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सरदार पटेल की बिखरती भारतमाला

सरदार पटेल, एक लौह पुरुष। जिसने बिखरते हुए भारत को एक लड़ी में पिरोने का कार्य किया था। जब भारत को आजाद करने का फैसला अंग्रेजों ने लिया तो भारतीय नेतृत्व के आगे सबसे बड़ी चुनौती थी, देश के बिखराव को रोकना, क्यूंकि अंग्रेजों ने राजा महाराजाओं को वे सब अधिकार वापस कर दिए थे, जो उनके पास अंग्रेजों के आने से पूर्व थे। अब राजे महराजे अपनी मनमर्जी मुताबिक फैसला ले सकते थे। अब राजे महाराजाओं पर निर्भर था, वे भारत का हिस्सा बनें या ना। भारत आजाद होने की कगार पर था, लेकिन समस्याओं का एक पहाड़ उसके सामने खड़ा था, जिस पर पार पाना जरूरी था। ऐसे में भारत के अंतिम वायसराय माउंटबेटन के साथ मिलकर वल्लभभाई पटेल ने एक योजना बनाई, जो भारत को एक डोरी में पिरोने की थी। देश की पांच सौ से अधिक रियासतों का भारत में विलय करना आसान काम नहीं था, जब जिन्ना जैसा व्यक्ति अलग देश की मांग लिए खड़ा हो। ऐसे में सरदार पटेल ने एक लौह पुरुष की भूमिका निभाई, आज जो भारत हमारे सामने है। उसमें बहुत बड़ा योगदान लौह पुरुष सरदार पटेल का है। अगर पटेल न होते तो शायद जोधपुर रियासत आज पाकिस्तान का हिस्सा होती, देश के कई हिस्से अलग देश के रूप में जाने जाते, जिनमें हैदराबाद के निजामों के क्षेत्र भी शामिल होते, जिनको आज एक आंध्र पदेश व अन्य राज्यों के नाम से जाना जाता है।

आज तेलंगाना आंध्र प्रदेश से अलग होने की प्रक्रिया में है। एक समय था जब हैदराबाद में तेलंगाना को मिलाकर राजशाही को खत्म किया गया था, इसके बाद तेलंगाना को आंध्र प्रदेश में मिला दिया गया। इस क्षेत्र को अलग राज्य के रूप में स्थापित करने के लिए कई दशकों से संघर्ष चल रहा है। इंदिरा गांधी ने इस राज्य के लोगों को टिकाए रखने के लिए कई हाथकंडे अपनाए, जिनमें पीवी नरसिमा राव को मुख्यमंत्री बना तक शामिल है, क्यूंकि वे इस क्षेत्र से आते थे। शायद यह मांग किसी कोने में दबकर भी रह जाती, मगर स्वार्थी नेताओं को सत्ता हासिल करने के लिए कुछ तो चाहिए होता है, ऐसे में चाहे एक राज्य के दो टुकड़े करने पड़े तो भी क्या फर्क पड़ता है। तेलंगाना की मांग को अगर पूर्ण रूप से स्वीकृति मिलती है तो भारत के अंदर और दर्जन भर नये राज्य सामने आ सकते हैं।

यह फैसले वे राजनीतिक पाॢटयां कर रही हैं, जो सरदार पटेल को अपना आदर्श मानती हैं। जो महात्मा गांधी का गुनगान गाती हैं। जिनको भारत को टुकड़े टुकड़े होने से बचाया था। मुश्किल यह नहीं कि भारत छोटे छोटे राज्यों में बंट रहा है, मुश्किल तो यह है कि ऐसे छोटे छोटे राज्यों के अस्तित्व में आने से भारत के केंद्र में बैठने वाली सरकार का हश्र क्या होगा। सवाल उठता है कि आने वाले समय में केंद्र में आने वाली सरकार छोटे छोटे दलों से सहयोग लेकर बनेगी, एक दल ने हाथ खींचता तो सरकार गई, और फिर चुनाव।

जिस प्रकार क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा बढ़ रहा है। वैसे वैसे देश के लिए मुश्किलें बढ़ रही हैं। केंद्र सरकार को कुछ कड़े फैसले लेने लिए कुछ अंदर खाते बड़े बड़े समझौते करने पड़ते हैं। जैसे कि पिछले दिनों एक बात सामने आई थी, सपा ने कहा था, खा-द्य सुरक्षा बिल पर हमारी सहमति चाहिए तो सीबीआई की जांच को हटाइए। सपा के अध्यक्ष मुलायम सिंह के खिलाफ चल रही सीबीआई जांच तीन से चार पर उलट पुलट हो चुकी है, जिससे स्पष्ट होता है कि किस तरह छोटे दल बड़ी पार्टी से सौदेबाजी करते हैं। बात उत्तर प्रदेश की करें तो पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का कहना है कि यूपी को चार हिस्सों में विभाजित किया जाए, मतलब यूपी को चार राज्यों में बांटा जाए। वहीं, पश्चिमी बंगाल में गोरखालैंड बनाने की मांग जोर पकड़ रही है। पिछले दिनों इस मांग के चलते गोरखालैंड जन मुक्ति मोर्चा की ओर से बंद का ऐलान किया गया था। महाराष्ट्र में विदर्भ की मांग सिर ऊंचा कर रही है। महाराष्ट्र का यह वे क्षेत्र है, जहां पर किसानों की हालत बेहद $खराब है और यहां पर किसानों के आत्महत्या करने के मामले आए दिन सामने आते हैं। महाराष्ट्र से सटे गुजरात में भी सौराष्ट्र को अलग राज्य बनाने की मांग है, लेकिन कोई ठोस नेतृत्व नहीं होने के कारण मांग को बल नहीं मिल पा रहा है। तेलंगाना के साथ लगता रायलसीमा भी एक अलग राज्य का सपना देख रहा है, जिसको फिलहाल तेलंगाना में शुमार किया जा रहा है। ऐसे और भी कई छोटे छोटे क्षेत्र हैं, जो राज्य के रूप में स्थापित होना चाहते हैं, चाहे वे जम्मू कश्मीर का लद्दाख क्षेत्र हो। राजस्थान का मरु प्रदेश, मध्यप्रदेश में बुदेलखंड आदि।