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हैप्‍पी अभिनंदन में रविश कुमार



हैप्‍पी अभिनंदन
 
में इस बार आपको एनडीटीवी के रिपोर्टर से एंकर तक हर किरदार में ढल जाने वाले गम्‍भीर व मजाकिया मिजाज के रवीश कुमार से मिलवाने की कोशिश कर रहा हूं, इस बार हैप्‍पी अभिनंदन में सवाल जवाब नहीं होंगे, केवल विशलेषण आधारित है, क्‍योंकि एक साल से ऊपर का समय हो चला है, अभी तक रवीश कुमार, जो नई सड़क पर कस्‍बा बनाकर बैठें हैं, की ओर से मेरे सवालों का जवाब नहीं आया, शायद वहां व्‍यस्‍तता होगी। हो सकता है कि उनके कस्‍बे तक मेरे सवाल न पहुंच पाए हों, या फिर उनके द्वारा भेजा जवाबी पत्र मुझ तक न आ पाया हो।

फिर मन ने कहा, क्‍या हुआ अगर जवाबी पत्र नहीं मिला, क्‍यूं न रवीश कुमार से पाठकों व ब्‍लॉगर साथियों की मुलाकात एक विशलेषण द्वारा करवाई जाए। रविश कुमार, ब्‍लॉग सेलीब्रिटी नहीं बल्‍कि एक सेलीब्रिटी ब्‍लॉगर हैं, जिनके ब्‍लॉग पर लोग आते हैं, क्‍यूंकि सेलीब्रिटियों से संबंध बनाने का अपना ही मजा है। मगर रवीश कुमार ने साबित किया है कि वह केवल सेलीब्रिटी ब्‍लॉगर नहीं हैं, बल्‍कि एक सार्थक ब्‍लॉगिंग भी करते हैं।

मैं पहली बार उनके ब्‍लॉग पर एक साथी के कहने पर पहुंचा था, जो उम्र में मुझे काफी बड़े थे, उनको पता था कि मैं ब्‍लॉग लिखता हूं, उन्‍होंने मुझे पूछा कभी रवीश को पढ़ा है, तब मैं नहीं जानता था कि रवीश कुमार कौन हैं। मैं उनको खोजा और कस्‍बा नामक ब्‍लॉग पर पहुंचा, यह कस्‍बा नई सड़क स्‍थित है।

उनका ब्‍लॉग उनकी नौकरीपेशा जिन्‍दगी से बिल्‍कुल अहलदा हैं, सच में, क्‍यूंकि वहां पर वह वो सब नहीं कर सकते, जो ब्‍लॉग जगत में वह बेबाक लिख सकते हैं, हर आदमी को आजादी चाहिए, चाहे वह आम आदमी हो या एक सेलीब्रिटी। कस्‍बा के रहवासी रवीश नरेंद्र मोदी से कोसों मील की दूरी रखते हैं, अगर उनके अगेंस्‍ट कोई न्‍यूज या स्‍टोरी मिल जाए तो उनकी कलम लिखते हुए आग उगलती है, वह केवल रिपोर्टर या एंकर ही नहीं, एक कवि भी हैं, जी हां, उनके ब्‍लॉग पर उनके भीतर का दर्द उनकी कविताओं से ही उजागर होता है। उनकी कविताएं बताती हैं कि वह मीडिया की आज की स्‍थिति से थोड़ा सा खफा हैं।

वो राजनीतिक मुददों पर भले प्रसून जी के मुकाबले में न खड़े होते हों, लेकिन सामाजिक मुददों को उनसे बेहतर कोई नहीं हैंडल कर सकता, उनके भीतर एक आम आदमी बसता है, जो सामाजिक मुददों को बेहतरीन तरीकों से जाना है और उठता है। वैसे उनको मजा लेने की बड़ी आदत है, यह आदत आप उनके प्राइम टाइम शो के दौरान कभी भी देख सकते हैं। आजकल उनको ब्‍लॉग से ज्‍यादा माइक्रो पोस्‍ट में मजा आता है, जो फेसबुक पर देखी जा सकती है, यह व्‍यस्‍त समय में अपनी बात कहने का आसान व सुखद तरीका है। वह कभी कभी फोटो से भी काम चला लेते हैं। चलते चलते इतना ही कहूंगा उनके चाहने वालों की लम्‍बी कतार हैं।

चलते चलते। दिग्‍गी सिंह, सोनिया जी आप नाराज क्‍यूं हो रही हैं, हमने तो राहुल के कहने पर सब बयान दिए थे, सोनिया, दिग्‍गी जी आपकी उम्र हो चली है, राहुल तो अभी बच्‍चा है, आपको तो कुछ सोचना चाहिए था।

आपका
कुलवंत हैप्‍पी  

हैप्‍पी अभिनंदन में स्‍पंदन वाली शिखा जी

नमस्‍कार दोस्‍तो, मैं कुलवंत हैप्‍पी, एक लम्‍बे समय बाद आपके समक्ष हमारे बीच में से ही एक शख्‍िसयत को हैप्‍पी अभिनंदन के जरिए आपसे मिलवाने लाया हूं, वैसे तो यकीनन आप उनकी रचनाओं एवं उनके ब्‍लॉगों के मार्फत उनसे कई बार मिल चुके होंगे, लेकिन हैप्‍पी अभिनंदन में आज उनसे मिलकर देखिए, और बताइए कि इस बार मिलने में और पहले मिलने में क्‍या अंतर लगा, जो शख्‍िसयत आज हैप्‍पी अभिनंदन में मेरे सवालों के जवाब में अपने विचार रखने जा रही है, वह कोई और नहीं बल्‍कि ब्‍लॉग स्पंदन/अंतर मन में उठती हुई भावनाओं की तरंगें पर लिखने वाली शिखा वार्ष्‍णेय जी हैं, जो रहती लंडन में हैं, लेकिन लिखती हिन्‍दी में हैं, और उनकी स्‍मृतियों में बसता है रूस, जहां से उन्‍होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की एवं चैनल में न्‍यूज प्रड़यूसर रह चुकी हैं शिखा जी अब स्‍पंदन पर लिखकर अपने अंदर की पत्रकार आत्मा तृप्त कर रही हैं।

हैप्‍पी के सवाल, शिखा के जवाब

शिखाजी, आपने पत्रकारिता की पढ़ाई की, लेकिन परिवारिक जिम्‍मेदारियों को पहल देते हुए आपने उससे नाता तोड़ लिया, लेकिन फिर अचानक आपको ब्‍लॉग जगत मिल गया, यहां पर आकर आप कैसे अनुभव करती हैं?

देखिये जगह कोई भी हो, हर तरह के अनुभव होते हैं कड़वे भी और अच्छे भी। हर तरह के लोग हर जगह होते हैं। अत: मेरे अनुभव भी मिले जुले ही हैं किंतु मेरा मानना है कि यदि ईमानदारी से अपना काम किया जाए कोई समस्या नहीं होती। मुझे ब्लॉग के रूप में अभिव्यक्ति का एक माध्यम मिला जिसका मैंने ईमानदारी से उपयोग किया है और मुझे अच्छा लगता है।

शिखा जी, व्‍यक्‍ित किसी न किसी से प्रेरित होता हैं, और आपके ब्‍लॉग पर आपके पिताजी के बारे लिखा संस्मरण पढ़ने के बाद लगा कि आप उनसे बेहद प्रभावित हैं, क्‍या कभी जिन्‍दगी में ऐसा हुआ कि आप मुश्‍िकल घड़ी में हैं, और पिता जी की किसी बात ने आपको हौंसला देते हुए मुश्‍िकल से बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया हो, अगर हां, हमारे साथ सांझा करें उस पल को।

जी बिलकुल सही समझा आपने। मैं अपने पिता से प्रभावित हूँ या नहीं ये तो पता नहीं।मेरे यह मानना है कि मैं किसी से भी प्रभावित मुश्किल से ही होती हूँ। पर हाँ उनसे गहरा जुड़ाव अवश्य है. और ऐसे कई मौके आए जब मैंने अपने आपको बेहद मजबूर पाया, और उस वक्‍त पिताजी के स्मरण ही मेरी ढाल बने और स्वत: ही मुझमें हालातों से लड़ने की सामर्थ्य आ जाती है. ऐसे कई पलों का मैंने अपनी ब्लॉग पोस्ट में उल्लेख किया है।

शिखा जी, आपने पत्रकारिता में मास्‍टर डिग्री हासिल की एवं कुछ समय तक मीडिया में कार्य भी किया, और यकीनन इस बाबत आपके पास एक अच्‍छा अनुभव भी होगा, तो मैं जानना चाहता हूं कि भारतीय एवं ब्रिटिश मीडिया में आपको सबसे बड़ा अंतर क्‍या लगता है?

सामान्यत: जो अंतर बाकी क्षेत्रों में है वही मीडिया में भी है.यहाँ ब्रिटेन में कानून सबके लिए एक है फिर चाहे वह प्रधान मंत्री हो या एक आम नागरिक. हमारे यहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  के नाम पर कुछ भी कहा – लिखा जाता है.या कुछ प्रभुत्व वाले लोग कुछ भी करें उनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया जाता. वहीँ ब्रिटेन में आप डेली मिर्रेर के मर्डोक का केस लीजिए इतने प्रभुत्व वाले पत्रकार को माफी मांगनी पड़ी, संसद में उस पर चर्चा हुई और प्रधानमंत्री तक को उसपर जबाब देना पड़ा.


शिखा जी, मैंने आपके प्रोफाइल में देखा है कि आपको हिन्‍दी के अलावा अंग्रेजी एवं रूस भाषा का भी ज्ञान है, अगर आपको रूसी भाषा का ज्ञान है तो यकीनन आप ने रूसी साहित्‍य को पढ़ा भी होगा, मगर मैं आप से यह जानना चाहता हूं कि आपको रूस का कौन लेखक बेहद पसंद है, और वहां साहित्‍य की कुछ खासियत जो उसको अन्‍य साहित्‍यों से अलग करती है ?


किसी भी देश का साहित्य उस भूमि से जुड़ा होता है उससे उस देश की संस्कृति की झलक हमें मिलती है. इसलिए सभी का अपना अलग स्थान है. रूसी लेखकों में मुझे चेखव बहुत पसंद हैं .उनकी छोटी छोटी कहानियों में रूसी शहरों और गांवों के जन जीवन की जीवंत तस्वीरें देखने को मिलती है और उनका विवरण बेहद रोचक होता है .वहीँ तोल्स्तोय का साहित्य उनकी सहज भाषा शैली की वजह से मुझे आकर्षित करता है.

शिखा जी, आपकी किताब स्‍मृतियों में रूस प्रकाशित हुई है, मैं जानना चाहता हूं कि क्‍या आप रूस में रह चुकी हैं, या फिर रूसी साहित्‍य पढ़ने के कारण रूस आपके जेहन में ऐसे बस गए, जैसे कि आप वहीं रहती है, मैं चाहूंगा कि आप रूस की कोई अभूल स्‍मृति हमारे साथ सांझी करें।

जी नहीं मेरी पुस्तक कल्पना पर आधारित नहीं बल्कि मेरे अपने अनुभवों पर है.जो मैंने अपनी पत्रकारिता की पढ़ाई के छ: वर्षों के दौरान वहाँ पाए.मैंने मोस्को स्टेट यूनिवर्सिटी से टीवी पत्रकारिता में परास्नातक किया है. स्मृतियाँ बहुत हैं उसके लिए मेरे ब्लॉग या यह पुस्तक पढ़ें।

शिखा जी, आप लंडन में रहती हैं, ऐसे में पाठक एवं ब्‍लॉगर दोस्‍त जानना चाहेंगे कि आपकी किताब स्‍मृतियों में रूस भारत में भी उपलब्‍ध है या नहीं, अगर नहीं तो कब तक होगी, अगर है तो कोई कैसे प्राप्‍त करें?

जी हाँ स्मृतियों में रूस भारत में ही डायमंड पब्लिशर से प्रकाशित हुई है. अत: डायमंड बुक्स की साईट से या उनसे संपर्क करके वी पी पी से आप पुस्तक माँगा सकते हैं. वैसे शायद कुछ दुकानों में भी उपलब्ध हो परन्तु मुझे उसका अभी पता नहीं है।

हैप्पी अभिनंदन में दीपक "मशाल"


हैप्पी अभिनंदन में आज आप जिस ब्लॉगर हस्ती से मिलने जा रहे हैं, वो शख्सियत अपनी माटी से शारीरिक तौर पर तो दूर है, लेकिन रूह से जुड़ी हुई है। यही जुड़ाव तो है, जो कोंच छोड़ने और बेलफास्ट, उत्तरी आयरलैंड पहुंचने के बाद भी हिन्दी ब्लॉग जगत के दीपक "दीपक मशाल' को अपने देश एवं अपनी बोली से जोड़े हुए है। इस दीपक के प्रकाश से हम सब हर रोज मसि कागद पर रूबरू होते हैं। आओ जानते हैं कि दीपक से मशाल का रूप ले रहे युवा कवि एवं ब्लॉगर दीपक मशाल से वो क्या कहते हैं, खुद के एवं ब्लॉग जगत के बारे में।

हैप्पी अभिनंदन में इंदुपुरी गोस्वामी

हैप्पी अभिनंदन में आज, आप जिस ब्लॉगर शख्सियत से रूबरू होने जा रहे हैं, वो पेशे से टीचर, लेकिन शौक से समाज सेविका एवं ब्लॉगर हैं। वो चितौड़गढ़ की रहने वाली हैं, ब्लॉगिंग जगत में आए उनको भले ही थोड़े दिन हुए हैं, लेकिन सार्थक ब्लॉगिंग के चलते बहुत जल्द एक अच्छा नाम बन गई हैं। जी हाँ, आज आप हैप्पी अभिनंदन में कान्हा की दीवानी यानी आज की मीरा एवं मेरी निगाह में दूसरी मदर टरेसा इंदुपुरी गोस्वामी से मिलने जा रहे हैं। आओ जाने, वो क्या कहती हैं ब्लॉग जगत एवं अपने बारे में :-

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगिंग के अलावा आप असल जिन्दगी में क्या करती हैं, और कुछ अपने बारे में बताएं?
इंदुपुरी गोस्वामी :
सरकारी स्कूल में टीचर हूँ। हिंदी और इंग्लिश लिटरेचर में एम.ए. हूँ। बचपन से लिखने का शौक था और पढ़ने का तो इतना कि बहुत जल्दी उसमें डूबना सीख गई थी। दसवी ग्यारहवी कक्षा तक आते आते मैंने साहित्य की प्रसिद्ध रचनाओं के अलावा रूसी, अंग्रेजी, उर्दू, और संस्कृत साहित्य के अलावा खलील जिब्रान को खूब पढ़ चुकी थी।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग जगत में आपने कदम कब और कैसे रखा?
इंदुपुरी गोस्वामी :
ब्लॉग की दुनिया में आए बहुत कम समय हुआ है। कब आई ये तो देख कर बताना पड़ेगा। इक्कतीस अगस्त दो हजार नौ तक मुझे कम्यूटर का माऊस भी चलाना नहीं आता था तो ये तो पक्की बात है कि उसके बाद ही आई हूँ। ब्लॉग की दुनिया में आने के लिए कीर्ति जी ने ही मुझे कहा कि आप अपना ब्लॉग बनाइये आप कई लोगों को नेक कामों से जोड़ सकती हैं, उन्हें मोटिवेट कर सकती हैं और लिख भी सकती हैं। और मैं आ गई ब्लॉग की दुनिया में।

कुलवंत हैप्पी : समाज सेवा के क्षेत्र में कैसे आई एवं सेवा करते हुए कैसा महसूस करती हैं?
इंदु गोस्वामी :
लोगों की छोटी मोटी मदद करा करती थी, उसी के चक्कर में दैनिक भास्कर के सम्पादक श्री कीर्ति राणा जी से परिचय हुआ, उन्हीं ने मेरा परिचय उदयपुर, जयपुर, दिल्ली, मुंबई के कई एडिटर्स और दयालु लोगों से मिलाया, जो जरुरतमंदों को मदद करने में मेरा हाथ बंटाते थे। वैसे मैं आज तक मिली उनमें से किसी से भी नहीं। मेरा सारा काम फोन से होता है और लोग मुझ पर यकीन करते हैं, डोनर्स भी। वे न पूछे पर मैं उन्हें एक एक पैसे का हिसाब बताती हूँ. उनकी भी मेहनत का पैसा है भाई। समाज सेवी और मैं? बिलकुल नहीं भैया। सच कहूँ, असली समाज सेवी तो वो होते हैं, जो एक 'एप्पल' किसी गरीब को देते हैं और दस व्यक्ति मिल कर फोटो खिंचवाते हैं, पेपर्स में देते हैं। मैंने तो कहीं कुछ किया तो अगले रोज किसी और नेता, समाजसेवी का फ़ोटो अखबार में उस काम का क्रेडिट लेते हुए देखा एवं पढ़ा।

