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राम मंदिर के बहाने, यूं ही कुछ चलते चलते

राममंदिर, इसको अगर थोड़ा सा तोड़कर पढ़ा जाए तो शायद इसका अर्थ कुछ ऐसा होगा। राम+ मन+ अंदर। राम तो कण कण में बसता है, उसको कहां जरूरत है किस एक जगह बंधकर बैठने की।

राम मंदिर की बात करने वाले अगर अपने राम को खुश देखना चाहते हैं तो उसकी प्रजा को पेट भर भोजन दें। इंटरनेट नहीं, बिजली सुविधा दें। उनके गलों को तर करें, उनके खेतों तक पानी पहुंचाने पर माथा पच्‍ची करें। इंटरनेट तो आ ही जाएगा, जब पैसे आएंगे। वैसे भी फेसबुक वाला फ्री में नेट देने के लिए कोशिश कर रहा है, वो कामयाब हो जाएगा। आपको जरूरत नहीं। 

भावनगर जाते समय मैंने बहुत खूबसूरत मंदिर देखे, मुझे लगता है कि जितना पैसा गुजरात में मंदिर निर्माण पर खर्च होता है, उतना किसी अन्‍य जगह पर नहीं होता। वहां पर अभी तीन से चार मंदिरों का निर्माण जारी था, जो जल्‍द बनकर तैयार होंगे।

गुजरात में स्‍वामिनारायण भगवान के मंदिर, जैनों के मंदिर, अलग अलग कुल देवियों के मंदिर। शायद ही कोई ऐसा मार्ग हो जहां आपको मंदिर न मिले। मंदिर तो स्‍वयं लोग बना देंगे, जैसा आपने कल्‍पना भी नहीं की, लेकिन पहले उनकी पेट की भूख को तो खत्‍म कर दें। पहले उनको चांद तो चांद नजर आने दें। चांद में उनको महबूब, मामा तो दिखने दें।

हम ईसाईयों पर आरोप लगाते हैं उन्‍होंने हिन्‍दुओं को पैसे देकर धर्म परिवर्तन कर दिया। पैसे आज जरूरत हैं, जिसको नकारा नहीं जा सकता, मौत से बेहतर व्‍यक्‍ति किसी धर्म की छांव में बैठना चाहेगा, अगर कुछ दिन बदले में जीना मिलता हो।

मोदी के सबसे बड़े करीबी बनकर उभरे डॉक्‍टर सुब्रमण्‍य स्‍वामी कहते हैं कि हम को कोई एतराज नहीं, मुस्‍लिम इस देश में रहें, वो हिन्‍दु को स्‍वीकार लें, क्‍यूंकि उनके वंशज हिन्‍दु थे, लेकिन सवाल यह है कि धर्म स्‍वीकार लेने से क्‍या फर्क पड़ता है, अगर भीतर न बदला जा सका।

गजनबी के जब हमले होते थे, कुछ कमजोर दिल वाले अपनी जान बचाने के लिए धर्म कबूलते होंगे। बदले में उनकी जान बची होगी। धीरे धीरे उनका वो ही धर्म हो गया और उसको मानने लगे।

जैसे आज कल नरेंद्र मोदी की हवाओं को देखते हुए कुछ कांग्रेस बीजेपी में आ गए, तो वो बीजेपी के हो गए। अगर कल को कांग्रेस वाले कहें, उनको कांग्रेस का धर्म ही कबूलना चाहिए, क्‍यूंकि उनकी पैदाइश कांग्रेस से हुई है तो, नहीं नहीं अब दुहाई होगी धर्म व राजनीति दोनों में फर्क है।

आप अपने मंदिरों व धर्म को इतना उदार बना दीजिए कि लोगों के कदम खुद ब खुद आपके मंदिरों की तरफ चल पड़ें। मैंने बहुत सारे अंग्रेजों को हिन्‍दु चोले पहनते देखा है, वो खुशी से पहनते हैं। उनको आनंद आता है। उनके चेहरों पर अद्भुत आनंद होता है। उनको लगता है कि उनके जीवन मेंं कुछ महत्‍वपूर्ण घटा है।

लेकिन कुछ कट्टर हिन्‍दु घटाने की कोशिश करना चाहते हैं, घटना और घटाने में अंतर है। जबरदस्‍ती बलात्‍कार हो सकता है, प्‍यार नहीं। प्‍यार के लिए शरीर के भीतर की आत्‍मा को जीतना पड़ता है।

अगर भीतर उतर गए, तो बाहरी चोले से अधिक अंतर नहीं पड़ता। मगर देश का दुर्भाग्‍य है कि आज के अध्‍यात्‍म गुरू अपने राह से भटक चुके हैं। श्री गुरू नानक देव जी एक गांव में गए, उन्‍होंने गरीब लालो के घर का खाना खाया, लेकिन अमीर मालिक भागो का खाना वापिस कर दिया। गुरूजी ने कहा कि मालिक तुम्‍हारा खाना मेहनत के तैयार नहीं हुआ, बेईमानी, गरीबों के खून पसीने से लथपथ है।

मगर आज हमारे धर्म गुरू भारत में शराब बेचने वाले, नंगे कलेंडर बेचने वाले, देश का धन लुटाने वाले नेतायों के रहमोकर्म पर अधिक पलते हैं। उनके हवाई जहाजों में घूमते हैं। अध्‍यात्‍म का गिरता स्‍तर हिन्‍दुस्‍तान के लिए घातक है, न कि किसी ढांचे का गिरना।

राम मंदिर, राम तो मन के अंदर है। उसके द्वार खो दें, सब ठीक हो जाएगा। गजनबी क्‍या लेकर गया यहां से, क्‍या सिकंदर लेकर गया। सिकंदर को भारत में न घुसने देने वाले पोरस को कौन याद करता है, भारत में, क्‍यूंकि वो पाकिस्‍तान में छूट गया।

नरफत पाकिस्‍तान के खिलाफ कट्टर पंथियों के खिलाफ होनी चाहिए। आवाज में गद्दारों का नाम होना चाहिए, पूरे समुदाय का नहीं। आज मंदिर मजिस्‍द चर्चों के बीच की लड़ाई से ऊपर उठकर उन युवायों के हितों के बारे में सोचना होगा, जो नेतायों से बहुत कदम आगे हैं। जो विदेशी जीवन जीने की ललक रखते हैं, जिनको हम ने विदेशी सिनेमे के जरिए वहां के रहन सहन से तो रूबरू करवाया दिया, लेकिन वैसा कुछ भारत में बना न सके, बनाते हैं तो भारत के परंपरागत ढांचे को चोट पहुंचती है।

Express Adda : राहुल गांधी के वक्‍तव्‍य - 2013

 साल 2013 में राहुल गांधी ने कब कहां, क्‍या कहा, जानिये, इस पोस्‍ट में।

राहुल गांधी  ने कहा, "कांग्रेस पार्टी दुनिया का सबसे बड़ा परिवार है लेकिन इसमें बदलाव की ज़रूरत है। मगर सोच-समझ कर। सबको एक साथ लेकर बदलाव की बात करनी है और बदलाव लाना है। प्यार से, सोचसमझ के साथ, सबकी आवाज़ को सुनकर आगे बढ़ना है। वो सबको एक ही आंख से एक ही तरीके से देखेंगे चाहे वो युवा हो, कांग्रेस कार्यकर्ता हो, बुजुर्ग हो या फिर महिला हो।'' 
राहल ने कहा, " आज सुबह मैं चार बजे ही उठ गया और बालकनी में गया। सोचा कि मेरे कंधे पर अब बड़ी जिम्मेदारी है। अंधेरा था, ठंड थी। मैंने सोचा कि आज मैं वो नहीं कहूंगा जो लोग सुनना चाहते हैं। आज मैं वो कहूंगा जो मैं महसूस करता हूं।" राहुल बोले, "पिछली रात मेरी मां मेरे पास आई और रो पड़ी क्योंकि वो जानती हैं कि सत्ता ज़हर की तरह होती है। सत्ता क्या करती है। इसलिए हमें शक्ति का इस्तेमाल लोगों को सबल बनाने के लिए करना है।"
रविवार, 20 जनवरी 2013

राहुल गांधी ने कहा, ''डरने की नहीं बल्कि लड़ने की जरूरत है ताकि सच को सामने लाया जा सके। सोच को बदलने और सकारात्मक सोच के साथ देश में बदलाव लाने की जरूरत है।''
मंगलवार, 22 जुलाई, 2013

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि गरीबी का मतलब भोजन, पैसे या अन्य भौतिक चीजों की कमी नहीं है बल्कि ये एक मनोदशा है.
मंगलवार, 6 अगस्त, 2013

राहुल गांधी ने कहा, 'मेरा अपना कोई सपना नहीं है। मैं अपने सपनों को कुचलना चाहता हूं और आपके सपनों को अपना बनाना चाहता हूं।'
बुधवार, 11 सितंबर, 2013

महाराष्‍ट्र में संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा, 'अगर कांग्रेस अपने दम पर जीतती है तो उसको एनसीपी जैसी सहयोगी पार्टियों के सहारे की जरूरत नहीं पड़ेगी''।
बुधवार, 25 सितंबर, 2013

जगदलपुर रैली में राहुल गांधी ने कहा, ''विपक्ष की सोच है कि एक या दो व्यक्ति देश चला सकते हैं जबकि कांग्रेस पार्टी आम आदमी को साथ लेकर चलती है।''
शुक्रवार, 26 सितंबर, 2013

राहुल गांधी ने कहा कि दागी नेताओं संबंधी सरकार द्वारा लाया गया अध्यादेश पूरी तरह बकवास है और इसे फाड़कर फेंक देना चाहिए।
शुक्रवार, 27 सितंबर, 2013

राहुल ने मनमोहन को लिखा है कि 'आप जानते हैं कि मेरे मन में आपके लिए बहुत ज्यादा सम्मान है। मैं ज्ञान के लिए आप ही की तरफ देखता हूं। मुश्किल हालात में जिस तरह से आप को नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं वो सराहनीय है और मैं इसका कायल हूं। उम्मीद करता हूं कि आप इस विवादित मुद्दे पर मेरे दृढ़ विश्वास को भी समझेंगे।
शनिवार, 28 सितंबर 2013


