Showing posts with label नरेंद्र मोदी. Show all posts
Showing posts with label नरेंद्र मोदी. Show all posts

Black Money - काला धन, मोदी सरकार और इंद्र की अप्सराएं

Publish In Swarn AaBha
भारत की जनता को लुभावना किसी बच्चे से अधिक मुश्किल नहीं और यह बात भारतीय नेताओं एवं विज्ञापन कंपनियों से बेहतर कौन जान सकता है। इस बात में संदेह नहीं होना चाहिए कि वर्ष २०१४ में हुए देश के सबसे चर्चित लोक सभा चुनाव लुभावने वायदों एवं मैगा बजट प्रचार के बल पर लड़े गए। इस प्रचार के दौरान खूबसूरत प्रलोभनों का जाल बुना गया, जो समय के साथ साथ खुलता नजर आ रहा है।

देश में सत्ता विरोधी माहौल था। प्रचार के दम पर देश में सरकार विरोधी लहर को बल दिया गया। प्रचार का शोरगुल इतना ऊंचा था कि धीमे आवाज में बोला जाने वाला सत्य केवल खुसर फुसर बनकर रहने लगा। जनता मुंगेरी लाल की तरह सपने देखने लगी एवं विश्वास की नींद गहरी होती चली गई कि अब तर्क की कोई जगह न बची। जो ऊंचे स्वर बार बार दोहराया गया, वो ही सत्य मालूम आने लगा। इस देश की जनता को पैसे की भाषा समझ आती है और विपक्षी पार्टी ने इसी बात को बड़े ऊंचे सुर में दोहराया, जो जनता को पसंद भी आ गया।

नौ जनवरी को यूट्यूब पर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक भाषण को अपलोड किया गया था, जिसमें उन्होंने तत्कालीन सरकार पर धावा बोलते हुए कुछ यूं कहा था, ‘‘ये जो चोर-लुटेरों के पैसे विदेशी बैंकों में जमा हैं न, उतने भी हम एक बार ले आये न, तो हिंदुस्तान के एक-एक गरीब आदमी को मुफ्त में 15-20 लाख रुपये यूं ही मिल जायेंगे। ये इतने रुपये हैं..। सरकार आप चलाते हो और पूछते मोदी को हो कि काला धन कैसे वापस लायें? जिस दिन भाजपा को मौका मिलेगा, एक-एक पाई हिंदुस्तान में वापस आयेगी और इस धन को हिंदुस्तान के गरीबों के काम में लगाया जायेगा।’’

मगर हैरानी उस दिन हुई जब २ नवंबर २०१४ रविवार को माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आकाशवाणी प्रसारण पर जनता से दूसरी बार रूबरू होते हुए 'मन की बात' प्रोग्राम में कहा, ''कालाधन कितना है, इसके बारे में न मुझे मालूम है, न सरकार को मालूम है, किसी को पता नहीं है। पिछली सरकार को भी इसकी जानकारी नहीं थी। मैं आंकड़ों में नहीं उलझना चाहता कि यह एक रूपया है, लाख है, करोड़ है या अरब रुपए है। बस कालाधन वापस आना चाहिए।''

उम्मीद तो यह थी कि सत्ता पाने के बाद चुनावी सभा में सुनने वाला स्वर पहले से अधिक प्रगाढ़ होगा, लेकिन मिला उम्मीद के विपरीत। सरकार में आते ही नरेंद्र मोदी के तेवरों में नरमी नजर आने लगी। समय बीतने लगा, जनता का ध्यान दूसरे मामलों की तरफ खींचने की कोशिश की जाने लगी। 'स्वच्छ भारत अभियान' उसकी कड़ी का एक हिस्सा है। मगर सरकार को समझना होगा कि काला धन, महंगाई एवं बाहरी सुरक्षा जैसे मुद्दों पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। काले धन पर तो बिल्कुल नहीं, क्योंकि सत्ता तक पहुंचाने में इस मुद्दे का बहुत बड़ा योगदान है।

राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ मीडिया कर्मी पुण्य प्रसून वाजपेयी के अनुसार आज से 25 बरस पहले पहली बार वीपी सिंह ने बोफोर्स घोटाले के कमीशन का पैसा स्वीस बैंक में जमा होने का जिक्र अपनी हर चुनावी रैली में किया था। इस काले धन के अश्वमेघ पर सवार होकर वीपी पीएम बन गए, मगर बोफोर्स घोटाले का एक भी पैसा स्वीस बैंक से भारत नहीं आया। सबसे हैरानीजनक बात तो यह है कि इस अश्वमेघ घोड़े पर सवार होकर गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश की सत्ता तक पहुंच गए। मगर अब उनकी सरकार का रवैया भी पुरानी संप्रग सरकार से अधिक अच्छा नहीं है। देश से काला धन बाहर भेजने वालों की सूची को सार्वजनिक न करने के लिए विदेशों के साथ संधि का हवाला दिया जाता है, जो केवल एक बहाना है। देश हित की बात करने वाली सरकार देश विरोधी तत्वों का नाम उजागर करने से पैर पीछे क्यों खींचती है ? इस मामले में यूटर्न क्यूं लेती है ?

जनता को काले धन का अर्थ केवल इतना समझ आता है कि घोटालों से की कमाई को विदेशों में छुपाना होता है। मगर काला धन केवल विदेशों में हो यह कहना भी उचित नहीं, देश के अंदर भी काला धन बहुत है। काला धन वो पैसा है, जो आप ने अज्ञात स्रोत से प्राप्त किया है एवं उसके सामने आप ने सरकार को कर प्रदान नहीं किया। देश के बड़े बड़े घराने अरबों का कर चोरी करते हैं, जिसको अन्य स्रोतों के जरिए पुनः अपने कारोबार विस्तार में लगाते हैं, ताकि उनका कारोबार निरंतर प्रफुल्लित हो।

एक नौकरीपेशा व्यक्ति लगभग अपने सभी कर अदा करता है, क्योंकि उसके पास कानूनविद नहीं हैं, और उसके पास इतना धन भी नहीं होता, जिसको बचाने के लिए वो किसी कानूनविद को तैनात करे। पिछले दिनों एक वकील से मुलाकात हुई, वकील के अनुसार एक बिजनसमैन अपने ग्रुप के अंतर्गत बहुत सारी कंपनियां बनाता है एवं उनमें कर्मचारियों की संख्या उन नियमों को ध्यान में रखकर करता है, जो उसको सरकारी कर अदा करने से बचाते हैं। इस तरह उसकी आमदनी में इजाफा होता है, मगर यह एक तरह से कर चोरी करने का तरीका है एवं चोरी करने वाला एक तरीके से काला धन एकत्र करता है, जिसको वो किसी बैंक में जमा नहीं करता, बल्कि किसी अन्य स्रोत के जरिये पुनः अपने कारोबार में निवेश करवाता है।

यदि देश की सरकार काले धन के खिलाफ असल रूप में काम करना चाहती है तो उसको देश के कारोबारियों के खिलाफ लोहा लेना होगा, जो कोई भी राजनीतिक पार्टी लेने से डरेगी। वर्ष २०१४ के लोक सभा चुनावों का शोर विदेशों तक में सुनाई दिया। प्रचार प्रसार पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए गए। सवाल उठता है कि आखिर प्रचार प्रसार के लिए इतना पैसा आया कहां से ? राजनीतिक पार्टियों को चंदा कहां से आता है ? इसके पीछे कौन सी लॉबी काम करती है ? अभी चुनाव कमिशन ने राजनीतिक पार्टियों को अपना चंदा सार्वजनिक करने को कहा था तो सभी विरोधी पार्टियां एक सुर में हो गई एवं चुनाव आयोग को अपना आदेश वापिस लेने के लिए कहने लगी। आखिर डर किसी बात से लगता है ? कहीं चुनाव प्रचार में लगने वाला धन काला तो नहीं ? क्योंकि ईमानदारों के पास तो जरूरतें पूरी करने के लिए पैसा नहीं, राजनीतिक पार्टियों का पेट भरने के लिए कहां से होगा ? राजनेता एक तरह से बेरोजगार एवं वालंटियर होते हैं, मगर जैसे ही नेताओं को सत्ता मिलती है तो उनके कच्चे मकान आलीशान महलों में तबदील हो जाते हैं ? यदि इस पैसे का हिसाब मांगा जाए तो शायद देश को उसका काला धन मिल सकता है ? एवं स्विस की बैंक में पड़ा काला धन, वैसा ही है,  जैसी इंद्र की अप्सराएं, जो किसी ने देखी नहीं, लेकिन उन अप्सराओं के साथ गृहस्थ जीवन भोगने के लिए लोग अपना वास्तविक गृहस्थ तक त्याग देते हैं। भारतीय जनता को उस बच्चे की भांति नहीं होना चाहिए, तो चांद को पाने की कामना करता है, उसको वास्तविकता को समझना चाहिए। काला धन देश के भीतर ही इतना घूम रहा है, यदि उसको सही व्यवस्था बनाकर रोक दिया जाए तो देश का भला हो सकता है। देश की सरकारों ने कर लगाए, लेकिन उससे बचने के लिए कुछ कानूनविद पैदा कर दिए। देश के सरकारी ही नहीं बल्कि प्राइवेट संस्थानों में निष्पक्षता के साथ सोशिल ओडिट होनी चाहिए। हिसाब किताब में पारदार्शिता होनी चाहिए। यदि ऐसा हो जाए तो शायद काला धन ढ़ूंढ़ने के लिए देश की जनता को स्विस बैंक की तरफ देखने की जरूरत न पड़े। मगर इस तरह का संभव होना मुश्किल है, क्योंकि कारोबारी परिवारों ने राजनीतिक पार्टियों को बड़े स्तर पर हाइजैक कर लिया है। यह कारण है कि चुनावी रैलियों में हुंकार भरने वाले नेता भी सत्ता में आने के बाद नरम होने लग जाते हैं।

मुझे लगता है कि काला धन किसी बैंक में नहीं मिलेगा, चाहे वो भारतीय बैंक हो या स्विस बैंक क्योंकि जिसको पैसे से पैसा बनाने की लत लग जाए, वो बैंक के मामूली ब्याज से पैसे को नहीं बढ़ाएगा, बल्कि वो अपने कारोबार में उसको निवेश कर कर दुगुना करता रहेगा। देश में बाहर से निवेश होने वाले पैसे पर भी सरकार को पैनी निगाह रखनी होगी, कहीं यह भारत में हुए घोटालों का पैसा ही तो भारत में किसी अन्य व्यक्ति द्वारा तो निवेश नहीं किया जा रहा है। भारत में यदि विदेशी कंपनी भी निवेश करती है तो उसके पैसे के स्रोत की पूरी जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए।

ध्यान रहे कि बैंकों का लेन देन तो आज नहीं तो कल ट्रेस हो सकता है, मगर दो नंबर का पैसा हमेशा बिना हिसाब किताब के गुप्त रास्तों से सीमाएं पार करता है।

मीडिया कवरेज़ पर उठ रहे सवाल

हमारे प्रधानमन्त्री जी अमेरिका दौरे पर है। आइये कुछ
सच्चाइयों से अवगत कराये।

भारतीय मीडिया

1. नरेंद्र मोदी जी का भव्य स्वागत किया गया।
* जब कि स्वागत के समय मात्र भारतीय मूल के पांच अफसर
और एक अमेरिकन प्रोटोकॉल उपस्थित थे।

2. नरेंद्र मोदी जी के लिए कढ़ी सुरक्षा व्यवस्था।
* जब कि एयरपोर्ट से होटल तक मोदी जी अपनी गाडी से
अमेरिकन सुरक्षा व्यवस्था के बिना ही गए। कोई भी अमेरिकन
पुलिस की मोटर साइकिल नहीं थी।

3. मोदी जी का अमेरिकन वासियो ने आथित्य स्वागत किया।
* जब की अमेरिका दौरे का पूरा खर्च भारत ने किया। उनके ठहरने
तक का खर्चा भारतीय दूतावास ने उठाया।

4. आइये देखे वहाँ के लोग और वहाँ के अखबार क्या कहते है।
* न्यू यॉर्क टाइम्स में उनके आने का उल्लेख तक नहीं है। 2002
के दंगो के कारण वहा की कोर्ट द्वारा सम्मन दिए जाने का विवरण
है।
* वाशिंगटन पोस्ट ने उनका मज़ाक उड़ाते हुए लिखा है -
"India’s Modi begins rock star-like U.S. tour" ,
यानि हमारे प्रधानमंत्री की तुलना वहाँ के नाचने - गाने वालों से
की है।

* वाशिंगटन पोस्ट ने यह भी लिखा है की भारत के प्रधानमंत्री के
अमेरिका दौरे से कोई भी महत्तवपूर्ण समझौता (अनुबंध) होने
की संभावना नहीं है।

5. "मैडिसन स्क्वायर गार्डन" जहाँ मोदी जी ने रिवॉल्विंग स्टेज
पर एक रॉक स्टार की तरह भाषण दिया वह भारतीय मूल के
व्यक्तियों (भाजपाई) द्वारा भुकतान करके किराये पर
लिया गया है । वहाँ की सरकार का कोई योगदान नहीं है ।

6. हमारे प्रधानमन्त्री के जापान दौरे के दौरान वहाँ इसी तरह
का माहोल था। जापान के सबसे ज्यादा लोकप्रिय न्यूज़ पेपर -
टोक्यो न्यूज़ पेपर ने उनके जापान आने की खबर मात्र 80sq
cm में पूरी कर दी। हमारे मीडिया ने ऐसा दिखाया जैसे की हमारे
प्रधानमंत्री जी ने पूरा जापान फ़तेह किया है ।

*चीन के प्रधानमंत्री के भारत आने पर हमारी मीडिया ने
ऐसा दिखाया कि जैसे भगवान धरती पर आ गए है और
वो भी अंगूठा दिखा कर चले गए।
.
.
भारत का मीडिया 150 अरब लोगो को उल्लू बना रहा है किसके
इशारे पर ?

