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'हैप्पी अभिनंदन' में समीर लाल "समीर"


जिस शख्सियत से आप आज रूबरू होने जा रहे हैं, वो शख्सियत उन लोगों के लिए किसी प्रेरणास्रोत से कम न होगी, जो लकीर के फकीर हुए फिरते हैं। भगवान ने हर व्यक्ति को किसी न किसी कला से नवाजा है, लेकिन लकीर के फकीर हुए लोग उस हुनर एवं कला को बाहर निकालने के चक्कर में जिन्दगी का असली स्वाद खो बैठते हैं। दुनिया में हमेशा ही दो तरह के लोग पाए जाते हैं, एक तो जिनकी बात मैंने ऊपर की, और दूसरे समीर लाल 'समीर' जैसे, जो शौक के कारण अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी बर्बाद नहीं करते, और रोजमर्रा की जिन्दगी को पटड़ी पर लाने के बाद शौक को नया आयाम देते हैं। आपको यकीन न हो शायद कि अपनी लेखनी के कारण तरकश सम्मान 2006, बेस्ट इंडिकाब्लॉग (हिन्दी) 2006, वाशिंगटन हिन्दी समिति की ओर साहित्य गौरव, शिवना सारस्वत सम्मान, पुरस्कार ब्लॉग ऑफ दी मन्थ फाऊंडेशन नवम्बर 2009, ताऊ डॉट कॉम के पहेली पुरस्कार एवं युवा सोच युवा खयालात द्वारा  स्थापित वर्ष 2009 हरमन प्यारा ब्लॉगर पुरस्कार पा चुके समीर लाल 'समीर' असल जिन्दगी में भारत से चार्टड एकाउन्टेन्ट, अमरीका से सी एम ए (CMA), अमरीका से प्रोजेक्ट मैनेजमेन्ट प्रोफेशनल (PMP), माईक्रोसॉफ्ट सर्टिफाईड एमएस एक्सेल एक्सपर्ट, कनाडा से अनेक शेयर बाजार संबंधित सर्टिफीकेशन से साथ प्रोफेशन फाईनेशियल प्लानर करने के बाद कनाडा की सबसे बड़ी बैंक से साथ तकनीकी सलाहकार के तौर पर काम कर रहे हैं। इसके अलावा इनके डॉट नेट तकनीकी पर तकनीकी आलेख अनेकों पेपरों में प्रकाशित होते हैं. तकनीकी पत्रिकाओं के लिए नियमित लेखन जारी है।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग का नाम उड़नतश्तरी रखा जाए, ये विचार कब और कैसे दिमाग में आया?
उत्तर :-जब मार्च २००६ में अपना ब्लॉग बनाया तब बस, एक सोच थी कि जो भी ख्याल दिमाग में उभरेंगे, उन्हें जस का तस इस माध्यम पर रख दूँगा और फिर ख्यालों की उड़ान, उसका तो कोई ओर छोर होता नहीं तो कुछ अजूबा ही सही और मन में कौंधा-उड़न तश्तरी. बस, नामकरण हो गया. वैसे अगर मैं इसका नाम चाँद रखता तो आपके सवाल के जबाब में कविता सुनाने का मौका हाथ लग जाता. किसी भी कविमना को इससे ज्यादा क्या चाहिए :)

कुलवंत हैप्पी : "कविता लिखी, उनकी नासमझी, कहानी लगी" ये हायकू कैसे बनी, इसके पीछे का रहस्य क्या है?
समीर : अग्रज ने सलाह दी थी कि कविता मन के भाव हैं, जो मन को अच्छा लगे वो लिखो और पढने वालों को पसन्द आ जाए तो बोनस. बस हमने भी ठान ली कि अब कविता लिखेंगे. उस रोज शाम को स्नान ध्यान करके माँ सरस्वती की आगे दो अगरबत्ती जलाई और कविता लिखने बैठ गए. तीन घंटे मशक्कत की, ढेरों कविताओं की साईट पर जा जा कर कठिन कठिन शब्द बटोरे, आपस में उनके ताने बाने बुने और बस कविता तैयार की और भेज दी एक पत्रिका में छपने. संपादक या तो बिल्कुल फुरसतिया थे या एकदम प्राम्पट. तुरंत जवाब आ गया संपादक जी की टिप्पणी के साथ. लिखा था, " आपकी कहानी पढ़ी, मगर एसा प्रतीत होता है कि कहानी का अंत पृष्ठ भूमि से भटक गया है. लघु कथाओं की सारगर्भिता लेखक की सजगता पर आधारित होती है. सजगता के साथ लिखने का प्रयास करें. शुभकामनाओं सहित-"सर्वप्रथम तो मुझे यह नहीं समझ आया कि मैंने तो कविता लिखी थी उसे संपादक जी ने कहानी कैसे मान लिया और वो भी लघु कथा. दूसरा, मैंने तो लिखते वक्त कोई पृष्ठ भूमि ही नही बनाई तो मै भटका काहे से. यहीं से जन्म हुआ हायकू
कविता लिखी
उनकी नासमझी
कहानी लगी.

