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रेप रेप रेप, अब ब्रेक

दिल्‍ली से केरल तक रेप की ख़बरें। भारतीय संस्‍कृति ऐसी तो नहीं। फिर क्‍यूं अपने घर में, देश की राजधानी में सेव नहीं गर्ल। लड़कियां कल का भविष्‍य हैं, कहकर कन्‍या भ्रूण हत्‍या पर तो रोक लगाने की हम सब जंग लड़ रहे हैं, लेकिन जिंदा लड़कियों को जिन्‍दा लाश में तब्‍दील करने के खिलाफ कब लड़ना शुरू करेंगे हम।

कभी दिल्‍ली की चलती बस में लड़की के साथ रेप होता है, तो कभी घर में उसके अपने ही उसके बदन के कपड़े तार तार कर देते हैं। कभी केरल से ख़बर आती है बाप ने अपनी बेटी से कई सालों तक किया रेप। रेप रेप रेप सुनकर तंग आ चुके हैं, अब ब्रेक लगना चाहिए।

गैंग रेप की घटना होने के बाद सारा कसूर पुलिस प्रशासन पर डाल देते हैं। हजारों मामलों की पैरवी कर रही पुलिस इस को भी एक मामला समझ कार्रवाई शुरू कर देती है। कई सालों बाद कोर्ट आरोपियों को कुछ साल की सजा सुना देती है, मगर रेप एक लड़की को कई सालों तक की सजा सुना देता है। उसके भीतर एक अनजाने से डर को ताउम्र भर के लिए भर देता है।

सिने जगत  से लेकर मीडिया पर कसनी होगी नकेल
हर तरफ सेक्‍स सेक्‍स, अश्‍लीलता अश्‍लीलता। जो दिमाग को पूरी तरह काम वासना से भर रही है। टीवी ऑन करो तो कंडोम की एड, अलग अहसास के संवादों से काम वासना को जागती है, रूपहले पर्दे पर अधनंगी अभिनेत्रियां, दो अर्थे संवाद, गूगल पर सबसे ज्‍यादा सन्नी लियोन को ढूंढ़ते हैं, समाचार पढ़ने पहुंचते हैं तो एडिटर च्‍वॉइस में भरी गंदी तस्वीरें देखने को मिलती हैं, किसी बुक स्‍टॉल पर पहुंचते हैं तो पत्रिका के कवरेज पेज पर सेक्‍स सर्वे की रिपोर्टें मिलती हैं। हर जगह आंखें सेक्‍स देखती हैं या पढ़ती हैं, ऐसे में दिमाग का संतुलन बनाए रखना, दिमाग पर काबू रखना बेहद मुश्किल होता है। हम अपने ही बुने हुए जाल में बुरी तरह फंसे जा रहे हैं, इस चक्रव्‍यूह को तोड़ना होगा, मीडिया से लेकर मनोरंजन की दुनिया को अपनी सोच बदलनी होगी।

खुलमखुल्‍ला प्‍यार घातक
प्‍यार बुरी चीज नहीं, लेकिन प्रेमियों के इजहार का तरीका बेहद घातक हो सकता है उनके लिए। इस्‍लाम में बाहर से आया एक पिता अपने बच्‍चे को बीच सड़क गले नहीं लगाता, क्‍यूंकि उनमें ऐसा माना जाता है कि ऐसे करने से उस बच्‍चे को ठेस लग सकती है, जिसके अब्‍बा नहीं हैं। आजकल पार्कों में, साइबर कैफों में, लड़के लड़कियां बेहूदा ढंग से बैठे हुए पाए जाते हैं, जो प्‍यार की परिभाषा नहीं है। इस तरह के खुलेपन से बचना होगा। इसको रोकना होगा। ऐसी चीजें देखने वालों के मानसिक असर डालती हैं, पानी और भावनाएं बहने का तरीका खोज लेती हैं, चाहे उसके परिणाम विपरीत हो या सकारात्‍मक।

सार्वजनिक सजा का बंदोबस्‍त
गैंग रेप जैसे मामलों में सार्वजनिक सजा का बंदोबस्‍त बेहद जरूरी है। जब तक गैंग रेप से आरोपों में ऐसा नहीं होगा तब तक इस पर अंकुश लगाना मुश्‍किल है। गैंग रेप में शामिल लोगों का परिवार अगर उनको बचाने के लिए बचाव में उतरता है तो समाज को उसका बहिष्‍कार करना चाहिए। जब तक हम इस के खिलाफ एकजुट नहीं होंगे, तब तक ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगाना बेहद मुश्‍किल है। इस तरह की घटनाओं को केवल पुलिस रोक पाएगी, तो ऐसा हमारा सोचना बेहद गलत है।

स्‍कूलों में यौन शोषण संबंधी जागरूकता की जरूरत
कई सालों तक अपने ही किसी द्वारा शिकार बनाई जा रही लड़कियों एवं बच्‍चों को बचाने के लिए स्‍कूलों में यौन शोषण संबंधी जागरूकता फैलाना अति जरूरी है। अब हमको ऐसी जागरूकता फैलाने के प्रति कदम उठाने होंगे, इसको सेक्‍स शिक्षा कहकर अब हम नकार नहीं सकते। अब टेलीविजन से लेकर सिने घर, वेबसाइट पर सेक्‍स संबंधी बहुत सारा गलत प्रचार हो रहा है, ऐसे में बच्‍चों को सेक्‍स संबंधी सही शिक्षा की बेहद जरूरत है।

चर्चाएं, चर्चाएं, बस चर्चाएं

हम कितने फुर्सत में हैं। हमारी फुर्सत एक 27 साल के युवक (फेसबुक का संस्‍थापक) को अरबपतियों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देती है। इंटरनेट कंपनियों को भी मालोमाल कर देती है। हमारे देश में सब कुछ खत्‍म हो सकता है, मगर बे मतलबी बहस कभी खत्‍म नहीं होगी, क्‍यूंकि पंजाबी में एक कहावत है, वेहला बनिया की करे, इधर दे बट्टे उधर धरे, मतलब फुरसतिया दुकानदार क्‍या करे, इधर से उठाकर बटटा उधर रखे।

आमिर खान का सत्‍यमेव जयते शुरू हुआ तो उसकी प्रशंसा करने की बजाय लोगों ने उसकी पत्‍िन का मुद्दा उठा लिया, अगर पीड़ित महिलाओं पर किस्‍त आए तो आमिर की पत्‍नि को बुलाना चाहिए, जबकि उनके तलाक के बाद से अब तक दोनों परिवारों की ओर से किसी भी प्रकार की बयानबाजी सामने नहीं आई, दोनों ने शादी की थी अपनी मर्जी से, छोड़ा अपनी मर्जी से, बोले तू कौन मैं खाम खा।

जब महिलाएं मां बनने वाली होती है, तो उनका शरीर शिथिल हो जाता है, वो थोड़ी सी मोटी दिखाई पड़ने लगती है, शायद 95 फीसद महिलाओं के साथ तो ऐसा ही होता है, मगर जब ऐश्‍वर्या राय बच्‍चन के साथ ऐसा हुआ तो पूरे देश में चर्चा छिड़ गई कि ऐश मोटी हो गई। अखबारों ने भी लिख डाला, किसी अखबार ने किसी गरीब के घर में झांक कर नहीं देखा कि कोई मां डिलीवरी के वक्‍त कमजोरी से चल बसी।

फिर एक मनचला शिवलिंग पर पैर रखकर फोटो खिंचवाता हुआ पाया गया, देश में एक और चर्चा शुरू हो गई, धर्म का अपमान किया जा रहा है, किसी ने लिखा काटो डाला इस मूले को ढूंढ़कर, हालांकि वो किस मजहब का है इस बात का भी पता नहीं था किसी को, फिर भी मुस्‍िलम समुदाय को गालियां देखकर गर्म चर्चाओं को हवा दे डाली। जब पुलिस ने उसको हिरासत में लिया तो उसका नाम लक्ष्‍मण जॉनसन पता चला, ऐसा नाम किसी मुस्‍िलम व्‍यक्‍ित का तो नहीं हो सकता। फिर भी हमारे हिंदु भाईयों के मुंह में आया बोलते चले गए।

कल ओलाम्‍पिक परेड हुई, हिन्‍दुस्‍तान ओलाम्‍पिक में हिस्‍सा ले रहा है, इस बात का जश्‍न मनाने की बजाय, कुछ लोगों की निगाह सानिया मिर्जा पर थी, जिसके हाथ में हिन्‍दुस्‍तानी झंडा नहीं था, या फिर उस लड़की पर, जिसने लाल व ब्‍लू स्‍की क्‍लर की ड्रेस पहनी हुई थी। इस लड़की को लेकर तलाश व चर्चा शुरू हो गई, अंत में पता चला कि इसने बैंगलूर से स्‍टडी की है, जो अब लंडन में रहती है, नाम है मधुरा हनी। दो लड़कियों ने पूरे विश्‍व का ध्‍यान अपनी तरफ खींच लिया, इससे कुछ नहीं बदलने वाला, इतना होगा, उस लड़की का नाम इंटरनेट पर सबसे ज्‍यादा सर्च किया जाएगा, वो रातों रात, करोड़ों नजरों से निकल जाएगी। इतनी बड़ी प्रसिद्ध सिर्फ अलग लुक से मिली और चर्चाओं से। चर्चाएं, चर्चाएं, बस चर्चाएं।

आमसूत्र कहता है; मिलन उतना ही मीठा होता है

आमसूत्र कहता है कि लालच को जितना पकने दो, मिलन उतना ही मीठा होता है। सबर करो सबर करो, और बरसने दो अम्‍बर को। गहरे पर सुनहरे रंग तैरने दो, बहक यह महकने दो, क्‍यूंकि सबर का फल मीठा होता है, मीठे रसीले आमों से बना मैंगो स्‍लाइस, आपसे मिलने को बेसबर है। आम का मौसम है। बात आम की न होगी तो किसकी होगी। मगर अफसोस के आम की बात नहीं होती। संसद में भी बात होती है तो खास की। आम आदमी की बात कौन करता है। अब जब उंगलियां 22 साल पुरानी इमानदारी पर उठ रही हैं तो लाजमी है कि खास जज्‍बाती तो होगा ही, क्‍यूंकि आखिर वह भी तो आदमी है, भले ही आम नहीं। जी हां, पी चिदंबरम। जो कह रहे हैं शक मत करो, खंजर खोप दो। वो कहते हैं बार बार मत बहस करो। कसाब को गोली मार दो। आखिर इतने चिढ़चिढ़े कैसे हो गए चिदंबरम। चिदंबरम ऐसे बर्ताव कर रहे हैं, जैसे निरंतर काम पर जाने के बाद आम आदमी करने लगता है। वो ही घसीटी पिट राहें। वो ही गलियां। वो ही चेहरे। वो ही रूम। वो ही कानों में गूंजती आवाजें। लगता है चिदंबरम को हॉलीडे पैकेज देने का वक्‍त आ गया।