राहुल गांधी ने कहा, 'मेरी मां ने मुझे बताया कि मेरे शब्द ज्यादा कड़े थे। मैं मानता हूं कि अध्यादेश को बकवास नहीं बताना चाहिए था। मेरी भावनाएं सही थीं, लेकिन शब्द ज्यादा कड़े हो गए थे।'
गुरुवार। 2 अक्‍टूबर 2013।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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First Look : फ्रैंकफर्ट में नई कारों का जमघट

रेनॉल्‍ट की इल्‍केट्रिक कार रेनॉल्‍ट ट्विजी
जर्मन के पांचवें सबसे बड़े शहर फ्रैंकफर्ट में इंटरनेशनल ऑटोमोबाइल एग्‍जीबिशन शुरू होने में केवल दो दिन शेष हैं।फ्रैंकफर्ट में आयोजित होने वाले इस ऑटो शो से पहले दस सितंबर को मीडिया के लिए प्रीव्‍यू डे का आयोजन किया गया, जहां पर दुनिया भर के कार निर्माताओं ने अपने नये मॉडल से पर्दा उठाया।

शरीर की कुल हड्डियों से मात्र एक कम पर्यटन स्‍थलों को अपनी बांहों में समेटे हुए शहर फ्रैंकफर्ट में 14 सितंबर से 22 सितंबर तक इस ऑटो शो का आयोजन किया जाएगा। 
जर्मन कार निर्माता वॉक्‍सवेगन कंपनी की इलेक्‍ट्रिक कार ई अप।

जर्मनी में शुरू हुए इंटरनेशनल मोटर शो में रेनॉल्‍ट स्‍पार्क एसआरटी 01ई एफआईए फॉर्मूला ई रेस कार की पहली झलक।


बुगती का नया मॉडल जीन बुगती का

ऑडी क्‍वाट्रो स्‍पोर्ट कन्‍सेप्‍ट हाईब्रिड कार

फेरारी के चेयरमैन लूका कॉर्डेरो दी मोंटेजेमोलो फेरारी का नया मॉडल फेरारी 458 प्रस्‍तुत करते हुए।

इंटरनेशनल ऑटोमोबाइल प्रदर्शनी में इंफिनिटी क्‍यू 30 कन्‍सेप्‍ट कार की पहली झलक।

बीएमडब्‍ल्‍यू आई8 को प्रस्‍तुत करते हुए बीएमडब्‍ल्‍यू सीईओ

कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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Ad Review : 'इंडिया वांट्स टू नाउ' इमेजिंग

फिल्‍मों का रिव्‍यू होता था। किताबों का रिव्‍यू होता था। फिर ट्रेलर और टीज़र का भी रिव्‍यू होने लगा। बहुत सारे विज्ञापन दिल को छू जाते हैं। कल Flipkart  का नया विज्ञापन देखने बाद खयाल आया, क्‍यूं न विज्ञापन की भी समीक्षा की जाए।

आज के लोग कुछ नया करना चाहते हैं। हर चीज के साथ नये नये अनुभव करना चाहते हैं। अच्‍छी बात है। कभी कभी अनुभव कड़वे तो कभी कभी शहद से भी मीठे साबित होते हैं। आप ब्रुश कर रहे हैं अचानक एक मीडिया कर्मी आपके घर में घुसता है, और पूछता है कि आपके टूथपेस्‍ट में नमक है। फिर एक और विज्ञापन आपको देखने को मिला होगा तोते को डेंडरफ वाला। दोनों में मीडिया की धज्‍जियां उड़ाई गई थी। दोनों में एंटरटेनमेंट या अपील जैसी कोई बात नहीं थी।

लेकिन Flipkart  का नया विज्ञापन ख़बरी चैनलों पर चलने वाले डिबेट शो पर आधारित एक इमेजिंग विज्ञापन है। यह विज्ञापन अंग्रेजी चैनल के बेहद लोकप्रिय और ब्रांड बन चुके अर्नब गोस्वामी को ध्‍यान में रख कर बनाया गया है। विज्ञापन हिन्‍दी चैनल को भी ध्‍यान में रखकर बनाया जा सकता था, लेकिन विज्ञापन कंपनी का टार्गेट हिंग्‍लिश यूथ है। जो थोड़ी हिन्‍दी और इंग्‍लिश जानता है। विज्ञापन में बच्‍चों को लिया गया है, जिन्‍होंने बेहद बेहतरीन तरीके से अर्नब गोस्‍वामी और अन्‍य गेस्‍टों की भूमिका निभाई। 45 सेकेंड का विज्ञापन किसी तीन घंटे लम्‍बी कॉमेडी से बेहतर लगता है। बच्‍चों ने ख़बरिया चैनलों के एंकरों से भी बेहतर काम कर दिखाया है। यकीनन यह विज्ञापन फिल्‍पकार्ट की कमाई में इजाफा करने में बेहतर भूमिका निभायेगा। फिल्‍पकार्ट के इस नये विज्ञापन को Happy Creative Services की ओर से तैयार किया गया है। देखिये और आनंद लीजिए।

 



कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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वेयर इज माय नॉबेल प्राइज

 व्‍हाइट हाउस के रोज गॉर्डन से....... हमने बहुत सोच समझ कर फैसला लिया है। सीरिया में जो हो रहा है वे बहुत गलत है। हमको जल्‍द से जल्‍द सीरिया पर हमला करना होगा। अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा बोल रहे हैं।

 
ट्रिंग......... ट्रिंग......... ट्रिंग......... ट्रिंग......... ट्रिंग......... ट्रिंग......... ट्रिंग......... ट्रिंग......... ट्रिंग.........ट्रिंग......... हेल्‍लो.... हेल्‍लो.... कौन है वहां ? भाषण की समाप्‍ति के बाद ऑफिस का फोन उठाते हुए ओबामा।

खाद्य सामग्री को रसद कहते हैं.....इस ना चीज को बशर अल असद कहते हैं। पहचाना। आगे से आवाज आती है। गुस्‍से में ओबामा चिल्‍लाते हैं....कुत्‍ते मैं तेरा खून पी जाऊंगा।

आगे से शांत आवाज आती है.... तू और कर भी क्‍या सकता है, आदिवासी इलाकों में कीड़े मकौड़े खाकर राष्‍ट्रपति की कुर्सी तक पहुंचे दो चेहरे इंसान, खून पीना तो तेरा बचपन का शौक है..... पीजे, बर्गर तो तुम को राष्‍ट्रपति बनने के बाद मिले।

गुस्‍से में लाल पीले ओबामा ताव में आकर..... बे गैरत.. जुबान को लगाम दे..वरना तेरे शरीर में इतने छेद करूंगा कि तू कंफ्यूज हो जाएगा..... सांस कहां से लूं.... और .... कहां से.***.. दबंग पांडे के स्‍टाइल में धमकाते हैं।

आगे से जवाब आता है..... मां ने नाम ओ (Obama) से क्‍या रख दिया .... खुद को ओ सामा बिन लादेन समझने लग गया। बहूत अच्‍छा।

थोड़े ठंडे हुए नरम आवाज में ओबामा बोलते हैं ..... शायद इराक टू देखने का बहुत शौक चढ़ा है, तुम को असद। शायद तुम वर्ल्‍ड सेंटर टॉवर का पहला पार्ट  देखना भूल गए.... प्‍यारे ओबामा चुटकी लेते हुए असद बोले।

जितना खुश होना है ..... हो ले बेटा .... बहुत जल्‍द तेरा नम्‍बर है ..... क्‍यूंकि .... एक बार जब मैं कोई कॉमिटमेंट कर लेता हूं... तो फिर मैं अपनी भी नहीं सुनता .......... ओबामा ने ताव में आते हुए जोरदार शॉर्ट मारा।

तभी त..........ओ ............ हमले के लिए संसदीय मोहर की जरूरत पड़ रही है। चुटकी लेते हुए असद ने कहा।
क्षुब्‍ध होकर ओबामा फोन नीचे रखने वाले थे कि सामने एक आवाज आई ...... फोन का रिसीवर नीचे मत रखना ......... जब तक रखने के लिए कहा न जाये .......... क्‍यूंकि यह फोन असद का नहीं .............. स्‍नोडेन का है ............... नाम तो याद होगा ........ प्‍यारे ओबामा ..................।

रख तेरी तो ..... परेशान होते हुए चिढ़चिढ़े मिजाज में ओबामा चीखे।

हा ... हा ... हा ... हा ...  हा ... स्‍नोडेन खुश हुआ।

दुखी ओबामा ऑफिस से बाहर निकल रहे थे कि जॉर्ज बुश से टकरा गए ...... जिनके हाथ में एक तख्‍ती थी .... जिस पर लिखा था ........ वेयर इज माय नॉबेल प्राइज ..........।





 
Thanks Snowden

सीटी स्‍केन रूम है या फन पार्क

न्‍यूयॉर्क के सबसे बड़े बच्‍चों के अस्‍पताल के सीटी स्‍कैन रूम पहुंचते ही बच्‍चे अलग अनुभव करेंगे। सीटी स्‍कैन करवाते उनको अब पहले से कम डर लगने की संभावना है। दरअसल, मॉर्गन स्‍टैनले चिल्‍ड्रेन्‍स हॉस्‍पिटल प्रबंधन ने अपने सिटी स्‍कैन रूम को समुद्री लुटेरों के थीम वाले वार्ड बदल दिया है।



इसके बदलाव को लेकर प्रबंधन का कहना है कि ऐसा इसलिए किया गया है ताकि बच्‍चे स्‍केनिंग के दौरान इस बात से न डरे कि वे अस्‍पताल के किसी वार्ड में खड़े हैं। इसके अलावा एक लम्‍बे अध्‍ययन के बाद  अस्‍पताल प्रबंधन ने जेई के साथ मिलकर एक ऐसी मशीन तैयार करवाई और यहां स्‍थपित की, जो पहले वाली मशीन के मुकाबले बच्‍चों के लिए कम नुकसानदेह साबित हो।
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दरअसल, एक अध्‍ययन के तहत प्रबंधन ने महसूस किया था कि सीटी स्‍कैन मशीन से निकलने वाला रेडिएशन बच्‍चों पर बुरा प्रभाव डालता है। इस अस्‍पताल में नवजात शिशुओं से लेकर 21 साल तक के युवाओं का सीटी स्‍केन किया जाता है।

Image :  Buzz Feed

It's Fake News - इंजी. छात्राओं के पेपर साहित्‍यक लाइबेरी में रखे जाएंगे

गुजरात यूनिवर्सिटी ने फैसला किया है कि वे इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे 700 छात्रों में से कुछ छात्रों के पेपर साहित्‍यक लाइबेरी में भेजे जाएंगे। इसके लिए बकायदा समाचार पत्रों व अन्‍य साधनों के जरिये आवेदन मांगे जाएंगे।