नरेंद्र मोदी, मीडिया और अरविंद केजरीवाल

गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी से अधिक मीडिया पीड़ित कोई नहीं होगा। मोदी जितना तो बॉलीवुड में भी आपको मीडिया पीड़ित नहीं मिलेगा। ग्‍यारह साल तक निरंतर मीडिया के निशाने पर रहे। मीडिया का विरोधी सुर इतना कि उनको पांच इंटरव्‍यूओं को छोड़कर भागना पड़ा।

2012 ढलते वर्ष के साथ एक नए नरेंद्र मोदी का जन्‍म हुआ। यह ग्‍यारह साल पुराना नरेंद्र मोदी नहीं था। इस समय नए नरेंद्र मोदी का उदय हो रहा था। गुजरात की सत्‍ता चौथी वार संभालने की तरफ कदम बढ़ रहे थे। गुजरात की जीत उतनी बड़ी नहीं थी, जितना बड़ा उसको दिखाया गया।

इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ एपको वर्ल्‍ड, पीआर एजेंसी का, जिसने अपने हाथ में मीडिया रिमोट ले लिया था। 2012 की जीत बड़ी नहीं थी। इसका तथ्‍य देता हूं, जब नरेंद्र मोदी पहली बार गुजरात में मुख्‍यमंत्री बने तो उनकी सीटें 127 थी, दूसरी बात सत्‍ता में आए तो उनकी सीटें 117 तक घिसककर आ गई थी। अंत 2012 में यह आंकड़ा महज 116 तक आकर रुक गया।

मगर मोदी का कद विराट हो गया, क्‍यूंकि मीडियाई आलोचनाओं के बाद भी नरेंद्र मोदी निरंतर गुजरात की सत्‍ता पर काबिज होने में सफल हुए। ग्‍यारह साल का वक्‍त नरेंद्र मोदी आज भी नहीं भूलते, तभी तो उन्‍होंने न्‍यूज ट्रेडर जैसे शब्‍द को जन्‍म दिया। हालांकि दिलचस्‍प बात तो यह थी कि नरेंद्र मोदी ने हर न्‍यूज चैनल को अपना इंटरव्‍यू दिया, ताकि अपनी बात पूरे देश तक पहुंचा सके, लेकिन किसी भी न्‍यूज ट्रेडर का नाम नहीं लिया।

नरेंद्र मोदी इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया से त्रसद थे, तभी उन्‍होंने शुरू से ही सोशल मीडिया पर जोर दिया। नरेंद्र मोदी 2007 के आस पास सोशल मीडिया पर पूरी तरह सक्रिय होने लगे। अलग अलग भाषाओं में अपनी वेबसाइट का संचालन किया, ताकि लोगों से जुड़ा जाए। 2012 तक आते आते नरेंद्र मोदी मीडिया के लिए टीआरपी का सबसे बड़ा मटीरियल बन चुके थे।

अब आजतक को राखी सावंत और इंडिया टीवी को भूत प्रेत दिखाने की अधिक जरूरत महसूस न हो रही थी। जी न्‍यूज के नवीन जिंदल के साथ रिश्‍ते बिगड़े, तो कांग्रेस सबसे बड़ी दुश्‍मन के रूप में जी न्‍यूज के सामने खड़ी हो गई। इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया को एक दूसरे की नकल करने की लत है।

इस लत की वजह देश में एक माहौल बनता है। उसकी माहौल में बड़े बड़े बुद्धिजीवी अपने दिमाग से कुछ नए शब्‍दों के साथ मसाले बनाते हैं, जो अख़बारों के कोरे कागजों को काले करने में अहम भूमिका निभाते हैं। इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया सोशल मीडिया पर, और प्रिंट मीडिया इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया के प्रभाव में अपना जीवन बसर कर रहा है।

जहां 2012 में डिजीटल कैंपेन व वन मैन शो के दम पर सरकार बनाने में नरेंद्र मोदी कामयाब हुए, वहीं मीडिया ने भाजपा के भीतर उनकी साख को जन्‍म दिया। अंतिम सांसों पर पड़ी बीजेपी को उम्‍मीद की किरण नजर आई। डूबते को तिनके का सहारा वाली कहावत इस समय सही समझ पड़ रही थी।

बीजेपी ने वरिष्‍ठ नेताओं की नाराजगी को मोल लेते हुए नरेंद्र मोदी को गोआ में पीएम पद का उम्‍मीदवार घोषित कर दिया। यहां पर एलके आडवाणी का विरोध सुर्खियों में रहा। जैसे कि सब जानते ही थे कि नरेंद्र मोदी यहां से पार पाएंगे एवं एक मजबूत नेता बनकर उभरेंगे। वही हुआ, अंत मीडिया ने नरेंद्र मोदी को मजबूत नेता घोषित कर दिया।

उधर, अरविंद केजरीवाल के साथ अन्‍ना अंदोलन अपनी शिखर पर था। सरकार की जड़ों को हिला चुका था। सरकार विरोधी माहौल तैयार हो चुका था। अब सरकार पूरी तरह ध्‍वस्‍त होने के किनारे थे। अनुमान लगने लगे थे कि सरकार आज गिरी या कल गिरी।

इस बीच पांच राज्‍यों के चुनाव आए। बड़ी दिलचस्‍प बात थी कि नरेंद्र मोदी को मध्‍य प्रदेश में चुनाव प्रचार के लिए नहीं जाने दिया गया, लेकिन फिर भी शिवराज चौहान की सरकार ने भाजपा को बहुत बड़ी जीत दिलाने में सफलता हासिल की, जो जीत नरेंद्र मोदी की 2012 की जीत से तो काफी बड़ी थी। मध्‍य प्रदेश के साथ साथ भाजपा ने चार राज्‍यों में अच्‍छा प्रदर्शन किया, लेकिन अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में बनी आम आदमी पार्टी ने दिल्‍ली में नरेंद्र मोदी की लहर वाली भाजपा की हवा निकाल दी। मीडिया ने अपने एग्‍जिट पोल में अरविंद केजरीवाल की पार्टी को आठ सीटें प्रदान की। नतीजे आए तो आंखें खुली की खुली रह गई। पूरा मीडिया जगत अवाक रह गया। स्‍वयं आम आदमी पार्टी को झटका लगा।

आम आदमी पार्टी 28 विधायकों के साथ दिल्‍ली विधान सभा पहुंची। आम आदमी पार्टी ने विपक्ष में बैठने की बात कही, और कहा कि बड़ी पार्टी बीजेपी सरकार बनाए। अब बीजेपी ने इंकार कर दिया। मीडिया ने ख़बर चला दी कि अरविंद केजरीवाल अपनी जिम्‍मेदारी से भाग रहे हैं, जब उनको कांग्रेस बिना शर्त समर्थन दे रही है तो सरकार बनानी चाहिए।

अरविंद केजरीवाल ने जनता के बीच जाकर समर्थन मांगा। तथाकथित कहो या असली, लेकिन अरविंद केजरीवाल ने सरकार बनाई। उम्‍मीद नहीं थी कि अरविंद केजरीवाल सत्‍ता में पहुंचते ही अपनी खांसी की परवाह किए बिना अपनी सरकार को काम में लगा देंगे। अरविंद केजरीवाल ने पुराने नेताओं की तरह किसी भी आभार रैली का आयोजन नहीं किया। सीधे काम में जुटे गए। घर पर पंचायत बुलाई तो कुछ शरारती लोगों ने हल्‍ला कर दिया। इसके बाद मीडिया को लगने लगा कि अब बीजेपी की लहर को झटका लगा सकता है।

उन्‍होंने अरविंद केजरीवाल के कुछ ऐसे वीडियो चलाने शुरू कर दिए। जैसे मैं राजनीति में नहीं जाउंगा। मैं कोई पद नहीं लाउंगा। मैं किसी सरकारी घर में नहीं रहूंगा। मैं सुरक्षा नहीं लूंगा वगैरह वगैरह। न जाने कितनी ऐसी बातें, जो आम आदमी यूं कह जाता है। यह बातें संगीन जुर्म तो नहीं हैं। काम की बात को छुपा दिया गया, अब नए शब्‍द का इस्‍तेमाल शुरू हुआ नौटंकीबाज, जो सोशल मीडिया से आया। सोशल मीडिया पर बीजेपी कार्यकर्ता सबसे तेज थे, उन दिनों। अब मीडिया का एक ही काम था, अरविंद केजरीवाल को अविश्‍वसनीय सिद्ध करना।

जो द्वेषराग नरेंद्र मोदी के प्रति था, अब को विरोधी राग अरविंद केजरीवाल के प्रति पैदा हो गया। स्‍थितियां बदल चुकी थी, अब अरविंद केजरीवाल बदलाव का चेहरा बनकर उभर रहे थे। इस बात से कोई मुकर नहीं रहा था कि अरविंद केजरीवाल नरेंद्र मोदी के लिए मुसीबत बन सकते हैं।

सरकार के विरोध में जनता हो चुकी थी। सिर्फ फैसले पर मोहर लगनी बाकी थी। अब पीआर एजेंसी भी तेज हो चुकी थी। नरेंद्र मोदी भी अपनी जीत के लिए कमर कस चुके थे। निरंतर रैलियां, उनका लाइव प्रसारण। टीवी पर निरंतर आने से तो निर्मल बाबा ने भी बड़े बड़े साधु संतों को पीछे छोड़ दिया था।

अब जनता एक प्रभाव में जीने लगी थी। अब आम आदमी पार्टी की सकारात्‍मक बाद केवल और केवल सोशल मीडिया पर थी, जो उसके समर्थक लिखते थे। और कहीं नहीं। सबसे दिलचस्‍प बात जो इस पूरे घटनाक्रम को देखने को मिली, पूरे देश में आम आदमी पार्टी के वर्करों पर तबाड तोड़ हमले हो रहे थे। मीडिया में कहीं भी चर्चा नहीं हो रही थी। सर्वे बताते हैं कि नरेंद्र मोदी से अधिक अगर मीडिया में किसी को स्‍पेस मिली वो केवल और केवल अरविंद केजरीवाल को मिली, प्राइम टाइम में। मगर सर्वे यह नहीं बताते कि मीडिया ने अरविंद केजरीवाल को लेकर नकारात्‍मक ख़बर कितनी स्‍पेस में दिखाई। इंडिया टीवी ने निरंतर प्राइम समय पर नरेंद्र मोदी को हीरो, तो केजरीवाल को जीरो दिखाया।

जी न्‍यूज का नरेंद्र मोदी के प्रति साधुवाद यह मीडिया में लम्‍बे समय तक याद रखा जाएगा। वहीं, आजतक पर भाजपा की तरफ से निशाने कसे गए, और कहा गया कि अरविंद केजरीवाल के अंदोलन के पीछे आजतक का हाथ है। सोशल मीडिया पर निरंतर हमलों के बाद आजतक ने भी अपनी ख़बरों की तस्‍वीर को बदलने की कोशिश की। एबीपी न्‍यूज ने अरविंद केजरीवाल को दिखाया, उसके दोनों पक्षों को निरंतर दिखाया।

मगर स्‍थितियां ऐसी भ्रमक हो चुकी थी कि कांग्रेस व अरविंद केजरीवाल की बात झूठी और नरेंद्र मोदी की बात सच्‍ची लगने लगी थी। अरविंद केजरीवाल की पुरानी बातों पर हो हल्‍ला करने वाले मीडिया ने नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल की खोज करने की कोशिश नहीं की, क्‍यूंकि इसकी पीआर एजेंसी आज्ञा नहीं देती थी।

मोदी की चुनावी रैलियों में आंकड़े गलत होने के बावजूद मीडिया ने उसकी निंदा नहीं की। सवाल एक ही अंत में पूछता हूं कि आखिर ग्‍यारह साल बाद नरेंद्र मोदी से मीडिया को इतना प्‍यार क्‍यूं उमड़ा ? जन अंदोलन से निकलकर आया अरविंद केजरीवाल, जिसको मीडिया ने स्‍टार बनाया, वो एकदम से नौटंकीवाला कैसे बन गया ? विशेषकर दिल्‍ली की जीत के बाद।

चलते चलते एक और दिलचस्‍प बात कहते चलूं कि ग्‍यारह साल नरेंद्र मोदी के खिलाफ ट्रायल चलाने वाला मीडिया हार गया, और अंत नरेंद्र मोदी जीत गया। दूसरे क्रम अरविंद केजरीवाल के मामले में भी कुछ ऐसा ही होने वाला है, अगर आम आदमी पार्टी यूं जुटी रही। अगर आम आदमी ने हताश होकर एक बार फिर दम तोड़ दिया तो क्‍या कहना।

News Nation - नमो लहर — यूपी में बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता हाशिए पर

लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की कथित लहर पर सवार पार्टी के प्रत्याशियों को अब उत्तर प्रदेश के कभी दिग्गज रहे वरिष्ठ नेताओं की जरूरत नहीं है। सोशल मीडिया और मैनेजमेंट के सहारे ही उन्हें अपनी नैया पार होती दिख रही है। आलम यह है कि यूपी भाजपा के कई बड़े नेता हाशिए पर डाल दिए गए हैं या फिर वे खुद नाराज होकर नेपथ्य में चले गए हैं।

कभी भाजपा के दिग्गजों में गिने जाने वाले उत्तर प्रदेश के ये नेता क्या कर रहे हैं, खुद भाजपा कार्यकताओं को ही नहीं पता है। भारतीय जनता पार्टी में कभी यूपी के नेताओं की तूती बोलती थी। एक लंबी श्रृंखला थी मुरली मनोहर जोशी, कलराज मिश्र, विनय कटियार, केसरी नाथ त्रिपाठी, ओम प्रकाश सिंह, सुरजीत सिंह डंग, सत्यदेव सिंह, हृदय नारायण दीक्षित, सूर्य प्रताप शाही समेत कई ऐसे नाम हैं जिनका सहयोग लेने से भाजपाई कतरा रहे हैं।

सूत्र बताते हैं कि भाजपा नेतृत्व ने इन्हें हाशिए पर डाल दिया तो अब प्रत्याशी भी इनमें से ज्यादातर लोगों के कार्यक्रमों की मांग नहीं कर रहे हैं। बनारस से कानपुर जाने के लिए मजबूर किए गए दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी की स्थिति खराब है। भाजपा के तीन शीर्ष नेताओं में शामिल जोशी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का उदय पचा नहीं पा रहे हैं। अब वह कानपुर में ही उलझे हुए हैं। सूत्र बता रहे हैं कि उनका कार्यक्रम कोई भी प्रत्याशी नहीं चाह रहा है। उसे डर है कि पता नहीं क्या बोल जाएं और बनी बनाई हवा का रुख मुड़ जाए।

कलराज मिश्र यूपी के बड़े नेता हैं। यूपी का कोना-कोना छानने वाले और कार्यकताओं को नाम से जानने वाले कलराज देवरिया तक सिमट कर रह गए हैं। देवरिया से बाहर निकल नहीं पा रहे हैं। बजरंगी नाम से प्रसिद्ध विनय कटियार अब किनारे हो गए हैं। लल्लू सिंह से शीतयुद्ध में ऊर्जा खत्म करने और लगातार तीन चुनाव हारने के बाद अब कोई प्रत्याशी उनके कार्यक्रम की मांग नहीं कर रहा है। पार्टी लगभग जबरिया उनका कार्यक्रम लगा रही है।

