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वो निकलती थी...

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वो निकला करती थी
पेड़ों की छाया में,
मैं भी मिला करता था
पेड़ों की छाया में,

अच्छा लगता था,
उसका बल खाकर चलना
पेड़ों की छाया में,

बुरा लगता था
विछड़ना और दिन डलना
पेड़ों की छाया में,

बहुत अच्छा लगता था,
खेतों, खलियानों को चीरते हुए मेरे गांव तलक उसका आना
पेड़ों की छाया में,

पहली मुलाकात सा लगता था,
कड़कती धूप में घर से निकलकर
उसके आगोश में जाना
पेड़ों की छाया में,

याद है मुझे आज भी
इस नहर में डुबकी लगाना
पेड़ों की छाया में,