गुजरात यूनिवर्सिटी के अधिकारियों ने पिछले दिनों एक मीडिया रिपोर्ट में खुलासा किया है कि इंजीनियरिंग कर रहे छात्र बहुत होशियार हैं, लेकिन फिर भी पेपर पास नहीं कर पा रहे, क्‍यूंकि उनको साहित्‍य का कीड़ा काट चुका है। छात्र इतने प्रतिभाशाली हैं कि वे इंजीनियरिंग पेपर में पूछे गए सवालों के जवाब अपनी निजी कहानियों, कविताओं के जरिये दे रहे हैं।

इसके साथ यूनिवर्सिटी ने चेताया कि छात्रों के पास अपना हुनर निखारने के लिए केवल 2015 तक का समय है, उसके बाद उनको साबित करने के लिए अन्‍य मौका नहीं दिया जाएगा। यूनिवर्सिटी को उम्‍मीद है कि अगले दो सालों में और बेहतरीन साहित्‍य कला कृतियां मिलेगीं।


दीपिका, क्‍या देख रहे हो ? शाह रुख खान, कुछ नहीं, देख रहा हूं, इतनी बड़ी हिट के बाद भी कोई निर्माता निर्देशक साइन करने क्‍यूं नहीं आया। दीपिका, अरे बुद्धू, निर्माता निर्देशक हैं, वे दर्शक थोड़ी, जो आंकड़े देख देखकर फिल्‍म देखने आते रहेंगे। #chennaiexpress




जब मैंने अमेरिका की कमान संभाली थी, मुझे पता है तब भारतीय मीडिया ने उस ख़बर को बड़ी शिद्दत से पेश किया था, जिसमें मैंने कहा था, मैं महात्‍मा गांधी से प्रभावित हूं। यकीनन मैं महात्‍मा गांधी से प्रभावित हूं, लेकिन मेरे गाल पर किसी ने थप्‍पड़ नहीं मारा, और मैं अमेरिकी हूं, जिस पर खुद अमेरिका यकीनन नहीं कर सकता, तो विश्‍व को करने की जरूरत क्‍या पड़ी है। आज मुझे लगता है कि नये हथियारों के लिए टेस्‍टिंग के लिए सीरिया सबसे बेहतर स्‍थान। हमें तो बस बहाना चाहिए, आप तो जानते ही हैं। अगर हम ऐसा न करें तो हमारे बनाए हथियार कौन खरीदेगा, आपको जानकार हैरानी होगी, हम तालिबान को हथियार भी देते हैं, और उन पर हमले भी करते हैं। मेरी तस्‍वीर में आपको दो चेहरे नजर आ रहे हैं, मैं बिल्‍कुल ऐसा ही हूं, वैसे आपके देश के राजनेता भी ऐसे ही हैं, यकीन नहीं होता न।  #syria

पाकिस्‍तान में आरटीआई नियम लाने पर विचार, जानकारियां कैसी होंगी, उम्‍मीद अनुसार, आने वाले समय में आतंकवादी शिविर में कितनी सीट होंगी, ट्रेनिंग के बाद कितने युवाओं को मिला रोजगार, भारत पर हमले के लिए भेजे जाने वाले आतंकवादियों को अलग से पे तो नहीं करना पड़ता, क्‍यूंकि वहां मेहमान निवाजी अच्छी है। एक सूचना पहले जारी की जाएगी, ओसामा बिन लादेन की मौत संबंधी पाकिस्‍तान में तो कोई रिकॉर्ड दर्ज नहीं, अगर चाहे तो हम आपको ब्रिटिश मीडिया की कटिंग उपलब्‍ध करवा सकते हैं, क्‍यूंकि वहां के मीडिया में ओसामा के मरने संबंधी की कई बार ख़बरें छपी हैं। ताजा समाचार भी आपको भेजते रहेंगे, बस इसके लिए आप पाकिस्‍तान से बाहर का पता दर्ज करवाएं। #RTI #in #pakistan

भारत सरकार और डॉलर में होगी सीधी वार्ता

डॉलर द्वारा भारतीय रुपये पर हो रहे निरंतर हमलों से सरकार पूरी तरह चिंतित है, लेकिन सरकार सोच रही है कि केवल चिंतन मंथन करने से काम नहीं चलेगा, अब पानी सिर से ऊपर निकल चुका है, ऐसे में डॉलर के साथ बैठकर आमने सामने बात करनी ही होगी। 

सरकारी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सरकार बहुत जल्‍द डॉलर के साथ बैठकर इस विषय पर बात करेगी। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि सरकार इस मामले में तीन दौर की बैठक का आयोजन कर सकती है।

उम्‍मीद है कि डॉलर रुपये को इज्‍जत देने के लिए तैयार हो जाएगा, और इस समझौते से रुपये की गिरती हालत में सुधार होगा। डॉलर का रुपये के प्रति कड़ा रुख वैसे तो सरकार से बर्दाशत नहीं होता, लेकिन वार्ता के दौरान सरकार शांति व गांधीगिरी से काम लेगी।

उधर, जब इस बारे में वित्‍त मंत्री से संपर्क साधा गया, और रुपये की दिन प्रति दिन बिगड़ रही तबीयत के बारे में पूछा गया तो उन्‍होंने कहा, लोगों को डॉलर की खरीददारी पर अंकुश लगाने की अपील की जा रही है, लेकिन लोग डॉलर खरीदने में अधिक दिलचस्‍प ले रहे हैं, उनको लग रहा है कि डॉलर भी सोने की तरह अच्‍छा रिटर्न देगा। साले पागल लोग।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि सरकार वार्ता के लिए दोनों तरीकों पर विचार कर रही है, अगर डॉलर भारत में आना चाहता है तो स्‍वागत है, नहीं तो सरकार के प्रतिनिधि बातचीत के लिए अमेरिका की यात्रा कर सकते हैं।

वैसे तो सरकार को पूरी उम्‍मीद है कि मामला सुलझ जाएगा, अगर डॉलर ने पाकिस्‍तान की तरह नखरे दिखाने की कोशिश की तो सरकार नक्‍सलवाद की तरह डॉलर को भी सख्‍त चेतावनी देगी।

अगर डॉलर अपनी हकरतों से बाज नहीं आया तो हो सकता है कि सरकार डॉलर को भारत में प्रतिबंधित कर दे। ऐसे में डॉलर अपनी जिद्द की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। अगर बात न बनी तो सरकार नेपाल करंसी से बात करेगी।

एक अन्‍य सवाल के जवाब में वित्‍त मंत्री ने कहा कि अमेरिका के लिए टिकटें हमेशा सरकार पहले से बुक करवाकर रखती है, क्‍यूंकि जो दशा सरकार की है, ऐसे में कभी भी देश छोड़कर भागना पड़ सकता है, क्‍यूंकि गांधीगिरी भाषण से अब बहुत दिन चलने वाला नहीं।

उधर, प्रकाश झा अपनी नई फिल्‍म सत्‍याग्रह से गांधी के मनपसंद शांति प्रिय भजन को अहिंसा भरपूर बना रहा है, और सीता राम से कह रहा है कि अब लोगों को धैर्य मत दे, अब और सहने की हिम्‍मत मत दे।

इनपुट फेकिंगन्‍यूज डॉट कॉम से भी

स्‍वतंत्रता दिवस पर लालन कॉलेज वर्सेस लाल किला

आजाद भारत का शायद पहला स्‍वतंत्रता दिवस होगा। जब राष्‍ट्र के लोग इस दिन मौके होने वाले आयोजित समारोह में अधिक दिलचस्‍प लेंगे। इसका मुख्‍य कारण मौजूदा प्रधानमंत्री और संभावित प्रधानमंत्री पद के दावेदार के बीच सीधी टक्‍कर। एक हर बार की तरह लाल किले तो तिरंगा फरहाएंगे तो दूसरे भुज के लालन कॉलेज से।
ऐसे में इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया के कैमरे दोनों तरफ तोपों की तरह तने रहेंगे। देश के प्रधानमंत्री होने के नाते मीडिया मनमोहन सिंह की उपस्‍थिति वाले समारोह को नजरअंदाज नहीं कर सकता, वहीं दूसरी तरफ संभावित प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार के रूप में उभरकर सामने आ रहे नरेंद्र मोदी को भी जनता सुनना चाहेगी, जो वैसे भी आजकल टेलीविजन टीआरपी के लिए एनर्जी टॉनिक हैं।

गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्‍वयं गुजरात के भुज में आयोजित युवाओं की एक सभा को संबोधित करते हुए कहा, ‘जब हम तिरंगा फहराएंगे तो संदेश लाल किला तक भी पहुंचेगा। राष्ट्र जानना चाहेगा कि वहां क्या कहा गया और भुज में क्या कहा गया।’

इस नरेंद्र मोदी की बात में कोई दो राय नहीं। देश की जनता बिल्‍कुल जानना चाहेगी, लेकिन उससे भी ज्‍यादा उतावला होगा भारतीय इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया। बस डर है कहीं, नरेंद्र मोदी लाइव न हो जाए, और देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का भाषण अगले दिन आने वाले समाचार पत्रों में पढ़ने को मिले।

उधर, सीधे तौर पर प्रधानमंत्री का जिक्र न करते हुए मोदी ने कहा, ‘एक तरफ वादों की झड़ी होगी तो दूसरी ओर किए गए काम का लेखा-जोखा होगा। एक तरफ निराशा होगी तो दूसरी तरफ आशा होगी।’ आपको बता दें कि गुजरात में स्वतंत्रता दिवस का आधिकारिक समारोह भुज में मनाया जाएगा जहां मोदी राष्ट्रीय ध्वज फहराएंगे।

आप इसे संयोगवश कहें या जान बुझकर चुना गया स्‍थान, लेकिन 15 अगस्‍त को आयोजित होने वाले इन दोनों समारोह को अगर कुछ जोड़ता है तो लाल। एक तरफ लाल किला, दूसरी तरफ भुज का लालन कॉलेज। दोनों में लाल शब्‍द है। इन दिनों जगहों पर तिरंगा लहराने वाले शख्‍सियतों के आगे प्रधानमंत्री शब्‍द भी जुड़ता है, एक संभावित प्रधानमंत्री पद प्रत्‍याशी हैं तो दूसरे मौजूदा प्रधानमंत्री।

