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विद्या बालन की 'द डर्टी पिक्‍चर'

रविवार के समाचार पत्र में एक बड़ा सा विज्ञापन था, जिसमें द डर्टी पिक्‍चर का पोस्‍टर और टीवी पर फिल्‍म प्रसारित होने का समय छपा हुआ था, यकीनन लोगों ने समय पर टीवी शुरू किया होगा, मगर हुआ बिल्‍कुल उनकी उम्‍मीद से परे का, क्‍यूंकि टीवी पर उस समय कुछ और चल रहा था, ऐसा ही कुछ हुआ था, पेज थ्री के वक्‍त हमारे साथ।

हम पांच लोग टिकट विंडो से टिकट लेकर तेज रफ्तार भागते हुए सिनेमाहाल में पहुंचे, जितनी तेजी से अंदर घुसे थे, उतनी तेजी से बाहर भी निकले, क्‍यूंकि सिनेमा हॉल के बाहर पोस्‍टर पेज थ्री का था, और अंदर फिल्‍म बी ग्रेड की चल रही थी। शायद द डर्टी पिक्‍चर देखने की उम्‍मीद लगाकर रविवार को 12 बजे टीवी ऑन करने वालों के साथ कुछ ऐसा ही हुआ होगा। यकीनन लोग घर से बाहर तो नहीं भागे होंगे, मगर निराशा होकर चैनल तो जरूर बदल दिया होगा।

द डर्टी पिक्‍चर, इस लिए अपने निर्धारित समय पर प्रसारित नहीं हुई, क्‍यूंकि कोर्ट ने इसके प्रसारण रोक लगाते हुए इसको रात्रि ग्‍यारह बजे के बाद प्रसारित करने का आदेश दिया है। मगर मसला तो यह उठता है कि अगर 'द डर्टी पिक्‍चर' इतनी ही गंदी है, जितनी कि कोर्ट मान रही है तो इस फिल्‍म को राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से क्‍यूं नवाजा गया? बात तब समझ से परे हो जाती है, जब एक तरफ फिल्‍म को राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया जाता है, और वहीं दूसरी तरफ कोर्ट द्वारा इसके प्रसारण पर रोक लगा दी जाती है।

अगर कोर्ट एक फिल्‍म के प्रसारण पर रोक लगाती है तो बुरी बात मानी जानी चाहिए, हां अगर कोर्ट ए सर्टिफिकेट हासिल सभी फिल्‍मों पर रोक लगाने का फैसला सुनाती है, तो हमको स्‍वागत करना चाहिए। मगर अफसोस की बात है कि पिछले कुछ सालों में बहुत कम ऐसी फिल्‍में बनी हैं, जिनको प्रसारण का हक मिलना चाहिए, लेकिन मिल रहा है। अभी पिछले दिनों आई रासक्‍ल, दिल तो बच्‍चा है, मॉर्डर, दम मारो दम, कितनी साफ सुधरी हैं, जो बार बार प्रसारित की जा रही हैं।

कुर्बान फिल्‍म में करीना कपूर का बेलिबास दृश्‍य, अभी रिलीज हुई हेट स्‍टोरी में नायिका नग्‍न पोस्‍टर और जिस्‍म 2 में सन्‍नी लियोन का नग्‍न शरीर पर पारदर्शी चुनरी ओढ़कर लेटना क्‍या रोक लगाने वाले मामले नहीं हैं। जब जंगल पूरी तरह आग के आगोश में चला जाता है, तब हमारी सांस्‍कृति को बचाने वालों की आंख खुलती है, और रोक लगाने की बातें शुरू होती हैं, जो एक प्रचार से ज्‍यादा कुछ नहीं होती।

चलते चलते  इतना ही कहूंगा कि यह फिल्‍म भी प्रसारित हो जाती चुपके से, मगर इसका नाम 'द डर्टी पिक्‍चर' ही सबसे बड़ी प्रॉब्‍लम खड़ी कर गया, 'द डर्टी पिक्‍चर' बोले तो 'गंदी छवि', और 'गंदी छवि' को कैसे प्रसारित किया जा सकता है। वैसे भी कहावत है, बद से बदनाम बुरा। और 'द डर्टी पिक्‍चर' बदनाम हो चुकी है। भले ही इसके डॉयलॉग छोटे पर्दे पर पुरस्‍कार समारोह की शान बने हों, मगर कोर्ट हमारी दलीलों व साबूतों पर अपना फैसला सुनाती है।

रुपहले पर्दे का असली द एंग्री यंग मैन

'ढ़ाई किलो का हाथ, जब उठता है तो आदमी उठता नहीं, उठ जाता है' इस संवाद को सुनते ही एक चेहरा एकदम से उभरकर आंखों के सामने आ जाता है। वो चेहरा असल जिन्‍दगी में बेहद शर्मिला व मासूम है, लेकिन रुपहले पर्दे पर वो हमेशा ही जिद्दी व गुस्‍सैल नजर आया, कभी क्रप्‍ट सिस्‍टम को लेकर तो कभी प्‍यार की दुश्‍मन दुनिया को लेकर। जी हां, मेरी निगाह में रुपहले पर्दे का असली द एंग्री यंग मैन कोई और नहीं बल्‍कि ही मैन धर्मेंद्र का बेटा सन्‍नी दिओल है, जो बहुत जल्‍द एक बार फिर रुपहले पर्दे पर मोहल्‍ला अस्‍सी से अपने दीवाने के रूबरू होने वाला है।

प्रचार व मीडिया से दूर रहकर अपने काम को अंजाम देने वाले दिओल खानदान के इस चिराग ने दिओल परिवार का नाम ऊंचा ही किया है, कभी गिराया नहीं, अच्‍छे बुरे वक्‍त से गुजरते हुए सन्‍नी ने फिल्‍म जगत में करीबन तीन दशक पूरे कर लिए हैं। इतने लम्‍बे कैरियर में सन्‍नी को अब तक दो राष्ट्रीय पुरस्कार और फिल्‍मफेयर पुरस्कार मिल चुके हैं। मगर आज भी बॉलीवुड में उनका हमउम्र हीरो उतना कदवार नहीं है, जितना के सन्‍नी दिओल।

गत साल 19 अक्‍टूबर को 55 साल पूरे कर चुके सन्‍नी ने साल 1983 में फिल्‍म ‘बेताब’ से अपनी फिल्‍मी करियर शुरुआत की। कहते हैं कि सन्‍नी ने इग्‍लैंड जाकर बकायदा अभिनय की ट्रेनिंग ली और उसके बाद फिल्‍मों का रुख करने का फैसला किया। शायद यही कारण है कि सन्‍नी ने रुपहले पर्दे पर अपने किरदारों को जीवंत कर दिया।

सन्‍नी दिओल ने अपने इतने लम्‍बे कैरियर में बहुत सी बेहतरीन फिल्‍में दी हैं, मगर उनकी कुछ फिल्‍में तो ऐसी हैं, जिनको फिल्‍म जगत व सिने दर्शक कभी नहीं भूल पाएंगे, जैसे कि ‘बेताब’ ‘सोहनी महिवाल’ ‘डकैत’ ‘निगाहें’ ‘वर्दी’ ‘जोशीले’ ‘त्रिदेव’ ‘चालबाज’ ‘घायल’ ‘नरसिम्‍हा’ ‘दामिनी’, ‘विश्‍वात्‍मा’ ‘लुटेरे’ ‘क्षेत्रिय’ ‘वीरता’ ‘डर’ ‘इंसानियत’ ‘इम्‍तिहान’ ‘जीत’ ‘घातक’ ‘जिद्दी’ ‘बॉर्डर’ ‘सलाखें’ ‘इंडियन’ ‘गदर-एक प्रेम कथा’ ‘अर्जुन पंडित’ ‘अपने’, और ‘यमला पगला दीवाना’ जैसी कई यादगार फिल्‍में हैं।

सन्‍नी ने अपनी करियर में ज्‍यादातर एक्शन किरदार ही निभाए हैं लेकिन पिछले साल आई फिल्‍म ‘यमला पगला दीवाना’ में सन्‍नी का कॉमेडी अंदाज भी लोगों को बेहद पसंद आया। फिल्‍म का निर्माण देओल परिवार के बैनर तले ही हुआ। फिल्‍मी कैरियर में कई उतार चढ़ाव देख चुके सन्‍नी दिओल रुपहले पर्दे पर अपने चाहने वालों के समक्ष इस साल मोहल्‍ला अस्‍सी व घायल रिटर्न्‍स लेकर हाजिर होंगे। ऐसे में उम्‍मीद है कि घायल रिटर्न्‍स में सन्‍नी दिओल का पुराना रूप देखने को मिलेगा, जिसको देखकर लगता है रुपहले पर्दे का असली द एंग्री यंग मैन।

पांच सितारा फिल्‍म, विधा की रहस्‍यमयी कहानी

फिल्‍में तीन चीजों से चलती है, वो तीन चीजें हैं इंटरटेन्‍मेंट इंटरटेन्‍मेंट इंटरटेन्‍मेंट, भले विधा बालन ने इस संवाद को एकता कपूर की छत्र छाया में बनी फिल्‍म द डर्टी पिक्‍चर में कहा हो, लेकिन असल में विधा भी जानती है कि फिल्‍म में तीन चीजों से चलती हैं, बोले तो शॉलिड कहानी, मजबूत निर्देशन एवं जर्बदस्‍त अभिनय, और विधा की कहानी में तीनों चीजें एक से बढ़कर एक हैं। नीरज पांडे की ए वेडनेसडे फिल्‍म की तरह, कहानी का अंतिम पड़ाव दर्शकों को यह बात भुला देता है कि वह कुछ पलों बाद सिनेमा हाल छोड़ने वाले हैं।

निर्देशक संजोय घोष फिल्‍म बनाते समय किसी कदर अपने काम में डूबे होंगे, फिल्‍म की कसावट देखने के बाद कोई भी व्‍यक्‍ित बड़ी आसानी से समझ सकता है। उन्‍होंने निर्देशन में, और विधा एवं अन्‍य अभिनेताओं ने अभिनय ने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी।

श्री घोष कहीं भी जल्‍दबाजी करते हुए नजर नहीं आते, बल्‍कि वह धीरे धीरे कदम दर कदम फिल्‍म को आगे बढ़ाते हुए अंत को इतना यादगार बनाते हैं कि दर्शक सिनेमा हाल से बाहर निकालते हुए तारीफ करने से चूक नहीं सकते, उन्‍होंने फिल्‍म को एक रहस्‍यमयी नॉबेल की तरफ ही बनाया, इस फिल्‍म की कहानी जितनी जोरदार है, उतनी जोरदार फिल्‍म की संवाद शैली है, जो दर्शकों को अपने से अलग नहीं होने देती।

अगर आप कहानी फिल्‍म का आनंद लेना चाहते हैं, तो फिल्‍म देखने से पहले फिल्‍म की कहानी मत सुनिए।

