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हैप्पी अभिनंदन में वृंदा गांधी

हैप्पी अभिनंदन में आज मैं आपको जिस ब्लॉगर हस्ती से रूबरू करवाने जा रहा हूँ, उसको ब्लॉग जगत में आए भले ही थोड़ा समय हुआ हो, लेकिन वो हस्ती जिस सोच और जिस ऊर्जा के साथ ब्लॉगिंग की दुनिया में आई है, उसको देखने के बाद नहीं लगता कि वो लम्बी रेस का घोड़ा नहीं। उसके भीतर कुछ अलग कुछ अहलदा करने की ललक है, वो आससान को छूना चाहती है, लेकिन अपने बल पर, शॉर्टकट उसको बिल्कुल पसंद नहीं। वो जहाँ एक तरफ पटियाला यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही है, वहीं दूसरी तरफ ब्लॉगिंग की दुनिया में अपने लेखन का लोहा मनवाने के लिए उतर चुकी है। पत्रकारिता और ब्लॉगिंग से रूबरू हो चुकी वृंदा गांधी आखिर सोचती क्या हैं ब्लॉग जगत और बाहरी जगत के बारे में आओ जानते हैं उन्हीं की जुबानी :-

कुलवंत हैप्पी : आप ब्लॉग जगत में कैसे आए, और आपको यहाँ आकर कैसा लग रहा है?
वृंदा गांधी :
कुछ समय पहले तक ब्लॉग मेरे लिए एक स्वप्न था क्योंकि इसके बारे में अधिक जानकारी नहीं थी। मेरा यह स्वप्न हकीकत में तब्दील हुआ, जब में अपनी ट्रेनिंग जनसत्ता समाचार-पत्र में करने गई। वहाँ सबके ब्लॉग देख एक इच्छा जागृत हुई और अरविन्द शेष जो वहाँ के चीफ सब-एडिटर हैं। उन्होंने जाने से पहले यह ब्लॉग नामक उपहार मुझे दिया। बहुत ही अच्छा अनुभव है और बहुत ख़ुशी होती है कि मैं भी इसी ब्लॉगजगत का हिस्सा हूँ।

कुलवंत हैप्पी : क्या ब्लॉग को अभिव्यक्ति का उत्तम जरिया मानती हैं, अगर हाँ तो क्यों?
वृंदा गांधी :
मेरे ख्याल से ब्लॉग अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। मुख्यता नए लेखकों या कहू आने वाले नामों के लिए। किसी समाचार पत्र में भेजे गए लेख, कहानी या किसी रचना को प्रकाशित करने से पहले वह अपनी पॉलिसी देखेंगे। लेकिन ब्लॉग के राही हम अपनी राय, विचार हर मुद्दे पर बेबाकी से दे सकते हैं। यह मंच हमें अपनी बातों व अपनी सोच को बिना दबे सबके सामने रखने की स्वतन्त्रता प्रदान करता है, ताकि अन्य भी उसे देख अपनी प्रतिक्रिया जाहिर कर सके।

कुलवंत हैप्पी : आपने पत्रकारिता को किस उद्देश्य से चुना और आपके आदर्श कौन है?
वृंदा गांधी :
बीए के समय रेडियो सुनने का बहुत शौक था। सोचती थी कि न-जाने ये कितने बड़े लोग होते होंगे जिनकी कहानियाँ अख़बारों में प्रकाशित होती हैं, लेकिन कभी एहसास नहीं था कि एक दिन मेरा नाम भी उन्ही लोगों के बीच होगा। लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में आकर लगता है कि लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ की शक्ति को अगर सकरात्मक राह की ओर लगाया जाए तो कौन सी समस्या सुलझाई नहीं जा सकती। मगर यहाँ तो पूरा सिस्टम ही खराब है, कोई जन समाज की बात करने को ही तैयार नहीं। रही मेरे आदर्श की बात, तो मेरे आदर्श मेरे पिता जी व मेरी ताई माँ हैं। उन्होंने हमेशा आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। मेरे पिता जी हमेशा से मेरे बड़े आलोचक भी रहे हैं। मेरी खूबियों से अधिक वो मेरी कमियों पर नजर रखते हैं।

कुलवंत हैप्पी : मीडिया या गैर मीडिया लोगों में से ज्यादा किसी को पढ़ना अच्छा लगता है?
वृंदा गांधी :
मीडिया लोगों को तो पढ़ती ही हूँ, क्योंकि हमारा यह क्षेत्र है। पर गैर-मीडिया लोगों को पढ़कर ज्यादा प्रसन्नता होती है कि वह लेखनी में अपना योगदान दे रहे हैं। वह कुछ नया और उत्तम स्तर का साहित्य सामने लेकर आ रहा हैं।