लगभग बीस साल पहले मेरे पति श्री कमल पुरी गोस्वामी जी यहाँ से जॉब छोड़ कर विदेश चले गये थे। जॉब भी अच्छा था पैसे भी। बच्चे बड़ी क्लासेस में आ गए थे मेरा इंडिया छोड़ना पॉसिबल नहीं था। गवर्नमेंट जॉब था मेरा कैसे जाती? इनके बिना कभी रही नहीं। लोगों की मदद करने की आदत...तो बस अपने आपको इसी में व्यस्त कर लिया। अब घर, बच्चे, मेरी नौकरी और मेरा ये काम.....सुकून मिलने लगा। जीने का एक मकसद सा मिल गया। धीरे धीरे पति, बच्चे और कई ऐसे लोग जुड़ गए जो मेरे लिए फील्ड में काम करने लगे।

जहाँ भी रही, आस पास के बेरोजगार इधर उधर भटकते रहने वाले नौजवान को भी जोड़ लिया, जो मोहल्ले, शहर, आस पास के गांवों के विकास के लिए काम करने लगे। विकलांगों, विधवाओं की पेंशन से लेकर, इंटेलिजेंट बच्चे जो 'डिजर्विंग' थे और आगे पढ़ नहीं पा रहे थे। उनके लिए फीस, ड्रेस, बुक्स सबके खर्च के लिए दानदाताओं से रूपये इक्कठे करना, सामान कलेक्ट करना, पहुँचाना सब काम मेरे ऐसे ही नौजवान करते हैं। हा हा हा.. बहुत सुकून है बाबू इसमें।

लगभग ढाई सौ तीन सौ स्टुडेंट्स को मदद दी जाती है। जानते हो उसमें से कुछ ऑफिसर्स बन चुके हैं। एक विशाल बारेगामा एयर क्राफ्ट मेंटिनेंस का कोर्स करके बेंगलोर में जॉब कर रहा है, रत्न वैष्णव जिंक में ऑफिसर है, जिंक, सीमेंट इंडस्ट्रीज़, टीचिंग में कई बच्चे पहुँच गये। आ कर मिलते है, बताते हैं कि मैं मिलती भी नहीं इन 'डिजर्विंग' बच्चों से। सीधे किसी डोनर को सौंप देती हूँ। 'ये' बच्चा है आप जब तक उनकी पढाई का खर्च उठा सकें. पार्ट टाइम जॉब भी दिलवा देते हैं जिस से खुद कमा कर पढाई कर सके। मदद का मतलब लोगों को निक्कमा बनाना भी नहीं। केंसर पीड़ित कुछ बच्चों के लिए कई लोग आगे आए, इसमें दैनिक भास्कर के सर्कल इंचार्ज राजेश पटेल, यही नाम है शायद। उन्होंने बहुत मदद की।

इसके अलावा मुंबई के नेलेक्तेद चिल्ड्रन को निःसन्तान दम्पत्तियों को गोद दिलवाना भी मेरे जीवन का मकसद है। कई बच्चे बहुत ही अच्छे परिवारों में गए हैं। कई है बाबू मददगार भी और काम भी क्या क्या बताऊँ छोडो, बस लोगों को कहूँगी अपने बच्चों के लिए करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी या मजबूरी पर किसी एक बच्चे को काबिल बनाने में मदद कर दीजिये, बहुत बहुत सुकून मिलेगा। नेत्र-दान, देह-दान करने और मृत्यु भोज न करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करती हूँ, इनकी शुरुआत पहले खुद से फिर अपने परिवार से करने के बाद लोगों को कहती हूँ। नहीं कहती नहीं एक्सामपल रख दिया, लोग फोलो कर रहे हैं। मैं अपने जीवन से बहुत खुश हूँ अपने पापा की लाडली थी और ईश्वर की भी मैं अपने दोनों 'बापों' को शर्मिंदा नहीं होने दूँगी। ऊपर जाते ही गले लगायेंगे मुझे. हम सब 'ऐसा' जी सकते हैं ,हैप्पी।

कुलवंत हैप्पी : श्री कृष्ण भगवान की प्रतिमाएं एवं उनको समर्पित कविताएं बताती हैं आप कृष्ण भगत हैं, क्या कभी उन्होंने कोई करिश्मा दिखाया?
इंदुपुरी गोस्वामी :
मैं क्या बताऊँ? हाँ जीवन मैं ऐसा थोडा बहुत जरूर किया है कि तुम जैसा नन्हा सा दोस्त और वे लोग जो मुझे प्यार करते है वे गर्व कर सकते हैं। मैं नास्तिक नहीं हूँ, पर पूजा पाठ नहीं होता मुझसे। कृष्ण.. नाम न लो उस दुष्ट का। इतना प्यारा दोस्त और प्रियतम है मेरा कि आवाज भी नहीं देती कि ऐसे आ खड़ा होता है, जैसे मुझ पर ही नजर गडाए बैठा रहता है। जासूसी करता है रात दिन मेरी दुष्ट कहीं का। एक बार नहीं बाबू कई बार अलौकिक अनुभव दिए इस अब कहोगे कितनी गालियाँ देती है अपने दोस्त को और जाने कितने सन्गठन खड़े हो जायेंगे 'ऐसा' बोला, पर...जब भी परेशान होती हूँ बुला कर कह देती हूँ 'लल्ला। इस परेशानी को पकड़ तो, सुबह दे देना, अभी सोने दे, और 'वो' शायद मेरे लिए रात भर जागता भी होगा। मेरे आंसू उसकी आँखों से बहते हैं, ये भी मैं जानती हूँ कि विकट से विकट परिस्थिति में जब लगा ये इंसानों के बस की बात नहीं उसमें से उसने यूँ निकाल लिया कि हम आश्चर्यचकित रह गए। हर बार किसी न किस रूप में वो मेरे साथ था कभी, कहीं मिलता है तो उसके गले लग कर खूब रोती हूँ और झगडती हूँ' दुष्ट। तू मेरे आस पास ही मंडराता रहता है क्या? मेरी आँखों में से वो झांकता है, मुझ में सांस लेता है।

बस अगरबत्ती भी नहीं जलाती. नाराज तो होता होगा। पर....उसे बहुत बहुत प्यार करती हूँ दोस्त की तरह, माँ की तरह, प्रेमिका की तरह तो कभी छोटी सी 'छुटकी' बन कर। मत पूछो, वो मेरा क्या है? सशरीर होता तो जाने कितनी अंगुलियां उठ चुकी होती अब तक मुझ पर। हा हा हा.. इश्वर ने एक पत्ता भी व्यर्थ नहीं बनाया। उसकी सर्वश्रष्ठ कृति 'मनुष्य' है। उसे वो यूँ ही थोड़े भेजेगा दुनिया में? नाम, प्रसिद्धि सब समय के साथ मिट जाते हैं, मगर कुछ ऐसा जरूर है करने को सबके लिए जिससे सुकून मिलता है। बस उसी के लिए करें पर ...करें जरूर और दिल की आवाज सुने वो कभी 'मिस गाईड' नहीं करती।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग जगत को आप क्या मानती हैं सोशल नेटवर्किंग या अभिव्यक्ति का प्लेटफार्म?
इंदुपुरी गोस्वामी :
ब्लॉग की दुनिया सोशल नेटवर्किंग और अभिवक्ति का सबसे प्यारा, खूबसूरत और सशक्त माद्यम है। यहाँ अच्छे लोगों की कोई कमी नहीं और अच्छे साहित्य की भी। मैंने कई ऐसा लोगों को पढा, जिन्हें कोई नहीं जानता, जिनके ब्लॉग पर दो तीन कमेंट्स भी नहीं पर कमाल लिखा था। जिन्हें पढ़ते हुए कब मेरी आँखों से आंसू बह निकलते थे पता ही नहीं चलता था। अरे बाबा! इसी ब्लॉग ने मुझे पद्म सिंह श्रीनेत जैसा प्यारा बेटा दिया, समीरजी जैसा दादा, ललितजी पाबला भैया जैसे भी, अनामिका जैसी बेटी महेश सिन्हा, मुकेश जी, हेप्पी जैसे छोटे छोटे प्यारे दोस्त दिए और....अपना ई-गुरु जैसा भतीजा दिया।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग जगत में होने वाली गुटबाजी पर आप क्या कहना चाहेंगी?
इंदुपुरी गोस्वामी :
बस फालतू की गुटबाजी, विवाद अपने बस की बात नहीं। सब मेरे मैं सबकी। कोई मेरा नही मैं किसी की नहीं। हा हा हा।

कुलवंत हैप्पी : कोई विशेष संदेश देना चाहेंगी?
इंदुपुरी गोस्वामी :
ईश्वर की शुक्रगुजार हूँ। उसने मुझे जीवन में बहुत अच्छे अच्छे लोगों से मिलाया। जिंदगी से या' उससे' कोई शिकायत नहीं।
 
चक्क दे फट्टे : सुनो शयाम (नेता का प्रेस सचिव), कल एक प्रेस नोट तैयार किया था "आतंकवादियों पर सरकार कारवाई करे'। हाँ जी। फ्यूड से आतंकवादी हटाकर वहाँ नक्सली लिखकर मेरी ओर से रिलीज कर देना।

हैप्पी अभिनंदन में शिवम मिश्रा

ब्लॉग ने पूरे हिन्दुस्तान को एक मंच पर ला खड़ा किया है, ब्लॉगिंग के बहाने हमको देश के कोने कोने का हाल जानने को मिल जाता है। देश का कितना बड़ा भी न्यूज पेपर हो, लेकिन आज वो ब्लॉग जगत के मुकाबले बहुत छोटा है। अखबार गली कूचों में बांट कर रह गया है, कारोबार ने उसकी सीमाएं बहुत छोटी कर दी। अखबार का दायरा जितना छोटा हुआ है, ब्लॉग जगत का दायरा उतना ही बड़ा हुआ है। जम्मू कश्मीर से मदरास तक और असम से गुजरात तक ही नहीं बल्कि हिन्दी ब्लॉगिंग का नेटवर्क तो सरहद पार विदेशों तक फैला हुआ है। इस नेटवर्क को एक एक ब्लॉगर ने बनाया है, ब्लॉग नेटवर्क एक माला की तरह है, जो एक एक मोती से बनती है। इस ब्लॉग रूपी माला में बहुत से मोती हैं, उन्हीं मोतियों में से एक मोती शिवम मिश्रा के साथ आज हैप्पी अभिनंदन में आप सबको रूबरू करवाने जा रहा हूँ, जो उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले से बुरा भला एवं जागो सोने वालों ब्लॉग को संचालित करते हैं। आओ आगे पढ़ें, कुलवंत हैप्पी  के सवाल और शिवम मिश्रा के जवाब।

कुलवंत हैप्पी : सबसे पहले जानना चाहेंगे कि आपकी जन्मस्थली कौन सी है और आपका जन्म कब हुआ?
शिवम मिश्रा : मेरा जन्म 15 मई, 1977 कों कोलकत्ता में हुआ। मैं 1997 तक कोलकत्ता में ही रहा और अपनी 12वीं तक की पढाई वहाँ की। इसे साल हम लोग मैनपुरी आ बसे यहाँ हमारी पुश्तैनी जमीन और मकान है।

कुलवंत हैप्पी : मिश्रा जी आपने ब्लॉग जगत में कब और कैसे आए?
शिवम मिश्रा : ब्लॉग जगत में मेरे खास दोस्त हिर्देश सिंह के प्रोत्साहन से आया। हिर्देश मैनपुरी एक जाने माने युवा पत्रकार है और अपना एक न्यूज़ चैनल चलाते हैं- सत्यम न्यूज़ के नाम से। मैंने अपनी पहली पोस्ट 31/03/2009 को लिखी थी। ब्लॉग जगत में आने का प्रमुख्य कारण यही था कि अपने मन की भावनायों को सब तक पहुंचाऊं अपने शब्दों में।

कुलवंत हैप्पी : आप ने बीच में ब्लॉगिंग से दूरी बना ली थी, कोई विशेष कारण?
शिवम मिश्रा : जी हाँ बीच में ब्लॉग जगत से दूर था, इस का केवल यही कारण था कि मेरे internet service provider द्वारा ब्लॉगर.कॉम तक मेरी पहुच बंद कर दी गई थी किसी तकनीकी कारण की वजह से वैसे अब जब लौटा हूँ तो आप जैसे मित्रों से पता चला है कि उन दिनों ब्लॉग जगत में काफी घमासान हुआ तो सोचता हूँ अच्छा ही हुआ कि दूर था।
 
कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग जगत में आपका अब तक का सफर कैसा रहा?
शिवम मिश्रा : अब तक का ब्लॉग जगत का सफ़र तो काफी बढ़िया रहा आगे खुदा मालिक।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगिंग के अलावा असल जिन्दगी में आजीविका के लिए क्या करते हैं आप?
शिवम मिश्रा : असल जीवन में ब्लॉगिंग के आलावा मैं एक investment consultant के रूप में कार्य कर रहा हूँ ख़ासकर बीमा क्षेत्र में।

कुलवंत हैप्पी : कोई ऐसा लम्हा जिसने कुछ अलग करने के लिए प्रेरित किया हो, और हमारे साथ बाँटना चाहते हों?
शिवम मिश्रा : देखिए अलग तो हम सब ही करना चाहते हैं पर सब से बहेतर यह होता है कि हम जो कर सकते है उसको ही और बहेतर तरीके से करे। मेरा तो मानना यही है।

चक्क दे फट्टे : शिवम : गधा मिठाई को देखकर क्या सोचता होगा? यार, हैप्पी : काश! यह मिठाई घास होती।

हैप्पी अभिनंदन में यशवंत महेता "फकीरा"

क्षमा चाहता हूँ, पिछले मंगलवार को मैं आपके सामने किसी भी ब्लॉगर हस्ती को पेश नहीं कर पाया। समय नहीं था कहना तो केवल बहाना होगा, इसलिए खेद ही प्रकट करता हूँ।


हैप्पी अभिनंदन में आज आप जिस ब्लॉगर हस्ती से मिलने जा रहे हैं, उनको अनुभवी जनों और बुद्धिजीवियो का साथ, चाय पीना, खेतों की हरियाली, बच्चन की मधुशाला को बार-बार पढना, बच्चों से बातें करना और बच्चों के संग बच्चा बन जाना बेहद अच्छा लगता है। इंदौर से दिल्ली तक का सफर तय करने वाली इस ब्लॉगर हस्ती को हम सब युग क्रांति ब्लॉग पर यशवंत महेता 'फकीरा' के नाम से पढ़ते हैं। जी हाँ, इस बार हमारे साथ यशवंत महेता फकीरा हैं, जिनके विचारों के धागों से बुनी हुई कविताएं रूपी चादरें फकीरा का कोना ब्लॉग पर भी सजी हुई हैं। आओ जानते हैं ब्लॉग जगत और खुद के बारे में यशवंत महेता "फकीरा" क्या कहते हैं?

