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शहीदों की अर्थी पर शब्दों की वर्षा शुरू हुई

युवा कवि नितिन फलटणकर
हम भूल गए सारे जख्म
और फिर से चर्चा शुरू हुई।
शहीदों की अर्थी पर शब्दों की वर्षा शुरू हुई।

हम भूल गए माँ के आँसू
हम भूल गए बहनों की किलकारी।
बस समझौते के नाम पर फिर से चर्चा शुरू हुई।
शहीदों की अर्थी पर शब्दों की वर्षा शुरू हुई।

वो आग उगलते रहते हैं
हम आँसू बहाते रहते हैं।
बहते आँसू की स्याही से इतिहास रचने की चर्चा शुरू हुई
शहीदों की अर्थी पर शब्दों की वर्षा शुरू हुई।

वो घात लगाए बैठे हैं।
हम आघात सहते रहते हैं।
आघातों की लिस्ट बनाने नेताओं की चर्चा शुरू हुई।
शहीदों की अर्थी पर शब्दों की वर्षा शुरू हुई।

पूछो इन नेताओं को, कोई अपना इन्होंने खोया है?
बेटे के खून से माताओं ने यहाँ बहुओं का सिंदूर धोया है।
इस सिंदूर के लाली की चर्चा फिर से शुरू हुई।
शहीदों की अर्थी पर शब्दों की वर्षा शुरू हुई।

शब्द बाण कब बनेंगे।
जख्म हमारे कब भरेंगे?
नए जख्म सहने की चर्चा यहाँ शुरू हुई,
शहीदों की अर्थी पर शब्दों की वर्षा शुरू हुई।