलिए..... जो चल रहा..... चलने दें..... तमाशा देखें..... क्‍योंकि..... तमाशबीन हैं हम.....

125 करोड़ जनता..... 11 क्रिकेटर..... जमकर देखते हैं..... गाली निकालते हैं..... जीते तो जश्‍न मनाते हैं..... पर्दे पर अजय मेहरा देखकर..... खून खौलने लगता है..... घर आते आते..... थका हरा घसीट पीटा आम आदमी..... भीतर से निकलता है..... जैसे अदालीन के चिराग से जिन्‍न.....

हम को अचानक..... बोलने वाला प्रधानमंत्री मिलता है..... हम खुशी के मारे झूम उठते हैं..... क्‍योंकि..... हम बोल नहीं सकते..... कोई तो आया बोलने वाला.....

फिर अचानक..... बोलना भी..... सिरदर्द करने लगता है.....

फिर..... आशावाद..... फिर..... चलो देखते हैं..... और फिर..... मैं..... आप..... सब..... तमाशबीन हो जाते हैं.....

तमाशबीन होने का भी..... अपना ही एक मजा है.....

टीवी के सामने बैठकर..... सचिन को शॉट मारना सिखाते हैं..... फिल्‍म निर्देशक को..... निर्देशन के गुर..... किसी लड़ने वाले को..... नायक से खलनायक..... खलनायक से नायक बनाते हैं.....

कोई चौपालों में..... कोई ड्राइंग रूम में..... कोई चाय के गल्‍ले पर बैठकर..... देश बदल रहा है..... पान मसाले का पीक..... मुंह से थू थू हुए..... स्‍वच्‍छता का ज्ञान झाड़ा जा रहा है..... सुन रहे हैं हम..... क्‍योंकि..... तमाशबीन हैं हम

असल जीवन में..... काले को सफेद करने की दौड़..... सोशल मीडिया पर..... ज्ञान खूब बघारा जा रहा है..... किसका दामन..... कितना मैला..... हर कोई..... लिए प्रमाण पत्र..... घूम रहा है.....

कांग्रेस के दौर में..... शहीद हुए तो एक के बदले दस..... भाजपा के दौर में शहीद हुए..... तो सवाल मत पूछिए..... रैलियों में सुर ऊंचा है..... संसद में सिर नीचा है.....

क्‍यों नहीं..... हम नेता चुनते..... क्‍यों..... हर बार हम..... कांग्रेस..... बीजेपी..... चुनें..... क्‍यों नहीं..... हम सरकार से..... तीखे सवाल करते..... चाहे कांग्रेस की हो..... चाहे बीजेपी की हो.....

क्‍यों नहीं..... हर सवाल हमारा मौलिक होता..... क्‍यों..... हम पढ़े लिखे होने के बाद भी..... कॉपी पेस्‍ट..... नकल करते हैं..... सभ्‍य समाज हैं..... फिर भी..... चर्चा नहीं..... बहस करते हैं..... तर्क नहीं दे पाते..... तो गाली गालौच करते हैं.....

भीड़ नहीं तो..... क्‍या हैं हम..... एक ने लिखा..... चोर..... तो हम भी..... लिखते हैं..... चोर..... इंटरनेट है..... पर तथ्‍य..... क्‍यों नहीं खोजते हम..... पढ़े लिखे हैं हम..... यह क्‍यों नहीं सोचते..... एक ही वीडियो..... कभी कांग्रेस का हो जाता है..... कभी भाजपा का..... और अंधे हम..... करते हैं..... फॉरवर्ड..... फॉरवर्ड..... फॉरवर्ड.....

कहो..... भीड़ नहीं हैं हम..... बताओ..... भेड़ नहीं हम..... युवा हैं हम..... किसी के गुलाम नहीं हम..... बीरबलता नहीं..... नचिकेतता चाहिये हमें..... बुरे हैं तो बुरा कहो..... सच्‍चे हैं तो सच्‍चे कहो..... झूठ के लिबास में..... तारीफ नहीं चाहिये.....

कहो..... भीड़ नहीं हम.....

और तो कुछ पता नहीं, लेकिन लोकतंत्र ख़तरे में है

जहां लोकतंत्र में सत्‍ता और विपक्ष रेल की पटरी सा होता है। तो वहीं, लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था एक रेल सी होती है। यदि दोनों पटरियों में असंतुलन आ जाए तो पटना इंदौर एक्‍सप्रेस सा हादसा होते देर नहीं लगती, सैंकड़ों जिंदगियां पल भर में खत्‍म हो जाती हैं। और पीछे छोड़ जाती हैं अफसोस कि काश! संकेतों पर गौर कर लिया होता। वक्‍त रहते कदम उठा लिये गए होते।

ये संकेत नहीं तो क्‍या हैं कि देश सिर्फ एक व्‍यक्‍ति पर निर्भर होता जा रहा है। देश में विपक्ष की कोई अहमियत नहीं रह गई। सत्‍ता पक्ष के खिलाफ बोलना अब देशद्रोह माना जाने लगा है। किसी सरकारी नीति की आलोचना करने का साहस करने पर आपको बुरा भला कहा जाता है।

दिलचस्थ तथ्‍य तो देखो कि भारत बंद की घोषणा होने के साथ ही सत्‍ता पक्ष की तरफ से कुछ दुकानों पर एक सरीखे नारे लिखे बोर्ड या बैनर टांग दिये जाते हैं। हर आदमी के गले में कड़वी बात को उतारने के लिए सेना और देशभक्‍ति का शहद की तरह इस्‍तेमाल किया जा रहा है, ताकि कड़वाहट महसूस न हो।

पहले तो ऐसा नहीं होता था, सरकार के खिलाफ भारत बंद भी होते थे। जो लोग आज सत्‍ता में हैं, वो ही लोग लठ लेकर निकला करते थे। कोई प्‍यार से बंद करे तो ठीक, नहीं तो लठवाद जिन्‍दाबाद। सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करने पर कोई किसी को देशद्रोही की संज्ञा तो नहीं देता था।

याद ही होगा, गुजरात के तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ से पहले संसद की चौखट पर शीश रखते हुए पूरे देश को भावुक कर दिया था। दरअसल, राजनीति में ऐसा ड्रामा आज तक किसी ने देखा नहीं था। ड्रामा इसलिए कह रहे हैं क्‍योंकि पिछले कई दिनों से उसी मंदिर से आवाज आ रही है कि आओ प्रधान सेवक आओ, जवाब दो हमारे सवालों के, चर्चा करो हमसे, हम भी जन-प्रतिनिधि हैं। लेकिन, प्रधान सेवक रॉक कंसर्ट को संबोधित करने में व्‍यस्‍त हैं, रैलियों में विपक्ष को काले धन का मालक बताने में व्‍यस्‍त हैं।

जो कड़वी दवा जल्‍दबाजी में दे बैठें हैं, कहीं जनता बाहर न निकाल दे, इसलिए आंसुओं व देशभक्‍ति का शहद मिलाकर निगल जाने के लिए प्रेरित करने में व्‍यस्‍त हैं। बड़ी अजीब बात है कि रैलियों से बैंक की कतारों में खड़े लोगों की तुलना सैनिक से तो कर रहे हैं, लेकिन, मन की बात प्रोग्राम में एक भी बैंक की कतार में शहादत पाए गए व्‍यक्‍ति को याद नहीं किया, और दो आंसू तक आंख से नहीं टपकाए।

आंसू टपके तो इस बात पर वो लोग मुझे नहीं छोड़ेंगें, मुझे मार देंगें। मगर, देश के प्रधान सेवक ने सदन में जाकर उन धमकाने वालों का नाम नहीं बताया, जो उनको नहीं छोड़ेंगें, जो उनको मार देंगें। विपक्ष पूछता रहा, यदि ऐसा है तो पूरा भारत आपके साथ है। लेकिन, अफसोस कि सदन में मौन है, देश का पहला बोलने वाला प्रधान मंत्री।

बहुत कम लोगों को याद होगा कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी मार्च 2016 में सदन के अंदर जबरदस्‍त वक्‍तव्‍य में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के बयान (देश में सरकारें तो आती जाती रहती हैं, लेकिन देश चलना चाहिए) की नकल करते हुए विपक्ष को महानुभवियों की संज्ञा दी थी। मगर, अफसोस कि नवंबर 2016 आते आते प्रधान मंत्री अपने ही बयान को भूल गये और उसी विपक्ष को काले धन के मालिक करार दे दिया।

अब स्‍थिति ऐसी हो चली है कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के कार्य पर उंगुली उठाना भी देशद्रोह है। हाल में ही, जब देश की सर्वोच्‍च अदालत ने सरकार से पूछा कि यदि आप भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़ने को तैयार हो तो अभी तक लोकपाल की नियुक्‍ति क्‍यों नहीं की? तो नरेंद्र मोदी समर्थक न्‍यायपालिका पर टूट पड़े और पूछा डाला कि अभी तक जो इतने केस लंबित पड़े हैं, उनका क्‍या? अजीब लोकतंत्र है कि अदालतों में जजों की नियुक्‍ति को लेकर भी सरकार और न्‍यायपालिका में ठनी हुई है।

देश में स्‍थिति ऐसी हो चुकी है कि जो नरेंद्र मोदी कहें वो ही सही है। कोई किंतु परंतु करने की जरूरत नहीं। हर बात को सेना से जोड़ा दिया जाता है क्‍योंकि पीआर जो नरेंद्र मोदी को कथित तौर पर संचालित करते हैं, वे अच्‍छी तरह जानते हैं कि किसी भी देश का नागरिक अपनी सेना का अपमान नहीं करेगा। भले ही, भारतीय जनता पार्टी के नेता भारतीय करंसी पर पैर रखकर काले धन की स्‍वच्‍छता का अभियान चलाएं, इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।

लोकतंत्र में एक व्‍यक्‍ति पर केंद्रित होना और देश के हर मामले में सेना के कंधे का इस्‍तेमाल ख़तरे की घंटियां हैं। इतना ही नहीं, आज विपक्ष बोल नहीं सकता, आज न्‍याय पालिका बोल नहीं सकती, आज मीडिया का एक तबका सरकार के खिलाफ एक शब्‍द लिख नहीं सकता।

चुटकला - 
मैं ट्रेन में सफर कर रहा था। 
मैंने बगल में बैठे व्‍यक्‍ति से कहा, 'यार कितनी ठंड पड़ रही है ना।'
तो अगले डिब्‍बे से आवाज आती है, 'क्‍या कांग्रेस के समय से ठंड नहीं होती थी?'

जब देश में ऐसे चुटकले प्रचलन में आ जाए तो एक बात अच्‍छे से समझ लेनी चाहिये कि लोकतांत्रिक देश यकीनन एक गलत दिशा में अग्रसर हो रहा है।

पहले देश हिन्‍दु मुस्‍लिम के आधार पर दो हिस्‍सों में बंट रहा था। अब देश देशभक्‍त और देशद्रोही के रूप में बंट रहा है। जो कल तक भारत बंद पर लाठियां लेकर निकलते थे, तोड़ फोड़ करते थे, आज उनके हाथों में मिठाईयां थीं। चलो मान लिया हमने कि देश बदल रहा है। जाने अनजाने में ही सही, लेकिन लोकतंत्र की पटरी से उतर रहा है।

Standpoint - 'हिंदु परिषद' के आगे 'विश्व' क्यूं ?