कुलवंत हैप्पी : आप यशवंत महेता से फकीरा कैसे बने?
फकीरा : यह तो बहुत ही खतरनाक सवाल है। बस एक दिन किसी से प्यार हो गया था। उसके दर पर गए जब तो उसने फकीरा बोल दिया और उस दिन से यशवंत महेता फकीरा बन गया।

कुलवंत हैप्पी : आपकी जन्मस्थली कौन सी है और कर्मस्थली कौन सी है?
फकीरा : मेरी जन्मस्थली मध्यप्रदेश की आर्थिक राज्यधानी इंदौर और कर्मस्थली देश की राज्यधानी दिल्ली है।

कुलवंत हैप्पी : आप ब्लॉग जगत में कब और कैसे आए ?
फकीरा : मैं ब्लॉग जगत में 17 जुलाई 2009 को आया, मेरे पहले ब्लॉग का नाम था 'फकीरा का कोना', जिसको बहुत कम लोग जानते हैं, क्योंकि मैंने उसको किसी भी ब्लॉग एग्रीगेटर के साथ नहीं जोड़ा।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग जगत में आकर कैसा लग रहा है?
फकीरा : अच्छा लगता है। जब लोग पढ़ते हैं और टिप्पणी करते हैं तो और भी अच्छा लगता है। मैं भी सबको पढ़ता हूँ, लेकिन टिप्पणियाँ थोड़ी कम करता हूँ। फिर भी सारे अच्छे ब्लॉगों पर आना जाना लगा रहता है।

कुलवंत हैप्पी : आपकी नजर में ब्लॉग सोशल नेटवर्किंग है या अभिव्यक्ति का उच्चस्तीय प्लेटफार्म?
फकीरा : देखिए, मैं ब्लॉगिंग को दोनों के बीच में रखूँगा, यह अभिव्यक्ति का प्लेटफॉर्म है, जो अभी उभर रहा है, जिसकी असली ताकत का अंदाजा अभी होना बाकी है। इसको सोशल नेटवर्किंग इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि यहाँ नए नए मित्र मिलते हैं, सोशल नेटवर्किंग वेबसाईटों की तरह।

कुलवंत हैप्पी : कोई ऐसा किस्सा जो कुछ हटकर कुछ करने के लिए प्रेरित करता हो?
फकीरा : संघर्ष करने वाले लोग मुझे बेहद प्रिय हैं, जो निराशा की गर्त से भी हीरा निकालकर ले आते हैं। एक किस्सा याद आ रहा है। एक कौए का। हमारे यहाँ दिल्ली में कौए बहुत हैं। अक्सर वो रोटी के टुकड़े उठाकर ले जाते हैं। एक दिन एक कौआ एक बहुत बड़ा रोटी का टुकड़ा उठाकर ले आया। रोटी का टुकड़ा बहुत बड़ा था। यूँ तो अक्सर कौए काँ काँ कर रोटी के टुकड़े गिरा देते हैं, पर उस कौए ने जिस समझदारी से उस टुकड़े को दो भागों में बाँटकर अपने दोनों पंजों के नीचे रखा और रोटी का आनंद लिया, असल में देखने लायक था। वैसे तो किस्से काफी हैं, लेकिन उक्त किस्सा पिछले दिनों घटित हुआ।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगर साथियों और युवा सोच युवा खयालात के पाठकों के लिए कोई विशेष सुझाव?
फकीरा : खूब पढ़िए, कम लीखिए और लाजवाब लिखिए, इसके अलावा अच्छे ब्लॉगों का अनुसरण करें। युवा सोच युवा खयालात से समाज और देश का भला कीजिए, चाहे उम्र जो भी हो सोच को हमेशा युवा रखिए। बस इतना ही कहना चाहूँगा।

चक्क दे फट्टे :  एक प्रोग्राम में फकीरा साहिब आटोग्राफ देते देते थक गए, ऐसे में उन्होंने एक बच्चे को आटोग्राफ देते हुए किसी जानवर का रेखाचित्र बना डाला। फकीरा का ऐसा आटोग्राफ देखकर बच्चा तुरंत बोला, सर आपका आटोग्राफ चाहिए, फोटोग्राफ नहीं।

हैप्पी अभिनंदन में सुनील कटारिया

सुनील कटारिया
हैप्पी अभिनंदन में इस बार आप जिस ब्लॉग हस्ती से रूबरू होने जा रहे हैं, उसने 'कौन कहता है आकाश में सुराख़ नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो' को सच कर दिखाया है असल जिन्दगी में, लेकिन ब्लॉग जगत में तो आए हुए इन्हें बड़ी मुश्किल से ढाई माह हुए हैं। ब्लॉग ख्यालात की कलम से पर लिखने वाले युवा ब्लॉगर सुनील कटारिया यहाँ एक तरफ पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर समाचार पत्रों के लिए गैर-वेतन लेखन कार्य करने के साथ - साथ  दूरदर्शन के पंजाब से चलने वाले रीजनल टीवी चैनल जालंधर दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले इवनिंग लाइव शो "पंज बजे लाईव" को होस्ट कर रहे हैं |  उन्होंने अब तक जो हासिल किया, वो खुद के बल पर हासिल किया है, तो ऐसे में लाज़मी है कि सफर रोमांचक रहा होगा, आईये जानते हैं वो क्या कहते हैं अपने निजी जीवन और ब्लॉग जगत के बारे में।

कुलवंत हैप्पी : आपको ब्लॉग जगत में आए कितना समय हो गया और इस प्लेटफार्म पर आकर कैसा लगा?
सुनील कटारिया : मुझे करीब ढाई महीने ही हुए हैं इस नए मंच पर आए हुए और इस प्लेटफोर्म पर आकर बहुत अच्छा लग रहा है।

कुलवंत हैप्पी : लिखने के अलावा यहाँ पढ़ते भी होंगे दूसरे ब्लॉगों को, क्या कुछ बदलाव की जरूरत लगती है?
सुनील कटारिया : जी बिल्कुल पढ़ता  हूँ लेकिन लिखने का मौका कभी कबार ही हाथ आता है। बदलाव के नज़रिए से लगता है कि इसके बारे में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को जागृत किया जाना चाहिए ताकि वो भी अपनी आवाज़ को बुलंद करते हुए इसका एक हिस्सा बनें क्यूंकि आज के दौर में इन्टरनेट या फिर कहें ब्लॉग एक सम्पूर्ण माध्यम है आजादी से अपनी बात कहने का। मीडिया के बाकी माध्यम चाहे वो अखबार हो या टीवी चैनल किसी ना किसी रूप में लोगों की बात को पूरी तरह से पेश नहीं करते हैं।

कुलवंत हैप्पी : आपने बहुत कम समय में बहुत नाम कमा लिया, पिछले दिनों आपकी प्रतिभा से रूबरू करवाता एक लेख पढ़ा था, यहाँ तक कैसे  पहुंचे?
सुनील कटारिया : दसवीं कक्षा में पढ़ते समय ही मुझे न्यूज़ चैनलों ने प्रभावित करना शुरू कर दिया और वहीँ से मेरे भीतर इस ओर आने की लौ जल उठी और फिर धीरे धीरे मेहनत के साथ साथ रास्ते खुद ब खुद बनते गए। मैं यहाँ कहना चाहूँगा कि "कोशिश करोगे तो कशिश पैदा होगी, रास्ते तो खुद ब खुद निकल आयेंगे"।

कुलवंत हैप्पी : इंटरनेट पर पढ़ने वालों की संख्या कम है, क्या ऐसे में आपका मन विचलित नहीं होता सोचकर कि मैं इतनी मेहनत से लिखता हूँ, और बहुत कम लोग पढ़ते हैं?
सुनील कटारिया : जी नहीं, मैं ये मानता हूँ कि आपकी बात में या फिर आपके ब्लॉग में अगर कुछ दम है तो लोग अपने आप आपके उस ब्लॉग तक किसी न किसी ज़रिए से ज़रूर पहुँच जाएंगे और ये आप पर निर्भर करता है कि आप किस तरह से अपने पाठकों को अपनी ओर खींच पाते हैं।

कुलवंत हैप्पी : कोई ऐसा लम्हा या शख्सियत जिसने कुछ हटकर करने के लिए प्रेरित किया हो?
सुनील कटारिया : जी, मैं हर पल हर शख्सियत से कहीं न कहीं ज़रूर मुतासिर होता हूँ। कोई ख़ास लम्हा या कोई ख़ास शख्सियत तो नहीं है जिसका मैं नाम ले सकूँ लेकिन मेरी ज़िन्दगी में आने वाले हर एक शख्स से ज़रूर किसी न किसी रूप में प्रेरणा लेता रहता हूँ और खास तौर पर मैं अपने जीवन में आने वाले लोगों की अच्छी बातों को ग्रहन करता हूँ।

कुलवंत हैप्पी : सुना है, आपने  CNN - IBN के  "द सिटीजन जर्नलिस्ट शो ' के लिए फिरोजपुर से ब्रिज को लेकर चल रहे विवाद का वीडियो भेजा था, जिसको सराहना मिली थी, वो विचार कैसे आया?
सुनील कटारिया : जी दरअसल, ये बात जुलाई 2007 की है जब मैं बी. ए. फाइनल में था। शहर के बीचो बीच स्थित रेलवे पुल को बने 150 साल से भी ज़्यादा का समय बीत जाने के कारण इसकी खस्ता हो चुकी हालत को देख केंद्र सरकार ने पुल को असुरक्षित तक घोषित कर दिया था और हर बार 23 मार्च शहीदी दिवस के दिन फिरोजपुर से करीब 11 किलोमीटर पर हुसैनीवाला भारत-पाक सीमा पर पंजाब के बड़े बड़े नेता पुल के नवनिर्माण का वायदा कर जाया करते थे। एक दिन CNN -IBN  के द सिटिजन जर्नलिस्ट शो सम्बंधी जानकारी देखी तो मैंने पुल का मोबाइल से वीडियो बना भेज डाला और फिर 27 नवम्बर 2007 को CNN - IBN की टीम फिरोजपुर पहुंची तो मुझसे पुल सम्बंधी रिपोर्टिंग करने को कहा गया और अंत में चैनल पर प्रसारित होने वाली इस वीडियो को "बेस्ट वीडियो अवार्ड" दिया गया।

युवा सोच युवा खयालात पाठकों और ब्लॉगर दोस्तों के लिए कोई संदेश?
सुनील कटारिया : किसी को संदेश देने के लायक तो नहीं हूँ, लेकिन हाँ गुजारिश ज़रूर करना चाहूँगा कि आज ज़्यादा से ज़्यादा नौजवान इन्टरनेट जैसे प्रभावशाली माध्यम का इस्तेमाल कर रहे हैं और अगर वो चाहें तो अपने विचारों से इस समाज में क्रान्ति ला सकते हैं, क्यूंकि हम उस देश में रह रहे हैं जिसे सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहा जाता है लेकिन इसी देश के हुकमरानों ने अपनी हुकूमत से लोकतंत्र के चौथे खम्बे अर्थात मीडिया पर भी अपना कब्ज़ा जमा लिया है, तो ऐसे में सभी दोस्तों से गुजारिश यही है कि वो इस सम्पूर्ण माध्यम का अपने आज़ादी भरे विचारों को दूसरों तक पहुंचाने के लिए इस्तेमाल करें।
                                                            चक्क दे फट्टे
रोहित : सुनील यार धोखा हो गया। सुनील : क्या हुआ, किसने धोखा दे दिया? रोहित : घरवालों ने। सुनील : वो कैसे? रोहित : घरवालों से मैंने किताबों के लिए पैसे मंगवाए थे, लेकिन उन्होंने किताबें ही भेज दी।

हैप्पी अभिनंदन में संगीता पुरी

श्रीमति संगीता पुरी जी
हैप्पी अभिनंदन में आज आप जिस ब्लॉगर शख्सियत से रूबरू होने जा रहे हैं, वो जहाँ एक तरफ हमें गत्यात्मक ज्योतिष ब्लॉग के जरिए भविष्य व वर्तमान की स्थिति से अवगत करवाती हैं, वहीं दूसरी ओर 'हमारा खत्री समाज' ब्लॉग के जरिए हमें इतिहास के साथ भी जोड़े रखती हैं।

हैप्पी अभिनंदन में विनोद कुमार पाण्डेय

विनोद कुमार पाण्डेय जी
इस बार हैप्पी अभिनंदन में बनारस की गलियाँ छोड़, नोयडा के 62 सेक्टर में जिन्दगी के हसीं पलों का आनंद लेने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर विनोद कुमार पाण्डेय जी पधारे हैं, जो अक्सर मिलते हैं 'मुस्कराते पल-कुछ सच कुछ सपने' ब्लॉग विला पर। वो किसी पहचान के मोहताज तो नहीं, लेकिन कलम के इस धुरंधर के बारे में कुछ शब्द लिखे बिन कलम मेरी रुकने को तैयार नहीं। जैसे भूमि कितनी उपजाऊ है, इस बात का अंदाजा तो उसकी फसल से ही लगाया जा सकता है। वैसे ही इतनी की सोच कितनी युवा है, वे तो उनकी लेखनी से हम सबको पता ही चल चुकी है। अब कुछ और बातें, जो ब्लॉग जगत से जुड़ी हैं, जो उनके जीवन से जुड़ी हैं, उन पर वो क्या सोचते हैं? चलो जानते हैं उनकी जुबानी।

कुलवंत हैप्पी : आपकी रचनाएं समाज की बुराईयों पर कटाक्ष करती हैं, जो आपके भीतर छुपे हुए एक क्रांतिकारी से रूबरू करवाती हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्रांतिकारी आखिर किससे प्रेरित है?
विनोद पांडेय:
कुलवंत जी, मैं ना तो कोई बहुत पॉपुलर ब्लॉगर ठहरा और ना ही बहुत बड़ा समाज सुधारक। फिर भी आपने हैप्पी अभिनंदन के लिए मेरा चयन किया, आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

अब रही बात मेरी रचनाओं कि तो यह बात सच है कि मैंने अपनी ज़्यादातर रचनाओं में समाज के ऊपर कटाक्ष किया या यह कहूँ कि अभी तक जो कुछ देखा, परखा और समझा वहीं सब लिखता हूँ, कुलवंत जी यह भावनाएँ किससे प्रेरित है, इस प्रश्न का उत्तर तो मैं भी ढूँढ रहा हूँ।

मैं एक हास्य व्यंग का कवि हूँ, एक आम आदमी का दर्द बाँटना चाहता हूँ, पर शायद कभी कभी दर्द बाँटने की इस प्रवृति में इतना मशगूल हो जाता हूँ कि उन्हें महसूस भी करने लगता हूँ, यूँ लगता है इक्कीसवीं सदी के इस विकासशील भारत, आधुनिक आदमी की सोच और समाज में फैली तमाम विषमताएँ को देख कर अनायास ही शब्द फूट पड़ते हैं और शायद मैं उन्हें रोक नही पाता।

कुलवंत हैप्पी : आपकी रचनाएं बेहद बढ़िया हैं, लेकिन टिप्पणियाँ उम्मीद से कम आती हैं (मुझे ऐसा लगता है), क्या इसके पीछे गम्भीर विषयों को स्पर्श करना है या तुम मुझे टिप्पणी दो, मैं तुझे टिप्पणी दूंगा वाली धारणा है?
विनोद पांडेय:
हम तो बस लिख देते हैं, जो कुछ अपने आस-पास दिखाई देता है।..आप सब लोगों का प्यार और आशीर्वाद मिलता है बस अच्छी हो जाती हैं।

कुलवंत जी, हो सकता है और ब्लॉगर्स की तुलना में टिप्पणियाँ थोड़ी कम मिलती हो पर अपने विचारों को व्यक्त करते समय मैं बिल्कुल नही सोचता कि ब्लॉगिंग की दुनिया में इसकी रेटिंग क्या होगी, मुझे पढ़ने और समझने वालों का एक खास वर्ग है, जिनका प्यार और आशीर्वाद निरंतर मेरा हौसला बढ़ाता रहता है,बस इससे अधिक मुझे कुछ नही चाहिए।

कुलवंत हैप्पी : आप हर रंग की कविताएं लिखते हैं, आपको कविताएं लिखने का शौक कैसे पड़ा एवं क्या ब्लॉग से पहले आपकी कविताएं कई और प्रकाशित हुई?

