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Fiction - टिकट टू पाकिस्‍तान

सुबह सुबह का समय था, सूर्य निकलने में देर थी, चिड़ियां की चीं चीं सुनाई दे रही थी। देव अफीमची खुशी के मारे नाच रहा था। द्वारकी हैरान थी, आखिर आज देव अफीमची बिना चीखे चिल्‍लाए। बिना हाय बू किए। बिना काली नागिन यानि अफीम खाए कैसे उठ गया। भीतर की महिला ने द्वाकी को बेचैन कर दिया, आखिर ऐसा क्‍या हुआ कि देव अफीमची, सुबह सुबह वो भी सू्र्य निकलने से पहले बिस्‍तर से खड़ा हो गया। द्वाकी मन ही मन में सोचने लगी, जब तक पता नहीं चलेगा, तब तक किसी काम में मन नहीं लगेगा।

आज ऐसा लग रहा था, जैसे देव अफीमची को अल्‍लादीन का चिराग मिल गया, और उसकी मनोकामना पूर्ण होगी। आज देव अफीमची द्वाकी को अपने पुराने दिनों की याद दिला रहा था, जब देव अफीमची युवा था, जब दोनों की नयी नयी शादी हुई थी। देव अफीमची, दूसरे नौजवानों की तरह सुबह सुबह इस तरह बड़े शौक से खेतों की तरफ निकलता था।

आज देव अफीमची को, अपनी जवानी की दलहीज लांघे हुए साठ साल हो चले हैं। इस उम्र में जवानी वाला जोश तो भगवान को भी चिंता में डाल दे, यहां तो फिर भी द्वाकी के रूप में एक महिला थी। बिना पूछे कैसे रह सकती थी, लेकिन सीधे सीेधे तो पूछना भी न आता था, कोई तो बात चलानी पड़नी थी।

अपनी स्‍टीक के सहारे चलते हुए द्वाकी देव अफीमची के करीब पहुंची। जो एक बैग में कपड़े भर रहा था। आस पास कुछ चीजें बिखरी हुयी थी। उन चीजों को द्वाकी ने पहले कभी नहीं देखा था, भले ही इस घर में आए हुए द्वाकी को साठ साल से अधिक का समय हो चुका था। भले ही इस मकान को घर बनाने में द्वाकी ने अपने जीवन का एक एक पल लगाया, लेकिन उस बैग के आस पास बिखरी हुयी चीजें द्वाकी ने कभी नहीं देखी थी। अब उसके मन में एक नहीं, बहुत सारे अनजाने सवाल जन्‍म लेने लगे।.......... जारी है