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क्‍यूंकि कभी पकड़ नहीं गया


@ईमानदारी - एक कंपनी ने अपने आवेदन पत्र में लिखा क्‍या कभी आपको गिरफ्तार किया गया है? आवेदक ने उत्तर दिया नहीं, दूसरा सवाल था, अगर नहीं तो क्‍यूं, आवेदक ने बड़ी मासूमियत से उत्तर दिया, क्‍यूंकि कभी पकड़ नहीं गया।

@सोच -  याद रहे कि हम किसी को हराने की तैयारी नहीं कर रहे, क्‍यूंकि हमारा लक्ष्‍य इतना छोटा नहीं।

@भरोसा- मुझे पता है, जो हम करने जा रहे हैं वो आसान नहीं, लेकिन असंभव भी तो नहीं।

@निर्णय - ओ जे सिम्‍पसन ने कहा था, जिस दिन आप अपने बारे में पूरी जिम्‍मेदारी ले लेते हैं। जिस दिन आप बहाने बनाना बंद कर देते हैं, उसी दिन आप चोटी की ओर की यात्रा शुरू करते हैं।

@यादों के झारोखों से -  मुझे लेकर अफवाहों का बाजार हमेशा गर्म रहा, मेरा कार्य क्षेत्र भले कोई भी रहा हो। मैं जिस क्षेत्र में गया, वहां अफवाहें भी मेरे पीछे पीछे चली आई। कभी कभी सोचता हूं, कि कहीं बॉलीवुड जाने का सपना पूरा हो जाता तो यह अफवाहें मुझे हर रोज अख़बारों में स्‍पेस दिलाती। फिर सोचता हूं कि लोग कितने फुर्सत में रहते हैं, जो दूसरों पर निगाह रखकर उनकी बात दूसरों तक पहुंचाते हैं, अफवाहों में पुष्‍टि नामक शब्‍द नहीं होता, अफवाहें, झूठ, कयासों से, अनुमानों से बनती हैं, और आगे बढ़ती चली जाती हैं। वैसे फिल्‍म गुरू में गुरूकांत देसाई कहते हैं, कि जब लोग आप के बारे में बातें करने लगे तो समझो आप तरक्‍की कर रहे हैं।

अगर जंग जीतनी है तो.....बन जाओ सुनहरे मोतियों की माला।

छोटी छोटी चीजें जीवन की दिशा बदल सकती हैं, लेकिन उन छोटी छोटी चीजों पर अमल होना चाहिए, इस रविवार मैं अपने ससुराल में था, यहां घर के मुख्‍य द्वार पर कुछ इंग्‍लिश्‍ा की पंक्‍ितयां लिखी हुई हैं, जिनका मतलब शायद मेरे हिसाब से यह निकलता है, अगर हम एक साथ आ जाते हैं, तो यह शुरूआत है, अगर हम एक साथ बने रहते हैं तो यह उन्‍नति है, अगर हम एक साथ मिलकर कार्य करते हैं तो सफलता निश्‍िचत है।

इस पंक्‍ित को पढ़ने के बाद लगा, क्‍या यह पंक्‍ित हमारे आज के उन नेताओं ने नहीं पढ़ी, जो काले धन को लेकर, लोकपाल बिल को दिल्‍ली में अनशन कर रहे हैं, अगर पढ़ी होती तो शायद बाबा रामदेव, अन्‍ना हजारे अलग अलग टीम बनाकर एक ही मिशन के लिए न लड़ते, बात चाहे लोकपाल बिल की हो या कालेधन को बाहर से लाने की, बात तो सरकार से जुड़ी हुई है। बचपन में एक कहानी कई दफा लिखी, क्‍योंकि उसको लिखने पर मुझे अंक मिलते थे, वो कहानी इम्‍ितहानों में से पास करवाने में अहम रोल अदा करती थी। एकता से जुड़ी वह कहानी, जिसमें एक किसान के चार पुत्र होते हैं, और किसान उनको पहले एक लकड़ी तोड़ने के लिए देता है और वह तोड़ देते हैं, फिर वह उनको लकड़ियों का बंडल तोड़ने के लिए कहता है, वह नहीं तोड़ पाते, तो किसान कहता है, एकता में शक्‍ित है, अगर आप एक हो तो आपको कोई नहीं तोड़ सकता।

मुझे लगता है यह कहानी मैंने ही नहीं, बल्‍कि हिन्‍दुस्‍तान के ज्‍यादातर लोगों ने पढ़ी होगी, पेपरों में अंक लेने के लिए लिखी भी होगी, हो सकता है उनकी कहानी में किसान न हो, लकड़ी के बंडल न हो, मगर बात तो एकता की ही होगी। हम जब भी लड़े अलग अलग होकर आखिर क्‍यों, आजादी के समय की बात हो या आज हो रहे विरोध अभियानों की, हम सब एक मंच पर क्‍यूं नहीं आ सकते, क्‍या हम को पदों की होड़ है, क्‍या हम दुनिया में अलग पहचान बनाने के लिए यह सब करते हैं, जो सच्‍चे लीडर होते हैं, जो सच्‍चे लड़ाकू होते हैं, वह स्‍वयं के लिए नहीं बल्‍कि कौम के लिए, समाज के लिए आगे चलते हैं या कहूं लड़ते हैं।

अगर जंग जीतनी है तो मोतियों की तरह एक ही धागे में घुसते चले जाओ, और बन जाओ सुनहरे मोतियों की माला।

एक सोच पर प्रतिबंध कहां तक उचित ?

