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fact 'n' fiction : सोनिया गांधी के नाम मल्‍लिका शेरावत का पत्र

नमस्‍कार, सोनिया गांधी जी। आज सुबह जब दरवाजे के नीचे से कुछ अख़बार आये, हर सुबह की तरह। मैंने उनको दौड़कर उठाया। शायद किसी सुर्खी में मेरा नाम हो, लेकिन एक सुर्खी ने मुझे पत्र लिखने के लिए मजबूर कर दिया। उस सुर्खी में पूर्व सेना अध्‍यक्ष वीके सिंह का नाम था, और उन पर किसी गुप्‍तचर एजेंसी की स्‍थापना व गलत इस्‍तेमाल करने का आरोप था।

सोनिया जी, यह वीके सिंह वहीं हैं ना, जो पिछले दिनों मेरे मूल राज्‍य हरियाणा के रेवाड़ी शहर में नरेंद्र मोदी के साथ नजर आये थे, एक पूर्व सैनिक रैली में। मुझे लगता है शायद उसी कार्य के लिए वीके सिंह सम्‍मानित किये जाने के प्रयासों का हिस्‍सा है यह सुर्खी। और एक संकेत है कि इस तरह के कार्य करने वाले अन्‍य लोगों को भी किसी न किसी रूप से सम्‍मानित किया जा सकता है, मैं सम्‍मानित नहीं होना चाहती, मुझे सम्‍मान पसंद नहीं, क्‍यूंकि मैं तो पहले ही बेरोजगारी का शिकार हूं, सम्‍मान वाले व्‍यक्‍ति तो छोटा मोटा काम नहीं कर सकते। रोजगार पाने के मकसद से तो गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्‍मदिवस पर गीत गाया था, शायद किसी को मेरी आवाज पसंद आ जाये, और किसी रैली में मुझे नृत्‍य प्रदर्शन के लिये बुला लिया जाये, क्‍यूंकि अमीरों के लिए मेरा ठुमका अब काम का नहीं रहा, उनको सनी लियोन के ठुमके अच्‍छे लगते हैं, करोड़ों रुपये खर्च कर देते हैं, दुबई तक बुला लेते हैं।

इस सदी की शुरूआत में मैंने घर छोड़ा, शादीशुदा जीवन छोड़ा, क्‍यूंकि आम जिन्‍दगी जीना मेरे के लिए मुश्‍िकल था, और आपकी मनरेगा योजना तो मेरी कमर तोड़कर रख देती, इतनी नाजुक हूं, इतना वजन नहीं उठा सकती, पौष्‍टिक आहार उतनी लेबर में नहीं मिलता। अधिक लेबर के लिए कभी कभी यौन शोषण से भी गुजरना पड़ता है, लेकिन मुम्‍बई की चमकीली दुनिया में होने वाले यौन शोषण जितना मेहनताना और नाम नहीं मिलता। यहां नाम के साथ इज्‍जत मिलती है।

इस ख्‍वाहिश में मुम्‍बई आई। पहली फिल्‍म ख्‍वाहिश ही करने को मिली। इस फिल्‍म में चुंबन से काम चल गया। कहते हैं कि अगर गुड देने से बंदा मर जाये तो जहर देने की जरूरत क्‍या, अगर किस देकर इज्‍जत बच जाये, और पैसा मिल जाये तो बुराई क्‍या है ?


पहली फिल्‍म में 17 चुंबन देकर रिकॉर्ड बनाया। कुछ और फिल्‍में मिल गई। मर्डर से मैंने तलाकशुदा स्‍त्री रीमा लांबा का मर्डर कर दिया, और मल्‍ल्‍िका शेरावत बनकर उभरी। अब 17 चुंबन का असर खत्‍म हो चुका है, क्‍यूंकि यहां पर 27 चुंबन वाली मॉर्डन जमाने की गर्ल परिणीति चोपड़ा आ गई। अब तक की सभी फिल्‍मों में चुंबन और अंतरंग सीन दिये हैं, आप घर लाकर अकेले में देख सकती हैं।

मैं चुंबन से आगे बढ़ने का प्रयास करती कि उस जगह को सनी लियोन नामक एक विदेशी बाला ने भर दिया। अच्‍छा खासा उसको वहां काम मिल रहा था, लेकिन भट्ट परिवार उसको भारत खींच लाया, यह वही परिवार है, जिसने मुझे मार्डर जैसी फिल्‍म से बॉलीवुड में इतने साल रहन बसर करने का लाइसेंस दिला दिया, वरना इस शहर में टिकना बेहद मुश्‍िकल था।