विनोद पांडेय :
जी हाँ, मैं हर रंग की कविताएँ लिखता हूँ क्योंकि मुझे किसी एक विधा में बँध कर रह जाना अच्छा नही लगता परन्तु हास्य मेरी सबसे प्रिय विधा हैं। कुलवंत जी बचपन से मुझे किताबें पढ़ने और कविताएँ सुनने का बड़ा शौक हैं और शायद यह एक खास वजह हैं, जिसने मेरे अंदर एक रचनाकार को जन्म दिया। ब्लॉग से पहले मेरी रचनाएँ अपने कॉलेज के कुछ खास दोस्तों तक ही सीमित थी। मेरे कवि बनने में मेरे कुछ उन दोस्तों का भी बहुत योगदान रहा जो निरंतर मेरा आत्मविश्वास बढ़ाते रहे।

कुलवंत हैप्पी : भगवान की दुआ से आपने पिछले महीने की दो तारीख को एक साल पूरा कर लिया ब्लॉग जगत में, इस एक साल दौरान ब्लॉग जगत में कैसे कैसे अनुभव हुए?
विनोद पांडेय:
मैं ब्लॉग जगत में कुछ सीखने और अपनी बात कहने के उद्देश्य से आया हूँ, कुछ बड़े लोगों का आशीर्वाद मिल रहा है, आप जैसे दोस्तों का प्यार मिल रहा है, और लोग मेरे मकसद को समझ भी रहें हैं, बस यही पर मेरी ब्लॉगिंग सफल हो जाती हैं, इतना अनुभव मेरे लिए बहुत है। बिना काम की चीज़ों को मैं हमेशा नज़रअंदाज कर देता हूँ।

कुलवंत हैप्पी: कितने प्रतिशत भारतीय हिन्दी ब्लॉगर एक सार्थक ब्लॉगिंग कर रहे हैं, 65 फीसदी, 75 फीसदी, 85, फीसदी या 95 फीसदी?
विनोद पांडेय:
कुलवंत जी, ब्लॉगिंग करने के सबके अलग अलग उद्देश्य होते हैं, हो सकता है कुछ मेरी समझ से बाहर हो इसलिए इस बात का जवाब देना मेरे लिए कठिन है कि कितने प्रतिशत सार्थक ब्लॉगिंग कर रहे है, हाँ एक बात ज़रूर कहना चाहूँगा की पढ़ने वालों की संख्या ज़रूर कम है..शायद लिखने वालों से भी कम।

कुलवंत हैप्पी: आपकी प्रोफाइल में बनारस और नोयडा है इनका आपके जीवन से क्या संपर्क है जरूर बताएं, और अगर मैं गलत न हूँ, आपका रिश्ता कुछ मुम्बई से भी है?
विनोद पांडेय:
कुलवंत जी, दोनों जगह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है, बनारस मेरी जन्मभूमि और नोयडा मेरी कर्मभूमि है। रही बात मुंबई की तो बस यहाँ बने फिल्मों का एक दर्शक हूँ, भाई, इसके अतिरिक्त मुंबई से मेरा कोई संबंध नही।

कुलवंत हैप्पी: स्टार ब्लॉगर का नाम शीर्षक में डाल दें तो टिप्पणियाँ धड़ाधड़ आती हैं वो भी स्टार ब्लॉगरों की, क्या ब्लॉगिंग टिप्पणियाँ प्राप्त करने के लिए की जाए?
विनोद पांडेय :
मुझे लगता है ऐसा सही नहीं, स्टार ब्लॉगर के सहारे कोई तक कब ब्लॉगिंग कर सकता है, अगर ब्लॉगिंग में कुछ करना है तो अपने नाम को इतना सार्थक बना दो कि वो खुद में एक स्टार ब्लॉगर बन जाए।

कुलवंत हैप्पी:  जिन्दगी की कोई ऐसी घटना, जो कुछ सिखाती हो, जरूर शेयर करें?
विनोद पांडेय :
वैसे तो जिंदगी रोज कुछ ना कुछ सिखाती रहती है, पर एक घटना मैं आप से ज़रूर शेयर करना चाहूँगा, बात कुछ दिनों पहले की है, मेरे घर से थोड़े दूर ग़ाज़ियाबाद रेलवे स्टेशन है। सुबह सुबह एक दिन मैं अपने एक रिश्तेदार को स्टेशन से लेने के लिया गया था तो एक बड़ा ही अजीब नज़ारा देखा कि एक बच्चा ने वहीं प्लेटफॉर्म पर बैठे एक बूढ़े भिखारी (जो दोनों पैरों से अपाहिज था) के कटोरे में 2 रुपए डाले और निकल लिया। उसके कुछ दिन बाद मुझे वही लड़का दूसरे प्लेटफॉर्म पर भीख माँगता दिखाई दिया, तो मैं दंग रह गया। एक भिखारी को दूसरे की मदद करते हुए देख।

अब आप भी समझ गए होंगे उस लड़के की सोच कितनी नेक थी जो खुद भीख माँग कर भी दूसरे की ज़रूरत को समझ रहा था और उससे अलग हम इंसान जो बस अपनी ज़रूरतों की भरपाई में लगे रहते है।


कुलवंत हैप्पी : चलते चलते कोई संदेश युवा सोच युवा खयालात के पाठकों एवं ब्लॉगर साथियों को?
विनोद पांडेय :
एक युवा होने के नाते मैं यही कहना चाहूँगा कि इस उम्र में साहस, शक्ति और जोश अन्य सभी अवस्थाओं से थोड़ा अधिक ही होता है, इसे व्यर्थ ना होने दे बल्कि इसका सार्थक उपयोग करें, अपने लिए तो हम सब जीते ही हैं,कभी चंद घड़ी दूसरों के लिए जिये, किसी ज़रूरतमंद की ज़रूरत को पूरा करने की कोशिश करें और किसी के आँसुओं को मुस्कान में बदलने की कोशिश करें, तरीका कुछ भी हो प्रयास ज़रूर करें मन को बहुत ही अच्छा लगेगा। आने वाला कल हमारा है। इसे खूबसूरत बनाना भी हमारा ही काम है, साथ ही साथ तन,मन और मस्तिष्क को स्वस्थ रखें। हो सकता है थोड़ा मुश्किल काम हो पर जितना ज़्यादा हो सकें खुश रहने की कोशिश करें।

चंद लम्हें हैं मिले, भींगी सुनहरी धूप में,
हमने सोचा हँस के जी लें, जिंदगानी फिर कहाँ

और अंत में..मैं अपने सभी ब्लॉगर्स साथियों को धन्यवाद देना चाहूँगा, जिनका प्यार और आशीर्वाद निरंतर मेरा हौसला बढ़ाता रहा, और एक बार फिर से आपको बहुत बहुत धन्यवाद कि आपने हैप्पी अभिनंदन में मुझे बुलाया।

वैसे भी ब्लॉगर्स के विचारों के प्रस्तुतिकरण के मामले में यह प्रोग्राम बेस्ट है। भगवान आपको और उन्नति दे...शुभकामनाएँ।

एक पत्रकार ने बंता जी से पूछा कि क्या कभी आपको प्यार हुआ है। तो बंता सिंह ने कहा कि रोज कहता हूँ उसको पर वो मानती नहीं, वो आगे से कहती है "आई लव यू टू", अब यह दूसरा कौन है मुझे पता नहीं।
आभार
कुलवंत हैप्पी

हैप्पी अभिनंदन में संजय भास्कर

हैप्पी अभिनंदन में आज आप जिस ब्लॉगर हस्ती से रूबरू होने जा रहे हैं, उस ब्लॉगर हस्ती ने बहुत कम समय में बहुत ज्यादा प्यार हासिल कर लिया है, अपने नेक इरादों और अच्छी रचनाओं के बल पर। वो अपनी बात कहने के लिए ज्यादा शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि अपने दिल की बात रखने के लिए वो दो चार पंक्तियाँ ही लिखते हैं, लेकिन पढ़ने का शौक इतना कि वो हर ब्लॉग पर मिल जाएंगे, जैसे सूर्य हर घर में रोशनी कर देता है, वैसे ही हमारे हरमन प्यारे ब्लॉगर संजय भास्कर जी भी हर ब्लॉग अपने विचारों का प्रकाश जरूर डालकर आते हैं। मैंने जब उनके ब्लॉग की पहली पोस्ट देखी, जो 19 जुलाई 2009 को प्रकाशित हुई, वो रोमन लिपि में थी सिर्फ एक लाईन में, लेकिन उनकी 'आदत.. मुस्कुराने की' ने उनको हिन्दी लिपि सीखने के लिए मजबूर कर ही दिया। उनकी मुस्कराने, पढ़ने और कुछ नया सीखने की आदत ने उनको एक शानदार ब्लॉगर बना ही दिया। आगे के बारे में वो क्या सोचते हैं, इसके बारे जाने के लिए पढ़िए, मेरे सवाल, उनके जवाब।

कुलवंत हैप्पी : आप ब्लॉगदुनिया में कैसे, कब और क्यों आए? यहाँ आने के बाद क्या कभी कुछ अलग सा महसूस हुआ?
संजय भास्कर :
मुझे ब्लॉगिंग से जोडऩे का श्रेय मैं अपने मित्र मलखान (आमीन) को देना चाहूंगा। कुछ दोस्त बीड़ी सिगरेट शराब आदि का नशा कराते हैं, उन्होंने मुझे ब्लॉगिंग का नशा लगाया। लगभग एक साल हो ही गया है। महसूस करता हूं कि मेरे जीवन में कुछ रंग शामिल हो गए हैं, जिनकी पहले कमी महसूस होती थी।

कुलवंत हैप्पी : एक ब्लॉगर के रूप में आपकी ब्लॉगदुनिया में अच्छी पहचान बन चुकी है, लेकिन हम जानना चाहेंगे असल दुनिया में आप अभी क्या पहचान बनाए हुए हैं?
संजय भास्कर :
ब्लॉगिंग की दुनिया भी तो असल दुनिया का ही हिस्सा है। हर जगह अलग पहचान होती है। मेरे दोस्तों की नजर में मैं क्या हूं, यह तो वही बता सकते हैं। चाहता हूं कि जीवन में किसी के दिल को चोट न पहुंचाऊं। मैं मुस्कुराता रहना चाहता हूं और दूसरों को भी मुस्कुराहट देना चाहता हूं। वैसे आजीविका के लिए टाटा इंडीकॉम के फतेहाबाद (हरियाणा) स्थित ऑफिस में कार्यरत हूँ, पिछले करीबन दो साल से, और साथ साथ पत्रकारिता की पढ़ाई भी चल रही है।

कुलवंत हैप्पी : जैसे कि आपने बताया कि आप टाटा इंडीकॉम में लोगों की दिक्कतों का समाधान करते हैं, क्या कभी लोगों की शिकायतें सुनते सुनते आप अपने ब्लॉग के शीर्षक (आदत..मुस्कराने की) का उल्लंघन करते हैं?
संजय भास्कर :
गुस्सा मानवीय व्यवहार का एक हिस्सा है। कोई इसे ज्यादा इस्तेमाल करता है तो कोई कम। मेरी कोशिश रहती है कि इस शीर्षक का उल्लंघन न करूं, लेकिन अगर कोई बात न समझे तो कभी-कभार हो भी जाता है।

कुलवंत हैप्पी : सुना है कि आप पत्रकारिता की पढ़ाई भी साथ साथ कर रहे हैं, क्या पत्रकारिता की दिशा में कैरियर बनाने के लिए टाटा इंडीकॉम का अनुभव काम आएगा?
संजय भास्कर :
अनुभव हर जगह काम आता है। शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र हो, जहां अनुभव काम न आता हो। मुझे लगता है कि पत्रकारिता का क्षेत्र काफी बड़ा है। दुनिया की हर चीज इसके घेरे में है। मेरा काम लोगों से इंटरेक्शन का भी है, जो हर क्षेत्र में जरूरी है।

कुलवंत हैप्पी : आप ज्यादातर अपने भावों को चार पाँच पंक्तियों में ही व्यक्त करते हैं, इसके पीछे कोई खास वजह?
संजय भास्कर :
पत्रकारिता का नियम है कि कम शब्दों में पूरी बात समझाई जाए। बस इसीलिए।

कुलवंत हैप्पी: कोई ऐसा रोचक लम्हा या सीख देती घटना, जो हमारे साथ बांटना चाहते हों?
संजय भास्कर :
हर लम्हा, हर घटना कुछ सिखाते हैं, किसी लम्हे का जिक्र करूं, किसका नहीं। अभी पिछले दिनों की बात है, जब ऑफिस में पुलिस वाले आ धमके थे और मेरे पैरों के तले से जमीं निकल गई थी। जहाँ इस घटना ने कुछ समय के लिए मेरी साँसें अंदर की अंदर और बाहर की बाहर रोक दी थी, वहीं एक अच्छा अनुभव भी करवाया। हुआ यूँ कि, फतेहाबाद के जितने मोबाइल ग्राहक हैं, उनके पहचान पत्र मुझसे होकर गुजरते हैं, लेकिन एक ग्राहक का पहचान पत्र देखने में छोटी सी चूक कर दी, जिसने उसका गलत इस्तेमाल कर दिया, और पुलिस पहुंच गई हमारे दरबार। जैसे तैसे कर मामला तो सुलझा लिया, लेकिन उसके बाद एक बात पक्की कर ली, अब सगे भाई को भी कनेक्शन बिना पहचान पत्र देखे नहीं देना।

कुलवंत हैप्पी :चलते चलते युवा सोच युवा खयालात के पाठकों और ब्लॉगर साथियों के लिए कोई संदेश जरूर दें?
संजय भास्कर :
हैप्पी जी एंड ऑल, बी हैप्पी।
चक्क दे फट्टे  
संजय के दोस्त आमीन ने बताया कि कोई व्यक्ति संजय को बार बार फोन करके तंग किए जा रहा था। संजय ने तंग आकर पुराना नम्बर बंद कर दिया एवं नया सिम ले लिया। और फिर उस नए नम्बर से उस व्यक्ति को एसएमएस किया, "वो पुराना सिम मैंने बंद कर दिया, अब तेरा बाप भी मुझे तंग नहीं कर सकता'।
आभार
कुलवंत हैप्पी

हैप्पी अभिनंदन में गिरीश बिल्लोरे

हैप्पी अभिनंदन में आज जिस ब्लॉगर हस्ती से आपकी मुलाकात होने जा रही है, वो लेखन ब्लॉगिंग से पॉडकास्टिंग ब्लॉगिंग तक पहुंच बना चुके हैं। वो जबलपुर में बैठकर भी दुनिया के किसी भी कोने में बैठे ब्लॉगर साथी के पास कुछ ही मिनटों में पहुंचकर, अपनी मधुर मीठी आवाज से उनके कानों में बातों का शहद खोलते, कुछ सवालों के मार्फत उनके भीतर के विचारों को जन जन तक पहुंचा देते हैं। अब उनके बारे में कुछ और कहने की जरूरत तो रह ही न गई, आप समझ ही गए होंगे मैं उनकी बात कर रहा हूँ, जो ब्लॉगर जगत के साँचे में बिल्कुल फिट बैठ गए, लेकिन गीत लिखने के शौकीन फिर भी कहते हैं गिरीश बिल्लोरे मिसफिट

कुलवंत हैप्पी : आपने ब्लॉगवुड में आगमन कब और कैसे किया?
गिरीश बिल्लोरे :
उस बच्चे के लिए नेट से जुड़ा जिसे आप सब आभास जोशी के नाम से जानतें हैं, बस मुझे नेट पर मिली श्रद्धा जैन जी और फिर पूर्णिमा वर्मा जी फिर छपाक से एक दिन मिले एक उड़न तश्तरी आई तीनों ने बना दिया ब्लॉगर।

कुलवंत हैप्पी : आपका लेखन ब्लॉगिंग से पॉडकास्टिंग ब्लॉगिंग की ओर जाना कैसे हुआ?
गिरीश बिल्लोरे :
किसी कवि नें कहा ''मैं वो परवाना नहीं जो आग में जल के मरे मुझको शम्मा के ज़लाने में मज़ा आता है" बस फिर मैंने पाया की पॉडकास्टिंग एक वो शमा है, जिसकी ओर कोई देख भी नहीं रहा ख़ुशी बेगानी जी और अन्य लोगों के बाद किसी ने इधर नहीं देखा बस दिमाग चल गया और चल निकली पाडकास्टिंग।
 

कुलवंत हैप्पी : एक प्रतिष्ठ ब्लॉगर के रूप में आपकी पहचान से तो हम रूबरू हैं, लेकिन असल जिन्दगी में रोजी रोटी चलाने के लिए  कौन सी जगह सेवाएं प्रदान कर रहे हैं, हमें बताएं?
गिरीश बिल्लोरे :
भाई, अपनी जन्म कुण्डली में महिलाओं की सेवा का बिंदु दर्ज है, बस महिला बाल विकास में बाल विकास परियोजना अधिकारी सह प्रोटेक्शन-आफिसर डोमेस्टिक वायलेंस फॉर वूमेन एंड चाइल्ड के टूर पर काम कर रहा हूम स्टेट ऑफ़ एम् पी में।

कुलवंत हैप्पी : आप खुद एक प्रतिष्ठ ब्लॉगर हैं, इसके अलावा आप पॉडकास्टिंग साक्षात्कार के दौरान कई ब्लॉगरों से विचारों का आदान  प्रदान भी करते रहते हैं, उसके आधार हम जानना चाहेंगे आपकी ब्लॉग के भविष्य और वर्तमान के बारे में क्या प्रतिक्रिया है?  
गिरीश बिल्लोरे : सभी की नज़र में ब्लॉगिंग का कल बेहद उजियारा है. मुझे भी कोई शक नहीं आप भी शक मत कीजिए हैप्पी जी बी हैप्पी।

कुलवंत हैप्पी : आपने जब से पॉडकास्टिंग ब्लॉगिंग शुरू की है, आपने लेखन ब्लॉगिंग की ओर से ध्यान हट लिया, क्या अब आप इस ओर रुख नहीं करेंगे?
गिरीश बिल्लोरे : कहावत याद है न ''चोर चोरी छोड़ देगा हेरा फेरी कैसे छोड़ेगा?'' हैप्पी जी मूलत: लेखक गीतकार हूँ ! सवाल ही पैदा नहीं होता लेखन से अलविदा कहने का। अरे भाई इस दौरान मैं अपना लेखन जारी रखे हुए हूँ. देखिये मिसफिट पर.