अब देखना यह रहेगा कि स्‍वतंत्रता दिवस पर तिरंगा लहराने वाली दोनों शख्‍सियतों में से अगले साल लाल किले पर तिरंगा कौन फहराता है ? क्‍या लालन कॉलेज से नरेंद्र मोदी लाल किले तक पहुंच सकेंगे ?  जिन्‍होंने पार्टी की उन बाधाओं को तो पार कर लिया, जो उनके प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार बनने के रास्‍ते में थीं, क्‍यूंकि पिछले दिनों एक टेलीविजन को दिए विशेष साक्षात्‍कार में भाजपा के महासचिव राजीव प्रताप रूढ़ी ने साफ साफ कहा कि जनता की आवाज सुनी जाएगी और अगस्‍त के अंत तक नरेंद्र मोदी को पीएम पद का उम्‍मीदवार घोषित किया जाएगा। यह तो पहला साबूत है।

नरेंद्र मोदी पर मौसम साफ होने का दूसरा संकेत यूपीए के खिलाफ चार्जशीट के रूप में लॉन्‍च की अपनी वेबसाइट इंडिया 272 को करते हुए दिया। इस वेबसाइट पर गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा कोई चेहरा नजर नहीं आ रहा है। इस वेबसाइट को लॉन्‍च तो भाजपा पार्टी ने किया, लेकिन वहां चेहरा केवल नरेंद्र मोदी का, भाजपा का यह कदम उस बात को चरितार्थ कर रहा है, जिसमें कहा गया था भाजपा एकमत है।

अब एक और सवाल के साथ आपसे अलविदा लेते हैं कि क्‍या अगले साल होने वाले लोक सभा चुनावों के बाद आजाद भारत को आजाद भारत में जन्‍मे किसी नागरिक को प्रधानमंत्री बनते देखने का मौका मिलेगा या पांच साल और इंतजार करना होगा ?

उड़ीसा का एक राजा, जो आज जीता फकीर सी जिन्‍दगी

न उसके घर में जंग खाती तलवार है और न सिंहासन। न राजा महाराजाओं की तरह दीवारों पर लटकी ट्रॉफियां, जो याद दिलाएं बीते दिनों में किए शिकारों की। न पीली पड़ चुकी तस्‍वीरें, जो याद दिलाएं युवा अवस्‍था के सुंदर सुनहरे दिनों की। जिस महल में वे अपनी पत्‍िन और बच्‍चों के साथ 1960 तक रहा, आज वहां लड़कियों का हाई स्‍कूल है।

टिगिरिया का पूर्व राजा ब्राजराज क्षत्रीय बीरबर चामुपति सिंह महापात्रा एक कच्‍चे मकान में कुछ प्‍लास्‍टिक की कुर्सियों के साथ अपना जीवन बसर करता है, टिगिरिया जो कि कटक 'उड़ीसा' जिले में पड़ता एक क्षेत्र है। एस्बेस्टस छत में से बारिश का पानी लीक हो रहा है, और भूतपूर्व राजा की लकड़ से बनी खाट को एक फटेहाल तरपाल से ढ़का गया है, ताकि वे छत से लीक हो रहे पानी से भीगकर ख़राब न हो। इस कच्‍चे घर में कुछ किताबें, प्‍लास्‍टिक की बोतलें, एक बैटरी और कुछ कच्‍चे टमाटर पड़े हुए हैं।

अपने परिवार से अलग हुआ भूतपूर्व राजा अब अपनी साधनहीन और असहाय जिन्‍दगी की अगुवाई कर रहा है। जबकि दोनों आंखों को मोतियाबिंद ने अपनी चपेट में ले लिया है, और सुनने की शक्‍ति भी समय के साथ पहले से कम हो गई। 1987 से अकेला पुराना टिगरिया गांव में इस तरह का जीवन बसर कर रहा है। जानकार कहते हैं कि उड़ीसा की 26 देशी रियासतों में से केवल वे अकेला राजा है, जो इस तरह का जीवन बसर कर रहा है, जिनका 15 दिसम्‍बर 1947 को भारत में विलय हो गया था। टिगिरिया देशी रियासत उड़ीसा की 26 रियासतों में से सबसे छोटी थी, जिसका क्षेत्रफल 119 वर्ग किलोमीटर था।

स्‍थानीय वकील ललित कृष्‍णा दास बताते हैं कि महापात्रा ने अपना महल सरकार को 1960 में केवल 75000 रुपये में बेच दिया था, और धीरे धीरे एक राजा फकीर में बदल गया, आज गांव वालों की मदद पर जीवन बसर करता है। गांव वाले हर रोज अपने पूर्व राजा को खाना खिलाते हैं। यह एकांत जीवन सिर्फ उसके लिए है।

धर्नीधार राना, जो गांववासी है, बताता है कि महापात्रा बहुत किफायती खाऊ हैं। राणा की बेटी कहती हैं कि वे ब्रेक फास्‍ट के लिए एक कप चाय और दो बिस्‍कुट लेते हैं, वहीं कुछ चावल और दाल दोपहर के भोजन में, और रोटी दाल रात को। वे कभी कभार चिकन खाते हैं। लुंगी कुर्ता पहनते हैं, और चलने के लिए छड़ी का सहारा लेते हैं। इस हालत को देखकर बतौर राजा महापात्रा की कल्‍पना करना मुश्‍िकल है। 

जयंत मारदराज, पूर्व शासक निलगिरी ने बताया कि आज वे एक आम आदमी से भी बदतर जिन्‍दगी जी रहे हैं, जो 1947 के अंत तक एक रियासत का शासक थे। राजकुमार कॉलेज रायपुर से डिप्‍लोमा करने के बाद 1940 में महापात्रा की शादी रासमंजरी देवी से हुई, जो सोनेपुर की राजकुमारी थीं। इनकी पांच संतान हुई, जिनमें तीन बेटे और दो बेटियां शामिल हैं। 

अपने बीते दिनों को याद करते हुए महापात्रा कहते हैं, 'मैं अक्‍सर अपने दोस्‍त के साथ कोतकाला की यात्रा करता, जो कि पुरी का शासक था। हम मैजिस्‍टिक और ग्रेट ईस्‍टर्न होटल में रूकते। मैं शराब लेना चाहता, यह अच्‍छा समय था। मैं पीने के लिए ब्‍लैक लेबल, व्‍हाइट लेबल, और धूम्रपान के लिए 999 और स्‍टेट एक्‍सप्रेस 555 सिगरेट ब्रांड पसंद करता। अगर बाजार में कोई कार का नया मॉडल आता तो हम खरीदते, मेरे पास 25 कारें और जीपें थी, जिनमें रोड़मास्‍टर,सेवरोलेट, पैकार्ड शामिल है। हमारे पास तीस नौकर होते थे। वो शिकारी था, उसने 13 टाइगरों,28 तेंदुओं और हाथी का शिकार किया। मैं हाथी के शिकार के लिए नहीं जाता था। मुझे गांव वाले शिकार के लिए करने के लिए मजबूत करते यह कहते हुए कि वे फसल को बर्बाद कर देंगे। इतने में बीच से जयंत बोलते हैं, यह शॉर्ट स्‍टोरी राइटर और एक अच्‍छे पेंटर भी हैं।

रियासत का भारत में विलय होने के बाद भी इंदिरा गांधी के समय तक महापात्रा को हर साल 11200 रुपये सरकार की ओर से मिलते रहे, लेकिन 1975 में इस सिस्‍टम को खत्‍म कर दिया गया। तब तक महापात्रा अपना टिगिरिया वाला महल बेच चुके थे, अपनी पत्‍िन से अलग हो चुके थे। इसके बाद वे अपने पुरी वाले दोस्‍त के यहां अगले बारह साल तक रहा, और कुछ समय उसने अपने बड़े भाई के यहां गुजारा, जो कि मंडासा रियासत के शासक थे। 1987 में महापात्रा टिगरिया लौट आए, यहां पर एक कच्‍चे घर का निर्माण किया, और रहना शुरू कर दिया। यहां से दो किलोमीटर दूर उनकी पत्‍िन रहती हैं, जो कि टिगरिया की पूर्व विधायिका हैं, लेकिन पिछले कई दशकों से दोनों मिले नहीं।

महापात्रा उस दिन को याद करते हैं, जब वे विलय का इकरारनामा साइन करने के लिए कटक गए, तो वहां के टाउन हाल में मेरे दीवान उदयनाथ साहु मेरा इंतजार कर रहे थे। सरदार पटेल हमको पहले ही अल्‍टीमेटम दे चुके थे। जब रानपुर के राजा ने साइन करने से मना किया तो सरदार पटेल ने सेना भेजने की धमकी दी। उन्‍होंने बताया कि पूर्व मुख्‍यमंत्री बिजू पटनायक ने उनको राजनीति में आने के लिए आग्रह किया था, लेकिन उन्‍होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि उनको लोगों को किस तरह संभालना है, यह नहीं आता।

जब महापात्रा से पूछा गया, आपको शाही महल, अपनी अमीरी और आजादी खोने का दुख है, तो वे कहते हैं, तब में राजा था, अब मैं कंगाल हूं। मुझे किसी भी बात के लिए मलाल नहीं है। क्‍या आप सोचते हैं कि मैं इतना लम्‍बा जिया पाता, अगर मैं दुखी होता।
 
देबाबरता मोहंती की रिपोर्ट है, जो इंडियन एक्‍सप्रेस में 12 अगस्‍त 2013 को प्रकाशित हुई, जिसका हिन्‍दी अनुवाद कुलवंत हैप्‍पी, युवारॉक्‍स डॉट कॉम के संपादक कम संचालक द्वारा किया गया।

मोना लीसा की तस्‍वीर का सच आएगा सामने या नहीं

लिओनार्दो दा विंची के द्वारा कृत एक विश्व प्रसिद्ध चित्र है। यह एक विचारमग्न स्त्री का चित्रण है जो अत्यन्त हल्की मुस्कान लिये हुए है। यह संसार की सम्भवत: सबसे प्रसिद्ध पेंटिंग है जो पेंटिंग और दृष्य कला की पर्याय मानी जाती है। सदियों से मोनालीसा की रहस्यमय मुस्कुराहट जहाँ रहस्य बनी हुई है।