अब उंगली का ट्रेंड

कोई गाली बोलता था तो सेंसर बोर्ड बीप मारकर उसको दबा देता था, लेकिन अब जो पश्‍िचम से नया ट्रेंड आया है, उसका तोड़ कहां से लाएगा सेंसर। मूक रहकर हाव भाव व इशारों से गाली देने का ट्रेंड, जहां रॉक स्‍टार में रणवीर कपूर पश्‍िचम की भांति उंगली उठाकर गाली देते हुए नजर आए, वहीं प्‍लेयर्स में रणबीर कपूर के साथ अभिनय पारी शुरू करने वाली सोहम कपूर उसी इशारे का इस्‍तेमाल करते हुए नजर आई।

जो उंगलियां कल तक किसी ओर इशारा करने के, माथे पर तिलक करने के, किसी को दोषी ठहरने के, शू शू करने की अनुमति मांगने के काम आती थी, अब उन्‍हीं में से एक  उंगली  गाली देने के काम भी आने लगी है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि सिनेमा समय के साथ साथ अपना प्रभाव छोड़ता है, और उंगली दिखाकर गाली देने का प्रचार बहुत जल्‍द हिन्‍दुस्‍तानी युवाओं के सिर चढ़कर बोलने लग सकता है। इतना ही नहीं, बहुत चीजें भाषा में शामिल होने लगी है, जैसे कि डरे हुए को देखकर लड़की हो या लड़का बेबाक ही कह देते हैं, तेरी तो बहुत फटती है, क्‍या यह शब्‍द हमारी भाषा का हिस्‍सा थे, आखिर यह शब्‍द कहां से आ टपके, हमारी बोल चाल में। यह शब्‍द सिनेमा से, सिनेमा कुछ लोग मिलकर रचते हैं, लेकिन वह सिनेमा लाखों लोगों को प्रभावित करता है।

पिछले दिनों रिलीज हुई दिल्‍ली बेली में बेशुमार गालियां थी, उसका एक गीत भी डबल मीनिंग था, इसको लेकर आपकी अदालत में जब आमिर खान से पूछा जा रहा था तो वह मुस्‍कराते हुए कह रहे थे, आज की पीढ़ी इसको पसंद करती है, और लड़कियां फिल्‍म का समर्थन कर रही थी, वह कह रही थी अगर लड़कों को गालियां आती है तो लड़कियों को भी गाली देनी आनी चाहिए।


अंत में सवाल यह खड़ा होता है कि क्‍या फिल्‍म इंडस्‍ट्री युवाओं को सही दिशा देने के लिए काम न कर सिर्फ अपने गोलक भरना चाहती है।

क्या देखते हैं वो फिल्में...

मंगलवार को एक काम से चंडीगढ़ जाना हुआ, बठिंडा से चंडीगढ़ तक का सफर बेहद सुखद रहा, क्योंकि बठिंडा से चंडीगढ़ तक एसी कोच बसों की शुरूआत जो हो चुकी है, बसें भी ऐसी जो रेलवे विभाग के चेयर कार अपार्टमेंट को मात देती हैं। इन बसों में सुखद सीटों के अलावा फिल्म देखने की भी अद्भुत व्यवस्था है।

इसी व्यवस्था के चलते सफर के दौरान कुछ समय पहले रिलीज हुई पंजाबी फिल्म मिट्टी देखने का मौका मिल गया, जिसके कारण तीन चार घंटे का लम्बा सफर बिल्कुल पकाऊ नहीं लगा।

पिछले कुछ सालों से पुन:जीवित हुए पंजाबी फिल्म जगत प्रतिभाओं की कमी नहीं, इस फिल्म को देखकर लगा। फिल्म सरकार द्वारा किसानों की जमीनों को अपने हितों के लिए सस्ते दामों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले करने जैसी करतूतों से रूबरू करवाते हुए किसानों की टूटती चुप्पी के बाद होने वाले साईड अफेक्टों से अवगत करवाती है।

फिल्म की कहानी चार बिगड़े हुए दोस्तों से शुरू होती है, जो नेताओं के लिए गुंदागर्दी करते हैं, और एक दिन उनको अहसास होता है कि वो सही अर्थों में गुंडे नहीं, बल्कि सरदार के कुत्ते हैं, जो उसके इशारे पर दुम हिलाते हैं।

वो इस जिन्दगी से निजात पाने के लिए अपने अपने घरों को लौट जाते हैं, लेकिन वक्त उनके हाथों में फिर हथियार थमा देता है, अब वो जंग किसानों के लिए लड़ते हैं, अपनों के लिए लड़ते हैं, सरकार के विरुद्ध संघर्ष अभियान चलाते हैं, और सरकार के खिलाफ चलाई इस मुहिम में तीन दोस्त एक एक कर अपनी जान गंवा बैठते हैं, लेकिन अंत तक आते आते फिल्म अपनी शिखर पर पहुंच जाती है। फिल्म का अंतिम सीन आम आदमी के भीतर जोश भरता है। इस दृश्य में किसान सति श्री अकाल और इंकलाब के नारे लगाते हुए पुलिस का सुरक्षा चक्र तोड़ते हुए नेता एवं फैक्ट्री मालक को मौत के घाट उतार देते हैं, और अपनी जमीन को दूसरे हाथों में जाने से रोक लेते हैं।

यह पिछले दिनों देखी गई पंजाबी फिल्मों में से दूसरी पंजाबी फिल्म थी, जो किसान हित की बात करते हुए सरकार के विरुद्ध आवाज बुलंद करने के लिए अपील करती है, आह्वान करती है। इससे कुछ दिन पहले पंजाबी गायक से अभिनेता बने बब्बू मान की फिल्म एकम - सन ऑफ सॉइल देखी। इस फिल्म में भी नायक एकम किसान वर्ग की अगुवाई करते हुए सरकार के विरुद्ध एक लड़ाई लड़ता है। इस फिल्म में बब्बू मान को देखकर पुरानी फिल्मों के अमिताभ बच्चन के उन दमदार किरदारों की याद आ गई, जो गरीब वर्ग की अगुवाई करते हुए गरीबों को उनके हक दिलाता था।

जैसे ही मिट्टी फिल्म खत्म हुई, तो एक के बाद एक सवाल दिमाग में आकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने लगे, क्या इन फिल्मों को उन्होंने देखा, जिन लोगों की स्थिति को पर्दे पर उभरा गया है, जिनके सवालों को बड़े पर्दे पर उठाया गया है। क्या सरकार के प्रतिनिधियों के पास सिनेमा देखने की फुर्सत है, वो भी ऐसी फिल्में, जो वास्तिवकता से रूबरू करवाती हों?

दिमाग को सवाल मुक्त करते हुए बस के भीतर बैठी सवारियों को एक नजर देखा, और पाया कि सब लोग नौकरी पेशा हैं, जिनके पास शायद चैन से बैठकर साँस लेने की फुर्सत भी न होगी, वो सरकार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए लामबंद कैसे हो सकते हैं, शायद उनके लिए तो बस में चल रही फिल्म भी कोई मतलब न रख रही होगी।

जिनको सरकार के विरुद्ध लामबंद करने के लिए फिल्म बनाई गई, वो तो बेचारे रोड़्वेज की उन बसों में भी बामुशिक्ल चढ़ते होंगे, जिन बसों में पुर्जों के खटकने की आवाजें कानों को पका देती हैं, सीटें माँस में चूंटी काट लेती हैं, और सफर खत्म होने तक जान मुट्ठी में रहती है, कहीं ब्रेक फेल न हो जाएं, वगैरह वगैरह।

नो एंट्री, वेलकम और थैंक यू

कुलवंत हैप्पी
आप ने अक्सर देखा होगा कि आप "थैंक्स" कहते हैं तो सामने से जवाब में "वेलकम" सुनाई पड़ता है, मेंशन नॉट तो गायब ही हो गया। ये ऐसे ही हुआ, जैसे अमिताभ के स्टार बनते ही शत्रूघन सिन्हा एवं राजेश खन्ना की स्टार वेल्यू। कभी कभी थैंक्स एवं वेलकम का क्रम बदल भी जाता है, वेलकम पहले और थैंक्स बाद में आता है। शायद फिल्म निर्देशक अनीस बज्मी दूसरे क्रम पर चल रहे हैं, तभी तो उन्होंने पहले कहा, "नो एंट्री", फिर कहा, "वेलकम" और अब कह रहे हैं "थैंक यू"। अनीस के नो एंट्री कहने पर भी हाऊसफुल हो गए थे, और वेलकम कहने पर भी, लेकिन सवाल उठता है कि क्या दर्शक उनके थैंक यू कहने पर वेलकम कहेंगे?

सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि इस बार अक्षय कुमार के साथ उनकी लक्की गर्ल कैटरीना नहीं, और उनका वक्त वैसे भी ख़राब चल रहा है, फिल्म आती है और बिन हाऊसफुल किए चली जाती है, वो बात जुदा है कि अक्षय कुमार ने इससे भी ज्यादा बुरा वक्त देखा है, और वो इस स्थिति को संभाल लेंगे, मगर लगातार दो फिल्म फ्लॉप देने वाली अनिल कपूर की बेटी का कैरियर धर्मेंद्र की बेटी ईशा देओल की तरह लटक सकता है, क्योंकि फिल्मी दुनिया में चढ़ते सूरज को सलाम होता है।

अगर अनीस जी अपने निर्देशन के बल पर फिल्म को हिट करवा गए तो अक्षय की असफल फिल्म यात्रा थम जाएगी, जो चाँदनी चौंक टू चाईना से शुरू हुई है और अभी तक अविराम जारी है। इतना ही नहीं, साँवरिया गर्ल एवं दिल्ली छ: की मसककली का नसीबा खुल जाएगा। नो एंट्री के बाद अनीस बज्मी पर हास्यस्पद फिल्म निर्देशक का ठप्पा लग गया, और सिंह इज किंग ने जहाँ अक्षय कुमार को शिखर पर खड़ा किया, वहीं अनीस बज्मी का हौसला बढ़ाया, जबकि अनीस जी ने अपने कैरियर के शुरूआती दिनों में प्रेम रोग, हलचल, प्यार तो होना ही था जैसी एक्शन, गम्भीर और रोमांटिक फिल्म निर्देशित की। अक्षय कुमार की तरह अनीस को हास्यस्पद फिल्में भी रास आई, और उनको सफल निर्देशकों की कतार में लाकर खड़ा कर दिया।