पटेल की प्रतिमा के लौह संग्रहण अभियान में लगाए गए ओम प्रकाश सिंह को अभियान को सफलतापूर्वक पूरा नहीं कर पाने का खामियाजा भुगतना पड़ा है। गठबंधन में उनके पुत्र अनुराग सिंह की दावेदारी वाली मिर्जापुर सीट एक विधायक वाली पार्टी अपना दल के खाते में चली गई। अनुराग ने भाजपा से इस्तीफा दे दिया और ओम प्रकाश सिंह नेपथ्य में चले गए। वैसे खबर यह भी है कि उनके कार्यक्रमों की मांग न के बराबर है। सीट न मिलने से नाराज केसरी नाथ त्रिपाठी भी कोप भवन में जा चुके हैं।

हृदय नारायण दीक्षित जैसे वरिष्ठ नेता को भी पार्टी ने राजनाथ सिंह को जिताने की जिम्मेदारी देकर बांध रखा है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही नाराज हैं। सपा में जाने की खबरें आई थीं, लेकिन मामला बन नहीं पाने की वजह से पार्टी के भीतर ही घुटन महसूस कर रहे हैं। प्रदेश में उनकी सक्रियता शून्य है। सत्यदेव सिंह एवं सुरजीत सिंह डंग जैसे नेता कहां हैं, किसी को खबर नहीं है।

बीजेपी उम्मीदवारों में भी सबसे अधिक मांग मोदी की है। उसके बाद राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह, उमा भारती और लक्ष्मीकांत वाजपेयी की। वरुण गांधी जैसा युवा और तेजतर्रार नेता भी यूपी की बजाय केवल अपने चुनाव क्षेत्र तक सिमटे हुए हैं। योगी आदित्यनाथ का इस्तेमाल भी गोरखपुर और आसपास के क्षेत्रों तक हो रहा है। भाजपा को अब नेताओं की नहीं, लहर का ही आसरा है।

आईएएनएस की रिपोर्ट

अब हिन्‍दुओं की भावनाएं आहत नहीं हुई


आजकल बाजार में एक नया नारा गूंज रहा है '' हर हर मोदी, घर घर मोदी'' अगर इस नारे को पहले कांग्रेस ने उठा लिया होता, और कहा होता कि ''हर हर गांधी, घर घर गांधी'', सच में हिन्‍दुयों की भावनाएं आहत हो जाती, लेकिन अब ऐसा नहीं, क्‍यूंकि हर हर महादेव की जगह मोदी को रखा है, और जिनकी भावनाएं आहत होती हैं, वो कथित हिन्‍दु इस नारे को बड़े शौक से लगा रहे हैं, शायद बोलने से झूठ सच हो जाए, लेकिन असंभव है।
अगर भाजपा के कुछ मोदीवादियों ने मोदी को महादेव की जगह फिट कर ही दिया है तो मुझे इससे एक अन्‍य बात भी याद आ रही है। शायद हर हिन्‍दु भाई को ज्ञात होगी कि हिन्‍दु धर्म में 'त्रिदेव' का सर्वाधिक महत्व है यानि ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश, दूसरे क्रम में कहूं तो निर्माता, पालक व विनाशक।

इस क्रम में अगर मोदी को महादेव कहा जाता है, तो बीजेपी के तीन शीर्ष नेता हुए, पहला अटल बिहारी वाजपेयी, जिन्‍होंने बीजेपी को एक अलग पहचान दी, स्‍वयं लोगों के प्रधान मंत्री होकर विदा हुए, दूसरा जो बीजेपी को आगे लेकर चले, जिनको पालक कहा जा सकता है यानि एलके आडवाणी, अब बीजेपी का पूरा भार, तीसरे कंधे पर है, जिसको नरेंद्र मोदी के नाम से जाना जाता है, जिसको उनके दीवानों ने हर हर महादेव वाले जयघोष में फिट कर दिया।

इसमें कोई दो राय नहीं कि दूसरे राजनीतिक दल अब मोदी को बीजेपी का विनाशक मान रहे हैं, एनडीए की बड़ी पार्टियां दूर हो चुकी हैं। अब देखना है कि मोदीवादियों के हर हर मोदी, घर घर मोदी, बीजेपी को किस डगर पर लेकर जा रहे हैं।

नोट :- यहां मैंने केवल अपने विचार रखें हैं, हो सकता है कि दूसरों से मेरे विचार मेल न खाएं, लेकिन आप अपने विचार रख सकते हैं, जिनका मैं पूरा सम्‍मान करूंगा।

मोदी काठमांडू सीट से लड़ेंगे !

पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश के प्रधान मंत्री पद के लिए उम्मीदवार चुने गए। इस बात से देश को खुशी होनी चाहिए थी, लेकिन अफसोस के देश के भीतर राजनीतिक पार्टियां उनको रोकने के लिए चुनाव मैदान में उतर गई। बड़ी हैरानीजनक बात है, भला कोई इस तरह करता है। माना कि देश में लोकतंत्र है, लेकिन किसी की भावनायों को भी समझना लोकतंत्र का फर्ज है कि नहीं।

बेचारे मोदी कहते हैं कि भ्रष्टाचार रोको। तो विरोधी कहते हैं मोदी रोको। मोदी कहते हैं कि गरीबी रोको तो विरोधी कहते हैं मोदी रोको। कितनी नइंसाफी है। वाराणसी से चुनाव लड़ने का मन बनाया था लेकिन मुरली मनोहर जोशी कहने लगे पाप कर बैठे जो वाराणसी से लड़ बैठे।​ स्थिति ऐसी हो चुकी है कि भाजप से न तो मुरली मनोहर जोशी को पाप मुक्त करते बनता है न ही पाप का भागीदार बनाते बनता है।

राजनाथ सिंह : आप बनरास से लड़े
नरेंद्र मोदी : जीतने की क्या गारंटी है ?
राजनाथ सिंह : गारंटी चाहिए तो arise इनवेटर ले आएं।

भाई गारंटी तो चाहिए क्यूंकि मुरली मनोहर जोशी के दीवाने भी अड़चन पैदा कर सकते हैं। अंत नरेंद्र मोदी ने फैसला किया है कि वो काठमांडू से चुनाव लड़ेंगे। वहां शांति हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि वहां उनको कोई रोकने वाला भी नहीं है। सबसे सुरक्षित सीट। फिर क्या हुआ अगर काठमांडू नेपाल में है। अब भारत में तो सभी बेचारे मोदी को रोक रहे हैं, यह भी कोई लोकतंत्र है।

सही। नरेंद्र मोदी को काठमांडू से चुनाव लड़ना चाहिए।

Publicly Letter : गृहमंत्री ​सुशील कुमार शिंदे के नाम

नमस्कार, सुशील कुमार शिंदे। खुश होने की जरूरत नहीं। इसमें कोई भावना नहीं है, यह तो खाली संवाद शुरू करने का तरीका है, खासकर आप जैसे अनेतायों के लिए। नेता की परिभाषा भी आपको बतानी पड़ेगी, क्यूंकि जिसको सोशल एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया के शब्दिक ​अ​र्थ न पता हों, उसको अनेता शब्द भी समझ में आना थोड़ा सा क​ठिन लगता है। नेता का इंग्लिश अर्थ लीडर होता है, जो लीड करता है। हम उसको अगुआ भी कहते हैं, मतलब जो सबसे आगे हो, उसके पीछे पूरी भीड़ चलती है।
 
अब आप के बयान पर आते हैं, जिसमें आप ने कहा कुचल देंगे। इसके आगे सोशल मीडिया आए या इलेक्ट्रोनिक मीडिया। कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, क्यूंकि कुचल देंगे तानाशाही का प्रतीक है या किसी को डराने का। आपके समकालीन अनेता सलमान खुर्शीद ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को नंपुसक कहा, क्यूंकि वो दंगों के दौरान शायद कथित तौर पर अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पाए, लेकिन जब मुम्बई पर हमला हुआ था, तब आपके कुचल देंगे वाले शब्द किस शब्दकोश में पड़े धूल चाट रहे थे, तब कहां थे सलमान खुर्शीद जो आज नरेंद्र मोदी को नपुंसक कह रहे हैं।

इलेक्ट्रोनिक मीडिया को तो शायद आप पैसे खरीद लें, क्यूंकि उसको पूंजीपति चलाते हैं, जो विज्ञापन के लिए काम कर सकते हैं, लेकिन सोशल मीडिया को कुचलना आपके हाथ में नहीं, क्यूंकि इसको खरीदना आपके बस की बात नहीं। सोशल मीडिया का शब्दिक अर्थ भी समझा देता हूं, लोगों का मंच। जो लोग सरकार बनाने की हिम्मत रखते हैं, उनको कुचलना आपके लिए उतना ही मुश्किल है, जितना घोड़े का घास के साथ दोस्ताना बनाए रखना।

आपके बयान बदलने से एक बात तो पता चलती है कि आप थोथी धमकियां देते हैं। वरना, अपने बयान पर अटल रहते, और मीडिया को कुचल देते, आज तक आप गूगल व फेसबुक से जानकारियां हासिल नहीं कर पाए, कुचलने की बात करते हैं। क्या किसी की अ​भिव्यक्ति को दबाना असैवंधानिक नहीं ? आपको इलेक्ट्रोनिक मीडिया व सोशल मीडिया का अंतर पता नहीं, तो संवैधानिक व गैर संवैधानिक का अंत क्या खाक पता चलेगा।

आजकल मोदी जी ने खूब अपना पुराना धंधा पकड़ा हुआ है। अपने पुराने दिनों को याद कर रहे हैं, इससे शायद उनको चुनावी फायदा मिल जाए, लेकिन अगर आप ने गृहमंत्री होकर कांस्टेबल वाली हरकतें न छोड़ी तो कांग्रेस को भाजपा वाले कुचल देंगे। और सलमान खुर्शीद को अच्छे से उनके बयान का अर्थ भी समझा देंगे।

जय रामजी की। इसका अर्थ बात शुरू करना भी होता है और संवाद बंद करना भी। जहां लिखा है, वहां इसका अर्थ संवाद बंद करना है। फिर से जय रामजी की। 

परिवर्तन किसे चाहिए.... सत्ता की भूख

देश को बदलने की बात करने वाले। देश को सोने की चि​ड़िया बनाने का दावा करने वाले बड़ी हैरत में डाल देते हैं, जब वह सामा​जिक मुद्दों को लेकर सत्ता में आई पार्टी पर सवाल​ उठाते हैं। उसका स्वागत करने की बजाय, उसको गिराने की साजिश रचते हैं, गिराने की हथकंडे अपनाते हैं।

देश को बदलने की बात करने वाली भाजपा के नेता अरविंद केजरीवाल की टोपी को लेकर सवाल उठा रहे हैं। अगर भाजपा देश का भला चाहती है तो उसको हर समाज सुधारक में मोदी नजर आना चाहिए न कोई दूसरा। मगर सत्ता पाने की चेष्ठा। आगे आने की अभिलाषा ऐसा होने नहीं देती। यह हालत वैसी है जैसे मरुथल में कोई भटक जाए। उसको प्यास लगे व मृग मरीचिका को झील समझने लगे। ​जिसके पास पानी की बोतल होगी, जिसको प्यास न होगी, उसको मृग मरीचिका लुभा न सकेगी।

मगर राजनेतायों को पद प्रतिष्ठा से प्रेम है। देश की जनता पहाड़ में जाए। नेता को ढोंग रचता है। जनता का मिजाज देखकर बाहर के कपड़े बदल लेता है। उसको समाज सुधार से थोड़ी न कुछ लेना है। एक दिन गधे पर सवार होकर मुल्ला नसीरुद्दीन बाजार से निकल रहा था, किसी ने पूछा किस तरफ जा रहे हो, मुल्ला ने कहा, गधे से पूछ लो। जिस तरफ ले जाएगा, चले जाएंगे। हमारी कहां मानता है।

देश का भला मोदी करे या अरविंद करे। क्या फर्क पड़ता है। देश का भला होना चाहिए। मगर नेता सोचते हैं, भला होना चा​हिए, लेकिन हमारे चुने नेता द्वारा होना चाहिए। शायद दुनिया इसी बहाने याद कर ले। इसमें सुख है, कोई याद कर ले। इस लालसा की आग में आदमी जलता जा रहा है। सिकंदर को याद कर लेता है, हिटलर को याद कर लेते हैं, लेकिन इससे उनको क्या फायदा होता है।

अरविंद की टोपी नजर आती है। उसके भीतर कुछ करने की आग नजर नहीं आती, क्योंकि लालसा ने आंख पर पट्टी बांध दी है। डर है कहीं, हमारे खेले दांव को अरविंद ​बिगड़ न दे। कहीं इस बार भाजपा सत्ता पाते पाते रह न जाए। लालसा बड़ी है, देश बड़ा नहीं है।

मोदी का कुर्ता नजर नहीं आता, नजर आती है तो अरविंद की टोपी। बड़ी दिक्कत है। टोपी तो अन्ना भी पहनते हैं। अन्ना से भी मोहभंग हो जाता, अगर वह नेतायों की रोजीरोटी छीन लेते। नेता ने अरविंद का साहस न देखा, देखा तो केवल टोपी को। टोपी ने कुर्सी छीन ली। कुर्सी पर बैठने का स्वप्न अधूरा रह गया। सालों से बुना था।

देश का भला करने वाले न टोपी देखते हैं, न पार्टी देखते हैं, न अरविंद देखते हैं, न नरेंद्र देखते हैं । वह तो केवल देश का विकास देखते हैं।

frank talk : मुजफ्फरनगर दंगों के छींटे दुर्गा एक्‍सल से नहीं जायेंगे अखिलेश

मुजफ्फरनगर में भड़काऊ भाषण देने के आरोपी बीजेपी विधायक संगीत सोम ने शनिवार को सरेंडर करते हुए नरेंद्र मोदी को प्रचार हथकंडा अपनाने के मुकाबले में पीछे छोड़ दिया। बीजेपी विधायक संगीत सोम ने ऐसे सरेंडर किया, जैसे वे किसी महान कार्य में योगदान देने के बाद पुलिस हिरासत में जा रहे हों। गिरफ्तारी के वक्‍त हिन्‍दुओं का हृदयसम्राट बनने की ललक संगीत सोम में झलक रही थी। शायद संगीत सोम को यकीन हो गया कि लोक सभा चुनावों के बाद नरेंद्र मोदी सत्‍ता में आयेंगे, जैसे नरेंद्र मोदी एलके आडवाणी के अवरोधों को तोड़ते हुए पीएम पद उम्‍मीदवार (एनडीएम) बने हैं।

