Showing posts with label संपादकीय. Show all posts
Showing posts with label संपादकीय. Show all posts

मुसीबत! फिल्‍मों में बढ़ता चुम्‍बन चलन

पिछले दिनों ड्राइव इन सिनेमा में मोहनजो दरो देखने गए। शादीशुदा आदमी बहुत कम अकेले जाता है, जब भी जाता है परिवार सहित जाता है। सवाल परिवार के साथ जाने या न जाने का तो बिलकुल नहीं। सवाल है कि आप अचानक फिल्‍म देखते देखते असहज हो जाते हो। हालांकि, चुम्‍बन करना बुरा नहीं। मगर, इस तरह चुम्‍बन को बढ़ावा देने उचित भी नहीं, जब सिनेमा घर में परिवार सहित बच्‍चे भी आए हों, जिनको कुछ भी पता नहीं होता।

मेरी छह साल की बच्‍ची है, सिनेमा घर हो या टेलीविजन की स्‍क्रीन, लड़का लड़की के बीच रोमांटिक सीन उसको बिलकुल नहीं अच्‍छे लगते। वो अपना ध्‍यान इधर उधर भटकाने पर लग जाती है। उसको अन्‍य बच्‍चों की तरह डॉरेमन जैसे कार्टून देखने अच्‍छे लगते हैं, जो शायद एक तरह से अच्‍छा भी है। कार्टून चैनलों पर अभी इतना फूहड़ता नहीं आई है।

मोहनजो दरो में एक चुम्‍बन दृश्‍य है, जो काफी बेहतरीन है। मगर, आपको असहज बना देता है क्‍योंकि जब फिल्‍म पूरी तरह सामाजिक सीमाओं में बंधकर चल रही हो और अचानक यूं दृश्‍य आ जाए। अब इसका चलन दिन प्रति दिन बढ़ता चला जाएगा। बड़े बैनर भी अब चुम्‍बन बाजी पर ध्‍यान दे रहे हैं।

आदित्‍य चोपड़ा अपनी अगली फिल्‍म बेफिक्रे में चुंबन दृश्‍यों की सेल लगाने वाले हैं। अब तक फिल्‍म के जितने भी पोस्‍टर आए, जब में रणवीर सिंह और वाणी कपूर खुलकर चुंबन करते नजर आए हैं। ख़बर है कि बार बार देखो में भी चुंबन सीनों पर विशेष ध्‍यान दिया गया है। फिल्‍म के ट्रेलर में ही 5 चुंबन सीन हैं, और ट्रेलर हर कुछ मिनटों पर टेलीविजन की स्‍क्रीनों पर नजर आता है। म्‍यूजिक चैनलों घर में खुले आम देखना, मतलब समय से पहले बच्‍चों को अर्ध ज्ञान के साथ अंधेर गुफा में धकेलने सा है। हालांकि, चुंबन, प्‍यार, रोमांस मानवीय जीवन का हिस्‍सा हैं। इन रंगों के बिना मानवीय जीवन बेरंग, बंजर सा है।

मगर, कच्‍ची उम्र की नादानियां, उम्र भर का दर्द लेकर आती हैं। आज समाज का दायरा विशाल हो चुका है और आज कल बच्‍चे पहले से नहीं रहे। हालांकि, हर मां बाप अपने बच्‍चे को दुनिया से हर बच्‍चे से अलग मानता है और हर मां बाप सोचता है कि उनके बच्‍चे कभी गलती नहीं कर सकते। आज के समय में बच्‍चों को लेकर सतर्क रहने की जरूरत है और उनकी गतीविधियों को समझने की जरूरत है।


चलते चलते। आज कल बॉलीवुड गीतों के वीडियो देखने असंभव है। एमपी 3 में बजाते रहो तो ठीक है। हमारे जमाने में तो इतनी शर्म होती थी कि ब्‍लैक एंड व्‍हाइट टीवी के आगे भी शटर होता है, जैसे महिलाओं के चेहरों पर घुंघट।

प्रियंका की चुप्‍पी पर अटका कांग्रेस का अधिग्रहण

16वीं लोक सभा के चुनावों में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी को मिले जोरदार जनादेश के बाद राजनीति पार्टियों में उठ पटक का दौर जारी है। इस बार के चुनावों ने राजनीतिक परिदृश्‍य को बदलकर रख दिया, लेकिन ताजुब की बात है कि आज भी राजनीतिक पार्टियां उस जद हैं, जिसके कारण हारी थी। इस जनादेश में अगर सबसे बड़ा झटका किसी पार्टी को लगा है, वो है कांग्रेस। देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को विपक्ष में बैठने के लिए भी गठनबंधन की जरूरत होगी।

जब देश की सबसे बड़ी एवं लम्‍बे समय तक शासन करने वाली पार्टी की यह दुर्दशा हो जाए तो पार्टी के भीतर से विरोधी सुर उठने तो लाजमी हैं। जो नेता चुनावों से पहले दबी जुबान में बोलते थे, आज वो सार्वजनिक रूप से अपना दर्द प्रकट कर रहे हैं। और दिलचस्‍प बात तो यह है कि विरोधी सुर उनके खिलाफ हैं, जिनके इस्‍तीफे को पार्टी हाईकमान ने स्‍वीकार करने मना कर दिया।

कल जिसके नेतृत्‍व में चुनाव लड़ा जा रहा था, आज उसके खिलाफ आवाजें उठ रही हैं। बड़ी की शर्मनाक हार के बाद ऐसा होना था। लेकिन इन्‍हीं आवाजों में एक आवाज परिवार सदस्‍य प्रियंका गांधी के पक्ष में उठ रही है। यह आवाज कह रही है कि प्रियंका गांधी में संभावनाएं हैं। वो पार्टी में जान फूंक सकती हैं। हालांकि, पार्टी नेता अच्‍छी तरह जानते हैं कि इन चुनावों को नरेंद्र मोदी ने दो चीजों के आधार पर लड़ा।

एक पाकिस्‍तान और दूसरा जी। जी से मतलब है कि जीजाजी। राहुल गांधी के जीजाजी, प्रियंका के पति देव। नरेंद्र मोदी की पूरी मुहिम जीजा जी के आस पास थी। जीजा जी काफी चर्चा में रहे, हालांकि जीजा जी को कोई सरकारी जमीन अलाट नहीं की गई। जीजा जी के खिलाफ अभी जांच शुरू हुई है। ऐसे में कांग्रेस में प्रियंका वाड्रा को लेकर आना, आखिर कांग्रेस के लिए कहां तक ठीक होगा।

क्‍या इतनी बड़ी हार के बाद भी कांग्रेस वंशवाद से बाहर निकलने को तैयार नहीं ? क्‍या आज भी कांग्रेस के पास कोई ऐसा नेता नहीं, जो नरेंद्र मोदी की तरह खात्‍मे की कगार पर खड़ी कांग्रेस को जीवन दान दे सके ? इसमें कोई दो राय नहीं कि राहुल गांधी राजनीति में रस नहीं लेते। इस बात को बड़े बड़े कांग्रेसी नेता मानते हैं।

अगर राहुल गांधी को राजनीति में रस नहीं, अगर उनके भीतर क्षमता नहीं नेतृत्‍व की, तो क्‍यूं कांग्रेस गांधी परिवार से अलग नहीं होना चाहिए ? जिस तरह अब राहुल गांधी से निराश हुए कांग्रेसी नेता प्रियंका गांधी से अपनी उम्‍मीद बांध रहे हैं, उसको देखकर लगता है कि बहुत जल्‍द वाड्रा परिवार कांग्रेस का अधिग्रहण कर लेगा।

अधिग्रहण शब्‍द का इस्‍तेमाल इसलिए, क्‍यूंकि प्रियंका गांधी व रॉबर्ट वाड्रा राजनीतिज्ञ नहीं हैं, उन्‍होंने कांग्रेस में जमीन स्‍तर से काम शुरू नहीं किया। उन्‍होंने कारोबार किया। पैसे कमाए। कई निदेशक पहचान नंबरों के लिए निवेदन किया। कारोबार में किसी चीज को अपने कब्‍जे में लेना अधिग्रहण कहलाता है।

अब देखना है कि वाड्रा परिवार इस अधिग्रहण के लिए तैयार होगा कि नहीं, कांग्रेसी नेता तो अपनी तरफ से हाथ बढ़ा चुके हैं। बस डील डन होने में प्रियंका की हां बाकी है। यह सौदा भी लाभ से जुड़ा है। अगर प्रियंका अधिग्रहण करती हैं तो कांग्रेस को मुनाफा होने की संभावना है और लोक सभा चुनावों में हुए नुकसान की भरपाई हो सकती है।

नरेंद्र मोदी, मीडिया और अरविंद केजरीवाल

गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी से अधिक मीडिया पीड़ित कोई नहीं होगा। मोदी जितना तो बॉलीवुड में भी आपको मीडिया पीड़ित नहीं मिलेगा। ग्‍यारह साल तक निरंतर मीडिया के निशाने पर रहे। मीडिया का विरोधी सुर इतना कि उनको पांच इंटरव्‍यूओं को छोड़कर भागना पड़ा।

2012 ढलते वर्ष के साथ एक नए नरेंद्र मोदी का जन्‍म हुआ। यह ग्‍यारह साल पुराना नरेंद्र मोदी नहीं था। इस समय नए नरेंद्र मोदी का उदय हो रहा था। गुजरात की सत्‍ता चौथी वार संभालने की तरफ कदम बढ़ रहे थे। गुजरात की जीत उतनी बड़ी नहीं थी, जितना बड़ा उसको दिखाया गया।

इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ एपको वर्ल्‍ड, पीआर एजेंसी का, जिसने अपने हाथ में मीडिया रिमोट ले लिया था। 2012 की जीत बड़ी नहीं थी। इसका तथ्‍य देता हूं, जब नरेंद्र मोदी पहली बार गुजरात में मुख्‍यमंत्री बने तो उनकी सीटें 127 थी, दूसरी बात सत्‍ता में आए तो उनकी सीटें 117 तक घिसककर आ गई थी। अंत 2012 में यह आंकड़ा महज 116 तक आकर रुक गया।

मगर मोदी का कद विराट हो गया, क्‍यूंकि मीडियाई आलोचनाओं के बाद भी नरेंद्र मोदी निरंतर गुजरात की सत्‍ता पर काबिज होने में सफल हुए। ग्‍यारह साल का वक्‍त नरेंद्र मोदी आज भी नहीं भूलते, तभी तो उन्‍होंने न्‍यूज ट्रेडर जैसे शब्‍द को जन्‍म दिया। हालांकि दिलचस्‍प बात तो यह थी कि नरेंद्र मोदी ने हर न्‍यूज चैनल को अपना इंटरव्‍यू दिया, ताकि अपनी बात पूरे देश तक पहुंचा सके, लेकिन किसी भी न्‍यूज ट्रेडर का नाम नहीं लिया।

नरेंद्र मोदी इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया से त्रसद थे, तभी उन्‍होंने शुरू से ही सोशल मीडिया पर जोर दिया। नरेंद्र मोदी 2007 के आस पास सोशल मीडिया पर पूरी तरह सक्रिय होने लगे। अलग अलग भाषाओं में अपनी वेबसाइट का संचालन किया, ताकि लोगों से जुड़ा जाए। 2012 तक आते आते नरेंद्र मोदी मीडिया के लिए टीआरपी का सबसे बड़ा मटीरियल बन चुके थे।

अब आजतक को राखी सावंत और इंडिया टीवी को भूत प्रेत दिखाने की अधिक जरूरत महसूस न हो रही थी। जी न्‍यूज के नवीन जिंदल के साथ रिश्‍ते बिगड़े, तो कांग्रेस सबसे बड़ी दुश्‍मन के रूप में जी न्‍यूज के सामने खड़ी हो गई। इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया को एक दूसरे की नकल करने की लत है।

इस लत की वजह देश में एक माहौल बनता है। उसकी माहौल में बड़े बड़े बुद्धिजीवी अपने दिमाग से कुछ नए शब्‍दों के साथ मसाले बनाते हैं, जो अख़बारों के कोरे कागजों को काले करने में अहम भूमिका निभाते हैं। इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया सोशल मीडिया पर, और प्रिंट मीडिया इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया के प्रभाव में अपना जीवन बसर कर रहा है।

जहां 2012 में डिजीटल कैंपेन व वन मैन शो के दम पर सरकार बनाने में नरेंद्र मोदी कामयाब हुए, वहीं मीडिया ने भाजपा के भीतर उनकी साख को जन्‍म दिया। अंतिम सांसों पर पड़ी बीजेपी को उम्‍मीद की किरण नजर आई। डूबते को तिनके का सहारा वाली कहावत इस समय सही समझ पड़ रही थी।

बीजेपी ने वरिष्‍ठ नेताओं की नाराजगी को मोल लेते हुए नरेंद्र मोदी को गोआ में पीएम पद का उम्‍मीदवार घोषित कर दिया। यहां पर एलके आडवाणी का विरोध सुर्खियों में रहा। जैसे कि सब जानते ही थे कि नरेंद्र मोदी यहां से पार पाएंगे एवं एक मजबूत नेता बनकर उभरेंगे। वही हुआ, अंत मीडिया ने नरेंद्र मोदी को मजबूत नेता घोषित कर दिया।

उधर, अरविंद केजरीवाल के साथ अन्‍ना अंदोलन अपनी शिखर पर था। सरकार की जड़ों को हिला चुका था। सरकार विरोधी माहौल तैयार हो चुका था। अब सरकार पूरी तरह ध्‍वस्‍त होने के किनारे थे। अनुमान लगने लगे थे कि सरकार आज गिरी या कल गिरी।

इस बीच पांच राज्‍यों के चुनाव आए। बड़ी दिलचस्‍प बात थी कि नरेंद्र मोदी को मध्‍य प्रदेश में चुनाव प्रचार के लिए नहीं जाने दिया गया, लेकिन फिर भी शिवराज चौहान की सरकार ने भाजपा को बहुत बड़ी जीत दिलाने में सफलता हासिल की, जो जीत नरेंद्र मोदी की 2012 की जीत से तो काफी बड़ी थी। मध्‍य प्रदेश के साथ साथ भाजपा ने चार राज्‍यों में अच्‍छा प्रदर्शन किया, लेकिन अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में बनी आम आदमी पार्टी ने दिल्‍ली में नरेंद्र मोदी की लहर वाली भाजपा की हवा निकाल दी। मीडिया ने अपने एग्‍जिट पोल में अरविंद केजरीवाल की पार्टी को आठ सीटें प्रदान की। नतीजे आए तो आंखें खुली की खुली रह गई। पूरा मीडिया जगत अवाक रह गया। स्‍वयं आम आदमी पार्टी को झटका लगा।