जैसे जैसे आप शिखर की तरफ जाते हैं, लोगों की उम्मीद आपसे ज्यादा होने लगती हैं। वो आप से और बेहतर की उम्मीद करते हैं, और वैसे ही जैसे रियालटी शो के जज प्रतिभागियों से करते हैं। रामगोपाल वर्मा एवं संजय लीला भंसाली ने एक से एक बेहतर दी, लेकिन जैसे ही उनकी क्रमश: आग और साँवरिया फ्लॉप हुई, तो उनको आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा, उनकी फिल्में फ्लॉप श्रेणी से निकल सुपर फ्लॉप श्रेणी में पहुंच गई। जब आप शिखर की तरफ जाते हैं, तो आपकी छोटी सी चूक भी बहुत बड़ी हो जाती है, ऐसे में शिखर की तरफ जाते हुए बहुत सावधान रहना पड़ता है। पहाड़ पर चढ़ते हुए, आप जितने नीचे होते हैं, उतना जोखिम कम, और जितना ऊपर पहुंचते हैं उतना जोखिम ज्यादा।

ऐसे में अनीस को चौकसी बरतनी होगी? खासकर तब तो विशेष जब फ्लॉप सितारों के साथ आप फिल्म बना रहें हो, अनीस की थैंक यू में अक्षय कुमार, सोनम कपूर के अलावा बॉबी दिओल भी हैं। सोनम, बॉबी दिओल कॉमेडी सितारे नहीं, स्टार कास्ट देखकर लग रहा है कि वो हास्यरहित फिल्म बनाने का जोख़म उठाने जा रहे हैं, ऐसे में तो और भी ज्यादा गम्भीर रहना होगा। वैसे अब तक के लिए अनीस जी को थैंक यू कहा जा सकता है।

लव सेक्स और धोखा बनाम नग्न एमएमएस क्लिप

फिल्म के निर्देशक और निर्माता ने फिल्म का शीर्षक समयोचित निकाला है, क्योंकि ज्यादातर दुनिया ऐसी होती जा रही है, प्रेम अभिनय की सीढ़ी जिस्म के बंगले तक पहुंचने के लिए लोग लगाते हैं, स्वार्थ पूरा होते ही उड़ जाते हैं जैसे फूलों का रस पीकर तितलियाँ। मुझे फिल्म के शीर्षक से कोई एतराज नहीं, लेकिन फिल्म समीक्षाएं पढ़ने के बाद फिल्म से जरूर एतराज हो गया है, ऐसा भी नहीं कि मैं कह रहा हूँ कि खोसला का घोंसला और ओए लक्की लक्की ओए जैसी फिल्म देने वाला निर्देशक एक घटिया फिल्म बनाएगा। 
 


मैं जो बात करने जा रहा हूँ, वो फिल्म में न्यूड सीन के बारे में है, कहते हैं कि निर्देशक ने बहुत साधारण वीडियो कैमरों से बहुत ही उम्दा ढंग से इन सीनों को फिल्माया है। अगर कोई साधारण कैमरे से अच्छी चीज का फिल्मांकन करता है तो इस बात के लिए उसकी प्रशंसा कर सकता हूँ, अगर कोई कहता है कि उसने नग्न एमएमएस क्लिप को भी बढ़िया ढंग से शूट किया तो मुझे समझ नहीं आता कि उसकी प्रशंसा कैसे और क्यों करूँ। हाँ, बात कर रहे थे, फिल्म में नग्न दृश्य डालने की, शायद पहली बार ऐसा हिन्दी फिल्म में हुआ, हमबिस्तर होते तो हर फिल्म में दिखाई ही देते हैं, मगर बिल्कुल नग्न दृश्य फिल्माने का साहस तो दिवाकर बनर्जी ने किया है, जबकि इससे पहले फिल्म निर्माता मधुर भंडारकर एवं अन्य फिल्म निर्माता निर्देशकों की फिल्मों से सेंसर ने ऐसे दृश्य कई दफा हटाए हैं, मगर इस बार सेंसर ने इनको धुंधल करने का आदेश दिया। अगर फिल्म में नग्न दृश्य फिल्माए गए हैं, तो लाजमी में है कि दृश्य भी उस तरह फिल्माए गए होंगे, जैसे नग्न फिल्मों में फिल्माए जाते हैं, या जैसे डीपीएस स्कूल की छात्रा का अश्लील एमएमएस को फिल्मा कर बाजार में भेज दिया गया था, और देश में शोर मच गया था। मगर जब वो ही दृश्य दिवाकर बनर्जी ने साधारण कैमरे द्वारा फिल्माया तो कुछ लोगों ने उसकी तारीफ की, क्या खूब फिल्माया है, लेकिन तारीफ करने वाले भूल गए कि इन दोनों घटनाओं में सिर्फ फर्क इतना है कि इस दृश्य को व्यवसाय के तौर पर फिल्माया गया है, इस दृश्य में काम करने वाला हर व्यक्ति या कलाकार व्यवसाय से जुड़ा हुआ है, और वो एमएमएस में शामिल छात्रा केवल धोखे की शिकार थी। 

मगर दोनों दृश्य में नग्नता तो एक सी ही है, फिर शाबाशी किस बात की दूँ, निर्देशक को। हाँ, अगर नग्न दृश्य फिल्माने के लिए ही शाबाशी देनी है, तो नग्न फिल्में बनाने वाले हर निर्देशक को दे डालो। अगर आप इसको अभिनय कहते हैं तो मैं उसको भी अभिनय कहता हूँ, जो उस दौरान उस लड़की के साथ किया गया, शायद वो करने वाला फिल्म कलाकार न हो, लेकिन असली जिन्दगी का एक घटिया मानसिकता का शिकार कलाकार तो था ही, जो चेहरे पर मित्रता एवं विश्वास का मॉस्क लगाकर अभिनय कर रहा था। दिवाकर बनर्जी का फिल्माया हुआ फिल्म दृश्य और वो एमएमएस वीडियो क्लिप दोनों एक बराबर हैं, लेकिन लोगों की देखने की सोच क्या कहती है मुझे नहीं पता। हो सकता है कि इन दृश्यों को फिल्मा रही लड़कियाँ खुद को बड़ी अभिनेत्रियाँ मान रही हों, लेकिन जिस्म और संवेदनाएं तो इनके दिल में भी वैसी ही हैं, जैसी उस एमएमएस की शिकार लड़की की थी।

आमिर खान की सफलता के पीछे क्या?

'तारे जमीं पर' एवं 'थ्री इड्यिटस' में देश के शिक्षा सिस्टम के विरुद्ध आवाज बुलंद करते हुए आमिर खान को रुपहले पर्दे पर तो सबने देखा होगा। इन दोनों फिल्मों की अपार सफलता ने जहां आमिर खान के एक कलाकार रूपी कद को और ऊंचा किया है, वहीं आमिर खान के गम्भीर और संजीदा होने के संकेत भी दिए हैं।

इन दिनों फिल्मों में आमिर खान का किरदार अलग अलग था। अगर 'तारे जमीं पर' में आमिर खान एक अदार्श टीचर था तो 'थ्री इड्यिटस' में एक अलहदा विद्यार्थी था, जो कुछ अलहदा ही करना चाहता था। इन किरदारों में अगर कुछ समानता नज़र आई तो एक जागरूक व्यक्ति का स्वाभाव और कुछ लीक से हटकर करने की जिद्द। इन दोनों किरदारों में शिक्षा सिस्टम पर सवालिया निशान लगाने वाले आमिर खान असल जिन्दगी में केवल 12वीं पास हैं। यह बात जानकर शायद किसी को हैरानी हो, लेकिन यह हकीकत है।

आमिर खान ने अपना कद इतना ऊंचा कर लिया है कि कोई पूछने की हिम्मत भी नहीं कर सकता कि आप कितने पढ़े हैं। शायद यह सवाल उनकी काबलियत को देखते हुए कहीं गुम हो जाता है। कभी कभी लगता है कि आमिर खान ने देश के शिक्षा सिस्टम से तंग आकर स्कूली पढ़ाई को ज्यादा अहमियत नहीं दी या फिर उसने जिन्दगी की असली पाठशाला से इतना कुछ सीख लिया कि स्कूली किताबें उसके लिए आम किताबें बनकर रहेगीं।

ऐसा नहीं कि आमिर खान को पढ़ने का शौक नहीं था, आमिर खान ने खुद एक इंटरव्यू में बताया था कि वो घर पहुंचते सबसे पहले टीवी रिमोट नहीं बल्कि किताबें उठाते हैं। उनके बारे में किरण राव तो यहाँ तक कहती हैं, "वो पढ़ने के इतने शौकीन हैं कि टॉयलेट और कार में किताबें साथ ले जाते हैं"। वो बात जुदा है कि वो किताबें स्कूल पाठ्यक्रम की नहीं होती। अगर आज आमिर खान एक सफल अभिनेता, फिल्म निर्माता और फिल्म निर्देशक हैं, तो इसमें उसकी स्कूल पढ़ाई नहीं बल्कि वो किताबी ज्ञान है, जो उसने छ: साल की उम्र से अब तक विद्वानों की किताबें पढ़कर अर्जित किया है।

सफलता की जिस शिखर पर आमिर खान आज पहुंच चुके हैं, वहां पहुंचते बहुत सारे व्यक्ति जमीं छोड़ देते हैं, पैसे और शोहरत के घुम्मड में सोचने की शक्ति तक खो देते हैं, लेकिन जिन्दगी की असल पाठशाला में पढ़े आमिर इसलिए बरकरार हैं कि उन्होंने कभी दौलत और शोहरत को कभी खुद पर हावी नहीं होने दिया। और कभी जमीं नहीं छोड़ी।

आमिर अपने किरदारों में इस तरह ढल जाते हैं, जैसे वो असल जिन्दगी में ही उन किरदारों को जी रहे हो। इस तरह का ढलना उस व्यक्ति के बस में ही हो सकता है, जो महावीर के उस कथन को जानता हो, जिसमें कहा गया है कि अगर कुछ सीखना है तो अपने दिमाग के बरतन को पूरी तरह खाली कर लो। तभी उसमें कुछ नया ग्रहण कर पाओगे। आमिर खान के किरदारों में दोहराव नाम की चीज आज तक नहीं देखने को मिली। यह बात भी इस तरह संकेत करती है कि आमिर खान कुछ नया करने से पहले अपने आपको पूरी तरह खाली कर लेते हैं, और फिर नए किरदार को नए विचार को अपने भीतर समा लेते हैं।

इसके अलावा मुझे आमिर खान की सफलता और उसके युवापन के पीछे उसका स्पष्टवादी सोच का होना बहुत ज्यादा नजर आता है। आमिर खान को कई बार मीडिया से बात करते हुए देखा है, वो अपनी बात पूरी स्पष्टता और निर्भय होकर कहता है। उसकी स्पष्टवादी नीति है, जो उसको 44 साल की उम्र में भी युवा रखे हुए है। किसी विचारक ने लिखा है कि अगर आप ताउम्र युवा रहना चाहते हो तो अपनी सोच को इतना स्पष्टवादी बना दो, अस्पष्टता बाकी न रहे। स्पष्टवादी व्यक्ति चिंतारहित हो जाता है और भयमुक्त हो जाता है, वो करनी में यकीन करता है। आमिर खान युवा पीढ़ी के लिए एक अदार्श व्यक्ति है, और आमिर खान से युवाओं को सीखना चाहिए।
भार
कुलवंत हैप्पी

