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कांग्रेसियों का 'ब्रह्मचर्य व्रत'

कहते हैं जो पकड़ा गया वो चोर बड़ा। जो समय रहते स्‍वीकार कर गया वो सबसे बड़ा महान, जैसे कि मोहनदास कर्म चंद गांधी। मगर अफसोस है कि अब कांग्रेसी नेताओं को स्‍वीकार करने का मौका ही नहीं मिलता या तो लड़कियां आत्‍म हत्‍या कर नेताओं को बेनकाब कर देती हैं या फिर कुछ साल बाद गलतियां पुत्रों का जन्‍म लेकर जग जाहिर हो जाती हैं।

शायद महात्‍मा गांधी की परंपरा को कांग्रेसी नेता बरकरार रखने की कोशिश में लगे हुए हैं, भले दूसरी तरफ सत्‍ता में बैठी कांग्रेस महिलाओं की सुरक्षा का पूरा पूरा जिम्‍मा उठाने का भरोसा दिला रही है। कथित तौर पर कुछ महीनों से ब्रह्मचर्य का व्रत, जिससे हम बलात्‍कार भी कह सकते हैं,  कर रहे एक नेता विक्रम सिंह ब्रह्मा को क्षुब्‍ध महिलाओं ने असम में पीट डाला, और कांग्रेस को एक बार फिर शर्मिंदा होना पड़ा। शायद कांग्रेस शर्मिंदा न होती। अगर आज हमारे राष्‍ट्रपिता की तरह विक्रम सिंह ब्रहमा भी जनता के बीच आकर महिला के साथ किए अपने ब्रह्मचर्य व्रत की स्‍वीकृति करते।

जैसे गांधी जी ने एक पत्र में लिखा था कि 'मुझे मालूम है कि शिविर के सभी लोग जानते हैं कि मनु मेरी खाट में साझेदारी करती है। वैसे भी मैं छुपाकर कुछ नहीं करना चाहता हूं। मैं इसको विज्ञापित नहीं कर रहा हूँ। यह मेरे लिए अत्यंत पवित्र चीज है। संदेह और अविश्वास को दूर करने के लिए फरवरी 1947 में गांधीजी ने नोआखाली की एक प्रार्थना सभा में मनु के साथ बिस्तर की साझेदारी की बात सबके सामने रखी। लेकिन यह नहीं बतलाया कि इस साझेदारी में मनु वस्त्रहीन अवस्था में होती थी।

कुछ माह पहले गीतिका नामक लड़की ने आत्‍महत्‍या कर ली और पीछे एक सुसाइड नोट छोड़ गई, जिसमें लिखा था कि उनकी आत्‍महत्‍या के पीछे कांग्रेसी नेता का हाथ है। यकीनन यह मामला भी महिला के साथ शारीरिक प्रयोग का था, जिसमें महिला को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। मगर जब आरोपी नेता का जन्‍मदिवस आया तो एक अन्‍य कांग्रेसी नेता ने कहा, 'गोपाल कांडा ने गलती से गलत नौकर रख लिया था'। यकीनन गीतिका मनु सी न थी, ईमानदार पैरोकार न था।

कांग्रेस के दिग्‍गज नेताओं में शुमार एनडी तिवारी, जो तीन बार उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री भी रह चुके हैं, को ब्रह्मचर्य व्रत प्रयोग उस समय महंगा पड़ गया, जब हाईकोर्ट ने डीएनए रिपोर्ट के आधार पर रोहित शेख़र को उनका पुत्र मान लिया। एनडी तिवारी ने इसको एक साजिश बताया तो वहीं डीएनए टेस्ट रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद उज्ज्वला शर्मा ने कहा था, जो सच्चाई केवल वह जानती थीं, अब वह सच्चाई पूरी दुनिया के सामने आ गई है। यह सच की जीत है और उनके बेटे के मां के प्रति प्रेम की जीत है।

