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माँ दिवस पर "युवा सोच युवा खयालात" का विशेषांक

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अगर आसमाँ कागद बन जाए, और समुद्र का पानी स्याही, तो भी माँ की ममता का वर्णन पूरा न लिख होगा, लेकिन फिर शायरों एवं कवियों ने समय समय पर माँ की शान में जितना हो सका, उतना लिखा। शायरों और कवियों ने ही नहीं महात्माओं, ऋषियों व अवतारों ने भी माँ को भगवान से ऊंचा दर्जा दिया है। आज माँ दिवस है, ऐसे शुभ अवसर पर विश्व की हर माँ को तहेदिल से इस दिवस की शुभकामनाएं देते एवं उनके चरण स्पर्श करते हुए उनकी शान में कवियों शायरों द्वारा लिखी रचनाओं से भरा एक पन्ना उनको समर्पित करता हूँ, एक छोटे से तोहफे के तौर पर।


खट्टी चटनी जैसी माँ।-निदा फाज़ली बेसन की सौंधी रोटी पर, खट्टी चटनी जैसी माँ। याद आती है चौका बासन, चिमटा फूँकनी जैसी माँ। बाँस की खुर्री खाट के ऊपर, हर आहट पर कान धरे। आगे पढ़ें
चार दीवार-इक देहरी माँ - सुधीर आज़ाद चार दीवार-इक देहरी माँ इक उलझी हुई पहेली माँ। सारे रिश्ते उस पर रक्खे, क्या क्या ढोए अकेली माँ। सर्द रातों का ठंडा पानी, जून की दोपहरी माँ। आगे पढ़ें 
आलोक श्रीवास्तव की रचना-अम्मा धूप हुई तो आंचल बन कर कोने-कोने छाई अम्मा, सारे घर का शोर-शराबा, सूनापन तनहाई अम्मा। सारे रिश्ते- जेठ दोपहरी, गर्म-हवा,…