मशहूर व मरहूम शायर साहिर लुधियानवीं

"मैं पल दो पल का शायर हूँ, पल दो पल मेरी कहानी है।
पल दो पल मेरी हस्ती है, पल दो पल मेरी जवानी है।

हिन्दी फिल्म संगीत जगत का बेहद लोकप्रिया गीत आज भी लोगों की जुबाँ पर बिराजमान है, लेकिन इस गीत को लिखने वाली कलम के बादशाह साहिर लुधियाणवीं 25 अक्टूबर 1980 को इस दुनिया से सदा के लिए रुखस्त हो गए थे। इस महान शायर और गीतकार का जन्म लुधियाना में 8 मार्च 1921 को हुआ। साहिर लुधियानवीं कितने मजाकिया थे, इस बात का अंदाजा उनकी नरेश कुमार शाद के साथ हुई एक मुलाकात से चलता है। नरेश कुमार शाद ने आम मुलाकातियों की तरह एक रसमी सवाल किया, आप कब और कहाँ पैदा हुए? तो साहिर ने उक्त सवाल को दोहराते हुए और थोड़ा सा मुस्कराते हुए कहा, ये सवाल तो बहुत रसमी है, कुछ इसमें और जोड़ दो यार। क्यों पैदा हुए?। शाद के अगले सवाल पर साहिर कुछ फ़खरमंद और गर्वमयी नज़र आए, उन्होंने कहा कि वो बी.ए. नहीं कर सके, गौरमिंट कॉलेज लुधिआना और दयाल सिंह कॉलेज ने उनको निकाल दिया था, जो आज उस पर बड़ा गर्व करते हैं। साहिर की इस बात से शाद को साहिर का नज़र ए कॉलेज शेअर याद आ गया।
लेकिन हम इन फजाओं के पाले हुए तो हैं।
गर या नहीं, यहाँ से निकाले हुए तो हैं॥
आगे साहिर लुधियानवीं बताते हैं कि 1937 में मैट्रिक की परीक्षा देने और नतीजे आने से पहले, उनके पास काफी समय था, उन दिनों उन्होंने कुछ शेअर लिखे, फिर एक नज़म जो उन्होंने अपने एक दोस्त के मार्फत अपने टीचर फयाज़ हरियाणवीं को दिखाकर उनकी राय मांगी थी, शिक्षक ने कहा कि शेअर बहुत अच्छे हैं, लेकिन नज़्म मामूली है। साहिर ने अच्छी बात पल्ले बाँध ली कि शेअर अच्छे हैं। शायर-ओ-शायरी के दीवाने हो चुके अब्दुल हुई के लिए अब तखल्लुस की जरूरत थी, साहिर के अनुसार उन दिनों तखल्लुस लगाना काफी प्रचलन में था। ऐसे में उनको भी तखल्लुस की कमी ज्यादा महसूस होने लगी, अचानक एक दिन उनकी निगाह इकबाल ने दाग के बारे जो मर्सिया लिखा था, उसके शेअर पर जा पड़ी।
इस चमन में होंगे पैदा बुलबुल-ए-शीराज भी।
सैंकड़ों साहिर भी होंगे, साहिब ए एज़ाज भी।।
अपने गीतों के नशे से हिन्दी संगीतप्रेमियों को धुत्त कर देने वाले साहिर लुधियानवीं शराब पीने के आदी थे, लेकिन उनको शराब पीने की लत आम लोगों की तरह नहीं लगी थी, वो तो शराब के पास से भी नहीं गुजरते थे। जब उनका लो बल्ड प्रेशर होना शुरू हुआ, तो मैडीकल के तौर पर थोड़ी थोड़ी शराब पीने लगे, फिर धीरे धीरे शराब आम हो गई कि छूटे न छूटे। साहिर लुधियानवीं साहिब फिल्म राईटर्स एसोसिएशन के प्रमुख भी रहे हैं, पुराने फिल्मी शायरों में उनको आरजू लखनवीं बेहद पसंद थे। जब अंत में शाद ने साहिर से पूछा कि आपने शादी क्यों नहीं की? उन्होंने अपने उसी हँसते हुए अंदाज में कहा, कुछ लड़कियाँ मुझ तक देर में पहुंची, और कुछ लड़कियों तक मैं देर से पहुंचा। शाद को इस सवाल से पहले साहिर का एक और शेयर याद आ गया था।
तुम में हिम्मत है तो दुनिया से बगावत कर दो।
वरना माँ बाप यहाँ कहते हैं शादी कर लो।
साहिर लुधियानवीं ने तो शादी नहीं की, लेकिन उनके अय्याश और जमींदार पिता चौधरी फजल अहमद ने 12 शादियाँ रचाई, और साहिर का जन्म सरदार बेगम की कोख से हुआ, जो उनके अय्याश पिता की 12वीं पत्नी थी। उनकी माँ और पिता के बीच संपत्ति को लेकर 13 साल तक मुकद्दमा चला, आखिर में मुकद्दमा सरदार बेगम जीत गई, और साहिर भी उनके हिस्से आए। इस गृहयुद्ध ने 13 वर्षीय साहिर के जीवन को बुरा तरह प्रभावित किया। पिछले दिनों प्रकाशित हुई एक किताब में लिखा है कि उसके पिता ने उसको जान से मारने तक की धमकियाँ दे डाली थी। गत दिनों प्रकाशित पुस्तक "जाग उठे कई ख्वाब" में उनकी जीवन की दर्द भरी दास्तां लिखी हुई है।

किताब के अनुसार इन सबका साहिर के दिलोदिमाग पर गहरा असर पड़ा। वह धीरे. धीरे उर्दू के क्रांतिकारी और रूमानी शायर बनते गए। वर्ष 1945 में प्रकाशित "तल्खियां" ने उन्हें इतनी शोहरत दी कि उन्हें आजादी की राह फिल्म में गीत लिखने का निमंत्रण मिला। इस फिल्म के हीरो पृथ्वीराज कपूर थे। उन्होंने भारत-पाकिस्तान पर हुए दंगों को रोकने के लिए 11 सितंबर 1942 को ऑल इंडिया रेडियो से "आज" शीर्षक से लंबी नज्म पढ़ी, जिसमें उन्होंने साम्प्रदायिक सौहार्द की अपील की।

पुस्तक के अनुसार साहिर को फिल्मों में सफलता 1951 में नौजवान फिल्म से मिली जिसका गाना ठंडी हवाएं लहरा के आएं काफी लोकप्रिय हुआ। कृष्णचंदर और प्रेम धवन की मदद से उन्हें इस फिल्म में गीत लिखने का काम मिला। ये गीत इतना हिट हुआ कि गुरुदत्त और सचिनदेव बर्मन ने अपनी आने वाली सभी फिल्मों के लिए गीत लिखने का स्थायी निमंत्रण दिया। साहिर और एस डी वर्मन की जोडी ने बाजी, सजा, अरमान, टैक्सी ड्राइवर, हाउस नंबर 44 और प्यासा में सदाबहार गीत लिखे, परन्तु दोनों में ऐसी गलतफहमियां हो गई कि वे बाद में एक साथ कभी नहीं आए। साहिर ने 59 वर्ष के उम्र में 113 फिल्मों के लिए सैकडों गीत लिखे 1उनके जीवन में चार महिलाएं महिन्दर चौधरी. ईश्वर कौर. अमृता प्रीतम और सुधा मल्होत्रा आई, लेकिन उनका कोई भी प्रेमप्रसंग विवाह में परिणत नहीं हो सका।

साहिर फिल्मों में आने से पहले मुशायरों के लोकप्रिय शायर हो चुके थे। वर्ष 1943 से 1945 बीच गांव, कस्बा और शहर का कोई भी महफिल उनके बिना अधूरा माना जाता था। उनकी ..ताजमहल..नज्म काफी लोकप्रिय हुई। साहिर का समाजवाद और आजादी में गहरा यकीन था। वह कम्युनिस्ट पार्टी. उसके छात्र संगठन और प्रगतिशील लेखक संघ में शामिल हो गए। उन्होंने 1953 में बनी शोले फिल्म के गीत भी लिखे थे। उन्होंने देवदास, नया दौर, सुबह कभी होगी, गुमराह, धूल का फूल, तुमसा नही देखा, बरसात की रात, हम दोनों, बहूरानी, दिली तो है, मुझे जीने दो, ताजमहल, चित्रलेखा, काजल, हमराज, वक्त,  बहूबेगम, आंखे, नील कमल, दाग, दीवार, कभी-कभी, अमानत, त्रिशूल और बर्निंग ट्रेन फिल्मों के लिए सदाबहार गीत लिखे।

चलते चलते : जब साहिर की नज्म ताजमहल दिल्ली के एक सरकारी रसाले आजकल में प्रकाशित हुई तो पुराने खयालातों के अखबारों ने साहिर के विरुद्ध हंगामा खड़ा कर दिया था।

भार
कुलवंत हैप्पी

ऑस्कर में नामांकित 'कवि' का एक ट्रेलर और कुछ बातें

कुछ दिन पहले दोस्त जनकसिंह झाला के कहने पर माजिद माजिदी द्वारा निर्देशित एक इरानी फिल्म चिल्ड्रन इन हेवन का कुछ हिस्सा देखा था और आज ऑस्कर में नामांकित हुई एक दस्तावेजी फिल्म 'कवि' का ट्रेलर देखा। इन दोनों को देखने के बाद महसूस किया कि भारतीय फिल्म निर्देशक अभी बच्चे हैं, कच्चे हैं।

चाहे वो राजकुमार हिरानी हो, चाहे विशाल भारद्वाज। इन दोनों महान भारतीय निर्देशकों ने अपनी बात रखने के लिए दूसरी बातों का इस्तेमाल ज्यादा किया, जिसके कारण जो कहना था, वो किसी कोने में दबा ही रह गया। जहाँ थ्री इडियट्स एक मनोरंजन फिल्म बनकर रह गई, वहीं इश्किया एक सेक्सिया फिल्म बनकर रह गई।

संगीतकार विशाल भारद्वाज की छत्रछाया के तले बनी अभिषेक चौबे निर्देशित फिल्म इश्किया अंतिम में एक सेक्सिया होकर रह जाती है। किसी फिल्म के सेक्सिया और मजाकिया बनते ही कहानी का मूल मकसद खत्म हो जाता है। और लोगों के जेहन में रह जाते हैं कुछ सेक्सिया सीन या फिर हँसाने गुदगुदाने वाले संवाद।