अब मैं बेरोजगार हूं, केआरके की तरह। नाम तो सुना होगा केआरके। एसआरके नहीं, केआरके, इस बंदे का पूरा नाम है कमाल राशिद ख़ान। यह भोजपुरी फिल्‍मों में नहीं चले, तो बॉलीवुड चले आये, देशद्रोही पहली फिल्‍म बनाई, आज तक उसकी का दूसरा भाग बना रहे हैं। बनाने की गति इतनी धीमी कि एक्‍टर यूट्यूब के जरिये एक फिल्‍म क्रिटिक्‍स बन गया। वैसे भी हमारे धर्म गुरू कहते हैं खाली दिमाग शैतान का घर। ऐसे में कोई न कोई शैतानी तो होई जाती है। जैसे पिछले दिनों नरेंद्र मोदी के जन्‍मदिवस पर मुझे से हुई,  आप तो समझदार हैं, समझ ही गई होंगी, क्‍यूंकि आपका विपक्ष के साथ अच्‍छा अनुभव रहा है।

एक समय था, जब राम गोपाल वर्मा का नाम चलता था। आजकल उनका केवल टि्वट खाता चलता है। उनकी हालत भी मेरी जैसी है। कल तक हीरोइनें उनकी फिल्‍म में आने के लिए तरसती थीं, लेकिन अब स्‍थिति वैसी तो नहीं, अब वे हीरोइनें के लिए तरसते हैं। तभी तो उन्‍होंने पिछले दिनों मिस अमेरिका नीना दावुलूरी की तारीफ करने के बजाय सनी लियोन की तारीफ की, क्‍यूंकि उनको पता है चांद की तारीफ करने से चांद जमीन पर नहीं आयेगा, लेकिन जो पास है उसको कह दे दिया जाये, शायद कोई मौका हाथ लग जाये। राम गोपाल वर्मा को भी उम्‍मीद होगी कि इस टि्वट के बाद उनके बेरोजगारी भरे दिन खत्‍म हो जायेंगे और सनी लियोन उनको अपनी किसी विदेशी फिल्‍म के लिए बतौर एक्‍टर साइन कर लेगी, वैसे भी एक्‍टर डायरेक्‍टर बन रहे हैं, और डायरेक्‍टर एक्‍टर बन जायें तो इसमें बुराई क्‍या है।

सोनिया जी, इस सुर्खी से पहले भी मुझे संकेत मिल गये थे, जब आपने अदानी समूह को 200 करोड़ के जुर्माने वाला प्रेम पत्र भेजा था। उससे पहले इंफोसिस को 582 करोड़ का, और बाबा रामदेव के नाम तो काफी पैसा बोलता है, यह सभी लोगों ने वो ही भूल की, जो पिछले दिनों वीके सिंह ने रेवाड़ी में की। आप समझदार हैं, अब विस्‍तार से लिखूंगी, तो ज्‍यादा स्‍याही और पेज बिगड़ेगा।

मेरे पास इन दिनों काम नहीं, और जो कमाया था, उसको रोजगार पाने के लिए उड़ा रही हूं, उम्‍मीद है कि एक औरत होकर एक औरत की मजबूरी को समझेंगी। मैं सब कुछ रोजगार के लिए कार रही हूं, जब राहुल बाबा का जन्‍मदिवस आयेगा, मैं तब भी गाउंगी, अगर आप मुझे कहीं से लोक सभा की टिकट देना चाहें तो मैं चुनाव भी लड़ना चाहुंगी, लेकिन सीट पर जीत कंफर्म हो। ख़तरे वाली सीट पर बैठना, और सफर करना मुझे पसंद नहीं, क्‍यूंकि स्‍थिति पहले ही खराब है।

मुझे उम्‍मीद है कि मेरे द्वारा पिछले दिनों किये गए नरेंद्र मोदी संबंधित कार्यों के लिए आप मुझे सम्‍मानित नहीं करेंगी।
Disclaimer : fact 'n' fiction सीरीज में व्‍यक्‍तियों के नाम असली हो सकते हैं, लेकिन इसकी लेखन शैली व कंटेंट पूर्ण रूप से काल्‍पनिक है। कुछ असली तथ्‍यों को आधार बनाकर कल्‍पना से इसकी रचना की जाती है।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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स्‍वतंत्रता दिवस पर लालन कॉलेज वर्सेस लाल किला

आजाद भारत का शायद पहला स्‍वतंत्रता दिवस होगा। जब राष्‍ट्र के लोग इस दिन मौके होने वाले आयोजित समारोह में अधिक दिलचस्‍प लेंगे। इसका मुख्‍य कारण मौजूदा प्रधानमंत्री और संभावित प्रधानमंत्री पद के दावेदार के बीच सीधी टक्‍कर। एक हर बार की तरह लाल किले तो तिरंगा फरहाएंगे तो दूसरे भुज के लालन कॉलेज से।
ऐसे में इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया के कैमरे दोनों तरफ तोपों की तरह तने रहेंगे। देश के प्रधानमंत्री होने के नाते मीडिया मनमोहन सिंह की उपस्‍थिति वाले समारोह को नजरअंदाज नहीं कर सकता, वहीं दूसरी तरफ संभावित प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार के रूप में उभरकर सामने आ रहे नरेंद्र मोदी को भी जनता सुनना चाहेगी, जो वैसे भी आजकल टेलीविजन टीआरपी के लिए एनर्जी टॉनिक हैं।

गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्‍वयं गुजरात के भुज में आयोजित युवाओं की एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘जब हम तिरंगा फहराएंगे तो संदेश लाल किला तक भी पहुंचेगा। राष्ट्र जानना चाहेगा कि वहां क्या कहा गया और भुज में क्या कहा गया।’

इस नरेंद्र मोदी की बात में कोई दो राय नहीं। देश की जनता बिल्‍कुल जानना चाहेगी, लेकिन उससे भी ज्‍यादा उतावला होगा भारतीय इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया। बस डर है कहीं, नरेंद्र मोदी लाइव न हो जाए, और देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का भाषण अगले दिन आने वाले समाचार पत्रों में पढ़ने को मिले।

उधर, सीधे तौर पर प्रधानमंत्री का जिक्र न करते हुए मोदी ने कहा, ‘एक तरफ वादों की झड़ी होगी तो दूसरी ओर किए गए काम का लेखा-जोखा होगा। एक तरफ निराशा होगी तो दूसरी तरफ आशा होगी।’ आपको बता दें कि गुजरात में स्वतंत्रता दिवस का आधिकारिक समारोह भुज में मनाया जाएगा जहां मोदी राष्ट्रीय ध्वज फहराएंगे।

आप इसे संयोगवश कहें या जान बुझकर चुना गया स्‍थान, लेकिन 15 अगस्‍त को आयोजित होने वाले इन दोनों समारोह को अगर कुछ जोड़ता है तो लाल। एक तरफ लाल किला, दूसरी तरफ भुज का लालन कॉलेज। दोनों में लाल शब्‍द है। इन दिनों जगहों पर तिरंगा लहराने वाले शख्‍सियतों के आगे प्रधानमंत्री शब्‍द भी जुड़ता है, एक संभावित प्रधानमंत्री पद प्रत्‍याशी हैं तो दूसरे मौजूदा प्रधानमंत्री।

अब देखना यह रहेगा कि स्‍वतंत्रता दिवस पर तिरंगा लहराने वाली दोनों शख्‍सियतों में से अगले साल लाल किले पर तिरंगा कौन फहराता है ? क्‍या लालन कॉलेज से नरेंद्र मोदी लाल किले तक पहुंच सकेंगे ?  जिन्‍होंने पार्टी की उन बाधाओं को तो पार कर लिया, जो उनके प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार बनने के रास्‍ते में थीं, क्‍यूंकि पिछले दिनों एक टेलीविजन को दिए विशेष साक्षात्‍कार में भाजपा के महासचिव राजीव प्रताप रूढ़ी ने साफ साफ कहा कि जनता की आवाज सुनी जाएगी और अगस्‍त के अंत तक नरेंद्र मोदी को पीएम पद का उम्‍मीदवार घोषित किया जाएगा। यह तो पहला साबूत है।

नरेंद्र मोदी पर मौसम साफ होने का दूसरा संकेत यूपीए के खिलाफ चार्जशीट के रूप में लॉन्‍च की अपनी वेबसाइट इंडिया 272 को करते हुए दिया। इस वेबसाइट पर गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा कोई चेहरा नजर नहीं आ रहा है। इस वेबसाइट को लॉन्‍च तो भाजपा पार्टी ने किया, लेकिन वहां चेहरा केवल नरेंद्र मोदी का, भाजपा का यह कदम उस बात को चरितार्थ कर रहा है, जिसमें कहा गया था भाजपा एकमत है।

अब एक और सवाल के साथ आपसे अलविदा लेते हैं कि क्‍या अगले साल होने वाले लोक सभा चुनावों के बाद आजाद भारत को आजाद भारत में जन्‍मे किसी नागरिक को प्रधानमंत्री बनते देखने का मौका मिलेगा या पांच साल और इंतजार करना होगा ?

सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को 'पत्र' लिखा

सोनिया गांधी, संयुक्‍त प्रगतिशील गठबंधन की चेयरपर्सन ने देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखा, लेकिन यह कोई प्रेम पत्र नहीं था। यह पत्र आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्‍ति नागपाल के निलम्‍बन को लेकर लिखा गया, इस पत्र में सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह से आग्रह किया, 'सरकार आईएएस अधिकारी के साथ किसी तरह की नइंसाफी न होने दे, और सरकार ने अब तक इस मामले में क्‍या काईवाई की उसकी जानकारी मांगी।'

जब सोनिया गांधी के पत्र की ख़बर सामने आई तो दिमाग का चक्‍का घूमा। खयाल आया कि आजकल सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बीच पति पत्‍नि वाला मनमुटाव हो गया क्‍या ? जैसे टीवी सीरियलों में होता है, जब पति पत्‍नि में अनबन हो जाती है तो टि्वटर नमूना पर्चियों का सहारा लेते हैं एक दूसरे को अपनी बात कहने के लिए, वैसे तो साधारण परिस्‍थितियों में रिमोट होम मिनिस्‍टर के हाथ में ही होता है, होम मिनिस्‍टर कहने भर से काम चल जाएगा, मुझे यकीन है।

सोनिया गांधी, जिन पर अक्‍सर आरोप लगता है कि संप्रग सरकार को मनमोहन सिंह नहीं, स्‍वयं सोनिया गांधी चलाती हैं, शायद वैसे ही जैसे बड़े बड़े अधिकारी कार की पिछली सीट पर बैठकर कार चालक को दिशा बताते हुए गाड़ी चलाते रहने का आदेश देते हैं, लेकिन ऐसा मामला अभी तक सामने नहीं आया, जिसमें कार चालक को किसी मालिकन या मालिक ने चिट पर लिखकर गाड़ी चलाने का आदेश दिया हो। हां, तब ऐसा जरूरत होता है, जब मालिकन या मालिक किसी अन्‍य काम में व्‍यस्‍त हों, और ड्राइवर को किसी जगह भेजना हो।

ऐसे में सवाल उठता है कि सोनिया गांधी आजकल कहां व्‍यस्‍त हैं, और मनमोहन सिंह, जोकि देश के प्रधानमंत्री हैं, को अकेले छोड़ दिया, जब लोक सभा चुनाव सिर पर हैं, और विरोधी पार्टियां दुष्‍प्रचार के लिए छोटे छोटे बहाने ढूंढ रही हैं। राहुल गांधी भी लापता हैं। ऐसे में तार से काम चलाया जा रहा है। दुर्गा शक्‍ति की गूंज जब टेलीविजन वालों ने पूरे देश में फैला दी, तब सोनिया गांधी की आंख खुली, शायद गलती से कोई न्‍यज चैनल रिमोट दबाते दबाते चल गया होगा, या दरवाजे के नीचे से कटिंग रहित समाचार पत्र पहुंच गया होगा।

चलो अच्‍छा है। सोनिया गांधी को इस बहाने लिखने का मौका तो मिला। चाहे मनमोहन सिंह को निर्देशित करता पत्र ही सही, मीडिया वाले अब रिमोट भूल पत्र संचालित प्रधानमंत्री कह सकते हैं। अगर सोनिया गांधी ने ऐसे कदम पहले उठा लिए होते तो शायद पिछले महीने बंद होने वाली टेलीग्राम सेवा बच जाती। देशभर में 14 जुलाई रात 9 बजे से 160 साल पुरानी टेलीग्राम  सेवा बंद हो गई।

सोनिया गांधी ने पत्र लिखा तो सबसे बड़ा दुख समाजवादी पार्टी को हुआ, जो केवल नाम से समाजवादी है, चरित्र से पूरी समझौतावादी। सोनिया गांधी तो अच्‍छी तरह जानती हैं। मामला कोई भी हो, समाजवादी पार्टी का एक ही नारा रहता है, हमारा काम करोगे तो समर्थन मिलेगा, वरना आपका हर बिल जन विरोधी होता है।

सीबीआई की दुर्दशा के पीछे जितनी कांग्रेस सरकार जिम्‍मेदार है, उससे कई गुना तो समाजवादी पार्टी जिम्‍मेदार है, जो संप्रग सरकार पर दबाव बनाकर, सीबीआई की गरिमा को चोटिल कर देती है। सुनने में आया है कि सीबीआई मुलायम सिंह पर लगे हैसियत से ज्‍यादा संपत्‍ति बनाने के मामले में चार बार आगे पीछे हो चुकी है। अब फिर चुनाव सिर पर हैं, अब फिर बैकफुट पर जाने की तैयारी है। सीबीआई वाला मामला तो ठीक है, लेकिन सोनिया गांधी के पत्र पर पहली प्रतिक्रिया इस पार्टी की आई, और समाजवादी पार्टी के नेता नरेश कुमार अग्रवाल ने सोनिया गांधी को दो पत्र और लिखने की सिफारिश की है, लेकिन यह पत्र दुर्गाशक्‍ति नागपाल निलम्‍बन के संबंध में नहीं, बल्‍कि आईएएस खेमका व राजस्‍थान के दो अधिकारियों के साथ हुई नइंसाफी के लिए। वहीं, भाजपा की मीनाक्षी लेखी ने कहा, ‘अगर सोनिया गांधी को दुर्गा नागपाल के निलंबन की इतनी चिंता है, तो उन्हें आईएएस अधिकारी अशोक खेमका के मामले पर भी गौर करना चाहिए, जिसका राबर्ट वाड्रा के भूमि सौदे की जांच करने पर तबादला किया गया।’  खेमका का तो 44 बार तबादला किया जा चुका है।  