आप सोच रहे होंगे। यह अटपटा सवाल क्यूं ? बिल्कुल मुझे भी 'विश्व' अटपटा लगता है, जब मैं इस संस्थान के प्रमुख के बयानों को सुनता हूं। देखता हूं या कहीं पढ़ता हूं।

बड़ी अजीब बात है कि आप भारत को एक कट्टर देश बनाने की सोच रखते हैं, लेकिन शब्द विश्व जैसा इस्तेमाल करते हैं। अगर आप भारत को सीमित रखना चाहते हैं, तो सच में 'विश्व' जैसा शब्द एक देश की ऐसी संस्था को शोभा नहीं देता।

यह शब्द वैसा ही है, जैसा दक्षिण भारत की एक राजनीतिक पार्टी indian christian secular party में 'सेकुल्यर'शब्द है। अगर सेकुल्यर हो तो क्रिचियन शब्द क्यूं ? वैसे ही अगर विश्व हिन्दु परिषद भारत को हिन्दु राष्ट्र बनाना चाहती है तो राष्ट्र शब्द स्टीक हो सकता है, लेकिन विश्व शब्द नहीं क्यूंकि राष्ट्र को विश्व की संज्ञा नहीं दी जा सकती।

31 मार्च 2013 को 'हिंदु संगम' समारोह का आयोजन हुआ। इस समारोह में विश्व हिंदु परिषद के प्रमुख प्रवीण तोगड़िया ने कहा था, ''2015 के बाद गुजरात को हिन्दु राज्य घोषित कर दिया जाएगा, क्यूंकि 18000 गांवों में विहिप की मौजूदगी हो जाएगी।''

एक अन्य ख़बर भी आई थी, जिसमें उन्होंने कहा था, अगर मैं ​देश का प्रधानमंत्री बना तो मुस्लिम समुदाय से मतदान का अधिकार छीन लूंगा। मुझे लगता है​ कि इस देश में लोकतंत्र का वो आखिर दिन होगा क्यूंकि उस दिन भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्रिक व्यवस्था वाला देश न रह जाएगा। शायद भारत में उस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी छीन जाएगी। जिसकी लाठी, उसकी भैंस की कहावत जैसी व्यवस्था बचेगी।

एक ताजे घटनाक्रम के अनुसार भावनगर में विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया ने चुनावी मौसम में मुसलमानों को निशाना बनाया है। तोगड़िया ने मुसलमानों को चेतावनी देते हुए कहा है कि वे हिंदू बहुल इलाकों से घर खाली करें। गुजरात के भावनगर में तोगड़िया ने शनिवार रात को विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर एक मुस्लिम बिजनेसमैन के घर के बाहर हंगामा भी किया। इस मुस्लिम बिजनेसमैन ने हिंदू बहुल क्षेत्र में हाल ही में घर खरीदा है। वीएचपी और बजरंग दल ऐसे सौदों का विरोध कर रहे हैं। तोगड़िया ने मुस्लिम बिजनेसमैन को 48 घंटों के भीतर खाली करने की धमकी दी और कहा यदि ऐसा नहीं किया गया तो उनके दफ्तर पर पत्थर, टायर और टमाटरों से हमला किया जाएगा। तोगड़िया ने हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं से कहा कि वे इस घर को अपने कब्जे में ले लें और इस पर बजरंग दल का बोर्ड टांग दें।

यह घटनाक्रम गुजरात का है। जहां मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जो बीजेपी की तरफ से पीएम पद के उम्मीदवार हैं, जो मुस्लिम समुदाय को साथ लेकर चलने का भरोसा दिला रहे हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों हाथों में अब लड्डू कैसे रखेंगे, जैसे वो रैलियों में कहते आए हैं। आरएसएस व विहिप की नजदीकियां किसी से छुपी नहीं, और आरएसएस का ही एक चेहरा बीजेपी है। 2015 तक गुजरात को हिन्दु राज्य घोषित करने का ऐलान भी अहमदाबाद शहर में हुआ। शायद इस मामले में गुजरात के मुख्यमंत्री को अपना स्टेंड क्लीयर करना चाहिए।

नफरत की आंधी में भारत ने हमेशा अपना गौरव खोया है। नफरत से पैदा हुए दंगों में मरने वाले चाहे हिन्दु हो, चाहे मस्लिम, लेकिन छवि देश की खराब होती है। भारत को पाकिस्तान न बनाएं। देश को विकास की जरूरत है। किसी भी धर्म के विनाश की नहीं।
प्रवीण तोगड़िया, तुम आधुनिक भारत के लिए कलंक हो। खुलेआम धमकियों और भड़काऊ टिप्पणियों को वापस लेने के लिए हम तुम्हें 48 घंटे का वक्त दे रहे हैं। 21 अप्रैल 2014

Publicly Letter : गृहमंत्री ​सुशील कुमार शिंदे के नाम

नमस्कार, सुशील कुमार शिंदे। खुश होने की जरूरत नहीं। इसमें कोई भावना नहीं है, यह तो खाली संवाद शुरू करने का तरीका है, खासकर आप जैसे अनेतायों के लिए। नेता की परिभाषा भी आपको बतानी पड़ेगी, क्यूंकि जिसको सोशल एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया के शब्दिक ​अ​र्थ न पता हों, उसको अनेता शब्द भी समझ में आना थोड़ा सा क​ठिन लगता है। नेता का इंग्लिश अर्थ लीडर होता है, जो लीड करता है। हम उसको अगुआ भी कहते हैं, मतलब जो सबसे आगे हो, उसके पीछे पूरी भीड़ चलती है।
 
अब आप के बयान पर आते हैं, जिसमें आप ने कहा कुचल देंगे। इसके आगे सोशल मीडिया आए या इलेक्ट्रोनिक मीडिया। कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, क्यूंकि कुचल देंगे तानाशाही का प्रतीक है या किसी को डराने का। आपके समकालीन अनेता सलमान खुर्शीद ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को नंपुसक कहा, क्यूंकि वो दंगों के दौरान शायद कथित तौर पर अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पाए, लेकिन जब मुम्बई पर हमला हुआ था, तब आपके कुचल देंगे वाले शब्द किस शब्दकोश में पड़े धूल चाट रहे थे, तब कहां थे सलमान खुर्शीद जो आज नरेंद्र मोदी को नपुंसक कह रहे हैं।

इलेक्ट्रोनिक मीडिया को तो शायद आप पैसे खरीद लें, क्यूंकि उसको पूंजीपति चलाते हैं, जो विज्ञापन के लिए काम कर सकते हैं, लेकिन सोशल मीडिया को कुचलना आपके हाथ में नहीं, क्यूंकि इसको खरीदना आपके बस की बात नहीं। सोशल मीडिया का शब्दिक अर्थ भी समझा देता हूं, लोगों का मंच। जो लोग सरकार बनाने की हिम्मत रखते हैं, उनको कुचलना आपके लिए उतना ही मुश्किल है, जितना घोड़े का घास के साथ दोस्ताना बनाए रखना।

आपके बयान बदलने से एक बात तो पता चलती है कि आप थोथी धमकियां देते हैं। वरना, अपने बयान पर अटल रहते, और मीडिया को कुचल देते, आज तक आप गूगल व फेसबुक से जानकारियां हासिल नहीं कर पाए, कुचलने की बात करते हैं। क्या किसी की अ​भिव्यक्ति को दबाना असैवंधानिक नहीं ? आपको इलेक्ट्रोनिक मीडिया व सोशल मीडिया का अंतर पता नहीं, तो संवैधानिक व गैर संवैधानिक का अंत क्या खाक पता चलेगा।

आजकल मोदी जी ने खूब अपना पुराना धंधा पकड़ा हुआ है। अपने पुराने दिनों को याद कर रहे हैं, इससे शायद उनको चुनावी फायदा मिल जाए, लेकिन अगर आप ने गृहमंत्री होकर कांस्टेबल वाली हरकतें न छोड़ी तो कांग्रेस को भाजपा वाले कुचल देंगे। और सलमान खुर्शीद को अच्छे से उनके बयान का अर्थ भी समझा देंगे।

जय रामजी की। इसका अर्थ बात शुरू करना भी होता है और संवाद बंद करना भी। जहां लिखा है, वहां इसका अर्थ संवाद बंद करना है। फिर से जय रामजी की। 

राजनीतिक पार्टियां यूं क्यूं नहीं करती

हर राजनीति देश के विकास का नारा ठोक रही है। सब कहते हैं, हमारे बिना देश का विकास नहीं हो सकता, सच में मैं भी यही मानता हूं, आपके बिना देश का विकास नहीं हो सकता, लेकिन एकल चलने से भी तो देश का विकास नहीं हो सकता, जो देश के विकास के लिए एक पथ पर नहीं, चल सकते, वो देश को विकास की बातें तो न कहें। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश को एकता का नारा देते हैं, लेकिन खड़े एकल हैं, जहां जाते हैं, वहां की सरकार की खाटिया खड़ी करते हैं। कभी कभी तो ऐसा भी होता है कि दो इंच कील की जगह चार इंच हथोड़े की चोट से ठोक देते हैं। कांग्रेस समेत देश की अन्य पार्टियां भी कुछ यूं ही करती हैं, वो देश के विकास का मोडल रखने को तैयार नहीं। टीवी चैनलों ने तो केजरीवाल सरकार को गिराने के लिए निविदा भर रखी है, जो गिराने में सशक्त होगा, उसको निवि​दा दी जाएगी। लेकिन क्यूं नहीं देश की राजनीतिक पार्टियां एक सार्वजनिक मंच पर आ जाएं। अपने अपने विकास मोडल रखें, जैसे स्कूल के दिनों में किसी प्रतियोगिता में बच्चे रखते थे, जिसका अच्छा होगा, जनता फैसला कर लेगी। इससे दो फायदे होंगे, एक तो टेलीविजन पर रोज शाम को बकबक बंद हो जाएगी। दूसरा भारतीय क्रिकेट को फिर से टेलीविजन में स्पेस मिल जाएगी। एंटरटेनमेंट में बहुत सी महिलायों को होंठ ख़राब हो चुके हैं, उ​सकी ख़बरें! अमिताभ बच्चन की पोती पढ़ने लग गई, हालांकि अभी तक बॉलीवुड में किसी के बच्चे पढ़ने नहीं ​गए, मुझे ऐसा लगता है, क्यूंकि कभी ख़बर नहीं आई! वो भी आने लग जाएंगी। पांच पांच सौ करोड़ जो विज्ञापन पर खर्च करना है, वो बच जाएगा, पता है वो भी जनता से वसूल किया जाएगा! थूक से पकौड़े बनाए जा रहे हैं, मूत से मछलियां पकड़ाई जा रही हैं! मुझे नहीं दिखा, कहीं गुजरात के मुख्यमंत्री ने गुजरात मोडल रखा हो, केवल बस इतना कहते हैं, मैंने इतनी भीड़ कभी नहीं देखी, सच में घर बैठ आडवाणी को बुरा लग जाता है! राहुल गांधी कुली कुली चिला रहे हैं, मोदी चाय चाय! इन दोंनो के प्रेमी आम आदमी पार्टी हाय हाय चिला रहे हैं! अनुयायी बड़ी गंदी चीज है, आंख पर पट्टी बांध लेती हैं, अपने नेता का भाषण सुनने के बाद कान में रूई डाल लेती है! दूसरी पार्टियां करें तो रासलीला, हमारे वाले करें तो रामलीला! घोर अत्याचार है!

समुदाय राजनीति बंद होनी चाहिए

समाचार : रामेश्वरम के निकट पंबम में मछुआरों के विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करते सुषमा ने कहा, 'नरेंद्र मोदी ने एक मछुआरों को राज्यसभा का सदस्य बनाया हैं।'

वह यहां मछुआरा समुदाय के चुन्नीभाई गोहिल का जिक्र कर रही थी, जिन्हें बीजेपी ने पिछले सप्ताह गुजरात से राज्यसभा का सदस्य नामांकित किया है।

इसके साथ ही बीजेपी की इस वरिष्ठ नेता ने वादा किया कि अगर उनकी पार्टी लोकसभा चुनाव में जीतती है, तो वह एक अलग मत्स्य पालन मंत्रालय का गठन करेगी और मछुआरों की रिहाइश की आस-पास अच्छे स्कूल और अस्पताल स्थापित किए जाएंगे।

युवारॉक्स व्यू : आखिर यह क्या बात है ? लोक सभा चुनाव नजदीक हैं, और भाजपा ने गुजरात से चुन्नीभाई गोहिल को राज्य सभा सदस्य नियुक्त किया। और भाजपा की मैडम उसको हथियार बना रही हैं। हद नहीं तो क्या है ? यूं वादे करना भ्रष्टाचार प्रलोभन नहीं तो क्या है ? तो बीजेपी को अब चाय वालों के पास जाना चाहिए, कहना चाहिए देखो नरेंद्र मोदी को प्रधान मंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया। पार्टी में कुछ वकील होंगे, कुछ छोटे कारोबारी होंगे। उधर, जदयू को भी न्यूज पेपर समुदाय से मदद मांग लेनी चा​हिए, प्रभात ख़बर के संपादक को राज्य सभा सदस्य नामांकित किया है। यह समुदाय आधारित राजनीति बंद होनी चाहिए। अगर कोई वादा करना है तो देश के लिए करो।

