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13 साल से कम उम्र के लिए फेसबुक बैन!

नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को दुनिया की अग्रणी सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक से अपनी साइट के मुख्य पेज पर यह चेतावनी जारी करने के लिए कहा कि 13 वर्ष से कम आयु के बच्चे यहां अपना खाता नहीं खोल सकते।

न्यायालय की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश बी. डी. अहमद एवं न्यायाधीश विभु बाखरू की पीठ ने फेसबुक से 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों को खाता खोलने की इजाजत न देने के लिए कहा।

फेसबुक की तरफ से न्यायालय के समक्ष उपस्थित वरिष्ठ वकील पराग त्रिपाठी ने न्यायालय को आश्वासन दिया कि साइट अपने मुख्य पेज पर 13 वर्ष से कम आयु के बच्चो के खाता न खोलने से संबंधित चेतावनी जारी करेगा।

न्यायालय ने केंद्र सरकार से भी यह बताने के लिए कहा कि बच्चों को ऑनलाइन सोशल नेटवर्किग साइटों पर होने वाली अभद्रता से बचाने के लिए उसके पास क्या कानून है।

बंदूकधारी युवक ने ली 20 मासूमों समेत 28 की जान

मां को मारने के बाद स्‍कूल पहुंचा

-: वाईआरएन सर्विस :-

अमरीका के कनेक्टीकट राज्य में एक बंदूकधारी ने 28 लोगों को गोलियों से भुन डाला। इस हमले में 20 बच्‍चों समेत 28 लोगों की मौत हो गई। मृतकों में बंदूकधारी की मां भी शामिल है। इस हमले में हमलावर भी घटनास्‍थल पर मृत पाया गया है। हमलावर की उम्र लगभग 20 साल बताई जा रही है। पुलिस का मानना है कि हमलावर का स्‍कूल से संबंध हो सकता है। ये हादसा न्यूटाउन के सैंडी हुक एलिमेन्टरी स्कूल में हुआ।

इस हमले को अब तक के इतिहास के सबसे घातक हमलों में गिना जा रहा है। इससे पहले साल 2007 में वर्जिनिया में हुए हमले में 32 लोग मारे गए थे। इस हादसे के बाद घबराए हुए अभिभावक सैंकड़ों की संख्‍या में घटनास्‍थल पर पहुंचे।

इस हादसे को अंजाम देने वाले बंदूकधारी युवक की पहचान एडम लांजा के रूप में हुई और उसने घटना के बाद खुद को गोली मारकर आत्‍महत्‍या कर ली। बंदूकधारी की मां स्‍कूल में कार्यरत थी, जिसके शव को पुलिस ने उनके घर से बरामद किया। मरने वालों में अधिक संख्‍या 5 से 10 साल के बच्‍चों की है।

इस हमले के पीछे क्‍या कारण है, अभी पूरी तरह स्‍पष्‍ट नहीं, शायद एडम मन ही मन किसी बात से क्षुब्‍ध था, उसने बदला लेने के लिए इस हमले को अंजाम दिया।

थप्‍पड़ अच्‍छे हैं

जोर से थप्‍पड़ मारने के बाद धमकी देते हुए मां कहती है, आवाज नहीं, आवाज नहीं, तो एक और पड़ेगा। जी हां, मां कुछ इस तरह धमकाती है। फिर देर बाद बच्‍चा पुराने हादसे पर मिट्टी डालते हुए मां के पास जाता है तो मां कहती है कि तुम ऐसा क्‍यूं करते हो कि मुझे मारना पड़े।

अब मां को कौन समझाए कि मां मैं अभी तो बहुत छोटा हूं या छोटी हूं, तुम कई बसंत देख चुकी हो। तुम भी इन थप्‍पड़ों को महसूस कर चुकी हो। मेरे पर तो तुम इतिहास दोहरा रही हो या कहूं कि एक विरासत को आगे बढ़ा रही हो। यह थप्‍पड़ मुझे जो आपने दिए हैं, वो कल मैं भी अपनी संतान को रसीद करूंगा या करूंगी, और मुझे पता भी न होगा, कब मेरा हाथ आपकी नकल करते हुए उसकी गाल पर छप जाएगा।
जब मम्‍मी मारती है तो पड़ोस में खड़े पापा या कोई अन्‍य व्‍यक्‍ति कहता है, क्‍यूं मारती हो बच्‍चे को, बच्‍चे तो जिद्द करते ही हैं, तुम्‍हें समझने की जरूरत है, मगर मां को नसीहत देने वाला, कुछ समय बाद इस नसीहत की धज्‍जियां उड़ा रहा होता है।

मां बाप के थप्‍पड़ का दर्द नहीं होता, क्‍यूंकि उनके पास प्‍यार की महरम है। हम बच्‍चे भी तो कितनी जिद्द करते हैं, ऐसे में क्षुब्‍ध होकर मां बाप तो मरेंगे ही न, वो बेचारे अपना गुस्‍सा और कहां निकालें। हम बच्‍चे मां बाप को छोड़कर कहीं जा भी तो नहीं सकते, अगर पापा ने मम्‍मी पर या मम्‍मी ने पापा पर अपना गुस्‍सा निकाल दिया तो बच्‍चों को जिन्‍दगी भर ऐसे थप्‍पड़ सहने पड़ते हैं, जिनके निशां कभी नहीं जाते। इसलिए थप्‍पड़ अच्‍छे हैं।