कथित तौर पर पिछले वर्ष कांग्रेस के फायरब्रांड वकील नेता अभिषेक मनु सिंघवी को भी उनके चालक ने ब्रह्मचर्य व्रत प्रयोग करते हुए एक वीडियो में कैच कर लिया था। इस वीडियो के रिलीज होने के बाद बात सामने आई कि वो वकील महिला को बदले में उच्‍च पदवी देने वाले थे। कांग्रेसी नेता अपने प्रेरणास्रोत एवं देश के राष्‍ट्रपिता के प्रयोग करने की कोशिश करते हुए पकड़े जाते हैं। उनको जनता महात्‍मा गांधी बनने से रोक लेती है। वैसे तो राहुल गांधी भी इस तरह के आरोप को झेल चुके हैं।

आज रात एनडीटीवी पर प्राइम टाइम शो देखते हुए एक सवाल सुनने को मिला कि महाभारत से द्रोपदी चीरहरण को हटा देना चाहिए। मुझे लगता है कि देश के राष्‍ट्रपिता की कुछ ऐसी स्‍वीकृतियों को भी नहीं हटा देना चाहिए।

पद्मनी को भुला दिया, दामिनी को भी भूल जाएंगे

एल आर गाँधी
 
केरल में कोच्ची की एक मस्जिद में 23 नवम्बर को, आतंकी अजमल कसाब जिसे 21 नवम्बर को फांसी पर लटका दिया गया था, के लिए नमाज़ पढ़ी गई। मस्जिद की प्रबंधक समिति ने कसाब के लिए नमाज़ पढने वाले इमाम को उसके पद से हटा दिया। ज़ाहिर है इमाम की इस करतूत को मस्जिद के प्रबंधकों ने राष्ट्र विरोधी माना और उसको इमाम के पद से हटा दिया। मगर केरल की कांग्रेस सरकार ने इस देशद्रोही इमाम के खिलाफ कोई कार्रवाही करना उचित नहीं समझा! करें भी कैसे? केंद्र की और राज्य की सेकुलर सरकारें तो आस्तीन में सांप पालने में वैसे ही माहिर हैं।

अभी अभी पिछले दिनों हमारे गृह मंत्री शिंदे जी महाराज ने तो मुंबई पर आतंकी हमले के  'आका ' हाफिज सईद को 'श्री' के अलंकार के साथ संबोधित कर अपनी चिर परिचित सेकुलर मानसिकता का परिचय दे ही दिया। हर मुस्लिम नाम के आगे श्री और पीछे जी लगाना कभी नहीं भूलते हमारे ये 'सेकुलर' हुक्मरान ..... भूलें भी कैसे ....वोट बैंक की दरकार जो है। हमारे दिग्गी मिया ने तो हद ही कर दी जब दुनिया के दुर्दांत आतंकी ओसामा बिन लादेन को देश के परम आदरणीय शब्द 'जी' से संबोधित तो किया ही और साथ ही अमेरिका द्वारा ओसामा को इस्लामिक रिवायत से  दफन न कर समुद्र में जल समाधि देने पर अपना 'आक्रोश' जताया। ऐसी ही कुछ राजनैतिक मजबूरिओं के चलते ही हमारे सेकुलर हुक्मरान 'मियाँ अफज़ल गुरु' को फांसी पर लटकाने से टालते आ रहे हैं।

दिल्ली के 'दामिनी' गैंग रेप कांड ने पूरे देश को झकझोंकर रख दिया। देश की राजधानी की सड़कों पर कैसे 'मौत के दरिन्दे' दनदनाते फिर रहे हैं। फिरें भी क्यों न, जब देश के जनतंत्र के मंदिर 'संसद' पर हमला करने वाले अफज़ल को 11 साल में उसके अंजाम तक नहीं पहुचाया गया। महिला होते हुए राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने 5 बलात्‍कारियों की मौत की सजा माफ़ कर दी। दामिनी कांड से आक्रोशित जनता के हजूम ने देश के भ्रष्ट राजनेताओ की नींद उड़ा दी।