शायद मेरा सुझाव वैसा ही जैसा, दिलीप कुमार को देवदास रिलीज होने के बाद कुछ डॉक्‍टरों ने दिया था, अब आप थोड़ी कॉमेडी फिल्में करें अन्यथा आपको मानसिक विकार हो जाएंगे। मुझे भी लगता है कि अगर चिदंबरम को कांग्रेस ने थोड़ी सी राहत न दी तो उनको भी कुछ ऐसा ही हो सकता है, क्‍यूंकि अब वो जज्‍बाती होने लगे हैं। जब आदमी जज्‍बाती होता है तो छोटी छोटी बातें भी दिल को लगने लगती हैं। वो बात खास हो या आम हो। आम से याद आया, हमने बात आम से शुरू की थी। फिर क्‍यूं न आम पर ही लौटा जाए।

जो पंक्‍ितयां मैंने शुरूआत में लिखी, वह पंक्‍ितयां पाकिस्‍तानियों को स्‍लाइस बेचने के लिए शीतल पेय बनाने वाली कंपनी इस्‍तेमाल कर रही है। इस विज्ञापन को देखने के बाद एक बात दिमाग में खटकने लगी। हिन्‍दुस्‍तान और पाकिस्‍तान कभी एक हुआ करते थे। दोनों के बीच केवल एक लाइन का तो फासला है। मगर दोनों देशों में प्रसारित होने वाले एक ही कंपनी के विज्ञापन में इतना बड़ा फासला कैसे?

भारत में जब स्‍लाइस बिकता है तो बड़े ग्‍लेमर के साथ बेचा जाता है, मगर जब वो ही पाकिस्‍तान में बेचने की बारी आती है तो शब्‍दों का जाल बुना। ऐसा क्‍यूं। वहां पर कैटरीना कैफ की कत्‍ल अदाओं से ज्‍यादा आम पर फॉकस किया जाता है। आमसूत्र क्‍या कहता है, यह बताया जाता है। दर्शकों को बंधने के लिए शब्‍दों का मोह जाल बुना जाता है। मगर जब इंडियन स्‍क्रीन होती है तो कैटरीना कैफ कत्‍ल अदाओं से हमले करते हुए हाथ में स्‍लाइस लेकर जीन्‍स टी शर्ट पहने एंटरी मारती है। अपने होंठों से, स्‍टाइल से, चाल से, बैठने के ढंग से, कपड़ों से, इशारों से विज्ञापन में भी कामुकता पैदा करने की कोशिश की जाती है।

भारत और पाकिस्‍तान में कितना बड़ा अंतर है। इस बात की पुष्‍टि करता है यह मैंगो स्‍लाइस का विज्ञापन। भारत में आजादी के नाम पर किस तरह ग्‍लेमर परोसा जाता है। यह तो हम सब जानते हैं। मगर पाकिस्‍तान में डर के कारण कितना संजीदा रहना पड़ता है, इस विज्ञापन से ही समझा जा सकता है।


सिर्फ नाम बदला है

वो बारह साल की है। पढ़ने में अव्‍वल। पिता बेहद गरीब। मगर पिता को उम्‍मीद है कि उसकी बेटी पढ़ लिखकर कुछ बनेगी। अचानक एक दिन बारह साल की मासूम के पेट में दर्द उठता है। वो अपने मां बाप से सच नहीं बोल पाती, अंदर ही अंदर घुटन महसूस करने लगती है। आखिर अपने पेट की बात, अपनी सहेली को बताती है, और वो मासूम सहेली घर जाकर अपने माता पिता को।

अगली सवेर उसके माता पिता कुछ अन्‍य पड़ोसियों को लेकर स्‍कूल पहुंचते हैं और स्‍कूल में मीटिंग बुलाई जाती है। बिना कुछ सोच समझे एक तरफा फैसला सुनाते बारह साल की मानसी को स्‍कूल से बाहर कर दिया जाता है। टूट चुका पिता अपनी बच्‍ची को लेकर डॉक्‍टर के यहां पहुंचता है, तो पता चलता है कि बच्‍ची मां नहीं बनने वाली, उसके पेट में नॉर्मल दर्द है। मगर डॉक्‍टर एक और बात कहता है, जो चौंका देती है, कि मानसी का कौमार्य भंग हो चुका है।

गरीब पिता अपनी बच्‍ची को किसी दूसरे स्‍कूल में दाखिल करवाने के लिए लेकर जाता है, तो रास्‍ते में पता चलता है कि उसकी बेटी को पेट का दर्द देने वाला कोई और नहीं, उसी की जान पहचान का एक कार चालक है, जो खुद दो बच्‍चों का बाप है। अगली सुबह मानसी को दूसरे स्‍कूल से भी निकाल दिया जाता है। बुरे वक्‍त में एक टीचर मानसी की मदद के लिए आगे आती है।

टीचर के कहने पर पुलिस अधिकारी कारवाई के लिए तैयार होता है। मगर गरीब पिता इज्‍जत की दुहाई देते हुए पीछे हट जाता है। अंत में एक समाज सेवी संस्‍था मानसी को किसी दूसरे स्‍कूल में दाखिला दिलाने में सफल होती है, और गरीब मजबूर पिता दोषी के खिलाफ कारवाई करने की बजाय हाथ जोड़कर दोषी को कहता है अब मुंह बंद रखना। भले की कुछ समय बाद मानसी पेट से दर्द से उभर आए, मगर क्‍या वह मासूम जिन्‍दगी भर बचपन में मिले इस दर्द से कभी उभर पाएगी।                                                                   (क्राइम पैट्रोल दस्‍तक अनूप सोनी के साभार से)

अभी कुछ दिन पहले बाल यौन शोषण को लेकर एक बिल पास हुआ है। जो ऐसा करने वाले को दंडित करेगा। मगर हर गरीब पिता इस तरह दोषियों के आगे हाथ जोड़कर खड़ा होगा तो उक्‍त कानून दोषियों को दंडित कैसे कर पाएगा। ऐसे लोगों के खिलाफ चुपी नहीं, संग्राम होना चाहिए। यह क्राइम पैट्रोल दस्‍तक की मानसी थी, अनूप सोनी इससे भले ही महाराष्‍ट्र से कहे, लेकिन मैं तो इसे भारत से कहूंगा। यह भारत के किसी भी कोने में हो सकती है। जब कभी भी आपको ऐसी दस्‍तक सुनाई दे, तो आवाज उठाएं अन्‍याय के खिलाफ। एक जुर्म के खिलाफ। एक बेटी के हक में। वो अनामिका हो सकती, वो चुलबुल हो सकती, वो शांति हो सकती है, हमने तो सिर्फ नाम बदला है।

जब नेता फंसे 'बड़े आराम से'

बड़े आराम से। यह संवाद तो आप ने जरूर सुना होगा, अगर आप टीवी के दीवाने हैं। अगर, नहीं सुना तो मैं बता देता हूं, यह संवाद छोटे नवाब सैफ अली खान बोलते हैं, अमूल माचो के विज्ञापन में। अमूल माचो पहनकर सैफ मियां, एक हत्‍या की गुत्‍थी को ''बड़े आराम से'' सुलझा लेते हैं, क्‍यूंकि ''अमूल माचो'' इतनी पॉवरफुल बनियान है कि मरा हुआ आदमी खुद उठकर बोलता है कि उसका खून किसने किया। इस विज्ञापन को देखने के बाद सरकार को शक हुआ कि जो घोटाले बड़े आराम से सामने आए हैं, उसमें अमूल माचो का बड़ा हाथ है।

घोटालों के सामने आते ही सरकार ने गुप्‍त बैठक का आयोजन कर नेताओं को सतर्क करते हुए कहा कि वह ''अपना लक पहनकर चलें'' मतलब लक्‍स कॉजी पहनें, वरना पकड़े जाने पर सरकार व पार्टी जिम्‍मेदार नहीं होगी। गुप्‍त बैठक से निकलकर नेता जैसे ही कार में बैठकर लक्‍स कॉजी लेने के लिए निकले तो रास्‍ते में ट्रैफिक पुलिस वाले ने नेता की गाड़ी को रोक लिया। नेता गुस्‍से में आ गए, आते भी क्‍यूं न जनाब। आखिर परिवहन मंत्री हैं, और उनके वाहन को बीच रास्‍ते रोक दिया जाए, बुरा तो लगेगा ही। ट्रैफिक पुलिस वाला कहता है, सर जी जो रूपा फ्रंटलाइन पहनते हैं, वही फ्रंट में रहते हैं।

नते ही नेता का सिर चक्‍कर खा गया, साला अभी तो गुप्‍त बैठक में बोल रहे थे, अपना लक पहनकर चलें, अभी यह पुलिस वाला बोल रहा है जो रूपा फ्रंटलाइन पहनते हैं, वही फ्रंट में रहते हैं। नेता जी दुविधा में फंस गए, आखिर कौन सी पहनूं, फ्रंट वाली या लक वाली। नेता को दुविधा में देख बीरबल जैसा तेज दिमाग पीए बोलता है, सर जी दोनों की एक साथ क्‍यूं नहीं पहन लेते। बात नेता को जम गई।

नेता तुरंत गाड़ी में बैठकर मॉल की ओर चल दिए। आखिर भाई नेता हैं, छोटी मोटी दुकान में थोड़ा न जाएंगे। नेता जैसे ही मॉल में पहुंचे तो टीवी चल रहा था, नीचे समाचारों की पट्टी चल रही थी, वो समाचार पट्टी को पढ़ने लगे ही थे कि अचानक स्‍क्रीन पर आकर अक्षय कुमार बनियान पहने कुछ गुंडा की पिटाई करने लगा। पिटाई करने के बाद जाते जाते ''होम डिलीवरी भी देता हूं। मैडम आपका बटन खुला है। फिट है तो हिट है बॉस।'' जैसे संवाद बोलता है। अब नेता के मन में फिर लड्डू फूटा। उसको एक नेता मित्र की याद आई। जो आशिक मिजाज था, वैसे अब नेताओं की छवि भी कुछ ऐसी बन गई है।