आम आदमी पार्टी 28 विधायकों के साथ दिल्‍ली विधान सभा पहुंची। आम आदमी पार्टी ने विपक्ष में बैठने की बात कही, और कहा कि बड़ी पार्टी बीजेपी सरकार बनाए। अब बीजेपी ने इंकार कर दिया। मीडिया ने ख़बर चला दी कि अरविंद केजरीवाल अपनी जिम्‍मेदारी से भाग रहे हैं, जब उनको कांग्रेस बिना शर्त समर्थन दे रही है तो सरकार बनानी चाहिए।

अरविंद केजरीवाल ने जनता के बीच जाकर समर्थन मांगा। तथाकथित कहो या असली, लेकिन अरविंद केजरीवाल ने सरकार बनाई। उम्‍मीद नहीं थी कि अरविंद केजरीवाल सत्‍ता में पहुंचते ही अपनी खांसी की परवाह किए बिना अपनी सरकार को काम में लगा देंगे। अरविंद केजरीवाल ने पुराने नेताओं की तरह किसी भी आभार रैली का आयोजन नहीं किया। सीधे काम में जुटे गए। घर पर पंचायत बुलाई तो कुछ शरारती लोगों ने हल्‍ला कर दिया। इसके बाद मीडिया को लगने लगा कि अब बीजेपी की लहर को झटका लगा सकता है।

उन्‍होंने अरविंद केजरीवाल के कुछ ऐसे वीडियो चलाने शुरू कर दिए। जैसे मैं राजनीति में नहीं जाउंगा। मैं कोई पद नहीं लाउंगा। मैं किसी सरकारी घर में नहीं रहूंगा। मैं सुरक्षा नहीं लूंगा वगैरह वगैरह। न जाने कितनी ऐसी बातें, जो आम आदमी यूं कह जाता है। यह बातें संगीन जुर्म तो नहीं हैं। काम की बात को छुपा दिया गया, अब नए शब्‍द का इस्‍तेमाल शुरू हुआ नौटंकीबाज, जो सोशल मीडिया से आया। सोशल मीडिया पर बीजेपी कार्यकर्ता सबसे तेज थे, उन दिनों। अब मीडिया का एक ही काम था, अरविंद केजरीवाल को अविश्‍वसनीय सिद्ध करना।

जो द्वेषराग नरेंद्र मोदी के प्रति था, अब को विरोधी राग अरविंद केजरीवाल के प्रति पैदा हो गया। स्‍थितियां बदल चुकी थी, अब अरविंद केजरीवाल बदलाव का चेहरा बनकर उभर रहे थे। इस बात से कोई मुकर नहीं रहा था कि अरविंद केजरीवाल नरेंद्र मोदी के लिए मुसीबत बन सकते हैं।

सरकार के विरोध में जनता हो चुकी थी। सिर्फ फैसले पर मोहर लगनी बाकी थी। अब पीआर एजेंसी भी तेज हो चुकी थी। नरेंद्र मोदी भी अपनी जीत के लिए कमर कस चुके थे। निरंतर रैलियां, उनका लाइव प्रसारण। टीवी पर निरंतर आने से तो निर्मल बाबा ने भी बड़े बड़े साधु संतों को पीछे छोड़ दिया था।

अब जनता एक प्रभाव में जीने लगी थी। अब आम आदमी पार्टी की सकारात्‍मक बाद केवल और केवल सोशल मीडिया पर थी, जो उसके समर्थक लिखते थे। और कहीं नहीं। सबसे दिलचस्‍प बात जो इस पूरे घटनाक्रम को देखने को मिली, पूरे देश में आम आदमी पार्टी के वर्करों पर तबाड तोड़ हमले हो रहे थे। मीडिया में कहीं भी चर्चा नहीं हो रही थी। सर्वे बताते हैं कि नरेंद्र मोदी से अधिक अगर मीडिया में किसी को स्‍पेस मिली वो केवल और केवल अरविंद केजरीवाल को मिली, प्राइम टाइम में। मगर सर्वे यह नहीं बताते कि मीडिया ने अरविंद केजरीवाल को लेकर नकारात्‍मक ख़बर कितनी स्‍पेस में दिखाई। इंडिया टीवी ने निरंतर प्राइम समय पर नरेंद्र मोदी को हीरो, तो केजरीवाल को जीरो दिखाया।

जी न्‍यूज का नरेंद्र मोदी के प्रति साधुवाद यह मीडिया में लम्‍बे समय तक याद रखा जाएगा। वहीं, आजतक पर भाजपा की तरफ से निशाने कसे गए, और कहा गया कि अरविंद केजरीवाल के अंदोलन के पीछे आजतक का हाथ है। सोशल मीडिया पर निरंतर हमलों के बाद आजतक ने भी अपनी ख़बरों की तस्‍वीर को बदलने की कोशिश की। एबीपी न्‍यूज ने अरविंद केजरीवाल को दिखाया, उसके दोनों पक्षों को निरंतर दिखाया।

मगर स्‍थितियां ऐसी भ्रमक हो चुकी थी कि कांग्रेस व अरविंद केजरीवाल की बात झूठी और नरेंद्र मोदी की बात सच्‍ची लगने लगी थी। अरविंद केजरीवाल की पुरानी बातों पर हो हल्‍ला करने वाले मीडिया ने नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल की खोज करने की कोशिश नहीं की, क्‍यूंकि इसकी पीआर एजेंसी आज्ञा नहीं देती थी।

मोदी की चुनावी रैलियों में आंकड़े गलत होने के बावजूद मीडिया ने उसकी निंदा नहीं की। सवाल एक ही अंत में पूछता हूं कि आखिर ग्‍यारह साल बाद नरेंद्र मोदी से मीडिया को इतना प्‍यार क्‍यूं उमड़ा ? जन अंदोलन से निकलकर आया अरविंद केजरीवाल, जिसको मीडिया ने स्‍टार बनाया, वो एकदम से नौटंकीवाला कैसे बन गया ? विशेषकर दिल्‍ली की जीत के बाद।

चलते चलते एक और दिलचस्‍प बात कहते चलूं कि ग्‍यारह साल नरेंद्र मोदी के खिलाफ ट्रायल चलाने वाला मीडिया हार गया, और अंत नरेंद्र मोदी जीत गया। दूसरे क्रम अरविंद केजरीवाल के मामले में भी कुछ ऐसा ही होने वाला है, अगर आम आदमी पार्टी यूं जुटी रही। अगर आम आदमी ने हताश होकर एक बार फिर दम तोड़ दिया तो क्‍या कहना।

कह सकते हैं 'मैं देशद्रोही हूं'

बड़ी अजीब स्‍थिति देश के अंदर, विशेषकर इस मंच पर, अगर आप भाजपा को छोड़कर किसी भी दल के साथ खड़े होते हैं, चाहे वो गैर राजनीतिक लोगों का समूह ही क्‍यूं न हो, तो आप देशद्रोही, या गंदी राजनीति करने वाले होंगे।

राजनीति में अब तक सभी दल एक जैसे लगते थे, लेकिन आम आदमी पार्टी के जरिए आम लोगों को राजनीति में आते देखकर आम आदमी के समर्थन में खड़ा हो गया। अगर आपको पसंद नहीं तो मैं देशद्रोही हूं।


अमिताभ बच्‍चन, शाहरुख खान, सलमान खान को पसंद करने वाले भी देशद्रोही कह सकते हैं, क्‍यूंकि मैंने बचपन से अक्षय कुमार को पसंद किया है।

हिन्‍दी संगीत में मुझे कैलाश खेर अच्‍छा लगता है। पंजाबी संगीत में गोरा चक्‍क वाला, राज बराड़ व देबी मखसूदपुरी अच्‍छा लगता है। अगर यह आपकी पसंद न हो तो आप कह सकते हैं मैं देशद्रोही हूं।

मैं रोबिन शर्मा को पढ़ता हूं, अन्‍य बहुत सारे लेखकों को पढ़ा, लेकिन मन पसंदीदा रोबिन शर्मा लगा। अगर आपको पसंद नहीं तो कह सकते हैं मैं देशद्रोही हूं।

मैंने बहुत सारे आध्‍यात्‍मिक गुरूओं को सुना और पढ़ा। ओशो की बातें ठीक लगी। कुछ सत्‍य लगी। मैंने ओशो को जब दिल किया, तब सुना। अगर आपको ओशो पसंद नहीं तो आप कह सकते हैं मैं देशद्रोही हूं।

आखिर आपकी पसंद ही तो मेरी पसंद होनी चाहिए थी। मेरे विचारों पर मेरा अधिकार नहीं होना चाहिए था। केवल आपके विचारों से सहमत होना ही तो देशभक्‍ति है।


- कुलवंत हैप्पी, ब्‍लॉग लेखक

Standpoint - 'हिंदु परिषद' के आगे 'विश्व' क्यूं ?


आप सोच रहे होंगे। यह अटपटा सवाल क्यूं ? बिल्कुल मुझे भी 'विश्व' अटपटा लगता है, जब मैं इस संस्थान के प्रमुख के बयानों को सुनता हूं। देखता हूं या कहीं पढ़ता हूं।

बड़ी अजीब बात है कि आप भारत को एक कट्टर देश बनाने की सोच रखते हैं, लेकिन शब्द विश्व जैसा इस्तेमाल करते हैं। अगर आप भारत को सीमित रखना चाहते हैं, तो सच में 'विश्व' जैसा शब्द एक देश की ऐसी संस्था को शोभा नहीं देता।

यह शब्द वैसा ही है, जैसा दक्षिण भारत की एक राजनीतिक पार्टी indian christian secular party में 'सेकुल्यर'शब्द है। अगर सेकुल्यर हो तो क्रिचियन शब्द क्यूं ? वैसे ही अगर विश्व हिन्दु परिषद भारत को हिन्दु राष्ट्र बनाना चाहती है तो राष्ट्र शब्द स्टीक हो सकता है, लेकिन विश्व शब्द नहीं क्यूंकि राष्ट्र को विश्व की संज्ञा नहीं दी जा सकती।

31 मार्च 2013 को 'हिंदु संगम' समारोह का आयोजन हुआ। इस समारोह में विश्व हिंदु परिषद के प्रमुख प्रवीण तोगड़िया ने कहा था, ''2015 के बाद गुजरात को हिन्दु राज्य घोषित कर दिया जाएगा, क्यूंकि 18000 गांवों में विहिप की मौजूदगी हो जाएगी।''

एक अन्य ख़बर भी आई थी, जिसमें उन्होंने कहा था, अगर मैं ​देश का प्रधानमंत्री बना तो मुस्लिम समुदाय से मतदान का अधिकार छीन लूंगा। मुझे लगता है​ कि इस देश में लोकतंत्र का वो आखिर दिन होगा क्यूंकि उस दिन भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्रिक व्यवस्था वाला देश न रह जाएगा। शायद भारत में उस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी छीन जाएगी। जिसकी लाठी, उसकी भैंस की कहावत जैसी व्यवस्था बचेगी।

एक ताजे घटनाक्रम के अनुसार भावनगर में विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया ने चुनावी मौसम में मुसलमानों को निशाना बनाया है। तोगड़िया ने मुसलमानों को चेतावनी देते हुए कहा है कि वे हिंदू बहुल इलाकों से घर खाली करें। गुजरात के भावनगर में तोगड़िया ने शनिवार रात को विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर एक मुस्लिम बिजनेसमैन के घर के बाहर हंगामा भी किया। इस मुस्लिम बिजनेसमैन ने हिंदू बहुल क्षेत्र में हाल ही में घर खरीदा है। वीएचपी और बजरंग दल ऐसे सौदों का विरोध कर रहे हैं। तोगड़िया ने मुस्लिम बिजनेसमैन को 48 घंटों के भीतर खाली करने की धमकी दी और कहा यदि ऐसा नहीं किया गया तो उनके दफ्तर पर पत्थर, टायर और टमाटरों से हमला किया जाएगा। तोगड़िया ने हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं से कहा कि वे इस घर को अपने कब्जे में ले लें और इस पर बजरंग दल का बोर्ड टांग दें।

यह घटनाक्रम गुजरात का है। जहां मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जो बीजेपी की तरफ से पीएम पद के उम्मीदवार हैं, जो मुस्लिम समुदाय को साथ लेकर चलने का भरोसा दिला रहे हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों हाथों में अब लड्डू कैसे रखेंगे, जैसे वो रैलियों में कहते आए हैं। आरएसएस व विहिप की नजदीकियां किसी से छुपी नहीं, और आरएसएस का ही एक चेहरा बीजेपी है। 2015 तक गुजरात को हिन्दु राज्य घोषित करने का ऐलान भी अहमदाबाद शहर में हुआ। शायद इस मामले में गुजरात के मुख्यमंत्री को अपना स्टेंड क्लीयर करना चाहिए।

नफरत की आंधी में भारत ने हमेशा अपना गौरव खोया है। नफरत से पैदा हुए दंगों में मरने वाले चाहे हिन्दु हो, चाहे मस्लिम, लेकिन छवि देश की खराब होती है। भारत को पाकिस्तान न बनाएं। देश को विकास की जरूरत है। किसी भी धर्म के विनाश की नहीं।
प्रवीण तोगड़िया, तुम आधुनिक भारत के लिए कलंक हो। खुलेआम धमकियों और भड़काऊ टिप्पणियों को वापस लेने के लिए हम तुम्हें 48 घंटे का वक्त दे रहे हैं। 21 अप्रैल 2014

आमिर खान पर उंगली उठाने वाले कहां हैं ?

