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वाह रे ममता बेनर्जी वाह

तृणमूल कांग्रेस के पश्‍िचमी बंगाल में लाल के लिए कोई जगह नहीं। लाल को सत्‍ता से बर्खास्‍त कर चुकी ममता बेनर्जी की अगुवाई वाली सरकार ने गत 5 अगस्‍त को आये सर्वोच्‍च अदालत के फैसले लाल बत्‍ती का दुरुप्रयोग रोकना चाहिए के बाद फैसला लिया कि लाल रंग की बत्‍ती को हरे में बदल दिया जाएगा। ममता बेनर्जी सरकार के इस फैसले से हैरान सीपीएम कहती है कि सरकार करने क्‍या जा रही है यह समझ से परे है। 

मदन मित्रा, खेल और परिवहन मंत्री ने कहा कि एक राज्‍यपाल की कार को छोड़कर बाकी सब पर वीआईपी लोगों की कारों पर लाल की जगह अब हरी बत्‍ती लगेगी। उनका कहना है कि पश्‍चिमी बंगाल में लाल के लिए कोई जगह नहीं है। इस संदर्भ में उनको ममता बेनर्जी से मंजूरी मिल चुकी है। इससे पहले सरकार सरकारी दीवारों और अन्‍य कार्यालयों को हरे रंग में रंग चुकी है।
 
अगर अदालती आदेश की बात करें तो अदालत ने कहा था कि लाल बत्‍ती सायरन के कारण लोग प्रभावित होते हैं, मगर पश्‍िचमी बंगाल सरकार ने लाल को हरा कर अदालती आदेश के आधे हिस्‍से पर रंग चढ़ा दिया है, पूरे पर नहीं, क्‍यूंकि लाल बत्‍ती हो या हरी। इससे फर्क नहीं पड़ता, फर्क पड़ता है अलग पहचान से। जो पहचान कल तक लाल बत्‍ती की थी, अब वे ग्रीन की हो जाएगी। रंग बदलने से फर्क तो कुछ नहीं पड़ेगा। केवल मन समझने के लिए, आंखों में धूल झोंकने के लिए काफी है। लाल तो ममता की आंखों में पहले से ही चुभता था, अदालत के आदेश ने इसको हटाने में ममता की ओर मदद कर दी। वाह रे ममता वाह।

रेलवे को नहीं मिला 'ममता बेनर्जी' का 'करीमगंज'

-: वाइआरएन सर्विस :-
 
जब ममता बेनर्जी रेल मंत्री थी, तो उन्‍होंने लोकसभा में रेलवे बजट पेश करते हुए पश्‍चिमी बंगाल स्‍थित कटवा एवं करीमगंज के बीच रेल लाइन बिछाने का एलान किया था, मगर 25 फरवरी, 2011 को हुई घोषणा अभी तक पूरी नहीं हुई, क्‍यूंकि रेलवे विभाग को कटवा के आसपास करीमगंज नामक कोई स्‍टेशन मिला ही नहीं।

जानकारी के मुताबिक तत्तकालीन रेलमंत्री की घोषणा को अमली जामा पहनाने के लिए जब रेलवे विभाग ने कमर कसी, तो उनके पसीने छूट गए, मगर करीमगंज नामक स्‍टेशन रेलवे विभाग को नहीं मिला। फिलहाल रेलवे विभाग ने थक हार कर इस घोषणा को अपनी ब्‍लू बुक से हटाने का मन बना लिया है। ब्लू बुक में रेलवे की सभी लंबित, जारी और प्रस्तावित परियोजनाओं का ब्यौरा होता है।

गौरतलब है कि करीमगंज नामक जगह पश्चिमी बंगाल में तो कहीं नहीं, लेकिन असम में जरूर है, जो कटवा से करीबन साढ़े सात सौ किलोमीटर दूर है। इसके अलावा इस नाम की जगह बंगला देश में भी है, जो कटवा से आठ सौ से नौ सौ किलोमीटर दूर है।

अब तो ममता बेनर्जी ही बता सकती हैं कि यह क्‍लेरीकल मिस्‍टेक है या फिर कोई उनकी निगाह में ऐसा स्‍थान है, जो रेलवे विभाग की नजर से दूर है, क्‍यूंकि करीमगंज ढूंढ़ने के मामले में रेलवे विभाग तो हाथ खड़े कर चुका है।