अब सोचा, क्‍यूं न इसे भी खरीद लिया जाए। तीनों एक साथ पहनकर चलेंगे, बड़े आराम से। अगले दिन नेता तीनों पहनकर कार्यालय में पहुंच गए। इतने में उनका नाम भी एक घोटाले में आ गया। नेता ने अपनी पार्टी प्रमुख को फोन लगाकर बोला कि उन्‍होंने तो वैसा ही किया था, जैसा पार्टी ने कल मीटिंग में बताया, लेकिन मेरा नाम फिर भी घोटाले में कैसे आया गया। तो आगे से फोन में पार्टी प्रमुख गुस्‍सेल मूड में कहते हैं, क्‍या नेता लोग ही केवल नकली चीजें बेच सकते हैं, दुकानदार नकली ब्रांड नहीं बेच सकता, अरे गधे। फोन कट, नेता कैचअप।

नटराजन का ख्‍वाब; पिंजरे की बुलबुल

एक के बाद एक घोटाला उछलकर बाहर आ रहा है। कांग्रेस की छवि दिन ब दिन महात्‍मा गांधी की तरह धूमिल होती जा रही है। कांग्रेस के नेता पूरी तरह बुखला चुके हैं, वो अपने निकम्‍मे नेताओं को सुधारने की बजाय पूरी शक्‍ति मीडिया को ''पिंजरे की बुलबुल'' बनाने पर खर्च कर रहे हैं, जो लोकतंत्र के बिल्‍कुल उल्‍ट है।

शायद कांग्रेस के नेता पानी के बहा को नहीं जानते, वो सोचते हैं कि पानी के बहा को बड़े बड़े बांध बनाकर रोका जा सकता है, लेकिन वो नहीं जानते कि पानी अपना रास्‍ता खुद बनाता है, पानी जीवन है तो विनाश भी है। अगर आप मीडिया के मुंह पर ताला जड़ेंगे तो लोग अपनी बात कहने के लिए दूसरे साधनों को चुनेंगे।

अंग्रेजों के वक्‍त इतना बड़ा और इतना तेज तर्रार मीडिया भी तो नहीं था, मगर फिर भी जनमत तैयार करने में मीडिया ने अहम योगदान अदा किया था। कांग्रेसी नेता की पोल किसी अधिकारिक मीडिया ने तो नहीं खोली, जिस पर मीनाक्षी नटराजन बिल लाकर नकेल कसना चाहती हैं। शायद मीनाक्षी नटराजन राहुल बाबा की दोस्‍ती में इतना व्‍यस्‍त रहती हैं कि उनको वो लाइन भी याद नहीं होगी, जो लोग आम बोलते हैं, ''एक दरवाजा बंद होता है तो दूसरा दरवाजा आपके लिए खुलता है''।

जिस बिल को कांग्रेस ने मीनाक्षी की निजी राय बताकर पूरे मामले से पल्‍लू झाड़ लिया, क्‍या मीनाक्षी ने उस बिल को लाने की बात करने से राहुल गांधी से एक बार भी सलाह विमर्श नहीं किया? क्‍या अब कांग्रेस के नेता इतने बड़े हो चुके हैं, जो अपनी निजी राय के अनुसार बिल बनाने की बात करने लगे हैं? या फिर नेता ऐसा सोचने लगे हैं कि जिस पर राहुल बाबा ने मोहर लगा दी, वो निजी राय नहीं एक विधयेक बन जाता है?

मीडिया को ''पिंजरे की बुलबुल'' बनाने से कांग्रेस की छवि सुधरने वाली नहीं, क्‍यूंकि सफेद कुर्ते पर इतने दाग लग चुके हैं, जो महंगे से महंगे सरफ इस्‍तेमाल करने से भी जाने वाले नहीं। अब तो कांग्रेसी नेताओं को लिबास ही चेंज करना होगा। सच कहूं तो उनको 10 जनपद छोड़ना होगा, क्‍यूंकि वहां एक इटली की मेम रहती है, जो इटली से आई है, भारत को अच्‍छी तरह से नहीं जानती, और उसका एक पुत्र भी है, जो कुछ नेताओं की मक्‍खनबाजी से बेहद खुश है।

किसी समझदार ने कहा है कि अगर आप अपना रिमोट किसी और के हाथों में देते हैं तो आप भूल जाइए कि आप कुछ अपनी मर्जी का कर पाएंगे। आज कल कांग्रेसी नेताओं का रिमोट सोनिया के हाथ में है, और राहुल गांधी का रिमोट कुछ कांग्रेसी नेताओं के हाथ में। ऐसे में कांग्रेस का क्‍या हश्र होने वाला है, यह तो राम जाने।

लेकिन एक बात कांग्रेस को समझ लेनी चाहिए कि मीडिया को पिंजरे की बुलबुल बनाने से बेहतर होगा कि कांग्रेस के भीतर बैठे भ्रष्‍ट लोगों को कांग्रेस आउट करे, नहीं तो कांग्रेस को लोग आउट कर देंगे, चाहे बेटिंग के लिए कांग्रेस के पास सचिन नाम का बेस्‍टमैन ही क्‍यूं न हो।

चलते चलते- कांग्रेस डॉक्‍टर के पास गई, मगर डॉक्‍टर था नहीं, वो पास की शॉप पर पूछने गए, दुकानदार ने पूछा, आप कौन हैं, और डॉक्‍टर से क्‍यूं मिलना चाहते हैं तो कांग्रेस बोली मैं कांग्रेस हूं, देश की सबसे बड़ी पार्टी, अच्‍छा अच्‍छा दुकानदार बोला, आपको डॉक्‍टर की नहीं, मैन्टोफ्रेश, सेंटरफ्रेश व हैप्‍पीडंट की जरूरत है।

और आपको क्‍या लगता है? लिखिए बेबाक।

बोफोर्स घोटाला, अमिताभ का बयान और मेरी प्रतिक्रिया

बोफोर्स घोटाला, कब सामने आया, यकीनन जब मैं तीसरा बसंत देख रहा था, यानि 1987, इस घोटाले का पर्दाफाश अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र द हिंदु की संवाददाता चित्रा सुब्रह्मण्‍यम ने किया, मगर सीबीआई ने इस मामले में चार्जशीट उस समय दाखिल की, जब मैं पांच साल पूरे कर छठे की तरफ बढ़ रहा था।

इसके बाद सरकारें बदली, स्‍थितियां परिस्‍थितियां बदली, मैं भी समय के साथ साथ बड़ा होता चला गया। लेकिन मुझे इस घोटाले की जानकारी उस समय मिली जब इस घोटाले के कथित दलाल ओत्तावियो क्‍वोत्रिकी की हिरासत के लिए सीबीआई जद्दोजहद कर रही थी, और मैं एक न्‍यूज वेबसाइट के लिए कीबोर्ड पर उंगलियां चला रहा था, तकरीबन तब मैं पच्‍चीस साल का हो चुका था, और यह घोटाला करीबन 22 साल का।

आप सोच रहे होंगे कि घोटाले और मेरी उम्र में क्‍या तालुक है, तालुक है पाठक साहिब, क्‍यूंकि जब यह घोटाला हुआ तो राजीव गांधी का नाम उछलकर सामने आया, चूंकि वह उस समय प्रधानमंत्री बने थे, और राजीव गांधी प्रधानमंत्री कब बने, जब इंदिरा गांधी का मौत हुई, और जब इंदिरा की मौत हुई, तब मैं पांच दिन का था, एक वो ही ऐसी घटना है, जिसने मेरे जन्‍मदिन की पुष्‍टि की।

स्‍वीडन के पुलिस प्रमुख स्‍टेन लिंडस्‍ट्रॉम ने कल जब 25 साल बाद अपने मरे हुए जमीर को जगाते हुए कहा कि अमिताभ बच्‍चन का नाम घोटाले में शामिल करने के लिए उन पर दबाव डाला गया था। और मुझे सबसे ज्‍यादा हैरानी तो तब हुई, जब अमिताभ बच्‍चन ने अपने ब्‍लॉग पर लिखा, चलो पच्‍चीस साल बाद तो मुझे राहत मिली, लेकिन उसकी भरपाई कौन करेगा, जो पच्‍चीस साल मैंने आरोप का दंश झेला, और मीडिया ने ख़बर बनाई।

अमिताभ बच्‍चन को शायद पता नहीं कि आरोप का दंश किसे कहते हैं। अगर वह सच में जानना चाहते हैं कि आरोप का दंश किसे कहते हैं तो उनको गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ देखना चाहिए, जो पिछले दस सालों से दंगों के आरोप का दंश झेलते आ रहे हैं। शायद ही उनकी कोई प्रेस कांफ्रेंस ऐसी गई होगी, जिसमें मीडिया ने उनसे दंगों से संबंधित प्रश्‍न नहीं पूछे। स्‍िथतियां तो कई बार ऐसी पैदा हुई कि उनको लाइव शो छोड़कर भी जाना पड़ा। मुझे तो एक भी ऐसा मौका याद नहीं आ रहा, जब मीडिया ने अमिताभ बच्‍चन से बोफोर्स घोटाले के बारे में भूलकर भी कोई प्रशन पूछा हो, या कभी मीडिया ने उनका नाम कहीं उछाला हो।

अमिताभ का नाम इस घोटाले से जुड़ा था, और उनको क्‍लीन चिट मिल गई, मुझे भी तब पता चला, जब अमिताभ ने इस पर खुशी जताई और मीडिया ने उसको हाईलाइट किया। मेरे ध्‍यान में शायद यह पहला मामला है, जब मीडिया ने आरोपी के साथ दोषी जैसा व्‍यवहार नहीं किया, और बेगुनाह होने पर उसको एक अच्‍छा डिस्‍पले दिया, मीडिया की अगर यह पहल है तो अच्‍छी बात है, अगर स्‍पेस की भरपाई के लिए स्‍पेस दिया गया है तो अफसोस की बात है।