ऐसे में एक सवाल दिमाग में खड़ा हो जाता है कि क्या करोड़ खर्च कर हम ऐसी ही फिल्म बना सकते है, जो समाज को सही मार्ग न दे सके। क्या कम पैसे और ज्यादा प्रतिभा खर्च कर एक स्माइली पिंकी या कवि फिल्म नहीं बना सकते।

उम्दा निर्देशन के लिए लोग आदित्य चोपड़ा को याद करते हैं, लेकिन क्या आदित्य चोपड़ा दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे का दूसरा हिस्सा दिखा सकेंगे, जहाँ पर अधूरा सच तिलमिला रहा है। फिल्म निर्देशक आदित्य चोपड़ा की फिल्म दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे भारतीय युवाओं को वहाँ तक ही पहुंचाती है, यहाँ तक भगवान श्री कृष्ण की कथा अभिमन्यु को। जो हाल अभिमन्यु का हुआ था, वो भी भारतीय युवा पीढ़ी का होता है।

राजू बन गया 'दी एंग्री यंग मैन'

"शाहरुख खान और अमिताभ बच्चन" हिन्दी फिल्म जगत के वो नाम बन गए, जो सदियों तक याद किए जाएंगे। आपसी कशमकश के लिए या फिर बेहतरीन अभिनय के लिए। दोनों में उम्र का बहुत फासला है, लेकिन किस्मत देखो कि चाहे वो रुपहला पर्दा हो या असल जिन्दगी का रंगमंच। दोनों की दिशाएं हमेशा ही अलग रही हैं, विज्ञापनों को छोड़कर। रुपहले पर्दे पर अमिताभ बच्चन के साथ जितनी बार शाहरुख खान ने काम किया, हर बार दोनों में ठनी है। चाहे गुरूकुल के भीतर एक प्रधानाचार्य एवं आजाद खयालात के शिक्षक के बीच युद्ध, चाहे फिर घर में बाप बेटे के बीच की कलह। अक्सर दोनों किरदारों में ठनी है। असल जिन्दगी में भी दोनों के बीच रिश्ते साधारण नहीं हैं, ये बात तो जगजाहिर है। रुपहले पर्दे पर तो शाहरुख खान का किरदार हमेशा ही अमिताभ के किरदार पर भारी पड़ता रहा है, लेकिन मराठी समाज को बहकाने वाले ठाकरे परिवार को करार जवाब देकर शाहरुख खान ने असल जिन्दगी में भी बाजी मार ली है।
कहने को तो अमिताभ बच्चन के नाम के साथ "दी एंग्री यंग मैन" का टैग लगा हुआ है, लेकिन असल जिन्दगी में उन्होंने हमेशा न्यू टैग 'बिग बी' का इस्तेमाल किया और करते भी हैं। "बिग बी" का असली अर्थ "बिग बिजनसमैन" मैं उस दिन समझा था, जब श्रीमति बच्चन के बयान पर अमिताभ बच्चन ने दो हाथ जोड़कर एक गली के गुंडे से माफी माँग ली थी, वो भी सिर्फ इसलिए कि उनके बेटे की आने वाली फिल्म द्रोण को व्यापारिक हानि न सहन करनी पड़े। वैसे बिग बी का दूसरा अर्थ बिग बच्चन हो नहीं सकता, क्योंकि उनके पिता हिन्दी साहित्य की जान थे। उस वक्त अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग के जरिए विदेश से ही माफी माँग ली थी, जबकि पूरी घटना का अमिताभ बच्चन को पता भी न था। उस घटना को मीडिया वालों ने भी गलत ढंग से दिखाया था, जिसका एक नमूना यहाँ देख सकते हैं। मैंने घटना के वक्त न्यूज चैनलों पर आ रही करवेज को देखा था, जिसमें दिखाया गया था कि प्रियंका और अभिषेक बच्चन इंग्लिश में बोल रहे थे, जिसके कारण जय बच्चन ने लोगों की भावनाओं को भाँपते हुए हिन्दी में बोलने की जरूरत समझी। अगर वैसा न होता तो प्रियंका चोपड़ा भी जय बच्चन के पीछे पीछे दोहराती हुई नजर न आती।
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आज शाहरुख खान भी उस मोड़ पर खड़ा है, जहाँ पर अमिताभ बच्चन थे, उनकी भी फिल्म रिलीज होने वाली थी, और अब शाहरुख की फिल्म भी रिलीज होने वाली है। मगर शाहरुख ने बिग बी की तरह घुटने नहीं टेके, उसने साफ शब्दों में कह डाला कि मैं माफी नहीं माँगूगा। शाहरुख खान ने अपने बयान पर अटल रहने का जो फैसला लिया है, वो ठाकरे परिवार के लिए किसी तमाचे से कम नहीं। राजू, राहुल के किरदार रुपहले पर्दे पर निभाने वाले शाहरुख खान के भीतर दी एंग्री यंग मैन न जाने कहां से जाग आया, चलो कहीं से भी आया, लेकिन एक आवाज तो उठी, जो ठाकरे को मुंह तोड़ जवाब दे सके।
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ठाकरे परिवार आजकल सबको नसीहत देने लगा हुआ है और मुम्बई को अपनी जंगीर बना लिया है। अभिवक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटा जा रहा है, लेकिन मुंह तोड़ जवाब आज तक किसी ने नहीं दिया। जब मुकेश अम्बानी ने कहा कि मुंबई किसी एक की नहीं है बल्कि हर भारतीय की है, तो उसको नसीहत दे डाली कि तुम बिजनस पर ध्यान दो, राजनीति मत करो।
इतना ही नहीं, जब महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर ने कहा "मैं मराठी हूं, मुझे मराठी होने पर गर्व है लेकिन मुंबई पूरे भारत की है और मैं भारत के लिए खेलता हूं।" तो उसको नसीहत देने के लिए बाला साहिब ठाकरे ने सामना के दो पन्ने काले कर डाले, और कहा कि तुम खेल पर ध्यान दो।
क्या देश को चलाने का ठेका ठाकरे परिवार ने ले रखा है? जो जवाब शाहरुख खान ने शिव सेना को दिया है,वो शिव सेना के लिए किसी तमाचे से कम नहीं, अगर अंत तक शाहरुख उस पर अटल रहे, तो अमिताभ का 'दी एंग्री यंग मैन' का फीता मैं शाहरुख खान के कंधे पर सजा दूँ, कोई और सजाए भले ही न सजाए।

कैमरॉन की हसीं दुनिया 'अवतार'

टायटैनिक जैसी एक यादगार एवं उम्दा फिल्म बनाने वाले निर्देशक जेम्स कैमरॉन उम्र के लिहाज से बुजुर्ग होते जा रहे हैं, लेकिन उनकी सोच कितनी गहरी होती जा रही है। इस बात का पुख्ता सबूत है 'अवतार'। करोड़ रुपयों की लागत से बनी 'अवतार' एक अद्भुत फिल्म ही नहीं, बल्कि एक अद्भुत दुनिया, शायद जिसमें हम सब जाकर रहना भी पसंद करेंगे। फिल्म की कहानी का आधारित पृथ्वी के लालची लोगों और पेंडोरा गृह पर बसते सृष्टि से प्यार करने वाले लोगों के बीच की जंग है। पृथ्वी के लोग पृथ्वी के कई हजार मीलों दूर स्थित पेंडोरा गृह के उस पत्थर को हासिल करना चाहते हैं, जिसके छोटे से टुकड़े की कीमत करोड़ रुपए है, लेकिन उनकी निगाह में वहां बसने वाले लोगों की कीमत शून्य के बराबर है।

इस अभियान को सफल बनाने के लिए अवतार प्रोग्रोम बनाया जाता है। इस प्रोग्रोम के तहत पृथ्वी के कुछ लोगों की आत्माओं को पेंडोरा गृहवासियों नमुना शरीरों में प्रवेश करवाया जाता है। वो पेंडोरा गृहवासी बनकर ही पेंडोरा गृहवासियों के बीच जाते हैं, ताकि उन लोगों को समझा बुझाकर कहीं और भेजा जाए एवं पृथ्वी के लोग अपने मकसद में पूरे हो सकें। उसकी मुलाकात नाईत्रि (जो सल्डाना) से होती है, जो वहां के लोगों के मुखिया की पुत्री है, लेकिन धीरे धीरे फिल्म का नायक जैक सुली (सैम वर्थिंगटन) वहां के लोगों के बेहद प्यार करने लगता है, जो अपने विज्ञानी भाई के अधूरे मिशन को पूरा करने के लिए गया है। इस मिशन में शामिल कुछ और लोग भी जैक सुली की तरह उन लोगों को प्यार करने लगते हैं, लेकिन पृथ्वी के लालची मानवों को ये बर्दाशत नहीं होता, और शुरू होती है जंग। फिल्म आज के समाज को एक आईना दिखाती है कि कुछ कागज के टुकड़ों के लिए उन्होंने जन्नत को कैसे नर्क बना दिया। पेंडोरा गृह पर पैसा नहीं, वहां लालच नहीं। वहां तो एकता है, वहां कुदरत से प्यार करने वाले बाशिंदे हैं।

कैमरॉन ने बहुत दूर की सोची है, शायद भारतीय फिल्म निर्देशक और लेखक तो सदियों तक उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। फिल्म का नायक जैक सुली (सैम वर्थिंगटन) और नायिका जोई सलदाना (नेईत्रि) ने अपने किरदारों को बाखूबी अंजाम दिया। इसके अलावा खलनायक कर्नल मिलिज़ कैट्रिच की भूमिका निभा ने वाले सटिफ्न लैंग ने अपने किरदार में अपने उम्दा अभिनय से जान डाल दी जबकि मिशैल रोडरिग्स एवं सीगोर्नी विवर ने भी अपने किरदार को पूरी जी जान से निभाया है। वैसे असली शब्दों में तो जेम्स कैमरून नि:संदेह इस फिल्म के हीरो हैं। छोटी-छोटी बातों पर उन्होंने ध्यान रखा है और हर किरदार का ठीक से विस्तार किया है। विज्युअल इफेक्ट, कहानी और एक्शन का उन्होंने संतुलन बनाए रखा है और तकनीक को फिल्म पर हावी नहीं होने दिया है।

उन्होंने कहीं भी फिल्म को बोझिल नहीं होने दिया, जो उनकी निर्देशन कमांड का एक लाजवाब नमूना है। इस फिल्म का तकनीकी रूप से फिल्म लाजवाब है। फोटोग्राफी, स्पेशल/विज्युअल इफेक्ट, कास्ट्यूम डिजाइन, संपादन बेहतरीन है। लाइट और शेड का प्रयोग फिल्म को खूबसूरत बनाता है। इस फिल्म में सीजीआई (कम्प्यूटर जनरेटेड इमेज) के सबसे अत्याधुनिक वर्जन का प्रयोग किया गया है, जिससे फिल्म के ग्राफिक्स की गुणवत्ता और अच्छी हो गई है। जेम्स कैमरॉन की निगाह से के अद्भुत दुनिया की सैर 'अवतार'।