कुलवंत हैप्पी : जहाँ तक मुझे जानकारी है, आप एक अच्छे ब्लॉगर होने के साथ साथ अच्छे गीतकार भी हैं, क्या आप हिन्दी संगीत  जगत में बतौर गीतकार स्थापित होने की सोच रहे हैं?
गिरीश बिल्लोरे : जी, मेरा लक्ष्य भी अपने हिन्दी गीतों को स्वर-बद्ध कराना है, अब तक मेरे दो एलबम निकल चुके हैं एक नर्मदा अमृत वाणी [पंडित रवीन्द्र शर्मा की आवाज़ में ], दूसरा बावरे-फकीरा [आभास जोशी की आवाज़ में ] तीसरे की तैयारी में हूँ जो टंगटविषटर [लिख नहीं पा रहा हूं जीभ-पलट गीत समझिए जी] गीतों/प्रेम गीतों का होगा।

कुलवंत हैप्पी : आप काफी सुलझे हुए ब्लॉगर में शामिल हैं, ऐसे में आप से एक सवाल पूछना चाहूँगा कि ब्लॉगर जगत में आए दिन  किसी न किसी बात को लेकर विवाद होता रहता है, क्या वो ब्लॉगवुड के हित में है?
गिरीश बिल्लोरे : कदापि नहीं-नहीं, यहां तक की उनके हित में भी नहीं, जो गैंगस्टर होते हैं. ऐसा वे सोचतें हैं. की वो जीत गए पर आईने में अपनी शक्ल देखें तो खुद को बांच सकते हैं. कितनी कालिख पुती होती है चेहरों पर।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगर जगत में गुटबाजी भी देखने को मिलती है, क्या आप उस गुटबाजी को उचित मानते हैं, और क्या वो सार्थक  ब्लॉगिंग के लिए नुकसान देह नहीं है?
गिरीश बिल्लोरे :
गुटबाज़ लोग ब्लॉगिंग का नहीं खुद का इतिहास बिगाड़ रहे हैं. देखना कुलवंत भैया खरा सोना ही टिकेगा, बाकी सब ख़त्म हो जाएगा।

कुलवंत हैप्पी : आपकी जिन्दगी का एक रोचक लम्हा, जो आप हमारे साथ बाँटना चाहते हों?
गिरीश बिल्लोरे  :
कई हैं किन्तु हालिया अरे नहीं १४ मार्च २००९ की बात है बावरे-फकीरा लांचिंग की तैयारी के समय ऑडिटोरियम में तैयारीयां चल रही थी। मेरे एक मित्र ने अपनी विशेषज्ञता का परिचय देते हुए मेरे बड़े भाई साहब से लगभग तीन सौ सीट्स तक इशारा करते हुए कहा ''भैया, इस कार्यक्रम में तीन सौ लोग यानी 40 परसेंट सीट भर जाएँ तो समझिए आप सफल हुए'। मैंने देखा भाई साहब उस मित्र की बात सुन कर मुस्कुरा रहे थे। ठीक सात बजे हाल की पूरी बारह सौ कुर्सियां भर गईं और दीवारों से टिके लोग दिखाई दे रहे थे कुछ बाहर से कार्यक्रम सुन रहे थे, मित्र इस चमत्कार से हतप्रभ जब मुझसे कुछ कहने आये तो बस उस वक्त ईश्वर ने मुझसे कहलवा दिया ''भाई, तुमने सतीश भैया से जो कहा था उसे साईं बाबा ने दिल पे ले लिया और भेज दिए इतने लोग '' कुलवंत जी जो मैं कर रहा हूँ सच में मैं नहीं करता ईश्वर ही करता है। मैं तो बस करता हुआ दिखता हूँ जो कदापि घमंड की वज़ह ही नहीं ''बुल्ला की जाणां मैं कौण?'' यही ब्रह्म सत्य है।

कुलवंत हैप्पी : चलते चलते आप युवा सोच युवा खयालात के पाठकों और अन्य ब्लॉगर साथियों के एक संदेश जरूर दें?
गिरीश बिल्लोरे :
युवा सोच युवा खयालात के पाठकों को क्या कहूं सब एक से बढकर एक जबर्दस्त प्रतिभाशाली हैं। बस इतना ज़रूर कहूंगा ''इश्क कीजै सरेआम खुल कर कीजै- भला पूजा भी कोई छिप छिप के किया करता है?

चक्क दे फट्टे  
सुनना है कि एक बार हमारे प्रसिद्ध ब्लॉगर भूरा मिस्त्री की पत्नि अपने मायके गई हुई थी, करीबन बीस दिन बाद पत्नि का फोन आया, आकर ले जाओ, बीस दिन में आधी रह गई। आगे ब्लॉगर साहिब कहाँ कम थे, उन्होंने भी तुरंत कह दिया, कोई बात नहीं बस बीस दिन और ठहर जाओ।

भार
कुलवंत हैप्पी

हैप्पी अभिनंदन में वृंदा गांधी

हैप्पी अभिनंदन में आज मैं आपको जिस ब्लॉगर हस्ती से रूबरू करवाने जा रहा हूँ, उसको ब्लॉग जगत में आए भले ही थोड़ा समय हुआ हो, लेकिन वो हस्ती जिस सोच और जिस ऊर्जा के साथ ब्लॉगिंग की दुनिया में आई है, उसको देखने के बाद नहीं लगता कि वो लम्बी रेस का घोड़ा नहीं। उसके भीतर कुछ अलग कुछ अहलदा करने की ललक है, वो आससान को छूना चाहती है, लेकिन अपने बल पर, शॉर्टकट उसको बिल्कुल पसंद नहीं। वो जहाँ एक तरफ पटियाला यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही है, वहीं दूसरी तरफ ब्लॉगिंग की दुनिया में अपने लेखन का लोहा मनवाने के लिए उतर चुकी है। पत्रकारिता और ब्लॉगिंग से रूबरू हो चुकी वृंदा गांधी आखिर सोचती क्या हैं ब्लॉग जगत और बाहरी जगत के बारे में आओ जानते हैं उन्हीं की जुबानी :-

कुलवंत हैप्पी : आप ब्लॉग जगत में कैसे आए, और आपको यहाँ आकर कैसा लग रहा है?
वृंदा गांधी :
कुछ समय पहले तक ब्लॉग मेरे लिए एक स्वप्न था क्योंकि इसके बारे में अधिक जानकारी नहीं थी। मेरा यह स्वप्न हकीकत में तब्दील हुआ, जब में अपनी ट्रेनिंग जनसत्ता समाचार-पत्र में करने गई। वहाँ सबके ब्लॉग देख एक इच्छा जागृत हुई और अरविन्द शेष जो वहाँ के चीफ सब-एडिटर हैं। उन्होंने जाने से पहले यह ब्लॉग नामक उपहार मुझे दिया। बहुत ही अच्छा अनुभव है और बहुत ख़ुशी होती है कि मैं भी इसी ब्लॉगजगत का हिस्सा हूँ।

कुलवंत हैप्पी : क्या ब्लॉग को अभिव्यक्ति का उत्तम जरिया मानती हैं, अगर हाँ तो क्यों?
वृंदा गांधी :
मेरे ख्याल से ब्लॉग अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। मुख्यता नए लेखकों या कहू आने वाले नामों के लिए। किसी समाचार पत्र में भेजे गए लेख, कहानी या किसी रचना को प्रकाशित करने से पहले वह अपनी पॉलिसी देखेंगे। लेकिन ब्लॉग के राही हम अपनी राय, विचार हर मुद्दे पर बेबाकी से दे सकते हैं। यह मंच हमें अपनी बातों व अपनी सोच को बिना दबे सबके सामने रखने की स्वतन्त्रता प्रदान करता है, ताकि अन्य भी उसे देख अपनी प्रतिक्रिया जाहिर कर सके।

कुलवंत हैप्पी : आपने पत्रकारिता को किस उद्देश्य से चुना और आपके आदर्श कौन है?
वृंदा गांधी :
बीए के समय रेडियो सुनने का बहुत शौक था। सोचती थी कि न-जाने ये कितने बड़े लोग होते होंगे जिनकी कहानियाँ अख़बारों में प्रकाशित होती हैं, लेकिन कभी एहसास नहीं था कि एक दिन मेरा नाम भी उन्ही लोगों के बीच होगा। लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में आकर लगता है कि लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ की शक्ति को अगर सकरात्मक राह की ओर लगाया जाए तो कौन सी समस्या सुलझाई नहीं जा सकती। मगर यहाँ तो पूरा सिस्टम ही खराब है, कोई जन समाज की बात करने को ही तैयार नहीं। रही मेरे आदर्श की बात, तो मेरे आदर्श मेरे पिता जी व मेरी ताई माँ हैं। उन्होंने हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। मेरे पिता जी हमेशा से मेरे बड़े आलोचक भी रहे हैं। मेरी खूबियों से अधिक वो मेरी कमियों पर नजर रखते हैं।

कुलवंत हैप्पी : मीडिया या गैर मीडिया लोगों में से ज्यादा किसी को पढ़ना अच्छा लगता है?
वृंदा गांधी :
मीडिया लोगों को तो पढ़ती ही हूँ, क्योंकि हमारा यह क्षेत्र है। पर गैर-मीडिया लोगों को पढ़कर ज्यादा प्रसन्नता होती है कि वह लेखनी में अपना योगदान दे रहे हैं। वह कुछ नया और उत्तम स्तर का साहित्य सामने लेकर आ रहा हैं।

कुलवंत हैप्पी : अपनी जिन्दगी का कोई ऐसा रोचक लम्हा जो हमारे साथ बाँटना चाहती हों?
वृंदा गांधी :
अभी कुछ समय पूर्व मेरी एक कहानी दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित हुई। मेरे कमरे में वह समाचर-पत्र पड़ा था। एक लड़की आई और उसे देखने लगी, थोड़ी देर बाद उसने कहा क्या मैं इसे ले जाऊं पढ़ना चाहती हूँ। कुछ दिनों बाद वह फिर से आई और धन्यवाद कहने लगी। मैंने हैरानी से पूछा किस लिए? तो वह कहने लगी, मेरी बुआ जी ने आठवीं कक्षा की फेरवेल पर कुछ शब्द कहने थे। मैंने तुम्हारी कहानी उन्हें सुनाई वे बहुत प्रभावित हुई और उन्होंने यह अपने विद्यार्थियों के साथ भी सांझी की, जिससे वह कुछ शिक्षा ले सके। कहानी का नाम था ' समझदारी से जीत' की पढ़ाई-लिखाई हमारे लिए कितनी आवश्यक है। उसकी यह बातें सुन में भाव-विभोर हो गई और लगा कि शायद मेरी लेखनी भी सार्थक हो गयी।

कुलवंत हैप्पी : ज्यादा टिप्पणियाँ प्राप्त वाले ब्लॉगर क्या ज्यादा सार्थक लिखते हैं?
वृंदा गांधी :
मेरा मानना है की टिप्पणियाँ आवश्यक हैं, लेकिन उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कितने लोगों ने उसे ध्यानपूर्वक पढ़ा। टिप्पणियों के बारे में मेरा मानना है कि इससे हमें प्रोत्साहन मिलता है। वहीं और बेहतर लिखने की प्रेरणा मिलती है, क्योंकि हर व्यक्ति प्रशंसा का भूखा  है, परन्तु इसे मस्तिष्क पर चढ़ाने की बजाय सकरात्मक रूप से ले कि लोगों की अब आपसे उमीदें बढ गयी है और आपको अब पहले से अधिक मेहनत करनी है, जिससे आप उनके विश्वास को पूरा कर सके।

कुलवंत हैप्पी : आपको किस तरह के ब्लॉग पढ़ने अच्छे लगते हैं?
वृंदा गांधी :
निराश न हो, इरादे न बदल, तकदीर किसी वक़्त भी बदल सकती है। मैं हमेशा किसी एक चीज को पढ़ना पसंद नहीं करती, क्योंकि हर विषय के बारे में जानकारी आवश्यक है। वैसे मुझे कुलवंत जी का युवा सोच युवा ख़यालात व मोहल्ला पढ़ना पसंद है, जो में नियमित रूप से पढ़ना पसंद करती हूँ।

कुलवंत हैप्पी : युवा सोच युवा खयालात के पाठकों एवं अन्य ब्लॉगर साथियों के लिए कोई संदेश देना चाहे तो जरूर दें?
वृंदा गांधी :
अंत में सन्देश नहीं, मैं प्रार्थना करना चाहूंगी। नए लोगों को प्रोत्साहन दें, आपके द्वारा की गई एक टिप्पणी किसी को और बेहतर लिखने के लिए प्रेरित कर सकती है। अत: संकोच न करते हुए बिगड़ैल युवाओं से कहना चाहूंगी कि लड़कियों के साथ शालीनता से पेश आए। यह हमेशा याद रखें कि तुम्हारे घर में भी एक माँ और बहन तुम्हारा इंतजार कर रही है। उसको भी कल भरे बाजार निकलना है। अपनी युवा शक्ति का इस्तेमाल समाज सुधारक कामों में करें। सपने देखें व उन्हें पूरा करने के लिए जान लगा दे।

बुझ जाए शमा तो जल सकती है, तूफान से भी किश्ती निकल सकती है।

क्क दे फट्टे : भूरा मिस्त्री ने एक पढ़ी लिखी लड़की से पूछा, (जो काफी समय विदेश में रहकर भूरे मिस्त्री के गाँव लौटी थी) "आई लव यू" क्या अर्थ क्या होता है। उसने कहा, "मैं तुमसे प्यार करती हूँ"। भूरा मिस्त्री तुरंत बोला, 'तुम गोरियों की यहीं तो दिक्कत है कि कुछ पूछा नहीं कि बोल देती हैं तुमसे प्यार करती हूँ।

भार
कुलवंत हैप्पी

हैप्पी अभिनंदन में हरिप्रसाद शर्मा

जैसे आप जानते ही हैं कि हैप्पी अभिनंदन में हर बार हम किसी न किसी ब्लॉगर हस्ती से रूबरू होते हैं हम सब और जानते हैं उनके दिल की बातें। जो ब्लॉग हस्ती इस बार हमारे बीच मौजूद है, वो पेशे से सरकारी अधिकारी हैं, लेकिन शौक से साहित्य अनुरागी, क्रिकेट कमेंटेटर भी हैं। काव्य अनुरागी से बैंक अधिकारी और उसके बाद ब्लॉगर श्री हरि शर्मा से जानते हैं उनके दिल की बातें उनकी जुबानी।

कुलवंत हैप्पी : आप ब्लॉगजगत मैं कैसे आए, और आने से पहले क्या सोचा था?
हरि शर्मा : भाई कुलवन्त ब्लॉग से मेरा नाता ३ साल का है और ये तब शुरू हुआ जब मै मैनपुरी जिले में था। सोचा यही था कि ये उस आदमी के लिए जो थोड़े अपने विचारों को पठनीय बनाना चाहता है वो ऐसा कर सकता है ब्लॉग के मार्फत। मैंने सबसे पहले अनीता कुमार जी का ब्लॉग पढ़ा, फिर कोशिश करता रहा। और हिन्दी टाइप करना मुश्किल था, जी और पीछे बहुत जाना पड़ेगा।