अफसोस इसलिए कि हम जिस घोटाले की जांच के लिए पिछले ढ़ाई दशक में करोड़ों रुपए खर्च चुके हैं, उस मामले में हमको मिली तो मिली केवल क्‍लीन चिट, क्‍या सरकार को जनता का पैसा केवल क्‍लिन चिट हासिल करने के लिए मिला है। हैरानी तो इस बात से भी हो रही है कि स्‍टेन का बयान 25 साल बाद ही क्‍यूं आया? और तब आया जब कांग्रेस की छवि देश के अंदर बिगड़ती जा रही है, और दूसरी बात देश में राष्‍ट्रपति के पद को लेकर भी नामों का चयन किया जा रहा है, कहीं पिछली बार की तरह इस बार भी तो अमिताभ का नाम उभरकर सामने आने वाला तो नहीं। उक्‍त दोनों संयोगों को देखने के बाद मुझे लगता है, कहीं स्‍टेन का यह बयान भी तो किसी दबाव के चलते तो नहीं आया। शायद पुष्‍टि के लिए 25 साल और इंतजार करना होगा।

चलते चलते इतना ही कहूंगा, ए मेरी सरकार हर घोटाले में क्‍िलन चिट पहले ही दे देना, क्‍यूंकि मेरे देश का धन मेरी जनता के काम आ सके, नहीं तो हर बार एक ही कहावत दोहरानी पड़ेगी ''खाया पीया कुछ नहीं गिलास तोड़ा बारह आना''।

याद रहे कुल चार सौ बोफोर्स तोपों की खरीद का सौदा 1.3 अरब डालर का था। आरोप है कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारत के साथ सौदे के लिए 1.42 करोड़ डालर की रिश्वत बांटी थी, मगर भारतीय सरकार ने जांच के लिए 256 करोड़ खर्च किए, और बदले में मिला ठेंगा।

आखिर छवि किसी की धूमिल हो रही है

आखिर छवि किसी की धूमिल हो रही है समझ से परे है, भारत सरकार की, इंडियन एक्‍सप्रेस की या सेनाध्‍यक्ष वीके सिंह की। कल रात प्राइम टाइम में इंडियन एक्‍सप्रेस के चीफ इन एडिटर शेखर गुप्‍ता ने एक बात जोरदार कही, जो शायद सभी मीडिया वालों के लिए गौर करने लायक है। श्री गुप्‍ता ने कहा कि इंडियन एक्‍सप्रेस ने जो प्रकाशित किया, अगर वह गलत है तो मीडिया को सामने लाकर रखना चाहिए, अगर इंडियन एक्‍सप्रेस में प्रकाशित बात सही है तो मीडिया वालों को उसका फलोअप करना चाहिए। इससे एक बात तो तय होती है कि इंडियन एक्‍सप्रेस को अपने पत्रकारों पर पूर्ण विश्‍वास है, जो होना भी चाहिए। फिर अभी अभी फेसबुक पर कुमार आलोक का स्‍टेटस अपडेट पढ़ा, जिसमें लिखा था, खबर है कि यूपीए में सरकार के एक बडे मंत्री के इशारे पर जनरल वीके सिंह की छवि धूमिल करने के लिए कल एक्सप्रेस में खबर छपरवाई गयी। मंत्री के रिश्तेदार बडे बडे आर्मस डीलर हैं। कुमार आलोक दूरदर्शन न्‍यूज में सीनियर पत्रकार हैं, ऐसे में उनकी बात को भी नकारा नहीं जा सकता। मगर सवाल यह उठता है कि इस पूरे घटनाक्रम में आखिर किसी की छवि धूमिल हो रही है, उस समाचार पत्र की जो अपनी विश्‍वसनीयत के लिए के जाना जाता है, या सेनाध्‍यक्ष की छवि, जिस पर देश की सरकार भी शक करने से इंकार कर रही है। इस घटनाक्रम में आखिर छवि खराब हुई है तो वह हिन्‍दुस्‍तान की, क्‍योंकि इंटरनेट ने पूरे विश्‍व को एक करके रख दिया, छोटी सी घटना भी एक पल में सरहदें पार कर जाती है। दूसरे देशों में भी विशेषज्ञ हिन्‍दुस्‍तान की स्‍थिति को लेकर कयास लगा रहे होंगे। जिस तरह देश के अंदर निरंतर उथल पुथल चल रही है, उसको लेकर उक्‍त खबर को झूठलाया नहीं जा सकता, और पूर्ण रूप से सच करार भी नहीं दिया जा सकता। इसमें कोई दो राय नहीं कि देश के प्रधानमंत्री एक कठपुतली से ज्‍यादा कुछ नहीं, कहूं तो सरकारी नल जैसे हैं, पानी आया तो भी ठीक, नहीं आया तो भी ठीक। सरकार की गलत कारगुजारियों के चलते देश उबल रहा है, ऐसे में कुछ भी हो जाना संभव है। देश में तख्‍तपलट भी कोई बड़ी बात नहीं। लोग तंग आ चुके हैं, अगर सेना नहीं करेगी तो बहुत जल्‍द लोग कर देंगे।

अगर जंग जीतनी है तो.....बन जाओ सुनहरे मोतियों की माला।

छोटी छोटी चीजें जीवन की दिशा बदल सकती हैं, लेकिन उन छोटी छोटी चीजों पर अमल होना चाहिए, इस रविवार मैं अपने ससुराल में था, यहां घर के मुख्‍य द्वार पर कुछ इंग्‍लिश्‍ा की पंक्‍ितयां लिखी हुई हैं, जिनका मतलब शायद मेरे हिसाब से यह निकलता है, अगर हम एक साथ आ जाते हैं, तो यह शुरूआत है, अगर हम एक साथ बने रहते हैं तो यह उन्‍नति है, अगर हम एक साथ मिलकर कार्य करते हैं तो सफलता निश्‍िचत है।

इस पंक्‍ित को पढ़ने के बाद लगा, क्‍या यह पंक्‍ित हमारे आज के उन नेताओं ने नहीं पढ़ी, जो काले धन को लेकर, लोकपाल बिल को दिल्‍ली में अनशन कर रहे हैं, अगर पढ़ी होती तो शायद बाबा रामदेव, अन्‍ना हजारे अलग अलग टीम बनाकर एक ही मिशन के लिए न लड़ते, बात चाहे लोकपाल बिल की हो या कालेधन को बाहर से लाने की, बात तो सरकार से जुड़ी हुई है। बचपन में एक कहानी कई दफा लिखी, क्‍योंकि उसको लिखने पर मुझे अंक मिलते थे, वो कहानी इम्‍ितहानों में से पास करवाने में अहम रोल अदा करती थी। एकता से जुड़ी वह कहानी, जिसमें एक किसान के चार पुत्र होते हैं, और किसान उनको पहले एक लकड़ी तोड़ने के लिए देता है और वह तोड़ देते हैं, फिर वह उनको लकड़ियों का बंडल तोड़ने के लिए कहता है, वह नहीं तोड़ पाते, तो किसान कहता है, एकता में शक्‍ित है, अगर आप एक हो तो आपको कोई नहीं तोड़ सकता।

मुझे लगता है यह कहानी मैंने ही नहीं, बल्‍कि हिन्‍दुस्‍तान के ज्‍यादातर लोगों ने पढ़ी होगी, पेपरों में अंक लेने के लिए लिखी भी होगी, हो सकता है उनकी कहानी में किसान न हो, लकड़ी के बंडल न हो, मगर बात तो एकता की ही होगी। हम जब भी लड़े अलग अलग होकर आखिर क्‍यों, आजादी के समय की बात हो या आज हो रहे विरोध अभियानों की, हम सब एक मंच पर क्‍यूं नहीं आ सकते, क्‍या हम को पदों की होड़ है, क्‍या हम दुनिया में अलग पहचान बनाने के लिए यह सब करते हैं, जो सच्‍चे लीडर होते हैं, जो सच्‍चे लड़ाकू होते हैं, वह स्‍वयं के लिए नहीं बल्‍कि कौम के लिए, समाज के लिए आगे चलते हैं या कहूं लड़ते हैं।

अगर जंग जीतनी है तो मोतियों की तरह एक ही धागे में घुसते चले जाओ, और बन जाओ सुनहरे मोतियों की माला।

सावधान! देश उबल रहा है

मेरे घर गुजराती समाचार पत्र आता है, जिसके पहले पन्‍ने पर समाचार था कि देश की सुरक्षा को खतरा, इस समाचार को पढ़ने के बाद पहले पहल तो लगा कि देश का मीडिया देश हित की सोचता है या चीन जैसे दुश्‍मन की, जो ऐसी जानकारियां खुफिया तरीकों से जुटाने के लिए लाखों रुपए खर्च करता है। फिर एकांक विज्ञापन की एक पंक्‍ित 'देश उबल रहा है' याद आ गई, जो कई दिनों से मेरे दिमाग में बार बार बज रही है। जो कई दशकों से नहीं हुआ, और अब हो रहा है यह उबलते हुए देश की निशानी नहीं तो क्‍या है?

इस समाचार को पढ़ने के बाद मैं काम को निकल गया, हुआ वही जो मेरे दिमाग में समाचार पढ़ने के बाद आया, कि अब राजनेता सेनाध्‍यक्ष की कुर्सी को निशाना बनाएंगे, सभी नेताओं ने प्रतिक्रिया देना शुरू कर दी, जो मुंह में आया बोल दिया, जानकारियां लीक करने वाले मीडिया के लिए जश्‍न का दिन बन गया, क्‍योंकि पूरा दिन पंचायत बिठाने का अवसर जो मिल गया था।

मीडिया ने एक की सवाल पूछा क्‍या सेनाध्‍यक्ष को बर्खास्‍त किया जाना चाहिए, किसी ने यह नहीं कहा कि जो सेनाध्‍यक्ष ने पत्र में लिखा, उस पर जांच बिठाई जानी चाहिए, आखिर कहां कमियां रह गई के देश का सुरक्षा तंत्र इतना खोखला हो गया। कितनी हैरानी की बात है कि सवा सौ करोड़ की आबादी खतरे में है, और जानकारी लीक करने पर अटकी हुई है, एक पूर्व सेना अधिकारी टीवी पर आकर कहते हैं कि यह आज की बात नहीं, पिछले चालीस सालों से यही स्‍िथति है, लेकिन किसी ने एक बार भी गम्‍भीरता से नहीं लिया, आखिर क्‍यों?