आखिर पूरी हुई करिश्मा की तमन्ना



करिश्मा कपूर की तमन्ना पूरी होने जा रही है ओनीर की अगली फिल्म 'यू एंड आई' से। खुद कमाने वाली हर औरत की तमन्ना होती है कि वो परिवार को संभालने के बाद एक बार फिर से अपने काम पर लौटे, जिससे उसकी पहचान थी। जिससे उसको गर्व महसूस होता है, जिससे वो आत्मनिर्भर बनती है।

अभिनेत्री करिश्मा कपूर ने संजय कपूर के साथ शादी करने के बाद फिल्मों में काम करना बंद कर दिया था, और अपना पूरा ध्यान परिवार की देखरेख में लगा लिया था, जैसा कि जया बच्चन, श्रीदेवी, माधुरी दीक्षित, काजोल, जूही चावला, सोनाली बेंद्रे,जैसी कई और अभिनेत्रियों ने किया। करिश्मा कपूर की समकालीन अभिनेत्रियों में से माधुरी दीक्षित, काजोल और जूही चावला ने तो वापसी कर ली, लेकिन करिश्मा कपूर पिछले एक दो साल से बस एक अच्छी कहानी की तलाश में थी, जैसे कि आरके बैनर कहता है कि अच्छी कहानी मिली तो फिल्में खुद बनाएंगे। आखिर आरके बैनर को तो कोई अच्छी कहानी मिली नहीं, मगर कपूर खानदान की बेटी को ओनीर की अगली फिल्म मिल गई, इसकी कहानी अच्छी है या बुरी ये तो जानते नहीं, लेकिन कहा जा रहा है कि ये फिल्म ऑस्कर विजेता फिल्म 'लाईफ इज ब्यूटीफुल' से प्रेरित है।

करिश्मा की वापसी कैसी होगी? इसके बारे में भी कह पाना बहुत मुश्किल है, क्योंकि बड़े पर्दे पर नई अभिनेत्रियों का राज हो रहा है, ऐसे में उनको टक्कर देने के लिए बहुत कुछ चाहिए। याद रहे कि इन नई अभिनेत्रियों में उनकी बहन करीना कपूर भी शामिल है, जिसको निर्देशकों ने साईन तो कर लिया, लेकिन जीरो फिगर से लेकर बिकनी पहनने के बाद भी उनकी फिल्में नहीं चली, जबकि कैटरीना कैफ सीधे और सिम्पल रोल करने के बाद भी निरंतर सफलता बटोरती जा रही है। यहां पर भी किस्मत की जरूरत पड़ती है, ऐसे में तो ज्यादा जब आप किसी बड़े बैनर के तले काम न कर रहें हों। गौरतलब है कि काजोल और माधुरी ने यशराज फिल्म्स बैनर की फिल्मों से वापसी की, लेकिन वापसी का फायदा केवल काजोल को मिला, माधुरी को तो फिर से प्रदेस जाना पड़ा। ऐसे ही बहुत सी अभिनेत्रियां हैं, जिन्होंने बहुत यत्न किए, लेकिन दर्शकों ने भाव नहीं दिया, इनमें विशेष रूप से सौदागर गर्ल 'मनीषा कोईराला', गदर गर्ल 'अमीषा पटेल' और रंगीला गर्ल 'उर्मिला मातोंडकर' शामिल हैं।

करिश्मा कपूर की समकालीन अभिनेत्री जूही चावला ने वक्त की नब्ज को समझा, और उम्र के हिसाब से रोल करने शुरू कर दिए, जबकि करिश्मा कपूर की पिछले कुछ सालों से तमन्ना रही है, वो ही राजस्थानी हिन्दुस्तानी वाले लीड रोल करने की, लेकिन करिश्मा भूल गई कि बॉलीवुड बदल चुका है, वहां पर लोकप्रियता देखकर पैसा फेंका जाता है। वहां फिल्में नहीं, प्रोडेक्ट बनते हैं, जो बहुत महंगे होते हैं, बिकते तो बिकते,  नहीं बिकते तो डिब्बा बंद वापिस होते हैं। करिश्मा को आखिर समझ आ गया कि अब वो करीना कपूर नहीं, इसलिए तो उन्होंने ओनीर की फिल्म झटपट साईन कर ली, जिसमें में उनके सामने होंगे संजय सूरी। डरो मत करिश्मा! सब चलता है, अगर तुम्हारी किस्मत चमक गई तो फिर से गोविंदा तुम्हारे साथ होगा, जिसके साथ जवान अभिनेत्री काम करने से मना कर रही हैं। बेस्ट ऑफ लक

रणभूमि की चलत-तस्वीर 'सेविंग प्राइवेट रेयान'


जज्बा किस चिड़िया का नाम है? युद्ध किसे कहते हैं? देश के लिए लड़ने वालों की स्थिति मैदान जंग में कैसी होती है? युद्ध के समय वहां पर क्या क्या घटित होता है? युद्ध सेनाओं से नहीं, हौंसलों से भी जीता जा सकता है। कुछ तरह की स्थिति को बयां करती है 1998 में प्रदर्शित हुई 'सेविंग प्राइवेट रेयान'।

फिल्म की कहानी शुरू होती है ओमाहा बीच जर्मनी से, जहां जर्मन फौजें और अमेरिकन फौजें आपस में युद्ध कर रही होती हैं। ओमाहा बीच पर उतरी अमेरिकन फौज की टुकड़ी की स्थिति बहुत नाजुक हो जाती है, पूरी टुकड़ी हमलावरों के निशाने में आने से लगभग खत्म सी हो जाती है। कुछ ही जवान बचते हैं, जो हौंसले के साथ आगे बढ़ते हुए दुश्मनों पर फतेह हासिल कर अपने मशीन को आगे बढ़ाते हैं। ओमाहा बीच पर उतरी टुकड़ी की अगवाई कर रहे कैप्टन जॉहन एच मिलर (टॉम हंक्स) को हाईकमान से आदेश मिलता है कि एक जवान को ढूंढकर उसके घर पहुंचाना है। उसके लिए कैप्टन मिलर को एक टीम मिलती है। युद्ध चल रहा है, लेकिन कैप्टन अपनी ड्यूटी निभाते हुए उस नौजवान जेम्स फ्रांसिस रेयान (मैट डॉमन) को ढूंढने निकल पड़ता है। इस दौरान उसको कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जो उसके जज्बे के आगे ढेर हो जाती है, प्रस्त हो जाती हैं। आखिर वो अपने दो साथियों को खोने के बाद जेम्स फ्रांसिस रेयान तक पहुंच जाता है और उसको वापिस जाने के लिए कहता है, मगर जेम्स अपने फर्ज को बीच में छोड़कर जाने के लिए तैयार नहीं होता। आखिर जंग के मैदान में दुश्मनों से लड़ते लड़ते कैप्टन मिलर और उसके अन्य आठ साथी अपनी जान गंवा देते हैं, जो रेयान को बचाने के लिए निकले थे।

युद्ध भूमि के दृश्यों को बहुत ईमानदारी के साथ फिल्माया गया है। युद्ध के दौरान सैनिकों की मनोवृत्ति किस तरह की हो जाती है, उसको भी खूब दिखाया है। साथियों की मृत्यु के बाद कैसे जवानों को आगे बढ़ना पड़ता है। कम गोला बारूद और औजारों के बिना भी दुश्मनों के साथ कैसे लोहा लेना पड़ता है को भी निर्देशक स्टीविन स्पीलबर्ग ने बहुत उम्दा ढंग से प्रस्तुत किया है। फिल्म की कहानी को पूरी कसावट के साथ निर्देशक आगे बढ़ाता है। हिन्दुस्तान में भी युद्ध पर काफी फिल्में बनी है, लेकिन हमारे यहां कुछ नियमों के चलते फिल्म निर्देशक युद्धभूमि को उतनी नजदीक से नहीं दिखा पाए, जितना कि स्टीविन ने अपनी फिल्म सेविंग प्राइवेट रेयान में दिखाया है। अगर अभिनय की बात की जाए तो टॉम हंक्स, मैट डॉमन, एडवर्ड बर्नस, जर्मनी डेविस, बेरी पाईपर, विन डीज़ल ने बहुत उम्दा अभिनय किया है।

एंजेल्स एडं डिमोंस - एक रोचक फिल्म



एंजेल्स एडं डिमोंस - एक रोचक फिल्म


अगर आप एक रहस्यमयी, एक्शन एवं गंभीर विषय की फिल्में देखना पसंद करते हैं या हॉलीवुड अभिनेता टॉम हंक्स की अदाकारी के कायल हैं तो आपके लिए 'दी दा विंची कोड' से विश्व प्रसिद्धी हासिल कर चुके डान ब्राउन के उपन्यास आधारित फिल्म 'एंजेल्स एंड डिमोंस' एक बेहतरीन हो सकती है, इस फिल्म का निर्देशन 'दी दा विंची कोड' बना चुके हॉलीवुड फिल्म निर्देशक रॉन होवर्ड ने किया है।

कहानी : फिल्म की कहानी ईसाई धर्म के आसपास घूमती है। रोम कैथोलिक चर्च के पोप की मृत्यु के बाद नए पोप के चुनाव के लिए रीति अनुसार समारोह आयोजित होता है। नया पोप बनने के लिए मैदान में चार उम्मीदवार होते हैं, जिनका अचानक समारोह से पहले ही अपहरण हो जाता है। उनका अपहरण ईसाई धर्म से धधकारे गए इल्यूमिनाटी समुदाय के लोग करते हैं, जो विज्ञान में विश्वास रखते हैं। इल्यूमिनाटी चेतावनी देते हैं कि चार धर्म गुरूओं की बलि चढ़ा दी जाएगी और वैटीकन सिटी को रोशनी निगल जाएगी, मतलब विशाल धमाका होगा, जिसे वैटीकन सिटी तबाह हो जाएगी। उन दुश्मनों तक पहुंचने के लिए चिन्ह विशेषज्ञ प्रो. रोबर्ट लैंगडन (टॉम हंक्स) को बुलाया जाता है। उसकी मदद के लिए अभियान में विक्टोरिया (अयेलीट यूर्र) भी शामिल हो जाती है, जो सीईआरएन की सदस्य है, जहां से इल्यूमिनाटी परमाणु कैमिकल चुराते हैं, वैटीकन सिटी को उड़ाने के लिए। प्रो.रोबर्ट एवं विक्टोरिया दोनों मिलकर सुरागों के सहारे आगे बढ़ते हुए दुश्मनों तक पहुंचते हैं, इस दौरान कई रहस्य खुलकर सामने आते हैं। जो कहानी में रोचकता बरकरार रखते हैं।