मीडिया ने लोगों को 'दामिनी की शहादत को न भुलाने की 'कसमें' दिलाई और दिल्ली की शीला, मोहन, सोनिया ने भी लोगों से अनगिनत 'वायदे' कर डाले। कहते हैं की जनता की याददाश्त बहुत कमजोरर होती है, और वह नेता ही क्या जिसका वायदा वफ़ा हो जाए। दशक पूर्व दो शैतान बिल्ला रंगा ने संजय चोपड़ा और गीता चोपड़ा बहन भाई को फिरौती के लिए अगवा किया और मार दिया। दिल्ली की सड़कों पर सरकार के खिलाफ ऐसा ही जन आक्रोश उमड़ा  था। लोग भी भूल गए और उस वक्त भी राज नेताओं ने ढेर सारे वायदे किए थे। कहाँ वफा हुए अपहरण-फिरौती बलात्कार बदस्तूर ज़ारी हैं और बढ़ते ही जा रहे हैं।

कहते हैं जो कौमें इतिहास से कुछ सबक नहीं लेतीं। वे इतिहास के पन्नों में ही दफन हो जाती हैं। पद्मिनी के इतिहास को हमने भुला दिया और दामिनी को भी भूल जाएंगे।  अलाउदीन खीलजी से अपनी 'आबरू' की रक्षा के लिए चितौड़ की महारानी ने अपनी तमाम चितौड़ वीरांगनाओं सहित 'जौहर' को चुना। पद्मिनी के रूप पर पागल अलाउदीन जब महल में दाखिल हुआ तो देख कर अवाक रह गया। राज महल की सभी राजपूत वीरांगनाओं के जिस्म 'जौहर' की ज्वाला में धू धू जल रहे थे। अलाउदीन ने चितौड के सभी 'काफिरों' के सर कलम करने का हुकम दिया। 60000 निहत्‍थे निर्दोष हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया गया और हमारे ये सेकुलर शैतान खिल्ज़ीओं, बाबरों और औरंगजेबों की मजारों पर सजदे करते नहीं थकते।

''दामिनी'' को ''गूगल'' की श्रद्धांजलि

-: वाईआरएन सर्विस :-
 
खुद सदा के लिए सो कर पूरे हिन्‍दुस्‍तान को जगाने वाली अस्‍मरणीय दामिनी को पूरे हिन्‍दुस्‍तान ने ही नहीं बल्‍कि विश्‍व के सबसे बड़े सर्च इंजनों में शामिल गूगल ने भी मोमबत्‍ती जलाकर श्रद्धांजलि अर्पित की। गूगल होम पेज पर नजर आने वाली मोमबत्ती पर जैसे ही माऊस जाता है तो वहां पर ''इन मैमोरी ऑफ द दिल्‍ली ब्रेवहार्ट'' लिखा मिलता है।

पीड़िता के साथ 16 दिसंबर को एक चलती बस में 6 पुरुषों ने गैंग रेप करने के बाद उसे सड़क किनारे फेंक दिया था। और उसके बाद उसे सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया और बाद में इलाज के लिए सिंगापुर भेजा गया। वहां उसकी हालत लगातार बिगड़ती गई और गत शनिवार तड़के उसकी मौत हो गई।

इस घटना ने पूरे हिन्‍दुस्‍तान को महिलाओं के प्रति हो रहे अत्‍याचारों के खिलाफ एकसुर किया। इस आंदोलन ने केंद्र सरकार की जड़ों को पूरी तरह हिलाकर रख दिया। यह आजादी के बाद पहला ऐसा जनाक्रोश था, जिसका नेतृत्‍व किसी ने नहीं किया, बल्‍कि आम लोगों ने किया।

प्रधान मंत्री के नाम खुला पत्र

प्रिय मनमोहन सिंह। मैं देश का आम नागरिक हूं। मुझे ऐसा लगने लगा है कि अब देश पर चल रही साढ़े साती खत्‍म होने का वक्‍त आ गया है। आपको अब नैतिक तौर पर अपने पद से अस्‍तीफा दे देना चाहिए। बहुत मजाक हो चुका। अब और मत गिराओ प्रधान मंत्री पद की गरिमा को। तुम राष्‍ट्र संदेश के अंत में पूछते हो ठीक है, जबकि देश में कुछ भी ठीक नहीं। हर तरफ थू थू हो रही है। उस समय 'ठीक' शब्‍द बहुत ख़राब लगता है, जब देश के नागरिक ठीक करवाने के लिए सड़कों पर उतर कर दमन का सामना कर रहे हों।