एक तस्‍वीर हजारों बातें, लेकिन अब अनुसंधानकर्ताओं की एक टीम इटली के फ्लोरेंस में पहुंच चुकी है। इस टीम के लिए उस कब्रगाह को खोल दिया गया है, जिसमें व्यापारी 'फ़्रांसेस्को देल जियोकॉन्डो' की पत्नी 'लिसा गेरार्दिनि' के अन्‍य परिजनों को दफनाया गया था। अनुसंधानकर्ताओं का मानना है कि डीएनए से मोनालीसा की पहचान हो सकती है।

लेखक और अनुसंधानकर्ता सिल्‍वानो विन्‍सेटी ने योजना बनाई है कि हड्डियों के जरिये डीएनए टेस्‍ट लेकर पिछले साल सेंट ओर्सोला कान्‍वेंट से मिली तीन खोपड़ियों के साथ टेस्‍ट करके देखा जाएगा, क्‍यूंकि उनके हिसाब से इतिहासिकारों का मानना है कि लीसा गेरार्दिनी अपने अंतिम कुछ साल सेंट ओर्सोला कन्‍वेट में थी, और इस खंडहर इमारत में पिछले साल हड्डियों को ढूंढने का काम शुरू हुआ था। उनको यकीनन है कि तीन में से एक तो लीसा हो सकती है।

अगर एक बार डीएनए मैच कर जाता है तो सेंट ओर्सोला से मिले खोपड़ी से लीसा गेर्रिदिनी का चेहरा बनाया जा सकता है, और उसकी तुलना उस तस्‍वीर में मुस्‍कराती हुई, महिला से की जाएगी, और पता लगाया जा सकेगा कि लीसा गेर्रिदिनी है या कोई और। अनुसंधानकर्ता के अनुसार अगर वे मां और बच्‍चे के बीच का संपर्क ढूंढ़ने में कामयाब हुए तो यकीनन वे लीसा को खोज लेंगे।

ऐसा माना जाता है कि इतालवी चित्रकार लियोनार्दो दा विंची ने मोनालिसा की तस्वीर 1503 से 1506 के बीच बनाई थी। समझा जाता है कि ये तस्वीर फ़्लोरेंस के एक गुमनाम से व्यापारी 'फ़्रांसेस्को देल जियोकॉन्डो' की पत्नी 'लिसा गेरार्दिनि' को देखकर आंकी गई है।

वहीं जर्मन के कला इतिहासकार सुश्री माईक बोग्ट-लयरेसन ने दावा किया है कि तस्वीर में दिख रही महिला इटली के अरांगो प्रान्त के डियूक की पत्नी ईशाबेला है। सुश्री माईक के अनुसार ईशाबेला की मुस्कान में दुख है क्योंकि लीयनार्दो के पेंटिंग बनाने से कुछ समय पहले ही उसकी माँ का देहान्त हो गया था। माईक की माने तो ईशाबेला का शराबी पति नशे में धुत् होकर उसे अक्सर मारता-पीटता था। अपनी प्रकाशित पुस्तक ‘हू इज मोनालिसा ’ इंसर्च में अनेकों समानतांएं गिनवायी हैं। पुस्तक में आगे लिखा है कि लियनार्दो जो कि डियूक के दरबार में शाही कलाकार थे, ईसाबेला के काफी निकट थे।

कुछ साल पूर्व जापान में दाँतों के एक डॉक्टर ने यह कह कर सबको हैरत में डाल दिया था कि मोनालिसा की रहस्यमयी मुस्कान का राज उसके ऊपरी जबड़े में आगे के दो दाँतों का टूटा होना है और इसी कारण उसके ऊपरी होठ एक तरफ कुछ दबा हुआ-सा दिखाई दे रहा है, इसी कारण उसका एक ऊपरी होठ एक तरफ से कुछ दबा हुआ सा दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि अंजाने में मोनालिसा व रहस्यमय मुस्कान दिखाई देती है जब कि वास्तव में यह मुस्कराहट नहीं बल्कि अपने टूट चुके दाँतों से खाली हुए स्थान को जीभ से होठों को ठेलने का प्रयास कर रही है जिससे होठ दबा हुआ न दिखे। यह डाक्टर पिछले कई वर्षों से मोनालिसा पर शोध कर रहे थे।

दिसम्बर 1986 में अमेरिका के बेल लेबोट्री में कम्प्यूटर वैज्ञानिक सुश्री लिलीयन स्वाडज ने अपने अनुसंधान के आधार पर यह कह कर पूरी दुनिया में तहल्‍का मचा दिया कि लीयनार्दो विंची की सुप्रसिद्ध कलाकृति मोनालिसा किसी रहस्यमय युवती का नहीं बल्कि स्वयं चित्रकार का अपना ही आत्म चित्र है। आर्ट एण्ड एनटिक्स नामक पत्रिका में प्रकाशित लेख में सुश्री लिलीयन ने दावा किया कि 1518 में लाल चाक से बनें लिनार्डोविंची का आत्मचित्र व मोनालिसा के चित्र को जब उसने पास-पास रखा तो यह देखकर दंग रह गई कि लीयनार्दो तथा मोनालिसा के चेहरे, ऑंखें, गाल, नाक व बालों में अद्भत समानता है। कम्प्यूटर के मदद से जब मोनालिसा के चेहरे के ऊपर लीयनार्दो के बाल, दाढ़ी व भवहे लगाकर देखा गया तो वह पूरी तरह लीयनार्दो में परिवर्तित हो गई। इसके विपरीत लीयनार्दो के चेहरे से यदि दाढ़ी, बाल, मूँछ, भवे आदि हटा दी जाये तो लीयनार्दो मोनालिसा में बदल जाते है।

स्वार्ड जी का कथन है कि लीयनार्दो ने मोनालिसा के रूप में स्वयं का नारी चित्रण किया है। उन्होंने इसके पीछे एक कलाकार का समलैंगिक होना प्रमुख कारण बताया है। इस बात की प्रबल संभावना है कि विंची समलैंगिक हो और उभय लिंगी विषयों को कलाकृति में ढालने में रूची रखते हो तथा अपनी इसी प्रवित्ती के चलते स्वयं को नारी रूप में चित्रित कर उसे मोनालिसा नाम दिया।

सम्प्रति यह छबि फ्रांस के लूव्र संग्रहालय में रखी हुई है। म्यूज़ियम के इस क्षेत्र में 16वीं शताब्दी की इतालवी चित्रकला की कृतियाँ रखी गई हैं। यह तस्‍वीर यहां से 1911 में यहां के पूर्व कर्मचारी द्वारा चुरा ली गई थी, लेकिन दो साल बाद पुलिस ने उस कर्मचारी को पकड़कर इस तस्‍वीर को फिर से हासिल किया।
मोनालिसा की असल पेंटिंग केवल 21 इंच लंबी और 30 इंच चौड़ी है। तस्वीर को बचाए रखने के लिए एक ख़ास किस्म के शीशे के पीछे रखी गई है जो ना तो चमकता है और ना टूटता है। मोनालिसा: एक अनसुलझा रहस्य। जिसको देखने के लिए लूव्र संग्रहालय में हर साल मिलियन्‍स पर्यटक आते हैं, और उसकी मुस्‍कराहट को देखकर चले जाते हैं।

कुछ इनपुट विकीपीडिया से

माँ की आँख

मेरी माँ की सिर्फ एक ही आँख थी और इसीलिए मैं उनसे बेहद नफ़रत करता था | वो फुटपाथ पर एक छोटी सी दुकान चलाती थी | उनके साथ होने पर मुझे शर्मिन्दगी महसूस होती थी | एक बार वो मेरे स्कूल आई और मै फिर से बहुत शर्मिंदा हुआ | वो मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकती है ? अगले दिन स्कूल में सबने मेरा बहुत मजाक उड़ाया |

मैं चाहता था मेरी माँ इस दुनिया से गायब हो जाये | मैंने उनसे कहा, 'माँ तुम्हारी दूसरी आँख क्यों नहीं है? तुम्हारी वजह से हर कोई मेरा मजाक उड़ाता है | तुम मर क्यों नहीं जाती ?' माँ ने कुछ नहीं कहा | पर, मैंने उसी पल तय कर लिया कि बड़ा होकर सफल आदमी बनूँगा ताकि मुझे अपनी एक आँख वाली माँ और इस गरीबी से छुटकारा मिल जाये |

उसके बाद मैंने म्हणत से पढाई की | माँ को छोड़कर बड़े शहर आ गया | यूनिविर्सिटी की डिग्री ली | शादी की | अपना घर ख़रीदा | बच्चे हुए | और मै सफल व्यक्ति बन गया | मुझे अपना नया जीवन इसलिए भी पसंद था क्योंकि यहाँ माँ से जुडी कोई भी याद नहीं थी | मेरी खुशियाँ दिन-ब-दिन बड़ी हो रही थी, तभी अचानक मैंने कुछ ऐसा देखा जिसकी कल्पना भी नहीं की थी | सामने मेरी माँ खड़ी थी, आज भी अपनी एक आँख के साथ | मुझे लगा मेरी कि मेरी पूरी दुनिया फिर से बिखर रही है | मैंने उनसे पूछा, 'आप कौन हो? मै आपको नहीं जानता | यहाँ आने कि हिम्मत कैसे हुई? तुरंत मेरे घर से बाहर निकल जाओ |' और माँ ने जवाब दिया, 'माफ़ करना, लगता है गलत पते पर आ गयी हूँ |' वो चली गयी और मै यह सोचकर खुश हो गया कि उन्होंने मुझे पहचाना नहीं |
एक दिन स्कूल री-यूनियन की चिट्ठी मेरे घर पहुची और मैं अपने पुराने शहर पहुँच गया | पता नहीं मन में क्या आया कि मैं अपने पुराने घर चला गया | वहां माँ जमीन मर मृत पड़ी थी | मेरे आँख से एक बूँद आंसू तक नहीं गिरा | उनके हाथ में एक कागज़ का टुकड़ा था... वो मेरे नाम उनकी पहली और आखिरी चिट्ठी थी |

उन्होंने लिखा था :