सत्यमेव जयते में आमिर खान महिलायों के साथ होने वाले अत्याचार की बात उठा रहा था तो एक विरोधी खेमा उनके निजी जीवन पर सवाल उठा रहा था, लेकिन आज वो खेमा कहां चला गया, कहां जाकर सो गया, जब नरेंद्र मोदी ने 12 साल बाद शादी की बात को स्वीकार किया।

आमिर खान ने तो कानूनी दायरे में रहकर दूसरी शादी की, पहली से तलाक लिया, लेकिन इस महाशय ने तो शादी भी नहीं निभाई और तलाक भी नहीं लिया। एक बात और कह देता हूं, दुहाई मत देना बाल विवाह था, शादी 19 साल की उम्र में हुई थी, मोदी व उनकी पत्नि तीन महीने साथ रहे थे, तीन साल के दौरान।

हल्फनामे में पत्नि की संपत्ति वाले कॉलम को खाली छोड़ा जानकारी नहीं लिखकर कितना उचित है। अगर सब यही करने लगे तो संपत्ति का ब्यौरा कौन देना चाहेगा। चुनाव आयोग चुप है हैरानी इस बात पर भी होगी। अगर वो कॉलम अनिवार्य नहीं तो उसको निकाल देना चाहिए।

आप कह सकते हैं यह नरेंद्र मोदी की निजी मामला है, लेकिन हल्फनामा किसी का निजी नहीं होता, वहां नियम देखे जाते हैं। अगर आप हल्फनामा गलत करते हैं तो देश आप पर यकीन कैसे करेगा कि आप कभी अपने फायदे के लिए गलत जानकारी नहीं देंगे।

वैसे लगता है कि आजकल मोदी एक रिकॉर्ड बनाने की होड़ में हैं। झूठ बोलने का रिकॉर्ड। मोदी का 56 इंच का सीना तो सब को याद है, लेकिन सत्य तो है कि मोदी का 44 इंच का सीना है, बाकी तो केवल उनकी लहर है। मोदी की लहर भी ऐसी है कि उनको अख़बार के फ्रंट पेज से लेकर अंदर तक के पेज अपने विज्ञापन के लिए खरीदने पड़ रहे हैं।

मेरी दुआ है।
अब की बार, मिले जशोदाबेन को प्यार
दिग्विजय सिंह हैं बधाई के हकदार


चलते चलते

नरेंद्र मोदी के शादी खुलासे के बाद भारतीय महिलाएं सतर्क हो चुकी हैं, सुनने में आया है कि उन्‍होंने फेसबुक के मालिक को पत्र लिख भेजा है कि वो भी भारतीय चुनाव आयोग की तरह थोड़े से सख्‍त नियम बनाएं। उधर, सूत्रों का कहना है कि फेसबुक के मालिक परेशान हैं, भारतीय राजनीति में तो एक आध हो सकता है, लेकिन हमारे यहां तो हर दूसरा भारतीय नरेंद्र मोदी है।

पहले ही खुलासा कर देते पांच सौ करोड़ तो बच जाते

राम मंदिर के बहाने, यूं ही कुछ चलते चलते

राममंदिर, इसको अगर थोड़ा सा तोड़कर पढ़ा जाए तो शायद इसका अर्थ कुछ ऐसा होगा। राम+ मन+ अंदर। राम तो कण कण में बसता है, उसको कहां जरूरत है किस एक जगह बंधकर बैठने की।

राम मंदिर की बात करने वाले अगर अपने राम को खुश देखना चाहते हैं तो उसकी प्रजा को पेट भर भोजन दें। इंटरनेट नहीं, बिजली सुविधा दें। उनके गलों को तर करें, उनके खेतों तक पानी पहुंचाने पर माथा पच्‍ची करें। इंटरनेट तो आ ही जाएगा, जब पैसे आएंगे। वैसे भी फेसबुक वाला फ्री में नेट देने के लिए कोशिश कर रहा है, वो कामयाब हो जाएगा। आपको जरूरत नहीं। 

भावनगर जाते समय मैंने बहुत खूबसूरत मंदिर देखे, मुझे लगता है कि जितना पैसा गुजरात में मंदिर निर्माण पर खर्च होता है, उतना किसी अन्‍य जगह पर नहीं होता। वहां पर अभी तीन से चार मंदिरों का निर्माण जारी था, जो जल्‍द बनकर तैयार होंगे।

गुजरात में स्‍वामिनारायण भगवान के मंदिर, जैनों के मंदिर, अलग अलग कुल देवियों के मंदिर। शायद ही कोई ऐसा मार्ग हो जहां आपको मंदिर न मिले। मंदिर तो स्‍वयं लोग बना देंगे, जैसा आपने कल्‍पना भी नहीं की, लेकिन पहले उनकी पेट की भूख को तो खत्‍म कर दें। पहले उनको चांद तो चांद नजर आने दें। चांद में उनको महबूब, मामा तो दिखने दें।

हम ईसाईयों पर आरोप लगाते हैं उन्‍होंने हिन्‍दुओं को पैसे देकर धर्म परिवर्तन कर दिया। पैसे आज जरूरत हैं, जिसको नकारा नहीं जा सकता, मौत से बेहतर व्‍यक्‍ति किसी धर्म की छांव में बैठना चाहेगा, अगर कुछ दिन बदले में जीना मिलता हो।

मोदी के सबसे बड़े करीबी बनकर उभरे डॉक्‍टर सुब्रमण्‍य स्‍वामी कहते हैं कि हम को कोई एतराज नहीं, मुस्‍लिम इस देश में रहें, वो हिन्‍दु को स्‍वीकार लें, क्‍यूंकि उनके वंशज हिन्‍दु थे, लेकिन सवाल यह है कि धर्म स्‍वीकार लेने से क्‍या फर्क पड़ता है, अगर भीतर न बदला जा सका।

गजनबी के जब हमले होते थे, कुछ कमजोर दिल वाले अपनी जान बचाने के लिए धर्म कबूलते होंगे। बदले में उनकी जान बची होगी। धीरे धीरे उनका वो ही धर्म हो गया और उसको मानने लगे।

जैसे आज कल नरेंद्र मोदी की हवाओं को देखते हुए कुछ कांग्रेस बीजेपी में आ गए, तो वो बीजेपी के हो गए। अगर कल को कांग्रेस वाले कहें, उनको कांग्रेस का धर्म ही कबूलना चाहिए, क्‍यूंकि उनकी पैदाइश कांग्रेस से हुई है तो, नहीं नहीं अब दुहाई होगी धर्म व राजनीति दोनों में फर्क है।

आप अपने मंदिरों व धर्म को इतना उदार बना दीजिए कि लोगों के कदम खुद ब खुद आपके मंदिरों की तरफ चल पड़ें। मैंने बहुत सारे अंग्रेजों को हिन्‍दु चोले पहनते देखा है, वो खुशी से पहनते हैं। उनको आनंद आता है। उनके चेहरों पर अद्भुत आनंद होता है। उनको लगता है कि उनके जीवन मेंं कुछ महत्‍वपूर्ण घटा है।

लेकिन कुछ कट्टर हिन्‍दु घटाने की कोशिश करना चाहते हैं, घटना और घटाने में अंतर है। जबरदस्‍ती बलात्‍कार हो सकता है, प्‍यार नहीं। प्‍यार के लिए शरीर के भीतर की आत्‍मा को जीतना पड़ता है।

अगर भीतर उतर गए, तो बाहरी चोले से अधिक अंतर नहीं पड़ता। मगर देश का दुर्भाग्‍य है कि आज के अध्‍यात्‍म गुरू अपने राह से भटक चुके हैं। श्री गुरू नानक देव जी एक गांव में गए, उन्‍होंने गरीब लालो के घर का खाना खाया, लेकिन अमीर मालिक भागो का खाना वापिस कर दिया। गुरूजी ने कहा कि मालिक तुम्‍हारा खाना मेहनत के तैयार नहीं हुआ, बेईमानी, गरीबों के खून पसीने से लथपथ है।

मगर आज हमारे धर्म गुरू भारत में शराब बेचने वाले, नंगे कलेंडर बेचने वाले, देश का धन लुटाने वाले नेतायों के रहमोकर्म पर अधिक पलते हैं। उनके हवाई जहाजों में घूमते हैं। अध्‍यात्‍म का गिरता स्‍तर हिन्‍दुस्‍तान के लिए घातक है, न कि किसी ढांचे का गिरना।

राम मंदिर, राम तो मन के अंदर है। उसके द्वार खो दें, सब ठीक हो जाएगा। गजनबी क्‍या लेकर गया यहां से, क्‍या सिकंदर लेकर गया। सिकंदर को भारत में न घुसने देने वाले पोरस को कौन याद करता है, भारत में, क्‍यूंकि वो पाकिस्‍तान में छूट गया।

नरफत पाकिस्‍तान के खिलाफ कट्टर पंथियों के खिलाफ होनी चाहिए। आवाज में गद्दारों का नाम होना चाहिए, पूरे समुदाय का नहीं। आज मंदिर मजिस्‍द चर्चों के बीच की लड़ाई से ऊपर उठकर उन युवायों के हितों के बारे में सोचना होगा, जो नेतायों से बहुत कदम आगे हैं। जो विदेशी जीवन जीने की ललक रखते हैं, जिनको हम ने विदेशी सिनेमे के जरिए वहां के रहन सहन से तो रूबरू करवाया दिया, लेकिन वैसा कुछ भारत में बना न सके, बनाते हैं तो भारत के परंपरागत ढांचे को चोट पहुंचती है।

परिवर्तन किसे चाहिए.... सत्ता की भूख

देश को बदलने की बात करने वाले। देश को सोने की चि​ड़िया बनाने का दावा करने वाले बड़ी हैरत में डाल देते हैं, जब वह सामा​जिक मुद्दों को लेकर सत्ता में आई पार्टी पर सवाल​ उठाते हैं। उसका स्वागत करने की बजाय, उसको गिराने की साजिश रचते हैं, गिराने की हथकंडे अपनाते हैं।

देश को बदलने की बात करने वाली भाजपा के नेता अरविंद केजरीवाल की टोपी को लेकर सवाल उठा रहे हैं। अगर भाजपा देश का भला चाहती है तो उसको हर समाज सुधारक में मोदी नजर आना चाहिए न कोई दूसरा। मगर सत्ता पाने की चेष्ठा। आगे आने की अभिलाषा ऐसा होने नहीं देती। यह हालत वैसी है जैसे मरुथल में कोई भटक जाए। उसको प्यास लगे व मृग मरीचिका को झील समझने लगे। ​जिसके पास पानी की बोतल होगी, जिसको प्यास न होगी, उसको मृग मरीचिका लुभा न सकेगी।

मगर राजनेतायों को पद प्रतिष्ठा से प्रेम है। देश की जनता पहाड़ में जाए। नेता को ढोंग रचता है। जनता का मिजाज देखकर बाहर के कपड़े बदल लेता है। उसको समाज सुधार से थोड़ी न कुछ लेना है। एक दिन गधे पर सवार होकर मुल्ला नसीरुद्दीन बाजार से निकल रहा था, किसी ने पूछा किस तरफ जा रहे हो, मुल्ला ने कहा, गधे से पूछ लो। जिस तरफ ले जाएगा, चले जाएंगे। हमारी कहां मानता है।

देश का भला मोदी करे या अरविंद करे। क्या फर्क पड़ता है। देश का भला होना चाहिए। मगर नेता सोचते हैं, भला होना चा​हिए, लेकिन हमारे चुने नेता द्वारा होना चाहिए। शायद दुनिया इसी बहाने याद कर ले। इसमें सुख है, कोई याद कर ले। इस लालसा की आग में आदमी जलता जा रहा है। सिकंदर को याद कर लेता है, हिटलर को याद कर लेते हैं, लेकिन इससे उनको क्या फायदा होता है।

अरविंद की टोपी नजर आती है। उसके भीतर कुछ करने की आग नजर नहीं आती, क्योंकि लालसा ने आंख पर पट्टी बांध दी है। डर है कहीं, हमारे खेले दांव को अरविंद ​बिगड़ न दे। कहीं इस बार भाजपा सत्ता पाते पाते रह न जाए। लालसा बड़ी है, देश बड़ा नहीं है।

मोदी का कुर्ता नजर नहीं आता, नजर आती है तो अरविंद की टोपी। बड़ी दिक्कत है। टोपी तो अन्ना भी पहनते हैं। अन्ना से भी मोहभंग हो जाता, अगर वह नेतायों की रोजीरोटी छीन लेते। नेता ने अरविंद का साहस न देखा, देखा तो केवल टोपी को। टोपी ने कुर्सी छीन ली। कुर्सी पर बैठने का स्वप्न अधूरा रह गया। सालों से बुना था।

देश का भला करने वाले न टोपी देखते हैं, न पार्टी देखते हैं, न अरविंद देखते हैं, न नरेंद्र देखते हैं । वह तो केवल देश का विकास देखते हैं।

अरविंद केजरीवाल कुछ तो लोग कहेंगे

बड़ी हैरानी होती है। कोई कुछ लेता नहीं तो भी देश के कुछ बुद्धिजीवी सवाल उठा देते हैं, अगर कोई लेता है तो भी। अब आम आदमी मुख्यमंत्री बन गया। वो आम आदमी सुरक्षा लेना नहीं चाहता, लेकिन मीडिया अब उसको दूसरे तरीके से पेश कर रहा है।

सुनने में आया है, अरविंद केजरीवाल ने सुरक्षा लेने से इंकार कर दिया। सुरक्षा के रूप में उसको दस बारह पुलिस कर्मचारी मिलते, लेकिन अब उसकी सुरक्षा के​ लिए सौ पुलिस कर्मचारी लगाने पड़ रहे हैं। अब भी सवालिया निशान में केजरीवाल हैं ?

