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हैप्पी अभिनंदन में सुनील कटारिया

सुनील कटारिया
हैप्पी अभिनंदन में इस बार आप जिस ब्लॉग हस्ती से रूबरू होने जा रहे हैं, उसने 'कौन कहता है आकाश में सुराख़ नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो' को सच कर दिखाया है असल जिन्दगी में, लेकिन ब्लॉग जगत में तो आए हुए इन्हें बड़ी मुश्किल से ढाई माह हुए हैं। ब्लॉग ख्यालात की कलम से पर लिखने वाले युवा ब्लॉगर सुनील कटारिया यहाँ एक तरफ पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर समाचार पत्रों के लिए गैर-वेतन लेखन कार्य करने के साथ - साथ  दूरदर्शन के पंजाब से चलने वाले रीजनल टीवी चैनल जालंधर दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले इवनिंग लाइव शो "पंज बजे लाईव" को होस्ट कर रहे हैं |  उन्होंने अब तक जो हासिल किया, वो खुद के बल पर हासिल किया है, तो ऐसे में लाज़मी है कि सफर रोमांचक रहा होगा, आईये जानते हैं वो क्या कहते हैं अपने निजी जीवन और ब्लॉग जगत के बारे में।

कुलवंत हैप्पी : आपको ब्लॉग जगत में आए कितना समय हो गया और इस प्लेटफार्म पर आकर कैसा लगा?
सुनील कटारिया : मुझे करीब ढाई महीने ही हुए हैं इस नए मंच पर आए हुए और इस प्लेटफोर्म पर आकर बहुत अच्छा लग रहा है।

कुलवंत हैप्पी : लिखने के अलावा यहाँ पढ़ते भी होंगे दूसरे ब्लॉगों को, क्या कुछ बदलाव की जरूरत लगती है?
सुनील कटारिया : जी बिल्कुल पढ़ता  हूँ लेकिन लिखने का मौका कभी कबार ही हाथ आता है। बदलाव के नज़रिए से लगता है कि इसके बारे में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को जागृत किया जाना चाहिए ताकि वो भी अपनी आवाज़ को बुलंद करते हुए इसका एक हिस्सा बनें क्यूंकि आज के दौर में इन्टरनेट या फिर कहें ब्लॉग एक सम्पूर्ण माध्यम है आजादी से अपनी बात कहने का। मीडिया के बाकी माध्यम चाहे वो अखबार हो या टीवी चैनल किसी ना किसी रूप में लोगों की बात को पूरी तरह से पेश नहीं करते हैं।

कुलवंत हैप्पी : आपने बहुत कम समय में बहुत नाम कमा लिया, पिछले दिनों आपकी प्रतिभा से रूबरू करवाता एक लेख पढ़ा था, यहाँ तक कैसे  पहुंचे?
सुनील कटारिया : दसवीं कक्षा में पढ़ते समय ही मुझे न्यूज़ चैनलों ने प्रभावित करना शुरू कर दिया और वहीँ से मेरे भीतर इस ओर आने की लौ जल उठी और फिर धीरे धीरे मेहनत के साथ साथ रास्ते खुद ब खुद बनते गए। मैं यहाँ कहना चाहूँगा कि "कोशिश करोगे तो कशिश पैदा होगी, रास्ते तो खुद ब खुद निकल आयेंगे"।

कुलवंत हैप्पी : इंटरनेट पर पढ़ने वालों की संख्या कम है, क्या ऐसे में आपका मन विचलित नहीं होता सोचकर कि मैं इतनी मेहनत से लिखता हूँ, और बहुत कम लोग पढ़ते हैं?
सुनील कटारिया : जी नहीं, मैं ये मानता हूँ कि आपकी बात में या फिर आपके ब्लॉग में अगर कुछ दम है तो लोग अपने आप आपके उस ब्लॉग तक किसी न किसी ज़रिए से ज़रूर पहुँच जाएंगे और ये आप पर निर्भर करता है कि आप किस तरह से अपने पाठकों को अपनी ओर खींच पाते हैं।