प्रिय मनमोहन सिंह मैं जानता हूं, चाय में चायपत्‍ती की मात्र चीनी, पानी एवं दूध से कम होती है। मगर पूरा दोष चायपत्‍ती को दिया जाता है, अगर चाय अच्‍छी न हो। मैं जानता हूं, आपकी दशा उस चायपत्‍ती से ज्‍यादा नहीं, लेकिन अब बहुत हुआ, अब तो आपको सोनिया गांधी पद छोड़ने के लिए कहे चाहे न कहे, आपको अपना पद स्‍वयं जिम्‍मेदारी लेते हुए छोड़ा देना चाहिए, ये ही बेहतर होगा।

वरना पूरा देश उस समय सदमे में पहुंच जाएगा। जब सचिन की तरह आपके भी संयास की ख़बर एक दम से मीडिया में आएगी। सचिन के नाम तो बहुत सी अच्‍छी उपलब्‍िधयां हैं, लेकिन आप की सरकार के नाम तो भ्रष्‍टाचार एवं घोटालों के अलावा कोई बड़ी उपलब्‍धि नहीं। आप एक अच्‍छे अर्थ शास्‍त्री हैं। लेकिन मैं हैरान हूं कि तीन दिन लग गए, यह बताने में कि आपके तीन बेटियां हैं। आप से पहले गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी कुछ ऐसा ही बयान दिया था, मेरे दो बेटियां हैं। मैं सोचता हूं कि अगर इन दिनों देश की कामना हमारे विश्‍व प्रसिद्ध बिहारी ब्रांड लालू प्रसाद यादव के हाथ में होती तो इस बयान के लिए जनता को सात दिन इंतजार करना पड़ता, क्‍यूंकि उनके तो सात बेटियां हैं।

यकीनन सोनिया गांधी को अफसोस रहा होगा कि उनको मौका नहीं मिला अपनी इकलौती पुत्री के बारे में बताने का, क्‍यूंकि शिंदे जी पहले ही दो नम्‍बर को जग जाहिर कर चुके थे। वैसे देश को खुशी हुई यह जानकार कि अब आप अपने परिवार समेत घर में सलामत हैं।

इस बयान से कहीं मनमोहन सिंह जी आप ये तो कहना नहीं चाहते थे कि मेरे तीन बेटियां हैं, अगर वो सुरक्षित हैं, और आपकी बेटियां असुरक्षित हैं तो इसमें सरकार नहीं, बल्‍िक जनता का कसूर है या फिर जब आग हमारे घर आएगी तो देखेंगे। अगर आप दूसरे विकल्‍प को दर्शाने की बात करते हैं तो मैं आपको एक कविता सुनाना चाहूंगा, जो मार्टिन नेमोलर की एक विश्‍व प्रसिद्ध कविता 'फर्स्‍ट दे कम' का हिन्‍दी अनुवाद है, जो कुछ दिन पूर्व राजस्‍थान पत्रिका में प्रकाशित हुई थी ''पहले वे फूलनों के लिए आए, मैंने कुछ नहीं कहा, क्‍यूंकि मैं फूलन नहीं थी, फिर वे नैनाओं के लिए आए, मैंने कुछ नहीं कहा, क्‍यूंकि मैं नैना नहीं थी, फिर वे भंवरियों के लिए आए, मैंने कुछ नहीं कहा, क्‍यूंकि मैं भंवरी नहीं थी, उसके बाद वे मेरे लिए आए, और वहां मेरे लिए बोलने वाला कोई नहीं था।

अंत में मनमोहन सिंह जी आपको एक बार फिर नैतिक जिम्‍मेदारी का अहसास करवाते हुए अपना पद छोड़ने की सलाह दूंगा। वैसे एक और बात, महात्‍मा गांधी के नाम दर्ज एक कहावत को लोगों ने बहुत पहले आपके नाम दर्ज कर दिया था, जिसे लोग अब ऐसे कहते हैं, मजबूरी का नाम मनमोहन सिंह।

वैसे आज मैंने भी एक बद दुआ को जन्‍म दिया, कुछ यूं, अगर आप का किसी देश को बद दुआ देने का मन करे तो चुपके से कह दीजिए, तुम्‍हारे देश का प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह जैसा हो।