कुछ खास : टॉम हंक्स एवं अयेलीट यूर्र ने अपनी अपनी भूमिका को जानदार बनाने के लिए जी जान से काम किया है, वो उनके चेहरों पर आते भावों से ही बयां होता है। एक उपन्यास को फिल्म में ढाल पाना बहुत मुश्किल होता है, लेकिन रॉन हावर्ड ने बहुत ही रोचक ढंग से इसको संभव कर दिखाया है। फिल्म की पटकथा में पूरी तरह कसावट है, कहीं भी फिल्म पकाऊ या बकवास नहीं लगती। फिल्म निरंतर अपनी रोचकता को लेकर आगे बढ़ती है। फिल्म की बैकराउंड में बजने वाला संगीत भी स्थितियों के बिल्कुल अनुकूल है। फिल्म के हर दृश्य को बहुत ही ध्यानपूर्वक फिल्माया गया है।

यादगर पल : जैसे कि प्रोफेसर का चिन्हों को देखकर इल्यूमिनाटी के इतिहास के बारे में बताना, दुश्मनों तक पहुंचने वाले संकेतों के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी देना, वैटीकन की ईसाई लाईब्रेरी की किताब से विक्टोरिया का पन्ना फाड़ना, लाईब्रेरी में लाईट का जाना प्रोफेसर का कांच तोड़ बाहर निकलना, अंत में इल्यूमिनाटी समुदाय की साजिश में शामिल लोगों का बेनकाब होना एवं धर्म गुरू पैट्रिक का आत्मदाह करना।


बे-लिबास बेबो, बुरे वक्त की निशानी


"पैसा मारो मुंह पर, कुछ भी करूंगा" यह संवाद अरुण बख्सी छोटे पर्दे पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक 'जुगनी चली जलंधर' में बोलते हैं, ये वो ही अरुण बख्सी हैं जो कभी 'अजनबी' नाम के एक हिन्दी धारावाहिक में "बोल मिट्टी दे बावेया" गुनगुनाते हुए नजर आते थे। उस संवाद में भी एक खरा सत्य था और इस नए संवाद में भी बहुत सत्य है।

किसी दूसरे पर यह संवाद फिट बैठे न बैठे, लेकिन कपूर खानदान की बेटी करीना कपूर पर तो बिल्कुल सही बैठता है। यकीनन न आता हो तो पिछले कुछ सालों पर निगाह मारो। शाहरुख के साथ डॉन में फिल्माया गया गीत हो, या अजनबी में अक्षय कुमार के साथ फिल्माए कुछ दृश्य। यशराज बैनर्स की सुपर फ्लॉप फिल्म टश्न में बिकनी पहनकर सबको हैरत में डाल देने वाली करीना ने इस पर आलोचना होते देख कहा था कि अब को बिकनी नहीं पहनेगी।

देखो वादे की कितनी पक्की हैं, बिल्कुल सही, उन्होंने बिकनी पहनना भी छोड़ दिया। अब तो वो टॉपलेस हो गई हैं। कमबख्त इश्क में अक्षय के साथ कई किस सीनों से जब मन नहीं भरा तो कुर्बान में सैफ अली खान के साथ सब से लम्बा किस और फिल्म की चर्चा के लिए टॉपलेस फोटो दे दिया।

ये पैसे कमाने का जरिया भी हो सकता है और अपनी स्टार्डम को बचाने का फंडा भी। या फिर इसे बॉलीवुड में एक काले युग की नई शुरूआत भी कह सकते हैं। जब कपूर खानदान की बेटी इस राह पर चल सकती है तो मायानगरी में सफलता के लिए संघर्ष कर रही गैर-फिल्मी घरानों से आई अभिनेत्रियां गुरेज क्यों करेगी?

करीना कपूर जिस युग की शुरूआत करने जा रही है उसको बॉलीवुड की तरक्की या प्रगति नहीं माना जा सकता, उसको दुर्गति कहा जा सकता है। बॉबी से ऋषि कपूर ने एक नए युग की शुरूआत की थी, उस युग ने कपूर खानदान की बेटियों को तो अपने चुंगल में लेना ही था। समय हिसाब किताब बराबर ही रखता है, इसका उदाहरण है करीना और करिश्मा कपूर। कल तक कपूर खानदान के छोकरे दूसरे घरों की लड़कियों को अपने इशारों पर नचाते थे, आज उनकी बेटियां अपने दिलों की हरसतें पूरी कर रही हैं। बिकनी पहनकर, किस देकर जीरो फिगर करके देख लिया, लेकिन नतीजा जीरो। अब तो लास्ट दाँव है टॉपलेस।

इसके बाद करीना के लिए बची हैं ए ग्रेड की फिल्में है, जिसमें वो अपना भविष्य तलाश सकती है। अब तो प्रसारण मंत्रालय भी रात को इन फिल्मों को प्रसारित करने की मंजूरी देने के करीब है। लगी रहो करीना लगी रहो। आग तो तुम्हारे ही घर से शुरू हुई थी।


बाजारवाद में ढलता सदी का महानायक

इसमें कोई शक नहीं कि रुपहले पर्दे पर अपने रौबदार एवं दमदार किरदारों के लिए हमेशा ही वाहवाही बटोरने वाला सदी का महानायक अमिताभ बच्चन अब बाजारवाद में ढलता जा रहा है, या कहूं वो पूरी तरह इसमें रमा चुका है। ऐसा लगता है कि या तो बाजार को अमिताभ की लत लग गई या फिर अमिताभ को बाजार की।

एक समय था जब अमिताभ की जुबां से निकले हुए शब्द लोगों के दिल-ओ-दिमाग में सीधे उतर जाते थे, उस वक्त के उतरे हुए शब्द आज भी उनकी जुबां पर बिल्कुल पहले की तरह तारोताजा हैं। उस समय कि दी यंग एंग्री मैन की छवि को आज का बिग बी टक्कर नहीं दे सकता। सत्य तो ये है कि आज का बिग बी तो उसके सामने बिल्कुल बौना नजर आता है।

सदी के इस महानायक का हाल एक शराबी जैसा हो गया है, जिसको देखकर कभी समझ नहीं आती कि शराब को वो पी रहा है या फिर शराब उसको पी रही है। आज बाजार अमिताभ को खा रहा है या अमिताभ बाजार को समझ नहीं आ रहा है, बस सिलसिला दिन प्रति दिन चल रहा है। असल बात तो यह है कि बीस तीस साल पुराना लम्बू और आज के बिग बी या अमिताभ बच्चन में बहुत बड़ा अंतर आ चुका है।

जहां बीस तीस साल पहले लम्बू बड़े पर्दे पर गरीबों दबे कुचले लोगों की आवाज बनता या उनका प्रतिनिधित्व करता हुआ एक दी यंग एंग्री मैन बन गया था, वहीं आज का अमिताभ बच्चन एक पूंजीवादी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए बाजार के लिए वस्तु बनकर रह गया या फिर टैग बनकर रह गया।

आज का बिग बी किसी को याद नहीं, अगर याद है तो सब को बीस तीस साल पुराना वो ऊर्जावान और शक्तिशाली अमिताभ बच्चन या फिर विजय दीना नाथ चौहान। जिसकी आवाज लोगों के कानों में आज भी गूंजती है, जिसके होने का आज भी अहसास होता है। वो कई साल पुराना हो चुका है, लेकिन आज भी तारोताजा है खेतों में लगी हुई सब्जियों की भांति। इस बात की पुष्टि तो पिछ्ले दिनों बिग बॉस के पहले दिन ही हो गई थी, जब बिग बी के सामने आने वाले बिग बॉस के मेहमान कल वाले अमित जी को याद कर रहे थे, जब अमिताभ उनकी उम्र का हुआ करता था। इन प्रतियोगियों को आज का अमित तो दिखाई ही नहीं देता। आज का बिग बी तो दी यंग एग्री मैन के कारण दौड़ रहा है।

अमिताभ बच्चन के 'दी यंग एंग्री मैन' से 'बिग बी' बनने के पीछे शायद '90 के दशक दौरान हुआ घाटा ही है, इसके बाद जब अमिताभ फिर से उदय हुआ तो उसका नया रूप था बिग बी। उसने विजय दीना नाथ चौहान का पल्लू छोड़ दिया, और खुद को बिग बी में ढाल लिया। जो अब पैसे की कीमत को समझने लगा था, उसको समझ आ गया था कि अब उसको बाजारवाद में ढलना होगा, नहीं तो वो खत्म हो जाएगा। किसी ने सत्य ही कहा है कि पैसा कुछ नहीं, अगर समझो तो खुदा से कम नहीं।

बीपीएल के विज्ञापन से विज्ञापन जगत में कदम रखने के बाद अमिताभ ने कई उत्पादों की बिक्री को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया, जिसके साथ अमिताभ का नाम जुड़ गया, उसका नसीबा खुल गया। इस दौर में अमिताभ पैसा खींच रहा है खुद के लिए और कुछ कारोबारी कंपनियों के लिए। शायद इस लिए लोगों के जेहन में दी यंग एंग्री मैन का नया रूप नहीं उतर रहा, बिग बी भा रहा है तो उसके पिछले युग के कारण, वैसे भी भारत में एक धारणा तो है कि आदमी अपने पिछले जन्मों का किया हुआ इस जन्म में खाता है, वैसे भी अमिताभ बच्चन का बिग बी दूसरा जन्म ही है। एक सवाल छोड़कर जा रहा हूं आपके सामने कि बाजारवाद में ढलना अमिताभ की मजबूरी है या समय की जरूरत?