शायद बुद्धिजीवी लोग घर से बाहर नहीं निकलते या घर नहीं आते। शायद रास्तों से इनका राब्ता नहीं, संबंध नहीं, कोई सारोकार नहीं। वरना,उनको अर​विंद केजरीवाल के शपथग्रहण कार्यक्रम की याद न आती, जहां पर सौ पुलिस कर्मचारियों को तैनात किया गया था। कहते हैं आठ दस से काम चल जाता है, अगर अरविंद सुरक्षा के लिए हां कह देते तो। सच में कुछ ऐसा हो सकता है, अगर हो सकता है तो नरेंद्र मोदी की राजधानी, मेरे घर के पास आकर देख लें।

मोदी गोवा से, दिल्ली, यूपी, बिहार से निकलता है, लेकिन मेरे शहर की सड़कों पर सैंकड़े से अधिक पुलिस कर्मचारी ठिठुरते हैं। मोदी की सुरक्षा के कारण हमको दिक्कत भी है, लेकिन फोकट की अधिक सुरक्षा भी। सड़क के दोनों तरफ पुलिस कर्मचारी होते हैं, मोदी का कोई नामोनिशां नहीं होता। जब मोदी निकलता है तो स्कोर्पियो का काफिला निकलता है, जो बख्तर बंद होता है। क्या इसका खर्च अ​रविंद केजरीवाल की सुरक्षा के लिए तैनात किए पुलिस कर्मचारियों से कम है।

पुलिस कर्मचारी, जनता के सेवक हैं। किसी मुख्यमंत्री या किसी नेता के नहीं। बंदूक रक्षा करती तो राजीव गांधी, इंदिरा गांधी सुरक्षित होती। भय किस बात का। मौत का। मौत ने तो काल को वश में करने वाले रावण को नहीं छोड़ा तो आम आदमी क्या है ? सुरक्षा का जिम्मा किसके हाथों में है, जो आम आदमी है, जिसके परिवार की सुरक्षा ऐसी पुलिस चौं​कियों के छाये में है, जहां चौंकियां तो हैं, पुलिस कर्मी नहीं।

बड़े अजीब हैं बुद्धिजीवी। कथा सुनाते हैं बैल, शिव व पार्वती की। और खुद की भूल जाते हैं। कहते हैं शिव पार्वती बैल पर बैठकर जा रहे थे। तभी रास्ते में दो लोग मिले, कहने लगे दोनों जानवर पर अत्याचार करते हैं। पार्वती ने पत्नी धर्म निभाया और नीचे उतर गई, शिव को बैठे रहने दिया। कुछ आगे गए तो कोई और मिला, उसने कहा, कैसा निर्दयी है, पत्नि चल रही है, आप आराम से बैठकर जा रहा है। शिव भी उतर गए। कुछ दूर गए तो दूसरे लोग मिल गए कहने लगे। यह लोग भी कैसे हैं, पास में सवारी है, लेकिन पैदल चलकर अपने एवं बैल के पैर थका रहे हैं। इससे अच्छा होता तो घर छोड़ आते।

सच में जितने मुंह उतनी बातें। अरविंद केजरीवाल जमाना है कुछ तो कहेगा। मैं भी तो कुछ कह रहा हूं।

यहां बे 'चारे' दोषी लालू, वहां क्‍या सोचते होंगे जेपी नारायण

चारा घोटाले में दोषी पाए गए लालू प्रसाद यादव। और रिपोर्टों मुताबिक जेल जाना निश्‍चित है। लालू प्रसाद यादव के लिये जेल जाना कोई नई बात नहीं, लेकिन बस फर्क इतना है कि वे कभी जेपी अंदोलन के कारण जेल जाते थे, और अब वे चारा घोटाले के दोष में जेल जाएंगे।

कहते हैं कि लालूप्रसाद यादव, जेपी नारायण के इतने खास थे कि वे लालू प्रसाद यादव को घर चलाने के लिए आर्थिक मदद तक देते थे। इतना ही नहीं, लालू प्रसाद यादव भी जेपी पर अपना कॉपीराइट मानते हैं, तभी तो जब अन्‍ना अंदोलन को जेपी अंदोलन से जोड़कर देखने की कोशिश की जाती है तो सबसे ज्‍यादा विरोधी सुर लालू प्रसाद यादव के होते हैं।

आज एक बार फिर जेपी को याद किया जा रहा है, हालांकि जेपी नारायण का जन्‍मदिवस अकसर अमिताभ बच्‍चन के जन्‍मदिवस की सुर्खियों में कहीं छुपा रह जाता है। जेपी, जय प्रकाश नारायण। यह नाम नहीं, एक अंदोलन था। जिसने इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस की जड़ों को उखाड़ फेंका था। उसकी जगह एक गैर कांग्रेसी सरकार को देश चलाने का मौका दिया। यह सरकार जनता पार्टी की थी, जिसका भी लघु नाम लिखा जाये तो जेपी बनेगा, हालांकि इस सरकार में जेपी ने कोई पद नहीं लिया था। वे हमेशा गैर राजनीतिक रहे।

शायद, स्‍वर्ग में कहीं विराजमान जेपी को आज दुख भी हो रहा होगा, और खुशी भी। खुशी इस बात की कि उनको कभी राजनीति की लत नहीं लगी, और दुख इस बात का, जो उसका सबसे करीबी चेला था, आज वे एक घोटाले में दोषी पाया गया।

वे सोच रहे होंगे। यह तो वे ही लालू है, जो कभी मेरे भ्रष्‍टाचार विरोधी अंदोलन में, सबसे आगे होता था। भ्रष्‍टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करता था। फिर सोचते होंगे, नहीं.. नहीं.. यह वे मेरा लालू नहीं, यह तो कोई राजनेता है। यह मेरा लालू नहीं हो सकता।

वे लालू तो कदम दर कदम अंदोलन को आगे बढ़ाता था। वे लालू तो मेरे समर्थकों में जान फूंकता था। मैंने लालू प्रसाद यादव को उसी दिन खो दिया था, जब वे जनता पार्टी की टिकट से सांसद बनकर लोक सभा पहुंचे थे। जब सत्‍ता के चक्‍कर में गठजोड़ की राजनीति पर उतारू हो गए थे।

मैं उस कहावत को भूल गया था, जो कदम दर कदम पढ़ाई जाती है, सिखायी जाती है कि एक मच्‍छली पूरे जल को बिगाड़ देती है, एक सेब दूसरे सेबों को खराब कर देता है, मैंने तो खराब सेबों के बीच अपना सेब रख दिया। मैंने तो गंदे जल में अपनी एक मच्‍छली छोड़ दी। आखिर नतीजा तो कुछ निकलना था।

सोच में पड़े होंगे जेपी, और सोच रहे होंगे, जब मेरी पुण्‍यतिथि में पांच दिन शेष होंगे, तब ( 03 अक्‍टूबर 2013 ) मेरे एक शार्गिद को अदालत सजा सुनाएगी। शायद इस वक्‍त मुझे कोई याद भी न करे।

वैसे भी मेरा जन्‍म एक महानायक की जन्‍म तारीख के साथ आता है। आज वे महानायक है, भले रुपहले पर्दे का, लेकिन मुझे से अधिक नाम है उसका। धन दौलत, शोहरत सब कुछ है उसके पास। उसको चाहने वालों की लम्‍बी फेहरिस्‍त है। मेरा नाम तो सियासतदान लेते हैं, वोट बैंक को निशाना बनाने के लिये, लोगों को भ्रमित करने के लिए।

वैसे लालू प्रसाद यादव, के कारण ही सही, कुछ लोग मुझे याद तो कर रहे होंगे। मेरा उन से शिकवा नहीं, जो मुझे अपना आदर्श मानते हैं। जो मेरी बातें करते हैं, और घर के किसी कोने में बैठे देश के सिस्‍टम को कोसते हैं, और किसी अंदोलन को जन्‍म नहीं देते।

वो लोग ही तो मेरे सच्‍चे आशिक हैं। वे नहीं चाहते मेरा अस्‍तित्‍व खत्‍म हो। जेपी अंदोलन की जगह कोई और अंदोलन जन्‍म ले। वे मुझे जिन्‍दा रखना चाहते हैं। वे मेरी कदर करते हैं।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

Yuva Rocks Dot Com से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें Facebook  पर ज्वॉइन करें, Twitter पर फॉलो करे।

fact 'n' fiction : नरेंद्र मोदी का चुनावी घोषणा पत्र

वैसे तो हर बार राजनीतिक पार्टियां या गठबंधन अपना चुनावी घोषणा पत्र चुनावों से पूर्व जारी करते हैं, लेकिन इतिहास में पहली बार 'नरेंद्र मोदी : द मैन इन पीएम रेस' की ओर से अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी किया गया है।

इस चुनावी घोषणा पत्र की एक कॉपी हमारे फर्जी सूत्रों द्वारा उपलब्‍ध करवाई गई है। केंद्र सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान करने वाले नरेंद्र मोदी की ओर से चुनावी घोषणा पत्र युवा पीढ़ी और आम जनता को ध्‍यान में रखकर बनाया गया है। विकास पुरुष की ओर से इसमें विकास संबंधी कोई घोषणा नहीं, जो है वे आपके सामने रखने जा रहे हैं।

सोशल मीडिया स्‍वतंत्रता
मैं सोशल मीडिया के अस्‍तित्‍व को बरकरार रखने के लिये पुरजोर कोशिश करूंगा। मुझे पता है कि यह एक अभिव्‍यक्‍ति का सशक्‍त प्‍लेटफॉर्म है, बशर्ते कि आप इस तरह की गतिविधियों का संचालन नहीं करेंगे, जिससे मेरी सरकार को ख़तरा पैदा हो। पहले स्‍पष्‍ट कर दूं, मैं मनमोहन सिंह की तरह बेदाग और इमानदार रहूंगा, लेकिन नेताओं की गारंटी लेना मुश्‍िकल है। पांच उंगलियां एक बराबर नहीं होती।

हर शहर में लाल किला
सोशल मीडिया के अस्‍तित्‍व को बरकरार रखने के बाद मेरा अगला कदम होगा, हर शहर में लाल किला हो। मुझे इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर में बहुत विश्‍वास है। आप गुजरात में आकर देखिये, यहां पर वैशनूदेवी से लेकर बालाजी धाम तक के प्रतिरूप मॉडल मिलेंगे। महात्‍मा गांधी मंदिर के लिये करोड़ों खर्च कर रहा हूं, यह ओर्जिनल है। लाल किला जब हर शहर में होगा, तो मैं प्रधानमंत्री के रूप में आपके शहर में 15 अगस्‍त मना पाउंगा। हालांकि दीवाली का प्रोग्राम तो सीमा पर सेना जवानों के साथ पाकिस्‍तानी सरहद पर बम फोड़कर मनाने का फिक्‍स है।

एलके आडवाणी राष्‍ट्रपति होंगे
मेरे प्रिय व भाजपा को मजबूत करने वाले मेहनतकश नेता एलके आडवाणी, जिनकी वेटिंग रद्द हो गई, को प्रमोशन देते हुए राष्‍ट्रपति नियुक्‍त किया जायेगा, बशर्ते वे मेरे साथ राज्‍यपाल कमला बेनीवाल जैसा रिलेशन न रखें। नहीं तो मजबूरन, अध्‍यादेश लाने के कानूनों में बदलाव करने होंगे, जिसके लिये मौजूदा समय में राष्‍ट्रपति की जरूरत पड़ती है।

पाकिस्‍तान विलय
हमारे लोहपुरुष सरदार पटेल का स्‍वप्‍न अधूरा रहा गया, वे चाहते थे कि भारत एक सूत्र में  बंधे, लेकिन ऐसा नहीं हो सकता, क्‍यूंकि जिन्‍ना का जिन्‍न कुछ रियासतों को अपने साथ लेकर जाने में सफल हुये। हमारी कोशिश होगी कि आतंकवाद जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे अपने पाकिस्‍तान को इस बीमारी से मुक्‍त किया जाये, और विलय से बेहतर विकल्‍प कोई नजर नहीं आता। भारत, वैसे तो इसका अर्थ प्रकाश, रत, लेकिन युवा पीढ़ी अर्थ कम ढूंढती है, उसको केवल पहले अक्षर का अर्थ भार समझ आता है, इसलिये इस भार को हल्‍का करने के लिये, भारत को 'हिन्‍दू' स्‍तान में परिवर्तित किया जायेगा, इंडिया को खत्‍म क्‍यूंकि इसके भी शुरूआती अक्षर, इंदिरा की याद दिलाते हैं।

ऑन लाइन वोटिंग सिस्‍टम

इस सिस्‍टम को लाना बहुत जरूरी है, क्‍यूंकि देश तरक्‍की की राह पर है। यहां के युवा आलसी हैं। जब से फेसबुक, टि्वटर, ऑनलाइन शॉपिंग, ऑनलाइन बिल पे सिस्‍टम शुरू हुआ है, तब से लाइनों में लगना बंद कर दिया, केवल आम आदमी लाइन में लगता है। और मेरी जीत की गारंटी फेसबुकिये और टि्वटरिये हैं। इसलिये इनके लिये ऑनलाइन वोटिंग प्रणाली जरूरी है, क्‍यूंकि यह क्‍यू में नहीं लगेंगे, और नहीं लगेंगे तो मेरा जीतना मुश्‍िकल है।

दागी नेताओं की छुट्टी
सत्‍ता में आने के बाद दागी नेताओं की छुट्टी करने पर विचार किया जायेगा। दागी नेताओं को बाहर का रास्‍ता दिखाने के लिये अदालती आदेशों को माना जायेगा, लेकिन उससे पहले सीबीआई व अन्‍य जांच एजेंसियों से बीजेपी के सभी नेताओं को क्‍लीन चिट दिलाई जायेगी। इस प्रक्रिया में विरोधी पार्टी के नेता भी शामिल हो सकते हैं, बशर्ते दिल्‍ली वाली गर्लफ्रेंड छोड़नी होगी।

बीजेपी के उच्‍च पदाधिकारियों ने इस संदर्भ में संपर्क करने पर बताया कि यह घोषणा पत्र पूर्ण रूप से फर्जी है। इसका वास्‍तविकता से कोई लेन देन नहीं, हालांकि कुछ तथ्‍य सही हो सकते हैं, बाकी कहानी काल्‍पनिक है। विश्‍वास कीजिये।

Disclaimer : fact 'n' fiction  सीरीज में व्‍यक्‍तियों के नाम असली हो सकते हैं, लेकिन इसकी लेखन शैली व कंटेंट पूर्ण रूप से काल्‍पनिक है। कुछ असली तथ्‍यों को आधार बनाकर कल्‍पना से इसकी रचना की जाती है।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