समाचार पत्रों में 'दिल्‍ली जनाक्रोश'

पूरा दिन हिन्‍दी इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया ने दिल्‍ली जनाक्रोश को कवरेज दी। इस जनाक्रोश को घरों तक पहुंचाया। वहीं अगले दिन सोमवार को कुछेक हिन्‍दी समाचार पत्रों ने दिल्‍ली जनाक्रोश को सामान्‍य तरीके से लिया, जबकि कुछेक ने जनाक्रोश को पूरी तरह उभारा। भारतीय मीडिया के अलावा दिल्‍ली जनाक्रोश पर हुए पुलिस एक्‍शन को विदेश मीडिया ने भी कवरेज दिया।

इंग्‍लेंड के गॉर्डियन ने अपने अंतर्राष्‍ट्रीय पृष्‍ठ पर 'वी वांट जस्‍टिस' एवं 'किल देम' जैसे शब्‍द लिखित तख्‍तियां पकड़ रोष प्रकट कर रही लड़कियों की फोटो के साथ, किस तरह पुलिस ने उनको खदेड़ने के लिए आंसू गैस एवं पानी की बौछारों का इस्‍तेमाल किया, समाचार प्रकाशित कर इंग्‍लेंड की जनता को भारतीय पुलिस रवैया से अवगत करवाया।

वहीं, न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स ने अपने डिजीटल संस्‍कार में दिल्‍ली जनाक्रोश की ख़बर को 'रोष प्रदर्शन हिंसा में बदला' के शीर्षक तले प्रकाशित किया। इस रिपोर्ट अंदर रविवार को हुए पूरे घटनाक्रम का बड़ी बारीकी से लिखा गया है। ख़बर में बताया गया कि किस तरह लोग दिल्‍ली में एकत्र हुए। किस तरह इस जनाक्रोश में राजनीतिक पार्टियों ने घुसना शुरू किया एवं किस तरह शक्‍ति बल के जरिए इस प्रदर्शन को दबाने की कोशिश की गई। उन्‍होंने पुलिस के प्रति रोष प्रकट करते हुए कुछ प्रदर्शनकारियों की बातों को भी विशेषता से प्रकाशित गया, जैसे के पुलिस से जनता का सवाल करना, आप जहां क्‍यूं नहीं आए, हमारे साथ क्‍यूं नहीं खड़े हुए एवं जो हुआ क्‍या आप से गुस्‍साए नहीं।

पाकिस्‍तान द डॉन तो निरंतर दिल्‍ली घटनाक्रम को प्रकाशित कर रहा है। कल बाद दोपहर से द डॉन ने इस ख़बर को अपने होमपेज पर नम्‍बर तीन पर रखा, जबकि मुख्‍य लीड में पाकिस्‍तान नेता की ख़बर थी, जिनकी एक बम्‍ब धमाके में मौत हो गई, जिनको कल पूरे रीति रिवाजों के साथ खाके सुपुर्द किया गया।

अगर भारतीय समाचार पत्रों की बात करें तो अमर उजाला ने सचिन की ख़बर को प्रमुखता से लिया, लेकिन अख़बार के पहले तीन कॉलम दिल्‍ली जनाक्रोश को दिए। वहीं राजस्‍थान पत्रिका ने सचिन की ख़बर को नम्‍बर दो पर रखते हुए दिल्‍ली जनाक्रोश की ख़बर को 'छावनी बना इंडिया गेट' शीर्षक के तले प्रमुखता से प्रकाशित किया।

कड़के की ठंड में उबलती रही दिल्‍ली के शीर्षक तले दैनिक जागरण ने इस घटनाक्रम से जुड़ी तमाम ख़बरों को प्रकाशित किया एवं अंत बॉटम में 'क्रिकेट के भगवान ने किया एकदिवसीय का परित्‍याग' से सचिन तेंदुलकर को भी स्‍पेस दिया।

वहीं, दैनिक हिन्‍दुस्‍तान ने एक भावुक करती छवि के साथ 'डंडे बरसे, बिगड़े हालत' ख़बर को प्रमुखता से प्रकाशित किया।