चुनावों के लिए राम मंदिर का मुद्दा काम नहीं आया तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी एकता का नारा लेकर सरदार पटेल को लेकर आए। एकता का अर्थ केवल भाजपा के समर्थन करना है। देश बनाने की बात न करते हुए सरदार पटेल के पुतले पर जोर दिया जा रहा है। सरदार पटेल जो अपना कद बना गए, क्या यह पुतला उससे अधिक उंचा कद बनाएगा सरदार पटेल का नहीं, ये तो केवल नरेंद्र मोदी का नाम इतिहास में दर्ज करवाएगा, लोग सरदार पटेल के पुतले को देखेंगे, नरेंद्र मोदी को याद करेंगे। यादों में पुतले बनाने से बेहतर है, सरदार पटेल के, भगत सिंह के, सुभाष चंद्र बोस समेत अन्य शहीदों के स्वप्नों का मुल्क बनाएं। एकता का नारा देने से देश, एक जुट नहीं होगा। अहिंसक राष्ट्रपति का देश आज सबसे उग्र है। टटोलकर देख लो। बस हिम्मत नहीं, जुटा पाता, भीतर को तूफान उठ रहे हैं, बस कंधे एवं भीड़ ढूंढ़ रहे हैं, ताकि इल्जाम उन पर न आए।

भारतीय राजनीति 99 के फेर में

पिछले एक साल में भाजपा के प्रधान मंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी ने हर स्तर पर विज्ञापनों से बहुत खूबसूरत जाल बुना। असर ऐसा हुआ कि देश में एक संप्रदाय का जन्म होता नजर आया। मोदी के अनुयायी उग्र रूप में नजर आए। मानो विज्ञापनों से जंग जीत ली। सत्ता उनके हाथ में है। जो शांत समुद्र थे, एकदम तूफानी रूख धारण करने लगे। अब उनको दूसरे समाज सेवी भी अपराधी नजर आने लगे, खासकर दिल्ली में, क्यूंकि ​दिल्ली फतेह होते होते चुंगल से छूट गई।

ख़बर है कि कांग्रेस प्रधान मंत्री पद की दौड़ में राहुल गांधी को उतारने का मन बना चुकी है। कांग्रेस राहुल गांधी को ऐसे तो उतार नहीं सकती, क्यूंकि सवाल साख़ का है, मौका ऐसा है कि बचा भी नहीं जा सका। अब राहुल को उतारने के लिए कांग्रेस पीआर एजें​सियों पर खूब पैसा लुटाने जा रही है। यकीनन अगला चुनाव मूंछ का सवाल है। इस बार चुनाव को युद्ध से कम आंकना मूर्खता होगी। युद्ध का जन्म अहं से होता है। यहां पर अहं टकरा रहा है। वरना देश में चुनाव साधारण तरीके से हो सकता था। भाजपा किसी भी कीमत पर सत्ता चाहती है। अगर उसकी चाहत सत्ता न होती तो शायद वह अपने पुराने बरगद के पेड़ को न काटती। अटलजी की तबीयत ठीक नहीं, वो राजनीति को समझ भी नहीं पा रहे, लेकिन फिर भी नेता उनके साथ फोटो खिंचवाने जाते हैं, उनकी एक झलक पाने जाते हैं, लेकिन एक बरगद का पेड़ खड़ा है, जो राजनीति की चरमसीमा को देख रहा है, उसको साइडलाइन कर दिया। युद्ध के लिए युवा सेनापति की जरूरत थी, जो नरेंद्र मोदी के रूप में मिला।

नरेंद्र मोदी ने पूरा देश में अपना प्रभाव छोड़ने के लिए विज्ञापनों पर दिल खोलकर पैसा खर्च किया। कांग्रेस ने एक भी पत्ता बाजार में नहीं फेंका। वो सिर्फ मूक दर्शक की भांति देखती रही। मगर जब बात राहुल गांधी वर्सेस नरेंद्र मोदी की आई तो कांग्रेस ने बख्तर कस लिए। अब युद्ध में युवराज है तो बिना तैयारी के युद्ध लड़ा नहीं जा सकता, अगर मोदी को बाजार से चेहरा संवारने वाले मिल सकते हैं तो कांग्रेस को भी मिल सकते हैं। देश अगर प्रभावित होता है तो विज्ञापनों से। उसकी खुद की सोच कभी काम करती, तो शायद छह दशक बाद आजादी का रोना न रो रहा होता।

इस युद्ध में पीआर एजें​सियों की चांदी होने वाली है। जन साधारण का तो पता नहीं। उसको तो उम्मीदों व झूठे वादों का अंबार जरूर मिल सकता है। शाहरुख खान की चैन्ने एक्सप्रेस ने जब बॉक्स आ​फिस पर दो करोड़ बटोरे तो आमिर खान पर तीन सौ करोड़ कमाने का दबाव था। एक समय सफलता व प्रतिष्ठा आपको गुलाम नजर आती है, लेकिन वास्तव में अगर देखें तो यह आपको अपना गुलाम बना लेती है। शीर्ष पाने में दिक्कत कम है, शीर्ष पर बने रहने के लिए दिक्कत ज्यादा।

शीर्ष को बचाने में जीवन खत्म हो जाता है। कहते हैं कि सम्राट की मालिश करने एक नाई आता था, जिसको मालिश के बदले सम्राट एक सिक्का देता था। नाई बहुत खुश रहता था। उसकी खुशी से सम्राट को जलन होने लगी। सम्राट ने अपने वजीर को कहा, उसकी खुशी का कारण बताओ, मुझे उसकी खुशी से जलन होने लगी है। वजीर तेज दिमाग था। रात को नाई के घर पर 99 सिक्कों से भरा थैला फेंक आया। अगली सुबह नाई उठा, उसने सिक्कों से भरा थैला उठाया। गिने तो 99 सिक्के थे। अब नाई ने सोचा, अगर आज एक सिक्का मैं बचाने में सफल हुआ तो मेरे पास 100 सिक्के हो जाएंगे। धीरे धीरे धन का संग्रह हो जाएगा। नाई अब सिक्के जुटाने के लिए सोचने लगा, जो परेशानी का सबब बना। सम्राट उसको परेशान देखकर पूछता है, तुम्हारी परेशानी का कारण तो बताओ। उसने कहा, कुछ नहीं, मैं ठीक हूं। सम्राट ने कहा, पहले जैसी खुशी नहीं है। कहीं वजीर ने तो कुछ नहीं कहा। अब नाई को समझ आया कि उसको जो एक थैला मिला था, वह वजीर द्वारा फेंका गया होगा। इस फेर से बाहर निकला मुश्किल है, जो निकल गया वह खुश हो गया। 

राहुल-कांग्रेस की छवि चमकाने को 500 करोड़ का ठेका

लोकपाल बिल तो वॉट्सएप पर पास हो गया था

अन्ना हजारे। आज के गांधी हो गए। ठोको ताली। कांग्रेस व भाजपा समेत अन्य पार्टियों ने लोक पाल बिल पास कर दिया। कहीं, आज फिर एक बार अंग्रेजों की नीति को तो नहीं दोहरा दिया गया। गांधी को महान बनाकर सुभाष चंद्र बोस, शहीद भगत सिंह जैसे किरदारों को दबा दिया गया।

सत्ता पाने की चाह में पागल पार्टियां ​दिल्ली में बहुमत न मिलने की कहानी गढ़ते हुए सरकार बनाने से टल रही हैं। आज भी राजनीतिक पार्टियां भीतर से एकजुट नजर आ रही हैं। शायद वह आम आदमी के हौंसले को रौंदा चाहती हैं, जो आप बनकर सामने आया है।

वह चाहती हैं कि आप गिरे। डगमगाए ताकि आने वाले कई सालों में कोई दूसरा आम आदमी राजनेता को नीचा​ दिखाने की जरूरत न करे। आठ साल से लटक रहा बिल एकदम से पास हो जाता है। अन्ना राहुल गांधी को सलाम भेजता है। उस पार्टी का भी लोक पाल को समर्थन मिलता है, जिसका प्रधानमंत्री उम्मीदवार, बतौर मुख्यमंत्री अब तक अपने राज्य में लोकायुक्त को लाने में असफल रहा है।

मुझे लगता है कि शायद अन्ना ने राहुल गांधी को भेजे पत्र के साथ एक पर्ची भी अलग से भेजी होगी। जिस पर लिखा होगा। क्या एक और अरविंद केजरीवाल चाहिए? राहुल के कान खड़े हुए होंगे। यकीनन उसने वॉट्सएप के जरिए ​पर्ची का डिजीटल संस्करण राजनेतायों के ग्रुप को भेजा होगा।

वहां भी कुछ वैसा ही हुआ होगा। नेताओं ने सोचा होगा। देश में हर चीज के लिए कानून है। लेकिन अपराध कहां रूकते हैं। यहां आज भी ट्रै​फिक सिग्नल टूटते हैं। कानून बनाने से अधिक फर्क नहीं पड़ेगा। जल्द से जल्द पास करवा दो। पास तो वॉट्सएप पर ही हो गया होगा, लेकिन खानापूर्ति के लिए संसदीय कार्यवाही जरूरी है। कानून तो टूट भी सकता है, लेकिन अगर एक और केजरीवाल पैदा होगा तो हमारा बना बनाया चक्रव्यूह टूट जाएगा। भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस से बेहतर तो महात्मा गांधी को बनाए रखना आसान है। क्यूं महात्मा गांधी, सरदार पटेल को गद्दी देने की बजाय नेहरू को सौंपेगा। गांधी अहिंसावादी है। वह सिस्टम के खिलाफ शांति से लड़ता है। तब तक कई साल गुजर जाते हैं। हमारी कई पीढ़ियों का इंतजाम हो जाता है।

लोक पाल बिल पास हो गया। ठोको ताली। आज के बाद ​देश में रिश्वत, घोटाले खत्म हो जाएंगे। हम भ्रष्ट नेताओं से मुक्त हो चुके हैं। कल का इंतजार करें।

ख़त तरुण तेजपाल, मीडिया व समाज के नाम

तरुण तेजपाल, दोष तुम्‍हारा है या तुम्‍हारी बड़ी शोहरत या फिर समाज की उस सोच का, जो हमेशा ऐसे मामलों में पुरुषों को दोष करार दे देती है, बिना उसकी सफाई सुने, मौके व हालातों के समझे। इस बारे में, मैं तो कुछ नहीं कह सकता है, लेकिन तुम्‍हारे में बारे में मच रही तहलका ने मुझे अपने विचार रखने के लिए मजबूर कर दिया, शायद मैं तमाशे को मूक दर्शक की तरह नहीं देख सकता था। मीडिया कार्यालयों, वैसे तो बड़ी बड़ी कंपनियों में भी शारीरिक शोषण होता, नहीं, नहीं, करवाया भी जाता है, रातों रात चर्चित हस्‍ती बनने के लिए।

लूज कपड़े, बोस को लुभावने वाला का मैकअप, कातिलाना मुस्‍कान के साथ बॉस के कमरे में दस्‍तक देना आदि बातें ऑफिस में बैठे अन्‍य कर्मचारियों की आंखों में खटकती भी हैं। मगर इस शारीरिक शोषण या महत्‍वाकांक्षायों की पूर्ति में अगर किसी का शोषण होता है तो उस महिला या पुरुष कर्मचारी का, जो कंपनी को ऊपर ले जाने के लिए मन से काम करता है।

जब तक डील नो ऑब्‍जेक्‍शन है, तब तक मजे होते हैं, जिस दिन डील में एरर आने शुरू होते हैं, उस दिन विवाद होना तय होता है, जैसे आपके साथ हुआ। विवाद दब भी जाता, लेकिन तेरी शोहरत तुम्‍हें ले बैठी। मीडिया हाउस, तुम्‍हारे तहलकिया अंदाज से डरने लगे थे, तुम्‍हारी हिन्‍दी पत्रिका पांच साल पूरे कर चुकी है व पाठक निरंतर बढ़ रहे हैं। वैसे तुमने सही लिखा, परिस्‍थितियां सही नहीं थी, मेल से हुए खुलासे के अनुसार। मुझे भी कुछ ऐसा लगता है, क्‍यूंकि जहां हादसा हुआ, वह जगह भाजपा की है, तुम तो भाजपा के पहले शिकार हो, वो चूक कैसे कर सकती थी।