सवाल यह नहीं कि चिटठी को किसी ने लीक किया, सवाल यह है कि करोड़ों रुपए के बजट को आखिर सरकार कहां लगा रही है, जो जनता हर साल सरकार को टेक्‍स के रूप में अदा करती है। जो मुम्‍बई में हुआ, उसके लिए कसाब नहीं, हमारा घटिया सुरक्षा मंत्रालय और सरकार जिम्‍मेदार है। सरकार को मिस्र से नसीहत लेनी चाहिए क्‍यों कि देश उबल रहा है, अब वो दिन दूर नहीं, जब ताज उछाले जाएंगे।

इतना ही नहीं, घटिया वाहन खरीदने के लिए सेना प्रमुख को घूस देने का प्रयास किया जाता है और बात रक्षा मंत्री तक पहुंचती है, मगर कारवाई के नाम पर चुप्‍पी साध ली जाती है, देश के सुरक्षा मंत्री की रक्षा को लेकर इस तरह की उदासीनता अच्‍छी नहीं, इस बात पर तो देश के किसी मंत्री व नेता एंटनी से अस्‍तीफे की मांग नहीं की, क्‍यूं चोर चोर मसेरे भाई जो ठहरे।

चलते चलते इतना ही कहूंगा कि नेताओं सावधान हो जाओ, क्‍योंकि देश उबल रहा है।

टाइम में मोदी, मीडिया में खलबली क्‍यूं

टाइम पत्रिका के पहले पन्‍ने पर गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र सिंह मोदी की फोटो एक लाइन बिजनस मीन मोदी, बट केन ही लीड इंडिया के साथ प्रकाशित हुई, जो यह इशारा करती है कि इस बार टाइम ने गुजरात के मुख्‍यमंत्री को लेकर स्‍टोरी प्रकाशित की है, जो किसी भी पत्रिका का कार्य होता है, लेकिन जैसे ही इस पत्रिका ने अपना एशियाई अंक प्रकाशित किया, वैसे ही भारतीय मीडिया इसको लेकर एक स्‍टोरी बनाने बैठ गया, जैसे किसी पत्रिका ने पहली बार किसी व्‍यक्‍ित पर स्‍टोरी की हो, इंडिया टूडे उठाकर देख लो, क्‍या उस के फ्रंट पेज पर किसी व्‍यक्‍ित विशेष की फोटो नहीं होती, या फिर हिन्‍दुस्तान में प्रकाशित होने वाली पत्रिकाएं पत्रिकाएं नहीं हैं, सच कहूं तो दूर के ढोल सुहाने लगते हैं।

इस पत्रिका के जो जो अंश समाचार बनाकर सामने आए हैं, उनमें कुछ भी नया नहीं था, क्‍योंकि जो लाइन टाइम ने फ्रंट पेज पर लिखी है, वह पूछ रही है कि क्‍या मोदी भारत की अगुवाई कर सकते हैं, यह बात को पिछले लोक सभा चुनाव के दौरान हर मीडिया बोल रहा था, शायद मसालेदार खबरों को दिखाने वाले मीडिया की याददाश्‍त कमजोर है। अगर नरेंद्र मोदी के खिलाफ कोई लिखे तो बहुत अच्‍छी बात है, लेकिन पक्ष में लिखे तो खबर बनती है, समझ से परे है, मीडिया के पास मोदी पर उंगली उठाने के लिए एक ही इश्‍यू है, वो गोधरा कांड, वो ही मीडिया अमृतसर में हुए हमले को कैसे भूल जाती है, वह मीडिया दिल्‍ली में सिखों के साथ हुए जुल्‍म को कैसे भुला देती है,

अगर मोदी गुजरात के अंदर विकास नहीं कर रहा तो हर बार चुनाव जीत कर सत्‍ता में कैसे पहुंच जाता है, क्‍या गुजरात की जनता गूंगी बहरी है, क्‍या उसको अच्‍छे बुरे की समझ नहीं, अगर मीडिया मोदी के खिलाफ कुछ लिखना चाहता है तो उसके पास इसकी आजादी है, लेकिन अगर कोई अच्‍छा लिखता है, उसको खबर बनाकर मोदी पर उंगली उठाना वह उचित नहीं|

वैसे भी किसी ने कहा है कि बुरे व्‍यक्‍ित के भीतर एक अच्‍छा गुण होता है, तो यह भी स्‍वभाविक है कि एक अच्‍छे आदमी के भीतर एक बुरा गुण भी होगा, ये बात तो आंकलन वाले को देखनी होती है कि कौन सी चीज को उभारकर लोगों के सामने रखना है, जैसे कि आधा पानी का भरा हुआ गिलास, किसी को आधा खाली नजर आता है।

मीडिया, किक्रेट और पब्‍लिक


पंजाब के पूर्व वित्‍त मंत्री व मुख्‍यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के भतीजे ने नई पार्टी की घोषणा करते हुए कहा कि आने वाले एक साल में वह पंजाब का नक्‍शा बदलकर रख देंगे, अगर लोग उनका साथ दें तो। आखिर बात फिर तो पर आकर अटक गई। जब तक बीच से तो व पर नहीं हटेंगे तब तक देश का सुधार होना मुश्किल। पब्‍लिक के साथ की तो उम्‍मीद ही मत करो, क्‍योंकि पब्‍लिक की याददाश्‍त कमजोर है। मनप्रीत सिंह बादल ने अपनी नई पार्टी की घोषणा तब की, जब पूरा मीडिया देश को क्रिकेट के रंग में पूरी तरह भिगोने में मस्त है। मीडिया की रिपोर्टों में भी मुझे विरोधाभास के सिवाए कुछ नजर नहीं आ रहा, चैनल वाले टीआरपी के चक्कर में बस जुटे हुए हैं। मुद्दा क्‍या है, क्‍या होना चाहिए कुछ पता नहीं। वो ही मीडिया कह रहा है कि भारत के प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को न्यौता भेजकर दोनों देशों के संबंधों में आई खटास दूर करने के लिए कदम उठाया है, लेकिन वहीं दूसरी तरफ मीडिया भारत पाकिस्तान के मैच को युद्ध की तरह पेश कर रहा है। कहीं कहता है कि दोनों देशों में दोस्ताना बढ़ेगा, वहीं किक्रेट की बात करते हुए युद्ध सी स्थिति पैदा कर देता है। मीडिया ने भारत पाकिस्तान मैच को इतना प्रमोशन दिया कि राष्ट्रीय छुट्‌टी तक रखने की बात सामने आ गई। हद है, किस के लिए छुट्टी, ताकि हम भारत को पाकिस्तान पर विजय पाते हुए दिखाना चाहते हैं, या फिर किक्रेट को खेल के नजरिए से। मीडिया की बदौलत सबसे ज्यादा सट्टा इस मेज पर लग रहा है, जिसको मीडिया भी बड़े उत्साह के साथ पेश कर रहा है, जैसे सट्टा लगाना को शुभ कार्य हो। इतना ही नहीं, कुछ दिन पहले भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाला भारत हजारों रुपए देकर ब्‍लैक में टिकट खरीदने के लिए तैयार हो गया। क्‍या भारत व मीडिया भूल गया कि यह भी एक सामाजिक बुराई है, जिसको आज हम किक्रेट के नशे में अन्धे होकर जन्म दे रहे हैं। डेढ़ सौ रुपए की टिकट पंद्रह पंद्रह हजार में खरीदी जा रही है आखिर ऐसा क्‍या है भारत पाकिस्तान में मैच में। मैच आम मैचों सा होना चाहिए था, मीडिया को मैच का मेल युद्ध से नहीं करना चाहिए था। इस बात ने भारतीयों के दिलों में पाकिस्तान के लिए प्यार स्नेह का बीज नहीं बोया बल्कि नरफत बोई है, जो पाकिस्तान को हर हाल में हारते हुए देखना चाहेगी। मीडिया की इस तरह की न समझी भरी रिपोर्टों ने भारतीय टीम को कितने दबाव तले ला दिया होगा, इसका अंदाजा शायद ही मीडिया वाले लगा सके। जीत का जश्न तो हिन्दुस्तानी बड़े आराम से मना लेते हैं, लेकिन हार का दर्द सहना मुश्किल हो जाता है, खास कर तब जब टीम से सौ फीसदी उम्‍मीद कर बैठें। मैं किक्रेट देखता हूं बहुत कम, लेकिन खेल के नजरिए से, जो बढि़या प्रदर्शन करेगा वो जीतेगा, जो बुरा प्रदर्शन करेगा वो हारेगा, क्‍योंकि जीत के लिए दोनों ही खेलते हैं। मुझे याद है, एक मैच जब मैदान में भारत की हार पर भीड़ ने मैदान में ही हुड़दंग मचा दिया था। आज भी विनोद कांबली का वो रोता हुआ चेहरा आंखों से ओझल नहीं होता, अगर मैं कहीं गलत न हूं तो तब भारत श्रीलंका के हाथों सेमीफाइनल में हारा था। इस विश्‍वकप में क्‍वाटर फाइनल में हारकर वापिस लौटने वाली पाकिस्तानी टीम को पाकिस्तान में पब्‍लिक द्वारा उतरने नहीं दिया गया था। आखिर उनका क्‍या दोष अगर वो मैच नहीं जिता सके, मैच का जिम्‍मा किसी एक प्लेयर पर नहीं, बल्कि पूरे टीम वर्क पर निर्भर करता है। मीडिया को समझदारी से काम लेना चाहिए। खेल को खेल रहने देना चाहिए।

