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याकूब मेमन की फांसी बहाने कुछ और भी

मेमन समुदाय के सर्वश्रेष्ठ चार्टेर्ड अकाउंट याकूब मेमन को उसके जन्म दिवस के मौके पर फांसी दी गर्इ। याकूब मेमन ने सीए की डिग्री लेने के बाद एक हिन्दु मित्र के साथ कारोबार शुरू किया। मगर, जल्द ही दोनों अलग हो गए, और देखते देखते मेमन समुदाय का याकूब सर्वश्रेष्ठ चार्टेर्ड अकाउंट बन गया। याकूब मेमन के पास सब कुछ था, नाम, शोहरत, दौलत।

मगर, मृत्यु के समय उसके चरित्र पर एक काला धब्बा था, देशद्रोही होने का। हां, एक समय था, जब फांसी के रस्से चूमने वालों को भारत अपनी सर आंखों पर ही नहीं बल्कि रग रग में बसा लेता था। मगर, उस समय भारत की लड़ार्इ कुछ एेसे लोगों के खिलाफ थी, जो बर्बरता की हद पार किए जा रहे थे।

मगर, याकूब मेमन के गले में डाला फांसी का रस्सा एक समाज को शर्मिंदा कर रहा था, गर्वित नहीं क्योंकि याकूब मेमन उस साजिश का हिस्सा था, जिसने कर्इ हंसते खेलते हुए घरों को एक झटके में बर्बाद कर दिया था। याकूब मेमन, जिस आतंकवादी हमले में शामिल थे, दाउद अब्राहिम के समूह ने उसको बाबरी मस्जिद पर हमले का बदला कहा, मगर, चकित करने वाली बात तो यह थी कि बम्ब धमाकों में मरने वालों का बाबरी मस्जिद गिराने में जरा सा भी हाथ नहीं था, जिन्होंने गिरार्इ, वे आज भी खुलेआम घूमते हैं।

हां, याकूब मेमन के गले में डाला फांसी का रस्सा शायद कुछ हद तक गर्वित करता यदि याकूब मेमन बाबरी मस्जिद गिराने वाले, उस दौरान मरने वाले निर्दोष हिन्दु मुस्लिम लोगों का बदला लेते हुए उन लोगों को निशाना बनाते, जो वास्तव में बाबरी मस्जिद गिराने, मुस्लिम हिन्दु लोगों को मरवाने में शामिल थे।

शहीद उधम सिंह एवं भगत सिंह ने कभी कभी अपने जीवन की भीख नहीं मांगी, क्योंकि उन्होंने केवल उन लोगों को निशाना बनाया, जो वास्तव में घटना के दोषी थे। भगत सिंह ने असेंबली में बम्ब फेंका, मगर किसी की जान तक नहीं ली, केवल अंग्रेजों को समझाया कि कुछ भी हो सकता है। उधम सिंह ने जलियां वाले बाग के दोषी को लंडन में जाकर गोली मारी आैर स्वयं को पुलिस के हवाले कर दिया। उनका फांसी का रस्सा चूमना सार्थक था।

मैंने कहीं नहीं सुना, आैर नाहीं पढ़ा कि फांसी के वक्त भगत सिंह रोया, उधम सिंह रोया क्योंकि उन्होंने जो किया होश में रहकर किया, आैर किसी भी मासूम को नहीं मारा। जो लोग सच में गर्व करने वाला कार्य करते हैं, उनके जीवन के अंतिम पल भी अफसोसजनक नहीं होते। मगर, याकूब मेमन के दामन पर कीचड़ था, गुलाल नहीं।

अंत में, याकूब मेमन पैदा न हों, इसके लिए भी समाज को पहल करनी चाहिए। किसी भी जुर्म का अंत सजा से नहीं होता, अगर, होता तो भारत की जेलों में कैदियों की भरमार न होती। आैर अपराध के आंकड़े दिन प्रति दिन महंगार्इ की तरह उुपर न जाते। देश का कानून सभी के लिए बराबर का होना चाहिए, चाहे वो अफजल गुरू हो, चाहे वो बाबू बजरंगी, माया कोडनानी हो, चाहे बेअंत सिंह का हत्यारा हो ?

नहीं तो, असदुद्दीन ओवैसी का यह सवाल देश की न्यायव्यवस्था को कटघरे में लाकर खड़ा कर देगा, जिसमें ओवैसी पूछते हैं कि बाबू माया के लिए फांसी क्यों नहीं मांगी? ओवैसी ने दलील दी कि अगर राजीव गांधी और बेअंत सिंह के हत्यारों को फांसी नहीं दी गई तो मुंबई धमाके के सबूत देने वाले याकूब को फांसी क्यों दी जा रही है?