एक वेबसाइट पर प्रकाशित मेल पढ़ी, जिसमें आप दोनों के बीच की बात है, जिसको एक वेबसाइट ने प्रकाशित किया। उसमें लड़की कहती है कि तुम अक्‍सर उससे शारीरिक संबंधों से जुड़े मामलों पर बात करते थे, वो उन विषयों से भागना चाहती थी। इसमें शक नहीं होगा, आप में ऐसा होता होगा, लेकिन हैरानी तो इस बात से है कि वह फिर भी तुम्‍हारे ऑफिस में बने रहना चाहती थी, क्‍यूं, जब तुम्‍हारी सोच से वह अच्‍छी तरह परिचित हो चुकी थी। यह बात तो आम महिला भी समझ जाती है कि जहां शराब, शबाब एवं दिमाग खराब एकत्र होंगे, वहां हादसा तो होना ही है, लेकिन एक दूरदृष्‍टि रखने वाली महिला संवाददाता हालातों को भांप नहीं पाई, हद है।

मीडिया, मीडिया वाले के पीछे पड़ गया। इसलिए नहीं कि वहां पर महिला कर्मचारी के साथ शारीरिक शोषण हुआ, बल्‍कि इसलिए कि सामने वाले को इतना शर्मिंदा कर दिया जाए कि वह उठने लायक न बचे। भले ही, अदालती फैसले आने में देर है। पुलिसिया काईवाई शुरू हुई है। महिला ने आरोप लगाए हैं, सत्‍य साबित होने में वक्‍त है, मगर मीडिया स्‍वयं जज बनकर बैठा है, सिर्फ टीआरपी के चक्‍कर में। नहीं, नहीं, अपने एक प्रतिद्वंद्वी को खत्‍म करने के चक्‍कर में भी।

समाज। बड़ा अजीब है समाज। इतने सारे राम। हर आदमी के अंदर राम है, लेकिन ऐसे मामले में स्‍वयं को एक झटके में राम से अलग कर देता है। वह इतनी जल्‍दी भूल जाता है कि कभी कभी महिला का भी दोष हो सकता है। समाज हूं, भावनायों में बहता हूं। नहीं, नहीं, आजकल तो फेसबुक के प्रवाह में बहता हूं। मुझे कुछ पता नहीं होता, मैं तो उस घटना के समीप भी नहीं होता, जो घटना बंद कमरे में घटती है, दो लोगों के बीच घटती है।

मैं तो बस महिला की सुनता हूं। मेरी आदत है। आम ही देखा होगा, सड़क पर जाते हुए दंपति अचानक मोटर साइकिल से गिरता है। मैं दौड़े दौड़े जाता हूं, महिला को पकड़ कर उठाने की कोशिश्‍ा करता हूं, पुरुष तो खड़ा हो जाएगा। मैं महिला को कमजोर समझता हूं, या मेरा उसके प्रति आकर्षण है, यह बात मैं नहीं जानता, लेकिन मैं समाज हूं। मुझे पता है, वह महिला हमेशा स्‍वयं को दुर्बल कमजोर बताएगी, भले ही ऐसे मौकों पर मैं उसके पक्ष में खड़ता हूं। मैं समाज हूं।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र । पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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frank talk : मुजफ्फरनगर दंगों के छींटे दुर्गा एक्‍सल से नहीं जायेंगे अखिलेश

मुजफ्फरनगर में भड़काऊ भाषण देने के आरोपी बीजेपी विधायक संगीत सोम ने शनिवार को सरेंडर करते हुए नरेंद्र मोदी को प्रचार हथकंडा अपनाने के मुकाबले में पीछे छोड़ दिया। बीजेपी विधायक संगीत सोम ने ऐसे सरेंडर किया, जैसे वे किसी महान कार्य में योगदान देने के बाद पुलिस हिरासत में जा रहे हों। गिरफ्तारी के वक्‍त हिन्‍दुओं का हृदयसम्राट बनने की ललक संगीत सोम में झलक रही थी। शायद संगीत सोम को यकीन हो गया कि लोक सभा चुनावों के बाद नरेंद्र मोदी सत्‍ता में आयेंगे, जैसे नरेंद्र मोदी एलके आडवाणी के अवरोधों को तोड़ते हुए पीएम पद उम्‍मीदवार (एनडीएम) बने हैं।

बीजेपी के विधायक संगीत सोम ने गिरफ्तारी के बाद कहा, मैं अपने धर्म की रक्षा के लिए लड़ता रहूंगा। शायद किसी ने संवाददाता ने पूछने की हिम्‍मत नहीं की कि आखिर आपका धर्म खतरे में कहां है ? अगर भारत में बहुसंख्‍यक धर्म संकट में है तो अल्‍पसंख्‍यक लोगों  में तो असुरक्षा का भाव अधिक होगा। जहां असुरक्षा का भाव है, वहां सुरक्षा के लिए तैयारियां होती हैं, और नतीजा हवा से दरवाजा बजने पर भी अंधेरे में तबाड़तोड़ गोलियां चल जाती हैं।

इस नेता की गिरफ्तारी उसी मामले में हुई है, जिसकी आग समाजवादी पार्टी को अपनी लपटों में लिये हुए है। एक ख़बरिया चैनल ने स्‍टिंग ऑपरेशन किया, तो समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान से मिलता जुलता नाम सामने आया, लेकिन स्‍टिंग ऑपरेशन पर मोहर उस समय लगती नजर आई, जब आनन फानन में आजम खान ने स्‍टिंग ऑपरेशन के तुरंत बाद प्रेस से मुखातिब होना लाजमी समझा।

इससे पूर्व यूपी के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव ने मुजफ्फरनगर के दंगा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया, तो लोगों ने उनको काले झंडे दिखाये और स्‍वागतम कहा। एक अख़बार का शीर्षक तो यह भी था कि हमको लेपटॉप नहीं, सुरक्षा चाहिए। शायद सुरक्षा की गारंटी देना अखिलेश यादव के हाथ में नहीं है, क्‍यूंकि अगर वे फैसला लेने का मादा रखते तो आजम खान को मनाने जाने की बजाय वे दंगा प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के पास जाते। हद है एक मुख्‍यमंत्री पहले अपने नेता को मनाने जाता है। शायद जनता को सुरक्षा का भरोसा दिलाने से ज्‍यादा जरूरी है, कि वे अपनी पार्टी को सुरक्षा का भरोसा दिलाये। शायद ऐसा भी लगा हो, कहीं लोक सभा चुनावों में आजम खान की नाराजगी पापा का पीएम कुर्सी वाला स्‍वप्‍न न तोड़ दे।

जब हर ओर से थू थू होने लगी तो जनाब को खयाल आया, दुर्गाशक्‍ति नागपाल का, जिसको कुछ महीने पहले निलंबित कर दिया गया था, क्‍यूंकि उसके द्वारा एक अवैध इमारत गिरा देने से दंगे होने की आशंका थी, लेकिन मुजफ्फरनगर में दुर्गाशक्‍ति नागपाल नहीं थी, फिर पचास के करीब जिन्‍दगियां चली गई और एक लाख के करीब लोग घरों से बेघर हो गये, बिना किसी घर को गिराये।

जो अखिलेश यादव मीडिया के सामने चीख चीख कर कह रहे थे, सरकार का फैसला सही है, दुर्गा शक्‍ति निलंबन संबंधी, लेकिन सवाल है कि आज अचानक उसी सरकार का फैसला अखिलेश यादव को गलत कैसे लगने लगा। सफेद रंग का कुर्ता जब ज्‍यादा मैला होने लगा तो अखिलेश यादव ने सोचा होगा, चलो दुर्गा शक्‍ति सरफ एक्‍सल से धो लिया जाये।

जो उत्‍तर प्रदेश में हुआ, शायद मुलायम सिंह यादव के कहने अनुसार वह केवल जातीय झड़प होती, लेकिन अगर राजनेता अपनी राजनीतिक रुतबे का इस्‍तेमाल न करते। 99.9 फीसद पुलिस विभाग नेताओं में दबाव में काम करता है, इस बात की पुष्‍टि के लिए किसी से प्रमाण पत्र लेने की जरूरत नहीं, और जो 0.1फीसद सरकारी विभाग का नौकर सरकार के खिलाफ काम करता है, वे दुर्गाशक्‍ति नागपाल की तरह निलंबित कर दिया जाता है।

अखिलेश यादव की सरकार का पुलिस विभाग में कितना हस्‍तक्षेप है। इस बात का अंदाजा तो एडीजी(लॉ एंड ऑर्डर) अरूण कुमार की उस गुहार से लगाया जा सकता है, जिसमें अरुण कुमार ने उत्‍तर प्रदेश से बाहर जाने की राज्य सरकार के सामने अपनी मंशा जाहिर की।

पुलिस विभाग का सामने आया स्‍टिंग ऑपरेशन सौ फीसद न सही, लेकिन कुछ फीसद तो सही होगा, अगर वो सही है तो सरकार और जनप्रतिनिधि दोनों मुजफ्फरनगर जन संहार के लिये जिम्‍मेदार हैं।

ऐसा नहीं कि यह दंगे केवल समाजवादी पार्टी के कारण हुये, यह दंगे सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक हितों के कारण हुये। इस बात की स्‍पष्‍टता तो संगीत सोम की ड्रामामय गिरफ्तारी से हो गई, वे हिन्‍दुओं का नया सितारा बनकर उभरना चाहता है। चाह बहुत कुछ करवा देती है।

अखिलेश यादव तुम्‍हारे दाग दुर्गा शक्‍ति नागपाल सरफ एक्‍सल से तो न जाये, लेकिन हो सकता है कि हिन्‍दुत्‍व पक्षियों का एक झुंड जब सत्‍ता में आयेगा तो किसी बड़े जन संहार से तुम्‍हारा छोटा गुनाह छुप जाये, और यकीनन भविष्‍य में ऐसा होगा, स्‍थितियों का आकालन बता रहा है, क्‍यूंकि यहां पर एक सांप फन उठा रहा है।

बस डर है, शाइनिंग इंडिया मिशन, कहीं मिस्र मिशन न बन जाये। जहां पर लोगों ने मुबारक हुस्‍नी को उतार कर मोहम्‍मद मर्सी को देश की कमान सौंपी, लेकिन विकास का एजेंडा किसी कोने में सिसकता रहा, और देश में इस्‍लामिक मत पैर पसारने लगा, एक भीड़ ने मिस्र में एक नये अंदोलन को जन्‍म दे दिया, जो मुर्सी से आजादी चाहता था।

कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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It's Fake News - इंजी. छात्राओं के पेपर साहित्‍यक लाइबेरी में रखे जाएंगे

गुजरात यूनिवर्सिटी ने फैसला किया है कि वे इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे 700 छात्रों में से कुछ छात्रों के पेपर साहित्‍यक लाइबेरी में भेजे जाएंगे। इसके लिए बकायदा समाचार पत्रों व अन्‍य साधनों के जरिये आवेदन मांगे जाएंगे।

गुजरात यूनिवर्सिटी के अधिकारियों ने पिछले दिनों एक मीडिया रिपोर्ट में खुलासा किया है कि इंजीनियरिंग कर रहे छात्र बहुत होशियार हैं, लेकिन फिर भी पेपर पास नहीं कर पा रहे, क्‍यूंकि उनको साहित्‍य का कीड़ा काट चुका है। छात्र इतने प्रतिभाशाली हैं कि वे इंजीनियरिंग पेपर में पूछे गए सवालों के जवाब अपनी निजी कहानियों, कविताओं के जरिये दे रहे हैं।

इसके साथ यूनिवर्सिटी ने चेताया कि छात्रों के पास अपना हुनर निखारने के लिए केवल 2015 तक का समय है, उसके बाद उनको साबित करने के लिए अन्‍य मौका नहीं दिया जाएगा। यूनिवर्सिटी को उम्‍मीद है कि अगले दो सालों में और बेहतरीन साहित्‍य कला कृतियां मिलेगीं।


दीपिका, क्‍या देख रहे हो ? शाह रुख खान, कुछ नहीं, देख रहा हूं, इतनी बड़ी हिट के बाद भी कोई निर्माता निर्देशक साइन करने क्‍यूं नहीं आया। दीपिका, अरे बुद्धू, निर्माता निर्देशक हैं, वे दर्शक थोड़ी, जो आंकड़े देख देखकर फिल्‍म देखने आते रहेंगे। #chennaiexpress




