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मीडिया की प्रश्‍नावली, नेताओं के बेबाक उत्‍तर

या तो मीडिया को अपनी बे अर्थी प्रश्‍नावली बंद कर देनी चाहिए या फिर देश के नेताओं के घटिया बयानों को प्रसारित करने से परहेज करना चाहिए। मीडिया को कहीं न कहीं सावधानी बरतनी होगी। मीडिया अच्‍छी तरह जानता है। हमारे नेताओं की शिक्षा का स्‍तर कितना ऊंचा है। वैसे भी रानजीतिक रैलियों में हमारे नेता कहते नहीं थकते कि कीचड़ में पत्‍थर मारोगे तो कीचड़ के छींटे आपका दामन गंदा करेंगे।

दिल्‍ली गैंग रेप घटना के बाद पूरा देश सदमे में है। ऐसा मैं नहीं, बल्‍कि हमारा 24 घंटे प्रसारित होने वाले इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया कह रहा है। भले ही इस घटनाक्रम के बावजूद सलमान की दबंग ने सौ करोड़ से ज्‍यादा रुपए बॉक्‍स ऑफिस पर एकत्र किए। भारतीय क्रिकेट प्रेमियों ने निरंतर क्रिकेट देखा। दिल्‍ली गैंगरेप की लाइव रिपोर्टिंग व चर्चा के दौरान मीडिया ने विज्ञापन से अच्‍छा कारोबार किया, थोड़े से ब्रेक के बाद के बहाने।

अब हमारे पत्रकार महोदय जहां भी खड़े होते हैं, वहीं खड़े किसी न किसी शख्‍स से पूछ लेते हैं दिल्‍ली गैंग रेप के बारे में आपका क्‍या खयाल है, क्‍यूंकि आजकल सन्‍नी लियोन फायरब्रांड नहीं। हमारे नेता भी टीवी पर आने के चक्‍कर बेबाक बयान दे देते हैं। मगर जब वो बयान बवाल बन जाता है तो मीडिया के सिर आरोप आता है बयान तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया। अंत बयान की लीपापोती की जाती है, शायद वैसे ही जैसे दीवाली से पूर्व कच्‍ची दीवारों में पड़े खड़ों को भरने की प्रक्रिया होती है या किसी बड़े नेता के आने से पूर्व टूटी सड़कों की मुरम्‍मत। नेता सार्वजनिक तौर पर माफी मांग लेता है। हर हिन्‍दी फिल्‍म की तरह बवाल का भी हैप्‍पी एंडिंग हो जाता है।

दिल्‍ली गैंगरेप पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है, 'रेप की घटनाएं 'भारत' में नहीं 'इं‌डिया' में ज्यादा होती हैं'। उन्होंने कहा है, 'गांवों में जाइए और देखिए वहां महिलाओं का रेप नहीं होता, जबकि शहरी महिलाएं रेप का ज्यादा शिकार होती हैं'।

मोहन भागवत किसी गांव की बात करते हैं, जहां से किसी शहर का उदय होता है। जैसे गंगोत्री गंगा का उदय, वैसे ही गांव शहर का उदय करता है। गांव से निकलकर लोग शहर की तरफ आते हैं। लोग शहर में आकर बस जाते हैं, जो कल गांव थे, आज गांव मंडियां या शहर बन चुके हैं। अगर मोहन भागवत गांव का तर्क देकर किसी सच्‍चाई से मुंह मोड़ना चाहते हैं तो अलग बात है, वैसे मैं उनको एक बात कहना चाहता हूं कि शायद शहर में औरत की आबरू की कीमत हजारों में लगती हो, मगर गांव में दलित महिला की इज्‍जत की कीमत केवल एक घास की गठड़ी हो सकती है या कुछ पैसे हो सकते हैं। गांवों की स्‍थिति शहर से बेहद बुरी है। गांव में दलित महिलाओं को निशाना बनाया जाता है। जैसे मध्‍य प्रदेश की एक महिला प्रोफेसर ने कहा था, समर्पण कर देना चाहिए था, वैसा समर्पण गांवों में महिलाओं को करना पड़ता है। वो उस स्‍थिति को स्‍वीकार कर लेती हैं।

वहीं दूसरी तरफ भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय ने कहा है 'महिलाएं मर्यादा न लांघें, नहीं तो रावण हरण के लिए बैठा है'। मगर कैलाश विजयवर्गीय ने महिलाओं की मर्यादा के बारे में प्रकाश नहीं डाला। शायद वो इस विषय पर विस्‍तार से बोलते तो हो सकता था महिलाएं उनके प्रवचनों को आत्‍मसात कर लेती। दिल्‍ली गैंग रेप को ध्‍यान में रखकर बयान देने से अच्‍छा होता अगर कैलाश क्राइम आंकड़े देखकर बयान दिया होता, जो यह दर्शाता है कि 90 फीसदी बलात्‍कार घरों के अंदर अपने ही परिजनों के हाथों से किए जाते हैं। घर में रहने वाली युवतियों के लिए, महिलाओं के लिए आख़िर कौन सी लक्ष्‍मण रेखा होती है, शायद जानने के लिए महिलाएं आतुर होंगी। अगर कैलाश जी आपके पास है तो जरूर बताईए, ताकि महिलाएं घर में किसी हवश के भूखे भेड़िए का शिकार होने से बच जाएं।