कुलवंत हैप्पी : अपनी जिन्दगी का कोई ऐसा रोचक लम्हा जो हमारे साथ बाँटना चाहती हों?
वृंदा गांधी :
अभी कुछ समय पूर्व मेरी एक कहानी दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित हुई। मेरे कमरे में वह समाचर-पत्र पड़ा था। एक लड़की आई और उसे देखने लगी, थोड़ी देर बाद उसने कहा क्या मैं इसे ले जाऊं पढ़ना चाहती हूँ। कुछ दिनों बाद वह फिर से आई और धन्यवाद कहने लगी। मैंने हैरानी से पूछा किस लिए? तो वह कहने लगी, मेरी बुआ जी ने आठवीं कक्षा की फेरवेल पर कुछ शब्द कहने थे। मैंने तुम्हारी कहानी उन्हें सुनाई वे बहुत प्रभावित हुई और उन्होंने यह अपने विद्यार्थियों के साथ भी सांझी की, जिससे वह कुछ शिक्षा ले सके। कहानी का नाम था ' समझदारी से जीत' की पढ़ाई-लिखाई हमारे लिए कितनी आवश्यक है। उसकी यह बातें सुन में भाव-विभोर हो गई और लगा कि शायद मेरी लेखनी भी सार्थक हो गयी।

कुलवंत हैप्पी : ज्यादा टिप्पणियाँ प्राप्त वाले ब्लॉगर क्या ज्यादा सार्थक लिखते हैं?
वृंदा गांधी :
मेरा मानना है की टिप्पणियाँ आवश्यक हैं, लेकिन उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कितने लोगों ने उसे ध्यानपूर्वक पढ़ा। टिप्पणियों के बारे में मेरा मानना है कि इससे हमें प्रोत्साहन मिलता है। वहीं और बेहतर लिखने की प्रेरणा मिलती है, क्योंकि हर व्यक्ति प्रशंसा का भूखा  है, परन्तु इसे मस्तिष्क पर चढ़ाने की बजाय सकरात्मक रूप से ले कि लोगों की अब आपसे उमीदें बढ गयी है और आपको अब पहले से अधिक मेहनत करनी है, जिससे आप उनके विश्वास को पूरा कर सके।

कुलवंत हैप्पी : आपको किस तरह के ब्लॉग पढ़ने अच्छे लगते हैं?
वृंदा गांधी :
निराश न हो, इरादे न बदल, तकदीर किसी वक़्त भी बदल सकती है। मैं हमेशा किसी एक चीज को पढ़ना पसंद नहीं करती, क्योंकि हर विषय के बारे में जानकारी आवश्यक है। वैसे मुझे कुलवंत जी का युवा सोच युवा ख़यालात व मोहल्ला पढ़ना पसंद है, जो में नियमित रूप से पढ़ना पसंद करती हूँ।

कुलवंत हैप्पी : युवा सोच युवा खयालात के पाठकों एवं अन्य ब्लॉगर साथियों के लिए कोई संदेश देना चाहे तो जरूर दें?
वृंदा गांधी :
अंत में सन्देश नहीं, मैं प्रार्थना करना चाहूंगी। नए लोगों को प्रोत्साहन दें, आपके द्वारा की गई एक टिप्पणी किसी को और बेहतर लिखने के लिए प्रेरित कर सकती है। अत: संकोच न करते हुए बिगड़ैल युवाओं से कहना चाहूंगी कि लड़कियों के साथ शालीनता से पेश आए। यह हमेशा याद रखें कि तुम्हारे घर में भी एक माँ और बहन तुम्हारा इंतजार कर रही है। उसको भी कल भरे बाजार निकलना है। अपनी युवा शक्ति का इस्तेमाल समाज सुधारक कामों में करें। सपने देखें व उन्हें पूरा करने के लिए जान लगा दे।

बुझ जाए शमा तो जल सकती है, तूफान से भी किश्ती निकल सकती है।

क्क दे फट्टे : भूरा मिस्त्री ने एक पढ़ी लिखी लड़की से पूछा, (जो काफी समय विदेश में रहकर भूरे मिस्त्री के गाँव लौटी थी) "आई लव यू" क्या अर्थ क्या होता है। उसने कहा, "मैं तुमसे प्यार करती हूँ"। भूरा मिस्त्री तुरंत बोला, 'तुम गोरियों की यहीं तो दिक्कत है कि कुछ पूछा नहीं कि बोल देती हैं तुमसे प्यार करती हूँ।

भार
कुलवंत हैप्पी