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लफ्जों की धूल

(1)
भले ही,
तुम लहरों सी करो दीवानगी,
लेकिन मैं अक्सर तेरा,
किनारों की तरह इंतजार करूँगा।

लेकिन, मुझे तो इक घर की जरूरत है

(1)

जिस्म के जख्म
मिट्टी से भी आराम आए
रूह के जख्मों के लिए
लेप भी काम न आए

(2)
वक्त वो बच्चा है,
जो खिलौने तोड़कर
फिर जोड़ने की
कला सीखता है

(3)
माँ का आँचल
तो हमेशा याद रहा,
मगर, 
भूल गया बूढ़े बरगद को
छाँव तले जिसकी खेला अक्सर।

(4)
जब कभी भी, टूटते सितारे को देखता हूँ
यादों में किसी, अपने प्यारे को देखता हूँ।

(5)
जब तेरी यादें धुँधली सी होने लगे,
तेरे दिए जख्म खरोंच लेता हूँ।

(6)
तेरे शहर में मकानों की कमी नहीं,
लेकिन, मुझे तो इक घर की जरूरत है
वेलकम लिखा शहर में हर दर पर
खुले जो, मुझे उस दर की जरूरत है

आभार
कुलवंत हैप्पी

पंजाबी है जुबाँ मेरी, शेयर-ओ-शायरी

पंजाबी है जुबाँ मेरी, शेयर-ओ-शायरी

(1)
पंजाबी है जुबाँ मेरी,
लेकिन हिन्दी भी बोलता हूँ।
बनाता हूँ शरबत-ए-काव्य जब
ऊर्दू की शक्कर घोलता हूँ॥

(2)
मैं वो बीच समुद्र
एक तूफाँ ढूँढता हूँ।
हूँ जन्मजात पागल
तभी इंसाँ ढूँढता हूँ॥

(3)
गूँगा, बहरा व अन्धा
है कानून मेरे देश का।
फिर भी चाहिए इंसाफ
देख जुनून मेरे देश का।

(4)
खिलते हुए गुलाबों से प्यार है तुमको
काँटों से भरी जिन्दगी में
तुम आकर क्या करोगी।

देता नहीं जमाना तुमको आजादी जब
फिर इन आँखों में सुनहरे ख्वाब
सजा क्या करोगी।

शेयर-ओ-शायरी

आज ज्यादातर ब्लॉगरों के ब्लॉगों पर धर्म युद्ध चल रहा है। जिनको पढ़ने के बाद मन में कुछ शेयर उभरकर आए। जो आपकी नजर करने जा रहा हूं। वैसे उन ब्लॉगों पर भी छोड़ आया।

मेरा धर्म बड़ा और तेरा छोटा, जब तक कमबख्त बहस चलती रहेगी।
जलते रहेंगे मासूम परवाने, जब तक शमां नफरत की जलती रहेगी॥

धर्म के नाम पे तुम दुकानदारी यूं ही चलाते रहो।
दंगे फसादों में इंसां को पुतलों की तरह यूं जलाते रहो॥


शेयर-ओ-शायरी

पिंजरों में बंद परिंदे क्या जाने कि पर क्या होते हैं,
कुएं के मेंढ़क क्या जाने यारों समंदर क्या होते हैं,
जंगलों में भटकने वाले क्या जाने घर क्या होते हैं,

भागती जिन्दगी में अपनों संग वक्त बिताना मुश्किल है,
जैसे मंदिर मस्जिद के झगड़े में इंसां बचाना मुश्किल है,

मैं मंदिर, मस्जिद और चर्च गया,
न जीसस, न अल्लाह और न राम मिला
जब निकल बाहर
तो इनके नाम पर दंगा फसाद आम मिला