सोनिया गांधी ने पत्र पर उठते हुए सवालों और विवादों को देखते हुए रविवार, 4 अगस्‍त 2013 को प्रण तो किया होगा कि अपने रिमोट में सैल डाल दिए जाएं तो अच्‍छा होगा, वरना इस बार की तरह घर की बात हर बात बाहर चली जाएगी।

राहुल गांधी : तुम आये तो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला

राहुल गांधी, युवा चेहरा। समय 2009 लोक सभा चुनाव। समय चार साल बाद । युवा कांग्रेस उपाध्‍यक्ष बना पप्‍पू। हफ्ते के पहले दिन कांग्रेस की मीडिया कनक्‍लेव। राहुल गांधी ने शुभारम्‍भ किया, नेताओं को चेताया वे पार्टी लाइन से इतर न जाएं। वे शालीनता से पेश आएं और सकारात्‍मक राजनीति करें। राहुल गांधी का इशारा साफ था। कांग्रेसी नेता अपने कारतूस हवाई फायरिंग में खत्‍म न करें। राहुल गांधी, जिनको ज्‍यादातर लोग प्रवक्‍ता नहीं मानते, लेकिन वे आज प्रवक्‍तागिरी सिखा रहे थे।

दिलचस्‍प बात तो यह है कि राहुल गांधी ख़बर बनते, उससे पहले ही नरेंद्र मोदी की उस ख़बर ने स्‍पेस रोक ली, जो मध्‍यप्रदेश से आई, जिसमें दिखाया गया कि पोस्‍टर में नहीं भाजपा का वो चेहरा, जो लोकसभा चुनावों में भाजपा का नैया को पार लगाएगा। सवाल जायजा है, आखिर क्‍यूं प्रचार समिति अध्‍यक्ष को चुनावी प्रचार से दूर कर दिया, भले यह प्रचार लोकसभा चुनावों के लिए न हो। कहीं न कहीं सवाल उठता है कि क्‍या शिवराज सिंह चौहान आज भी नरेंद्र मोदी को केवल एक समकक्ष मानते हैं, इससे अधिक नहीं। सवाल और विचार दिमाग में चल रहे थे कि दूर से कहीं चल रहे गीत की धुनें सुनाई पड़ी, ‘तुम आये तो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला, जाने कितने दिनों के बाद, गली में आज चाँद निकला’ चांद से याद आता है राहुल गांधी का चेहरा, जो कुछ महीने पहले जयपुर में नजर आया था, और आज सोमवार को नजर आ रहा है। शायद दूर कहीं ये गीत सही वक्‍त पर बजा रहा है। काश यह गीत राहुल गांधी के समारोह के आस पास बजता तो राहुल आज की होट स्टोरी होते।

राहुल गांधी ने जमीनी राजनीति पर उतर कर बेटिंग करने को कहा। यकीनन कांग्रेस के लिए यह बहुत बेहतरीन सुझाव है, वैसे भी कहते हैं कि सुबह का भूला शाम को घर आए तो उसको भूला नहीं कहते, अगर कांग्रेस आज भी अपने ग्रामीण क्षेत्र के वोटरों को संभाल ले तो हैट्रिक लगा सकती है। कांग्रेस ने जयपुर में मंथन किया था, शायद वे जमीनी नहीं था। अगर होता तो कांग्रेस अपने कारतूसों को हवाई फायरिंग में खराब करने से बेहतर सही दिशा में खर्चती। कांग्रेस के दामन में दाग बहुत हैं, लेकिन कांग्रेस अपनी योजनाओं के सर्फ एक्‍सल से धो सकती है।

कांग्रेस केंद्र में है। उसके द्वारा शुरू की गई, योजनाएं एक अच्‍छी पहल हैं। केंद्र सरकार ने इन योजनाओं को लागू करने के लिए करोड़ों रुपए राज्‍य सरकारों को दिए, लेकिन राज्‍य सरकारों की गड़बड़ियों के कारण योजनाएं पिट गई, और दोष पूरा कांग्रेस के सिर मढ़ दिया गया। मिड डे मिल, जो आज चर्चा का कारण है, क्‍या उसमें केंद्र का दोष है ? नहीं, दोष है राज्‍य सरकारों का जो उसको अच्‍छी तरह से लागू नहीं कर पा रही। मनरेगा, रोजगार की गारंटी भी निश्‍चत एक अच्‍छी पहल है, लेकिन राज्‍य सरकारों की अनदेखी के कारण धूल फांक रही है, बदनामी की कल्‍ख कांग्रेस के माथे, हालांकि कुछ घोटालों के आरोपी नेता या मंत्री जेल की हवा तक खा चुके हैं।