अंत मीडिया कवरेज पर राज्‍य सभा चैनल पर मीडिया मंथन में कई तरह के सवाल उठाए गए। इसमें कहा गया कि मीडिया ने जनाक्रोश को भड़काने का प्रयास किया। मीडिया भी कहीं न कहीं इस गुस्‍से की लय में बह गया। अंत कोई कुछ भी कहे। देश की सरकार को इस झटके की जरूरत थी। इस मीडिया ने जो जनाक्रोश को कवरेज दिया, वो काफी सराहनीय थे, वरना दिल्‍ली की क्ररूरता जो कैमरों के सामने भी कम न हुई, वो कैमरों से परे कितना कहर बरपाती, इसका अंदाजा लगाना बेहद मुश्‍किल है।

चलते चलते इतना कहूंगा। हमारी इज्‍जत गई, अब तो शर्म करो दिल्‍ली के हुक्‍मरानों।

तो मोदी का सिर मांग लेता मीडिया

सुषमा स्‍वराज  टि्वट के जरिए लोगों को संबोधित करते हुए कहती हैं, 'मैं आपकी भावनाओं को समझती हूं, आपके गुस्‍से का सत्‍कार करती हूं, हमें कुछ वक्‍त दें, हम बातचीत कर रहे हैं, जल्‍द ही किसी नतीजे पर पहुंचेंगे'। उधर, तस्‍लीमा नस्‍रीन  लिखती हैं, 'यह औरतों की सुरक्षा का सवाल नहीं, केवल औरतों के लिए नहीं, बल्‍कि मानव अधिकारों का सवाल है, हर किसी को इस मार्च में शामिल होना चाहिए'।

वहीं आजसमाज  ने टि्वट पर लिखा है कि अगर यह मसला गुजरात के अंदर बना होता तो मीडिया अब तक नरेंद्र मोदी का सिर मांग चुका होता, लेकिन अभी तक मीडिया एवं अन्‍य पार्टियों ने शीला दीक्षित से नैतिकता के तौर पर अस्‍तीफा देने जैसे सवाल नहीं उठाए।

वहीं कुछ मित्रों ने फेसबुक पर लिखा है कि लोगों का जनाक्रोश अब किसी दूसरी तरफ मोड़ खाता नजर आ रहा है, ऐसे में किसी अनहोनी के होने से पहले लोगों को सतर्क होते हुए वापिस जाना चाहिए।

वहीं, मीडिया के रुख पर गुस्‍साए अभिनेता परेश रावल अपने टि्वट पर लिखते हैं, ''ख़बर कमरे में बैठकर लोगों के गुस्‍से को गलत बताने वाले पत्रकारों को घटनास्‍थल पर जाकर आंसू गोलों, पानी की ठंडी बौछारों का सामना करना चाहिए, और फिर बताएं प्रदर्शनकारियों का गुस्‍सा गलत या सही।

'जनांदोलन' नहीं, 'जनाक्रोश'

राहुल गांधी, अब जनपथ से बाहर आइए। इंडिया गेट पर पहुंचकर, उस युवा पीढ़ी के साथ खड़े होने का दम दिखाईए। जिसको बार बार राजनीति में उतरे का आह्वान आप हर राजनीति रैली में कर रहे थे। इस बार पुलिस असफल हो रही है भीड़ को खदेड़ने में, क्‍यूंकि यह जनांदोलन नहीं, जनाक्रोश है। जो ज्‍वालामुखी की तरह एक दम से फूटता है, और पानी की बौछारें उस आग का कुछ नहीं बिगाड़ पाती, जो ज्‍वालामुखी से उत्‍पन्‍न होती है।