Yuva Rocks Dot Com से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें Facebook  पर ज्वॉइन करें, Twitter पर फॉलो करे।

fact 'n' fiction : रेवाड़ी रैली, ताऊ लगता है मोदी मामू बना गया

शब्‍दी गोला बारूद लाये हो न भाई।
हरियाणा के रेवाड़ी शहर में गुजरात के मुख्‍यमंत्री व संभावित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व सैनिकों की रैली को संबोधन किया। इस रैली में नरेंद्र मोदी ने जमकर सीमा पर खड़े जवानों की तारीफ की। खुद को भी श्रेय देने से बिल्‍कुल नहीं चुके। प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार बनने के बाद ज्‍यादा गर्मजोशी में नजर आये। इस मौके पर वन रेंक वन पेंशन की बात की, लेकिन पूर्व सैनिकों को भरोसा नहीं दिलाया कि वे सरकार बनने पर उसके लिए कुछ खास करेंगे।

नरेंद्र मोदी ने पूरा ध्‍यान सीमा पर खड़े जवानों पर लगा दिया। पूर्व सैनिक सोच रहे थे, शायद आज गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी और संभावित प्रधानमंत्री कुछ ऐसी घोषणा करेंगे, जो उनके दर्द को कम करेगी, लेकिन नरेंद्र मोदी ने संप्रग को वन रेंक वन पेंशन पर श्‍वेत पत्र लाने की सलाह देने के अलावा कुछ नहीं दिया। रोजगार की बात करते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा कि हम को हथियार इम्‍पोर्ट करने बंद करने चाहिए, हमको भारत में हथियार बनाकर बेचने चाहिए। इसके लिए कॉलेजों में विशेष कोर्सों का प्रबंधन किया जाये।

नरेंद्र मोदी की इस रैली के बाद दुनिया की नम्‍बर वन फेक टॉक न्‍यूज एजेंसी से बात करते हुए कांग्रेस महासचिव दिग्‍विजय सिंह ने कहा, 'हम बहुत जल्‍द चुनाव आयोग को पत्र लिखकर निवेदन करेंगे कि आगामी चुनावों में पोलिंग बूथों पर सेना जवानों की तैनाती न की जाये, क्‍यूंकि नरेंद्र मोदी ने उनका हृदय परिवर्तन कर दिया है, ऐसे में सेना जवानों की तैनाती चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करेगी।' हालांकि हथियार वाली बात पर प्रतिक्रिया देने से दिग्‍विजय सिंह कतराते हुए नजर आये।

उधर, व्‍हाइट हाउस से बराक ओबामा के सहयोगियों ने फेक टॉक से बात करते हुए कहा कि अमेरिका कल तक सीरिया को लेकर परेशान था, लेकिन अब वे भारत को लेकर भी चिंता में है, क्‍यूंकि मौजूदा भारतीय सरकार ने उसको सीरिया पर हमला करने के लिए समर्थन नहीं दिया, और आने वाली संभावित सरकार भारत में हथियार बनाने की बात कर रही है, ऐसे में अमेरिका का बेड़ा गर्क हो जायेगा।, हालांकि गुप्‍त सूत्रों से जानकारी मिली है कि बहुत जल्‍द नरेंद्र मोदी को अमेरिका का वीजा दिया जायेगा, और उनकी हथियार निर्माण योजना में अमेरिका बहुत ज्‍यादा निवेश करने के लिए तैयार है।

नरेंद्र मोदी के करीबी फर्जी सूत्रों का कहना है कि हथियार बनाने का पूरा जिम्‍मा साधू यादव को सौंपा जायेग, जिन्‍होंने पिछले दिनों गुजरात के मुख्‍यमंत्री से मुलाकात की थी। वैसे भी नीतिश कुमार के आने से पहले बिहार के एक क्षेत्र में देशी हथियार बनाने का धंधा जोरों पर था। इतना ही नहीं, इस रैली के बाद नरेंद्र मोदी को गूगल सर्च इंजन में  बराक ओबामा से भी ज्‍यादा सर्च किया गया, बताया जा रहा है कि अमेरिकी हथियार निर्माता कंपनियों में काम कर रहे कर्मचारी अपना बायोडाटा मेल करने के लिए नरेंद्र मोदी का संपर्क एड्रेस खोज रहे थे, हालांकि उनको नतीजे में एक टेलीफोन नम्‍बर मिला, जिस पर डायल करने के बाद उनको नरेंद्र मोदी का केवल लाइव भाषण सुनाई पड़ा।
सोशल मीडिया वाले सही कहते हैं तू यार बड़ा फेकु है
समाजवादी पार्टी व जेडीयू के नेताओं ने फर्जी मीडिया एजेंसी फेकटॉक को अमरेली शहर की तस्‍वीर दिखाते हुए, ( जिसमें लोग पानी के लिए तरस रहे हैं, वहां टैंकियां तो हैं पानी नहीं) कहा कि अमरेली शहर में गुजरात के मुख्‍यमंत्री ने पानी नहीं पहुंचाया, लेकिन बॉर्डर पर पानी पहुंचा दिया, इसके पीछे की मंशा की पूर्ण रूप से स्‍वतंत्र जांच होनी चाहिये, हो सके तो इस मामले की जांच सीबीआई से होनी चाहिए। हालांकि वे समुद्री पानी को पीने लायक बनाकर भी सेना जवानों को दे सकते थे, नर्मदा का पानी खींचकर लेकर जाने की क्‍या जरूरत थी। अब तो पसीने से पानी बनाने वाली मशीनें आ गई हैं।
फेक टॉक संवाददाताओं को रैली के बाद कुछ ऐसे फर्जी टेप मिले हैं, जिसमें लोगों को कहते हुए सुना गया, ताऊ, यह तो मामू बनाकर चला गया। रैली पूर्व सैनिकों की, और बात बॉर्डर पर खड़े सैनिकों की, यह बात तो 15 अगस्‍त को भी कर लेते, और आने वाली 26 जनवरी को भी कर सकते थे, लेकिन हमारी मांगों का क्‍या ? अटलजी की सरकार का छुनछुना थमाकर चला गया, बजाते रहो। न बैटरी खत्‍म होगी, न सुर ताल बिगड़ेगा, बस बजाते रहो। जंगल में भी, घर में भी, क्‍यूंकि नेटवर्क टूटने का डर नहीं।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

Yuva Rocks Dot Com से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें Facebook  पर ज्वॉइन करें, Twitter पर फॉलो करे।

fact 'n' fiction : प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जगह लेंगे एलके आडवाणी

यह फाइल फोटो है, जो गूगल सर्च के जरिये प्राप्‍त हुई।
भारतीय जनता पार्टी द्वारा हाशिये पर धकेल दिए गए नेता एलके आडवाणी बहुत जल्‍द संप्रग सरकार में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जगह लेंगे, हालांकि इस मामले में आधिकारिक मोहर लगना अभी बाकी है।

गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदीमय हुई भारतीय जनता पार्टी द्वारा दरकिनार कर दिए गए नेता एलके आडवाणी की ओर से अधिवक्‍ता फेकु राम भरोसे ने संयुक्‍त प्रगतिशील गठबंधन की कोर्ट में जनहित याचिका दायर करते हुए मांग की है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के शेष बचे हुए कार्यकाल का पूरा जिम्‍मा देश के सशक्‍त व सीनियर नेता एलके आडवाणी को सौंपा जाये, ताकि आजाद भारत के नागरिकों राजनीति पर भरोसा बना रहे। वरना, उनको लगेगा कि यहां पर करियर नाम की कोई चीज नहीं है। राजनीति में सपने देखने वाले बर्बाद हो जाते हैं। अगर ऐसी धारणा एक बार बन गई तो आपका सबसे बड़ा राजनीतिक दुश्‍मन नरेंद्र मोदी जीत जायेगा, जिसने पिछले दिनों कहा था कि सपने देखने वाले बर्बाद हो जाते हैं।

सूत्रों ने जानकारी देते हुए बताया कि याचिकाकर्ता के वकील ने संप्रग अदालत के सामने दलील पेश की कि देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह किसी भी समय त्‍याग पत्र देने के लिए तैयार हैं, अगर संप्रग चेयरपर्सन उनको ग्रीन सिग्‍नल दें तो।

उधर, संप्रग की ओर से संभावित पीएम के पद उम्‍मीदवार राहुल गांधी ने भी स्‍पष्‍ट कर दिया है कि वे अपने सपनों को मारकर जनता के सपनों को साकार करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं, और एलके आडवाणी देश के सीनियर सिटीजन हैं, ऐसे में उनका सपना भी राहुल गांधी को पूरा करना चाहिए।

इस बाबत जब देश की सबसे बड़ी फर्जी न्‍यूज एजेंसी 'फेकटॉक' ने गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे से संपर्क साधा तो उन्‍होंने कहा कि रामू श्‍यामू और धामू कोई भी पीएम पद का उम्‍मीदवार हो सकता है, क्‍यूंकि पप्‍पू कान्‍ट डांस, साला! पप्‍पू, राहुल गांधी को सोशल मीडिया द्वारा दिया गया प्‍यार का नाम है।

उधर, गुप्‍त सूत्रों ने बताया है कि एलके आडवाणी अपना सपना पीएम कुर्सी...कुर्सी को पूरा करने के लिए बहुत जल्‍द सोनिया गांधी से मुलाकात करने वाले हैं। उनके करीबियों ने कोरियर के जरिये सोनिया गांधी को एक सीडी भेजी है, ताकि बैठक से पहले दोनों गुटों को मित्रभाव पैदा हो सके। इस सीडी का एक नमूना आप यहां देख सकते हैं।



पिछले दिनों एलके आडवाणी की खास मानी जाने वाली लोकसभा में विपक्ष नेता सुषमा स्‍वराज ने प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठकर निरीक्षण किया और बताया है कि कुर्सी बेहद आराम दायक है, और एक सीनियर सिटीजन उस पर आराम से बैठ सकता है।

दलील और स्‍थितियों के मद्देनजर तो ऐसा लगता है कि 'आदमी आदमी के काम आता है' की तर्ज पर संप्रग सरकार पिछले दो बार से पीएम पद की रेस में शामिल रह चुके एलके आडवाणी की भावनाओं को समझेगी, और उनको संप्रग सरकार में मनमोहन सिंह की जगह प्रदान करेगी। बाकी तो राम ही राखै।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

Yuva Rocks Dot Com से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें Facebook  पर ज्वॉइन करें, Twitter पर फॉलो करे।

fact 'n' fiction : सुशील कुमार शिंदे के निर्देशन में बनेगी 'डी - डे' रीमेक

निखिल अडवाणी, एक युवा फिल्‍म निर्देशक हैं। बॉलीवुड में 'कल हो न हो' से जोरदार दस्‍तक दी। दूसरी बार सलामे इश्‍क से दीदार हुआ, तो न सलाम हुआ, न इश्‍क हुआ। बड़े सितारों की अधिक चमक के नीचे दब गया निर्देशन का आसमान, लेकिन अगला साहसिक कदम 'चांदनी चौंक टू चाइना' के रूप में भरा, जो एक यादगार फिल्‍म निकली। जिसे फिल्‍म निर्माता एक बेहद बुरी घटना के रूप में याद करेंगे, और बच्‍चे एक मनोरंजक व इनवेंशनल फिल्‍म के रूप में।

बच्‍चे जब जवां होंगे, वो कहीं भी होंगे, निर्देशक निखिल आडवाणी की इस फिल्‍म को याद जरूर करेंगे, अगर उस समय पैर की किक से मानव उड़ रहे हुए तो, क्‍यूंकि निखिल आडवाणी ने 'चांदनी चौंक टू चाइना' में मिथुन दा की किक से अक्षय कुमार को बहुत उड़ाया, और आज कल अक्षय कुमार मिथुन दा के करियर को उड़ान दे रहे हैं, अपनी हर फिल्‍म में मिथुन दा को जगह देकर। इसके अलावा इस फिल्‍म के जरिये निखिल ने काफी अन्‍वेंषण किए हैं, जैसे कि छाते को पैराशूट में बदलने, यंत्रों से भाषाओं को ट्रांसलेट करने आदि।

अब निखिल आडवाणी की हालिया रिलीज 'डी-डे' भी एक यादगार फिल्‍म बनने की कारगार पर खड़ी है, अगर गृह (मंत्री) निर्देशक सुशील कुमार शिंदे के निर्देशन में यूपीए मोशन पिक्‍चर्स इसके जीवंत संस्‍करण को प्रस्‍तुत करने में सफल रही।

यह भी एक साहसिक कदम था निखिल आडवाणी का, क्‍यूंकि उन्‍होंने कराची में घूसकर दाउद अब्राहिम को मारने का साहस जो दिखाया, हालांकि बॉलीवुड दाउद अब्राहिम की दहशत वाली लोकप्रियता को छद्म नाम से कैश करता आ रहा है।  

गुप्‍त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार यूपीए मोशन पिक्‍चर्स इस फिल्‍म के निर्माण के लिए विचार कर रहा है। इस बात का खुलासा उस समय हुआ, जब यूपीए के गृह निर्देशक सुशील कुमार शिंदे ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि इंडिया बहुत जल्‍द अमेरिका के साथ मिलकर दाउद अब्राहिम को पकड़ने के लिए मिशन पर निकलेगा।

वैसे इन दिनों अमेरिकी सरकारी फिल्‍म कंपनी ओबामा मोशन पिक्‍चर्स इराक टू के निर्माण को लेकर हर संभव प्रयास कर रही है, जिसकी शूटिंग सीरिया में करने की योजना है, लेकिन जी 20 से लेकर यूएन, अमेरिकी कांग्रेस तक ने इस फिल्‍म के निर्माण पर पुन र्विचार की बात कही है। इस बात से ओबामा मोशन पिक्‍चर्स के अधिकारी बेहद क्षुब्‍ध हैं, ऐसे में वे किसी भी अन्‍य प्रोडक्‍शन कंपनी के साथ हाथ मिला सकते हैं, खासकर भारतीय फिल्‍म कंपनी यूपीए मोशन पिक्‍चर्स के साथ, जो डी डे के जीवंत संस्‍करण की तैयारी में जुटी है।

