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Standpoint - इंटरव्यू या बेआबरू होने का नया तरीका

आज सुबह सुबह कंप्यूटर चलाया। राज ठाकरे के साथ अर्णब गोस्वामी का इंटरव्यू देखने के लिए, लेकिन बदकिस्मती देखिए, मैं आईबीएन ख़बर की वेबसाइट पर पहुंच गया, जहां सीएनएन आईबीएन के चीफ इन एडिटर राजदीप सरदेसाई राज ठाकरे का इंटरव्यू ले रहे थे।

इंटरव्यू देखते वक्त ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कि राज ठाकरे राजदीप सरदेसाई की क्लास लगा रहे हों। एक चैनल के चीफ इन एडिटर को बता रहे थे, इंटरव्यू और इंट्रोगेशन में कितना अंतर होता है।

बोलने को भौंकना जैसे शब्दों से संबोधित किया गया। इंटरव्यू में किस मुद्रा में बैठा जाता है। इंटरव्यू कर रहे हैं तो पीछे हटकर बैठें। आपको अर्णब गोस्वामी नहीं बनना है। इंटरव्यू में आवाज उंच्ची नहीं होती। इंटरव्यू चल रहा है, राजदीप सरदेसाई स्वयं को रोके हुए हैं।

राज ठाकरे अनाप शनाप बोले जा रहे हैं। सवाल तो यह है कि इस तरह का बदतमीजी पर इंटरव्यू करना चाहिए ? अगर इस इंटरव्यू को दिखाया गया तो क्यूं ? इसके पीछे की मजबूरी क्या ? क्या राज ठाकरे का इंटरव्यू इतना महत्वपूर्ण है कि चीफ इन एडिटर जैसे पद पर बैठा व्यक्ति अपनी इज्जत को दांव पर लगाए। कहीं इज्जत की ध​ज्जियां उड़ाने का हमने नया तरीका तो नहीं खोज लिया।

आज राज ठाकरे ने किया। कल कोई और करेगा। इज्जत मालिकों की नहीं, पत्रकारिता की खत्म हो रही है। सोचने की जरूरत है। मीडिया जिस तरह अपनी गरिमा को खत्म कर रहा है, ऐसा लग रहा है कि भारत में अब पत्रकार कम, और पीआर एजेंट ज्यादा होंगे।