'अजब प्रेम..' पर टिका संतोषी का भविष्य


अगर हिन्दी फिल्म जगत के फिल्म निर्देशकों की बात की जाए तो राजकुमार संतोषी का नाम न लिया जाए तो शायद बात अधूरी सी लगेगी। उनकी फ्लॉप फिल्मों ने उनके कैरियर में एक काला अध्याय लिख दिया है, लेकिन फिर भी एक समय था जब राजकुमार संतोषी की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर खूब तालियां एवं पैसा बटोरती थी। अब बहुत जल्द राजकुमार संतोषी अपनी अगली फिल्म 'अजब प्रेम की गजब कहानी' लेकर आए रहे हैं, लेकिन मन में सवाल उठता है कि श्री संतोषी जी युवा दर्शकों को संतुष्ट कर पाएंगे ? मेरे दिमाग में ये सवाल इस लिए आया, क्योंकि पिछले साल रिलीज हुई उनकी फिल्म 'हल्ला बोल', उनकी 1993 में रिलीज हुई दामिनी से काफी मिलती जुलती थी। जिसके कारण उनकी ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा समय टिक नहीं पाई, बेशक इस फिल्म में पंकज कपूर के काम को ज्यादा प्रशंसा मिली।


संतोषी और देओल परिवार की जोड़ी बॉक्स ऑफिस पर खूब गजब ढाहती थी, लेकिन आजकल दोनों ही परिवार बुरे दौर से गुजर रहे हैं। संतोषी और देओल नाम की युगलबंदी ने हिन्दी फिल्म जगत को घायल, दामिनी, घातक, बरसात जैसी हिट फिल्में दी। इसके बाद संतोषी ने अजय देवगन से हाथ मिला लिया, वो भी सन्नी देओल की तरह संतोषी के लिए शुभ साबित हुआ। इस जोड़ी ने भी हिन्दी फिल्म जगत को 'लज्जा', द लीजेंड ऑफ भगत सिंह, खाकी जैसी हिट फिल्में दी। लेकिन इस जोड़ी की हल्ला बोल पिछले साल रिलीज हुई, जो बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह पिटी, क्योंकि थीम बहुत पुराना था। इसके बाद अजय और संतोषी में अनबन होने की बातें आई। इस दौरान बातों पर विराम लगाने के लिए संतोषी ने अजय काजोल को लेकर रामायण बनाने के घोषणा कर दी।


मगर ये घोषणा भी शायद अजब प्रेम की गजब कहानी पर ही टिकी होगी, अगर न्यू कपूर स्टार रणबीर कपूर और अक्की की लक्की गर्ल कैटरीना कैफ के साथ अजब प्रेम की गजब कहानी बॉक्स ऑफिस पर गजब न कर सकी तो शायद एक समय के सुपर हिट निर्देशक की ताकत पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए बॉलीवुड उनको नकार देगा, क्योंकि बॉलीवुड की आदत है कि चढ़ते सूर्य को सलाम करो। जहां तक खुद फिल्म निर्माण क्षेत्र में उतरने की बात है, ये दाँव तो वो बहुत पहले से ही खेल चुके हैं। लज्जा और चाइना गेट में स्टारों की संख्या भी फिल्म को उस पर लगी लागत वापस नहीं दिला सकी।


दर्द-ए-आवाज मुकेश को मेरा नमन, और आपका


जी हां, पिछले कुछ दिनों से मेरे साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है, उंगलियां कुछ और लिख रही हैं और दिमाग में कुछ और चल रहा है। मुझे नहीं पता मेरे ऐसा पिछले दिनों से ऐसा क्यों हो रहा है, वो बात मैं आपके साथ बांटना चाहता हूं, इस पोस्ट के मार्फत। पिछले दिनों अचानक मेरे दिमाग में एक नाम आया, वो था मुकेश का। ये मुकेश कोई और नहीं, हमारे होंठों पर आने वाले गीतों को अमर कर देने वाली आवाज के मालिक मुकेश का ही था।

मेरा हिंदी संगीत से कोई ज्यादा रिश्ता नहीं रहा, लेकिन दूरदर्शन की रंगोली और चित्रहार ने मुझे कहीं न कहीं हिन्दी संगीत के साथ जोड़े रखा। पहले पहल तो ऐसा ही लगा करता था कि अमिताभ खुद गाते हैं, और अक्षय कुमार खुद गाते हैं, जैसे जैसे समझ आई, पता चला कि गीतों में जान फूंकने वाला तो कोई और ही होता है, ये तो केवल आवाज पर उन पर गाने का अभिनय करते हैं। पता नहीं, मुझे पिछले कुछ दिनों से क्यों ऐसा लग रहा था कि ‘दर्द-ए-संगीत’ की रूह मुकेश को शायद मीडिया की ओर से उतना प्यार नहीं मिलता जितना मिलना चाहिए, विशेषकर खंडवा के लाल किशोर दा के मुकाबले तो कम ही मिलता है, ये तो सच है। किशोर दा का जन्मदिवस या पुण्यतिथि, उनको प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया तक खूब दिखाया और याद किया जाता है। उनको याद करने में ब्लॉगर जगत भी पिछे नहीं रहता। ये एक बहुत अच्छी बात है, लेकिन वहीं ये बात बुरी भी है कि मुकेश को उतना याद नहीं किया जाता, जितने के वो हकदार हैं।

यही प्रश्न मुझे पिछले दो तीन दिनों से बेहद परेशान कर रहा था, मैंने इसके लिए वेबर पर सर्च मार कई दफा। मैंने मुकेश के नगमों को ढूंढा, लेकिन उन नगमों में वो नगमे भी शामिल थे, जिनको मैं सुनता रहा हूं और सुनता हूं आज भी, लेकिन इस बात से अनजान था कि वो मुकेश की आवाज में रमे हुए हैं। आज इनकी पुण्यतिथि है, इस बात का पता भी मुझे आज सुबह उस वक्त लगा, जब मैंने खबरें देखने के लिए टीवी ऑन किया, मैं चैनल बदलते बदलते आगे बढ़ रहा था, तो एनडीटीवी पर देखा कि आज मुकेश की पुण्यतिथि है । सुबह सुबह तो एनडीटीवी ने इस संगीत की विशाल हस्ती को पांच मिनट की स्टोरी में सिमट दिया, लेकिन दिन में इस स्टोरी को विस्तारपूर्वक प्रसारित कर एक अद्भुत श्रद्धांजलि दी। वो अपने गीतों के मार्फत आज हर दिल में बसता है, लेकिन उसके बारे में जिक्र बहुत कम होता है। उसके गाए गीत ‘दोस्त दोस्त न रहा’, ‘मैं शायर हूं पल दो पल का’, ‘मिट्टी के मोल’ जैसे तमाम गीत, जिनको सुनते ही कान, दिमाग और दिल सुकून महसूस करता है।

आज का दिन था, जब दर्द-ए-आवाज अमेरिका में हार्ट अटैक का शिकार होने से खामोश हो गई थी। केएल सहगल से प्रेरित मुकेश को मुम्बई तक लाने का शुभ काम अभिनेता मोतीलाल ने किया, उन्होंने ने ही उनको अपनी फिल्म पहली नजर में प्ले-बैक सिंगर के तौर पर चांस दिया, और मुकेश ने अपना हुनर साबित किया। इसके बाद उन्होंने राजकपूर के लिए काफी गीत भी गाया, लेकिन जब मुकेश के खामोश होने की खबर राजकपूर तक पहुंची तो राजकपूर के मुंह से निकला कि आज मैंने अपनी आवाज खो दी। आज सुबह जैसे ही मुझे पता चला कि मुकेश की पुण्यतिथि है, तो मुझे ऐसा अहसास हुआ कि शायद कोई तो रिश्ता होगा मेरा इस आवाज के साथ, वरना मेरे जेहन में मुकेश का नाम क्यों आया? शायद एक संगीत प्रेमी का रिश्ता होगा। चल जो भी हो। आज पुण्यतिथि पर दर्द-ए-आवाज को मेरा नमन।

क्यों नहीं भाते कुंवारे इनको ?

कल अरुण शौरी की खबर पर अचानक एक खबर भारी पड़ गई थी, जी हां वो खबर थी शिल्पा शेट्टी के विवाह की खबर। कल मीडिया में शिल्पा के पिता के हवाले से कुछ खबरें आई, जिनमें कहा गया कि शिल्पा राज कुंदरा की होने वाली हैं, जो एक तलाकशुदा व्यक्ति है। शिल्पा शेट्टी राजकुंदरा से शादी कर ओकलाहामा स्टेट यूनिवर्सिटी की शोध को सच कर रही है या नहीं, “जिसमें कहा गया था कि कुंवरी लड़कियों की पहली पसंद शादीशुदा पुरुष होते हैं”, ये तो पता नहीं। हां, मगर वो बॉलीवुड की उस प्रथा को आगे बढ़ा रही हैं, जिस प्रथा को योगिता बाली, रिया पिल्ले, करिश्मा कपूर, मान्यता ने कड़ी दर आगे चलाया।

संगीत की दुनिया में अमिट छाप छोड़ जाने वाले किशोर दा के साथ योगिता बाली ने शादी रचाई, लेकिन ये विवाह संबंध जल्द ही टूट गए और योगिता बाली मिथुन चक्रवर्ती की हो गई। किशोर कुमार की योगिता बाली के साथ तीसरी शादी थी। एक भारतीय टेनिस खिलाड़ी की पत्नी बन चुकी रिया पिल्ले ने संजय दत्त के साथ रचाई, जो अपनी पहली पत्नी को खोने के बाद तन्हा जीवन जी रहे थे, लेकिन यहां पर भी विवाह संबंध सफल न हुए और रिया ने संजय से अलग होकर एक टेनिस सितारे लिएंडर पेस से शादी कर ली।

अब संजय की जिन्दगी में मान्यता है, जिसकी संजय दत्त के प्रति दीवानगी उक्त यूनीवर्सिटी की द्वारा की गई सर्च को मान्यता देती है। जहां बॉलीवुड के सलमान खान अभी तक अविवाहित घूम रहे हैं, वहीं आमिर खान ने 15 साल पुराना रिश्ता तोड़कर किरण राव से दूसरी शादी रचा ली, जो आजकल धोबीघाट का निर्माण कर रही हैं। इतना ही नहीं, किरण आमिर खान से उम्र में बहुत छोटी हैं, लेकिन फिर भी उनको आमिर खान ही भा रहे हैं।

कभी अजय देवगन तो कभी अभिषेक बच्चन के साथ रोमांस की अफवाहों का शिकार रही करिश्मा कपूर ने भी तो अभिषेक बच्चन जैसे कुंवारे लड़के को सगाई के बाद छोड़कर तलाकशुदा कारोबारी संजय कपूर से जीवन भर का नाता जोड़ लिया। इनके विवाहित जीवन के शुरू में ही शादी टूटने की बातें आने लग गई थी, लेकिन बर्बादी का बम्वडर थम गया।

इसके अलावा आजकल रियालिटी शो में नजर आने वाली फिजा उर्फ अनुराधा बाली ने भी कुछ ऐसा ही किया चांद मुहम्मद के साथ शादी रचाकर, ये शादी तो एक मजाक बनकर रहेगी। और पिछे छोड़ गई बदनामी की कल्ख, जो जिन्दगी भर उनकी संतानों के लिए एक कलंक बनकर रहेगी।

शिल्पा शेट्टी शादी कर रही है, खुशी की बात है कि उसके हाथ पीले हो रहे हैं, लेकिन किसकी उतरन वो क्यों पहनें। क्या हिन्दुस्तान में कुंवारों की कमी पड़ गई, जो वो विदेश में जाकर एक शादीशुदा व्यक्ति को अपना कुंवारा हुस्न सौंप रही है। क्या शिल्पा-राज की शादी सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ पाएगी? बेशक ये शिल्पा का एक निजी फैसला है, जिसमें हमें टीका टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं, लेकिन ये कदम सामाजिक ताने बाने को बिगाड़ते हैं। इस लिए मन चिंतित हो उठता है, अगर मारना है तो उन बुराईयों को मारो जो समाज को खराब कर रही हैं, लेकिन नई बुराइयों को जन्म मत दो…