निखिल आडवाणी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उसकी पांचवीं फिल्‍म डी डे एक इतिहासिक फिल्‍म होने की कारगार पर पहुंच जाएगी, जो बॉक्‍स ऑफिस पर खास कुछ नहीं कर सकी। इस फिल्‍म को भी राम गोपाल वर्मा की फिल्‍म कन्‍ट्रेक्‍ट की तरह याद किया जाएगा, जिसको देखने के बाद आंतकवादियों ने अहमदाबाद के सिविल अस्‍पताल को निशाना बनाया था।

फेक टॉक से बातचीत के दौरान गृह मंत्रालय के फेक सूत्रों ने बताया कि नरेंद्र मोदी के निरंतर हमलों से तंग परेशान यूपीए की चेयरपर्सन ने सभी सहयोगियों को नये आइडिये लाने के लिए कहा। जब सभी अलग अलग जगहों पर आइडियों की तलाश में जुटे हुए थे, तभी हमारे मंत्रालय के निर्देशक की निगाह दीवार पर लगे एक पोस्‍टर पर पड़ी, जिस पर दाउद का हमशकल छपा हुआ था। यह पोस्‍टर एक फिल्‍म का था। हमने उसकी फिल्‍म की बाजार से डुप्‍लीकेट सीडी खरीदी, और अध्‍ययन किया।

अंत आइडिया यूपीए मोशन पिक्‍चर्स की चेयरपर्सन को सुनाया और सभी सहयोगियों को पसंद आया। उन्‍होंने कहा कि फिल्‍म अंतरराष्‍ट्रीय रिश्‍तों पर आधारित है, ऐसे में भारतीय कलाकारों को लेना बेकूफी होगी। ऐसे में अमेरिकी सरकारी फिल्‍म कंपनी से बात करने पर सहमति बनी, जो शांति स्‍थापना के हिंसक फिल्‍में बनाने में माहिर है। फिलहाल उनको प्रस्‍ताव भेज दिया गया है। यकीन है कि वे इसके लिए तैयार हो जाएंगे।

फिल्‍म निर्माण से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इसकी शूटिंग कराची के अलावा दुबई में भी हो सकती है। फिल्‍म का शुरूआती दौर मुम्‍बई, कराची में फिलमाये जाएंगे, उसके बाद क्‍लाइमैक्‍स के लिए दुबई के कुछ लोकेशनों का सहारा लिया जाएगा।

अगर डी डे जीवंत संस्‍करण बनने में सफल हो गया तो निखिल आडवाणी बॉलीवुड के सबसे बेहतर निर्देशक साबित हो सकते हैं। ऐसे में उनको अमेरिकी फिल्‍म कंपनियां अपने वहां निर्देशन का जिम्‍मा सौंप सकती हैं।

लेकिन सबसे बड़ी मुश्‍िकल यह है कि इस फिल्‍म के निर्माण के लिए यूपीए मोशन पिक्‍चर्स के पास केवल आगामी लोक सभा चुनावों तक समय है।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

Yuva Rocks Dot Com से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें Facebook  पर ज्वॉइन करें, Twitter पर फॉलो करे।

पैट्रोल है, रुपया नहीं, ओनियन है, रुपया नहीं

डॉलर के मुकाबले गिरते रुपये को लेकर भारत सरकार का पता नहीं क्‍या रवैया है या भविष्‍य में होगा, लेकिन चीन पब्‍लिक पेशाबघरों में गिरते पेशाब से पूरी तरह दुखी है। अब इसके हल के लिए चीन के एक शहरी प्रबंधन विभाग ने एक नया नियम बनाया है।  पेशाब करने के लिए लगाए स्‍टैंडिंग बाउल से अगर आपका पेशाब बाहर गिरा तो चीन के हांगकांग से सटे सेनजेन शहर में आपको 16 डॉलर तक का दंड किया जाएगा। भले ही इस आदेश के बाद चीनी लोगों ने अपने नेटवर्किंग साइट पर इस नियम को लेकर खूब मजाक उठाया, यहां तक लिख दिया गया, अब नये इंस्‍पेक्‍टर भर्ती किए जाएंगे, जो हर पेशाब करने वाले के पीछे खड़े होकर लाइनमेंट चेक करेंगे। मजाक और असल जिन्‍दगी में फर्क होता है, यकीनन पेशाबघरों की हालत सुधरेगी, भले भारतीय रुपये की हालत सुधरने में वक्‍त लगे। गिरने से याद आया, कल बापू आसाराम का नाम भी उस गोलक में गिर गया, जिसमें पहले से कई बाबाओं के नाम गिर चुके हैं। इस गोलक को रेप आरोप बॉक्‍स कहते हैं। बाबागिरी का जीवन स्‍तर ऐशो  आराम वाला हो रहा है तो अध्‍यात्‍मिक स्‍तर गिर रहा है। अब ए सी कमरे हैं, नीचे मखमल के गद्दे हैं, ऊपरी रेश्‍म की ओढ़नी है, ऐसे में अकेले मन कैसे लगे, और सुविधाओं की जरूरत महसूस होने लगी है। जय हो मेरे गांव वाले बाबा की, जो महिलाओं को अपने डेरे के आस पास आने तक नहीं देता था, और इस गोलक से बच गया। बाबाओं का स्‍तर गिर रहा है, देश के नेताओं का स्‍तर तो आजादी के बाद से निरंतर रसतल से भी नीचे जा रहा है। रुयपे डॉलर के मुकाबले ही नहीं, प्‍याज, पैट्रोल, चीनी, अन्‍य वस्‍तुओं के मुकाबले भी तो कमजोर पड़ रहा है। मेरे पिता बताते हैं, वैसे तो सबके बताते होंगे, हम मेले में जाते थे, केवल बारह आने में ढे़र सारे पकौड़े लेकर आते थे, आज मेले में नहीं जाते, क्‍यूंकि अब आने ही नहीं, रुपया भी फेल हो रहा है।

इन दिनों एक गोरा, एक पैट्रोल पर पंप गया, वहां खड़े कर्मचारी को डॉलर देते हुए कहा, डालो पैट्रोल, उसने मशीन चलाई, थोड़े से टाइम बाद  गड़ गड़ की आवाज आना बंद हो गई, एक लीटर पूरा नहीं हुआ था, तो गोरे ने कहा, यह क्‍या, यह डॉलर है, रुपया नहीं, तो सामने पैट्रोल पंप कर्मचारी ने कहा, साहेब यह पैट्रोल है, रुपया नहीं।

जब वक्‍त खराब हो, हर जगह से मात पड़ती है, अब गोरा थोड़ा सा आगे गया, प्‍याजों की रेहड़ी खड़ी थी, लाल लाल चमकते प्‍याज, उसको भा गए, सोचा खरीद लेता हूं, रेहड़ी वाले के पास गया, डॉलर दिया, और बोला प्‍याज दे दो, प्‍याज वाले ने प्‍याज तोलकर गोरे के हाथ में थमा दिए, गोरा खड़ा रहा है, तो प्‍याज वाले ने पूछा साहेब, कुछ और चाहिए, गोरा बोला नहीं, बाकी के पैसे चाहिए, तो रेहड़ी वाले ने कहा, हो गया पूरा हो गया साहेब, गोरे ने फिर कहा, यह रुपया नहीं डॉलर है, तो सामने रेहड़ी ने कहा, मुझे पता है, लेकिन आपको पता नहीं, यह ओनियन है, रुपया नहीं। अंग्रेज निराश होकर चल दिया। चलो कोई तो है जो डॉलर को नीचा दिखा रहा है, वरना रुपये तो रसतल की तरफ जा रहा है।

इसके लिए कौन जिम्‍मेदार है। यकीनन पहली नजर में तो सरकार। जिस पर विपक्ष निशाने लगाए जा रहा है। देश की सौ करोड़ से अधिक आबादी इसके लिए जिम्‍मेदार नहीं, क्‍यूंकि अगर सौ करोड़ की आबादी वाला देश एक अच्‍छा एजुकेशन सिस्‍टम पैदा नहीं कर सकता तो बच्‍चों को पढ़ने के लिए मजबूर विदेश जाना होगा, यहां का पैसा वहां के एजुकेशन सेक्‍टरों की ग्रोथ के लिए खर्च करना होगा। देश की खूबसूरत जगहाएं जब दंगों की आग में झुलसने, कुदरती मुसीबतों के कारण खराब होने लगेंगी तो फिल्‍म शूटिंग के लिए फिल्‍म इंडस्‍ट्री को विदेश का रुख करना होगा। अब भारतीय हिल स्‍टेशन, जंगल या शिमला, कश्‍मीर, फिल्‍मों में नजर नहीं आते। अगर आज की युवा विदेश ब्रांड को प्‍यार करने लगी, तो दोष सरकार का है, युवा पीढ़ी का नहीं, क्‍यूंकि वे तो विश्‍व स्‍तरीय लुक चाहती है, अगर देश की सरकार देश में गुणवत्‍ता बरकरार रखने में चूकती है तो कोई इस पीढ़ी को दोष कैसे दे सकता है। गोगल्‍स, टी शर्ट, जूते, कारें सब विदेशी ब्रांड पसंद हैं। ऐसे में डॉलर की मांग बढ़ेगी, जब डॉलर की मांग बढ़ेगी तो अर्थशास्‍त्र कहता है कि बाजार में जिस की मांग बढ़ी, उसके रेट चढ़े। भले ही देश का प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक अच्‍छा अर्थशास्‍त्री है, लेकिन इस मोर्चे पर वे सामाज शास्‍त्री के तौर भी नजर नहीं आते।

देश में हर साल लाखों वाहन सड़कों पर उतर रहे हैं। पैट्रोल की खपत बढ़ रही है। पैट्रोल की खपत बढ़ेगी तो यकीनन भारत को पैट्रोल अधिक मंगवा पड़ेगा। इरान भले ही भारत के साथ भारतीय करंसी में डील करने के लिए सहमति जता चुका है, जब तक यह फैसला पक्‍का नहीं होता, तब तक डॉलर में से होकर रुपये को गुजरना होगा, और यह गुजरना भारत की धज्‍जियां उड़ा रहा है। ऐसा नहीं कि पैट्रोल की बढ़ती खपत के लिए देश के नागरिक जिम्‍मेदार हैं, वे तो बेचारे अपने पैसे को वाहनों पर खर्च कर रहे हैं, ताकि देश को रैवेन्‍यु मिल सके, देश के अंदर वाहनों का कारोबार करने वाली कंपनियों को मजबूती मिल सके, अगर सरकार चाहे तो पब्‍िलक ट्रांसपोर्ट को मजबूत बना सकती है। टोकियो जैसा भारी जनसंख्‍या वाला शहर अगर ट्रैफिक समस्‍या से उलझता नहीं तो कारण है कि वहां पर पब्‍लिक ट्रांसपोर्ट बेहद बेहतरीन है। लोग पब्‍लिक ट्रांसपोर्ट में जाना पसंद करते हैं, पर्सनल गाड़ी लेकर जाने की बजाय। मगर भारत में पर्सनल गाड़ी पर ज्‍यादा विश्‍वास है, क्‍यूंकि पब्‍लिक ट्रांसपोर्ट, मतलब सरकारी, और सरकारी शब्‍द भारतीयों को एक ही जगह अच्‍छा लगता है, केवल नौकरियों में, दूसरी जगह कहीं नहीं, क्‍यूंकि सरकारी नौकरी, चिंताओं से मुक्‍त। बारिश आये, तूफान आये, मंदी का दौर आए, लेकिन कभी वेतन नहीं रुकेगा, रुका तो ब्‍याज समेत आयेगा।

रुपये के गिरते स्‍तर से परेशान देश। जिम्‍मेदार सरकार। जो रुपया देशी प्‍याज के सामने कमजोर हो सकता है, वे डॉलर के आगे सिर कैसे उठाएगा। जिस देश में बाबा रासलीला रचाते हों, वहां पर नेताओं पर रासलीला को लेकर उंगली उठाना, मूर्खता होगी, क्‍यूंकि राजाओं के समय से विलासता शासन करने वालों का जन्‍म सिद्ध अधिकार रही है। डॉलर की औकत, प्‍याज, और पैट्रोल के सामने कुछ नहीं। थोड़ा सा अभियान हम भी कर सकते हैं।

रेप मुआवजे से नरेंद्र मोदी पर चुटकियां लेती शिव सेना तक

जम्‍मू कश्‍मीर की कमान एक युवा नेता उमर अब्‍दुला के हाथ में है, लेकिन शनिवार को उनकी सरकार की ओर से लिए एक फैसले ने उनको सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया। जम्‍मू कश्‍मीर सरकार ने रेप पीड़ित को मुआवजे वाली लिस्‍ट में शामिल किया है। अगर युवा नेता उमर अब्‍दुला इस मुआवजे वाली सूची को जारी करने की बजाय बलात्‍कारी को सजा देने वाली सूची जारी करते तो शायद भारतीय युवा पीढ़ी को ही नहीं, बल्‍कि देश की अन्‍य राज्‍यों की सरकारों को भी सीख मिलती। उमर अब्‍दुला, इज्‍जत औरत का सबसे महंगा गहना होती है, उसकी कीमत आप ने ज्‍वैलरी से भी कम आंक दी। उसको मुआवजे की नहीं, उसको सुरक्षा गारंटी देने की जरूरत है। उसको जरूरत है आत्‍मराक्षण के तरीके सिखाने की, उसको जरूरत है आत्‍मविश्‍वास पैदा करने वाली आवाज की। अगर इज्‍जत गंवाकर पैसे लेने हैं तो वे कहीं भी कमा सकती है। आपके मुआवजे से कई गुना ज्‍यादा, जीबी रोड दिल्‍ली में अपना सब कुछ दांव पर लगाकर पैसा कमाती बेबस लाचार लड़कियां महिलाएं इसकी  साक्षात उदाहरण हैं। जख्‍मों पर नमक छिड़ने का काम अगर आज के युवा नेता करने लग गए तो शायद देश की सत्‍ता युवा हाथों में सौंपते हुए देश की जनता डरेगी। वैसे भी आज देश की जनता युवाओं की तरह फुर्तीफे दिखने वाले 60 पार कर चुके गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपने के लिए पैरों की उंगलियों पर खड़ी है, भले एनडीए की सहयोगी पार्टियां इस बात को स्‍वीकार करने में थोड़ा सा कतराती हों।