बीजेपी के विधायक संगीत सोम ने गिरफ्तारी के बाद कहा, मैं अपने धर्म की रक्षा के लिए लड़ता रहूंगा। शायद किसी ने संवाददाता ने पूछने की हिम्‍मत नहीं की कि आखिर आपका धर्म खतरे में कहां है ? अगर भारत में बहुसंख्‍यक धर्म संकट में है तो अल्‍पसंख्‍यक लोगों  में तो असुरक्षा का भाव अधिक होगा। जहां असुरक्षा का भाव है, वहां सुरक्षा के लिए तैयारियां होती हैं, और नतीजा हवा से दरवाजा बजने पर भी अंधेरे में तबाड़तोड़ गोलियां चल जाती हैं।

इस नेता की गिरफ्तारी उसी मामले में हुई है, जिसकी आग समाजवादी पार्टी को अपनी लपटों में लिये हुए है। एक ख़बरिया चैनल ने स्‍टिंग ऑपरेशन किया, तो समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान से मिलता जुलता नाम सामने आया, लेकिन स्‍टिंग ऑपरेशन पर मोहर उस समय लगती नजर आई, जब आनन फानन में आजम खान ने स्‍टिंग ऑपरेशन के तुरंत बाद प्रेस से मुखातिब होना लाजमी समझा।

इससे पूर्व यूपी के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव ने मुजफ्फरनगर के दंगा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया, तो लोगों ने उनको काले झंडे दिखाये और स्‍वागतम कहा। एक अख़बार का शीर्षक तो यह भी था कि हमको लेपटॉप नहीं, सुरक्षा चाहिए। शायद सुरक्षा की गारंटी देना अखिलेश यादव के हाथ में नहीं है, क्‍यूंकि अगर वे फैसला लेने का मादा रखते तो आजम खान को मनाने जाने की बजाय वे दंगा प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के पास जाते। हद है एक मुख्‍यमंत्री पहले अपने नेता को मनाने जाता है। शायद जनता को सुरक्षा का भरोसा दिलाने से ज्‍यादा जरूरी है, कि वे अपनी पार्टी को सुरक्षा का भरोसा दिलाये। शायद ऐसा भी लगा हो, कहीं लोक सभा चुनावों में आजम खान की नाराजगी पापा का पीएम कुर्सी वाला स्‍वप्‍न न तोड़ दे।

जब हर ओर से थू थू होने लगी तो जनाब को खयाल आया, दुर्गाशक्‍ति नागपाल का, जिसको कुछ महीने पहले निलंबित कर दिया गया था, क्‍यूंकि उसके द्वारा एक अवैध इमारत गिरा देने से दंगे होने की आशंका थी, लेकिन मुजफ्फरनगर में दुर्गाशक्‍ति नागपाल नहीं थी, फिर पचास के करीब जिन्‍दगियां चली गई और एक लाख के करीब लोग घरों से बेघर हो गये, बिना किसी घर को गिराये।

जो अखिलेश यादव मीडिया के सामने चीख चीख कर कह रहे थे, सरकार का फैसला सही है, दुर्गा शक्‍ति निलंबन संबंधी, लेकिन सवाल है कि आज अचानक उसी सरकार का फैसला अखिलेश यादव को गलत कैसे लगने लगा। सफेद रंग का कुर्ता जब ज्‍यादा मैला होने लगा तो अखिलेश यादव ने सोचा होगा, चलो दुर्गा शक्‍ति सरफ एक्‍सल से धो लिया जाये।

जो उत्‍तर प्रदेश में हुआ, शायद मुलायम सिंह यादव के कहने अनुसार वह केवल जातीय झड़प होती, लेकिन अगर राजनेता अपनी राजनीतिक रुतबे का इस्‍तेमाल न करते। 99.9 फीसद पुलिस विभाग नेताओं में दबाव में काम करता है, इस बात की पुष्‍टि के लिए किसी से प्रमाण पत्र लेने की जरूरत नहीं, और जो 0.1फीसद सरकारी विभाग का नौकर सरकार के खिलाफ काम करता है, वे दुर्गाशक्‍ति नागपाल की तरह निलंबित कर दिया जाता है।

अखिलेश यादव की सरकार का पुलिस विभाग में कितना हस्‍तक्षेप है। इस बात का अंदाजा तो एडीजी(लॉ एंड ऑर्डर) अरूण कुमार की उस गुहार से लगाया जा सकता है, जिसमें अरुण कुमार ने उत्‍तर प्रदेश से बाहर जाने की राज्य सरकार के सामने अपनी मंशा जाहिर की।

पुलिस विभाग का सामने आया स्‍टिंग ऑपरेशन सौ फीसद न सही, लेकिन कुछ फीसद तो सही होगा, अगर वो सही है तो सरकार और जनप्रतिनिधि दोनों मुजफ्फरनगर जन संहार के लिये जिम्‍मेदार हैं।

ऐसा नहीं कि यह दंगे केवल समाजवादी पार्टी के कारण हुये, यह दंगे सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक हितों के कारण हुये। इस बात की स्‍पष्‍टता तो संगीत सोम की ड्रामामय गिरफ्तारी से हो गई, वे हिन्‍दुओं का नया सितारा बनकर उभरना चाहता है। चाह बहुत कुछ करवा देती है।

अखिलेश यादव तुम्‍हारे दाग दुर्गा शक्‍ति नागपाल सरफ एक्‍सल से तो न जाये, लेकिन हो सकता है कि हिन्‍दुत्‍व पक्षियों का एक झुंड जब सत्‍ता में आयेगा तो किसी बड़े जन संहार से तुम्‍हारा छोटा गुनाह छुप जाये, और यकीनन भविष्‍य में ऐसा होगा, स्‍थितियों का आकालन बता रहा है, क्‍यूंकि यहां पर एक सांप फन उठा रहा है।

बस डर है, शाइनिंग इंडिया मिशन, कहीं मिस्र मिशन न बन जाये। जहां पर लोगों ने मुबारक हुस्‍नी को उतार कर मोहम्‍मद मर्सी को देश की कमान सौंपी, लेकिन विकास का एजेंडा किसी कोने में सिसकता रहा, और देश में इस्‍लामिक मत पैर पसारने लगा, एक भीड़ ने मिस्र में एक नये अंदोलन को जन्‍म दे दिया, जो मुर्सी से आजादी चाहता था।

कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

Yuva Rocks Dot Com से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें Facebook  पर ज्वॉइन करें, Twitter पर फॉलो करे।

fact 'n' fiction : रेवाड़ी रैली, ताऊ लगता है मोदी मामू बना गया

शब्‍दी गोला बारूद लाये हो न भाई।
हरियाणा के रेवाड़ी शहर में गुजरात के मुख्‍यमंत्री व संभावित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व सैनिकों की रैली को संबोधन किया। इस रैली में नरेंद्र मोदी ने जमकर सीमा पर खड़े जवानों की तारीफ की। खुद को भी श्रेय देने से बिल्‍कुल नहीं चुके। प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार बनने के बाद ज्‍यादा गर्मजोशी में नजर आये। इस मौके पर वन रेंक वन पेंशन की बात की, लेकिन पूर्व सैनिकों को भरोसा नहीं दिलाया कि वे सरकार बनने पर उसके लिए कुछ खास करेंगे।

नरेंद्र मोदी ने पूरा ध्‍यान सीमा पर खड़े जवानों पर लगा दिया। पूर्व सैनिक सोच रहे थे, शायद आज गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी और संभावित प्रधानमंत्री कुछ ऐसी घोषणा करेंगे, जो उनके दर्द को कम करेगी, लेकिन नरेंद्र मोदी ने संप्रग को वन रेंक वन पेंशन पर श्‍वेत पत्र लाने की सलाह देने के अलावा कुछ नहीं दिया। रोजगार की बात करते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा कि हम को हथियार इम्‍पोर्ट करने बंद करने चाहिए, हमको भारत में हथियार बनाकर बेचने चाहिए। इसके लिए कॉलेजों में विशेष कोर्सों का प्रबंधन किया जाये।

नरेंद्र मोदी की इस रैली के बाद दुनिया की नम्‍बर वन फेक टॉक न्‍यूज एजेंसी से बात करते हुए कांग्रेस महासचिव दिग्‍विजय सिंह ने कहा, 'हम बहुत जल्‍द चुनाव आयोग को पत्र लिखकर निवेदन करेंगे कि आगामी चुनावों में पोलिंग बूथों पर सेना जवानों की तैनाती न की जाये, क्‍यूंकि नरेंद्र मोदी ने उनका हृदय परिवर्तन कर दिया है, ऐसे में सेना जवानों की तैनाती चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करेगी।' हालांकि हथियार वाली बात पर प्रतिक्रिया देने से दिग्‍विजय सिंह कतराते हुए नजर आये।

उधर, व्‍हाइट हाउस से बराक ओबामा के सहयोगियों ने फेक टॉक से बात करते हुए कहा कि अमेरिका कल तक सीरिया को लेकर परेशान था, लेकिन अब वे भारत को लेकर भी चिंता में है, क्‍यूंकि मौजूदा भारतीय सरकार ने उसको सीरिया पर हमला करने के लिए समर्थन नहीं दिया, और आने वाली संभावित सरकार भारत में हथियार बनाने की बात कर रही है, ऐसे में अमेरिका का बेड़ा गर्क हो जायेगा।, हालांकि गुप्‍त सूत्रों से जानकारी मिली है कि बहुत जल्‍द नरेंद्र मोदी को अमेरिका का वीजा दिया जायेगा, और उनकी हथियार निर्माण योजना में अमेरिका बहुत ज्‍यादा निवेश करने के लिए तैयार है।

नरेंद्र मोदी के करीबी फर्जी सूत्रों का कहना है कि हथियार बनाने का पूरा जिम्‍मा साधू यादव को सौंपा जायेग, जिन्‍होंने पिछले दिनों गुजरात के मुख्‍यमंत्री से मुलाकात की थी। वैसे भी नीतिश कुमार के आने से पहले बिहार के एक क्षेत्र में देशी हथियार बनाने का धंधा जोरों पर था। इतना ही नहीं, इस रैली के बाद नरेंद्र मोदी को गूगल सर्च इंजन में  बराक ओबामा से भी ज्‍यादा सर्च किया गया, बताया जा रहा है कि अमेरिकी हथियार निर्माता कंपनियों में काम कर रहे कर्मचारी अपना बायोडाटा मेल करने के लिए नरेंद्र मोदी का संपर्क एड्रेस खोज रहे थे, हालांकि उनको नतीजे में एक टेलीफोन नम्‍बर मिला, जिस पर डायल करने के बाद उनको नरेंद्र मोदी का केवल लाइव भाषण सुनाई पड़ा।
सोशल मीडिया वाले सही कहते हैं तू यार बड़ा फेकु है
समाजवादी पार्टी व जेडीयू के नेताओं ने फर्जी मीडिया एजेंसी फेकटॉक को अमरेली शहर की तस्‍वीर दिखाते हुए, ( जिसमें लोग पानी के लिए तरस रहे हैं, वहां टैंकियां तो हैं पानी नहीं) कहा कि अमरेली शहर में गुजरात के मुख्‍यमंत्री ने पानी नहीं पहुंचाया, लेकिन बॉर्डर पर पानी पहुंचा दिया, इसके पीछे की मंशा की पूर्ण रूप से स्‍वतंत्र जांच होनी चाहिये, हो सके तो इस मामले की जांच सीबीआई से होनी चाहिए। हालांकि वे समुद्री पानी को पीने लायक बनाकर भी सेना जवानों को दे सकते थे, नर्मदा का पानी खींचकर लेकर जाने की क्‍या जरूरत थी। अब तो पसीने से पानी बनाने वाली मशीनें आ गई हैं।
फेक टॉक संवाददाताओं को रैली के बाद कुछ ऐसे फर्जी टेप मिले हैं, जिसमें लोगों को कहते हुए सुना गया, ताऊ, यह तो मामू बनाकर चला गया। रैली पूर्व सैनिकों की, और बात बॉर्डर पर खड़े सैनिकों की, यह बात तो 15 अगस्‍त को भी कर लेते, और आने वाली 26 जनवरी को भी कर सकते थे, लेकिन हमारी मांगों का क्‍या ? अटलजी की सरकार का छुनछुना थमाकर चला गया, बजाते रहो। न बैटरी खत्‍म होगी, न सुर ताल बिगड़ेगा, बस बजाते रहो। जंगल में भी, घर में भी, क्‍यूंकि नेटवर्क टूटने का डर नहीं।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

Yuva Rocks Dot Com से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें Facebook  पर ज्वॉइन करें, Twitter पर फॉलो करे।

fact 'n' fiction : प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जगह लेंगे एलके आडवाणी

यह फाइल फोटो है, जो गूगल सर्च के जरिये प्राप्‍त हुई।
भारतीय जनता पार्टी द्वारा हाशिये पर धकेल दिए गए नेता एलके आडवाणी बहुत जल्‍द संप्रग सरकार में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जगह लेंगे, हालांकि इस मामले में आधिकारिक मोहर लगना अभी बाकी है।

गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदीमय हुई भारतीय जनता पार्टी द्वारा दरकिनार कर दिए गए नेता एलके आडवाणी की ओर से अधिवक्‍ता फेकु राम भरोसे ने संयुक्‍त प्रगतिशील गठबंधन की कोर्ट में जनहित याचिका दायर करते हुए मांग की है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के शेष बचे हुए कार्यकाल का पूरा जिम्‍मा देश के सशक्‍त व सीनियर नेता एलके आडवाणी को सौंपा जाये, ताकि आजाद भारत के नागरिकों राजनीति पर भरोसा बना रहे। वरना, उनको लगेगा कि यहां पर करियर नाम की कोई चीज नहीं है। राजनीति में सपने देखने वाले बर्बाद हो जाते हैं। अगर ऐसी धारणा एक बार बन गई तो आपका सबसे बड़ा राजनीतिक दुश्‍मन नरेंद्र मोदी जीत जायेगा, जिसने पिछले दिनों कहा था कि सपने देखने वाले बर्बाद हो जाते हैं।

सूत्रों ने जानकारी देते हुए बताया कि याचिकाकर्ता के वकील ने संप्रग अदालत के सामने दलील पेश की कि देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह किसी भी समय त्‍याग पत्र देने के लिए तैयार हैं, अगर संप्रग चेयरपर्सन उनको ग्रीन सिग्‍नल दें तो।

उधर, संप्रग की ओर से संभावित पीएम के पद उम्‍मीदवार राहुल गांधी ने भी स्‍पष्‍ट कर दिया है कि वे अपने सपनों को मारकर जनता के सपनों को साकार करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं, और एलके आडवाणी देश के सीनियर सिटीजन हैं, ऐसे में उनका सपना भी राहुल गांधी को पूरा करना चाहिए।