कांग्रेस की समस्‍या है कि वे सोशल मीडिया को समझ नहीं पा रही। दरअसल कांग्रेस पुराने ढर्रे पर चल रही है, और भाजपा इस कमजोरी का फायदा उठाते हुए पूरी तरह सोशल मीडिया को कैप्‍चर कर रही है। कहते हैं कि सोशल मीडिया 160 लोकसभा सीटों को प्रभावित करता है। उसकी पहुंच 12 करोड़ भारतीयों तक है। मगर सोशल मीडिया पर एक बाज की नजर है, जो देश के 80 करोड़ लोगों तक पहुंच बनाए हुए है। जी हां, इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया। आज देश का इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया, मोदी की ब्रांडिंग कर रहा है। कांग्रेस किसी सहमे हुए बच्‍चे की तरह, डरी हुई किसी कोने में खड़ी पूरा तमशा देख रही है।

उसके कई कारण हैं। सबसे पहले कांग्रेस के पास एक दमदार प्रवक्‍ता नहीं। राहुल गांधी युवा पीढ़ी को प्रेरित करता था, लेकिन पिछले कुछ समय से उसकी चुप्‍पी ने युवा पीढ़ी को निराश किया, और युवा पीढ़ी का बहाव नरेंद्र मोदी की तरफ ऑटोमेटिक मुड़ गया। नरेंद्र मोदी के पास राजनीति में लम्‍बा संघर्ष, एक आदर्श राज्‍य की पृष्‍ठभूमि, 11 साल का नेतृत्‍व अनुभव है। राहुल के पास एक मां है, जो उसकी दादी की तरह दमदार प्रवक्‍ता नहीं। संप्रग के पास प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह है, जिसको लोग कथित तौर पर सोनिया गांधी संचालित टेलीविजन कहते हैं। जब भी उनसे राहुल गांधी के पीएम बनने के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब एक था आज कहो, आज पीछे हट जाता हूं, मतलब साफ है, वे केवल मास्‍क हैं।

राहुल गांधी की कलावती पटकथा हिट हुई तो युवा आइकन बन गए। कलावती के बाद राहुल गांधी की कोई पटकथा हिट नहीं हुई। उसका प्रभाव खत्‍म होने लगा। सोशल मीडिया ने उसको पप्‍पू करार दे दिया। राहुल गांधी ने जो कदम आज उठाया है, उस बच्‍चे की तरह, जो पेपरों से कुछ दिन पहले तैयारी करने बैठता है, नतीजा जो भी आए, अगर राहुल का मंत्र सफल हुआ तो शायद 2014 में अख़बारों की सुर्खियां यह शीर्षक बन सकता है ‘पप्‍पू पास हो गया”।

ईद के चांद की तरह नजर आने वाला राहुल गांधी शायद आम चांद की तरह नजर आए, और जो सोच वे कभी कभी जनता के सामने रखते हैं, वे प्रत्‍येक दिन रखे, हफ्ते, महीने में रखे तो स्‍थितियां बदल सकती हैं।

और वे गीत भी शायद कभी इतना रिलेवेंट न लगे, जो आज कहीं दूर से कानों में पड़ रहा है, जख्‍म फिल्‍म का पूजा भट्ट पर फिल्‍माया गया गीत ”तुम आये तो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला जाने कितने दिनों के बाद, गली में आज चाँद निकला”

दिल्‍ली की प्रशासक महिला, फिर महिला असुरक्षित!

दिल्‍ली गैंगरेप मामले ने उस तरह तुल पकड़ लिया, जिस तरह मुम्‍बई में हुए आतंकवादी हमले ने। भले ही इससे पहले भी गैंगरेप हुए थे, भले ही इससे पहले भी आतंकवादी हमले हुए थे। शायद किसी न किसी चीज की एक हद होती है, जब हद पार हो जाए तो उसका विनाश तय होता है।

