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बिहार से लौटकर; बदल रहा है बिहार

जब बिहार अपने 100 वर्ष पूरे कर रहा था, उन्‍हीं दिनों हमारा कंपनी के काम को लेकर बिहार जाना हुआ है, बिहार को लेकर कई प्रकार की धारणाएं समाज फैली हुई हैं, जैसे कि यह लोग मजदूरी के लायक हैं, यह लोग बेहद गरीब हैं, बिहार में गुंडागर्दी एवं लूटमार बहुत होती हैं, यह लोग विनम्र नहीं, पता नहीं क्‍या क्‍या, मगर जैसे ही असनसोल एक्‍सप्रेस ने बिहार में एंट्री मारी, वैसे ही मेरी निगाह हरे भरे खेतों की तरफ गई, जहां किसान काम कर रहे थे, कुछ लोग भैंसों खाली स्‍थानों पर चरा रहे थे, कुछ कुछ किलोमीटर पर पानी के चश्‍मे थे, जो किसी भी राज्‍य के लिए गर्व की बात होती है, मैं यह सब देखते हुए रेलगाड़ी के साथ आगे बढ़ रहा था, खुशी थी कि कंपनी के काम के कारण ही बिहार की एक झलक देखने को तो मिली, बिहार के उपरोक्‍त दृश्‍य मुझे अनिल पुस्‍दकर के ब्‍लॉग अमीर देश गरीब लोग की याद दिला रहे थे कि इनका राज्‍य कितना अमीर है, यह कोई नहीं जानता, बस अगर कोई जानता है तो इतना के बिहारी दूसरे राज्‍यों में जाकर कार्य करते हैं।

जैसे ही पटना पहुंचा तो सबसे पहले वहां की स्‍िथति को जानने के लिए मैंने वहां बिक रहा अखबार खरीदा, जिसको इंटरनेट पर कई दफा देखा, मगर हकीकत में पहली बार देखा, इसका लेटआउट बेहद प्‍यारा था, और यह अंक वाक्‍य में बेहतरीन था, इसी अंक ने मुझे यह बतलाया कि आज बिहार सौ साल का हो गया एवं इस अंक के अंदर बुजुर्ग एवं युवा के विचारों का सुमेल अंकित किया गया था, जिससे यह पता चल सके कि बिहार ने असल में तरक्‍की की या नहीं, युवा पीढ़ी के विचार देखकर लगा कि बिहार तरक्‍की के राह पर अग्रसर है, और यहां की स्‍िथति दिन प्रति दिन बदल रही है, लोगों में जागरूकता आ रही है।

इतने में मेरे सामने बैठे एक नौजवान ने हम से बात करने में रुचि दिखाई, इसने बिहार के अंदर हो रहे परिवर्तनों से अवगत करवाया, सबसे बेहतरीन बात तो यह थी कि वह युवक अपनी मीडिया की अच्‍छी खासी जॉब छोड़कर अपने राज्‍य लौट चुका था, क्‍योंकि वह नहीं चाहता था कि बिहारियों को भी अब पहले की तरह आंका जाए, यह बात वह अकेला ही नहीं, बल्‍कि बिहार का हर पढ़ा लिखा युवक सोच रहा है, पिछले कुछ सालों से बिहार के निवासियों ने अन्‍य राज्‍यों की तरफ जाने का रुझान कम कर दिया, जो बिहार के अंदर हो रहे विकास की पहली निशानी कही जा सकती है, इतना ही नहीं युवक ने बताया कि बिहारी मजदूर कितने माह बाहर रहते हैं, ज्‍यादा से ज्‍यादा तीन माह, उसके बाद वह अपने राज्‍य को लौटते हैं, खाली हाथ नहीं बल्‍िक एक अच्‍छे धन के साथ, जिसका वह अपनी कृषि में निवेश करते हैं, जो कि एक बेहतरीन निवेश है।

वो युवक तो बगुसराय उतर गया, लेकिन उसकी जगह कुछ और युवक आकर बैठ गए, जो सुखवल जा रहे थे, सुखवल नेपाल के समीप स्‍थित है एवं कहते हैं कि यहां के हर घर में हथियार हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह लोग हिंसक प्रवृति के ही हैं, बल्‍कि यह हथियार, तब निकलते हैं, जब बात इज्‍जत पर आ जाए, वो तो देश के हर कोने में होता है, उस युवक ने बताया कि मुंगेर के अंदर हर प्रकार के हथियार बनते हैं, नई नई तकनीकों के हथियार, जो शायद नक्‍सलियों को भी सप्‍लाई होते होंगे, मगर सहरसा आने से पहले पहले उस युवक के मुंह से यह तो निकल गया कि अब बिहार में बीस फीसदी गुंडे बचे हैं, बाकी सब अंडरग्राउंड या जेलों में बंद हैं। वह युवक आईसीआई बैंक में जॉब के लिए इंटरव्‍यू देकर सुखवल लौट रहा था, जो इस बात की ओर इशारा करता है कि वहां के लोग भी सुखद एवं भय रहित जीवन जीने के इच्‍छुक हैं।

सहरसा पहुंचने के बाद जब हम उन लोगों से मिले, जिनसे मिलना था, तो मिलकर बिल्‍कुल नहीं लगा कि बिहार के अंतिम स्‍टेशन पर हम पहुंच चुके हैं। उनका मिलनसार व्‍यवहार ही कुछ ऐसा था, अगले दिन सुबह कचहरी में कंपनी के काम से जाना हुआ, जब हम कचहरी पहुंचे तो वहां एक परिंदा तक नहीं था, लेकिन जब बाद दोपहर लौट रहे थे तो पैर रखने की जगह तक नहीं थी।

जब बिहार से सूरत पहुंच तो यह घटनाक्रम हमने जेबीएम परिवार के एमडी अशोक मंगुकिया के साथ शेयर किया, तो उन्‍होंने कहा कि जैसा नेता वैसी प्रजा, आज बिहार की सत्‍ता एक पढ़े लिखे एवं सुलझे हुए इंसान के हाथों में है, तो स्‍वभाविक है कि वहां की जनता में परिवर्तन आएगा।