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उंगली उठाने से पहले जरा सोचे

बुधवार को स्थानीय फायर बिग्रेड चौंक पर समाज सेवी संस्थाओं की ओर से हिन्दुस्तानी भ्रष्टाचार के खिलाफ जागरूकता रैली का आयोजन किया गया, जिसमें मैं भी शामिल हुआ। हाथों में जागरूकता फैलाने वाले बैनर पकड़े हम सब सडक़ के एक किनारे खड़े थे, और उन बैनरों पर जो लिखा था, वह आते जाते राहगीर तिरछी नजरों से पढ़कर अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे। इतने में मेरे पास खड़े एक व्यक्‍ति की निगाह सामने दीवार पर लटक रहे धार्मिक संस्था के एक फलेक्‍स पर पड़ी, जिस पर लिखा हुआ था, हम बदलेंगे युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा, उन्होंने मेरा ध्यान उस तरफ खींचते हुए कहा कि वह शब्‍द बहुत कम हैं, लेकिन बहुत कुछ कहते हैं। अपने लेखन से सागर में गागर तो कई लेखकों ने भर दिया, लेकिन हमारा जेहन उनको याद कितनी देर रखता है, अहम बात तो यह है। हमारे हाथों में पकड़े हुए बैनरों पर लिखे नारों की अंतिम पंक्‍ति भी कुछ यूं ही बयान करती है, न रिश्वत लें, न रिश्वत दें की कसम उठाएं, जो बैनर तैयार करते समय मेरे दिमाग से अचानक निकली थी। किसी पर उंगली उठानी, सडक़ों पर निकल कर प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करनी हमारी आदत में शुमार सा हो गया था, लेकिन हम क्‍यों नहीं सोचते के जब हम किसी पर उंगली उठाते हैं तो तीन उंगलियां हमारी तरफ होती हैं, जो हमको याद करवाती हैं कि कुछ दोष तो हमारा भी है, सारा दोष सरकारी सिस्टम का नहीं। हम सिस्टम का बहुत बड़ा हिस्सा हैं, अगर हम सिस्टम को बरकरार रखते हैं, तो ही सिस्टम ठीक रह सकता है, क्‍योंकि सिस्टम बनाने वाले मुट्‌ठी भर लोग हैं, लेकिन उसको संभालकर रखने वाले व बिगाडऩे वाले करोड़ों में हैं। अगर हम रिश्वत देते हैं, तो सामने वाला रिश्वत लेता है। हम अगर नशा पैदा करते हैं, तो हमीं से कुञ्छ लोग बेचते हैं, कुछ लोग खाते हैं। गलियों में सीवरेज का पानी फैल जाता है, तो लोग सडक़ों पर उतर आते हैं, नगर पालिकाओं, नगर निगमों व सरकारों के खिलाफ नारेबाजी करते हैं। लेकिन नारेबाजी करने से पूर्व वह एक दफा भी नहीं सोचते हैं कि आखिर नालियां व सीवरेज बंद क्‍यों होते हैं। प्लास्टिक के लिफाफे इस्तेमाल करने के बाद हम कहां फेंकते हैं? कभी सोचा है! वह लिफाफे ही सीवरेज व्यवस्था को प्रभावित कर देते हैं। जरा सोचो, सीवरेज व्यवस्था प्रभावित होने से हम इतने क्रोधित हो जाते हैं तो जिस तरह भूमि में प्लास्टिक दिन प्रति दिन फेंके जा रहे हैं, एक दिन धरती की सोखने की क्षमता खत्म हो जाएगी, तब क्‍या होगा, किसके खिलाफ नारेबाजी करेंगे। सिस्टम केञ् खिलाफ, कौन से सिस्टम के खिलाफ, जो हम से बनता है, जिसका हम हिस्सा हैं। बेहतर होगा, धार्मिक बोर्ड पर लिखी पंक्‍तियों का अनुसरण करें, जिसमें लिखा था, हम बदलेंगे युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा।

हैप्पी अभिनंदन में यशवंत महेता "फकीरा"

क्षमा चाहता हूँ, पिछले मंगलवार को मैं आपके सामने किसी भी ब्लॉगर हस्ती को पेश नहीं कर पाया। समय नहीं था कहना तो केवल बहाना होगा, इसलिए खेद ही प्रकट करता हूँ।


हैप्पी अभिनंदन में आज आप जिस ब्लॉगर हस्ती से मिलने जा रहे हैं, उनको अनुभवी जनों और बुद्धिजीवियो का साथ, चाय पीना, खेतों की हरियाली, बच्चन की मधुशाला को बार-बार पढना, बच्चों से बातें करना और बच्चों के संग बच्चा बन जाना बेहद अच्छा लगता है। इंदौर से दिल्ली तक का सफर तय करने वाली इस ब्लॉगर हस्ती को हम सब युग क्रांति ब्लॉग पर यशवंत महेता 'फकीरा' के नाम से पढ़ते हैं। जी हाँ, इस बार हमारे साथ यशवंत महेता फकीरा हैं, जिनके विचारों के धागों से बुनी हुई कविताएं रूपी चादरें फकीरा का कोना ब्लॉग पर भी सजी हुई हैं। आओ जानते हैं ब्लॉग जगत और खुद के बारे में यशवंत महेता "फकीरा" क्या कहते हैं?