इस बाबत जब देश की सबसे बड़ी फर्जी न्‍यूज एजेंसी 'फेकटॉक' ने गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे से संपर्क साधा तो उन्‍होंने कहा कि रामू श्‍यामू और धामू कोई भी पीएम पद का उम्‍मीदवार हो सकता है, क्‍यूंकि पप्‍पू कान्‍ट डांस, साला! पप्‍पू, राहुल गांधी को सोशल मीडिया द्वारा दिया गया प्‍यार का नाम है।

उधर, गुप्‍त सूत्रों ने बताया है कि एलके आडवाणी अपना सपना पीएम कुर्सी...कुर्सी को पूरा करने के लिए बहुत जल्‍द सोनिया गांधी से मुलाकात करने वाले हैं। उनके करीबियों ने कोरियर के जरिये सोनिया गांधी को एक सीडी भेजी है, ताकि बैठक से पहले दोनों गुटों को मित्रभाव पैदा हो सके। इस सीडी का एक नमूना आप यहां देख सकते हैं।



पिछले दिनों एलके आडवाणी की खास मानी जाने वाली लोकसभा में विपक्ष नेता सुषमा स्‍वराज ने प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठकर निरीक्षण किया और बताया है कि कुर्सी बेहद आराम दायक है, और एक सीनियर सिटीजन उस पर आराम से बैठ सकता है।

दलील और स्‍थितियों के मद्देनजर तो ऐसा लगता है कि 'आदमी आदमी के काम आता है' की तर्ज पर संप्रग सरकार पिछले दो बार से पीएम पद की रेस में शामिल रह चुके एलके आडवाणी की भावनाओं को समझेगी, और उनको संप्रग सरकार में मनमोहन सिंह की जगह प्रदान करेगी। बाकी तो राम ही राखै।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

Yuva Rocks Dot Com से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें Facebook  पर ज्वॉइन करें, Twitter पर फॉलो करे।

'गे' वेंटवर्थ मिलर ने की 'मर्दों' वाली बात

बहुत मुश्‍किल होता है कभी कभी उस बात को स्‍वीकार करना, जिसको समाज में असम्‍मानजनक नजर से देखा जा रहा हो, लेकिन अमेरिकी धारावाहिक प्रिज्‍यॅन ब्रेक के स्‍टार वेंटवर्थ मिलर ने रूस में आयोजित होने वाले इंटरनेशनल फिल्‍म फेस्‍टीवल में बतौर मुख्‍यातिथि के लिए आए न्‍यौते को ठुकराते हुए स्‍वयं के गे होने की बात को सार्वजनिक कर दिया। रूस के प्रस्‍ताव को ठुकराने और स्‍वयं को गे घोषित करने के बाद टि्वटर पर उनके लोकप्रिय धारावाहिक प्रिज्‍यॅन ब्रेक के ट्रेंड ने जोर पकड़ लिया।

दरअसल, रूस ने एक नया प्रस्‍ताव पारित किया है, जो असल में है तो एंटी गे लॉ, लेकिन सरकार इस बिल का बचाव बच्‍चों की सुरक्षा का हवाला देते हुए करती है। सेंट पीटर्सबर्ग ऐसी जगह है, जहां पर गे बहुसंख्‍या में रहते हैं, लेकिन हिंसक गतिविधियों के कारण सामने आने का सांस नहीं करते। पिछले दिनों न्‍यू यॉर्क टाइम्‍स में एक लेख प्रकाशित हुआ था, जिसकी शुरूआत करते हुए लेखक ने लिखा था, अगर यह लेख रूस में प्रकाशित हुआ होता तो इसके लिए एक्‍स रेटिंग होती, और 18 साल से कम उम्र के बच्‍चों को पढ़ने की मनाही होती। इस लेख के अंदर कई ऐसी घटनाओं का जिक्र है, जहां पर गे युगलों को निशाना बनाया गया।

अगले वर्ष होने वाले 2014 विंटर ओलंपिक गेम्‍स पर एंटी गे लॉ की काली परछाई पड़ सकती है, क्‍यूंकि गे समुदाय के पक्ष में कुछ देश इन खेलों का विरोध करने का मन बना रहे हैं। पिछले दिनों तो एक ब्रिटिश कॉमेडियन स्‍टिफन फ्राय, जो गे हैं, ने कहा था कि सोची गेम्‍स का बायकॉट किया जाए। अप्रैल महीने में लवादा सेंटर की ओर से गे संबंधों को लेकर एक सर्वे किया गया, जिसमें 35 फीसदी रूसी लोगों ने समलैंगिक रिश्‍ते को एक बीमारी बताया, तो 43 फीसद लोगों ने इसको बुरी आदत कहा। उधर, इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी ने गे एथलीट और दर्शकों को सुरक्षा को लेकर चिंतित न होने की बात कही है, लेकिन इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी उन घटनाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकती, जिनमें गे समुदाय के लोगों को त्रासदी का सामना करना पड़ता है। सेंट पीटसबर्ग, जहां पर अमेरिकी टेलीविजन स्‍टार को बुलाया जा रहा था, वहां पर पिछले महीने गे प्राइड एवेंट का आयोजन किया गया, तो पुलिस ने गे प्राइड एवेंट में शामिल लोगों को पकड़कर खूब धोया।
सेंट पीटर्सबर्ग की गे प्राइड एवेंट से वापिस इंटरनेशनल फिल्‍म फेस्‍टीवल की तरफ लौटते हैं, जिसका न्‍यौता अमेरिकी टेलीविजन एक्‍टर ने इसलिए ठुकरा दिया, क्‍यूंकि वे स्‍वयं एक गे है। रूस के इन्‍वीटेंशन के बाद आयोजकों के नाम लिखे ख़त में वेंटवर्थ मिलर ने लिखा, मुझे खुशी है कि आपने मुझे इतने बड़े प्रोग्राम में बतौर मुख्‍यातिथि आने का न्‍यौता दिया। पिछली बार रूस में बेहद मजा आया। मुझे अच्‍छा लगता अगर में इस बार में भी हां कहता, लेकिन एक गे होने के नाते मैं इस न्‍यौते को सिरे से खारिज करता हूं।
मैं उस देश के एक जश्‍न में शरीक नहीं हो सकता, जहां मेरे जैसे लोगों को खुले में प्‍यार करने और जीने की आजादी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा हो। जो रूस सरकार ने पिछले दिनों एक युवक और महिला के साथ व्‍यवहार किया, उसने मुझे अंदर तक तोड़ दिया है। ऐसे में मैं रूस का चक्‍कर नहीं लगा सकता। इस तरह उसने अपना विरोध प्रकट किया।

ऐसा नहीं कि ऐसा केवल विदेश है, भारत में भी बड़ी बड़ी हस्‍तियां गे हैं, लेकिन सार्वजनिक तौर पर किसी ने अभी तक स्‍वीकारा नहीं, और न ही गे समुदाय के लिए आवाज उठाई।

जो कल तक लोगों की निगाह में एक टेलीविजन स्‍टार था, अचानक उसने अपने गे होने की बात स्‍वीकार करते हुए अपने चाहने वालों को चौंकाया होगा। उसको पता भी होगा कि इससे उसको नुकसान हो सकता है, लेकिन जब बात किसी के अहं को लगती है तो वे दौलत सौहरत को छोड़कर निकल पड़ता है। एक गे ने कही, मर्दों वाली बात, इसलिए कह रहा हूं, अमेरिका और ब्रिटेन नरेंद्र मोदी को हर बार वीजा न देने की बात कहकर एक नये विवाद को जन्‍म दे देते हैं, एक भारतीय जन प्रतिनिधि का अपमान कर देते हैं, लेकिन भाजपा के अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह खुशी खुशी अमेरिका की यात्रा करते हैं। किसी भी जन प्रतिनिधि के साथ कोई देश इस तरह का बर्ताव करे तो देश के राजनेताओं को सोचना चाहिए, अगर कल को उनकी सत्‍ता न रही तो क्‍या अमेरिका ब्रिटेन उनके साथ भी इस तरह का व्‍यवहार करेंगे। एक गे अपने गे भाईयों पर हो रहे अत्‍याचारों के लिए सार्वजनिक तौर पर न्‍यौते को ठुकराता है। रूस की सरकार को दिखाता है कि गे के अहं को भी चोट लगती है, उसकी भावनाएं हैं, भले ही इसको आप बुरी आदत कहें या बीमारी। लेकिन जो लत लग गई, उसका इलाज नहीं है। अमेरिका ब्रिटेन एक भारतीय जन प्रतिनिधि को वीजा नहीं देता, और देश की सरकार विदेश नीति को लेकर सख्‍त कदम नहीं उठाती तो देश को शर्म आनी चाहिए।

रेप मुआवजे से नरेंद्र मोदी पर चुटकियां लेती शिव सेना तक

जम्‍मू कश्‍मीर की कमान एक युवा नेता उमर अब्‍दुला के हाथ में है, लेकिन शनिवार को उनकी सरकार की ओर से लिए एक फैसले ने उनको सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया। जम्‍मू कश्‍मीर सरकार ने रेप पीड़ित को मुआवजे वाली लिस्‍ट में शामिल किया है। अगर युवा नेता उमर अब्‍दुला इस मुआवजे वाली सूची को जारी करने की बजाय बलात्‍कारी को सजा देने वाली सूची जारी करते तो शायद भारतीय युवा पीढ़ी को ही नहीं, बल्‍कि देश की अन्‍य राज्‍यों की सरकारों को भी सीख मिलती। उमर अब्‍दुला, इज्‍जत औरत का सबसे महंगा गहना होती है, उसकी कीमत आप ने ज्‍वैलरी से भी कम आंक दी। उसको मुआवजे की नहीं, उसको सुरक्षा गारंटी देने की जरूरत है। उसको जरूरत है आत्‍मराक्षण के तरीके सिखाने की, उसको जरूरत है आत्‍मविश्‍वास पैदा करने वाली आवाज की। अगर इज्‍जत गंवाकर पैसे लेने हैं तो वे कहीं भी कमा सकती है। आपके मुआवजे से कई गुना ज्‍यादा, जीबी रोड दिल्‍ली में अपना सब कुछ दांव पर लगाकर पैसा कमाती बेबस लाचार लड़कियां महिलाएं इसकी  साक्षात उदाहरण हैं। जख्‍मों पर नमक छिड़ने का काम अगर आज के युवा नेता करने लग गए तो शायद देश की सत्‍ता युवा हाथों में सौंपते हुए देश की जनता डरेगी। वैसे भी आज देश की जनता युवाओं की तरह फुर्तीफे दिखने वाले 60 पार कर चुके गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपने के लिए पैरों की उंगलियों पर खड़ी है, भले एनडीए की सहयोगी पार्टियां इस बात को स्‍वीकार करने में थोड़ा सा कतराती हों।

एनडीए की सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी बाला साहेब ठाकरे की शिव सेना है, जिसका नेतृत्‍व उद्धव ठाकरे जैसे युवा नेता के हाथ में है। इस पार्टी के मुख्‍य समाचार पत्र सामना हिन्‍दी में नरेंद्र मोदी को केंद्र बिंदु बनाकर संपादकीय लिखा गया है, जो पहले शिव सेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे के विचारों का कॉलम माना जाता था, और अब वे उद्धव ठाकरे के विचारों का। भुज के लालन कॉलेज से गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्‍ली के लाल किले पर स्‍वतंत्रता दिवस के मौके राष्‍ट्रीय ध्‍वज लहराने वाले देश के प्रधानमंत्री पर जुबानी हमला बोला। 
यह साढ़े छह दशक पुराने लोकतंत्र में पहला मौका था, जब एक प्रधानमंत्री के राष्‍ट्र नाम दिए भाषण को किसी मुख्‍यमंत्री ने आड़े हाथों लिया हो। इस भाषण के बाद पार्टी के शीर्ष नेता लाल कृष्‍ण आडवाणी भी पार्टी के इस तेज तरार नेता से असहमत नजर आए, जिसका जिक्र संपादकीय में किया गया है। संपादकीय में लिखा कि नरेंद्र मोदी किसी और दिन भी यह कसर पूरी कर सकते थे। संपादकीय में शिवसेना मोदी की तारीफ करती है, लेकिन चुटकियां लेते हुए, जैसे कि मोदी के नेतृत्‍व में गुजरात में अच्‍छा काम काज हुआ, और उसके लिए उनकी प्रशंसा करने में किसी को आपत्‍ति नहीं होनी चाहिए। स्‍पर्धा का घोड़ा कितना भी क्‍यूं न दौड़े, लेकिन दिल्‍ली की राजनीति में आखिरी क्षण में खरारा 'एक प्रकार की कंघी' करने वाले ही जीतते हैं, ऐसा आज तक का अनुभव है।
आगे कहते हैं, मनमोहन सिंह से युद्ध की भाषा झेली नहीं जाती, और आक्रामकता उनसे बर्दाशत नहीं होती। मोदी मात्रा आक्रामक बोलकर जनभावना की तोप दाग रहे हैं। फिर भी स्‍वतंत्रता दिवस के मौके पर देश के प्रधानमंत्री को इस तरह बेइज्‍जत करना ठीक है क्‍या? आगे संपादकीय में उद्धव एलके आडवाणी की तारीफ करते हुए लिखते हैं, आडवाणी की देशभक्‍ति भी गरम और उनका अनुभव भी मजबूत है। भारतीय जनता पार्टी जिस तरह के मीठे फल चख रही है, उसका श्रेय आडवाणी को ही जाता है। 

मोदी पर चुटकी लेते हुए, आज मोदी ने कांग्रेस के खिलाफ रणभेरी बजाकर आग लगा दी है यह सच है। उस आग की ज्‍वाला कई बार आग लगाने वाले को ही झुलसा देती है। शिव सेना आगे कहती है कि जो लालन कॉलेज से नरेंद्र मोदी ने बोला, कल वे उसके सामने आने वाला है। यकीनन अगर कांग्रेस वहां से आउट होती है तो नरेंद्र मोदी के सामने वे सब चुनौतियां आएंगी, जिसको लेकर वे मनमोहन सिंह पर हल्‍ला बोल रहे हैं।
प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार नरेंद्र मोदी को बनाने की बात पर शिव सेना के उद्धव ठाकरे हमेशा बच निकलते हैं, लेकिन संपादकीय के पहले अध में कहते हैं कि प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार चुनना भाजपा का अंदरूनी मामला है, वहीं अंत तक आते आते वे सरदार पटेल से मोदी की तुलना करते हुए कहते हैं कि हमे विश्‍वास है कि मोदी के हाथ में सरदार पटेल की तरह दिल्‍ली की सत्‍ता आएगी, उस समय देश लूटने वाले सारे डकैतों को वे जेल का रास्‍ता दिखाएंगे।

