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लंडन ड्रीम्स- द बेस्ट मूवीज


विपुल अमृतलाल शाह मेरी उम्मीदों पर खरा उतरा, बाकी का तो पता नहीं, बेशक हाल में तालियों की गूंज सुनाई दे रही थी और ठहाकों की भी। आँखें, वक्त, नमस्ते लंडन, सिंह इज किंग के बाद विपुल शाह की लंडन ड्रीम्स को भी शानदार फिल्मों की सूची में शुमार होने से कोई नहीं रोक सकता, खासकर मेरी मनपसंद शानदार फिल्मों की सूची से। सिंह इज किंग भले ही अनीस बज्मी ने निर्देशित की हो, लेकिन विपुल शाह का योगदान भी उसमें कम नहीं था, क्योंकि एक अच्छा निर्माता एक निर्देशक को अपने ढंग से काम करने के लिए अवसर देता है। लंडन ड्रीम्स शुरू होती है अजय देवगन (अर्जुन) से, जो संघर्ष कर सफलता की शिखर पर है, लेकिन वो अपने सपनों के लिए अपनों को खोने से भी भय नहीं खाता। वो बचपन से माईकल जैक्सन बनना चाहता है, लेकिन उसके पिता को गीत संगीत से नफरत है। वो भगवान से दुआ करता है कि उसके रास्ते की सब रुकावटें दूर हो जाएं। अचानक उसके पिता की मौत हो जाती है और उसका चाचा ओमपुरी उसको लंडन ले जाता है, जो उसका ख्वाब है। वो एयरपोर्ट से ही अपने चाचा का साथ छोड़कर सपनों को पूरा करने के लिए निकल पड़ता है। संघर्ष करते करते वो अपने सपने की तरफ अग्रसर होता है। इस दौरान उसको अपने दोस्त की याद आती है, जो पंजाब के एक गांव में रहता है। अर्जुन अपने दोस्त मनु को मिलने के लिए गांव आता है, अजुर्न ने संगीत सीखने के लिए संघर्ष किया। मगर मनु (सलमान खान) को गाने की कला भगवान ने गिफ्ट में दी है, लेकिन मस्तमौला स्वभाव का मनु अपने हुनर को नहीं जानता, वो गांव में ही अन्य नौजवानों की तरह मस्ती करते हुए ही जीवन गुजार देना चाहता है। जैसे ईगल साँप को अपने पंजों में फंसाकर आस्मां में ले जाती है, वैसे ही मनु का दोस्त अर्जुन अपने दोस्त को लंडन ले जाता है और शामिल कर लेता है लंडन ड्रीम्स बैंड में। ये बात तो कुदरती ही है कि कुदरत द्वारा बख्सी गई कला तालीम द्वारा हासिल की गई कला से बेहतर होती है। वो बिना मिलावट के होती है। मनु की सफलता अर्जुन के लिए जहर बनती जा रही थी। ये जहर ही मनु और अजुर्न की दोस्ती के बीच दरार बन जाता है। वो मनु को नशे की आदत डलवा देता है, तांकि वो गाना गा न सके और मनु को चाहने वाली असिन भी उसको छोड़ दे। आखिर राज खुल जाता है, सत्य सामने आ जाता है। जिसके बाद मनु अपने गांव वापिस आ जाता है और अर्जुन विदेश में अकेला पड़ जाता है। फिल्म का अंत आम फिल्मों की तरह सुखद होता है, लेकिन एक संदेश छोड़ते हुए। उस संदेश को समझने के लिए फिल्म देखनी होगी मेरे यारों। सलमान खान ने पंजाब के गांवों में बसने वाले मस्तमौला युवकों का रोल खूब निभाया तो अजय देवगन ने गंभीर रोल अदा करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी, गंभीर किरदारों में जान डालना तो अजय की खासियत है। फिल्म में असिन ने काम पूरी ईमानदारी के साथ किया है, वो भी बिल्कुल बिना ओवरएक्टिंग के। ओमपुरी का रोल छोटा है। सलमान खान और असिन पर निर्देशिक ने ज्यादा ध्यान दिया। फिल्म संगीत में थोड़ी मार खाती है, लेकिन कलाकारों के लिए पहनावा बिल्कुल को सही चुना गया है।


जाने अनजाने में ही सही, लेकिन विपुल शाह ने एक सच तो सबके सामने रख दिया है कि पंजाब के युवाओं में कला की कोई कमी नहीं, लेकिन इनको शराब और लापरवाहपने ने मार डाला।