दिल्‍ली गैंगरेप के बाद लोग सड़कों पर उतर आए, मगर दिल्ली की मुख्‍यमंत्री शीला दीक्षित कहती हैं, उनमें हिम्‍मत नहीं कि वो रेप पीड़िता से मिल सकें, लगातार तीन बार दिल्‍ली की जनता ने उनको मुख्‍यमंत्री बनाया। दिल्‍ली का प्रशासन एक महिला के हाथ में है, मगर हैरत की बात है कि दिल्‍ली को महिलाओं के लिए असुरक्षित माना जा रहा है। इससे पहले दिल्‍ली पर सुषमा स्‍वराज का राज रहा। निरंतर महिलाएं दिल्‍ली की सत्‍ता संभालें हुए हैं, मगर फिर भी दिल्‍ली सुरक्षित नहीं महिलाओं के लिए।

देश की सबसे बड़ी पार्टी को चलाने वाली सोनिया गांधी  दिल्‍ली में दस जनपथ पर रहती हैं। वहीं, सेक्‍सी शब्‍द को सुंदरता की संज्ञा देने वाली महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा  भी तो दिल्‍ली में बसती हैं। गैंग रेप मामले ने जैसे ही तुल पकड़ा तो सेक्‍सी शब्‍द की सुंदरता से तुलना करने वाली ममता शर्मा ने बलात्‍कारियों नपुंसक बना देना चाहिए ताकि वे अपने जीवन के हर दिन पर पछताएं, वाला बयान देकर अपनी जिम्‍मेदारी से पल्‍लू झाड़ लिया।

मुम्‍बई की ठुमके लगाने वाली जय बच्‍चन, ''संजय निरुपम के एक अदाकारा के संदर्भ में दिए बयान को मद्देनजर रखते हुए'' सांसद में गैंगरेप मामले को लेकर रो पड़ती हैं, मगर दिल्‍ली में बैठी हुई महिलाओं में हिम्‍मत नहीं कि वो पीड़िता के सामने जाकर उसका हाल चाल पूछ पाएं। शीला दीक्षित बयान देती हैं कि उनमें हिम्‍मत नहीं कि वो पीड़िता से मिल सकें, सवाल तो यह है कि अगर अस्‍पताल में पड़ी लड़की की जगह उनकी अपनी बेटी होती तो, क्‍या वो फिर भी उक्‍त बयान देती।

दिल्‍ली को चंडीगढ़ से सीख लेनी होगी। चंडीगढ़ पुलिस ने गैंग रेप एवं सार्वजनिक स्‍थलों पर होने वाली छेड़खानी को रोकने के लिए विशेष मुहिम चलाई है। चंडीगढ़ पुलिस ने कुछ महिला पुलिस कर्मचारियों को कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियों का रूप दे दिया एवं उनको उन जगहों पर भेजा, जहां से सर्वाधिक लड़कियां अपने कॉलेजों की तरफ जाती हैं। मनचलों को पता नहीं होता कि छात्राओं सी लगने वाली लड़कियां पुलिस कर्मचारी हैं, जैसे ही मनचले अपना मन बहलाने के लिए अपने शरारती हाथों को आगे बढ़ाते हैं, पीछे कैमरे में कैच कर रहे अन्‍य पुरुष पुलिस कर्मचारी मनचलों को दबोच लेते हैं।

जब ऐसे शरारती तत्‍वों को हम सार्वजनिक स्‍थलों पर पकड़ेंगे एवं उनकी वहीं पर सार्वजनिक तौर पर इज्‍जत उतारेंगे तो कहीं न कहीं इससे समाज में सकारात्‍मक संकेत मिलेंगे। इससे पूर्व बठिंडा में तैनात एक पुलिस कर्मचारी सुबह सुबह बस स्‍टेंडों पर पहुंच जाता था, वो देखता लड़के वहां किस तरह से लड़कियों के साथ व्‍यवहार करते हैं, बस संदिग्‍ध युवाओं की घटनास्‍थल पर धुलाई कर देता। उसके नाम का डर पूरे शहर में फैल गया। दुनिया किसी बात से डरे न डरे, लेकिन डर के आगे भूत भी नाचते हैं।

डर पैदा करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे, नहीं तो पुलिस लाठीचार्ज, पानी की बौछारें एवं गैसी गोले लोगों के बढ़ते आक्रोश को कभी नहीं रोक पाएंगे। आक्रोश का दमन हमेशा असफल सिद्ध होता है। विश्‍व प्रसिद्ध लेखिका तस्‍लीम नसरीन  लिखती हैं, भारतीय महिला सदियों से जुल्‍म को सहती आ रही है। अंत वो गुस्‍से हुई एवं सड़कों पर उतरी। मुम्‍बई से एक फिल्‍मी अदाकार डेजी ईरानी कहती हैं, बलात्‍कारियों को मारो नहीं, नपुंसक बनाकर छोड़ दो।