उद्धव ठाकरे उक्‍त लाइन में एक बात स्‍पष्‍ट कर रहे हैं कि नरेंद्र मोदी के हाथ में जो सत्‍ता है वे सरदार पटेल की तरह आएगी, मतलब उप प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री नहीं। सरदार पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते, लेकिन कहते हैं कि महात्‍मा गांधी के कारण जवाहर लाल नेहरु प्रधानमंत्री बने, और पटेल उप प्रधानमंत्री। उद्धव ठाकरे भले ही कुछ स्‍पष्‍ट न कर रहे हों, लेकिन कहीं न कहीं इस बात का संदेश जरूर दे रहे हैं कि प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने के लिए नरेंद्र मोदी के आगे कोई तो है, वे राजनाथ सिंह है, वे अरुण जेटली है,  वे सुषमा स्‍वराज है या कोई अन्‍य, पता नहीं, लेकिन एलके आडवाणी यहां गांधी की भूमिका अदा करना चाहेंगे।
 संपादकीय का अंतिम पड़ाव भी किसी चुटकी से कम नजर नहीं आता। जिसमें कहा गया है, वे दाऊद इब्राहिम, सईद हाफिज, मेमन टाइगर जैसों को पाकिस्‍तान से घसीटते हुए लाएंगे, लाकर फांसी पर लटकाएंगे। जो धन स्‍विस बैंक में पड़ा है उसको कार्गो हवाई जहाज में लादकर भारतीय सीमा में लाएंगे। ऐसा करने में मोदी पूरी तरह सक्षम हैं, हमको तिल जितनी भी शंका नहीं। यह बात उस समय किसी व्‍यंग से कम नहीं लगती, जब किसी भी देश में घुसने के लिए किसी विशेष कानूनी प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ता हो।

अंत में शिव सेना कहती है कि मोदी ने गुजरात के रेगिस्‍तान से जो तोप दागी, उससे पाकिस्‍तान को फर्क पड़ा या नहीं, इसका तो पता नहीं, लेकिन मोदी की तोप से निकले गोले के कारण दिल्‍ली के कांग्रेसी नेताओं ने नींद की गोलियों का ऑर्डर दे दिया है।

रैली समीक्षा - नरेंद्र मोदी एट हैदराबाद विद यस वी कैन

भाजपा के संभावित नहीं, बल्‍कि पक्‍के प्रधानमंत्री पद के उम्‍मीदवार नरेंद्र मोदी ने आज हैदराबाद में एक रैली को संबोधन किया, कहा जा रहा था कि यह रैली आगामी लोक सभा चुनावों के लिए शुरू होने वाले अभियान का शंखनाद है।

 राजनेता के लिए रैलियां करना कोई बड़ी बात नहीं। रैलियां तो पहले से होती आ रही हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी की रैली को मीडिया काफी तरजीह दे रहा है, कारण कोई भी हो। संभावित अगले प्रधानमंत्री या पैसा। नरेंद्र मोदी की रैली का शुभारम्‍भ स्‍थानीय भाषा से हुआ, जो बड़ी बात नहीं, क्‍यूंकि इटली की मैडम हर बात हिन्‍दी में बोलती हैं, भले शब्‍द उनके अपने लिखे हुए न हों।

नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा का नारा इस्‍तेमाल किया, यैस वी कैन। इस बात से ज्‍यादा हैरान होने वाली बात नहीं, क्‍यूंकि नरेंद्र मोदी की ब्रांडिंग का जिम्‍मा उसी कंपनी के हाथों में है, जो बराक ओबामा को विश्‍वस्‍तरीय ब्रांड बना चुकी है, और जो आज भी अपनी गुणवत्‍ता साबित करने के लिए संघर्षरत है। ज्‍यादातर अमेरिकन का उस पर से भरोसा उठा चुका है। अफगानिस्‍तान से सेना वापसी, वॉल स्‍ट्रीट की दशा सुधारने, आतंकवाद के खिलाफ लड़ने जैसे मोर्चों पर ओबामा पूरी तरह असफल हैं।

विज्ञापन कंपनियों का काम होता है, उत्‍पाद को बाजार में पहचान दिलाना, उस पहचान को बनाए रखना शायद उत्‍पाद निर्माता के हाथ में होता है। विज्ञापन हमेशा दिल को लुभावने वाले बनाए जाते हैं, अगर वे आकर्षक न होंगे, तो ग्राहक नहीं जाएगा उसको खरीदने के लिए।

यस वी कैन पर एक बार फिर लौटता हूं, यह शब्‍द सुनने भर से अगर आपको लगता है कि बहुत बड़ा करिश्‍मा हो गया है तो हर रविवार आपके शहर में किसी न किसी एमएलएम, नेटवर्किंग कंपनी की बैठक आयोजित होती होगी, उसमें जाइए, इससे भी ज्‍यादा आपको मोटिवेशन का नशा पिला दिया जाएगा, लेकिन जब उतरेगा तो आप पहले से भी ज्‍यादा खुद को कमजोर पाएंगे।

नरेंद्र मोदी ने कहा, किसी भी सरकार का पहला मजहब होता है राष्‍ट्र, जबकि नरेंद्र मोदी ने तो इंडिया कहा, और सरकार का ग्रंथ होता है संविधान। मोदी की तैयारी बहुत सही थी, लेकिन अगर गुजरात के अंदर लोकायुक्‍त के लिए युद्ध न चल रहा होता तो। सुप्रीम कोर्ट तक जाने की क्‍या जरूरत थी, संविधान को मानते, और राज्‍य में लोकायुक्‍त को नियुक्‍त करते।

बीजिंग की तारीफ पर नरेंद्र मोदी ने एक नेता को निशाने पर लिया। किसी शहर या देश की तारीफ करना बुरी बात नहीं, लेकिन नरेंद्र मोदी खुद को भूल गए, जब वे पुणे में विद्यार्थियों को शिक्षा पर भाषण दे रहे थे तो उन्‍होंने भी चीन की तारीफ की थी, वहां के आंकड़े पेश किए थे, जो वहां की सरकारों के पास भी नहीं। हो सकता है अधिक काम और जिम्‍मेदारियों के चलते खुद की गलतियां याद न रहीं हो, जैसे आज विपक्ष में बैठी एनडीए को अपने कार्यकाल के दौरान हुए आतंकवादी हमले, पाकिस्‍तान से दोस्‍ताना संबंध याद नहीं रहे। और आरोपों से बचने के लिए कहते हैं, देश की जनता ने तब हम को नकार दिया था, मतलब गंगा नहा लेने से किए पाप धुल गए, तो चालीस साल के गुनाह तो कांग्रेस के भी धुल चुके हैं, जो आपके आने सत्‍ता से उतर गई थी। अगर आपकी भाषा में सत्‍ता से उतरना पाप धूलना होता है तो।

यह एक युवा रैली थी। उम्‍मीद थी संभावनाओं का माया जाल बुनने वाले नरेंद्र मोदी युवा पीढ़ी के लिए कुछ खास बात लेकर आने वाले हैं, लेकिन अफसोस के रैली में नरेंद्र मोदी ने सरकार विरोधी अख़बार का संपादकीय पन्‍ना ही पढ़ डाला। सरकार की बुराईयां तो अख़बारों में हर रोज सुर्खियां बनती हैं, उनको गिनाकर देश की जनता को लुभावना, ठगने जैसा लगा। मुझे लगता है कि आंध्र प्रदेश में अख़बार निकलते होंगे, हर रोज नेताओं के सरकार विरोधी बयानों को जगह मिलती होगी।

नरेंद्र मोदी को इस रैली में समस्‍याएं और कांग्रेस को नीचा दिखाने की बजाय अपने भीतर के लीडर की उन योजनाओं से अवगत करवाना चाहिए था, जिसको लेकर युवा पीढ़ी सोच सके कि नरेंद्र मोदी को वोट किया जाए। मंच पर ऊंचे सुर में बोलने से कुछ सच्‍चाईयां नहीं बदलती। शराब का नशा सुबह तक रहता है। नशा मत पिलाइए, कोई देश बदलने का सुझाव बतलाइए। वो कौन सी बातें हैं, जो देश को नये आयाम तक लेकर जा सकती हैं। नरेंद्र मोदी राष्‍ट्रवाद की बात कर रहे हैं, लेकिन उनकी सरकार की टशन हमेशा पड़ोसी राज्‍यों से चलती रहती है। वहां पर नरेंद्र मोदी राष्‍ट्रहित क्‍यूं नहीं देख पाते ? वहां पर एक क्षेत्रीय प्रतिनिधि का फर्ज ही अदा क्‍यूं करते हैं ?

सवाल बहुत हैं, लेकिन चलते चलते इतना कहूंगा कि नरेंद्र मोदी के पास 11 साल का अनुभव है, एक राज्‍य को चलाने का, वे संभावनाओं का खुला आसमान दिखाते हैं। उधर, राहुल गांधी के पास विरासत में मिली कांग्रेस की रियासत है, लेकिन वे सकारात्‍मकता की किताब को बीच में से पढ़ने की कोशिश करते हैं। दोनों राजनीति तो सकारात्‍मक सोच से कर रहे हैं, लेकिन कहीं कहीं उलझ जाते हैं।

आज की रैली एक राजनेता की रैली थी, नरेंद्र मोदी बतौर एक मार्गदर्शक, देश के प्रधानमंत्री पूरी तरह पिछड़ते नजर आए। 

आप अपनी राय जरूर रखें, ताकि रैली समीक्षा को समझने में मुझे और आसानी हो।

दिल्‍ली अभी दूर है 'नरेंद्र भाई'

भले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम आज देशभर में ही नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर लोकप्रियता की सभी हदें पार कर चुका है, लेकिन इसको आगामी लोक सभा चुनावों के लिए सफलता की गारंटी कदापि नहीं माना जा सकता। आंकड़ों की धरातल को सही से देखे बिना भले ही भाजपा या उसके समर्थक सत्ता पर बैठने का ख्वाब संजो रहे हों, क्योंकि आंकड़े वैसे नहीं, जैसे भाजपा सोच रही है, आंकड़े विपरित हैं, खासकर भाजपा की सोच से। हां, अगर कोई करिश्मा हुआ तो जरूर भाजपा को २०१४ में सत्ता का स्वाद चखने का मौका मिल सकता है। वैसे ज्यादातर उम्मीद करना बेईमानी होगी, क्यूंकि आज स्थितियां १९९८ या १९९९ वाली नहीं हैं, जब भाजपा अन्य सहयोगी पार्टियों की सहायता से सिंहासन पर बैठी थी। अटलबिहारी वाजपेई जैसा एक सशक्त और दूरदर्शी सोच का व्यक्ति भाजपा का अगुवाई कर रहा था।

अब भाजपा नरेंद्र मोदी के जरिए उस इतिहास को दुहराना चाहती है। मगर नरेंद्र मोदी को पार्टी के शीर्ष नेता व अन्य भाजपा के मुख्यमंत्री तक नहीं सहज से ले पा रहे तो जनता से कैसी उम्मीद की जा सकती है, खासकर उस समुदाय से, जो नरेंद्र मोदी को आज भी मन ही मन में मुस्लिम समुदाय के लिए खतरे के रूप में देखता है। सच कहें तो आज नरेंद्र मोदी के आगे २००९ से कहीं अधिक चुनौतियां हैं, क्यूंकि  समय के साथ साथ भाजपा के कई संगी साथी एनडीए छोड़कर चले गए, खासकर जद यू के जाने बाद भाजपा को अगला चुनाव कुछ सहयोगियों के सहारे लडऩा होगा। जनता दल यूनाइटेड, जिसके अध्यक्ष शरद यादव हैं, ऐसी १३वीं पार्टी थी, जिसने भाजपा का साथ छोड़ा। अब एनडीए में केवल शिवसेना, शिरोमणि अकाली बादल और छोटी छोटी आठ पार्टियां हैं, जिनके पास या तो एक एक सांसद है या बिल्कुल नहीं। शिवसेना के पास मौजूदा समय में ११ तो शिअद के पास केवल ४ सांसद हैं जबकि भाजपा के पास 117 सांसद हैं। हालांकि सरकार बनाने के लिए २७३ के आंकड़े को छूना होता है।

जब १९९८ और १९९९ में भाजपा अटल बिहारी वापपेयी के नेतृत्व में चुनाव लड़ी थी। संजीदा, समझदार और अनुभवी राजनेता की छवि रखने वाले वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर उसे दोनों बार सत्ता हासिल हुई थी, भले ही पहली सरकार १३ दिन चली, लेकिन अगली सरकार १ सीट का इजाफा करते हुए १८३ का आंकड़ा छूने में सफल हुई, और अन्य पाॢटयों के सहयोग से सरकार बनाने में सफल रही और एक सफल कार्याकाल पूरा किया। अब स्थितियां पहले जैसी नहीं, पहली बात अब एनडीए पूरी तरह टूटकर बिखर चुका है, दूसरी बात अटलबिहारी वाजपेयी जितनी अहमियत नरेंद्र मोदी को उनकी पार्टी में नहीं मिल रही, यहां पर उनका मुकाबला कांग्रेस से कम अपने साथियों से ज्यादा है, वरना नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार समिति अध्यक्ष बनने पर इतना होहल्ला न होता। भाजपा के हाथ में केवल कुछ राज्य हैं, जिनसे उम्मीद की जा सकती है, जिसमें मध्यप्रदेश, ३६गढ़, राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा आदि। जद यू से अलग होने के बाद बिहार भाजपा के खाते से निकल चुका है। ४२ लोक सभा सीटों वाले पश्चिमी बंगाल में भाजपा केवल एक सीट के साथ बनी हुई है, लेकिन वह सीट पर जसवंत सिंह की है, जो नरेंद्र मोदी के कट्टर विरोधी बताए जाते हैं, हालांकि १९९९ में इस राज्य से भाजपा को 2 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। जब भाजपा को यह सीटें नसीब हुई थी, तब उसका और तृणमूल कांग्रेस का गठबंधन था। मगर अब रिश्ते वैसे नहीं, जैसे पुराने दिनों में हुआ करते थे। पश्चिमी बंगाल में एक चौथाई मतदान मुस्लिम है। ऐसे में अपनी कुर्सी बनाए रखने के लिए तृणमूल कांग्रेस कहीं न कहीं, आगे चलकर कांग्रेस के साथ समझौता तो कर सकती है, लेकिन नरेंद्र मोदी की अगुवाई को शायद ही मंजूर करे। वैसे नरेंद्र मोदी पश्चिमी बंगाल से टाटा को गुजरात खींच रहे, कहीं न कहीं, यह बात भी पश्चिमी बंगाल के लोगों को खलती है।