जनाक्रोश से भी बेहतर हैं विकल्प, देश बदलने के

कुलवंत हैप्पी / गुड ईवनिंग/ समाचार पत्र कॉलम
हिन्दुस्तान में बदलाव के समर्थकों की निगाहें इन दिनों अरब जगत में चल रहे विद्रोह प्रदर्शनों पर टिकी हुई हैं एवं कुछ लोग सोच रहे हैं कि हिन्दुस्तान में भी इस तरह के हालात बन सकते हैं और बदलाव हो सकता, लेकिन इस दौरान सोचने वाली बात तो यह है कि हिन्दुस्तान में तो पिछले छह दशकों से लोकतंत्र की बहाली हो चुकी है, यहां कोई तानाशाह गद्दी पर सालों से बिराजमान नहीं। वो बात जुदा है कि यहां लोकतांत्रिक सरकार होने के बावजूद भी देश में भूखमरी, बेरोजगारी व भ्रष्टाचार अपनी सीमाएं लांघता चला जा रहा है। इसके लिए जितनी हिन्दुस्तान की सरकार जिम्मेदार है, उससे कई गुणा ज्‍यादा तो आम जनता जिम्मेदार है, जो चुनावों में अपने मत अधिकार का इस्तेमाल करते वक्‍त पिछले दशकों की समीक्षा करना भूल जाती है। कुछ पैसों व अपने हित के कार्य सिद्ध करने के बदले वोट देती है। देश में जब जब चुनावों का वत नजदीक आता है नेता घर घर में पहुंचते हैं, लेकिन इन नेताओं की अगुवाई कौन करता है, हमीं तो करते हैं, या कहें हमीं में से कुछ लोग करते हैं, या जो समस्याएं हमें दरपेश आ रही हैं, उनको नहीं आती, जो नेताओं के लिए वोट मांगने के लिए हमारे दर आते हैं। पार्षद किसी नेता को अपनी दहलीज नहीं लाया कि हम भूल जाते हैं, यह वो शख्स है, जिसके खिलाफ जनाक्रोश के ख्वाब संजो रहे थे कुछ समय पूर्व, यह उसकी सरकार के प्रतिनिधि हैं, जिन्होंने डिग्री हाथों में लेकर नौकरी मांगने गए कुछ बेरोजगारों पर लाठियां बरसाई। यह भूलने की आदत ही तो आफत बन चुकी है। एक शहर में बहुत बड़ा बम्ब धमाका होता है, एवं कुछ घंटों बाद सुन टूटती है एवं शहर पहले सी चहल पहल का अहसास करता है। इसको साहस कहो, चाहे कमजोर याददाशत का नतीजा। पुलिस प्रशासन सांप निकालने के बाद लकीर पीटने की कहावत को सच करते हुए कुछ समय सुरक्षा कड़ी करता है, फिर वह भी अपनी जिम्मेदारी भूल जाता है। आज टीवी व समाचार पत्रों में अरब जगत में हो रहा जनाक्रोश छाया हुआ है, और कुछेक हिन्दुस्तानी शेखचिल्ली की तरह ख्यालों में हिन्दुस्तान में भी इस तरह के विद्रोह को होते हुए महसूस कर एक नए हिन्दुस्तान की कल्पना कर रहे हैं, लेकिन जैसे ही वहां सब शांत हो जाएगा, समाचार पत्र व खबरिया चैनल अपनी पेज थ्री की खबरों में व्यस्त हो जाएंगे, वैसे ही लोग भूल जाएंगे अरब देशों के जनाक्रोश को, और हिन्दुस्तान का लोकतंत्र दिन ब दिन बूढ़ा एवं बोझिल होता चला जाएगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि हिन्दुस्तान में भी जनाक्रोश फूटेगा, लेकिन सत्‍ता नहीं बदलेगी बल्कि आपराधिक गतिविधियां बढ़ेगी, रिश्ते टूटेंगे, बच्चे बिकेंगे, वेश्यवृत्ति बढ़ेगी, दंगे फसाद होंगे। अगर इन सबको होने से रोकना है तो सरकार पर उम्मीदें रखने से बजाय खुद करने की हिम्मत करो। देश को बदलने के लिए जनाक्रोश के अलावा भी कई रास्ते हैं, लेकिन उन रास्तों पर चलने के लिए स्वयं में शति की जरूरत है। फैट्री मालिक प्रशासन से सहयोग लेकर युवावस्था भिखारियों को कार्य पर रखें, भीख मांगने वाले बच्चों को बड़े बड़े स्कूल अपने हॉस्टलों में रखकर शिक्षा दें, खासकर जो मोटी दान राशि लेते हैं। आम जन अपने पुराने कपड़ों को बेचने की बजाय, गरीबों को बांट दें, होटलों में बर्बाद होते खाने को गरीबों तक पहुंचा दो, सरकार के हर कार्य पर निगाहें रखो एवं पैसे देकर काम करवाने की आदत को नकार दो, नोट के बदले वोट की बजाय विकास के बदले दो वोट देने की आदत डालो।

उंगली उठाने से पहले जरा सोचे

बुधवार को स्थानीय फायर बिग्रेड चौंक पर समाज सेवी संस्थाओं की ओर से हिन्दुस्तानी भ्रष्टाचार के खिलाफ जागरूकता रैली का आयोजन किया गया, जिसमें मैं भी शामिल हुआ। हाथों में जागरूकता फैलाने वाले बैनर पकड़े हम सब सडक़ के एक किनारे खड़े थे, और उन बैनरों पर जो लिखा था, वह आते जाते राहगीर तिरछी नजरों से पढ़कर अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे। इतने में मेरे पास खड़े एक व्यक्‍ति की निगाह सामने दीवार पर लटक रहे धार्मिक संस्था के एक फलेक्‍स पर पड़ी, जिस पर लिखा हुआ था, हम बदलेंगे युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा, उन्होंने मेरा ध्यान उस तरफ खींचते हुए कहा कि वह शब्‍द बहुत कम हैं, लेकिन बहुत कुछ कहते हैं। अपने लेखन से सागर में गागर तो कई लेखकों ने भर दिया, लेकिन हमारा जेहन उनको याद कितनी देर रखता है, अहम बात तो यह है। हमारे हाथों में पकड़े हुए बैनरों पर लिखे नारों की अंतिम पंक्‍ति भी कुछ यूं ही बयान करती है, न रिश्वत लें, न रिश्वत दें की कसम उठाएं, जो बैनर तैयार करते समय मेरे दिमाग से अचानक निकली थी। किसी पर उंगली उठानी, सडक़ों पर निकल कर प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करनी हमारी आदत में शुमार सा हो गया था, लेकिन हम क्‍यों नहीं सोचते के जब हम किसी पर उंगली उठाते हैं तो तीन उंगलियां हमारी तरफ होती हैं, जो हमको याद करवाती हैं कि कुछ दोष तो हमारा भी है, सारा दोष सरकारी सिस्टम का नहीं। हम सिस्टम का बहुत बड़ा हिस्सा हैं, अगर हम सिस्टम को बरकरार रखते हैं, तो ही सिस्टम ठीक रह सकता है, क्‍योंकि सिस्टम बनाने वाले मुट्‌ठी भर लोग हैं, लेकिन उसको संभालकर रखने वाले व बिगाडऩे वाले करोड़ों में हैं। अगर हम रिश्वत देते हैं, तो सामने वाला रिश्वत लेता है। हम अगर नशा पैदा करते हैं, तो हमीं से कुञ्छ लोग बेचते हैं, कुछ लोग खाते हैं। गलियों में सीवरेज का पानी फैल जाता है, तो लोग सडक़ों पर उतर आते हैं, नगर पालिकाओं, नगर निगमों व सरकारों के खिलाफ नारेबाजी करते हैं। लेकिन नारेबाजी करने से पूर्व वह एक दफा भी नहीं सोचते हैं कि आखिर नालियां व सीवरेज बंद क्‍यों होते हैं। प्लास्टिक के लिफाफे इस्तेमाल करने के बाद हम कहां फेंकते हैं? कभी सोचा है! वह लिफाफे ही सीवरेज व्यवस्था को प्रभावित कर देते हैं। जरा सोचो, सीवरेज व्यवस्था प्रभावित होने से हम इतने क्रोधित हो जाते हैं तो जिस तरह भूमि में प्लास्टिक दिन प्रति दिन फेंके जा रहे हैं, एक दिन धरती की सोखने की क्षमता खत्म हो जाएगी, तब क्‍या होगा, किसके खिलाफ नारेबाजी करेंगे। सिस्टम केञ् खिलाफ, कौन से सिस्टम के खिलाफ, जो हम से बनता है, जिसका हम हिस्सा हैं। बेहतर होगा, धार्मिक बोर्ड पर लिखी पंक्‍तियों का अनुसरण करें, जिसमें लिखा था, हम बदलेंगे युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा।

रक्षक से भक्षक तक

सर जी, वो कहता है कि उसको एसी चाहिए घर के लिए। वो का मतलब था डॉक्टर, क्योंकि मोबाइल पर किसी से संवाद करने वाला व्यक्ति एक उच्च दवा कंपनी का प्रतिनिधि था, जो शहर में उस कंपनी का कारोबार देखता था। इस बात को आज कई साल हो गए, शायद आज उसके संवाद में एसी की जगह एक नैनो कार आ गई होगी या फिर से भी ज्यादा महंगी कोई वस्तु आ गई होगी, क्योंकि शहर में लगातार खुल रहे अस्पताल बता रहे हैं कि शहर में मरीजों की संख्या बढ़ चुकी है, जिसके चलते दवा कारोबार में इजाफा तो लाजमी हुआ होगा।

आप सोच रहें होंगे कि मैं क्या पहेली बुझा रहा हूँ, लेकिन यह किस्सा आम आदमी की जिन्दगी को बेहद प्रभावित करता है, क्योंकि इस किस्सा में भगवान को खरीदा जा रहा है। चौंकिए मत! आम आदमी की भाषा में डॉक्टर भी तो भगवान का रूप है, और उक्त किस्सा एक डॉक्टर को लालच देकर खरीदने का ही तो है। कितनी हैरानी की बात है कि पैसे मोह से बीमार डॉक्टर शारीरिक तौर पर बीमार व्यक्तियों का इलाज कर रहे हैं।

इस में कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि दवा कंपनियों के पैसे से एशोआराम की जिन्दगी गुजारने वाले ज्यादातर डॉक्टर अपनी पसंदीदा कंपनियों की दवाईयाँ ही लिखकर देते हैं, जिसकी मार पड़ती है आम आदमी पर, क्योंकि दवा कंपनियां डॉक्टर को दी जाने वाली सुविधाओं का खर्च भी तो अपने ही उत्पादों से निकालेंगी।

पैसे के मोह से ग्रस्त डॉक्टरी पेशा भी बुरी तरह बर्बाद हो चुका है, अब इस पेशे में ईमानदार लोग इतने बचें, जितना आटे में नमक या फिर समुद्र किनारे नजर आने वाला आईसबर्ग (हिमखंड), ज्ञात रहे कि आइसबर्ग का 90 फीसदी हिस्सा पानी में होता है, और दस फीसदी पानी के बाहर, जो नजर आता है।