नटराजन का ख्‍वाब; पिंजरे की बुलबुल

एक के बाद एक घोटाला उछलकर बाहर आ रहा है। कांग्रेस की छवि दिन ब दिन महात्‍मा गांधी की तरह धूमिल होती जा रही है। कांग्रेस के नेता पूरी तरह बुखला चुके हैं, वो अपने निकम्‍मे नेताओं को सुधारने की बजाय पूरी शक्‍ति मीडिया को ''पिंजरे की बुलबुल'' बनाने पर खर्च कर रहे हैं, जो लोकतंत्र के बिल्‍कुल उल्‍ट है।

शायद कांग्रेस के नेता पानी के बहा को नहीं जानते, वो सोचते हैं कि पानी के बहा को बड़े बड़े बांध बनाकर रोका जा सकता है, लेकिन वो नहीं जानते कि पानी अपना रास्‍ता खुद बनाता है, पानी जीवन है तो विनाश भी है। अगर आप मीडिया के मुंह पर ताला जड़ेंगे तो लोग अपनी बात कहने के लिए दूसरे साधनों को चुनेंगे।

अंग्रेजों के वक्‍त इतना बड़ा और इतना तेज तर्रार मीडिया भी तो नहीं था, मगर फिर भी जनमत तैयार करने में मीडिया ने अहम योगदान अदा किया था। कांग्रेसी नेता की पोल किसी अधिकारिक मीडिया ने तो नहीं खोली, जिस पर मीनाक्षी नटराजन बिल लाकर नकेल कसना चाहती हैं। शायद मीनाक्षी नटराजन राहुल बाबा की दोस्‍ती में इतना व्‍यस्‍त रहती हैं कि उनको वो लाइन भी याद नहीं होगी, जो लोग आम बोलते हैं, ''एक दरवाजा बंद होता है तो दूसरा दरवाजा आपके लिए खुलता है''।

जिस बिल को कांग्रेस ने मीनाक्षी की निजी राय बताकर पूरे मामले से पल्‍लू झाड़ लिया, क्‍या मीनाक्षी ने उस बिल को लाने की बात करने से राहुल गांधी से एक बार भी सलाह विमर्श नहीं किया? क्‍या अब कांग्रेस के नेता इतने बड़े हो चुके हैं, जो अपनी निजी राय के अनुसार बिल बनाने की बात करने लगे हैं? या फिर नेता ऐसा सोचने लगे हैं कि जिस पर राहुल बाबा ने मोहर लगा दी, वो निजी राय नहीं एक विधयेक बन जाता है?

मीडिया को ''पिंजरे की बुलबुल'' बनाने से कांग्रेस की छवि सुधरने वाली नहीं, क्‍यूंकि सफेद कुर्ते पर इतने दाग लग चुके हैं, जो महंगे से महंगे सरफ इस्‍तेमाल करने से भी जाने वाले नहीं। अब तो कांग्रेसी नेताओं को लिबास ही चेंज करना होगा। सच कहूं तो उनको 10 जनपद छोड़ना होगा, क्‍यूंकि वहां एक इटली की मेम रहती है, जो इटली से आई है, भारत को अच्‍छी तरह से नहीं जानती, और उसका एक पुत्र भी है, जो कुछ नेताओं की मक्‍खनबाजी से बेहद खुश है।

किसी समझदार ने कहा है कि अगर आप अपना रिमोट किसी और के हाथों में देते हैं तो आप भूल जाइए कि आप कुछ अपनी मर्जी का कर पाएंगे। आज कल कांग्रेसी नेताओं का रिमोट सोनिया के हाथ में है, और राहुल गांधी का रिमोट कुछ कांग्रेसी नेताओं के हाथ में। ऐसे में कांग्रेस का क्‍या हश्र होने वाला है, यह तो राम जाने।

लेकिन एक बात कांग्रेस को समझ लेनी चाहिए कि मीडिया को पिंजरे की बुलबुल बनाने से बेहतर होगा कि कांग्रेस के भीतर बैठे भ्रष्‍ट लोगों को कांग्रेस आउट करे, नहीं तो कांग्रेस को लोग आउट कर देंगे, चाहे बेटिंग के लिए कांग्रेस के पास सचिन नाम का बेस्‍टमैन ही क्‍यूं न हो।

चलते चलते- कांग्रेस डॉक्‍टर के पास गई, मगर डॉक्‍टर था नहीं, वो पास की शॉप पर पूछने गए, दुकानदार ने पूछा, आप कौन हैं, और डॉक्‍टर से क्‍यूं मिलना चाहते हैं तो कांग्रेस बोली मैं कांग्रेस हूं, देश की सबसे बड़ी पार्टी, अच्‍छा अच्‍छा दुकानदार बोला, आपको डॉक्‍टर की नहीं, मैन्टोफ्रेश, सेंटरफ्रेश व हैप्‍पीडंट की जरूरत है।

और आपको क्‍या लगता है? लिखिए बेबाक।