कुलवंत हैप्पी : आप समीर लाल 'प्रेमी' से समीर लाल 'समीर' कैसे बने?
समीर : उसी मोड़ पर जहाँ हर प्रेमी आदमी बन जाता है यानि विवाहोपरांत. :) यकीन जानो, न शादी होती न हमारा प्यारा उपनाम प्रेमी स्वर्गवासी होता. आज आप किसी और का ही इन्टरव्यू ले रहे होते, हाय!!

कुलवंत हैप्पी : आपके विल्स कार्ड पर लिखे शेर हिट हुए, अब कौन सी सिगरेट चलती है विल्स या कोई अन्य?
समीर : माँ जनवरी, २००५ में गई. हर वक्त उसकी एक ही मांग होती थी कि मैं सिगरेट पीना छोड़ दूँ. बस, तो सिगरेट उसके साथ ही चली गई. तब से आज तक, लगभग ५ साल होने को आये, कभी सिगरेट की तरफ मुड़ कर नहीं देखा. विल्स कार्ड बस पुरानी यादें हैं, जिन गलियों एं मैं अब जाता नहीं, के प्रतीक!! मुझे लगता है कि जिस तरह मेरे विल्स कार्ड युवा वर्ग से ले हर वर्ग में पसंद किये जा रहे हैं और रेडियो मिष्टी सिक्किम से उनका नियमित प्रसारण हो रहा है, मुझे भी एक संवेधानिक चेतावनी हर नये अंक के साथ लिख देना चाहिये, जस्ट बतौर सुरक्षा कवच के लिए.

वैसे तो वो शेर हैं भी नहीं और उनके लिए मेरी कुछ ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं:
जब जब भी मैंने
अपने दिल की बात को
किसी कागज पर उतारा है....
न जाने क्यूँ...
लोगों ने..
उसे कविता कह कर पुकारा है!!!

कुलवंत हैप्पी : अगले काव्य संग्रह का नाम विल्स कार्ड रखेंगे या कुछ और?
समीर :- अव्वल तो अगला संग्रह कहानियों का आ रहा है जल्द ही शायद इसी जून तक किन्तु इन विल्स कार्डों को ले एक गद्य और पद्य का संमिश्रण करते हुए सीडी निकालने के योजना पर कार्य चल रहा है. देखिये, योजना कब मूर्त रूप लेती है मगर जल्दी ही लाने की फिराक में हूँ. सुना है २०१२ में दुनिया खत्म होने वाली है, तो उसके पहले एकाध साल तो कम से कम से लोग सुन लें.

कुलवंत हैप्पी : "मैं एक हारा हुआ योद्धा हूँ" जब आपने इस लेख को लिखा, क्या आप उन दिनों किसी खास वजह से परेशान थे ?
समीर : कई दिनों से मिस करते करते, सहते सहते जब मिसिंग समेटने की और सहनशक्ति सीमा के बाहर हो जाती, तब ऐसा विस्फोट होता है. ऐसा ही कुछ हुआ था. मेरी जिन्दगी की खुली किताब के वो ही कुछ आपस में चिपके पन्ने हैं, जिन्हें मैं उधेड़ कर न पढ़ना और न ही पढ़वाना चाहता हूँ. आप तो मेरे चेहरे की मुस्कान देखो, कहीं कोई कमी नजर आये तो बताना. तुरंत डेन्टिंग पेन्टिंग करवाई जायेगी, वादा. :)