एनडीए की सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी बाला साहेब ठाकरे की शिव सेना है, जिसका नेतृत्‍व उद्धव ठाकरे जैसे युवा नेता के हाथ में है। इस पार्टी के मुख्‍य समाचार पत्र सामना हिन्‍दी में नरेंद्र मोदी को केंद्र बिंदु बनाकर संपादकीय लिखा गया है, जो पहले शिव सेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे के विचारों का कॉलम माना जाता था, और अब वे उद्धव ठाकरे के विचारों का। भुज के लालन कॉलेज से गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्‍ली के लाल किले पर स्‍वतंत्रता दिवस के मौके राष्‍ट्रीय ध्‍वज लहराने वाले देश के प्रधानमंत्री पर जुबानी हमला बोला। 
यह साढ़े छह दशक पुराने लोकतंत्र में पहला मौका था, जब एक प्रधानमंत्री के राष्‍ट्र नाम दिए भाषण को किसी मुख्‍यमंत्री ने आड़े हाथों लिया हो। इस भाषण के बाद पार्टी के शीर्ष नेता लाल कृष्‍ण आडवाणी भी पार्टी के इस तेज तरार नेता से असहमत नजर आए, जिसका जिक्र संपादकीय में किया गया है। संपादकीय में लिखा कि नरेंद्र मोदी किसी और दिन भी यह कसर पूरी कर सकते थे। संपादकीय में शिवसेना मोदी की तारीफ करती है, लेकिन चुटकियां लेते हुए, जैसे कि मोदी के नेतृत्‍व में गुजरात में अच्‍छा काम काज हुआ, और उसके लिए उनकी प्रशंसा करने में किसी को आपत्‍ति नहीं होनी चाहिए। स्‍पर्धा का घोड़ा कितना भी क्‍यूं न दौड़े, लेकिन दिल्‍ली की राजनीति में आखिरी क्षण में खरारा 'एक प्रकार की कंघी' करने वाले ही जीतते हैं, ऐसा आज तक का अनुभव है।
आगे कहते हैं, मनमोहन सिंह से युद्ध की भाषा झेली नहीं जाती, और आक्रामकता उनसे बर्दाशत नहीं होती। मोदी मात्रा आक्रामक बोलकर जनभावना की तोप दाग रहे हैं। फिर भी स्‍वतंत्रता दिवस के मौके पर देश के प्रधानमंत्री को इस तरह बेइज्‍जत करना ठीक है क्‍या? आगे संपादकीय में उद्धव एलके आडवाणी की तारीफ करते हुए लिखते हैं, आडवाणी की देशभक्‍ति भी गरम और उनका अनुभव भी मजबूत है। भारतीय जनता पार्टी जिस तरह के मीठे फल चख रही है, उसका श्रेय आडवाणी को ही जाता है। 

मोदी पर चुटकी लेते हुए, आज मोदी ने कांग्रेस के खिलाफ रणभेरी बजाकर आग लगा दी है यह सच है। उस आग की ज्‍वाला कई बार आग लगाने वाले को ही झुलसा देती है। शिव सेना आगे कहती है कि जो लालन कॉलेज से नरेंद्र मोदी ने बोला, कल वे उसके सामने आने वाला है। यकीनन अगर कांग्रेस वहां से आउट होती है तो नरेंद्र मोदी के सामने वे सब चुनौतियां आएंगी, जिसको लेकर वे मनमोहन सिंह पर हल्‍ला बोल रहे हैं।
प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार नरेंद्र मोदी को बनाने की बात पर शिव सेना के उद्धव ठाकरे हमेशा बच निकलते हैं, लेकिन संपादकीय के पहले अध में कहते हैं कि प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार चुनना भाजपा का अंदरूनी मामला है, वहीं अंत तक आते आते वे सरदार पटेल से मोदी की तुलना करते हुए कहते हैं कि हमे विश्‍वास है कि मोदी के हाथ में सरदार पटेल की तरह दिल्‍ली की सत्‍ता आएगी, उस समय देश लूटने वाले सारे डकैतों को वे जेल का रास्‍ता दिखाएंगे।

उद्धव ठाकरे उक्‍त लाइन में एक बात स्‍पष्‍ट कर रहे हैं कि नरेंद्र मोदी के हाथ में जो सत्‍ता है वे सरदार पटेल की तरह आएगी, मतलब उप प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री नहीं। सरदार पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते, लेकिन कहते हैं कि महात्‍मा गांधी के कारण जवाहर लाल नेहरु प्रधानमंत्री बने, और पटेल उप प्रधानमंत्री। उद्धव ठाकरे भले ही कुछ स्‍पष्‍ट न कर रहे हों, लेकिन कहीं न कहीं इस बात का संदेश जरूर दे रहे हैं कि प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने के लिए नरेंद्र मोदी के आगे कोई तो है, वे राजनाथ सिंह है, वे अरुण जेटली है,  वे सुषमा स्‍वराज है या कोई अन्‍य, पता नहीं, लेकिन एलके आडवाणी यहां गांधी की भूमिका अदा करना चाहेंगे।
 संपादकीय का अंतिम पड़ाव भी किसी चुटकी से कम नजर नहीं आता। जिसमें कहा गया है, वे दाऊद इब्राहिम, सईद हाफिज, मेमन टाइगर जैसों को पाकिस्‍तान से घसीटते हुए लाएंगे, लाकर फांसी पर लटकाएंगे। जो धन स्‍विस बैंक में पड़ा है उसको कार्गो हवाई जहाज में लादकर भारतीय सीमा में लाएंगे। ऐसा करने में मोदी पूरी तरह सक्षम हैं, हमको तिल जितनी भी शंका नहीं। यह बात उस समय किसी व्‍यंग से कम नहीं लगती, जब किसी भी देश में घुसने के लिए किसी विशेष कानूनी प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ता हो।

अंत में शिव सेना कहती है कि मोदी ने गुजरात के रेगिस्‍तान से जो तोप दागी, उससे पाकिस्‍तान को फर्क पड़ा या नहीं, इसका तो पता नहीं, लेकिन मोदी की तोप से निकले गोले के कारण दिल्‍ली के कांग्रेसी नेताओं ने नींद की गोलियों का ऑर्डर दे दिया है।

रैली समीक्षा - नरेंद्र मोदी एट हैदराबाद विद यस वी कैन

भाजपा के संभावित नहीं, बल्‍कि पक्‍के प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार नरेंद्र मोदी ने आज हैदराबाद में एक रैली को संबोधन किया, कहा जा रहा था कि यह रैली आगामी लोक सभा चुनावों के लिए शुरू होने वाले अभियान का शंखनाद है।

 राजनेता के लिए रैलियां करना कोई बड़ी बात नहीं। रैलियां तो पहले से होती आ रही हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी की रैली को मीडिया काफी तरजीह दे रहा है, कारण कोई भी हो। संभावित अगले प्रधानमंत्री या पैसा। नरेंद्र मोदी की रैली का शुभारम्‍भ स्‍थानीय भाषा से हुआ, जो बड़ी बात नहीं, क्‍यूंकि इटली की मैडम हर बात हिन्‍दी में बोलती हैं, भले शब्‍द उनके अपने लिखे हुए न हों।

नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा का नारा इस्‍तेमाल किया, यैस वी कैन। इस बात से ज्‍यादा हैरान होने वाली बात नहीं, क्‍यूंकि नरेंद्र मोदी की ब्रांडिंग का जिम्‍मा उसी कंपनी के हाथों में है, जो बराक ओबामा को विश्‍वस्‍तरीय ब्रांड बना चुकी है, और जो आज भी अपनी गुणवत्‍ता साबित करने के लिए संघर्षरत है। ज्‍यादातर अमेरिकन का उस पर से भरोसा उठा चुका है। अफगानिस्‍तान से सेना वापसी, वॉल स्‍ट्रीट की दशा सुधारने, आतंकवाद के खिलाफ लड़ने जैसे मोर्चों पर ओबामा पूरी तरह असफल हैं।

विज्ञापन कंपनियों का काम होता है, उत्‍पाद को बाजार में पहचान दिलाना, उस पहचान को बनाए रखना शायद उत्‍पाद निर्माता के हाथ में होता है। विज्ञापन हमेशा दिल को लुभावने वाले बनाए जाते हैं, अगर वे आकर्षक न होंगे, तो ग्राहक नहीं जाएगा उसको खरीदने के लिए।

यस वी कैन पर एक बार फिर लौटता हूं, यह शब्‍द सुनने भर से अगर आपको लगता है कि बहुत बड़ा करिश्‍मा हो गया है तो हर रविवार आपके शहर में किसी न किसी एमएलएम, नेटवर्किंग कंपनी की बैठक आयोजित होती होगी, उसमें जाइए, इससे भी ज्‍यादा आपको मोटिवेशन का नशा पिला दिया जाएगा, लेकिन जब उतरेगा तो आप पहले से भी ज्‍यादा खुद को कमजोर पाएंगे।

नरेंद्र मोदी ने कहा, किसी भी सरकार का पहला मजहब होता है राष्‍ट्र, जबकि नरेंद्र मोदी ने तो इंडिया कहा, और सरकार का ग्रंथ होता है संविधान। मोदी की तैयारी बहुत सही थी, लेकिन अगर गुजरात के अंदर लोकायुक्‍त के लिए युद्ध न चल रहा होता तो। सुप्रीम कोर्ट तक जाने की क्‍या जरूरत थी, संविधान को मानते, और राज्‍य में लोकायुक्‍त को नियुक्‍त करते।

बीजिंग की तारीफ पर नरेंद्र मोदी ने एक नेता को निशाने पर लिया। किसी शहर या देश की तारीफ करना बुरी बात नहीं, लेकिन नरेंद्र मोदी खुद को भूल गए, जब वे पुणे में विद्यार्थियों को शिक्षा पर भाषण दे रहे थे तो उन्‍होंने भी चीन की तारीफ की थी, वहां के आंकड़े पेश किए थे, जो वहां की सरकारों के पास भी नहीं। हो सकता है अधिक काम और जिम्‍मेदारियों के चलते खुद की गलतियां याद न रहीं हो, जैसे आज विपक्ष में बैठी एनडीए को अपने कार्यकाल के दौरान हुए आतंकवादी हमले, पाकिस्‍तान से दोस्‍ताना संबंध याद नहीं रहे। और आरोपों से बचने के लिए कहते हैं, देश की जनता ने तब हम को नकार दिया था, मतलब गंगा नहा लेने से किए पाप धुल गए, तो चालीस साल के गुनाह तो कांग्रेस के भी धुल चुके हैं, जो आपके आने सत्‍ता से उतर गई थी। अगर आपकी भाषा में सत्‍ता से उतरना पाप धूलना होता है तो।

यह एक युवा रैली थी। उम्‍मीद थी संभावनाओं का माया जाल बुनने वाले नरेंद्र मोदी युवा पीढ़ी के लिए कुछ खास बात लेकर आने वाले हैं, लेकिन अफसोस के रैली में नरेंद्र मोदी ने सरकार विरोधी अख़बार का संपादकीय पन्‍ना ही पढ़ डाला। सरकार की बुराईयां तो अख़बारों में हर रोज सुर्खियां बनती हैं, उनको गिनाकर देश की जनता को लुभावना, ठगने जैसा लगा। मुझे लगता है कि आंध्र प्रदेश में अख़बार निकलते होंगे, हर रोज नेताओं के सरकार विरोधी बयानों को जगह मिलती होगी।

नरेंद्र मोदी को इस रैली में समस्‍याएं और कांग्रेस को नीचा दिखाने की बजाय अपने भीतर के लीडर की उन योजनाओं से अवगत करवाना चाहिए था, जिसको लेकर युवा पीढ़ी सोच सके कि नरेंद्र मोदी को वोट किया जाए। मंच पर ऊंचे सुर में बोलने से कुछ सच्‍चाईयां नहीं बदलती। शराब का नशा सुबह तक रहता है। नशा मत पिलाइए, कोई देश बदलने का सुझाव बतलाइए। वो कौन सी बातें हैं, जो देश को नये आयाम तक लेकर जा सकती हैं। नरेंद्र मोदी राष्‍ट्रवाद की बात कर रहे हैं, लेकिन उनकी सरकार की टशन हमेशा पड़ोसी राज्‍यों से चलती रहती है। वहां पर नरेंद्र मोदी राष्‍ट्रहित क्‍यूं नहीं देख पाते ? वहां पर एक क्षेत्रीय प्रतिनिधि का फर्ज ही अदा क्‍यूं करते हैं ?