जब मैंने अमेरिका की कमान संभाली थी, मुझे पता है तब भारतीय मीडिया ने उस ख़बर को बड़ी शिद्दत से पेश किया था, जिसमें मैंने कहा था, मैं महात्‍मा गांधी से प्रभावित हूं। यकीनन मैं महात्‍मा गांधी से प्रभावित हूं, लेकिन मेरे गाल पर किसी ने थप्‍पड़ नहीं मारा, और मैं अमेरिकी हूं, जिस पर खुद अमेरिका यकीनन नहीं कर सकता, तो विश्‍व को करने की जरूरत क्‍या पड़ी है। आज मुझे लगता है कि नये हथियारों के लिए टेस्‍टिंग के लिए सीरिया सबसे बेहतर स्‍थान। हमें तो बस बहाना चाहिए, आप तो जानते ही हैं। अगर हम ऐसा न करें तो हमारे बनाए हथियार कौन खरीदेगा, आपको जानकार हैरानी होगी, हम तालिबान को हथियार भी देते हैं, और उन पर हमले भी करते हैं। मेरी तस्‍वीर में आपको दो चेहरे नजर आ रहे हैं, मैं बिल्‍कुल ऐसा ही हूं, वैसे आपके देश के राजनेता भी ऐसे ही हैं, यकीन नहीं होता न।  #syria

पाकिस्‍तान में आरटीआई नियम लाने पर विचार, जानकारियां कैसी होंगी, उम्‍मीद अनुसार, आने वाले समय में आतंकवादी शिविर में कितनी सीट होंगी, ट्रेनिंग के बाद कितने युवाओं को मिला रोजगार, भारत पर हमले के लिए भेजे जाने वाले आतंकवादियों को अलग से पे तो नहीं करना पड़ता, क्‍यूंकि वहां मेहमान निवाजी अच्छी है। एक सूचना पहले जारी की जाएगी, ओसामा बिन लादेन की मौत संबंधी पाकिस्‍तान में तो कोई रिकॉर्ड दर्ज नहीं, अगर चाहे तो हम आपको ब्रिटिश मीडिया की कटिंग उपलब्‍ध करवा सकते हैं, क्‍यूंकि वहां के मीडिया में ओसामा के मरने संबंधी की कई बार ख़बरें छपी हैं। ताजा समाचार भी आपको भेजते रहेंगे, बस इसके लिए आप पाकिस्‍तान से बाहर का पता दर्ज करवाएं। #RTI #in #pakistan

कपड़ों से फर्क पड़ता है

मुम्‍बई में महिला पत्रकार के साथ हुए गैंग रेप हादसे के बाद कुछ नेताओं ने कहा, महिलाओं को कपड़े पहनने के मामले में थोड़ा सा विचार करना चाहिए। यकीनन यह बयान महिलाओं की आजादी छीनने सा है। अगर दूसरे पहलू  से सोचें तो इसमें बुरा भी कुछ नहीं, अगर थोड़ी सी सावधानी, किसी बुरी आफत से बचा सकती है तो बुराई कुछ भी नहीं। हमारे पास आज दो सौ किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ने वाले वाहन हैं, लेकिन अगर हर कोई इस सपीड पर कार चलाएगा तो हादसे होने संभव है। ऐसे में अगर कोई गाड़ी संभलकर चलाने की बात कहे तो बुरा नहीं मानना चाहिए। देश का ट्रैफिक, सड़कें भी देखनी होगी, केवल स्‍पीड देखने भर से काम तो नहीं हो सकता। ऐसी सलाह देश के कुछ नागरिकों को बेहद नागवार गुजरती है, लेकिन आग के शहर में मोम के कपड़े पहनना भी बेवकूफी से कम न होगा। हमें कहीं न कहीं समाज को देखना होगा, उसके नजरिये को समझना होगा। जब हर कदम पर सलीब हो, और हर तरफ अंधेरा फैला हो, तो यकीनन हर कदम टिकाते समय बहुत सावधानी बरतनी पड़ेगी, पहले टोह लगानी पड़ेगी है, नीचे सलीब तो नहीं, एक दम दौड़कर निकलने वाले अक्‍सर लहू लहान होते हैं। देश की सरकार को कोसने भर से, देश की उन लड़कियों की आबरू वापसी नहीं आ सकती, जो हवश के तेज धार हथियार से घायल हो चुकी हैं। दिल्‍ली से मुम्‍बई तक। देश का शायद ही कोई कोना इससे बचा हो। ऐसा नहीं कि सेक्‍सी कपड़े पहनने वाली बालाओं को निशाना बनाया जाता है, लेकिन देश के ऐसे भी कई हिस्‍से हैं, जहां फैशन नाम की चिड़िया ने दस्‍तक नहीं दी। और वहां पर भी हादसे होते हैं। उसके भी कई कारण हैं, सबसे पहला कारण कमजोर कानून और सामाजिक प्रभाव, आम बोल चाल का हो, या सिनेमा हाल का।

देश को आजाद हुए साढ़े छह दशक से अधिक का समय हो गया। सिनेमा एक शताब्‍दी पूरी कर गया। लेकिन देश की आजादी के बाद महिलाओं की सुरक्षा को लेकर न सरकारों ने कुछ सोचा, और दूसरी तरफ सौ साल के सिनेमे ने भी औरत को आइटम बनाने में कोई कसर तो बाकी नहीं छोड़ी। छह करोड़ का ठुमका। सिनेमा हॉल में सीटियां तालियां बटोरता है। साड़ी पहनने या सीधी सादी लड़की का किरदार हमेशा हिट फिल्‍म का हिस्‍सा तो रहा, लेकिन उस किरदार को अदा करने वाला चेहरा रुपहले पर्दे से गायब हो गया। महिलाओं को परिवार से घूमने की आजादी को मिल गई। मनपंसद कपड़े पहनने की। आजादी के साथ मुसीबतें आती हैं। इसको नकारना बेहद पागलपन होगा। महिलाएं बराबरी का अधिकार जताती हैं, जो जताना चाहिए, लेकिन वे रेलवे टिकट कटवाते हुए खुद को महिला कहते हुए आगे निकल कर टिकट कटवाने का हक भी जताती हैं। बस में सफर करते वक्‍त भीड़ के बीच खड़े होना आज भी जिसके लिए सलीबों पर टंगे होने से कम नहीं, वे खुले बाजार में निकलते क्‍यूं भूल जाती है, घर परिवार बदला है, लेकिन जमाने की सोच नहीं।

देश मॉर्डन होता जा रहा है, लेकिन आज भी युवा पीढ़ी एक नारे को बड़े गर्व से कहती है। वैसे तो पक्‍के ब्रह्मचारी, लेकिन जहां मिल गई वहां ***, युवा पीढ़ी की इस सोच को कैसे नकार सकते हैं। देश के बाबा भी इस नियम को फलो करते हैं। हर तरफ जब आग का गोल चक्र बना हो तो मोम के कपड़े पहनकर निकलना बेहद घातक होता है। देश की सरकार कुछ करे न करे, लेकिन स्‍वयं की इज्‍जत तो स्‍वयं के हाथों में है। फैसला स्‍वयं को करना है। देश में बलात्‍कार जैसे हमलों को रोकने के लिए सख्‍त कानूनों की जरूरत है, लेकिन कानून बनने के बाद भी सुरक्षा की गारंटी तो नहीं। देश के सौ साल के सिनेमे ने औरत को भोग विलास की चीज के रूप में पेश किया है। इस तस्‍वीर को धुंधला होने में वक्‍त लगेगा। इस समाज में लड़का स्‍कूटरी के पीछे बैठा, और लड़की चला रही हो तो भी लोग बेगानी निगाहों से देखते हैं। अगर कानून बनने भर से देश की जनता को सुरक्षा की गारंटी मिल गई होती तो पुलिस थाने कब के दम तोड़ गए होते, जो आज पैसे बनाने की मशीन बनते जा रहे हैं। यहां अपराधी कम दलाल अधिक मिलते हैं। छोटे मोटे केस सुलझाने में कोर्ट भले ही मात खा जाए, लेकिन दलाल लोग कभी मात नहीं खाते। ऐसा नहीं कि मानवी दिमाग को आपके कपड़े ही केवल प्रभावित करेंगे, उसके दिमाग को रुपहले पर्दे के कपड़े भी प्रभावित करते हैं। फोटो कॉपी आज भी दिमाग में यॉरॉक्‍स है, टूथपेस्‍ट आज भी कोलगेट, और डिटर्जेंट पाउडर आज भी सर्फ। प्रभाव रहता है, प्रभाव पड़ता है। कपड़ों से फर्क पड़ता है। आपका गेटअप कपड़ों से आता है, फेसबुक पर सेक्‍सी, हॉट जैसी प्रतिक्रियाएं पाने के बाद खुश होना अच्‍छी बात है, लेकिन उसका संबंध कहीं न कहीं, असल जिन्‍दगी से है। यह भी समझना अति जरूरी है। आपका गेटअप आपको सेक्‍सी, हॉट और साधारण बनाता है। आजादी की दुहाई देकर हर बात को दरकिनार नहीं किया जा सकता। 

चलते चलते इतना कहूंगा, रात के 10 बजे जब मैं, अपने कार्यालय से घर की तरफ लौटता हूं तो सुनसान हाइवे पर लड़के लड़कियां टहलते हुए देखता हूं। यह कोई अजीब बात नहीं, लेकिन अजीब बात तो यह है कि लड़का पूरे ट्रैक सूट में होता है, और लड़की खुली टी शर्ट, और 12 इंच की चड्ढी में होती है।

राहुल गांधी : तुम आये तो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला

राहुल गांधी, युवा चेहरा। समय 2009 लोक सभा चुनाव। समय चार साल बाद । युवा कांग्रेस उपाध्‍यक्ष बना पप्‍पू। हफ्ते के पहले दिन कांग्रेस की मीडिया कनक्‍लेव। राहुल गांधी ने शुभारम्‍भ किया, नेताओं को चेताया वे पार्टी लाइन से इतर न जाएं। वे शालीनता से पेश आएं और सकारात्‍मक राजनीति करें। राहुल गांधी का इशारा साफ था। कांग्रेसी नेता अपने कारतूस हवाई फायरिंग में खत्‍म न करें। राहुल गांधी, जिनको ज्‍यादातर लोग प्रवक्‍ता नहीं मानते, लेकिन वे आज प्रवक्‍तागिरी सिखा रहे थे।

दिलचस्‍प बात तो यह है कि राहुल गांधी ख़बर बनते, उससे पहले ही नरेंद्र मोदी की उस ख़बर ने स्‍पेस रोक ली, जो मध्‍यप्रदेश से आई, जिसमें दिखाया गया कि पोस्‍टर में नहीं भाजपा का वो चेहरा, जो लोकसभा चुनावों में भाजपा का नैया को पार लगाएगा। सवाल जायजा है, आखिर क्‍यूं प्रचार समिति अध्‍यक्ष को चुनावी प्रचार से दूर कर दिया, भले यह प्रचार लोकसभा चुनावों के लिए न हो। कहीं न कहीं सवाल उठता है कि क्‍या शिवराज सिंह चौहान आज भी नरेंद्र मोदी को केवल एक समकक्ष मानते हैं, इससे अधिक नहीं। सवाल और विचार दिमाग में चल रहे थे कि दूर से कहीं चल रहे गीत की धुनें सुनाई पड़ी, ‘तुम आये तो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला, जाने कितने दिनों के बाद, गली में आज चाँद निकला’ चांद से याद आता है राहुल गांधी का चेहरा, जो कुछ महीने पहले जयपुर में नजर आया था, और आज सोमवार को नजर आ रहा है। शायद दूर कहीं ये गीत सही वक्‍त पर बजा रहा है। काश यह गीत राहुल गांधी के समारोह के आस पास बजता तो राहुल आज की होट स्टोरी होते।

राहुल गांधी ने जमीनी राजनीति पर उतर कर बेटिंग करने को कहा। यकीनन कांग्रेस के लिए यह बहुत बेहतरीन सुझाव है, वैसे भी कहते हैं कि सुबह का भूला शाम को घर आए तो उसको भूला नहीं कहते, अगर कांग्रेस आज भी अपने ग्रामीण क्षेत्र के वोटरों को संभाल ले तो हैट्रिक लगा सकती है। कांग्रेस ने जयपुर में मंथन किया था, शायद वे जमीनी नहीं था। अगर होता तो कांग्रेस अपने कारतूसों को हवाई फायरिंग में खराब करने से बेहतर सही दिशा में खर्चती। कांग्रेस के दामन में दाग बहुत हैं, लेकिन कांग्रेस अपनी योजनाओं के सर्फ एक्‍सल से धो सकती है।