कुलवंत हैप्पी : कोई ऐसा लम्हा या शख्सियत जिसने कुछ हटकर करने के लिए प्रेरित किया हो?
सुनील कटारिया : जी, मैं हर पल हर शख्सियत से कहीं न कहीं ज़रूर मुतासिर होता हूँ। कोई ख़ास लम्हा या कोई ख़ास शख्सियत तो नहीं है जिसका मैं नाम ले सकूँ लेकिन मेरी ज़िन्दगी में आने वाले हर एक शख्स से ज़रूर किसी न किसी रूप में प्रेरणा लेता रहता हूँ और खास तौर पर मैं अपने जीवन में आने वाले लोगों की अच्छी बातों को ग्रहन करता हूँ।

कुलवंत हैप्पी : सुना है, आपने  CNN - IBN के  "द सिटीजन जर्नलिस्ट शो ' के लिए फिरोजपुर से ब्रिज को लेकर चल रहे विवाद का वीडियो भेजा था, जिसको सराहना मिली थी, वो विचार कैसे आया?
सुनील कटारिया : जी दरअसल, ये बात जुलाई 2007 की है जब मैं बी. ए. फाइनल में था। शहर के बीचो बीच स्थित रेलवे पुल को बने 150 साल से भी ज़्यादा का समय बीत जाने के कारण इसकी खस्ता हो चुकी हालत को देख केंद्र सरकार ने पुल को असुरक्षित तक घोषित कर दिया था और हर बार 23 मार्च शहीदी दिवस के दिन फिरोजपुर से करीब 11 किलोमीटर पर हुसैनीवाला भारत-पाक सीमा पर पंजाब के बड़े बड़े नेता पुल के नवनिर्माण का वायदा कर जाया करते थे। एक दिन CNN -IBN  के द सिटिजन जर्नलिस्ट शो सम्बंधी जानकारी देखी तो मैंने पुल का मोबाइल से वीडियो बना भेज डाला और फिर 27 नवम्बर 2007 को CNN - IBN की टीम फिरोजपुर पहुंची तो मुझसे पुल सम्बंधी रिपोर्टिंग करने को कहा गया और अंत में चैनल पर प्रसारित होने वाली इस वीडियो को "बेस्ट वीडियो अवार्ड" दिया गया।

युवा सोच युवा खयालात पाठकों और ब्लॉगर दोस्तों के लिए कोई संदेश?
सुनील कटारिया : किसी को संदेश देने के लायक तो नहीं हूँ, लेकिन हाँ गुजारिश ज़रूर करना चाहूँगा कि आज ज़्यादा से ज़्यादा नौजवान इन्टरनेट जैसे प्रभावशाली माध्यम का इस्तेमाल कर रहे हैं और अगर वो चाहें तो अपने विचारों से इस समाज में क्रान्ति ला सकते हैं, क्यूंकि हम उस देश में रह रहे हैं जिसे सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहा जाता है लेकिन इसी देश के हुकमरानों ने अपनी हुकूमत से लोकतंत्र के चौथे खम्बे अर्थात मीडिया पर भी अपना कब्ज़ा जमा लिया है, तो ऐसे में सभी दोस्तों से गुजारिश यही है कि वो इस सम्पूर्ण माध्यम का अपने आज़ादी भरे विचारों को दूसरों तक पहुंचाने के लिए इस्तेमाल करें।
                                                            चक्क दे फट्टे
रोहित : सुनील यार धोखा हो गया। सुनील : क्या हुआ, किसने धोखा दे दिया? रोहित : घरवालों ने। सुनील : वो कैसे? रोहित : घरवालों से मैंने किताबों के लिए पैसे मंगवाए थे, लेकिन उन्होंने किताबें ही भेज दी।