कुलवंत हैप्पी : हरि जी पहले से ही कवि थे या बैंक अधिकारी के बाद कवि बने?
हरि शर्मा :
मेरा पहला सार्वजनिक परिचय क्रिकेट कमेन्ट्रेटर के रूप में था मेरे अपने इलाके में, और इस रूप को मेरे चाहने वाले बहुत पसन्द करते थे, लेकिन साथ साथ कविता प्रेम भी अपनी जगह था २००५ तक मैंने कभी भी अपनी लिखी कविता को संगृहित नहीं किया और नाही सार्वजनिक किया। कवि होने का भ्रम आज भी मुझे नहीं है लेकिन प्रथम श्रेणी का कविता प्रेमी मैं अपने आपको डन्के की चोट पर कहता हूँ, बहुत से प्रसिद्ध कवि लगभग पूरे रटे हुए थे उनमें सबसे अन्त में नाम आज के लोकप्रिय कवि डा. कुमार विश्वास है। हाँ! एक और बात, नौकरी की शुरुआत अधिकारी के रूप मे नहीं हुई लम्बे समय तक क्लर्क रहा।

कुलवंत हैप्पी : क्या आप भी अन्य उच्च बैंक अधिकारियों की तरह काले शीशों के पीछे रहते हैं, और आम जन से नहीं मिलते?
हरि शर्मा :
अभी जो दायित्व मेरे पास है उसमें आम जन से कोई सरोकार नही है, लेकिन पहले जब में फ़ील्ड ऑफिसर था बाद में शाखा प्रबंधक बना था, तब शायद अपनी जमात में सबसे ज्यादा आम आदमी के बीच था सिर्फ़ दलाल के अलावा मेरे कमरे में हर किसी का स्वागत था। अभी में जिस कार्यालय में हूँ, वहां समाशोधन का काम होता है। वो केन्द्रीयकृत समाशोधन कार्यालय है।

कुलवंत हैप्पी : क्या ब्लॉग जगत और बैंक कार्य के साथ जुड़ने के बाद आपने क्रिकेट केमेंट्री करना छोड़ दिया?
हरि शर्मा :
अब तो बहुत समय हो गया क्रिकेट केमेंट्री छोड़े। कभी कभी अपने शहर जाता हूँ और कोई मैच देखने जाता हूँ तो पुराने लोग शोर करते हैं कि आप केमेन्ट्री करें तो नए लोग भी जगह छोड़ देते हैं लेकिन अब ये यदा कदा ही होता है। जिन्दगी इस तरफ़ से उदास सी है।

कुलवंत हैप्पी : आपने ऊपर अपने शहर जाने की बात की, तो आप अब कहाँ रहते हैं और आपका शहर कौन सा जरूर जानना चाहेंगे?
हरि शर्मा :
जी मेरे ब्लॉग का शीर्षक है नगरी नगरी द्वारे द्वारे। ये यात्रा हिन्डौन सिटी जो मेरा पारिवारिक निवास स्थान है वहाँ से शुरू हुई और अभी जोधपुर हूँ । 2004 से एक यात्रा पर हूँ, जिसके दौरान जयपुर, अलीगढ, गाज़ियाबाद, आगरा, भोगाव और अलीपुर खेडा ( दोनों मैन्पुरी जिला) घूमा और अब जोधपुर में हूँ। अगली पोस्टिंग की जल्दी उम्मीद है।

कुलवंत हैप्पी :  2004 से यात्रा पर हैं, इस यात्रा के दौरान कई जगहों पर जाना हुआ, लेकिन सबसे सुखद और अच्छा वातावरण कहाँ मिला?
हरि शर्मा
: सुख और दुख साथ चलते रहते है कभी सुख के लिए इन्तेजार करना पड़ता है, हम अगर आने वाली स्थिति के लिए पहले से ही तैयार हों तो बड़े से बड़ा दुख भी छोटा सा लगता है।

कुलवंत हैप्पी : आप ब्लॉगिंग की दुनिया में पिछले तीन साल से हैं, इन तीन सालों में ब्लॉगरों की संख्या ग्राफ बहुत तेजी के साथ बढ़ा है, इससे हिन्दी ब्लॉगिंग को फायदा हुआ या नुक्सान?
हरि शर्मा :
सबके ब्लॉग लिखने का मकसद एक नहीं है। मोटे तौर पर ३-४ तरह के लोग यहाँ हैं। पत्रकार जो अपने अतिरिक्त मसाले को यहाँ छाप देते हैं। इसके अलावा साहित्यकार, लिखने की कोशिश करने वाले हम जैसे साहित्य अनुरागी और खुद की अभिव्यक्त करने को तरसते लोग। जितना यहाम हम पढ़ पाते हैं उतना पुस्तके खरीदकर तो पढ़ नहीं सकते तो मेरे लिए तो ब्लॉग का विस्तार एक सुखद सूचना है लेकिन हाँ इसे परिपक्व होने में समय लगेगा जो हर विधा के साथ होता है।

कुलवंत हैप्पी : क्या ब्लॉग केवल ब्लॉगर साथियों के लिए लिखे जाते हैं, उनका आम पाठक से कोई सारोकार नहीं?
हरि शर्मा :
आपने बहुत बढिया प्रश्न किया है। मुझे लगता है कि ब्लॉग को पाठकों के लिए होने चाहिए। इसी में इसकी व्यापक सार्थकता है, लेकिन सफ़ल ब्लॉगर वो हैं जिसे अन्य ब्लॉगर ध्यान से पढ़ते हैं। इसमें कोई विरोधाभास नहीं है, पर इस माध्यम को आम पाठक तक पहुँचने में ही सबकी भलाई है। मै खुद १-२ माह पहले तक ब्लॉगवाणी पर नहीं जाता था और खोजकर ही ब्लॉग पढ़ता था।

कुलवंत हैप्पी : जिन्दगी का कोई रोचक और हसीं लम्हा जो मेरे और युवा सोच युवा खयालात के पाठकों के संग बाँटना चाहते हों?
हरि शर्मा :
२००४ मे हम लोग पूना गए थे ४ सप्ताह के लिए। वहां से आये तो एक साथी को मैंने मुम्बई घुमाई। अमिताभ जी के बंगले पर पहुंचे। तो मस्खरी के मूड में थे। दरवान से पूछा कि अमित भैया हैं क्या? वो अलर्ट हो गया और बोला नहीं, वो तो जलसा में रहते हैं। फिर मैंने पूछा कि यहां कौन रहता है?, तो वे बोला कि यहां अभिषेक बाबा और मालकिन (जया जी) रहती हैं, तो मैंने पूछा कि जलसा में कौन कौन रहता है। उसने बताया कि वहां साहब और उनकी माताजी रहती हैं। मैंने कहा कि यार अमित भैया आए तो कहना कि आदमी के मकान चाहे कितने ही हो कम से कम रहे तो ठीक से। एक बार ऐसे ही सुनील गवास्कर से मुलाकात हुई
मुम्बई में। उनके आटोग्राफ के लिए लम्बी कतार लगी थी। मैं सीधा गया और चमचों के बीच से निकलते हुए बोला और सुनील कैसे हो? चमचे हट गए। चमचे एक तरफ़ हट गए। सुनते ही गवास्कर बोले मैं ठीक हूँ, आप कैसे हैं। ऐसे ही थोड़ी बात करके उनसे बच्चों के लिए आटोग्राफ लिया और चले आए। ऐसे ही माधव राव सिन्धिया जब केन्द्र में मन्त्री थे तब उनसे स्टेज पर जाकर हाथ मिलाया।

कुलवंत हैप्पी : अंतिम सवाल, अगर मैं या कोई अन्य व्यक्ति जयपुर, अलीगढ़, गाज़ियाबाद, आगरा या जोधपुर जाना चाहे तो कौन सी जगह आप उसको देखने घूमने के लिए सुझाव के तौर पर बताना चाहोगे?
हरि शर्मा :
आगरा मे ताज महल को एक तरफ़ रख दें तो शहर के रूप में आकर्षित नही करता, जयपुर शहर भी देखने लायक है और दर्शनीय स्थल भी बहुत हैं। वैसे आपका सूर्य नगरी जोधपुर में भी स्वागत है।

चक्क दे फट्टे : एक बार भगवान जमीं पर आए, वो गलती से भूरा मिस्त्री को मिल गए। वो उसको लेकर शराब के ठेके पर पहुंच गया। वहाँ दोनों ने खूब पी। कुछ देर बाद भूरा मिस्त्री बोला, तुम को चढ़ती क्यों नहीं। आगे से उत्तर आया "मैं भगवान हूँ"। तो भूरा मिस्त्री बोला "चढ़ गई साल्ले नूँ।
आभार
कुलवंत हैप्पी

हैप्पी अभिनंदन में महफूज अली

हैप्पी अभिनंदन में आज आप जिस ब्लॉगर हस्ती से मिलने जा रहे हैं, उनकी सोच युवा है, लेकिन दिल में आज भी कोई बच्चा बसता है। उनका मिलनसार स्वाभाव, सफलता की शिखर को छूने के बाद भी जमीं से लगाव उनकी शख्सियत को चार चाँद लगाता है। नवाबों की नगरी लखनऊ के पॉश इलाके में जन्में, एक हाई स्टैंडर्ड स्कूल में पढ़े और एक बिजनसमैन के साथ साथ एक शानदार कवि के रूप में अपनी पहचान बनाई, हाँ सही पहचाना वो हैं अपने महफूज अली भाई। अपने बारे में वो और क्या क्या कहते हैं, उनकी कहानी उनकी जुबानी सुनते हैं।

कुलवंत हैप्पी : अभिनेता सलमान खान से सब पूछते हैं, लेकिन महफूज अली से हम पूछना चाहेंगे शादी कब करोगे?
महफूज अली :
शादी इस साल हो जाने की उम्मीद है। भाई

कुलवंत हैप्पी : आपकी नजर में भगवान की क्या परिभाषा है?
महफूज अली :
भगवान वो ताकत है जो सर्वशक्तिमान है....हर जगह है.... और भगवान ही इस दुनिया को चला रहे हैं... इस सम्पूर्ण ब्रम्हांड पर उन्हीं का शासन है...हर क्रिया -प्रक्रिया बिना भगवान् इजाज़त के नहीं होती।

कुलवंत हैप्पी : आप इंग्लिश में भी कविताएं लिखते हैं और हिन्दी में भी, लेकिन असली मजा किसी भाषा में आता है?
महफूज अली :
अब सही कहूँ तो कॉन्वेंट बैकग्राउंड होने की वजह से इंग्लिश में आसानी रहती है। मैं बचपन से इंग्लिश में ही लिखता रहा और इंग्लिश में मेरी वार्ड पॉवर भी स्ट्रोंग है। मुझे चार-चार डिक्शनरी याद हैं, और Wren & Martin की इंग्लिश ग्रामर पूरी याद है। हिंदी में लिखना 1995 में शुरू किया था, और मेरी हिंदी अंग्रेजी मिश्रित होती थी। आज भी है... हिंदी में जबसे लिखना शुरू किया, और जो सफलता मिली फिर पीछे मुड़के नहीं देखा। मैं अब हिंदी और इंग्लिश में सामान रूप से लिखता हूँ, पर यह है कि हिंदी में शब्दों को लेकर अटक जाता हूँ। और जब भी अटकता हूँ,तो शरद कोकास भैया या फिर अजित वडनेरकर भैया को फोन लगाकर पूछ लेता हूँ....आप दोनों से मुझे बहुत मदद मिलती है और आप दोनों को पढ़कर ही मेरी हिंदी और अच्छी हुई है। गिरिजेश राव जी भी बहुत मदद करते हैं, पर अब हिंदी में लिखना ज्यादा अच्छा लगता है और मैं हिंदी में ही अब लिखना चाहता हूँ, इंग्लिश और हिंदी साहित्य में तकरीबन सब कुछ पढ़ा है।

कुलवंत हैप्पी : आप सफल कवि होने के साथ साथ बिजनसमैन भी हैं, आपकी सफलता का राज या गुरूमंत्र?
महफूज अली :
कवि तो मैं बचपन से ही हूँ। मैं चार साल की उम्र से कविता लिख रहा हूँ। फिर कवि से लेखक हुआ, बेसिकली तो मैं academician हूँ। मैं सीनियर प्रवक्ता हूँ, विश्विद्यालय में.... और IIT कानपुर के डिपार्टमेंट ऑफ़ सोशल साइंसेस व IIM लखनऊ में visiting faculty । बिजनेसमैन तो मैं ऐसे हुआ कि मेरा एक सपना था कि मेरा एक बिज़नस भी हो...जिससे कि मैं हमेशा secured रहूँ और कई लोगों को रोज़गार भी प्रदान करूँ....... तो अपनी Phd... के दौरान मैंने एक Pharmaceutical company की स्थापना की... मेरी कम्पनी का नाम Medica Herbal and Research Laboratory है... कृपया वेबसाईट देखें www.medicaherbals.com मेरी सफलता का राज़ Time management (समय प्रबंधन) है... मेरा यह मानना है की इस दुनिया में सबके पास चौबीस घंटे हैं....हर महान काम चौबीस घंटे में ही हुए हैं..मैंने समय को बाँट कर रखा हुआ है .... १० घंटे काम करता हूँ... ६ घंटे सोता हूँ.... १ घंटा एक्सरसाइज़ करता हूँ... ४ घंटे रोज़ पढता हूँ....आधा घंटा सुबह टिप्पणी करता हूँ..आधे से एक घंटा रात को टिप्पणी करता हूँ... बाकी का समय यहाँ वहां के नित्य कामों में ...बस इसी तरह समय को बाँट कर काम करता हूँ... और यही सफलता का राज़ है।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगिंग की दुनिया में किस तरह आए और कैसा लगा ब्लॉगवुड?
महफूज अली :
ब्लॉग्गिंग में मैं सन २००२ में आया.... मैं पहले इंग्लिश ब्लॉगिंग किया करता था... हिंदी ब्लॉगिंग में मैं २००८ में आया...और सक्रिय रूप से सन २००९ से हिंदी ब्लॉगिंग में हूँ...ब्लॉगवुड में आकर तो बहुत अच्छा लगा... यहाँ मुझे इतने रिश्ते और अपने लोग मिले हैं.... अब तो यह ब्लॉगवुड ही मेरा परिवार है।

कुलवंत हैप्पी :  बिजनसमैन, कवि और ब्लॉगर होने के अलावा आप अतिथि लेक्चरार भी हैं, फिर इन सबको मैनेज कैसे करते हैं?
महफूज अली :
इसका जवाब ऊपर ही है.... मैनेज कर लेना भाई।

कुलवंत हैप्पी :  एक बिजनसमैन को साहित्य की तरफ कौन सी वजह खींच लाई और कौन सा कवि या लेखक आपका प्रणेता है?
महफूज अली :
बिज़नेसमैन तो मैं बहुत बाद में बना हूँ...लिखने-पढने का शौक मुझे मेरी माँ ने डलवाया....हमारे घर में हिंदुस्तान की हर पत्रिका का सब्सक्रिप्शन है और था भी। साहित्य की ओर मैं बचपन से ही आकर्षित था...मैं आज भी कॉमिक्स पढता हूँ। मेरे पसंदीदा कवि Percy Byshe Shelly हैं, इनको को ही पढ़कर मुझे लिखने का शौक हुआ और पसंदीदा लेखक E. R. Braithwaite हैं। Brooker T. Washington की लिखी कहानी My Struggle for an Education आज भी मेरे दिमाग पर पूरी तरह छाई हुई है।

कुलवंत हैप्पी : नवाबों के शहर लखनऊ में सबसे बढ़िया जगह कौन सी लगती है?
महफूज अली :
पुराने लखनऊ में बड़ा इमामबाड़ा, लक्ष्मण झूला मैदान और नए लखनऊ में, जहाँ मैं रहता हूँ गोमती नगर में। मुझे बहुत अच्छी लगता है गोमतीनगर, लखनऊ का क्या पूरे उत्तर प्रदेश की सबसे पोश इलाका है और हर सुविधा सिर्फ यहीं हैं। VIP area होने की वजह से गोमतीनगर बहुत अच्छा लगता है।

कुलवंत हैप्पी : कोई प्यारा पल, जो हम से बाँटना चाहते हों?
महफूज अली :
मैं शिमला डगशाई में बोर्डिंग में पढता था। तब फर्स्ट क्लास में था। मम्मी की बहुत याद आ रही थी, मैं रोते रोते सो गया था, पर जब आँख खुली तो सामने मम्मी थीं। जबकि मम्मी को अगले महीने आना था, अब जब रोता हूँ और यही ख्याल आता है कि काश! मम्मी आ जाएँ.... खुदा मेरी मम्मी को जन्नत बख्शें....मम्मी.... मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ।

कुलवंत हैप्पी : जाते जाते कोई ऐसा संदेश जो पूरे ब्लॉग जगत और युवा सोच युवा खयालात के पाठकों को देना चाहते हों?
महफूज अली :
प्यार दो, प्यार पाओगे।