कांग्रेस केंद्र में है। उसके द्वारा शुरू की गई, योजनाएं एक अच्‍छी पहल हैं। केंद्र सरकार ने इन योजनाओं को लागू करने के लिए करोड़ों रुपए राज्‍य सरकारों को दिए, लेकिन राज्‍य सरकारों की गड़बड़ियों के कारण योजनाएं पिट गई, और दोष पूरा कांग्रेस के सिर मढ़ दिया गया। मिड डे मिल, जो आज चर्चा का कारण है, क्‍या उसमें केंद्र का दोष है ? नहीं, दोष है राज्‍य सरकारों का जो उसको अच्‍छी तरह से लागू नहीं कर पा रही। मनरेगा, रोजगार की गारंटी भी निश्‍चत एक अच्‍छी पहल है, लेकिन राज्‍य सरकारों की अनदेखी के कारण धूल फांक रही है, बदनामी की कल्‍ख कांग्रेस के माथे, हालांकि कुछ घोटालों के आरोपी नेता या मंत्री जेल की हवा तक खा चुके हैं।

कांग्रेस की समस्‍या है कि वे सोशल मीडिया को समझ नहीं पा रही। दरअसल कांग्रेस पुराने ढर्रे पर चल रही है, और भाजपा इस कमजोरी का फायदा उठाते हुए पूरी तरह सोशल मीडिया को कैप्‍चर कर रही है। कहते हैं कि सोशल मीडिया 160 लोकसभा सीटों को प्रभावित करता है। उसकी पहुंच 12 करोड़ भारतीयों तक है। मगर सोशल मीडिया पर एक बाज की नजर है, जो देश के 80 करोड़ लोगों तक पहुंच बनाए हुए है। जी हां, इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया। आज देश का इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया, मोदी की ब्रांडिंग कर रहा है। कांग्रेस किसी सहमे हुए बच्‍चे की तरह, डरी हुई किसी कोने में खड़ी पूरा तमशा देख रही है।

उसके कई कारण हैं। सबसे पहले कांग्रेस के पास एक दमदार प्रवक्‍ता नहीं। राहुल गांधी युवा पीढ़ी को प्रेरित करता था, लेकिन पिछले कुछ समय से उसकी चुप्‍पी ने युवा पीढ़ी को निराश किया, और युवा पीढ़ी का बहाव नरेंद्र मोदी की तरफ ऑटोमेटिक मुड़ गया। नरेंद्र मोदी के पास राजनीति में लम्‍बा संघर्ष, एक आदर्श राज्‍य की पृष्‍ठभूमि, 11 साल का नेतृत्‍व अनुभव है। राहुल के पास एक मां है, जो उसकी दादी की तरह दमदार प्रवक्‍ता नहीं। संप्रग के पास प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह है, जिसको लोग कथित तौर पर सोनिया गांधी संचालित टेलीविजन कहते हैं। जब भी उनसे राहुल गांधी के पीएम बनने के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब एक था आज कहो, आज पीछे हट जाता हूं, मतलब साफ है, वे केवल मास्‍क हैं।

राहुल गांधी की कलावती पटकथा हिट हुई तो युवा आइकन बन गए। कलावती के बाद राहुल गांधी की कोई पटकथा हिट नहीं हुई। उसका प्रभाव खत्‍म होने लगा। सोशल मीडिया ने उसको पप्‍पू करार दे दिया। राहुल गांधी ने जो कदम आज उठाया है, उस बच्‍चे की तरह, जो पेपरों से कुछ दिन पहले तैयारी करने बैठता है, नतीजा जो भी आए, अगर राहुल का मंत्र सफल हुआ तो शायद 2014 में अख़बारों की सुर्खियां यह शीर्षक बन सकता है ‘पप्‍पू पास हो गया”।

ईद के चांद की तरह नजर आने वाला राहुल गांधी शायद आम चांद की तरह नजर आए, और जो सोच वे कभी कभी जनता के सामने रखते हैं, वे प्रत्‍येक दिन रखे, हफ्ते, महीने में रखे तो स्‍थितियां बदल सकती हैं।

और वे गीत भी शायद कभी इतना रिलेवेंट न लगे, जो आज कहीं दूर से कानों में पड़ रहा है, जख्‍म फिल्‍म का पूजा भट्ट पर फिल्‍माया गया गीत ”तुम आये तो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला जाने कितने दिनों के बाद, गली में आज चाँद निकला”

राजनाथ सिंह, नरेंद्र मोदी और भाजपा की स्‍थिति

''राह में उनसे मुलाकात हो गई, जिससे डरते थे वो ही बात हो गई''  विजय पथ फिल्‍म का यह गीत आज भाजपा नेताओं को रहकर का याद आ रहा होगा, खासकर उनको जो नरेंद्र मोदी का नाम सुनते ही मत्‍थे पर शिकन ले आते हैं।

देश से कोसों दूर जब न्‍यूयॉर्क में राजनाथ सिंह ने अपना मुंह खोला, तो उसकी आवाज भारतीय राजनीति के गलियारों तक अपनी गूंज का असर छोड़ गई। राजनाथ सिंह, भले ही देश से दूर बैठे हैं, लेकिन भारतीय मीडिया की निगाह उन पर बाज की तरह थी। बस इंतजार था, राजनाथ सिंह के कुछ कहने का, और जो राजनाथ सिंह ने कहा, वे यकीनन विजय पथ के गीत की लाइनों को पुन:जीवित कर देने वाला था।

दरअसल, जब राजनाथ सिंह से पीएम पद की उम्‍मीदवारी के संबंधी सवाल पूछा गया तो उनका उत्तर था, मैं पीएम पद की उम्‍मीदवारी वाली रेस से बाहर हूं। मैं पार्टी अध्‍यक्ष हूं, मेरी जिम्‍मेदारी केवल भाजपा को सत्ता में बिठाने की है, जो मैं पूरी निष्‍ठा के साथ निभाउंगा। यकीनन, नरेंद्र मोदी आज सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं, अगर भाजपा सत्ता हासिल करती है तो वे पीएम पद के उम्‍मीदवार होंगे।

दूर देश में बैठे राजनाथ सिंह को इस बात का अंदाजा भी नहीं होगा, ऐसे कैसे हो सकता है कि उनके मुंह से निकले यह शब्‍द भारत में बैठे उनके कुछ मित्रों को अग्‍निबाण से भी ज्‍यादा नागवार गुजरेंगे। क्‍यूंकि भूल गए वे गोवा बैठक के बाद की उस हलचल को, जो एलके आडवाणी के इस्‍तीफे से पैदा हुई थी।

भारतीय मीडिया के बीच अक्‍सर इस बात संबंधी पूछे सवाल पर पार्टी बैठकर फैसला करेगी कह निकले वाले राजनाथ सिंह क्‍यूं भूल गए कि आज का मीडिया सालों पुराना नहीं, जो ख़बर को प्रकाशित करने के लिए किसी बस या डाक खाने से आने वाले तार का इंतजार करता रहेगा, आज तो आपने बयान दिया नहीं कि इधर छापकर पुराना, और चलकर घिस जाता है।

राजनाथ सिंह, ने पहले पत्ते दिल्‍ली की बजाय गोवा में खोले, शायद राजनाथ सिंह ने उनके लिए विकल्‍प खुला रखा था, जो इस फैसले से ज्‍यादा हताश होने वाले थे, क्‍यूंकि तनाव के वक्‍त खुली हवा में सांस लेना, टहलना, बीच के किनारे जाकर मौज मस्‍ती करना बेहतर रह सके।

अब वे न्‍यूयॉर्क पहुंचकर अपने पत्‍ते खोलते हैं, ताकि उनके भारत लौटने तक पूरा मामला किसी ठंडे बस्‍ते में पड़ जाए, और वे नरेंद्र मोदी को दिए हुए अपने वायदे पर कायम रह सकें। शायद अब तो सहयोगी पार्टियों को अहसास तो हो गया होगा कि नरेंद्र मोदी के अलावा भाजपा के पास 2014 के लिए कोई और विकल्‍प नहीं है।

अगर अब भी किसी को शक है तो वे अपना भ्रम बनाए रखे, क्‍यूंकि भ्रम का कोई इलाज नहीं होता, और अंत आप ठंडी सांस लेते हुए पानी की चंद घूंटों के साथ, कुर्सी पर पीठ लगाकर गहरी ध्‍यान अवस्‍था में जाकर, विजय पथ के उस गीत को आत्‍मसात करें, ''राह में उनसे मुलाकात हो गई, जिससे डरते थे वो ही बात हो गई''।

आईपीएल तो हैडर स्‍पेस खा गई

आईपीएल कवरेज तो ज्‍यादातर अख़बारों के हैडर खा गया, लेकिन उस छात्र की ख़बर पहले पन्‍ने पर भी नहीं आई, जो उस शहर में पुलिस लाठीचार्ज के दौरान मारा गया, जहां आईपीएल का प्रोग्राम था। बड़ी अजीबोगरीब हो गई मीडियाई बंदों की सोच।


टाइटल स्‍पेस भी बेच डाली लगता है मीडिया ने, वरना मुफ्त इतना प्रमोशन तो मीडिया खुद का नहीं करता। मगर दैनिक भास्‍कर ने पुराने तौर तरीके को बरकरार रखते हुए पहले दो पृष्‍ठ विज्ञापन के लिए छोड़े, मगर दूसरे मीडिया वाले तो खुद के हैडर को भी बेच गए। सभी हिन्‍दी न्‍यूजपेपरों ने हैडर के नीचे दिया है समारोह का पिक्‍चर यह तो संकेत करता है कि यह टोटल एक एड कंपनी द्वारा प्रायोजित किया गया पेज है, किसी संपादक द्वारा नहीं।

जिस तरह अब प्रचार कंपनियों का हस्‍तक्षेप संपादक इलाके में प्रभाव छोड़ता हुआ नजर आ रहा है, आने वाले समय में लगता संपादक केवल कुछ दिनों के लिए समाचारों को कैसे और कहां प्रकाशित करने की सलाह देंगे, बाकी दिन विज्ञापन दाता कंपनियां फैसला करेंगी। हो सकता है कि किसी दिन आपके घर आने वाला अख़बार पूरी तरह विज्ञापन से भरा हो।

माँ की आँख

मेरी माँ की सिर्फ एक ही आँख थी और इसीलिए मैं उनसे बेहद नफ़रत करता था | वो फुटपाथ पर एक छोटी सी दुकान चलाती थी | उनके साथ होने पर मुझे शर्मिन्दगी महसूस होती थी | एक बार वो मेरे स्कूल आई और मै फिर से बहुत शर्मिंदा हुआ | वो मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकती है ? अगले दिन स्कूल में सबने मेरा बहुत मजाक उड़ाया |

मैं चाहता था मेरी माँ इस दुनिया से गायब हो जाये | मैंने उनसे कहा, 'माँ तुम्हारी दूसरी आँख क्यों नहीं है? तुम्हारी वजह से हर कोई मेरा मजाक उड़ाता है | तुम मर क्यों नहीं जाती ?' माँ ने कुछ नहीं कहा | पर, मैंने उसी पल तय कर लिया कि बड़ा होकर सफल आदमी बनूँगा ताकि मुझे अपनी एक आँख वाली माँ और इस गरीबी से छुटकारा मिल जाये |

उसके बाद मैंने म्हणत से पढाई की | माँ को छोड़कर बड़े शहर आ गया | यूनिविर्सिटी की डिग्री ली | शादी की | अपना घर ख़रीदा | बच्चे हुए | और मै सफल व्यक्ति बन गया | मुझे अपना नया जीवन इसलिए भी पसंद था क्योंकि यहाँ माँ से जुडी कोई भी याद नहीं थी | मेरी खुशियाँ दिन-ब-दिन बड़ी हो रही थी, तभी अचानक मैंने कुछ ऐसा देखा जिसकी कल्पना भी नहीं की थी | सामने मेरी माँ खड़ी थी, आज भी अपनी एक आँख के साथ | मुझे लगा मेरी कि मेरी पूरी दुनिया फिर से बिखर रही है | मैंने उनसे पूछा, 'आप कौन हो? मै आपको नहीं जानता | यहाँ आने कि हिम्मत कैसे हुई? तुरंत मेरे घर से बाहर निकल जाओ |' और माँ ने जवाब दिया, 'माफ़ करना, लगता है गलत पते पर आ गयी हूँ |' वो चली गयी और मै यह सोचकर खुश हो गया कि उन्होंने मुझे पहचाना नहीं |
एक दिन स्कूल री-यूनियन की चिट्ठी मेरे घर पहुची और मैं अपने पुराने शहर पहुँच गया | पता नहीं मन में क्या आया कि मैं अपने पुराने घर चला गया | वहां माँ जमीन मर मृत पड़ी थी | मेरे आँख से एक बूँद आंसू तक नहीं गिरा | उनके हाथ में एक कागज़ का टुकड़ा था... वो मेरे नाम उनकी पहली और आखिरी चिट्ठी थी |