अब पाकिस्तान में घमासान मचने को तैयार है, क्योंकि इमरान खान की लिखी गई जीवनी में कुछ ऐसी बातें सामने आई हैं, जो भुट्टो परिवार को आहत कर सकती हैं। समझ नहीं आ रही कि हर कोई सच का सामना क्यों करना चाहता है, वो भी उस सच का जिसे किसी का भी घर उजड़ सकता है। हर कोई सुकरात बनने की फिराक में। पिछले सोमवार को रिलीज हुई जसवंत सिंह की किताब ने अपनी रिलीज के बाद ही राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी, अगर देखा जाए तो जसवंत सिंह ने उस कहावत को सच करने की कोशिश की है, जो हम सब आम सुनते हैं कि एक हाथ से ताली नहीं बजती। ये बिल्कुल सच है कि कभी भी एक हाथ से ताली नहीं बजती, और उस तत्थ को भी उन्होंने सही साबित करने की कोशिश की है कि अगर हम किसी दूसरे की तरफ एक उंगली उठाते हैं तो शायद तीन उंगुलियां हमारी तरफ होती हैं।

जसवंत सिंह ऐसा पहला शख्स नहीं जिसने जिन्ना के बारे में कुछ कहा हो, इससे पहले भाजपा के सीनियर नेता लालकृष्ण आडवानी भीं जिन्ना की वकालत कर चुके हैं। आडवानी ने तो अपने पद से त्याग पत्र देकर पार्टी को चुप करवा दिया था, लेकिन जसवंत सिंह की बारी तो पार्टी के कायदे कानून ही बदल गए। जिन्ना को लेकर बवाल उस वक्त भी उठा था और आज भी उठा है। जिन्ना को लेकर भाजपा में बिखराव हुआ है, जब ये बात भी कबरों में आराम फरमान रहे जिन्ना तक पहुंचेगी तो वो भी सोच में पड़ जाएंगे कि जीते जी तो हिंदुस्तान के विभाजन का आरोप था और मरने के बाद भी मुझे पर विभाजन का आरोप क्यों ?

एक तरफ तो कहा जाता है कि हिन्दुस्तान में जुबां आजाद है, आपको बोलने और लिखने की आजादी है। अगर हिन्दुस्तान में इस चीज की आजादी है तो गुजरात सरकार द्वारा जसवंत सिंह की किताब पर लगाया गया प्रतिबंध तो इस नियम का उल्लंघन कर रहा है। ऐसे तो लोकतंत्र की धज्जियां उड़ रही हैं, इस लेकर बुद्धिजीवी, साहित्यकार, लेखक चुप क्यों है? आज अगर गाज जसवंत सिंह की किताब पर गिरी है तो कल को किसी और की किताब पर गिरेगी, फिर तो हिन्दुस्तान के खाते में भी तस्लीमा नसरीन और सलमान रसूदी जैसे लेखकों की संख्या बढ़ जाएगी।

कल जेटली का बयान आया कि पार्टी को किताब पर नहीं, उसमें छापे मुद्दे पर आपत्ति है, जबकि दूसरी तरफ जसवंत सिंह का कहना है कि किताब पिछले कई सालों की शोध पर आधारित है। शोध पर आधारित या नहीं, लेकिन ये किताब एक व्यक्ति की सोच है और उस सोच पर रोक लगा देना कहां तक उचित है। आज समाचार पत्रों के पोर्टलों से ज्यादा ब्लॉग पढ़े जाते हैं, क्योंकि यहां पर लिखने वाली कलम आजाद है। ब्लॉग पर व्यक्त की सोच से हर कोई तो सहमत नहीं होता, लेकिन उस पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाता। ऐसे में जसवंत सिंह की किताब पर प्रतिबंध लगाना बहुत गलत है।

गुजरात सरकार द्वारा लगाया किताब पर बैन तो सरकार की संकरी सोच का सबूत है। गुजरात सरकार ने कहा है कि इससे वल्लभभाई पटेल की छवि को चोट पहुंचेगी, इस किताब में तो नेहरू का भी जिक्र है क्या उसकी छवि को चोट नहीं पहुंचेगी ? लेकिन गुजरात की वोट बटोरने के लिए नेहरू नहीं पटेल का नाम चाहिए। सो गुजरात ने किया। जसवंत को बाहर करना भी वोट बैंक का हिस्सा है, लेकिन भाजपा एक पुरानी हो चुकी चारपाई की खस्ता डोर की तरह एक एक कर टूट रही है। पहले यशवंत सिन्हा, फिर कल्याण सिंह और अब जसवंत सिंह का जाना, वहीं नवजोत सिंह सिद्धू भी नाराज हैं, तो वसुंधरा राजे कहां भाजपा से खुश है। भाजपा के टूटने का कारण है कि वो अतीत से बाहर आना ही नहीं चाहती, वो तो कल में ही जीना चाहती है। आज की जनरेशन अतीत की आवोहवा में सांस भरना चाहती है, कुछ करना चाहती है।