सवाल बहुत हैं, लेकिन चलते चलते इतना कहूंगा कि नरेंद्र मोदी के पास 11 साल का अनुभव है, एक राज्‍य को चलाने का, वे संभावनाओं का खुला आसमान दिखाते हैं। उधर, राहुल गांधी के पास विरासत में मिली कांग्रेस की रियासत है, लेकिन वे सकारात्‍मकता की किताब को बीच में से पढ़ने की कोशिश करते हैं। दोनों राजनीति तो सकारात्‍मक सोच से कर रहे हैं, लेकिन कहीं कहीं उलझ जाते हैं।

आज की रैली एक राजनेता की रैली थी, नरेंद्र मोदी बतौर एक मार्गदर्शक, देश के प्रधानमंत्री पूरी तरह पिछड़ते नजर आए। 

आप अपनी राय जरूर रखें, ताकि रैली समीक्षा को समझने में मुझे और आसानी हो।

वॉट्सएप, फेसबुक और समाज

12 साल का रोहन फेसबुक पर खाता बनाता है। अपनी उंगलियों को मोबाइल पर तेज रफतार दौड़ाता है। एंड्रॉयड, विन्‍डोज, स्‍मार्ट फोन और ब्‍लैकबेरी के बिना जिन्‍दगी चलती नहीं। भारतीय रेलवे विभाग भले साधारण फोन से रेलवे टिकट कटवाने की व्‍यवस्‍था की तरफ बढ़ रहा हो, लेकिन भारतीय एक पीढ़ी हाईटेक फोनों की तरफ बढ़ रही है।

गेम्‍स, चैट और नेटसर्फिंग आज की युवा पीढ़ी की दिनचर्या का हिस्‍सा बन चुकी है। यह दिनचर्या उनको अजनबियों से जोड़ रही है और अपनों से तोड़ रही है। अंधेर कमरे में भी हल्‍की लाइटिंग रहती है, यह लाइटिंग किसी कम रोशनी वाले बल्‍ब की नहीं, बल्‍िक मोबाइल फोन की स्‍क्रीन से निकली रोशनी है।

आज युवा पीढ़ी कहीं पर भी हो, लेकिन उसकी नजर मोबाइल फोन की स्‍क्रीन पर रहती है। रतन टाटा, बिरला और अम्‍बानी से ज्‍यादा व्‍यस्‍त है, हमारी युवा पीढ़ी। सेक्‍सी, होट कैमेंट आज आम बात हो चली है। फेसबुक, वॉट्सएप्‍स के मालिक दिन प्रति दिन धनी हो रहे हैं। सीबीआई और आईबी के दस्‍तावेजों से भी ज्‍यादा आज की युवा पीढ़ी के मोबाइल कॅन्‍फीडेंशियल होते हैं। एक शादी समारोह में एक लड़की मेरा ध्‍यान अपनी ओर खींच रही थी, इसलिए नहीं कि वे दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की थी, बल्‍कि इसलिए उसका ध्‍यान शादी समारोह में कम मोबाइल पर ज्‍यादा था। उंगलियां मोबाइल की स्‍क्रीन पर इस तरह चल रही थीं, जैसे कचहरी में बैठे टाइपिस्‍ट बाबू की। हर सेकेंड पर रीप्‍लई करना आज आम बात हो गई लगता है।

सस्‍ते इंटरनेट पैकेजों ने हर किसी की आदत बिगाड़ दी है। मिलने के लिए घर पर आया दोस्‍त, अगर मोबाइल फोन पर उंगलियां चलाता रहे, और बातों में सिर्फ औपरचारिक तौर पर सिर हिलाए तो गुस्‍सा किसी को भी आ जाएगा, पर ऐसे वक्‍त पर गुस्‍से को काबू रखने वाले को महात्‍मा गांधी कह सकते हैं।

अगर हमारा कोई मित्र दोस्‍त फेसबुक पर नहीं तो हम उसको सलाह देते हैं फेसबुक पर आ जा, लेकिन हम एक बार भी नहीं सोचते कि वहां पर हजार का आंकड़ा पार कर चुके लोगों से हमने कितनों के साथ बात की। हम फोटो शेयर कर देते हैं, वहां से कुछ लाइक आ जाते हैं। हम खुश होते हैं।

जब हमारी जिन्‍दगी में फेसबुक, स्‍मार्टफोन आदि इतना घुस चुके हैं, वहां पर अदालती आदेश क्‍या मायने रखता है, जिसमें कहा गया हो कि 13 से कम उम्र के बच्‍चों को सोशल मीडिया पर रोक होनी चाहिए। वे तो बहुत पहले से है, लेकिन वहां पर उम्र का प्रमाण पत्र मांगता कौन है, यहां तो भारत के सरकारी कार्यालय नहीं, जहां के कर्मचारी अपनी जेब गर्म करने या कायदे कानून का हवाला देते हुए आपके पैदा होने के साबूत मांग मांगकर आपको मरने जैसा कर देंगे।

यकीनन, इसका बढ़ता क्रेज घातक है, लेकिन इसको रोकने वाले अभिभावक, खुद इसका शिकार हैं। सिने दुनिया ने आम दुनिया की युवा पीढ़ी को अति बिंदास बना दिया है। एक घटनाक्रम की बात करें तो एक लड़की अपने फेसबुक खाते से एक अन्‍य दोस्‍त के साथ फोटो शेयर करती है, और कहती हैं भैया कैसी लगी, जो पूरी तरह बेलिबास पिक्‍चर है, और हैरानी की बात यह है कि लड़की की उम्र 14 साल भी नहीं है।

फेसबुक पर खाता बनाने के चक्‍कर में बच्‍चे सबसे पहला झूठ बोलते हैं उम्र के संबंध में। वे अन्‍य फेस के सहारे फेसबुक पर आते हैं। अपनों के अधिक बेगानों से दोस्‍ती करना पसंद करते हैं। जब अधिकतर बच्‍चे घरों में सुरक्षित नहीं, तो साइबर की दुनिया में उनके सुरक्षित होने की गारंटी कौन देगा।

बिहार को किस की नजर लग गई

आधुनिकता के इस युग में नजर कोई मायने नहीं रखती। नजर से तात्पर्य, दृष्टि नहीं, अंधविश्‍वास है। कहते सुना होगा कि नजर लग गई। नजर लगना, बुरी बला का साया पड़ना। अच्‍छा होते होते एकदम बुरा होने लगना। जब सब रास्‍ते बंद हो जाते हैं तो भारतीय लोग अपने पुराने रीति रिवाजों के ढर्रे पर आ जाते हैं, और सोचने लगते हैं कि इसके पीछे कुछ न कुछ है, जो अंधविश्‍वास से जुड़ा हुआ है।

सड़कों पर चलने वाले ट्रकों के पीछे बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला, यह पंक्‍ति आम मिल जाएगी, हालांकि बुरी नजर वाले का मुंह कभी काला नहीं होता, जो लोग पैदाइशी काले होते हैं, उनके दिल और उनकी नजर भी अन्‍य लोगों की तरह पाक साफ होती है। काला रंग, तो ग्रंथों की शान है। काले रंग की  फकीर कंबली ओढ़ते हैं। कोर्ट में वकील काले रंग का कोर्ट पहनता है। आंखों में डालने वाला काजल काला होता है। कुछ लोग तो बुरी नजर से बचाने के लिए घर की छत या मुख्‍यद्वार पर काला घड़ा रखते हैं।

शायद बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार अपने सुशासन को बचाए रखने के लिए बिहार के मुख्‍यद्वार पर काले घड़े को रखने भूल गए। मुझे लगता है कि बिहार को किसी की नजर लग गई है। बिहार में सुशासन लौट रहा था, भाजपा जनता दल यूनाइटेड गठबंधन सरकार निरंतर सत्‍ता में बनी हुई थी। अचानक इस साल बिहार में दोनों का गठबंधन टूट गया, और सत्‍ता केवल नीतीश्‍ा कुमार की अगुवाई वाली पार्टी के हाथ में रह गई। इस ब्रेकअप से जिगरी दोस्‍त, दुश्‍मन बन गए। जो कल तक हाथ मिलाते थे, ब्रेकअप के बाद एक दूसरे से हाथापाई करते नजर आए। यह मामला ठंडा पड़ता कि महाबोधि मंदिर को उग्र लोगों ने निशाना बना लिया। भली हो राम की, कोई बड़ा हादसा होने से टल गया। वरना, जितने बम महाबोधि मंदिर में फटे, उतने बम तो लाशों के ढेर लगा सकते थे।

महाबोधि मंदिर के हमले से तो बच निकले, लेकिन छपरा में मिड डे मील के कारण जिन्‍दगियां बचाने से मात खा गए। यहां एक स्‍कूल में भोजन खाने से लगभग दो दर्जन के करीब बच्‍चे अपनी जिन्‍दगी से हाथ धो बैठे, और पीछे छोड़ गए मातम, कुछ सवाल और चर्चाएं ।

छपरा के दर्द से बिहार उभरता कि इस सोमवार को भारतीय सीमा पर आतंकवादियों ने घातक लगाकर भारत के पांच जवानों को शहीद कर दिया, लेकिन इसमें भी चार जवान बिहार के थे, जो शहीद हुए। बिहार को एक बार फिर पीड़ा से गुजरना पड़ा।

एक हादसे के बाद एक बिहार को कष्‍ट, दर्द दे रहे हैं। ऐसे में यकीनन एक सवाल तो आता है कि आखिर बिहार को किस की नजर लग गई। कोई तो जाओ, मिर्च बिहार के ऊपर से घूमाकर चुल्‍हे में जला डालो, कुछ अगरबत्‍तियां बिहार के सिर से घूमाकर मुख्‍य द्वार पर लगा दीजिए, शायद बुरी भलाओं का साया बिहार से टल जाए, कहते हैं कि बुरी नजर तो पत्‍थरों को भी चीर देती है। हलका सा काला काजल का टिक्‍का लगा लें, शायद किसी ने चांद पर भी दाग इसलिए छोड़ दिया था कि इसको किसी की नजर न लगे, वरना चमकते हुए चांद में काला सा धब्‍बा क्‍यूं नजर आता।




सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को 'पत्र' लिखा

सोनिया गांधी, संयुक्‍त प्रगतिशील गठबंधन की चेयरपर्सन ने देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखा, लेकिन यह कोई प्रेम पत्र नहीं था। यह पत्र आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्‍ति नागपाल के निलम्‍बन को लेकर लिखा गया, इस पत्र में सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह से आग्रह किया, 'सरकार आईएएस अधिकारी के साथ किसी तरह की नइंसाफी न होने दे, और सरकार ने अब तक इस मामले में क्‍या काईवाई की उसकी जानकारी मांगी।'

जब सोनिया गांधी के पत्र की ख़बर सामने आई तो दिमाग का चक्‍का घूमा। खयाल आया कि आजकल सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बीच पति पत्‍नि वाला मनमुटाव हो गया क्‍या ? जैसे टीवी सीरियलों में होता है, जब पति पत्‍नि में अनबन हो जाती है तो टि्वटर नमूना पर्चियों का सहारा लेते हैं एक दूसरे को अपनी बात कहने के लिए, वैसे तो साधारण परिस्‍थितियों में रिमोट होम मिनिस्‍टर के हाथ में ही होता है, होम मिनिस्‍टर कहने भर से काम चल जाएगा, मुझे यकीन है।

सोनिया गांधी, जिन पर अक्‍सर आरोप लगता है कि संप्रग सरकार को मनमोहन सिंह नहीं, स्‍वयं सोनिया गांधी चलाती हैं, शायद वैसे ही जैसे बड़े बड़े अधिकारी कार की पिछली सीट पर बैठकर कार चालक को दिशा बताते हुए गाड़ी चलाते रहने का आदेश देते हैं, लेकिन ऐसा मामला अभी तक सामने नहीं आया, जिसमें कार चालक को किसी मालिकन या मालिक ने चिट पर लिखकर गाड़ी चलाने का आदेश दिया हो। हां, तब ऐसा जरूरत होता है, जब मालिकन या मालिक किसी अन्‍य काम में व्‍यस्‍त हों, और ड्राइवर को किसी जगह भेजना हो।

ऐसे में सवाल उठता है कि सोनिया गांधी आजकल कहां व्‍यस्‍त हैं, और मनमोहन सिंह, जोकि देश के प्रधानमंत्री हैं, को अकेले छोड़ दिया, जब लोक सभा चुनाव सिर पर हैं, और विरोधी पार्टियां दुष्‍प्रचार के लिए छोटे छोटे बहाने ढूंढ रही हैं। राहुल गांधी भी लापता हैं। ऐसे में तार से काम चलाया जा रहा है। दुर्गा शक्‍ति की गूंज जब टेलीविजन वालों ने पूरे देश में फैला दी, तब सोनिया गांधी की आंख खुली, शायद गलती से कोई न्‍यज चैनल रिमोट दबाते दबाते चल गया होगा, या दरवाजे के नीचे से कटिंग रहित समाचार पत्र पहुंच गया होगा।

चलो अच्‍छा है। सोनिया गांधी को इस बहाने लिखने का मौका तो मिला। चाहे मनमोहन सिंह को निर्देशित करता पत्र ही सही, मीडिया वाले अब रिमोट भूल पत्र संचालित प्रधानमंत्री कह सकते हैं। अगर सोनिया गांधी ने ऐसे कदम पहले उठा लिए होते तो शायद पिछले महीने बंद होने वाली टेलीग्राम सेवा बच जाती। देशभर में 14 जुलाई रात 9 बजे से 160 साल पुरानी टेलीग्राम  सेवा बंद हो गई।

सोनिया गांधी ने पत्र लिखा तो सबसे बड़ा दुख समाजवादी पार्टी को हुआ, जो केवल नाम से समाजवादी है, चरित्र से पूरी समझौतावादी। सोनिया गांधी तो अच्‍छी तरह जानती हैं। मामला कोई भी हो, समाजवादी पार्टी का एक ही नारा रहता है, हमारा काम करोगे तो समर्थन मिलेगा, वरना आपका हर बिल जन विरोधी होता है।

सीबीआई की दुर्दशा के पीछे जितनी कांग्रेस सरकार जिम्‍मेदार है, उससे कई गुना तो समाजवादी पार्टी जिम्‍मेदार है, जो संप्रग सरकार पर दबाव बनाकर, सीबीआई की गरिमा को चोटिल कर देती है। सुनने में आया है कि सीबीआई मुलायम सिंह पर लगे हैसियत से ज्‍यादा संपत्‍ति बनाने के मामले में चार बार आगे पीछे हो चुकी है। अब फिर चुनाव सिर पर हैं, अब फिर बैकफुट पर जाने की तैयारी है। सीबीआई वाला मामला तो ठीक है, लेकिन सोनिया गांधी के पत्र पर पहली प्रतिक्रिया इस पार्टी की आई, और समाजवादी पार्टी के नेता नरेश कुमार अग्रवाल ने सोनिया गांधी को दो पत्र और लिखने की सिफारिश की है, लेकिन यह पत्र दुर्गाशक्‍ति नागपाल निलम्‍बन के संबंध में नहीं, बल्‍कि आईएएस खेमका व राजस्‍थान के दो अधिकारियों के साथ हुई नइंसाफी के लिए। वहीं, भाजपा की मीनाक्षी लेखी ने कहा, ‘अगर सोनिया गांधी को दुर्गा नागपाल के निलंबन की इतनी चिंता है, तो उन्हें आईएएस अधिकारी अशोक खेमका के मामले पर भी गौर करना चाहिए, जिसका राबर्ट वाड्रा के भूमि सौदे की जांच करने पर तबादला किया गया।’  खेमका का तो 44 बार तबादला किया जा चुका है।  

सोनिया गांधी ने पत्र पर उठते हुए सवालों और विवादों को देखते हुए रविवार, 4 अगस्‍त 2013 को प्रण तो किया होगा कि अपने रिमोट में सैल डाल दिए जाएं तो अच्‍छा होगा, वरना इस बार की तरह घर की बात हर बात बाहर चली जाएगी।