मेरे बेटे...
मुझे लगता है मैंने अपनी जिंदगी जी ली है | मै अब तुम्हारे घर कभी नहीं आउंगी... पर क्या यह आशा करना कि तुम कभी-कभार मुझसे मिलने आ जाओ... गलत है ? मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है | मुझे माफ़ करना कि मेरी एक आँख कि वजह से तुम्हे पूरी जिंदगी शर्मिन्दगी झेलनी पड़ी | जब तुम छोटे थे, तो एक दुर्घटना में तुम्हारी एक आँख चली गयी थी | एक माँ के रूप में मैं यह नहीं देख सकती थी कि तुम एक आँख के साथ बड़े हो, इसीलिए मैंने अपनी एक आँख तुम्हे दे दी | मुझे इस बात का गर्व था कि मेरा बेटा मेरी उस आँख कि मदद से पूरी दुनिया के नए आयाम देख पा रहा है | मेरी तो पूरी दुनिया ही तुमसे है |

चिट्ठी पढ़ कर मेरी दुनिया बिखर गयी | और मैं उसके लिए पहली बार रोया जिसने अपनी जिंदगी मेरे नाम कर दी... मेरी माँ |

Noted # यह कहानी  किसी महान व्‍यक्‍ित द्वारा किसी और संदर्भ में लिखी गई , कहानी से प्रेरित है, मगर जिसने लिखा है, उसका भी नाम मुझे पता नहीं, मगर कहानी आपको बेहद अच्‍छी लगेगी। 

घोष्ट राइंटिंग - हमें सोचना होगा

'पाखी' पत्रिका ने महुआ माजी के द्वारा लिखे गए उपन्यास की चोरी का विवाद खड़ा किया उससे बहुत सारे प्रश्न उठते हैं। अंग्रेजी में भी ऐसी घटनाओं के कारण बहसें हुई हैं और लेखन की मौलिकता संदेह के घेरे में आयी और उन्हें रचनाकार की सम्मानित सूची से हटा दिया गया।

लेकिन हिंदी में यह ताजा प्रकरण इसलिए महत्वपूर्ण है कि पिछले दिनों लेखन में महत्वाकांक्षियों की एक पूरी फौज आ गयी है और वे साहित्य के इतिहास में 'महान्' हो जाना चाहते हैं। इसमें फिर चाहे तन, मन के अलावा धन ही क्यों न लगाना पड़ें। इसमें पत्रिका के सम्पादकों के साथ एक गठजोड़ की भूमिका भी देखी जानी चाहिए। कई बार प्रकाशकों के साथ इस गठजोड़ की भूमिका की जांच भी की जा सकती है।

पश्चिम में तो अब आलोचक की हैसियत रही नहीं कि उसके 'कहे बोले' गए से कोई लेखक महान हो जाए या उसकी महानता की चौतरफा स्वीकृति हो जाए। वहां प्रकाशनगृह ही लेखक पैदा करते हैं वे ही उन्हें महान भी बनाते हैं। अब माना जा रहा है कि यह सिलसिला यहां हिंदी में भी चल पड़ा है।

आलोचक का प्रभाव धुंधला गया है और प्रकाशक ही अब लेखक को 'आइकनिक' बना सकता है। हिंदी में ऐसे कई उदीयमान और चम‍कीले लेखक हो रहे हैं, जो वे किसी न किसी के डंडे पर चढ़कर, झंडे की तरह लहरा सकने की स्थिति में आ गए हैं। लिखने-पढ़ने की बिरादरी वाले लोगों के बीच

होने के नाते हम भी जानते हैं कि प्रभु जोशी ने न केवल कुछेक घोष्ट पेंटर बना दिए हैं बल्कि घोष्ट कहानीकार भी। अब वे ही घोष्ट खूब छप रहे हैं और पुरस्कार हथिया रहे हैं। और भी कोई प्रभु हो सकता है। ऐसी स्थिति इसलिए भी बनने लगी है कि पत्रिकाओं की तादाद बढ़ी और लेखक संघों का भी विघटन हो चुका है। इसलिए अब गुट है। गुटों की अपनी अपनी पत्रिकाएं हैं। अपने अपने लेखक है ही, पत्रिका के अपने अपने महान है। ऐसे महान भी हैं जो ‍किसी न किसी की 'घोष्ट राइंटिंग' के कारण सांस ले रहे हैं।

सवाल यह उठता है कि क्या हम अब यह मान लें ‍कि भारत का साहित्य मर गया है? उसकी मौलिकता के कोई मायने नहीं? अब साहित्य का भी राजनीति की तरह पतन हो चुका है? क्या ऐसे माहौल में हम कभी अमेरिकन और रशियन के समकक्ष खड़े हो पाएंगे? वह कौन सी वहज है जिसके

कारण हम भारत के साहित्य और साहित्यकारों को महान मानकर अपना आदर्श बनाएं, जबकि साहित्य भी अब बाजार की राह पर चल पड़ा है।

लेखक - अनिरुद्ध जोशी, वेब दुनिया हिन्‍दी डॉट कॉम,

अरविंद केजरीवाल के बहाने स्‍विस यात्रा

आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने अंबानी भाइयों के स्विस बैंक में खाते होने का दावा करते हुए दो बैंक ख़ातों को उजागर किया है, जिनको केजरीवाल अम्‍बानी बंधूओं का बता रहे हैं। अरविंद केजरीवाल के खुलासों की चर्चा से बॉलीवुड भी अछूत नहीं, हालिया रिलीज हुई फिल्‍म 'खिलाड़ी 786' में पुलिस कर्मचारी का किरदार निभा रहे जोनी लीवर मिथुन चक्रवर्ती को धमकी देते हैं कि वो 'केजरीवाल' को बता देगा।

केजरीवाल खुलासे पर खुलासा किए जा रहे हैं, लेकिन सरकार इस मामले में कोई सख्‍़त कदम उठाती नजर नहीं आ रही, जो बेहद हैरानीजनक बात है, उक्‍त खाते अम्‍बानी बंधुओं कि हैं या नहीं, इस बात की पुष्‍टि तो स्‍विस बैंक कर सकती है, मगर निजता नियमों की पक्‍की स्‍विस बैंक ऐसा कभी नहीं करेगी, क्‍यूंकि उसने खाताधारक को एक गुप्‍त कोड दिया होता है, जिसका पता खाताधारक के अलावा किसी को नहीं होता, और तो और स्‍विस बैंक, हर दो साल बाद खाता धारकों के खाते बदल देती है, आप एक ख़ाते को आजीवन नहीं रख सकते।

स्‍विस को हम कितना जानते हैं, बस इतना कि वहां पर हमारा काला धन पड़ हुआ है। मगर स्‍विस एक ऐसा देश है, जहां की सरकार अपने नागरिकों के प्रति पूर्ण रूप से वफादार है। भले ही स्‍विस की धरती पर धार्मिक ग्रंथ नहीं लिखे गए, भले ही मानवता का पाठ वहां पर कई शताब्‍दियों तक न पढ़ाया गया, मगर फिर भी स्‍विस सरकार मानवता धर्म का पालन बाखूबी करती है।

हिन्‍दुस्‍तान में धर्म के भीतर भले ही औरत को सबसे ऊंचा दर्जा मिला हो, मगर वास्‍तविकता हम सब जानते हैं, मगर स्‍विस के भीतर औरत को बेहद सुरक्षित रखा गया है, अगर कोई व्‍यक्ति अपनी पत्‍नी को छोड़ना चाहता है तो बेहिचक छोड़ दे, लेकिन अपनी सरकारी संपत्ति उसके नाम करके।

विकलांगों के लिए अलग संस्‍थानों का प्रबंध स्‍विस में है, जहां पर विकलांगों की हर इच्‍छा पूर्ण की जाती है, चाहे काम वासना से जुड़ी हुई ही क्‍यूं न हो। पैदल चलने वालों के लिए वाहन वालों को रूकना पड़ता है। बुजुर्ग को पहले रास्‍ता क्रोस करने की इजाजत है।

कोई भी बिजनस शुरू करने से पूर्व आपको एक तयशुदा राशि सरकार को डिपोजिट करनी होती है, जिसके बाद आप सरकार से लोन भी ले सकते हैं, अगर बिजनस नहीं चला तो सरकार आप पर लोन राशि वापस करने के लिए किसी तरह का दबाव नहीं डालेगी, मगर आगे से लोन भी नहीं देगी।

अगर आपकी एक समयाविधि के बाद नौकरी चली जाए तो आपको सरकार अपनी और से कुछ पैसे वेतन के रूप में देती है, और उसके साथ साथ आपको नि:शुल्‍क कोर्स करवाती है, ताकि आप जल्‍द से जल्‍द नए काम के लिए तैयार हो सकें। बच्‍चों के लिए एजुकेशन खर्च सरकार वाहन करती है, जो बहुत बड़ी रकम के रूप में प्रतिमाह अभिभावकों को मिलता है।

महिलाओं के मजबूत पक्ष के कारण स्‍विस में मूल निवासियों की जनसंख्‍या बेहद कम हो रही है, जो स्‍विस सरकार को गंवारा नहीं। इसलिए अब वहां पर सरकार स्‍विस नागरिकों को शादी करने एवं परिवार बढ़ाने के प्रति सजग कर रही है।

वैसे तो स्‍विस बैंक की जानकारियां किसी को मिलती नहीं, लेकिन फिर भी एक जानकार द्वारा बताई गई जानकारी के अनुसार स्‍विस बैंक में भारत का इतना काला धन पड़ा है कि अगर वो भारत वापिस आ जाए तो भारत के नागरिकों को 2050 तक नौकरी करने की जरूरत न पड़े, और बेरोजगारी भत्‍ते के नाम पर मोटी राशि प्रदान की जा सकती है।

अब बंद होंगे याहू पब्‍लिक चैट रूम

साइबर कैफे में बैठकर याहू मैसेंजर के जरिए पब्‍लिक चैट करने वालों के लिए बेहद दुखद ख़बर है कि अब याहू पब्‍लिक चैट रूम बंद कर रहा है। 1998 में शुरू हुई याहू पब्लिक चैट सर्विस 2005 तक आते आते विवादों में घिरने लगी थी। इस दौरान याहू ने अपने कई पब्‍लिक चैट रूम बंद किए, ताकि विवादों से छुटकारा पाया जाए। मगर अभी अभी याहू ने अपने ब्‍लॉग में घोषणा की है कि वे पब्लिक चैट को स्थाई रूप से बंद कर रही है।