जो जनाक्रोश दिल्‍ली में अभी देखने को मिल रहा है। वो अब तक हुए जनांदोलनों से कई गुना ज्‍यादा आक्रामक है। वहां हर कोई पीड़ित है। वहां हर कोई सरकार से पूछना चाहता है आखिरी कब मिलेगी असली आजादी। लड़कियां तो लड़कियां इस जनाक्रोश में तो लड़के भी बहुसंख्‍या में शामिल नजर आ रहे हैं, जो कहीं न कहीं बदलते समाज की तस्‍वीर को उजागर करते हैं। ये वो युवा पीढ़ी है, जो आने वाले कल में देश को नई पनीरी देगी। जो आज दिल्‍ली में आक्रोशित हैं, वो कल अपने बच्‍चों को शायद एक अच्‍छा नागरिक बनाने में तो अपनी जी जान लगाएगी। वहीं, दूसरी तरफ उस अस्‍पताल के बाहर कुछ कानून की पढ़ाई कर रहे छात्र नुक्‍कड़ नाटक के प्रति लोगों को जागरूक करते नजर आए। कहीं न कहीं, हम को गंदे समाज का बहिष्‍कार करना होगा और एक अच्‍छे समाज की परिकल्‍पना एवं सृजना करनी होगी। आज जो लोग दिल्‍ली में जनाक्रोश से सरकार को जगाने का प्रयास कर रहे हैं, कल उन्‍हीं लोगों को वापिस लौट कर अपने आस पास के समाज को जगाना होगा, क्‍यूंकि इस रेप मामले में ऐसे भी देखने का आया है, इसमें शामिल कुछ ऐसे आरोपी हैं, जो पहली बार जुर्म की दुनिया में आए। इसके पीछे कहीं न कहीं हमारा समाज जिम्‍मेदार है, जो औरत को सिर्फ काम वासना की वस्‍तु मानता है।

बलात्‍कारियों के खिलाफ उठी आवाम में आक्रोश की लहर अब थमनी नहीं चाहिए। देश की सरकार शायद अब आक्रोश की भाषा समझने लगी है। असुरक्षित का भाव आज जनता को सरकार के सामने खींच लाया है। यह असुरक्षित का भाव जब नेताओं के मनों में पहुंचेगा, तब वो भी खुद को सुरक्षित करने के लिए जनता की तरफ ध्‍यान देंगे।

जनपथ की महारानी या उनका वजीर अभी तक जनाक्रोश को बिना आश्‍वासन के कुछ नहीं दे पाया। अगर जनपथ की महारानी एवं उनके वजीर समय रहते जनता की भावनाओं को समझते, तो शायद आज का जनाक्रोश देखने को न मिलता। शायद पहली बार ऐसा हुआ होगा, जब पुलिस के आंसू गोले, ठंडे पानी की बौछारें एवं लाठीचार्ज भी जनाक्रोश को खदेड़ नहीं पाया। इंडिया गेट पर बढ़ती लोगों भीड़ बलात्‍कार के दोषियों को सजा तो दिला देगी। मगर क्‍या हमारी सरकार इस जनाक्रोश से कुछ सीखकर पूरे देश के भीतर एक अच्‍छा कानून ला पाएगी, जो इस खौफनाक जुर्म के लिए एक कड़ी सजा देने का अधिकार कानून को दे सके।

दिल्‍ली की प्रशासक महिला, फिर महिला असुरक्षित!

दिल्‍ली गैंगरेप मामले ने उस तरह तुल पकड़ लिया, जिस तरह मुम्‍बई में हुए आतंकवादी हमले ने। भले ही इससे पहले भी गैंगरेप हुए थे, भले ही इससे पहले भी आतंकवादी हमले हुए थे। शायद किसी न किसी चीज की एक हद होती है, जब हद पार हो जाए तो उसका विनाश तय होता है।

दिल्‍ली गैंगरेप के बाद लोग सड़कों पर उतर आए, मगर दिल्ली की मुख्‍यमंत्री शीला दीक्षित कहती हैं, उनमें हिम्‍मत नहीं कि वो रेप पीड़िता से मिल सकें, लगातार तीन बार दिल्‍ली की जनता ने उनको मुख्‍यमंत्री बनाया। दिल्‍ली का प्रशासन एक महिला के हाथ में है, मगर हैरत की बात है कि दिल्‍ली को महिलाओं के लिए असुरक्षित माना जा रहा है। इससे पहले दिल्‍ली पर सुषमा स्‍वराज का राज रहा। निरंतर महिलाएं दिल्‍ली की सत्‍ता संभालें हुए हैं, मगर फिर भी दिल्‍ली सुरक्षित नहीं महिलाओं के लिए।