कर्नाटक का हाल तो पिछले दिनों देखने को मिला। भाजपा को इस बार कर्नाटका से भी कुछ ज्यादा की उम्मीद करना बेईमानी होगा। येदियुरप्पा अगर भाजपा में फिर से लौटते हैं तो भी भाजपा कर्नाटका में फिलहाल तो करिश्मा नहीं कर सकती, क्यूंकि जनता का मन भाजपा से उठ चुका है। २८ लोक सभा सीटों वाले इस क्षेत्र से भाजपा को २००९ में १८ सीटें नसीब हुई थी, लेकिन इस बार इनकी संख्या नीचे गिरने की पूरी संभावना है, क्यूंकि यहां कांग्रेस ने सत्ता वापसी कर ली है। उड़ीसा जहां २१ लोक सभा सीटें हैं,  वहां पर भाजपा के पास मौजूदा समय में एक भी सांसद नहीं, उड़ीसा का मुख्यमंत्री नवीन पटनायक नरेंद्र मोदी को अच्छा प्रशासक नहीं मानता, और २००९ में संघ की गतिविधियों से तंग आकर नवीन पटनायक ने भाजपा से नाता तोड़ लिया था, ऐसे में उसका भाजपा के साथ खड़े होना मुश्किल है, क्यूंकि यहां के नतीजे ईसाई समुदाय प्रभावित करता है, जो संघ को पसंद नहीं करता, और संघ के बिना बीजेपी चल नहीं सकती।

देश में सर्वाधिक लोक सभा सीटें रखने वाले उत्तरप्रदेश में भाजपा को करिश्मा करना होगा। केवल यह राज्य किसी भी पार्टी का नसीब बदल सकता है, क्यूंकि यहां पर देश की ८० लोक सभा की सीटें हैं, लेकिन यहां मुश्किल यह है कि इस क्षेत्र में क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा है, जो किसी भी सहारा को सहारा देती है, लेकिन कई शर्तों के साथ। बीएसपी और सपा, दोनों का यहां बहुत बोलबाला है, और दोनों पाॢटयों के शीर्ष नेता खुद प्रधानमंत्री की सीट पर बैठने के ख्वाब देखते हैं। यह समझौतावादी लोग कांग्रेस के साथ इसलिए चले जाते हैं, यहां सौदेबाजी का काफी संभावनाएं रहती हैं, लेकिन भाजपा के साथ इस तरह की सौदेबाजी करना पा मुश्किल होगा। इस क्षेत्र में भाजपा ने सबसे बेहतरीन प्रदर्शन १९९८ में किया था, जब उसको ५९ सीटें मिली थी, उसके बाद इस आंकड़े को भाजपा कभी छू नहीं पाई, मौजूदा समय में भाजपा के पास केवल नौ सीट हैं।

महाराष्ट्र, जहां पर लोक सभा की ४८ सीटें हैं। मगर भाजपा के खाते में केवल ९ सीटें हैं। इस बार स्थिति यों की त्यों बनी रह सकती है। इस राज्य में एनडीए सहयोगी शिवसेना है, जिसके पास मौजूदा समय में ११ सांसद हैं, लेकिन बाल ठाकरे को खो देेने के बाद राज ठाकरे का उभरना, कहीं न कहीं शिव सेना को पीछे धकेलेगा। जिस तरह का रु$ख शिव सेना के मौजूदा अध्यक्ष उद्धव ठाकरे नरेंद्र मोदी के बारे में अपनाए हुए हैं। ऐसे में इस दल के भी एनडीए से बाहर होने के चांस हैं, क्यूंकि भाजपा के संभवत: पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे दोनों में से किसी एक को चुन सकते हैं, जिसका प्रदर्शन बेहतर हुआ, लेकिन उससे पूूर्व भाजपा का प्रदर्शन बेहतर होना लाजमी है। अन्ना हजारे इस राज्य से संबंध रखते हैं, वे नरेंद्र मोदी की आलोचना सार्वजनिक मंचों से कर रहे हैं, और ऐसे में अपनु मानस, महाराष्ट्रीयन लोग नरेंद्र मोदी के चेहरे से दूरी बना सकते हैं।

आंंध प्रदेश में भाजपा के पास एक भी सांसद नहीं, हालांकि भाजपा ने ४२ लोक सभा सीटों वाले इस क्षेक में अपनी शाख जमाने के लिए २००९ में ३७ उम्मीदवार उतारे थे। अटल बिहारी वापपेयी की सरकार के वक्त यहां की पार्टी टीडीपी का बहुत बड़ा हाथ था। मगर २००४ में टीडीपी और भाजपा का  रिश्ता टूट गया था, अगर अब भी यह रिश्ता बनता है तो कोई ज्यादा फायदा नहीं मिलने वाला, क्यूंकि टीडीपी भी अपनी चमक को खोती जा रही है। वहां पर संभावना यह की जा सकती है कि भाजपा जगमोहन रेड्डी की नई पार्टी के साथ चुनाव लड़ सकती है, जो पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वाईएसआर रेड्डी की मौत के बाद उनके पुत्र ने बनाई है। तेलुगु देशम पार्टी तीसरे फ्रंट की तरफ रुख कर सकती है। वैसे यह क्षेत्र कांग्रेस के प्रभाव वाला है। तमिलनाडु में लोक सभा की ३९ सीटें हैं। यहां पर दो पाॢटयां सक्रिय हैं, एक डीएमके  और एआईएडीएमके। एम करुणानिधि और जयललिता दोनों यहां के रूसख वाले नेता हैं। जयललिता का रूझान नरेंद्र मोदी की तरफ है। दोनों में रिश्ते अच्छे हैं। मगर यहां पर डीएमके किस तरह का प्रदर्शन करती है, उस पर चुनाव समीकरण बनेंगे। दोनों पर्टियां मौकाप्रस्त हैं। अपनी शर्तों पर समर्थन देती और खींच लेती हैं।

नरेंद्र मोदी को अगर सत्ता हासिल करनी है तो उसको एक जादू आंकड़ा हासिल करना होगा। अकेली भाजपा को २०० से अधिक सीटें बटोरनी होंगी। भाजपा को गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़,   दिल्ली, यूपी, बिहार एक बेहतरीन प्रदर्शन करना होगा। यहां से आने वाले आंकड़े भाजपा की किस्मत बदल सकते हैं। मौजूदा समय में भाजपा के नहीं, बल्कि एडीए के पास केवल 138 सीटें हैं। अगर भाजपा एक जागड़ू सरकार के साथ सत्ता में कदम रखती है तो देश की हालत में कोई सुधार होने की उम्मीद नहीं दिखती, और यह सरकार हमेशा एक बनावटी सांस प्रणाली यंत्र पर चलेगी, जो किसी भी समय अगले चुनावों की नौबत पैदा कर सकती है। क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है। सबसे अहम बात अगर नरेंद्र मोदी को सत्ता हासिल करनी है तो उसको एक राज्य के साथ खुद को जोड़े रखने से परहेज करना होगा। नरेंद्र मोदी का चेहरा, जो ब्रांड बन चुका है, लेकिन मध्यप्रदेश के चुनाव प्रचार में इस चेहरे को गायब कर दिया गया, क्यूंकि गुजरात सरकार और मध्यप्रदेश सरकार पर कई मोर्चों पर युद्ध शुरू है। इन दिनों शेरों के स्थानांतरित को लेकर अदालती युद्ध चल रहा है। ऐसे में मध्यप्रदेश के लोग नरेंद्र मोदी को स्वीकार नहीं कर सकते, क्यूंकि वे उसकी सरकार का नेतृत्व करते हैं, जो शेरों के स्थानांतरित को लेकर अदालत के कटघरे में खड़ी है। ऐसे में शिवराज चौहान अपनी सरका बचाने के लिए नरेंद्र मोदी से दूर बनाए रखना ज्यादा बेहतर समझते हैं। यकीनन यह चुनाव कहीं न कहीं आगामी लोक सभा चुनावों पर व्यापक असर डालेंगे।

”लेखक कुलवंत हैप्‍पी, युवारॉक्‍स डॉट कॉम व हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र प्रभात आभा के संपादक व जानो दुनिया डॉट टीवी में बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं।”

यह लेख 27 जुलाई 2013 के प्रभात आभा एडिशन में प्रकाशित हुआ है।

राजनाथ सिंह, नरेंद्र मोदी और भाजपा की स्‍थिति

''राह में उनसे मुलाकात हो गई, जिससे डरते थे वो ही बात हो गई''  विजय पथ फिल्‍म का यह गीत आज भाजपा नेताओं को रहकर का याद आ रहा होगा, खासकर उनको जो नरेंद्र मोदी का नाम सुनते ही मत्‍थे पर शिकन ले आते हैं।

देश से कोसों दूर जब न्‍यूयॉर्क में राजनाथ सिंह ने अपना मुंह खोला, तो उसकी आवाज भारतीय राजनीति के गलियारों तक अपनी गूंज का असर छोड़ गई। राजनाथ सिंह, भले ही देश से दूर बैठे हैं, लेकिन भारतीय मीडिया की निगाह उन पर बाज की तरह थी। बस इंतजार था, राजनाथ सिंह के कुछ कहने का, और जो राजनाथ सिंह ने कहा, वे यकीनन विजय पथ के गीत की लाइनों को पुन:जीवित कर देने वाला था।

दरअसल, जब राजनाथ सिंह से पीएम पद की उम्‍मीदवारी के संबंधी सवाल पूछा गया तो उनका उत्तर था, मैं पीएम पद की उम्‍मीदवारी वाली रेस से बाहर हूं। मैं पार्टी अध्‍यक्ष हूं, मेरी जिम्‍मेदारी केवल भाजपा को सत्ता में बिठाने की है, जो मैं पूरी निष्‍ठा के साथ निभाउंगा। यकीनन, नरेंद्र मोदी आज सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं, अगर भाजपा सत्ता हासिल करती है तो वे पीएम पद के उम्‍मीदवार होंगे।

दूर देश में बैठे राजनाथ सिंह को इस बात का अंदाजा भी नहीं होगा, ऐसे कैसे हो सकता है कि उनके मुंह से निकले यह शब्‍द भारत में बैठे उनके कुछ मित्रों को अग्‍निबाण से भी ज्‍यादा नागवार गुजरेंगे। क्‍यूंकि भूल गए वे गोवा बैठक के बाद की उस हलचल को, जो एलके आडवाणी के इस्‍तीफे से पैदा हुई थी।

भारतीय मीडिया के बीच अक्‍सर इस बात संबंधी पूछे सवाल पर पार्टी बैठकर फैसला करेगी कह निकले वाले राजनाथ सिंह क्‍यूं भूल गए कि आज का मीडिया सालों पुराना नहीं, जो ख़बर को प्रकाशित करने के लिए किसी बस या डाक खाने से आने वाले तार का इंतजार करता रहेगा, आज तो आपने बयान दिया नहीं कि इधर छापकर पुराना, और चलकर घिस जाता है।

राजनाथ सिंह, ने पहले पत्ते दिल्‍ली की बजाय गोवा में खोले, शायद राजनाथ सिंह ने उनके लिए विकल्‍प खुला रखा था, जो इस फैसले से ज्‍यादा हताश होने वाले थे, क्‍यूंकि तनाव के वक्‍त खुली हवा में सांस लेना, टहलना, बीच के किनारे जाकर मौज मस्‍ती करना बेहतर रह सके।

अब वे न्‍यूयॉर्क पहुंचकर अपने पत्‍ते खोलते हैं, ताकि उनके भारत लौटने तक पूरा मामला किसी ठंडे बस्‍ते में पड़ जाए, और वे नरेंद्र मोदी को दिए हुए अपने वायदे पर कायम रह सकें। शायद अब तो सहयोगी पार्टियों को अहसास तो हो गया होगा कि नरेंद्र मोदी के अलावा भाजपा के पास 2014 के लिए कोई और विकल्‍प नहीं है।

अगर अब भी किसी को शक है तो वे अपना भ्रम बनाए रखे, क्‍यूंकि भ्रम का कोई इलाज नहीं होता, और अंत आप ठंडी सांस लेते हुए पानी की चंद घूंटों के साथ, कुर्सी पर पीठ लगाकर गहरी ध्‍यान अवस्‍था में जाकर, विजय पथ के उस गीत को आत्‍मसात करें, ''राह में उनसे मुलाकात हो गई, जिससे डरते थे वो ही बात हो गई''।

भाजपा का खेल, टेस्‍ट मैच के अंतिम दिन सा

क्रिकेट के मैदान पर अक्‍सर जब दो टीमें होती हैं, खेलती हैं तो यकीनन दोनों टीमें अपना बेहतर प्रदर्शन देने के लिए अपने स्‍तर पर हरसंभव कोशिश करती हैं, ताकि नतीजे उनकी तरफ पलट जाएं, लेकिन भारतीय राजनीति की पिच पर वैसा नजारा नहीं है। यहां तो केवल भारतीय जनता पार्टी, जो एनडीए की सबसे बड़ी और अगुवाईकर्ता पार्टी है, खेल रही है, पूरा ड्रामा रच रही है। अहम मुद्दों पर चर्चा कर पक्ष को हराने की बजाय उसका पूरा ध्‍यान मैच के अंदर खलन पैदा कर सुर्खियां बटोरना है, वे एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाते हुए नजर नहीं आ रही, वे केवल एक राज्‍य के विकास के दम पर राजनीति ब्रांड बना चुके चेहरे के इस्‍तेमाल पर सत्ता हथियाना चाहती है। भाजपा का रवैया केवल उस टेस्‍ट टीम सा है, जो टेस्‍ट मैच के अंतिम दिन समय बर्बाद करने के लिए हर प्रकार का हथकंड़ा अपनाती है।

भाजपा ने पहला ड्रामा रचा। जब राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक गोवा में होनी थी। कुछ नेताओं ने वहां जाने से इंकार कर दिया, तो कुछ ने अनचाहे मन से वहां जाना बेहतर समझा। ख़बरों में थी भाजपा, और विरोधी टीम के इक्‍का दुक्‍का बयानबाज नेता। इस बैठक के साथ भाजपा को मीडिया सामान्‍य भाव से लेता कि एलके आडवाणी ने इस्‍तीफे का पैंतरा चल दिया। मीडिया के अगले कुछ दिन और उसकी भेंट चढ़ गए। अंत होते होते एलके आडवाणी अपने फैसले से पलटे, किसी टीवी सीरियल के किरदार की तरह।

नरेंद्र मोदी की एलके आडवाणी से दूरियां, करीबियां चर्चा में बनीं रही। इस दौरान किसी बेहतर प्रदर्शन कर रहे गेंदबाज की तरह नरेंद्र मोदी मीडिया में स्‍पेस बनाते चले गए। कहते हैं कि जब वक्‍त अच्‍छा हो तो दूसरों की गलतियां भी आपके उभार के लिए कारगार सिद्ध होती हैं, खास नरेंद्र मोदी के मामले में कुछ ऐसा ही हुआ है। वे एक अच्‍छे मुख्‍यमंत्री हैं, कोई शक नहीं, लेकिन क्‍या कांग्रेस के पास ऐसे मुख्‍यमंत्री नहीं, बिल्कुल हैं, लेकिन उसके पास मीडिया में हौवा पैदा करने वाले नेता नहीं।