कुलवंत हैप्पी : भारत छोड़कर विदेश जाने का संयोग कैसे हुआ और मीठी जेल कैसी लगती है?
समीर : सन 1999 में बेटे दोनों 12वीं कर चुके थे. इच्छा थी कि वो कनाडा आकर विश्वविद्यालय की पढ़ाई करें. इसके पूर्व भी घूमने कनाडा कई बार आना हुआ था. बड़ा मजा आता है और उस समय तो उम्र से भी काबिल थे. बहुत से मित्र यहाँ थे. बस, मचल उठे चमक दमक देख और आड़ अच्छी और सभ्य थी कि बच्चों के कैरियर का सवाल है मगर ज्यादा कुछ तो अपने मन की दबी चाह ही रही होगी कि वहाँ भी किस्मत आजमाई जाए, रह कर देखा जाए, यहाँ ले आई. आने के बाद वैसा ही यथार्थ दर्शन हुआ जैसा प्रेम के बाद विवाह करके होता है. तब जिन्दगी की असल आपाधापी आपको धरातल दिखाती है. घूमने आते थे तो बात अलग थी, बस घूमना और मस्ती छानना. अब तो काम भी करना होता था. नौकरी बजाने से लेकर बरफ साफ करते दिन में ही वो चमकीले तारे दिखने लग गए जो घसीट कर हमें यहाँ लाए थे. वापस लौटने की राह न थी. क्या मूँह दिखाते तो बस, नौकरी में लगे रहे और वाकई जो आड़ थी वो उद्देश्य बन गया. बच्चे पढ़ लिख कर कायदे की नौकरी और व्यापार में लगे. अब हम जुगाड़ में लगे हैं कि कैसे भारत लौट जाएं पूरे से, मगर सुविधाओं की जंजीरें बड़ी मोटी और मजबूत होती हैं, काटते काटते ही कटेंगी. हम तो झटका मार कर जंजीर तोड़ कर भाग भी निकले, लेकिन पत्नी के तो पैर भी नाजुक हैं, कहीं बेचारी मोच न खा जाए इसलिए धीरे धीरे जंजीर के कटकर अलग होने का दिवा स्वपन पाले जिए जा रहे हैं. हर बार भारत जाते हैं, हालात, दुर्दशा, बिजली पानी की जूझन, ट्रेफिक का बुरा हाल, रोज रोज की जहमतें झेल कर जब वापस आते हैं तो इन जंजीरों को और मजबूत होता देखते हैं. कभी तो हालात बेहतर होंगे और यह जंजीरें कमजोर. देखिए, कब सपना साकार होता है.

कुलवंत हैप्पी- आप पिछले चार सालों से निरंतर लगे हुए हैं, आज सबसे बड़े ब्लॉगर भी हैं, फिर भी टिप्पणी देने से गुरेज नहीं करते अन्य बड़े ब्लॉगरों की भांति क्यों?
समीर : इस प्रश्न का जबाब प्रश्न के हिज्जे करके देता हूँ. :) चार साल से लगे हुए हैं-मगर उतना सीरियस नहीं थे इसलिये शरीर से सबसे बड़े ब्लॉगर बन गए. वाकई और कोई इतना बड़ा, ब्लॉगजगत में अभी तक तो नहीं टकराया. अब सीरियस हुए हैं, रोज सुबह टहलने जाते हैं. रामदेव बाबा से शरण मांगी हुई है. ट्रेड मिल खरीद लाये हैं. इस वर्ष खाने का बजट घटा कर ७५% कर दिया है जबकि खाद्य सामग्री की कीमतें ३० % बढ़ी हैं, आप समझ सकते हैं. इन उपायों से आशा ही नहीं पूर्व वर्षों की भांति पूर्ण विश्वास है कि वर्षांत तक आपको हमें सबसे बड़ा ब्लॉगर कहने का मौका नहीं मिलेगा.