पब्‍लिक चैट रूम
यह ऐसे रूम हैं, जहां पर आप किसी भी अनजान व्‍यक्‍ति को चैट के लिए आमंत्रित कर सकते हो, अगर वो आप से बात करने का इच्‍छुक है तो आपको जवाब मिल जाएगा। मगर इन चैट रूमों का इस्‍तेमाल ज्‍यादातर अश्‍लील वेबसाइट संचालक करते हैं, जो चैट रूम में उल्‍लू जलूल नाम से घुस कर वहां उपस्‍थित युवाओं एवं युवतियों को अपना निशाना बनाते हैं। इतना ही नहीं, कुछ उम्रदाज महिलाएं एवं पुरुष अपना दिल बहलाने के लिए अज्ञात लोगों से मित्रता करती एवं करते हैं। इस चैट रूम की बजाय से काफी सारे लोग विदेश यात्रा तक भी कर चुके हैं, क्‍यूंकि चैट के दौरान इंडियन लड़के और लड़कियां विदेशी पार्टनर ढूंढते एवं ढूंढती हैं, अगर मिल गया तो विदेश जाना पक्‍का, भले ही उस पार जाते रिश्‍ते तार तार हो जाएं।

कब होंगे चैट रूम बंद
याहू कंपनी की ओर से आए ब्लॉग में लिखा गया है कि ये सेवा अब वेबसाइट के इस्तेमाल करने वालों के लिए पर्याप्त लाभ नहीं पहुंचा रही है। याहू चैट रुम 14 दिसंबर से गायब हो जाएंगे और इन्हीं से संबंधित कुछ अन्य फ़ीचर जनवरी के अंत तक हटा दिए जाएंगे।

पल में टूटता था संपर्क
इन चैट रूमों पर जैसे ही कोई व्‍यक्‍ति पहुंचता तो उसका स्‍वागत बहुत सारे मैसेजों से होता, हर कोई वहां पर लिंग, लोकेशन एवं उम्र पूछता, समलंगी होने पर शॉरी के साथ खत्‍म हो जाती थी चैट वार्ता। यह युवा पीढ़ी के लिए अच्‍छा नहीं था, मगर युवा पीढ़ी साइबर कैफों में ज्‍यादातर इसके लिए ही पहुंचती है।

कहीं छीन न जाए आजादी का मंच

हर देश आजाद हो गया। मगर आजाद देश के बशिंदों द्वारा चुने गए शासक एक बार फिर तानाशाह का रवैया अपनाने लगे हैं, जो शुभ संकेत नहीं। एक पल में हमारी डाक पहुंचाने वाले गूगल ने समर्थन मांगा है, आजादी के लिए। गूगल ने अपने होमपेज पर ''मुक्त और खुला इंटरनेट पसंद है ? विश्व सरकार को उस तरह रखने के लिए कहें'' और  Love the free and open Internet? Tell the world's governments to keep it that way. लिखकर आपका समर्थन मांगा है। गूगल को संदेह है कि कुछ देशों की सरकारें बंद कमरों में बैठ कर इंटरनेट को सेंसर की जंजीरों से जकड़ने का प्रयास कर रही है। अगर अब आवाज न उठी तो हो सकता है कि हमारी आवाज को बुलंद करने वाला मंच हम से छीन जाए।

आओ मिलकर आवाज उठाएं। निम्‍न लिंक पर क्‍लिक करें। और समर्थन दें। 

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बस! मुझे ट्रैफिक चाहिए

आज की ब्रेकिंग न्‍यूज क्‍या है ? सर अभी तक तो कोई नहीं, लेकिन उम्‍मीद है कि कोई दिल्‍ली से धमाका होगा। अगर न हुआ तो। फिर तो मुश्‍िकल है सर। बस! मुझे ट्रैफिक चाहिए। कुछ ऐसे ही संवाद होते हैं आज के बाजारू मीडिया संपादक के।

मजबूरी का नाम महात्‍मा गांधी हो या मनमोहन सिंह, कोई फर्क नहीं पड़ता। मजबूरी तो मजबूरी है। उसके सामानर्थी शब्‍द ढूंढ़ने से कुछ नहीं होने वाला। पापी पेट के लिए कुछ तो पाप करने पड़ते हैं। आज मीडिया हाऊसों की वेबसाइटों को अश्‍लील वेबसाइटों में तब्‍दील किया जा रहा है। अगर कोई ब्रेकिंग न्‍यूज नहीं तो क्‍या हुआ, तुम कुछ बनाकर डालो, अश्‍लील फोटो डालो, लिप लॉक की फोटो डालो। मुझे तो बस! मुझे ट्रैफिक चाहिए। इतना ही नहीं, मासिक पत्रिकाएं भी कहती हैं अब कुछ करो, बुक स्‍टॉलों पर ट्रैफिक चाहिए, वरना घर जाइए।

हर किसी को ट्रैफिक चाहिए। हर कोई ट्रैफिक के पीछे दौड़ रहा है। सड़कें ट्रैफिक से निजात पाना चाहती हैं, मगर ऐसा हो नहीं पा रहा। पैट्रोल के रेट बढ़ रहे हैं तो कंपनियां वाहनों के रेट गिराकर डीजल मॉडल उतार रही हैं। ट्रैफिक कम होने का नाम नहीं ले रहा, वहीं दूसरी तरफ नेता अभिनेता भी ट्रैफिक बढ़ाने को लेकर लगे हुए हैं।

फिल्‍मी दुनिया में तो आजकल इतना जद्दोजहद चल रहा है, जो सितारा बॉक्‍स ऑफिस पर ट्रैफिक खींचने की कुव्‍वत रखता है, उसको पहल के आधार पर साइन किया जाता है एवं शर्त होती है कि फिल्‍मी नफे का कुछ प्रतिशत आपको मिलेगा। ऐसे में अभिनेताओं में युद्ध शुरू हो गया है। यही कारण था कि जब तक है जान के रिलीज होने के लिए सिनेहाल पहले से बुक कर लिए गए थे, और अजय देवगन की सन ऑफ सरदार को कम सिनेहालों में रिलीज करना पड़ा। अब आमिर ख़ान भी अपनी अगली फिल्‍म तलाश को लेकर कुछ ऐसा ही कर रहे हैं। आमिर ख़ान बॉलीवुड में सबसे अधिक ट्रैफिक खींचने वाला सितारा है, लेकिन इस बार उसके पास भी समय कम है, क्‍यूंकि तलाश के अगले हफ्ते खिलाड़ी 786 रिलीज हो रही है। सोनम को छोड़कर निर्देशक सोनाक्षी को साइन कर रहे हैं, क्‍यूंकि ट्रैफिक खींचने वाली आइटम चाहिए।

नरेंद्र मोदी को हाईटेक प्रचार की जरूरत क्‍यूं पड़ रही है, क्‍यूंकि पिछले दस सालों के अंदर किसी पौधे को पनपने नहीं दिया, अब हैट्रिक का दबाव है, ऐसे में हर जगह पहुंच नहीं पा रहा, लेकिन हैट्रिक लगाने के लिए जरूरत कहती है कि ट्रैफिक चाहिए। मगर सड़कें कहती हैं ट्रैफिक नहीं चाहिए। नहीं चाहिए। नहीं चाहिए। इतने शोर शराबे में उनकी सुनता कौन है। क्‍यूंकि वाहन बनाने वाली कंपनियों ने प्रचार कंपनियों पर दबाव डाल दिया है कि शो रूम के अंदर ट्रैफिक चाहिए।

टुकड़ों की जिन्‍दगी ; रिटर्न टू इंडिया

कई बार हमने अपने बहनों भाईयों और दोस्‍तों को बड़े उत्‍साह के साथ जीमैट या जीआरई, टीओएफईएल की तैयारी करते, अमेरिकी दूतावास के सामने लम्‍बी कतारें लगाए और छात्रवृत्‍ति पाने के लिए तमाम कोशिशें करते देखा है, उनका मकसद सिर्फ इतना होता है कि वे अमेरिकी सपने को जीना चाहते हैं। वे कोला कोला, मिक्‍की माऊस, हैरिसन फोर्ड और अवसरों के देश को उड़ जाना चाहते हैं ताकि अपने जीवन के साथ प्रयोग कर सकें, परंपराओं और लालफीताशाही की घरेलू जंजीरों को तोड़ सकें।

जानी मानी लेखिका एवं स्‍तंभकार शोभा नारायण ने अपनी किताब ''रिटर्न टू इंडिया'' में बड़ी बेबाकी से अमेरिकी सपने और उसे जीने की चाहत को उकेरा है। साथ ही साथ दो परंपराओं के बीच झूल रहे लोगों के द्वंद्व के बारे में भी बड़े सलीके से बताया और जताया है। उन्‍होंने प्‍यार, परिवार, पहचान एवं घर कहने लायक एक ठिकाने की तलाश की कहानी बड़े ही मर्मस्‍पर्शी ढंग से पिरोई है।

इन कहानियों के बीच अपनी यादों को ताजा करते हुए शोभा जाहिद खान जैसे अपने दोस्‍तों की कहानी भी सुनाती हैं, जो अपने अमेरिकीकरण के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। कहानी के बहाव के दौरान यह भी पता चलता है कि मल्‍लिकार्जुन राघवेंद्र उर्फ मिडनाइट कैसे मल्‍लिक पटेल बन जाते हैं, ताकि अपनी पत्‍िन नीना पटेल के रिश्‍तेदारों को निवेश के लिए मना सकें। ऐसी कई कहानियां एक दूसरे में गुंथी हुई मिलती हैं।

एक तरह से देखा जाए तो यह एक अप्रवासी के द्वंद्व की कहानी है, जिसे एक अप्रवसी ने अप्रवासी के लिए लिखा है। इसमें शोभा का वह सपना भी संजोया गया है, जिसमें वह घर लौटना चाहती है। एक जगह वह कहती हैं, मेरा सफर अनगिनत सफरों का प्रतीक है। मेरे द्वंद्व में बहुत सारे अप्रवासियों के द्वंद्व का अक्‍स दिखाई पड़ता है।

शोभा के सिर पर अमेरिका की धुन बचपने में ही सवार हो गई थी, जब उन्‍होंने अमेरिकी कार्टून, संगीत, फिल्‍में देखीं और आर्ची, बेटी एवं वेरॉनिका की कहानियां पढ़ीं। जब वह अमेरिका जाने के सपने को लेकर काफी गम्‍भीर होने लगीं तो उनके पिता ने आर्ची कॉमिक्‍स और मैड मैगजीन मंगाने पर रोक लगा दी और अमर चित्र कथा की ढे़रों प्रतियां घर लाने लगे ताकि शोभा को भारतीय परंपराओं और हिन्‍दु देवी देवताओं के बारे में जानकारी मिल सके। शोभा की मां अपने भाई कोअमेरिका में हुई एक दुर्घटना में खो चुकी थीं, इसलिए जब शोभा पर अमेरिका की धुन सवार होती थी तो वे उन पर बाल्‍टी भर पानी उंडेल देती थीं, मानो कोई भूत वूत उतार रही हों।