कुलवंत हैप्पी : आप यशवंत महेता से फकीरा कैसे बने?
फकीरा : यह तो बहुत ही खतरनाक सवाल है। बस एक दिन किसी से प्यार हो गया था। उसके दर पर गए जब तो उसने फकीरा बोल दिया और उस दिन से यशवंत महेता फकीरा बन गया।

कुलवंत हैप्पी : आपकी जन्मस्थली कौन सी है और कर्मस्थली कौन सी है?
फकीरा : मेरी जन्मस्थली मध्यप्रदेश की आर्थिक राज्यधानी इंदौर और कर्मस्थली देश की राज्यधानी दिल्ली है।

कुलवंत हैप्पी : आप ब्लॉग जगत में कब और कैसे आए ?
फकीरा : मैं ब्लॉग जगत में 17 जुलाई 2009 को आया, मेरे पहले ब्लॉग का नाम था 'फकीरा का कोना', जिसको बहुत कम लोग जानते हैं, क्योंकि मैंने उसको किसी भी ब्लॉग एग्रीगेटर के साथ नहीं जोड़ा।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉग जगत में आकर कैसा लग रहा है?
फकीरा : अच्छा लगता है। जब लोग पढ़ते हैं और टिप्पणी करते हैं तो और भी अच्छा लगता है। मैं भी सबको पढ़ता हूँ, लेकिन टिप्पणियाँ थोड़ी कम करता हूँ। फिर भी सारे अच्छे ब्लॉगों पर आना जाना लगा रहता है।

कुलवंत हैप्पी : आपकी नजर में ब्लॉग सोशल नेटवर्किंग है या अभिव्यक्ति का उच्चस्तीय प्लेटफार्म?
फकीरा : देखिए, मैं ब्लॉगिंग को दोनों के बीच में रखूँगा, यह अभिव्यक्ति का प्लेटफॉर्म है, जो अभी उभर रहा है, जिसकी असली ताकत का अंदाजा अभी होना बाकी है। इसको सोशल नेटवर्किंग इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि यहाँ नए नए मित्र मिलते हैं, सोशल नेटवर्किंग वेबसाईटों की तरह।

कुलवंत हैप्पी : कोई ऐसा किस्सा जो कुछ हटकर कुछ करने के लिए प्रेरित करता हो?
फकीरा : संघर्ष करने वाले लोग मुझे बेहद प्रिय हैं, जो निराशा की गर्त से भी हीरा निकालकर ले आते हैं। एक किस्सा याद आ रहा है। एक कौए का। हमारे यहाँ दिल्ली में कौए बहुत हैं। अक्सर वो रोटी के टुकड़े उठाकर ले जाते हैं। एक दिन एक कौआ एक बहुत बड़ा रोटी का टुकड़ा उठाकर ले आया। रोटी का टुकड़ा बहुत बड़ा था। यूँ तो अक्सर कौए काँ काँ कर रोटी के टुकड़े गिरा देते हैं, पर उस कौए ने जिस समझदारी से उस टुकड़े को दो भागों में बाँटकर अपने दोनों पंजों के नीचे रखा और रोटी का आनंद लिया, असल में देखने लायक था। वैसे तो किस्से काफी हैं, लेकिन उक्त किस्सा पिछले दिनों घटित हुआ।

कुलवंत हैप्पी : ब्लॉगर साथियों और युवा सोच युवा खयालात के पाठकों के लिए कोई विशेष सुझाव?
फकीरा : खूब पढ़िए, कम लीखिए और लाजवाब लिखिए, इसके अलावा अच्छे ब्लॉगों का अनुसरण करें। युवा सोच युवा खयालात से समाज और देश का भला कीजिए, चाहे उम्र जो भी हो सोच को हमेशा युवा रखिए। बस इतना ही कहना चाहूँगा।

चक्क दे फट्टे :  एक प्रोग्राम में फकीरा साहिब आटोग्राफ देते देते थक गए, ऐसे में उन्होंने एक बच्चे को आटोग्राफ देते हुए किसी जानवर का रेखाचित्र बना डाला। फकीरा का ऐसा आटोग्राफ देखकर बच्चा तुरंत बोला, सर आपका आटोग्राफ चाहिए, फोटोग्राफ नहीं।