हाँ, आपकी सोच सही है कि भारी भरकम शरीर लेकर चल, उठ बैठ ले रहे हैं, उतना ही काफी है उस पर से टिप्पणी देना-वाकई बहादुरी का काम है. जब दुबला हो जाऊँगा और सबसे बड़ा वाला ब्लॉगर नहीं रहूँगा, तब तो और ज्यादा टिप्पणी कर पाऊँगा. उर्जा और स्फूर्ति दोनों ज्यादा होगी. वैसे हमारी सबसे बड़े ब्लॉगर होने की पदवी कई बार कुछ लोगों का बढ़ता घेरा यानि शरीर देख लुट जाने से घबराती है. आप तो समझदार पाठक हो, समझ ही गए होंगे. मगर टिप्पणी जिसे मैं प्रोत्साहन का स्वरुप ज्यादा मानता हूँ, वो जारी रहेगा शायद कोई ज्यादा मोटा हो जाए तो हम सबसे बड़े न रह जाए, इसी उद्देश्य से लगे हैं. बचपन में एक डाकूमेन्ट्री आया करती थी जिसमें कई छोटी छोटी मछलियाँ मिलकर बड़ी मछली बनकर चला करती थी, और वाकई वाली बड़ी मछली डरकर छिप जाती थी. बस, उसी तरह की साजिश से डरता हूँ जो रोज दिखती है. :)

कुलवंत हैप्पी : जिन्दगी का कोई ऐसा पल जो हम सब के साथ बांटना चाहते हों?
समीर : जिन्दगी का हर वो पल, जो मेरी मुस्कान का सबब बनता है, उसे सबके साथ बांटना चाहता हूँ और हर आँसू अपने पास समेट कर रख़ लूँ, यही इच्छा रहती है हालांकि दर्ज तो सभी कर देता हूँ. आज आप जैसे महारथी (जो भी मेरा इन्टरव्यू लेता है, उसे ऐसा ही कहता हूँ ताकि आगे भी याद रखे और इन्टव्यू लेता रहे:)) को इन्टरव्यू दे रहा हूँ-देखिए न कितना खुशनुमा पल है, यह सबको बांट देना चाहता हूँ. वैसे मेरा सीए बनना, मेरा प्रेम करना और फिर उसी से मेरी शादी, बेटों का इंजीनियर बनना, बिटिया (बहु) का घर आना, पुस्तक का विमोचन, विभिन्न सम्मानों से विभूषित होना आदि अनेकानेक मौके हैं जिन्हें मैं अपनी जिन्दगी के सबसे खुशनुमा पलों में गिनता हूँ.

कुलवंत हैप्पी : शायद सब जानना चाहेंगे कि आप भारत अब कब आ रहें हैं?
समीर : बहुत जल्द, पूरी ताकत लगा रखी है कि फरवरी/मार्च में आ जाएं, मगर हमारे चाहे क्या होता है? हमारे चाहे ही सब हो जाए तो हम तो कल ही आ जाएं. शायद नौकरी के एडजस्टमेन्ट, परिवार की जरुरतें आदि ऐसी बातें है जिन्हें यूँ ही नहीं नकारा जा सकता. अतः यदि किसी वजह फरवरी/मार्च में आने में व्यवधान हुआ तो ठीक है, नहीं नवम्बर तो पक्का है ही. मई/जून में भारत की गरमी से इसलिए भी ज्यादा डर लगता है कि उसके साथ बिजली भी गुम रहती है, पसीने में पूरा पाऊडर पुंछ जाने का खतरा रहता है फिर हमारा रंग तो...सूर्य की गरमी को विशेष आकर्षित करता है. :)

अंत में आपका बहुत आभार जो आपने मुझे इस इन्टरव्यू के काबिल समझा. सभी मित्रों और पाठकों का आभार जिन्होंने इन वर्षों में इतना स्नेह दिया और मुझे निरंतर प्रोत्साहित किया. सभी से निवेदन है कि ऐसा ही स्नेह बनाए रखिये.

व्यवसायिक शौक : लगातार कुछ नया सीख लेने की ललक हर साल नये कोर्स करवाती रहती है. फिलहाल सलाहकारी के साथ साथ कुछ एक्जामस की तैयारियों में व्यस्त हूँ.


चक्क दे फट्टे  : मैंने अपने पिता जी से कहा "मुझे गायक बनना है"। वो झटपट बोले "तुम लेखक बन जाओ"। "आपने कभी मेरा लिखा हुआ तो कुछ पढ़ा ही नहीं" मैंने कहा। उन्होंने मेरी तरफ न देखते हुए कहा "तभी तो कह रहा हूँ बेटा जी"।