उन्होंने लिखा था :

मेरे बेटे...
मुझे लगता है मैंने अपनी जिंदगी जी ली है | मै अब तुम्हारे घर कभी नहीं आउंगी... पर क्या यह आशा करना कि तुम कभी-कभार मुझसे मिलने आ जाओ... गलत है ? मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है | मुझे माफ़ करना कि मेरी एक आँख कि वजह से तुम्हे पूरी जिंदगी शर्मिन्दगी झेलनी पड़ी | जब तुम छोटे थे, तो एक दुर्घटना में तुम्हारी एक आँख चली गयी थी | एक माँ के रूप में मैं यह नहीं देख सकती थी कि तुम एक आँख के साथ बड़े हो, इसीलिए मैंने अपनी एक आँख तुम्हे दे दी | मुझे इस बात का गर्व था कि मेरा बेटा मेरी उस आँख कि मदद से पूरी दुनिया के नए आयाम देख पा रहा है | मेरी तो पूरी दुनिया ही तुमसे है |

चिट्ठी पढ़ कर मेरी दुनिया बिखर गयी | और मैं उसके लिए पहली बार रोया जिसने अपनी जिंदगी मेरे नाम कर दी... मेरी माँ |

Noted # यह कहानी  किसी महान व्‍यक्‍ित द्वारा किसी और संदर्भ में लिखी गई , कहानी से प्रेरित है, मगर जिसने लिखा है, उसका भी नाम मुझे पता नहीं, मगर कहानी आपको बेहद अच्‍छी लगेगी। 

बयान बवालों से 'बुद्धम् शरणम् गच्छामि' की गूंज तक - साप्‍ताहिक हलचल

रविवार, 6 जनवरी 2013।  इसी के साथ नव वर्ष के प्रथम छह दिन खत्‍म होने जा रहे हैं। बीते सप्‍ताह के दौरान ज्‍यादा सुर्खियां बयानों को लेकर हुए बवालों पर बनी। अगर अंतर्राष्‍ट्रीय समाचारों की बात की जाए तो दो से अधिक सप्‍ताह बाद संडी हूक्‍स स्‍कूल के बच्‍चे जहां एक बार फिर स्‍कूल लौटे तो वहीं दूसरी तरफ तालिबानियों की गोली का निशान बनी मलाला को अस्‍पताल से छुट्टी मिल गई। अंत अमरीका में टैक्स की बढ़ोत्तरी एवं सरकारी खर्चों में कटौतियों के मसले पर 'फ़िस्कल क्लिफ़' नामक' प्रस्ताव को अमरीका के दोनों सदन ने मंजूरी दे दी है, जो प्रस्ताव राष्ट्रपति ओबामा के लिए गले की फांस बन गया था। इसके अलावा भारतीय मूल की अमेरिका में कांग्रेस के लिए निर्वाचित पहली हिन्दू तुलसी गैबर्ड ने पवित्र भगवद् गीता पर हाथ रखकर पद एवं गोपनीयता की शपथ ली। तुलसी (31) को प्रतिनिधि सभा के स्पीकर जॉन बोहनर ने शपथ दिलाई। दाऊद इब्राहिम के समधि को भारत वीजा मिलने पर भारत में हुआ विरोध एवं अंत वीजे को कैंसल करना पड़ा। मियांदाद भारत में चल रही अंतर्राष्‍ट्रीय वनडे क्रिकेट सीरीज देखने के लिए आने वाले थे, जो भारत पाकिस्‍तान को 2-0 के फर्क से हार चुका है एवं आज इस सीरीज का अंतिम एवं तीसरा मैच खेला जाएगा।

नव वर्ष का आरंभ दिल्‍ली गैंगरेप से जुड़ी सुर्खियों से हुआ। इस मामले में शशि थरूर के उस बयान को लेकर राजनीतिक हलकों में बहस छिड़ गई, जिसमें उन्‍होंने कहा था कि गैंग रेप पीड़ित के नामों को उनके माता पिता की अनुमति से सार्वजनिक किया एवं उसके नाम पर नए बनने वाले कानून का नाम रखा जाए। इसके बाद बयान के चलते मुस्‍लिम नेता औवेसी का विवाद शुरू हुआ। उनका यह विवाद उनके बेहद भड़काऊ भाषण से जुड़ा हुआ है। उनके खिलाफ शबनम हाशमी ने कार्रवाई करने के लिए संबंधित विभागों को पत्र लिखा। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार की उस अपील को खारिज करते हुए लोकायुक्‍त आरए मेहता की नियुक्‍ित को सही ठहराया, जिसमें लोकायुक्‍त की नियुक्‍ित पर एतराज उठाया गया था।

संघ नेता मोहन भागवत एवं भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय ने महिलाओं के प्रति ऐसी टिप्‍पणियां की जो बेहद चिंताजनक एवं विवादित थी। जहां भागवत ने कहा कि बलात्‍कार इंडिया में होते हैं भारत में नहीं, वहीं कैलाश ने कहा, अगर महिलाएं लांघेगी अपनी मर्यादा तो रेप होना पक्‍का है। इस बयान के बाद भाजपा ने कैलाश विजयवर्गीय को माफी मांगने के आदेश दिए, लेकिन मोहन भागवत के बयान पर बीजेपी केवल इतना कह पाई, उनके कहने का वो अर्थ नहीं था, जो मीडिया ने पेश किया। आख़िर भाजपा ऊंचे सुर में मोहन भागवत के साथ कैसे बात करती, क्‍यूंकि इसकी जान तो संघ तोते में है। उधर, डीएमके के प्रमुख करुणानिधि ने अपने छोटे बेटे स्‍टालिन को उत्‍तराधिकारी बनाने के संकेत दिए तो बड़े बेटे एमके अलागिरी ने कहा, यह कोई मठ नहीं, जिसका उत्‍तराधिकारी घोषित किया जाए। वहीं राष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से अलग हुए पीए संगमा ने अपनी नई पार्टी नेशनल पीपल्‍स पार्टी का गठन कर दिया।

शनिवार देर रात इंडियन ऑयल कारपोरेशन के हजीरा गुजरात स्थित संयंत्र में एक तेल भंडारण टैंकर में आग लग गई और देखते ही देखते तेजी से फैल गयी। इस घटनाक्रम में करीबन 2:30 करोड़ तेल जलकर नष्‍ट होने की सूचना मिली है। 200 करोड़ से अधिक रुपए के नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है।

दबंग टू ने जहां बॉक्‍स ऑफिस पर सौ करोड़ रुपए से ऊपर कलेक्‍शन किया, वहीं अक्षय कुमार एवं परेश रावल अभिनीत ओह माय गॉड ने सिनेमा खिड़की पर अपने सौ दिन का सफर पूरा किया। पिछले हफ्ते रिलीज हुई राजधानी एक्‍सप्रेस पटड़ी से उतर गई जबकि परेश रावल के टेबल नं 21 को फिल्‍म समीक्षकों ने देखने लायक बताया। देहरादून डायरी सिने खिड़की पर आई, लेकिन सिने प्रेमियों ने कोई रुचि तक नहीं ली। अगले हफ्ते रिलीज होने वाले विश्‍वरूपम उस समय विवादों में घिर गई, जब कमल हसन ने इस फिल्‍म को रिलीज से पहले डीटीएच पर रिलीज करने की घोषणा की एवं इस फिल्‍म को लेकर मुस्‍लिम समुदाय ने भी अपना एतराज दर्ज करवाया।

अंत में दिल्‍ली गैंग रेप मामले पर लौटते हुए बताना चाहेंगे। इस हफ्ते इस मामले पर रही मीडिया की गहरी निगाह। ब्‍लैकमेलिंग मामले में जमानत पर रिहा हुए जी न्‍यूज संपादक सुधीर चौधरी ने हादसे के शिकार युवक का लाइव इंटरव्‍यू दिखाकर खुद को एक बार फिर चर्चा का केंद्र बनाया। कुछ लोग कह रहे हैं कि सुधीर चौधरी अपने दाग धोना चाहते हैं। फिलहाल दिल्ली गैंगरेप मामले में वॉरंट जारी कर दिए गए हैं एवं सोमवार को पेश होंगे 5 आरोपी।

केबीसी में मुम्‍बई की सनमीत कौर साहनी ने पांच करोड़ जीतकर सुखद समाचारों की सीरीज का आगाज किया तो पाटलिपुत्र में 'बुद्धम् शरणम् गच्छामि' की गूंज भी सुनाई देने लगी, क्‍यूंकि यहां पर तीन दिवस तक चलने वाले अंतरराष्ट्रीय बौद्ध संघ समागम का शुभारम्‍भ हो चुका है। इसमें बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा स्‍वयं उपस्‍थित हैं।

मीडिया की सुर्खियों में मुम्‍बई की सनमीत

बिहार के सुशील कुमार के बाद मुम्‍बई की सनमीत कौन साहनी ने पांच करोड़ रुपए जीतकर मीडिया में सुर्खियां बटोर ली है। खासकर सनमीत कौर साहनी ने यह ईनाम राशि उस वक्‍त जीती है, जब पूरा मीडिया महिलामय हो चुका है। ऐसे में सनमीत कौर साहनी को सुर्खियां मिलना लाजमी है।

बीबीसी हिन्‍दी ने इस ख़बर को 'केबीसी: 12वीं पास महिला ने जीते पाँच करोड़' हैंडलाइन के साथ प्रकाशित किया है। शायद मीडिया को लगता है कि सामान्‍य ज्ञान  केवल बड़े बड़े डिग्री होल्‍डर के पास है, तभी तो मीडिया हैंडिंग हैरतजनक बनाया, 12वीं पास महिला ने पांच करोड़ जीत लिए, इस ख़बर के अंदर बताया गया है कि सनमीत कौर साहनी बच्‍चों को ट्यूशन पढ़ाती हैं।

वहीं मुम्‍बई के प्रसिद्ध समाचार पत्र मिड डे ने इस ख़बर को 'वूमैन विन्‍स पांच करोड़ ऑन केबीसी' के टाइटल तले प्रकाशित की। इस टाइटल को पढ़ने के बाद उम्‍मीद है कि पुरुष थोड़ा सा शर्मिंदा होंगे, और तपाक मुंह से निकलेगा 'महिला ने जीते पांच करोड़'। अगर गम्‍भीरता से देखा जाए तो यह हैंडिंग भी अचकितवाचक लगता है। इतना ही नहीं, मुम्‍बई वासियों को खुश करने के लिए वुमैन के आगे मुम्‍बई भी लगा दिया गया है, सब हैंडिंग तो देखिए जनाब। शी इज ए हाऊसवाइफ, हू रेजिडेज इन मुम्‍बई। प्‍वाइंट नोट करने लायक है। पति अपनी पत्‍नि को ताना मार सकते हैं, देखो वो गृहिणी है, जिसने पांच करोड़ जीते।

सुशील के बाद सनमीत ने जीते पांच करोड़, अमर उजाला ने ख़बर की तरह पेश किया, कोई हलचल नहीं। शायद अमर उजाला वाले सोचते हैं, जीत के लिए खेल रही थी, तो जीतना लाजमी था। वहीं एबीपी न्‍यूज ने लिखा, केबीसी में महिला ने रचा इतिहास, जीते पांच करोड़। इस टाइटल को हम मान सकते हैं, बिल्‍कुल स्‍टीक है, अगर पहले किसी महिला प्रतिभागी ने यह उपलब्‍िध हासिल नहीं की। दैनिक जागरण ने भी अमर उजाला की तरह साधारण टाइटल केबीसी में सनमीत ने जीते पांच करोड़ के साथ ख़बर को प्रस्‍तुत किया। ख़बर एनडीटीवी ने लिखा, सनमीत ने केबीसी में जीते पांच करोड़।

चलते चलते। सभी मीडिया हाऊसों ने इस ख़बर को ब्रेकिंग न्‍यूज की तरह लिया, ब्रेकिंग न्‍यूज में गलतियां होना स्‍वाभविक है, वैसा ही इस ख़बर में भी हुआ, किसी ने उसको सुरमीत लिखा तो किसी ने सनमीत। अंत शायद उसका नाम सनमीत कौर साहनी है, वो मुम्‍बई की रहनी वाली है। शैक्षणिक योग्‍यता की बात करें तो पांच करोड़ उनकी झोली में पहुंच चुका है। आदमी शिक्षा दो चीजों के लिए हासिल करता है, नौकरी के लिए और जिन्‍दगी जीने के सही तौर तरीकों सीखने के लिए। फिलहाल सनमीत कौर ने दो मैदानों में अपना लोहा मनवा लिया।