चक्क दे फट्टे : टीचर ने कहा, चलो जुर्माना मुआफी का निवेदन पत्र लिखो। भूरे मिस्त्री ने तुरंत पूछा, मैडम जी जुर्माना कितने रुपए है। मैडम ने कहा, 'पाँच रुपए'। भ्रूरा मिस्त्री अपने कपड़ों से मिट्टी झाड़ते हुए उठा और मैडम के पास आकर बोला "लो पकड़ो, पाँच रुपए, मेरे पिता कहते हैं कि पाँच दस रुपयों के लिए बेइज्जती करवाना अच्छी बात नहीं होती"

भार
कुलवंत हैप्पी

हैप्पी अभिनंदन में ललित शर्मा

हैप्पी अभिनंदन में आज आपको जिस ब्लॉगर हस्ती से रूबरू करवाने जा रहा हूँ, वैसे तो आप उन्हें अच्छी तरह वाकिफ होंगे, लेकिन किसी शख्स के बारे में जितना जाना जाए, उतना कम ही पड़ता है। वो हर रोज किसी न किसी ब्लॉगर का चर्चा मंच ,चर्चा हिन्दी चिट्ठों की !!! जैसे अन्य ब्लॉगों के जरिए प्रचार प्रसार करते हैं। कई क्षेत्रीय भाषाओं का ज्ञान भी रखते हैं, ताऊ और फौजी उनको बेहद प्यारे हैं, सच में उनकी मुछें जहाँ ताऊ की याद दिलाती हैं, वहीं उनके ब्लॉगों पर लगे स्वयं के फौजी वाले कार्टून उनके देश भक्ति के जज्बे को उजागर करते हैं, वैसे हरियाणा के घर घर में एक फौजी पैदा होता है, ऐसी बात भी प्रचलन में है। अगर देखा जाए तो अभनपुर छत्तीसगढ़ की शान ब्लॉगर ललित शर्मा जी भी फौजी से कम नहीं, वो बात अलहदा है कि उनकी हाथ में बंदूक की जगह कलम है, वैसे एक महान एवं महरूम पत्रकार प्रभाष जोशी ने कहा है कि जब तोप न चले तो अखबार निकालो, मतलब कलम उठाओ, क्रांति लाओ। आओ चर्चा पान की दुकान पर करने वाले एक कलम के फौजी से जानते हैं उनके दिल की बातें।

कुलवंत हैप्पी : पंजाबी बापू के खुंडे 'लठ' की तरह हरियाणा का ताऊ बड़ा फेमस है, ताउ के शै है बतलाईए?
ललित शर्मा: वाह! भाई हैप्पी वाह! - सवाल भी ढूंढ़ के लाया गजब का, ताऊ शब्द हरियाणा, राजस्थान, यु.पी. के कुछ हिस्सों, दिल्ली, आदि में प्रचलित है. ताऊ शब्द सुनते ही मन में एक मूछ वाले बुजुर्ग माणस की तश्वीर उभरती है, जिसके हाथ में लठ हो. ताऊ एक ऐसी शख्सियत है जिसका कहा छोटे हो या बड़े सब मानते हैं. ताऊ भतीजों की तो दोस्ती मशहूर होती है. जो चीज बालक अपने बाप से नहीं मांग सकता वो ताऊ से मांग ले तो सहज उपलब्ध हो जाती है. अगर ताऊ एकाध लठ भी मार दे तो परसाद समझ के खाना भी पड़ जाता है. ताऊ से बड़ी कोई अदालत नहीं होती इसके बाद तो भगवान ही मालिक है. मेरे हिसाब से तो ताऊ एक संस्कृति और विचार धारा का नाम है. जिसमे प्यार, सम्मान, रौब-रुतबा सब समाया हुआ है. ताऊ एक जिम्मेदार आदमी का प्रतीक है. इसलिए मै ताऊ का भरपूर सम्मान करता हूँ और भरपूर स्नेह पाता हूँ.
   
कुलवंत हैप्पी : आप कितनी भाषाओं में लिखते हैं?
ललित शर्मा-  विभिन्न भाषाओँ को पढ़ने लिखने का शौक है मुझे अवधी, भोजपुरी गुजराती भी बड़ी प्यारी लगती है. मैंने संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, गुरमुखी का अक्षर ज्ञान पाया है, अब अभ्यास छुट गया है फ़िर भी जीवन के इन वषों में भाषाओं में सिद्ध होने की कोशिश रहूँगा. अभी भी मैं भाषाओं का विद्यार्थी हूँ. तथा जीवन पर्यंत विद्यार्थी ही रहना चाहता हूँ. तमिल और मलयालम सीखने की कोशिश कर रहा हूँ। अब मुझे समय कम मिल पाता है. ब्लाग पर हिंदी, हरियाणवी और छत्तीसगढ़ी में लिख रहा हूँ निरंतर, पंजाबी में लिखी रचनाएँ भी हैं, अब उन्हें भी प्रकाशित करना चाहूँगा. विद्या अध्यन से कभी आलस नहीं करना चाहिए. नीतिकारों ने कहा है-
आलस्यं मदमोहौ च चापल्यं गोष्ठिरेव च्।
स्तब्धता चाभिनित्वं तथाSत्यागित्वमेव च।।
सुखार्थिन: कुतो विद्या नास्ति विद्या्र्थिन: सुखम्।
सुखार्थी वा त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेतसुखम्॥
एते वै सप्त दोषा: स्यु: सदा विद्यार्थिनां मता। 

कुलवंत हैप्पी : आप चिट्ठा चर्चाओं पर भी एक ब्लॉग संचालित करते हैं, ज्यादा चिट्ठा चर्चाएं पक्षपात करती हैं। इस बारे में आपकी क्या राय है?
ललित शर्मा :  आपने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया? मैं नहीं मानता की चिटठा चर्चाओं में कोई पक्षपात होता है. सभी के पठनीय लेखों का समवेश किया जाता है. जब मैं ब्लॉग जगत में आया था तो रवि रतलामी जी ने मेरे ब्लॉग "शिल्पकार के मुख से" में प्रकाशित एक गजल "शाहकार बनने पर वे कटवा देंगे मेरे हाथ" की चर्चा की थी. जबकि मेरा आज भी उनसे रूबरू परिचय नही है. वो मेरे ब्लॉग पे आते हैं और मै उनके ब्लॉग पे जाता हूँ. अगर पक्षपात होता तो हमारा जिक्र ही नही होता. मै अभी "चर्चा मंच"-"समय चक्र" एवं "चर्चा हिंदी चिट्ठों की" पर ब्लाग चर्चा कर रहा हूँ. सभी के उत्कृष्ट एवं पठनीय लेखन का चिटठा चर्चा में उल्लेख किया जाता है.

कुलवंत हैप्पी : व्यंगकार, कवि और लेखक आप हैं ये तो सब जानते हैं, लेकिन असल जिन्दगी में क्या करते हैं कुछ बतलाईए?
ललित शर्मा - अभी मेरा प्रमुख कार्य अध्यन और अध्यापन ही है और यह जीवन ही असल जिंदगी है. जो सबके सामने है.

कुलवंत हैप्पी : जब आपकी रचनाएं संपादकों द्वारा आपको वापिस भेजी गई तो आपको कैसा लगा ?
ललित शर्मा - हा हा हा! जब मैंने कवितायेँ लिखना प्रारम्भ किया तो उस समय मेरी उमर १३-१४ साल की थी. बस धुन सवार रहती थी लिखने की्। उसके बाद श्रोता ढूँढना पड़ता था सुनाने के लिए. बस जो भी जहाँ भी पकड में आ गया दो चार कविता सुना ही देता था. उस समय कविता के शिल्प की समझ भी नहीं थी. जो आया लिख मारा. उसके बाद उसे अखबारों और पत्र पत्रिकाओं में भेजता था. मौलिक होने का प्रमाण पत्र और एक टिकिट लगे लिफाफे के साथ. अधिकांश कवितायेँ वापस आ जाती थी. खेद का सन्देश साथ में होता था. तब बड़ी कोफ़्त होती थी. सम्पादकों पर गुस्सा भी आता था कि मेरी कवितायेँ क्यूँ नहीं छापते. मेरा गांव लग-भग उस समय ८००-९०० की आबादी का था. जिसमे लिखने वाला कोई भी नहीं था कि मुझे कोई उस्ताद मिल जाता और मुझे कविता लेखन का रास्ता दिखाता. अब तो सब मिल गए और जितने मिले सब उस्ताद ही मिले.

कुलवंत हैप्पी : ढाई अक्षर प्रेम के तो सुने थे, लेकिन ढाई पंक्ति कविता आपने कब और कैसे लिखने की सोची?
ललित शर्मा- ढाई अक्षर प्रेम का राग तो अब बहुत ही पुराना हो चूका है. रिकार्ड घिस चूका है. अब इसे बदल देना चाहिए कुछ नया होना चाहिए ढाई पंक्ति की प्रेरणा मुझे बड़े भाई जैसे मित्र शरद कोकास जी से मिली तथा जब से आपने पढ़ी तब से ही लिखी.    

कुलवंत हैप्पी : रोचक हो या गम्भीर एक यादगार पल, जो सबके साथ सांझा करना चाहते हों?
ललित शर्मा - एक बहुत ही रोचक किस्सा है, सुनिए-सभी पंथों एवं धर्मों की मान्यता है कि शवयात्रा में शामिल होना पुण्य का काम है. दोस्त हो या दुश्मन, परिचित हो या अपरिचित सभी की अंतिम यात्रा में शामिल होना चाहिए, ये बात मैंने भी गांठ बांध रखी थी. किसी की भी शव यात्रा घर के सामने से निकले मैं अपना पंछा (अंगोछा) उठा कर उसमें शामिल हो जाता हूँ, एक दिन ऐसी ही एक शव यात्रा घर के सामने से निकली, उसमें सभी परिचित लोग दिखे, तो मैंने सोचा कि गांव में किसी की मृत्यु हो गयी और नाई मुझ तक नहीं पहुंच पाया मुझे जाना चाहिए तो मैंने अपना अंगोछा उठाया और चल दिया, श्मशान जाने के बाद मैंने किसी से नहीं पूछा कि कौन मरा है? अपने हिसाब से कयास लगाया. हमारे मोहल्ले में एक फौजी रहता था और वो काफी वृद्ध हो गया था, वो लगातार बीमार भी रहता था, उसके नाती लोग उसके साथ रहते थे. श्मशान में फौजी के नाती लोग सभी क्रिया कर्मों को अंजाम दे रहे थे. अब मैंने सोच लिया कि फौजी की ही शव यात्रा है. अंतिम संस्कार के बाद घर आया तो मेरी दादी ने पूछा कि कौन मर गया? मैंने कहा फौजी. उन्हें बता कर मैं नहा कर पूजा पाठ करके किसी काम से बस स्टैंड चला गया. जब वापस घर आया तो देखा घर के सब लोग एक साथ बैठे थे. मैं देखते ही चक्कर में पड़ गया कि क्या बात हो गयी इतनी जल्दी? मैं तो अभी ही घर से गया हूं बाहर. दादी ने पूछा " तू किसकी काठी "अंतिम यात्रा"में गया था. मैंने कहा "फौजी की. तो वो बोली "फौजी तो अभी आया था. रिक्शा में बैठ के और मेरे से 100 रूपये मांग कर ले गया है. वो बीमार है और इलाज कराने के लिए पैसे ले गया है. अब मैं भी सर पकड़ कर बैठ गया "आखिर मरा वो कौन था? जिसकी मैं शव यात्रा में गया था. मैंने कहा ये हो ही नहीं सकता मैं अपने हाथों से लकडी डाल के आया हूँ. वो किधर गया है? उन्होंने कहा कि बस स्टैंड में डाक्टर के पास गया होगा. मैंने फिर अपनी बुलेट उठाई और बस स्टैंड में उसको ढूंढने लगा. एक जगह पान ठेले के सामने वो मुझे रिक्शे में बैठे मिल गया. मैंने उतर के देखा और उससे बात की. अब मैं तो सही में पागल हो चूका था कि "मैं आखिर किसी शव यात्रा में गया था" मेरी तो समझ में नहीं आ रहा था, क्या किया जाये? फिर मेरे दिमाग में आया कि फौजी के नाती लोगों से पूछा जाये. अब पूछने में शरम भी आ रही थी कि वे क्या सोचेंगे? महाराज का दिमाग खसक गया है. काठी में जा के आने के बाद पूछ रहा है कौन मरा था? किसकी काठी थी? मैं इसी उधेड़ बुन में कुछ देर खडा रह फिर सोचा कि चाहे कुछ भी पूछना तो पड़ेगा. ये तो बहुत बड़ी मिस्ट्री हो गयी थी.आखिर मैं उनके घर गया. दूर में मोटर सायकिल खड़ी करके उसके छोटे नाती को वहीँ पर बुलाया और उससे पूछा. तो उसने बताया कि उसके पापा (फौजी के दामाद) की मौत हुयी है वो भी काफी दिन से बीमार चल रहे थे.

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगिंग दुनिया में कब आए, और इस दुनिया को आप कितना समय देते हैं? उस समय में से कितना पढ़ने और कितना लिखने में को देते हैं?
ललित शर्मा-
ब्लोगिंग की दुनिया में आए तो साल हो गया. लेकिन सक्रिय रूप से जुलाई में आया. तब से लेकर आज तक मैं ब्लॉगिंग को लगभग ६ घंटे देता हूँ जिसमें लिखना पढ़ना दोनों शामिल है. मतलब जब भी समय होता है, उसे पूरी गंभीरता से ब्लॉगिंग को समर्पित करता हूँ. 

कुलवंत हैप्पी : आपकी राय में कितने प्रतिशत ब्लॉगर सार्थक ब्लॉगिंग करते हैं?
ललित शर्मा-
सभी ब्लॉगर ही अपनी-अपनी मति के अनुसार सार्थक ब्लॉगिंग ही कर रहे हैं. हमारे पास ऐसा कोई पैमाना नहीं है किसी की ब्लॉगिंग का मुल्यांकन कर सकें। जो भी ब्लागिंग में है वह अपने जीवन का महत्वपुर्ण समय और धन इसमे अर्पित कर रहा है, सभी की पसंद और उद्देश्य एक नहीं हो सकते। इसलिए जिसको जो अच्छा लगता है वो वही लिखता है और वैसा ही उन्हें पाठक वर्ग मिल जाता है।  

कुलवंत हैप्पी : क्या आपने स्वयंलिखित व्यंग्य लेख पर विचार करते हुए शौचालय को सोचालय बना या नहीं?
ललित शर्मा-
हा हा हा! मारा पापड़ वाले को। ये राज की बात है इसे राज ही रहने दो, हमारे घर मे ४-४ सो्चालय हैं।
अंत मे कुछ पंक्तिया जिन से में नाता रखता हूँ।
परिचय क्या दूं मैं तो अपना
नेह भरी जल की बदरी हुँ
किसी पथि्क की प्यास बुझाने
बंधी हुई कुंवे पर गगरी हुँ
मीत बनाने जग मे आया
मानवता का सजग प्रहरी हुँ
हर दुवार खुला है घर का
सबका स्वागत करती नगरी हुँ
:-राम राम

चक्क दे फट्टे : भूरा मिस्त्री गप्पे भी बड़े बड़े छोड़ता है। इस बात का पता तब चला। उसकी और भजने अमली की बात चल रही थी। भजना अमली जब बहुत ज्यादा अफीम खा लेता है तो झूठ बहुत बोलता है। भजने अमली ने कहा "भूरे तुम्हें पता है मेरे ससुराल वालों का घर इतना बड़ा है कि वहाँ माल गाड़ी पार्क की जा सकती है"। भूरा मिस्त्री भी कहाँ कम था, उसने भी तुरंत कह डाला, मेरे ससुराल वालों का घर तो इतना बड़ा है कि दूसरे कोने में जाते ही रोमिंग शुरू हो जाती है।

भार
कुलवंत हैप्पी

हैप्पी अभिनंदन में कार्टूनिस्ट कीर्तिश भट्ट

हैप्पी अभिनंदन में आज ब्लॉगवुड की जिस हस्ती से आप रूबरू होने जा रहे हैं, वो कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कहने में यकीन रखते हैं। कहूँ तो गागर में सागर भरने की कोशिश करते हैं और सफल भी होते हैं, सच में कोई अतिशोक्ति नहीं। हररोज आप उनके इस हुनर और कला से रूबरू होते हैं। जी हाँ, मैं आज आपकी मुलाकात बामुलाहिजा के संचालक और शानदार कार्टूनिस्ट कीर्तिश भट्ट से करवाने जा रहा हूँ। वो क्या सोचते हैं ब्लॉगवुड के बारे में और कैसे पहुंचे जहाँ तक उनकी कहानी उनकी जुबानी खुद ही पढ़िएगा।