अब ज्यादातर डॉक्टरों का मकसद मरीजों को ठीक करना नहीं, बल्कि रेगुलर ग्राहक बनाना है, ताकि उनकी रोजी रोटी चलती रहे, और वो जिन्दगी को पैसे के पक्ष से सुरक्षित कर लें, पैसे की लत ऐसी लग गई है कि आम लोग सरकारी नौकरियाँ तलाशते हैं, डॉक्टर खुद के अस्पताल खोलने के बारे में सोचते हैं। मुझे याद है, जब मेरी माता श्री बीमार हुई थी, उसका मानसा के एक सरकारी अस्पताल से चल रहा था, वो पहले से चालीस फीस ठीक हो गई थी, अचानक उस युवा डॉक्टर ने सरकारी नौकरी छोड़कर खुद को अस्पताल खोल लिया, और मेरी माता की दवाई अब उसके अस्पताल से आनी शुरू हो गई, वो पहले महीने भर में बुलाता था, अब हफ्ते भर में। और मोटी फीस लेने लगा था, लेकिन कुछ हफ्तों बाद उसकी तबीयत फिर से पहले जैसी हो गई, क्योंकि अब उस डॉक्टर का मकसद खुद की आमदन बढ़ाना था, ना कि मरीज को तंदरुस्त कर घर भेजना।

लोगों ने डॉक्टर को भगवान की उपमा दी है, लेकिन अब उस भगवान के मन में इतना खोट आ गया है कि अब वो भगवान अपने दर पर आने वाले मानवों के अंगों की तस्करी करने से भी पीछे नहीं हट रहा। इतना ही नहीं, कभी कभी तो भगवान इतना क्रूर हो जाता है कि शव को भी बिन पैसे परिजनों के हवाले नहीं करता। और तो और रक्त के लिए भी अब वो निजी ब्लड बैंकों की पर्चियां काटने लगा है, आम आदमी का शोषण अब उसकी आदत में शुमार हो गया है। अपनी रक्षक की छवि को उसने भक्षक की छवि में बदल दिया।

अपनों के खून से सनते हाथ

अपनों के खून से सनते हाथ, आदम से इंसान तक का सफर अभी अधूरा है को दर्शाते हैं। झूठे सम्मान की खातिर अपनों को ही मौत के घाट उतार देता है आज का आदमी। पैसे एवं झूठे सम्मान की दौड़ में उलझे व्यक्तियों ने दिल में पनपने वाले भावनाओं एवं जज्बातों के अमृत को जहर बनाकर रख दिया है, और वो जहर कई जिन्दगियों को एक साथ खत्म कर देता है।

पाकिस्तान की तरह हिन्दुस्तान में भी ऑनर किलिंग के मामले निरंतर सामने आ रहे हैं, ऐसा नहीं कि भारत में ऑनर किलिंग का रुझान आज के दौर का है, ऑनर किलिंग हो तो सालों से रही है, लेकिन सुर्खियों में अब आने लगी है, शायद अब पाकिस्तान की तरह हिन्दुस्तानी हुक्मरानों को भी चाहिए कि वो भी मर्दों के लिए ऐसे कानून बनाए, जो उनको ऐसे शर्मनाक कृत्य करने की आजादी मुहैया करवाए। पाकिस्तानी मर्दों की तरह हिन्दुस्तानी मर्द भी औरतों को बड़ी आसानी से मौत की नींद सुला सके, वो अपना पुरुष एकाधिकार कायम कर सकें।

वोट का चारा खाने में मशगूल सरकारें मूक हैं और खाप पंचायतें अपनी दादागिरी कर रही हैं। इन्हीं पंचायतों के दबाव में आकर माँ बाप अपने बच्चों को मौत की नींद सुला देते हैं, जिनको जन्म देने एवं पालने के लिए हजारों सितम झेले होते हैं।

इसको एक सभ्य समाज कैसे कहा जा सकता है, जहाँ खुद पेड़ लगाकर खुद उखड़ा फेंकने का प्रचलन हो। जब मानव ऐसे शर्मनाक कृत्य करता है तो क्या फर्क रह जाता है आदम और पशु में। जब जब ऐसे ऑनर किलिंग के मामले सामने आते हैं तो सच में एक बात तो समझ में आने लगती है कि हमारी शिक्षा प्रणाली एवं हमारी धार्मिकता कितनी कमजोर है।

हमारे धार्मिक गुरू, ग्रंथ हमको अहिंसक होने का पाठ पढ़ाते हैं, प्रेम करने का पाठ पढ़ाते हैं, हमारी शिक्षा प्रणाली हमको गंवार से पढ़ा लिखा बनाती है ताकि हम अच्छे बुरे की पहचान कर सके, लेकिन हम इन चीजों को त्याग मूड़ लोगों की भीड़ खुद को खड़ा कर लेते हैं, जो वो भीड़ कर रही है, उसको ही सही मान रहे हैं।

भीड़ में सब अनजान होते हैं एक दूसरे से, किसी को कुछ अंदाजा नहीं होता वो क्या कर रहे हैं, वो सब सोच रहे होते हैं, बस जो कर रहे हैं अच्छा ही होगा, लेकिन जब कोई खुद को भीड़ से अलग कर एकांत में सोचता है तो उसकी हिम्मत नहीं पड़ती कि वो खुद से सामना भी कर सके, वो भीतर ही भीतर टूटकर बिखर जाता है। जब तलक मानव सोच शैतानी बचपने से उभरेगी नहीं, तब तक फगवाड़ा के गांव महेड़ू में हुए प्रवासी दम्पति की हत्या (ऑनर किलिंग) जैसे शर्मनाक कृत्य घटित होते रहेंगे।

क्या देखते हैं वो फिल्में...

मंगलवार को एक काम से चंडीगढ़ जाना हुआ, बठिंडा से चंडीगढ़ तक का सफर बेहद सुखद रहा, क्योंकि बठिंडा से चंडीगढ़ तक एसी कोच बसों की शुरूआत जो हो चुकी है, बसें भी ऐसी जो रेलवे विभाग के चेयर कार अपार्टमेंट को मात देती हैं। इन बसों में सुखद सीटों के अलावा फिल्म देखने की भी अद्भुत व्यवस्था है।

इसी व्यवस्था के चलते सफर के दौरान कुछ समय पहले रिलीज हुई पंजाबी फिल्म मिट्टी देखने का मौका मिल गया, जिसके कारण तीन चार घंटे का लम्बा सफर बिल्कुल पकाऊ नहीं लगा।

पिछले कुछ सालों से पुन:जीवित हुए पंजाबी फिल्म जगत प्रतिभाओं की कमी नहीं, इस फिल्म को देखकर लगा। फिल्म सरकार द्वारा किसानों की जमीनों को अपने हितों के लिए सस्ते दामों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले करने जैसी करतूतों से रूबरू करवाते हुए किसानों की टूटती चुप्पी के बाद होने वाले साईड अफेक्टों से अवगत करवाती है।

फिल्म की कहानी चार बिगड़े हुए दोस्तों से शुरू होती है, जो नेताओं के लिए गुंदागर्दी करते हैं, और एक दिन उनको अहसास होता है कि वो सही अर्थों में गुंडे नहीं, बल्कि सरदार के कुत्ते हैं, जो उसके इशारे पर दुम हिलाते हैं।

वो इस जिन्दगी से निजात पाने के लिए अपने अपने घरों को लौट जाते हैं, लेकिन वक्त उनके हाथों में फिर हथियार थमा देता है, अब वो जंग किसानों के लिए लड़ते हैं, अपनों के लिए लड़ते हैं, सरकार के विरुद्ध संघर्ष अभियान चलाते हैं, और सरकार के खिलाफ चलाई इस मुहिम में तीन दोस्त एक एक कर अपनी जान गंवा बैठते हैं, लेकिन अंत तक आते आते फिल्म अपनी शिखर पर पहुंच जाती है। फिल्म का अंतिम सीन आम आदमी के भीतर जोश भरता है। इस दृश्य में किसान सति श्री अकाल और इंकलाब के नारे लगाते हुए पुलिस का सुरक्षा चक्र तोड़ते हुए नेता एवं फैक्ट्री मालक को मौत के घाट उतार देते हैं, और अपनी जमीन को दूसरे हाथों में जाने से रोक लेते हैं।

यह पिछले दिनों देखी गई पंजाबी फिल्मों में से दूसरी पंजाबी फिल्म थी, जो किसान हित की बात करते हुए सरकार के विरुद्ध आवाज बुलंद करने के लिए अपील करती है, आह्वान करती है। इससे कुछ दिन पहले पंजाबी गायक से अभिनेता बने बब्बू मान की फिल्म एकम - सन ऑफ सॉइल देखी। इस फिल्म में भी नायक एकम किसान वर्ग की अगुवाई करते हुए सरकार के विरुद्ध एक लड़ाई लड़ता है। इस फिल्म में बब्बू मान को देखकर पुरानी फिल्मों के अमिताभ बच्चन के उन दमदार किरदारों की याद आ गई, जो गरीब वर्ग की अगुवाई करते हुए गरीबों को उनके हक दिलाता था।

जैसे ही मिट्टी फिल्म खत्म हुई, तो एक के बाद एक सवाल दिमाग में आकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने लगे, क्या इन फिल्मों को उन्होंने देखा, जिन लोगों की स्थिति को पर्दे पर उभरा गया है, जिनके सवालों को बड़े पर्दे पर उठाया गया है। क्या सरकार के प्रतिनिधियों के पास सिनेमा देखने की फुर्सत है, वो भी ऐसी फिल्में, जो वास्तिवकता से रूबरू करवाती हों?

दिमाग को सवाल मुक्त करते हुए बस के भीतर बैठी सवारियों को एक नजर देखा, और पाया कि सब लोग नौकरी पेशा हैं, जिनके पास शायद चैन से बैठकर साँस लेने की फुर्सत भी न होगी, वो सरकार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए लामबंद कैसे हो सकते हैं, शायद उनके लिए तो बस में चल रही फिल्म भी कोई मतलब न रख रही होगी।

जिनको सरकार के विरुद्ध लामबंद करने के लिए फिल्म बनाई गई, वो तो बेचारे रोड़्वेज की उन बसों में भी बामुशिक्ल चढ़ते होंगे, जिन बसों में पुर्जों के खटकने की आवाजें कानों को पका देती हैं, सीटें माँस में चूंटी काट लेती हैं, और सफर खत्म होने तक जान मुट्ठी में रहती है, कहीं ब्रेक फेल न हो जाएं, वगैरह वगैरह।

कितने और हैं पैसे और शहीदी ताज?