देश की सबसे बड़ी पार्टी को चलाने वाली सोनिया गांधी  दिल्‍ली में दस जनपथ पर रहती हैं। वहीं, सेक्‍सी शब्‍द को सुंदरता की संज्ञा देने वाली महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा  भी तो दिल्‍ली में बसती हैं। गैंग रेप मामले ने जैसे ही तुल पकड़ा तो सेक्‍सी शब्‍द की सुंदरता से तुलना करने वाली ममता शर्मा ने बलात्‍कारियों नपुंसक बना देना चाहिए ताकि वे अपने जीवन के हर दिन पर पछताएं, वाला बयान देकर अपनी जिम्‍मेदारी से पल्‍लू झाड़ लिया।

मुम्‍बई की ठुमके लगाने वाली जय बच्‍चन, ''संजय निरुपम के एक अदाकारा के संदर्भ में दिए बयान को मद्देनजर रखते हुए'' सांसद में गैंगरेप मामले को लेकर रो पड़ती हैं, मगर दिल्‍ली में बैठी हुई महिलाओं में हिम्‍मत नहीं कि वो पीड़िता के सामने जाकर उसका हाल चाल पूछ पाएं। शीला दीक्षित बयान देती हैं कि उनमें हिम्‍मत नहीं कि वो पीड़िता से मिल सकें, सवाल तो यह है कि अगर अस्‍पताल में पड़ी लड़की की जगह उनकी अपनी बेटी होती तो, क्‍या वो फिर भी उक्‍त बयान देती।

दिल्‍ली को चंडीगढ़ से सीख लेनी होगी। चंडीगढ़ पुलिस ने गैंग रेप एवं सार्वजनिक स्‍थलों पर होने वाली छेड़खानी को रोकने के लिए विशेष मुहिम चलाई है। चंडीगढ़ पुलिस ने कुछ महिला पुलिस कर्मचारियों को कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियों का रूप दे दिया एवं उनको उन जगहों पर भेजा, जहां से सर्वाधिक लड़कियां अपने कॉलेजों की तरफ जाती हैं। मनचलों को पता नहीं होता कि छात्राओं सी लगने वाली लड़कियां पुलिस कर्मचारी हैं, जैसे ही मनचले अपना मन बहलाने के लिए अपने शरारती हाथों को आगे बढ़ाते हैं, पीछे कैमरे में कैच कर रहे अन्‍य पुरुष पुलिस कर्मचारी मनचलों को दबोच लेते हैं।

जब ऐसे शरारती तत्‍वों को हम सार्वजनिक स्‍थलों पर पकड़ेंगे एवं उनकी वहीं पर सार्वजनिक तौर पर इज्‍जत उतारेंगे तो कहीं न कहीं इससे समाज में सकारात्‍मक संकेत मिलेंगे। इससे पूर्व बठिंडा में तैनात एक पुलिस कर्मचारी सुबह सुबह बस स्‍टेंडों पर पहुंच जाता था, वो देखता लड़के वहां किस तरह से लड़कियों के साथ व्‍यवहार करते हैं, बस संदिग्‍ध युवाओं की घटनास्‍थल पर धुलाई कर देता। उसके नाम का डर पूरे शहर में फैल गया। दुनिया किसी बात से डरे न डरे, लेकिन डर के आगे भूत भी नाचते हैं।

डर पैदा करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे, नहीं तो पुलिस लाठीचार्ज, पानी की बौछारें एवं गैसी गोले लोगों के बढ़ते आक्रोश को कभी नहीं रोक पाएंगे। आक्रोश का दमन हमेशा असफल सिद्ध होता है। विश्‍व प्रसिद्ध लेखिका तस्‍लीम नसरीन  लिखती हैं, भारतीय महिला सदियों से जुल्‍म को सहती आ रही है। अंत वो गुस्‍से हुई एवं सड़कों पर उतरी। मुम्‍बई से एक फिल्‍मी अदाकार डेजी ईरानी कहती हैं, बलात्‍कारियों को मारो नहीं, नपुंसक बनाकर छोड़ दो।