कुलवंत हैप्पी : आपने अपने ब्लॉग पर भारतीय कार्टून और भारतीय कार्टूनिस्ट से सम्बद्ध लेख का लिंक तो दिया है, लेकिन खुद के बारे में कुछ नहीं लिखा, विशेष कारण?
कीर्तिश भट्ट : ज
हाँ तक 'भारतीय कार्टून और भारतीय कार्टूनिस्ट से सम्बद्ध लेख का ' सवाल है तो वो लिंक मैंने इसलिए लगाया है क्योंकि हिंदी विकिपीडिया पर इस विषय से सम्बद्ध लेख मैं लिख रहा हूँ, लिंक पर दिए गए लेख मेरे लिखे हुए हैं. कई पूर्ण है कई आधे अधूरे हैं जिन्हें जानकारी के आभाव मैं पूरा नहीं कर पाया हूँ. लिंक देने कई कारण है जैसे कि अन्य कार्टूनिस्ट भी अपने बारे मैं जानकारी दें. पाठक कार्टूनिस्टों के बारे मैं जानें, और यदि किसी के पास इनसे सबंधित और जानकारी हो तो वाह भी सामने आ जाये.
रही बात अपने बारे मैं लिखने कि तो ईमानदारी से कहूं तो लिखने को कुछ विशेष था ही नहीं सो नहीं लिखा. पढाई से लेकर कार्टूनिंग तक ऐसा कोई तीर नहीं मारा जिसका यहाँ उल्लेख किया जा सके. शकल भी ऐसी नहीं है फोटो दिखाने के बहाने अपने बारे मैं कुछ लिखा जाये. ऐसे मैं अपने ब्लॉग पर एक अनुपयोगी विजेट की बजाय अन्य रोचक सामग्री प्रस्तुत करना ज्यादा उचित समझा  जो पाठको को पसंद भी आए और मेरी साईट की रोचकता और पठनीयता भी बढाए.आप यदि गूगल अनालीटिक्स जैसी सुविधाओं का उपयोग करते हो तो आपको पता चलता रहता है कि आपकी साईट पर क्या पसंद किया जा रहा है तथा कब /कहाँ /कैसे और क्या पढ़ने के लिए आपकी साईट पर ट्राफिक आ रहा है. मैंने उसी प्राथमिकता से अपने ब्लॉग के विजेट सेट किये हुए हैं. इसमें अपने बारे में लिखना मुझे अनावश्यक लगा. वैसे जो लोग जानना ही चाहते हैं उनके लिए मैं यहाँ बता देता हूँ कि मैं मध्यप्रदेश के झाबुआ मैं पैदा हुआ. शिक्षा के नाम पर समाजशास्त्र मैं एमए किया है. कला और कार्टून से सम्बद्ध कोई डिग्री या शिक्षा मैंने नहीं ली. वर्तमान में इंदौर मैं 'नईदुनिया' मैं कार्यरत हूँ. 

कुलवंत हैप्पी : आप ने अपने ब्लॉग से टिप्पणी बॉक्स हटा दिया, उसके पीछे कोई विशेष कारण?
कीर्तिश भट्ट :
फिर वही वजह 'give and take' कम से कम मेरे ब्लॉग पर तो यह गैरजरूरी विजेट था. वैसे भी उसका उपयोग कम और दुरुपयोग ज्यादा हो रहा था. या तो उस पर कोई बेनामी टिपण्णी कर अपनी कुंठा शांत कर रहा था या नए (कुछ पुराने ब्लॉगर भी) अपने ब्लॉग का विज्ञापन कर रहे थे. मेरा समय प्रबंधन जरा ख़राब है ऐसे मैं जितना समय बचा पता हूँ उसमें ज्यादा से ज्यादा पोस्ट पढ़ने  का प्रयास करता हूँ. लेकिन टिप्पणियाँ कम ही कर पाता हूँ. अब जैसी कि प्रथा चल पड़ी है अगर मैं टिप्पणियां कर नहीं कर रहा हूँ तो  आयेंगी भी नहीं. अतः बंद करना बेहतर समझा. इससे कम से कम उन ब्लॉगर बंधुओं क समय बचेगा जो इस आशा मैं टिपण्णी करने यदा कदा आ जाते थे कि बदले में मैं भी टिपण्णी करूँगा.ब्लॉग्गिंग की इस टिपण्णी प्रथा से व्यथित हो कर मैंने अपने गुरुनुमा बड़े भाई (ब्लॉगर मित्र) से चर्चा की और उनसे मार्गदर्शन भी माँगा. टिप्पणियों को लेकर मेरे कदम का उन्होंने समर्थन किया और जो वचन उन्होंने कहे उसे यहाँ पेस्ट किये दे रहा हूँ छोटे से लेकर बड़े ब्लॉगर और बुद्धिजीवी से लेकर टिपण्णीजीवी ब्लॉगर सभी ध्यान से पढ़ें. टिपण्णी के बारे मैं वे कहते हैं "यही तो मानवीय मूल्यों का सर्वोपरि अवलोकन है जो मानव को मानव से दानव बनाने के लिए स्वतः प्रेरित करता है. यही तो वह शाश्वत प्रलोभन है जिसका संशोधन करना है. जैसे पुष्प ही पुष्प की अन्तःतवचा में उद्वेलित होता है. शाश्वत प्रलोभन ही भ्रष्टाचार जनता है और उससे वह प्रभावित होता है जो सानिवि का अधिशासी अभियंता है." ... आशा है समझाने वाले समझ गए होंगे.

कुलवंत हैप्पी : आप ने अपने हुनर को खुद पहचाना या किसी और ने कहा, आप अच्छे कार्टूनिस्ट बन सकते हो?
कीर्तिश भट्ट :
अच्छा या बुरा यह तय होने में अभी बहुत ज्यादा समय बाकी है. रही बात सिर्फ कार्टूनिस्ट बनने की तो उसके लिए तीन लोगों को श्रेय देना चाहूँगा जिन्होंने प्रत्यक्ष तो नहीं लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से मुझे मदद की. पहले मेरे प्राइमरी स्कूल (सरकारी) के हेडमास्टर. स्कूल में उनकी सख्ती और अनुशासन इतना भय रहता था कि मेरे जैसे लडके उनके जोर से डांटने पर ही अपनी निक्कर गीली कर दे. एक दिन क्लास मैं कॉपी पर चित्र बनाते हुए नज़र ऊपर कि तो सामने वही खड़े थे. उस वक्त कुछ सेकेंड्स में मेरा छोटा दिमाग जितने भी बुरे परिणाम सोच सकता था सोच रहा था ..और इससे पहले कि निक्कर गीली होती उस कड़क आवाज़ ने हँसते हुए बोला "अरे वाह !! आज तो चित्रकारी हो रही है !!??" ..बस तब से वो चित्रकारी (दरअसल कार्टूनिंग ) चल ही रही है. अगर उस दिन उनकी प्रशंसा की बजाय एक आध थप्पड़ पढ़ जाता तो शायद कार्टूनिंग भूल जाता मैं. दूसरे और तीसरे नम्बर पर मेरे दोनों बढे भाई जिन्होंने पिताजी की सोच के विपरीत मुझे पढाई से ज्यादा कार्टून पर ध्यान देने कि सलाह दी. इसके अतिरिक्त बाकी सफ़र  "एकला चालो रे " की नीति पर जारी है.  

कुलवंत हैप्पी : आपकी वेकसाईट पर कॉमिक स्ट्रिप हैं, लेकिन आप उन्हें ब्लॉग पर क्यों नहीं डालते ?
कीर्तिश भट्ट :
शुरू से ही मैं बामुलाहिजा को ब्लॉग के बजाय वेबसाइट के रूप मैं स्थापित करना चाहता हूँ इसके मद्देनज़र उस पर राजनितिक और सामाजिक हास्य-व्यंग आधारित अन्य कई सामग्री भी उपलब्ध रहती है. कॉमीक्स ही नहीं उस पर और भी कई रोचक सामग्री है मैं लगभग हर रोज जोड़ रहा हूँ. यदि में अपनी साईट का हर आइटम  ब्लॉग पर पोस्ट बनाकर डालूँ तो शायद एग्रीगेटर के पेज पर हर आधे घंटे में  एक पोस्ट मेरी होगी. चूँकि एग्रीगेटर्स पर लगातार पोस्ट प्रकाशित होती रहती है ऐसे मैं मेरे पोस्ट बार बार पेज पर आने से दूसरी महत्वपूर्ण पोस्ट बिनावाजह बगैर पढ़े ही नीचे खिसक जाएँगी. ब्लोग्गेर्स अभी ९० प्रतिशत ट्राफिक एग्रीगेटर्स के माध्यम से ले रहे है. ऐसे मैं कई अच्छी या बेहतरीन पोस्ट सिर्फ इसलिए पाठको से वंचित रह जाती है क्योंकि ढेर सारी पोस्ट उस पोस्ट के बाद आ जाती है और वह पोस्ट पीछे के पेज पर चली जाती है. अतः मैं सिर्फ अपना बनाया कार्टून पोस्ट करता हूँ जो सामयिक होता है. अन्य सामग्री को में इस प्रकार से नियोजित करने का प्रयास करता हूँ कि वे पोस्ट के रूप में एग्रीगेटर्स पर इकट्ठा न हों.  जो लोग कार्टून पढ़ने के लिए ब्लॉग पर आते हैं वे वहां उपलब्ध लिंक को क्लिक करके भी उन्हें पढ़ सकते हैं. हर छोटी छोटी सामग्री के लिए एग्रीगेटर पर ट्राफिक जाम लगाना अजीब  लगता है.

कुलवंत हैप्पी : आप असल जिन्दगी में क्या करते हैं, और ब्लॉग दुनिया के अलावा कहाँ (निवास) रहते हैं?
कीर्तिश भट्ट :
यानी आपको भी पता है कि मेरे जैसे 'कार्टूनिस्ट' का गुजारा सिर्फ कार्टून से तो नहीं चल सकता. सिर्फ कार्टूनिंग पर सरवाईव करने के लिए अभी काफी लम्बा सफ़र तय करना है. मैं एक ग्राफिक डिज़ाईनर हूँ. कुछ वर्षों तक विज्ञापन एजेंसियों के लिए कार्य किया लेकिन अखबारों के लिए ग्राफिक और इन्फोग्रफिक बनाना ज्यादा रुचिकर लगा तो विज्ञापन कि दुनिया छोड़ अख़बार सम्हाल लिए. हाई फाई कोडिंग तो नहीं लेकिन थोडा बहुत वेब डिज़ाईनिंग और फ्लेश अनिमेशन मेरा शौक है. जिसका भरपूर उपयोग मैं बामुलाहिजा पर करता हूँ.

कुलवंत हैप्पी : एक दैनिक समाचार पत्र में आपके कार्टून "चुटकी" सिरलेख के नीचे प्रकाशित होते हैं, ऑनलाइन मीडिया के लिए बामुलाहिजा चुनने की विशेष वजह ?
कीर्तिश भट्ट :
'चुटकी' नाम से पॉकेट कार्टून कालम पहले से समाचार पत्र नई दुनिया में छप रहा था और जब मैंने यहाँ ज्वाइन किया तो वही नाम मेरे कार्टूनों के साथ जुड़ गया. जबकि 'बामुलाहिजा' इस समाचारपत्र में आने से पहले बन चुका था. 'बामुलाहिजा' नाम मुझे एक समाचारपत्र के संपादक ने दिया था जहां पहली बार मेरा नियमित कार्टून स्तम्भ छपना शुरू हुआ था. तभी से मुझे इस नाम से लगाव सा है ये मेरे लिए मेरी पहचान है. बतौर कार्टूनिस्ट मैं अपने नाम से ज्यादा 'बामुलाहिजा' का नाम अपने कार्टूनों के साथ जोड़ता हूँ.

कुलवंत हैप्पी : कोई रोचक लम्हा, जिसको याद करते ही दिल फूलों की तरह खिल उठता हो?
कीर्तिश भट्ट :
निजी तो काफी है ...बतौर कार्टूनिस्ट पूछें तो एक घटना अभी कुछ समय पहले घटी जो मेरे लिए बड़ी अहम् और रोचक भी थी. हुआ यूं कि विष्णु नागर जी का एक दिन प्रेस मैं आगमन हुआ. उनका और कादम्बिनी का मैं बड़ा प्रसंशक था सो खबर मिलते ही मेरी इच्छा हुई कि यदि वे आज आखबार के कार्यालय में है तो उनसे एक बार मिलना हो जाये. मैं इसी जुगाड़ मैं बैठा सोच ही रहा था कि उनसे कैसे मिलूँ ....कि वे हमारे संपादक जी के साथ डिज़ाईनिंग रूम मैं मेरे सामने खड़े थे... हमारे संपादक अन्य साथियों का परिचय कराते उससे पहले ही विष्णु नागर जी पूछ बैठे आपके यहाँ कीर्तिश नाम का कार्टूनिस्ट है वो कहाँ बैठता है? मैं उनके ठीक पीछे खड़ा था तो संपादक ने इशारा करते हुए मेरा परिचय करवाया. उन्होंने आगे बढाकर मुझसे हाथ मिलाया और मुझसे जो भी उन्होंने कहा वो आशीर्वाद स्वरोपस्वरुप मेरे साथ हमेशा रहेगा. उस दिन मेरी ख़ुशी का  ठिकाना नहीं रहा, मैं जिनसे मिलने के लिए रास्ते तलाश रहा था वे अगले ही पल खुद मुझे ढूँढते हुए मेरे सामने खड़े थे.

कुलवंत हैप्पी : क्या एक कार्टूनिस्ट को अच्छा व्यंगकार भी होना लाजमी?
कीर्तिश भट्ट :
बिलकुल! मेरे ख्याल से तो व्यंगकार होना ज्यादा जरूरी है. किसी अख़बार के लिए बनने वाले सम्पादकीय कार्टून में ८० प्रतिशत व्यंग होता है और २० प्रतिशत चित्रांकन. इस लिहाज से व्यंगकार होना ज्यादा जरूरी है.

कुलवंत हैप्पी : पाठकों और ब्लॉगवुड वासियों के लिए कोई संदेश?
कीर्तिश भट्ट :
हिंदी ब्लॉगस पर पाठक नहीं के बराबर है जो भी आ रहे हैं वे एग्रीगेटर्स के द्वारा आ रहे हैं जो कि खुद ब्लॉगर हैं जो एक दुसरे की पोस्ट पर मात्र टिप्पणियां कर रहे हैं. नए ब्लॉगर बनाने और उन्हें प्रोत्साहित करने के काफी प्रयास ब्लॉग जगत में होते आये हैं और हो रहे हैं लेकिन नए पाठक बनने का कोई प्रयास मैंने आज तक ब्लॉग की दुनिया मैं नहीं देखा. जबकि अब जरूरत उसी की है मेरा निवेदन है कि ब्लॉगर थोड़ी सी तकनीकी सुझबुझ या किसी तकनिकी ब्लॉगर बंधू के सहयोग से अपने ब्लॉग के नाम, टाइटल मेटाटेग, कीवर्ड आदि का समायोजन इस प्रकार से करें कि उनके ब्लॉग पर सर्च इंजिन से और डाइरेक्ट ट्राफिक भी आए. सर्च इंजिन और सीधे आने वाला ट्राफिक ही हमारे असली पाठक है और सभी ब्लॉगर्स को अपने ब्लॉग और उसके कंटेंट को सर्च इंजिन से जुड़ने लायक बनाना होगा.

चक्क दे फट्टे : भूरा मिस्त्री शिवरात्रि के दिन भंग पीने के लिए मंदिर में गया, लेकिन भंग तो मिली नहीं। मंदिर से बाहर निकलते उसकी पत्नि ने देख लिया। बोली क्या बात आज मंदिर में। हाजिरजवाबी भूरा मिस्त्री बोला "तेरे लिए कुछ माँगने गया था"। खुशी से फूल की तरह खिल उठी पत्नि बोली तो क्या माँगा। भूरा मिस्त्री ने कहा कि मैंने शिव जी से कहा मेरी पत्नि को सदैव सुहागन रखना।



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कुलवंत हैप्पी