उसके नेता मीडिया में आने से डरते हैं, जो आते हैं, उनकी बोल चाल इतनी खराब है कि उनके मुंह से निकले बोल भाजपा को कम कांग्रेस को ज्‍यादा नुकसान पहुंचाते हैं। लादेन जी, आपदा पर्यटन या मौत का सौदागर जैसे शब्‍द भाजपा की नहीं, बल्‍कि कांग्रेसी नेताओं की देन हैं, जो सोशल मीडिया में कांग्रेस की खिल्‍ली उड़ाने के लिए काफी हैं।

वहीं, मीडिया नरेंद्र मोदी के बयानों पर ध्‍यान देने की बजाय उनके मुंह से निकले शब्‍दों के पीछे की सोच को पकड़ने की कोशिश करता है, जो ख़बर की शकल ले लेते हैं। बुर्के की जगह नरेंद्र मोदी शायद घुंघट भी कह सकते थे, लेकिन नहीं, उन्‍होंने बुर्का कहा, बुर्का उस समुदाय से जुड़ा है, जिसका नरेंद्र मोदी को सबसे कट्टर माना जाता है, भले ही नहीं, मोदी कहते हों कि वे देश को एक साथ आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं।

पिछले कई महीनों से चल रहे ड्रामे के आज वाले एपिसोड में नरेंद्र मोदी को 19 टीमें और मिल गई, हालांकि भाजपा इस की घोषणा बीते हुए कल में कर सकती थी, लेकिन उसने धारावाहिक की तरह, अपने फैसले पर रहस्‍य बनाए रखा, ताकि कांग्रेस के खाते से एक दिन हो छीन लिया जाए। कुल मिलाकर भाजपा टेस्‍ट मैच के अंतिम दिन वाली गेम खेल रही है, कैसे भी रहता वक्‍त गुजर जाए, और मैच उनके खाते में पहुंच जाए।

'कल के नेता' आज के नेताओं के कारण मुश्‍िकल में

नीतीश कुमार बाबू के राज्‍य में बसते छपरा के एक सरकारी स्कूल में विषाक्त दोपहर के भोजन से हुई 22 बच्चों की मौत अत्यंत पीड़ादायक है, इसने इस महत्वपूर्ण योजना के प्रति बरती जा रही आपराधिक लापरवाही को ही जगजाहिर किया है। कल के नेता कहे जाने वाले बच्‍चे स्कूल में पढ़ने गए थे, लेकिन हमारे सड़ी-गली व्यवस्था वाले सिस्‍टम मासूम बच्‍चों के सपनों को साकार होने से पहले ही ताश के पत्तों की तरह बिखेर दिया।

बेहद बुरा लगता है जब, भोजन में मरी छिपकली होने या उसके किसी और तरह से विषाक्त होने की शिकायतें मिलती हैं और पहले भी कुछ जगहों पर कुछ बच्चों की विषाक्त भोजन से मौत तक हुई है, इसके बावजूद शिक्षा के बुनियादी अधिकार को आधार देने वाली इस योजना को लेकर चौतरफा कोताही बरती जा रही है। 

यह तो जांच से पता चलेगा कि उन बच्चों को दिए गए भोजन में कीटनाशक मिला हुआ था या कोई और जहरीला पदार्थ, मगर जिस तरह से स्कूलों में दोपहर का  भोजन, ''जिसको हम मिड डे मील कहते हैं'' तैयार किया जाता है और बच्चों को परोसा जाता है, उस पूरी व्यवस्था में ही बहुत सारी खामियां हैं। इसमें सबसे बड़ी गड़बड़ी यही है कि इस महंगाई के दौर में आज भी भोजन देने के लिए प्रति बच्चे साढ़े तीन से पांच रुपये ही तय किए गए हैं! इसी पैसे में उनके लिए चावल-दाल और सब्जी के साथ ही ईंधन का भी इंतजाम करना होता है। इसके अलावा यह पूरी योजना भ्रष्टाचार का एक बड़ा जरिया भी बनी हुई है, जिसमें खरीद की आड़ में भारी गड़बड़झाला होता है। वैसे समग्र रूप में देखें, तो यह योजना सरकारी और सरकारी मद से चलने वाले स्कूलों में पढ़ने वाले तकरीबन 12 करोड़ बच्चों को पौष्टिक भोजन देने के उद्देश्य से चलाई जा रही है। 

दरअसल 1960 के दशक में जब के कामराज ने तमिलनाडु में यह योजना शुरू की थी, तो उनका मकसद यही था कि कोई भी बच्चा भूख की वजह से पढ़ाई से वंचित न रह जाए। कुछ साल पहले अदालती आदेशों के बाद बच्‍चों को बना बनाया खाना परोसा जाने लगा। निश्चित रूप से इस योजना से वंचित तबके के बच्चों को स्कूलों से जोड़ने में मदद मिली है, लेकिन सरकारी स्कूलों का आज जो हाल हो गया है, उससे निराशा ही होती है। अच्छा तो यह होता कि इसे सबक की तरह लिया जाता और इस योजना की खामियों को दूर करने पर अविलंब विचार किया जाता, मगर विडंबना देखिए कि इस हृदयविदारक घटना के बाद बिहार में राजनीति शुरू हो गई है।

राजनीति दिन प्रति दिन गंदी होती जा रही है। संवेदनशील मुद्दों पर गहन विचार करने, अपनी जिम्‍मेदारी लेने की बजाय नेता ऐसे बयानों की बौछार करते हैं, या विपक्ष पर साजिश का आरोप लगाते हैं, कि मुद्दा कहीं छुप जाता है, बस बचता है तो बयानों का ख़बरों में उड़ता हुआ धूंआं।

मैन ऑफ द वीक नरेंद्र मोदी

खुदी को कर बुलंद इतना की खुदा बन्दे से ये पूछे की बता तेरी रजा क्या है, शायद कुछ इसी राह पर चल रहे हैं गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी। वक्‍त भी कदम दर कदम उनका साथ दे रहा है, उनकी तरफ विरोधियों द्वारा फेंका गया पासा भी उनके लिए वरदान साबित होता है।

इस महीने की शुरूआत से नमो या कहूं नरेंद्र मोदी सुर्खियों में हैं, क्‍यूंकि कर्नाटका में भाजपा की हार के बाद लोगों की निगाह टिकी थी कि गुजरात में नमो मंत्र का क्‍या हश्र होगा, 2 तारीख को चुनाव हुए, नमो बेफिक्र थे, मानो उनको पता हो कि नतीजे मेरे पक्ष में हैं।

नमो पर वक्‍त मेहरबान तो उस समय हुआ, जब भाजपा के सीनियर नेता व वेटिंग इन पीएम लालकृष्‍ण आडवानी मध्‍यप्रदेश के ग्‍वालियर पहुंचे, और उन्‍होंने गंगा गए गंगाराम, जमुना गए जमुना राम, की कहावत को चरितार्थ करते हुए कह दिया, गुजरात से अच्‍छे तो मध्‍यप्रदेश और छतीसगढ़ हैं, क्‍यूंकि इनकी हालत बेहद खराब थी, जब भाजपा सत्‍ता में आई, हैरानी की बात तो यह है कि सीनियर नेता अपना लोक सभा का चुनाव निरंतर डेढ़ दशक से गुजरात की राजधानी गांधीनगर से लड़ते आ रहे हैं।

वेटिंग इन पीएम की वाणी ने राजनीति में हलचल पैदा कर दी और भाजपा नेताओं को नरेंद्र मोदी का समर्थन करते हुए पाया गया, नमो के लिए इससे अच्‍छा क्‍या था कि वे बिना कुछ कहे, चर्चा में आए, उनको पार्टी का भी समर्थन मिल गया।

इसके बाद 5 तारीख आई, जिसका नरेंद मोदी से ज्‍यादा विरोधियों को इंतजार था, क्‍यूंकि उन्‍हें उम्‍मीद थी कि इस बार नरेंद्र मोदी को जमीन पर पटकने का एक अच्‍छा मौका मिलेगा, अफसोस कि नमो मंत्र ने काम किया, गुजरात में दो लोकसभा सीटों समेत छह सीटों पर भाजपा कब्‍जा करने में सफल हुई, इतना ही नहीं, नीतीश कुमार को मिली हार के पीछे उनकी नमो के प्रति दिखाई बेरुखी को ठहराया गया।

इत्‍तेफाक देखिए, जिस दिन नतीजे आने थे, उसी दिन आंतरिक सुरक्षा मामले में मुख्‍यमंत्रियों की बैठक का आयोजन नई दिल्‍ली में किया गया। इस बैठक में बिहार मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार पहले से मौजूद थे, लेकिन नमो उनके बाद पहुंचे, नमो ने उनको देखना तक गवारा न समझा, नमो को नीतीश को खासकर उस समय नजरअंदाज करना खटकता है, जब वे नरेंद्र मोदी के प्रिय और छत्तीसगढ़ के मुख्‍यमंत्री रमन सिंह से बातचीत कर रहे थे।

इस दौरान नमो टेलीविजन की स्‍क्रीन पर कब्‍जा जमाने में कामयाब हुए, क्‍यूंकि गुजरात में हुए उपचुनावों नतीजे आ चुके थे। बिहार में नीतीश बुरी तरह पिट चुके थे, और इतना ही नहीं, मीटिंग में भी नमो के भाषण पर सबकी निगाह थी, हर बार की तरह नमो यहां पर केंद्र को पटकनी देते हुए नजर आए।

ये कारवां यहां कहां रुकने वाला था, नरेंद्र मोदी ने गुजरात की जीत का जश्‍न दिल्‍ली में मनाना बेहतर समझा। वे पार्टी अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह से मिले, जिनका नरेंद्र मोदी को पूरा पूरा समर्थन है, फिर मिले लालकृष्‍ण आडवानी से, सारे गिले शिकवे एक किनारे कर, मिलते भी क्‍यूं न अटल और आडवानी की छात्रछाया में तो नमो ने राजनीति के गुरमंत्र सीखे। वे बात जुदा है कि आडवानी का सर्गिद आज उससे कहीं ज्‍यादा लोकप्रिय है।

फिर समुद्री किनारे ठंडे मौसम में मंथन के लिए पार्टी ने प्रोग्राम बनाया, तो पब्‍लिक डिमांड आई कि नमो भी इसमें शिरकत करें, जनता की मांग को भाजपा कैसे ठुकरा सकती थी, मोदी के जाने की ख़बर सुनते समारोह में कांग्रसी, वामपंथी तो किनारा करते सुने थे, लेकिन पहला मौका था कि भाजपा के कई नेताओं ने इस अहम मीटिंग से  किनारा कर लिया, राजनीति को और गर्मा दिया, नतीजा चर्चा में रहे नरेंद्र मोदी।

कहते हैं कि गोवा में आयोजित होने वाले एक अन्‍य प्रोग्राम के लिए भी नरेंद्र मोदी को आमंत्रित किया गया था, लेकिन नरेंद्र मोदी से पहले गोया में उनका संदेश पहुंच गया था। गोया के रोमानियत भरे मौसम में भाजपा किसी नतीजे पर पहुंचे या न, लेकिन नमो के लिए दिल्‍ली में मैराथन का आयोजन किया जा रहा है। इससे पहले उनके लिए रॉक कंसर्ट का आयोजन किया गया था।

आज शनिवार, आठ तारीख। 2 से 8 जून तक कई बड़ी ख़बरें आई, लेकिन नमो मंत्र, कांग्रेस की माने तो नमो वायरस को टेलीविजन स्‍क्रीन से हटा नहीं पाई, वैसे कहते हैं कि सिनेमा हाल से हर शुक्रवार, और टीवी स्‍क्रीन से हर घंटे एक ख़बर लापता हो जाती है, लेकिन नमो पूरा हफ्ता टीवी स्‍क्रीन पर बने रहे, चाहे इस दौरान जिया ख़ान आई, चाहे आईपीएल में सट्टेबाजी, चाहे कोई अन्‍य मामला, लेकिन शाम तक टेलीविजन स्‍क्रीन पर नमो लौट आते, सुबह का भूला शाम को लौट आए, तो उसको भूला नहीं कहते। आप कुछ भी कहें, लेकिन हम नरेंद्र मोदी को मैन ऑफ द वीक कहते हैं।

तोगड़िया ने कुछ गलत तो नहीं कहा

विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के अंतर्राष्‍ट्रीय प्रमुख डॉक्टर प्रवीण तोगड़िया ने कहा, ''जो लोग नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बता रहे हैं, वे बुनियादी रूप से एनडीए और बीजेपी को तोड़ने की रणनीति पर काम कर रहे हैं''।

अगर विहिप के नेता की बात मान भी ली जाए तो इसमें बुरा भी कुछ नहीं। अगर देश की जनता नरेंद्र मोदी के रूप में भाजपा को बहुमत दे देती है तो इसके देश के लिए बेहद अच्‍छी बात है, जब तक इसको बहुमत सरकार नहीं मिलेगी, तब तक इस देश का भला होना मुश्किल है, वो बहुमत चाहे कांग्रेस को मिले चाहे फिर बीजेपी को, बहुमत देश के हित में है।

भाजपा अपनी तैयारी कर चुकी है नितिन गड़करी को महाराष्‍ट्र भेज राजनाथ सिंह को अध्‍यक्ष बनाकर। अपने पुराने साथी कल्‍याण सिंह को एक बार फिर अपने साथ खींच लाई। नरेंद्र मोदी अपने शपथ समारोह में जयललिता से लेकर प्रकाश सिंह बादल को बुलाकर अपनी आगे की योजना को सबके सामने रख चुके हैं। वाइब्रेंट गुजरात 2013 के जरिए अपना शक्‍ति प्रदर्शन ही नहीं, बल्‍कि उसमें छत्‍तीसगढ़ के मुख्‍यमंत्री रमन सिंह की उपलब्‍धियों भरी स्‍पेशल प्रदर्शनी कर अपने साथ ला खड़ा किया।

उम्‍मीद है कि भाजपा फरवरी में नरेंद्र मोदी को चुनाव समिति का अध्‍यक्ष बनाएगी। अगर ऐसा होता है तो इसको हम नरेंद्र मोदी की अग्‍निपरीक्षा मान सकते हैं। मगर जिस तरह की स्‍थिति इन दिनों में देश के अंदर बनी हुई है, उसको नजर अंदाज करना मुश्‍किल है। देश पिछले कई सालों से एक तानाशाह की तलाश में है, जो लोकतंत्र में विश्‍वास करता है, ऐसा एक ही व्‍यक्‍ति है, वो नरेंद्र मोदी।