मीडिया भी उस बाजार का एक हिस्‍सा है, जो अपने उत्‍पाद बेचने के लिए हर तरह का फंडा अपनाता है। यह कहना गलत होगा कि केवल बॉलीवुड नग्‍नता परोसता है। मीडिया भी कोई कम नहीं। मल्‍लिका शेरावत, सन्‍नी लियोन, पूनम पांडे से दुनिया को अगवत करवाने वाला बॉलीवुड नहीं, मीडिया है। काजोल, माधुरी, जूही किस तरह अपने परिजनों को समर्पित हो गई हैं। मीडिया यह सब बताने में दिलचस्‍पी नहीं लेता, बल्‍कि इसमें दिलचस्‍पी लेता है कि मल्‍लिका ने कितने चुम्‍बन दिए, सन्‍नी लियोन से इससे पहले कौन कौन सी अश्‍लील फिल्‍मों में काम किया।

बस! मुझे ट्रैफिक चाहिए

आज की ब्रेकिंग न्‍यूज क्‍या है ? सर अभी तक तो कोई नहीं, लेकिन उम्‍मीद है कि कोई दिल्‍ली से धमाका होगा। अगर न हुआ तो। फिर तो मुश्‍िकल है सर। बस! मुझे ट्रैफिक चाहिए। कुछ ऐसे ही संवाद होते हैं आज के बाजारू मीडिया संपादक के।

मजबूरी का नाम महात्‍मा गांधी हो या मनमोहन सिंह, कोई फर्क नहीं पड़ता। मजबूरी तो मजबूरी है। उसके सामानर्थी शब्‍द ढूंढ़ने से कुछ नहीं होने वाला। पापी पेट के लिए कुछ तो पाप करने पड़ते हैं। आज मीडिया हाऊसों की वेबसाइटों को अश्‍लील वेबसाइटों में तब्‍दील किया जा रहा है। अगर कोई ब्रेकिंग न्‍यूज नहीं तो क्‍या हुआ, तुम कुछ बनाकर डालो, अश्‍लील फोटो डालो, लिप लॉक की फोटो डालो। मुझे तो बस! मुझे ट्रैफिक चाहिए। इतना ही नहीं, मासिक पत्रिकाएं भी कहती हैं अब कुछ करो, बुक स्‍टॉलों पर ट्रैफिक चाहिए, वरना घर जाइए।

हर किसी को ट्रैफिक चाहिए। हर कोई ट्रैफिक के पीछे दौड़ रहा है। सड़कें ट्रैफिक से निजात पाना चाहती हैं, मगर ऐसा हो नहीं पा रहा। पैट्रोल के रेट बढ़ रहे हैं तो कंपनियां वाहनों के रेट गिराकर डीजल मॉडल उतार रही हैं। ट्रैफिक कम होने का नाम नहीं ले रहा, वहीं दूसरी तरफ नेता अभिनेता भी ट्रैफिक बढ़ाने को लेकर लगे हुए हैं।

फिल्‍मी दुनिया में तो आजकल इतना जद्दोजहद चल रहा है, जो सितारा बॉक्‍स ऑफिस पर ट्रैफिक खींचने की कुव्‍वत रखता है, उसको पहल के आधार पर साइन किया जाता है एवं शर्त होती है कि फिल्‍मी नफे का कुछ प्रतिशत आपको मिलेगा। ऐसे में अभिनेताओं में युद्ध शुरू हो गया है। यही कारण था कि जब तक है जान के रिलीज होने के लिए सिनेहाल पहले से बुक कर लिए गए थे, और अजय देवगन की सन ऑफ सरदार को कम सिनेहालों में रिलीज करना पड़ा। अब आमिर ख़ान भी अपनी अगली फिल्‍म तलाश को लेकर कुछ ऐसा ही कर रहे हैं। आमिर ख़ान बॉलीवुड में सबसे अधिक ट्रैफिक खींचने वाला सितारा है, लेकिन इस बार उसके पास भी समय कम है, क्‍यूंकि तलाश के अगले हफ्ते खिलाड़ी 786 रिलीज हो रही है। सोनम को छोड़कर निर्देशक सोनाक्षी को साइन कर रहे हैं, क्‍यूंकि ट्रैफिक खींचने वाली आइटम चाहिए।

नरेंद्र मोदी को हाईटेक प्रचार की जरूरत क्‍यूं पड़ रही है, क्‍यूंकि पिछले दस सालों के अंदर किसी पौधे को पनपने नहीं दिया, अब हैट्रिक का दबाव है, ऐसे में हर जगह पहुंच नहीं पा रहा, लेकिन हैट्रिक लगाने के लिए जरूरत कहती है कि ट्रैफिक चाहिए। मगर सड़कें कहती हैं ट्रैफिक नहीं चाहिए। नहीं चाहिए। नहीं चाहिए। इतने शोर शराबे में उनकी सुनता कौन है। क्‍यूंकि वाहन बनाने वाली कंपनियों ने प्रचार कंपनियों पर दबाव डाल दिया है कि शो रूम के अंदर ट्रैफिक चाहिए।