कुलवंत हैप्पी
कितने शहीदी ताज और मुआवजा देने के लिए पैसे हैं, शायद सरकार के लेखाकार और नीतिकार सोच रहे होंगे? साथ में यह भी सोच रहे होंगे कि बड़ी मुश्किल से हवाई हादसे की ख़बर के कारण जनता का ध्यान बस्तर से हटा था, नक्सलवाद से हटा था। चलो अफजल गुरू को फाँसी भले ही अब तक नहीं दे सके, लेकिन कसाब को फाँसी की सजा सुनाकर जनता की आँख में धूल तो झोंक ही दी, जो आँखें बंद कर जीवन जीने में व्यस्त है। आजकल तो हमारे पास कोई नेता भी नहीं बचा, जो मीडिया में गलत सलत बयानबाजी कर निरंतर हो रहे नक्सली हमलों से मीडिया का और जनता का ध्यान दूर खींच सके। देखो न कितना कुछ है सोचने के लिए सरकार के सलाहकारों के पास। आप सोच रहे होंगे क्या सलाहकार सलाहकार लगा रखी है, बार बार क्यों लिख रहा हूँ सलाहकार। लेकिन क्या करूं, देश के उच्च पदों पर बैठे हुए नेतागण भी फैसला लेने से पहले अपने सलाहकारों
से बात करते हैं, सलाहकार भी नेताओं से चालू हैं, वो भी वहाँ बैठे बैठे ही टेबल स्टोरी जर्नलिस्ट की तरह बैठे बैठे लम्बी चौड़ी स्टोरियों सी सलाहें नेताओं के दे डालते हैं, जो वास्तविकता से कोसों दूर होती हैं।

जनता की आँख में धूल झोंकने के लिए मुआवजा एवं शहीद जैसे सबसे बढ़िया हथियार सरकार के हाथ में हैं। शहीदों की संख्या दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है। कहीं सरकार गिनीज बुक में रिकार्ड तो दर्ज नहीं करवाना चाहती कि भारत में सबसे ज्यादा शहीद हैं, अपनी मिट्टी को प्यार करने वाले, देश पर मिटने वाले। आख़र कब तक नेताओं की लापरवाहियों के कारण नवविवाहितें जिन्दा लाश बनती रहेंगी? कब तक माँओं की कोखें उजड़ती रहेंगी? कब तक बूढ़े बाप के सहारे गँवाते रहेंगे? हम सुरक्षा की उम्मीद आख़र किस से कर रहे हैं, जो हमारे बीच आते हुए भी अपने साथ बंदूकधारी लेकर आते हैं। जो आलीशान घरों में उच्चस्तीय सुरक्षा घेरे के बीच सुख की नींद सोते हैं। किसी ने कहा है, सरकारें तब तक ताकतवर हैं, जब तक जनता सोई हुई है।

कारगिल फतेह करने वाला भारत आज अपनी माटी पर क्यों बार बार मुँह की खा रहा है? क्यों नैतिकता के नाम पर अस्तीफे देकर नेता लोग सिस्टम में रहकर सिस्टम को सुधारने जैसे जिम्मेवार काम से भागते हैं? आख़र अब कोई मोमबत्तियाँ जलाकर संसद तक क्यों नहीं आ रहा? मुम्बई हमले की गूँज अगर विदेशों तक पहुंच सकती है, तो क्या नक्सली हमले की गूंज बहरे हो चुके हिन्दुस्तानी आवाम के कानों तक नहीं पहुंच सकती?

कब बोलेंगे सरकार के खिलाफ हल्ला? कब जागेगी भारतीय जनता? कब गली गली से आवाज आएगी हमें इंसाफ चाहिए? आख़र कब समझेगी सरकार जनता की ताकत को? कब करेगी अपनी जिम्मेदारियों का अहसास? तमाम सवालात दिमाग में आ खड़े हो जाते हैं, जब देश में मौत का तांड़व देखता हूँ।

एक खत कुमार जलजला व ब्लॉगरों को

कुमार जलजला को वापिस आना चाहिए, जो विवादों में घिरने के बाद लापता हो गए, सुना है वो दिल्ली भी गए थे, ब्लॉग सम्मेलन में शिरकत करने, लेकिन किसी ढाबे पर दाल रोटी खाकर अपनी काली कार में लेपटॉप समेत वापिस चले गए, वो ब्लॉगर सम्मेलन में भले ही वापिस न जाए, लेकिन ब्लॉगवुड में वापसी करें।

दिलों में नहीं आई दरारें

लेखक : कुलवंत हैप्पी
पिछले कई दिनों से मेरी निगाह में पाकिस्तान से जुड़ी कुछ खबरें आ रही हैं, वैसे भी मुझे अपने पड़ोसी मुल्कों की खबरों से विशेष लगाव है, केवल बम्ब धमाके वाली ख़बरों को छोड़कर। सच कहूँ तो मुझे पड़ोसी देशों से आने वाली खुशखबरें बेहद प्रभावित करती हैं। जब पड़ोसी देशों से जुड़ी किसी खुशख़बर को पढ़ता हूँ तो ऐसा लगता है कि अलग हुए भाई के बच्चों की पाती किसी ने अखबार के मार्फत मुझ तक पहुंचा दी। इन खुशख़बरों ने ऐसा प्रभावित किया कि शुक्रवार की सुबह अचानक लबों पर कुछ पंक्तियाँ आ गई।

दिल्ली से इस्लामाबाद के बीच जो है फासला मिटा दे, मेरे मौला,
नफरत की वादियों में फिर से, मोहब्बत गुल खिला दे, मेरे मौला,

सच कहूँ, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच अगर कोई फासला है तो वो है दिल्ली से इस्लामाबाद के बीच, मतलब राजनीतिक स्तर का फासला, दिलों में तो दूरियाँ आई ही नहीं। रिश्ते वो ही कमजोर पड़ते हैं, यहाँ दिलों में दूरियाँ आ जाएं, लेकिन यहाँ दूरियाँ राजनीतिज्ञों ने बनाई है। साहित्यकारों ने तो दोनों मुल्कों को एक करने के लिए अपनी पूरी जान लगा दी है। अगर दिलों में भी मोहब्बत मर गई होती तो शायद श्री ननकाणा साहिब जाने वाले सिखों का वहाँ गर्मजोशी से स्वागत न होता, गुजरात की सीमा से सटे पाकिस्तान में खण्डहर बन चुके जैन मंदिरों को मुस्लिम अब तक संभाले न होते, शोएब के मन में सानिया का घर न होता, जाहिदा हीना जैसे लेखिका कभी पाकिस्तान की डायरी न लिख पाती और नुसरत फतेह अली खाँ साहिब, साजिया मंजूर, हस्न साहिब दोनों मुल्कों की आवाम के लिए कभी न गाते।

दिल चाहता है कि दोनों मुल्कों की सरकारों में साहित्यकार घूस जाएं, और मिटा दें राजनीतिज्ञों द्वारा जमीं पर खींची लकीर को। एक बार फिर हवा की तरह एवं अमन पसंद परिंदों की तरह सरहद लाँघकर बेरोक टोक कोई लाहौर देखने जाए, और कोई वहाँ से दिल्ली घूमने आए। पंजाब में एक कहावत आम है कि जिसने लाहौर नहीं देखा, वो पैदा ही नहीं हुआ, ऐसा होने से शायद कई लोगों का पैदा होना होना हो जाए। जैन समाज खण्डहर हो रहे अपने बहुत कीमती मंदिरों को फिर से संजीवित कर लें, हिन्दु मुस्लिम का भेद खत्म हो जाए और बाबरी मस्जिद का मलबा पाकिस्तान में बसते हिन्दुओं पर न गिरे। हवाएं कुछ ऐसी चलें कि दोनों तरह अमन की बात हो, वैसे भी पाकिस्तानी आवाम भारत को अपने बड़े भाईयों के रूप में देखती है।

जी हाँ, जब हिन्दुस्तान में महिला आरक्षण बिल पास हुआ था, तो पाकिस्तानी महिलाओं ने अपने हकों के लिए वहाँ आवाज़ बुलंद की, और दुआ की कि भारत की तरह वहाँ भी महिला शक्ति को अस्तित्व में ला जाए। भारत में जब अदालत का फैसला 'गे समुदाय' के हक में आया तो पाकिस्तान में 'गे समुदाय' भी आवाज बुलंद कर उठा, जो कई वर्षों से चोरी चोरी पनप रहा था, किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि भारतीय अदालत का फैसला पाकिस्तान में दुबक कर जीवन जी रहे गे समुदाय में भी जान फूँक जाएगा।

पाकिस्तानी आवाम व हिन्दुस्तानी जनता के दिलों में आज भी एक दूसरे के प्रति मोहब्बत बरकरार है, शायद यही कारण है कि पाकिस्तान में संदेश नामक सप्ताहिक अखबार की शुरूआत हुई, जो सिंध में बसते हिन्दु समाज की समस्याओं को पाकिस्तानी भाषा में उजागर करता है। पाकिस्तानी मीडिया हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचारों को ज्यादा अहमियत नहीं देता, लेकिन संदेश ने हिन्दु समाज के लिए वो काम किया, जिसकी कल्पना कर पाना मुश्किल है। इतना ही नहीं, पंजाबी बोली को बचाकर रखने के लिए पाकिस्तानी पंजाब में भी कई संस्थाएं सक्रिय हैं।

पाकिस्तान की सीमा से सटे पंजाब में कबूतर पालने का चलन आज भी है। लेकिन कबूतर पालकों की खुशी तब दोगुनी हो जाती है, जब कोई पाकिस्तानी अमन पसंद परिंदा उनकी छत्री पर एकाएक आ बैठता है। उनको वैसा ही महसूस होता है जैसा कि सरहद पार से आए किसी अमन पसंद व्यक्ति को मिलकर। काश! इन परिंदों की तरह मानव के लिए भी सरहदें कोई अहमियत न रखें। लेखक की दिली तमन्ना है कि एक बार फिर से Diwali में अली और Ramjan में राम नजर आएं।

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