शोभा ने इस बात का ध्‍यान रखा है कि पाठक का मन अंत तक लगा रहे। इसके लिए उन्‍होंने बड़े ही दिलचस्‍प कहानी किस्‍से बुने हैं। कई मौकों पर पाठक को मुस्‍कराने का मौका दिया है। मिसाल के तौर पर शोभा ने एक जगह बताया है कि कैसे अमेरिकी विश्‍वविद्यालय में उनके चयन की ख़बर चैन्‍नई के किन्‍नरों तक पहुंच गई। या फिर किस तरह इंटरनेशनल स्‍टूडेंट्स एसोसिएशन से उन्‍हें पता चला कि सॉरी और पार्डन समानार्थी शब्‍द नहीं हैं और पास आऊट का मतलब बेहोश हो जाना होता है, न कि कॉलेज से स्‍नातक की उपाधि हासिल करना।

शोभा भी अमेरिकी सपने को जीने के लिए बेताब थीं ग्रीन कार्ड का सपना। मगर जब ग्रीन कार्ड आया तब शोभा की नई नई शादी हुई थी और उन्‍होंने उस पत्र को बेकार की पत्र पाती समझकर मोहल्‍ले के कूड़ेदान में फेंक दिया। उनके पति रात 'जिन्‍हें वे खुद से ज्‍यादा तार्किक एवं यथार्थवादी बताती हैं' उन्‍हें एक शानदार इतालवी रेस्‍त्रां ले गए, जहां दोनों ने कैंडल लाइट डिनर, मंत्रमुग्‍ध कर देने वाले संगीत और बेहतरीन शैंपेन के साथ जश्‍न मनाया। घर लौटते समय राम ने शोभा से ग्रीन कार्ड के बारे में पूछा तब दोनों को पता चला कि ग्रीन कार्ड वाला लिफाफा तो गलती से उसने कूड़ेदान में फेंक दिया है। आखिर शोभा और राम को रात में ही निकलकर टॉर्च की रोशनी में कूड़ेदान से वो पीला लिफाफा ढूंढना पड़ा।

बाद में अमेरिका में जब शोभा को बेटी हुई तो उन्‍हें वहां पहली चुनौती का सामना करना पड़ा। चुनौती थी बेटी का नामकरण। शोभा को शीला नाम पसंद था, मगर उनके भाई श्‍याम 'जो नेवी में कैप्‍टन थे और बाद में वार्टन बिजनेस स्‍कूल से स्‍नातक हुए' को यह नाम बेकार लगा। श्‍याम ने शोभा से कहा कि अगर अमेरिकी लोग आर्नल्‍ड श्‍वाज़ेनेगर जैसे जटिल नाम का सही उच्‍चारण कर सकते हैं तो फिर वे रंजिनी भी कह सकते हैं।

मैसेच्‍युसेट्स स्‍थित माउंड हॉल्‍योक में दाखिला पाने से पहले शोभा भारत छोड़कर अमेरिका जाने के लिए उतावली थीं। वे लिखती हैं कि भारत एक ऐसा देश है, जिससे प्‍यार करना मुश्‍किलक काम है और 20 साल की उम्र में तो मेरे लिए इसका कोई मतलब ही नहीं था। ऐसा नहीं कि मैं भारत से नरफत करती थी, मेरी भावनाएं इतनी तीव्र नहीं थी, मैं तो बस सामाजिक बर्ताव को लेकर बनाए गए नियमों और रूढ़ियों से तंग आ गई थी। मगर अमेरिका में 17 साल बिताने और दूसरी बेटी मालिनी के जन्‍म के बाद शोभा भारत लौटने के लिए बेकरार रहने लगीं। मगर फिर उनके मन में द्वंद्व पैदा हो गया और अमेरिका छोड़ने के पक्ष और विपक्ष में न जाने कितने विचार उमड़ने लगे। अंतत जब उनके पति को सिंगापुर में तैनाती मिलती है तब वे कुछ और समय तक अमेरिका में ही रहने का फैसला करती हैं।

किताब की यह खूबी है कि शोभा के भीतर के पत्रकार ने संवाद को काफी महत्‍व दिया है। बयानों बातचीत एवं विचारों को पूरी जगह मिली है। पूरे 269 पन्‍ने की इस तरह संवाद एवं कहानियों को संजोते हुए पिरोए गए हैं। किताब का आवरण एयरोग्राम जैसा दिखता है जो एक अप्रवासी और उस जैसे लाखों मुसाफिरों को खोजपरक यात्राओं का प्रतिनिधित्‍व करने वाली पुस्‍तक के लिए एकदम उपयुक्‍त है।

प्रस्‍तुति - केएस नारायण,
साभार - द संडे इंडियन हिन्‍दी पत्रिका
पुस्‍तक का नाम - रिटर्न टू इंडिया
लेखिका - शोभा नारायण
प्रकाशक - रूपा
पृष्‍ठ संख्‍या - 269
कीमत - 395

पहले मां बनो, फिर बनो पत्‍नी

टोटोपाडा के जंगल से बॉलीवुड तक | हम नया कुछ नहीं करते, हम पुराने को तरीकों फिर से दोहराते हैं, लेकिन ख़बरों में आने के बाद वो नया सा लगने लगता है चाहे वो योग या फिर लिव इन रिलेशन का कनेक्‍शन।

भारत भूटान सीमा पर एक टोटोपाडा नामक ऐसी जगह है, जहां आज भी शादी से पहले लड़की को गर्भवती होना पड़ता है। कहते हैं कि टोटो जनजाति समुदाय के लड़के को जो लड़की पसंद आती है, वो उसके साथ फरार होता है एवं लड़का लड़की एक साथ रहते हैं, कुछ महीनों बाद जब लड़की गर्भधारण कर लेती है तो लड़की को शादी के काबिल माना जाता है। भले ही हम हिन्‍दी फिल्‍मों में कुछ महिलाओं को त्रासदी झेलते देखते हैं, जब वो अपने प्रेमी से कहती हैं, जोकि फिल्‍म में विलेन है, लेकिन लड़की के लिए प्रेमी, मैं तुम्‍हारे बच्‍चे की मां बनने वाली हूं।
मगर बॉलीवुड की कहानी भी रुपहले पर्दे से बेहद अलग है, जहां बहुत सी अभिनेत्री हैं, जो टोटोपाडा की प्रथा को बॉलीवुड में स्‍थापित कर चुकी हैं। ख़बरों की मानें तो बॉलीवुड की सदाबाहर अभिनेत्री श्रीदेवी ने बोनी कपूर से उस समय शादी की थी, जब वह करीबन सात माह की गर्भवती थी।

परदेस से बॉलीवुड में प्रवेश करने वाली महिमा चौधरी ने अपने गर्भवती होने की रिपोर्ट देकर सब को चौंका ही दिया था, क्‍यूंकि रितु से महिमा बनी परदेस गर्ल ने कब शादी कर ली, मीडिया तक को ख़बर नहीं थी, ख़बर तब हुई, जब महिमा चौधरी ने कहा, मैं गर्भवती हूं। कहते हैं कि कईयों के साथ अफेयर को लेकर चर्चाओं में रही महिमा चौधरी ने चुपके से बॉबी मुखर्जी को अपना बना लिया।

श्रुति हसन, जिसके अभी तक रुपहले पर्दे पर कदम नहीं जम सके, के होने से पूर्व उनकी माता सारिका ठाकुर का कमन हसन के साथ लव चल रहा था, जिसको लेकर कमल हसन की पहली बीवी बेहद परेशान थी। इस दौरान सारिका ने श्रुति हसन को जन्‍म दिया, जिसके बाद कमल हसन ने सारिका से शादी की एवं कुछ सालों बाद दोनों अलग हो गए।

लीक से हटकर एवं गम्‍भीर अभिनय के लिए जानी जाने वाली अभिनेत्री कोंकणा सेन शर्मा ने सितम्‍बर 2010 में अभिनेता रणवीर शौरी से शादी की एवं अगले साल मार्च में एक बच्‍चे को जन्‍म दिया। इससे यह बात तो स्‍पष्‍ट होती है कि कोंकणा सेन शादी से पूर्व गर्व धारण कर चुकी थी।

लगता है कि टोटोपाडा से निकलकर बॉलीवुड में घुस चुकी प्रथा, अब धीरे धीरे मैट्रो सिटी में भी प्रवेश करने से भी नहीं हिचकाएगी। कुछ शहरों में तो ऐसा हो भी रहा है, लेकिन इज्‍जत न चली जाए के कारण सामने नहीं आते, बॉलीवुड में तो ख़बर रुकती नहीं। वहां तो दुष्‍प्रचार भी पब्‍लसिटी के लिए हिट फार्मूला है।

क्राइम शो के होस्‍ट राघवेंद्र कुमार मुद्गल नहीं रहे

‘चैन से सोना है तो जाग जाओ’ कहने वाले राघवेंद्र नहीं रहे। टीवी चैनल पर चर्चित रहे क्राइम शो सनसनी के एंकर राघवेंद्र कुमार मुद्गल का रविवार को पटना में निधन हो गया। वे कई घंटों से वेंटिलेटर पर थे। उनका अंतिम संस्कार रविवार को ही पटना में किया गया। 
        
दिल का दौरा पडऩे के बाद वे कई दिनों से मगध अस्पताल के आईसीयू में भर्ती थे। राघवेंद्र की स्कूली शिक्षा बिलासपुर में हुई थी। उनके पिता आरटीओ अधिकारी थे। वे अंबिकापुर से रिटायर हुए। फिर वहीं बस गए। राघवेंद्र ने आकाशवाणी अंबिकापुर के ड्रामा आर्टिस्ट के तौर पर करिअर की शुरुआत की थी। 

   इप्टा में उन्होंने अपना अभिनय कौशल संवारा। दिल्ली और चंडीगढ़ में एनएसडी के कलाकारों के साथ भी काम किया। वे बीबीसी की कई डाक्यूमेंट्रीज में भी नजऱ आए। मुदगल ने एक भोजपुरी फिल्म ‘भोले शंकर’ में विलेन का रोल किया था। इसके हीरो मिथुन चक्रवर्ती थे। उन्होंने न्यूज़ एक्सप्रेस चैनल में भी काम किया।