डिस्‍कलेमर- घर जाकर पत्‍नि पर टौंट मत कसिएगा, देखो उसने पांच करोड़ जीते महिला होकर, क्‍यूंकि मुंह की खानी पड़ेगी प्‍यारे इससे पहले सुशील कुमार भी जीत चुके हैं।

मुबारक हो! नई पार्टी बन गई

मुबारक हो! आज एक नई पार्टी का गठन हो गया। जी हां, नेशनल कांग्रेस पार्टी के सह संस्‍थापक रहे पीएम पीए संगमा ने आज नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) का गठन करते हुए भाजपा के नेतृत्व वाले राजग में शामिल होने की घोषणा कर दी।

पिछले कुछ सालों से निरंतर नई राजनीतिक पार्टियों का उदय हो रहा है चाहे राज्‍य स्‍तर पर हो चाहे फिर राष्‍ट्रीय स्‍तर पर। पंजाब के विधान सभा चुनावों से पूर्व शिरोमणि अकाली दल से अलग होते हुए प्रकाश सिंह बादल के भतीजे एवं पंजाब के पूर्व वित्‍त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल ने 27 मार्च 2011 को पीपुल्स पार्टी आफ पंजाब की स्‍थापना की, मगर यह पार्टी चुनावों में कुछ भी न कर सकी।

इससे कुछ साल पूर्व 2006 में महाराष्‍ट्र के अंदर भी शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने शिव सेना से किनारा करते हुए महाराष्‍ट्र नवनिर्माण सेना का गठन किया। राज ठाकरे की अगुवाई वाली मनसे ने महाराष्ट्र विधानसभा 2009 के चुनावों में 13 सीटों पर जीत दर्ज करते हुए अपनी उपस्‍िथति दर्ज करवाई थी, वहीं महाराष्‍ट्र के अंदर 2012 के दौरान हुए नगर पालिका के चुनावों में भी मनसे का दबदबा देखने को मिला।

2012 में तीन पार्टियों का गठन हुआ, जिसमें आम आदमी पार्टी, गुजरात परिवर्तन पार्टी एवं कर्नाटका जनता पार्टी शामिल है। आम आदमी पार्टी का गइन तो हो चुका है, लेकिन अभी तक इस पार्टी की ओर से कोई चुनाव नहीं लड़ा गया, जबकि गुजरात परिवर्तन पार्टी की नींव रखने वाले गुजरात के पूर्व मुख्‍यमंत्री केशुभाई पटेल गुजरात विधान सभा 2012 के चुनावों में कोई कमल नहीं कर सके। उनकी पार्टी केवल 2 सीटों पर विजय परचम लहराने में कामयाब हुई। गुजरात के पूर्व मुख्‍यमंत्री की तरह भाजपा के बर्ताव से दुखी बीजेपी के साथ चार दशक पुराना रिश्ता तोड़ने वाले कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने 9 दिसम्‍बर 2012 को गृह जिले हावेरी में विशाल रैली कर नई पार्टी कर्नाटक जनता पार्टी की घोषणा की।

वहीं, आज शनिवार 5 जनवरी 2013 को राष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से रिश्‍ता तोड़ते हुए पीके संगमा ने अपनी नई पार्टी नेशनल पीपुल्स पार्टी का गठन किया, मगर राष्‍ट्रपति पद के उम्‍मीदवार बने पिता का साथ देने वाली और अपना मंत्री पद गंवाने वाली अगाथा पिता के साथ नजर नहीं, बल्‍िक भरोसा जताया जा रहा है कि वो अगले चुनाव अपनी पिता की पार्टी के बैनर तले लड़ेंगी।

इस नई पार्टी का राष्ट्रीय चुनाव चिह्न किताब होगा, क्योंकि संगमा एवं उनके सहयोगी मानते हैं कि केवल शिक्षा और साक्षरता ही कमजोर वर्गों का सशक्तिकरण कर सकती है। इतना ही नहीं, जल्द ही होने जा रहे मेघालय विधानसभा के चुनाव में उनकी पार्टी अपने उम्मीदवार उतारेगी एवं 33 उम्मीदवारों के नाम पहले ही तय हो चुके हैं।

गौरतलब है कि संगमा ने शरद पवार और तारिक अनवर के साथ 1999 में कांग्रेस छोड़ दिया था, और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) का गठन किया था। सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर इस नई पार्टी का गठन किया गया था। नौ बार सांसद रहे एवं पूर्व लोकसभा अध्यक्ष संगमा के जुलाई में राष्ट्रपति चुनाव लड़ने के फैसले पर उन्हें राकांपा से निकाल दिया गया था।

चलते चलते मन में सवाल उठता है कि निजी हितों के लिए बनाई गई, यह छोटी छोटी पार्टियां क्‍या देश को सही दिशा की तरफ अग्रसर करेंगी? राकांपा का जन्‍म इस लिए हुआ, क्‍यूंकि सोनिया गांधी विदेशी थी, मगर अफसोस कि आज राकांपा उसी सोनिया गांधी के दर पर पानी भरती है। इन छोटी छोटी पार्टियों के कारण किसी बड़ी पार्टी को बहुमत नहीं मिलता, और गठबंधन सरकार सत्‍ता संभालती है, जिसकी स्‍थिति कर्तब दिखाती उस बच्‍ची सी है, जिसको रस्‍सी पर चलते हुए बैलेंस बनाकर रखना पड़ता है। किसी भी तरफ झुकाव हुआ, वहीं सारा खेल खत्‍म। छोटी छोटी पार्टियों के मनमुटाव के कारण कई बार बिल लोक सभा या राज्‍य सभा में पारित होने से रह जाते हैं, या बेतुके तरीके से पास हो जाते हैं। कई राष्‍ट्रीय मुद्दों पर बात नहीं होती। छोटी छोटी पार्टियां राष्‍ट्रीय मुद्दों को भूलकर अपने क्षेत्रिय मुद्दों पर ज्‍यादा ध्‍यान देने लगती हैं, क्‍यूंकि राजनीति वोट बैंक आधारित होती जा रही है।

मीडिया की प्रश्‍नावली, नेताओं के बेबाक उत्‍तर

या तो मीडिया को अपनी बे अर्थी प्रश्‍नावली बंद कर देनी चाहिए या फिर देश के नेताओं के घटिया बयानों को प्रसारित करने से परहेज करना चाहिए। मीडिया को कहीं न कहीं सावधानी बरतनी होगी। मीडिया अच्‍छी तरह जानता है। हमारे नेताओं की शिक्षा का स्‍तर कितना ऊंचा है। वैसे भी रानजीतिक रैलियों में हमारे नेता कहते नहीं थकते कि कीचड़ में पत्‍थर मारोगे तो कीचड़ के छींटे आपका दामन गंदा करेंगे।

दिल्‍ली गैंग रेप घटना के बाद पूरा देश सदमे में है। ऐसा मैं नहीं, बल्‍कि हमारा 24 घंटे प्रसारित होने वाले इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया कह रहा है। भले ही इस घटनाक्रम के बावजूद सलमान की दबंग ने सौ करोड़ से ज्‍यादा रुपए बॉक्‍स ऑफिस पर एकत्र किए। भारतीय क्रिकेट प्रेमियों ने निरंतर क्रिकेट देखा। दिल्‍ली गैंगरेप की लाइव रिपोर्टिंग व चर्चा के दौरान मीडिया ने विज्ञापन से अच्‍छा कारोबार किया, थोड़े से ब्रेक के बाद के बहाने।

अब हमारे पत्रकार महोदय जहां भी खड़े होते हैं, वहीं खड़े किसी न किसी शख्‍स से पूछ लेते हैं दिल्‍ली गैंग रेप के बारे में आपका क्‍या खयाल है, क्‍यूंकि आजकल सन्‍नी लियोन फायरब्रांड नहीं। हमारे नेता भी टीवी पर आने के चक्‍कर बेबाक बयान दे देते हैं। मगर जब वो बयान बवाल बन जाता है तो मीडिया के सिर आरोप आता है बयान तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया। अंत बयान की लीपापोती की जाती है, शायद वैसे ही जैसे दीवाली से पूर्व कच्‍ची दीवारों में पड़े खड़ों को भरने की प्रक्रिया होती है या किसी बड़े नेता के आने से पूर्व टूटी सड़कों की मुरम्‍मत। नेता सार्वजनिक तौर पर माफी मांग लेता है। हर हिन्‍दी फिल्‍म की तरह बवाल का भी हैप्‍पी एंडिंग हो जाता है।

दिल्‍ली गैंगरेप पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है, 'रेप की घटनाएं 'भारत' में नहीं 'इं‌डिया' में ज्यादा होती हैं'। उन्होंने कहा है, 'गांवों में जाइए और देखिए वहां महिलाओं का रेप नहीं होता, जबकि शहरी महिलाएं रेप का ज्यादा शिकार होती हैं'।

मोहन भागवत किसी गांव की बात करते हैं, जहां से किसी शहर का उदय होता है। जैसे गंगोत्री गंगा का उदय, वैसे ही गांव शहर का उदय करता है। गांव से निकलकर लोग शहर की तरफ आते हैं। लोग शहर में आकर बस जाते हैं, जो कल गांव थे, आज गांव मंडियां या शहर बन चुके हैं। अगर मोहन भागवत गांव का तर्क देकर किसी सच्‍चाई से मुंह मोड़ना चाहते हैं तो अलग बात है, वैसे मैं उनको एक बात कहना चाहता हूं कि शायद शहर में औरत की आबरू की कीमत हजारों में लगती हो, मगर गांव में दलित महिला की इज्‍जत की कीमत केवल एक घास की गठड़ी हो सकती है या कुछ पैसे हो सकते हैं। गांवों की स्‍थिति शहर से बेहद बुरी है। गांव में दलित महिलाओं को निशाना बनाया जाता है। जैसे मध्‍य प्रदेश की एक महिला प्रोफेसर ने कहा था, समर्पण कर देना चाहिए था, वैसा समर्पण गांवों में महिलाओं को करना पड़ता है। वो उस स्‍थिति को स्‍वीकार कर लेती हैं।

वहीं दूसरी तरफ भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय ने कहा है 'महिलाएं मर्यादा न लांघें, नहीं तो रावण हरण के लिए बैठा है'। मगर कैलाश विजयवर्गीय ने महिलाओं की मर्यादा के बारे में प्रकाश नहीं डाला। शायद वो इस विषय पर विस्‍तार से बोलते तो हो सकता था महिलाएं उनके प्रवचनों को आत्‍मसात कर लेती। दिल्‍ली गैंग रेप को ध्‍यान में रखकर बयान देने से अच्‍छा होता अगर कैलाश क्राइम आंकड़े देखकर बयान दिया होता, जो यह दर्शाता है कि 90 फीसदी बलात्‍कार घरों के अंदर अपने ही परिजनों के हाथों से किए जाते हैं। घर में रहने वाली युवतियों के लिए, महिलाओं के लिए आख़िर कौन सी लक्ष्‍मण रेखा होती है, शायद जानने के लिए महिलाएं आतुर होंगी। अगर कैलाश जी आपके पास है तो जरूर बताईए, ताकि महिलाएं घर में किसी हवश के भूखे भेड़िए का शिकार होने से बच जाएं।

मीडिया भी उस बाजार का एक हिस्‍सा है, जो अपने उत्‍पाद बेचने के लिए हर तरह का फंडा अपनाता है। यह कहना गलत होगा कि केवल बॉलीवुड नग्‍नता परोसता है। मीडिया भी कोई कम नहीं। मल्‍लिका शेरावत, सन्‍नी लियोन, पूनम पांडे से दुनिया को अगवत करवाने वाला बॉलीवुड नहीं, मीडिया है। काजोल, माधुरी, जूही किस तरह अपने परिजनों को समर्पित हो गई हैं। मीडिया यह सब बताने में दिलचस्‍पी नहीं लेता, बल्‍कि इसमें दिलचस्‍पी लेता है कि मल्‍लिका ने कितने चुम्‍बन दिए, सन्‍नी लियोन से इससे पहले कौन कौन सी अश्‍लील फिल्‍मों में काम किया।