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पैट्रोल है, रुपया नहीं, ओनियन है, रुपया नहीं

डॉलर के मुकाबले गिरते रुपये को लेकर भारत सरकार का पता नहीं क्‍या रवैया है या भविष्‍य में होगा, लेकिन चीन पब्‍लिक पेशाबघरों में गिरते पेशाब से पूरी तरह दुखी है। अब इसके हल के लिए चीन के एक शहरी प्रबंधन विभाग ने एक नया नियम बनाया है।  पेशाब करने के लिए लगाए स्‍टैंडिंग बाउल से अगर आपका पेशाब बाहर गिरा तो चीन के हांगकांग से सटे सेनजेन शहर में आपको 16 डॉलर तक का दंड किया जाएगा। भले ही इस आदेश के बाद चीनी लोगों ने अपने नेटवर्किंग साइट पर इस नियम को लेकर खूब मजाक उठाया, यहां तक लिख दिया गया, अब नये इंस्‍पेक्‍टर भर्ती किए जाएंगे, जो हर पेशाब करने वाले के पीछे खड़े होकर लाइनमेंट चेक करेंगे। मजाक और असल जिन्‍दगी में फर्क होता है, यकीनन पेशाबघरों की हालत सुधरेगी, भले भारतीय रुपये की हालत सुधरने में वक्‍त लगे। गिरने से याद आया, कल बापू आसाराम का नाम भी उस गोलक में गिर गया, जिसमें पहले से कई बाबाओं के नाम गिर चुके हैं। इस गोलक को रेप आरोप बॉक्‍स कहते हैं। बाबागिरी का जीवन स्‍तर ऐशो  आराम वाला हो रहा है तो अध्‍यात्‍मिक स्‍तर गिर रहा है। अब ए सी कमरे हैं, नीचे मखमल के गद्दे हैं, ऊपरी रेश्‍म की ओढ़नी है, ऐसे में अकेले मन कैसे लगे, और सुविधाओं की जरूरत महसूस होने लगी है। जय हो मेरे गांव वाले बाबा की, जो महिलाओं को अपने डेरे के आस पास आने तक नहीं देता था, और इस गोलक से बच गया। बाबाओं का स्‍तर गिर रहा है, देश के नेताओं का स्‍तर तो आजादी के बाद से निरंतर रसतल से भी नीचे जा रहा है। रुयपे डॉलर के मुकाबले ही नहीं, प्‍याज, पैट्रोल, चीनी, अन्‍य वस्‍तुओं के मुकाबले भी तो कमजोर पड़ रहा है। मेरे पिता बताते हैं, वैसे तो सबके बताते होंगे, हम मेले में जाते थे, केवल बारह आने में ढे़र सारे पकौड़े लेकर आते थे, आज मेले में नहीं जाते, क्‍यूंकि अब आने ही नहीं, रुपया भी फेल हो रहा है।

इन दिनों एक गोरा, एक पैट्रोल पर पंप गया, वहां खड़े कर्मचारी को डॉलर देते हुए कहा, डालो पैट्रोल, उसने मशीन चलाई, थोड़े से टाइम बाद  गड़ गड़ की आवाज आना बंद हो गई, एक लीटर पूरा नहीं हुआ था, तो गोरे ने कहा, यह क्‍या, यह डॉलर है, रुपया नहीं, तो सामने पैट्रोल पंप कर्मचारी ने कहा, साहेब यह पैट्रोल है, रुपया नहीं।

जब वक्‍त खराब हो, हर जगह से मात पड़ती है, अब गोरा थोड़ा सा आगे गया, प्‍याजों की रेहड़ी खड़ी थी, लाल लाल चमकते प्‍याज, उसको भा गए, सोचा खरीद लेता हूं, रेहड़ी वाले के पास गया, डॉलर दिया, और बोला प्‍याज दे दो, प्‍याज वाले ने प्‍याज तोलकर गोरे के हाथ में थमा दिए, गोरा खड़ा रहा है, तो प्‍याज वाले ने पूछा साहेब, कुछ और चाहिए, गोरा बोला नहीं, बाकी के पैसे चाहिए, तो रेहड़ी वाले ने कहा, हो गया पूरा हो गया साहेब, गोरे ने फिर कहा, यह रुपया नहीं डॉलर है, तो सामने रेहड़ी ने कहा, मुझे पता है, लेकिन आपको पता नहीं, यह ओनियन है, रुपया नहीं। अंग्रेज निराश होकर चल दिया। चलो कोई तो है जो डॉलर को नीचा दिखा रहा है, वरना रुपये तो रसतल की तरफ जा रहा है।

इसके लिए कौन जिम्‍मेदार है। यकीनन पहली नजर में तो सरकार। जिस पर विपक्ष निशाने लगाए जा रहा है। देश की सौ करोड़ से अधिक आबादी इसके लिए जिम्‍मेदार नहीं, क्‍यूंकि अगर सौ करोड़ की आबादी वाला देश एक अच्‍छा एजुकेशन सिस्‍टम पैदा नहीं कर सकता तो बच्‍चों को पढ़ने के लिए मजबूर विदेश जाना होगा, यहां का पैसा वहां के एजुकेशन सेक्‍टरों की ग्रोथ के लिए खर्च करना होगा। देश की खूबसूरत जगहाएं जब दंगों की आग में झुलसने, कुदरती मुसीबतों के कारण खराब होने लगेंगी तो फिल्‍म शूटिंग के लिए फिल्‍म इंडस्‍ट्री को विदेश का रुख करना होगा। अब भारतीय हिल स्‍टेशन, जंगल या शिमला, कश्‍मीर, फिल्‍मों में नजर नहीं आते। अगर आज की युवा विदेश ब्रांड को प्‍यार करने लगी, तो दोष सरकार का है, युवा पीढ़ी का नहीं, क्‍यूंकि वे तो विश्‍व स्‍तरीय लुक चाहती है, अगर देश की सरकार देश में गुणवत्‍ता बरकरार रखने में चूकती है तो कोई इस पीढ़ी को दोष कैसे दे सकता है। गोगल्‍स, टी शर्ट, जूते, कारें सब विदेशी ब्रांड पसंद हैं। ऐसे में डॉलर की मांग बढ़ेगी, जब डॉलर की मांग बढ़ेगी तो अर्थशास्‍त्र कहता है कि बाजार में जिस की मांग बढ़ी, उसके रेट चढ़े। भले ही देश का प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक अच्‍छा अर्थशास्‍त्री है, लेकिन इस मोर्चे पर वे सामाज शास्‍त्री के तौर भी नजर नहीं आते।

देश में हर साल लाखों वाहन सड़कों पर उतर रहे हैं। पैट्रोल की खपत बढ़ रही है। पैट्रोल की खपत बढ़ेगी तो यकीनन भारत को पैट्रोल अधिक मंगवा पड़ेगा। इरान भले ही भारत के साथ भारतीय करंसी में डील करने के लिए सहमति जता चुका है, जब तक यह फैसला पक्‍का नहीं होता, तब तक डॉलर में से होकर रुपये को गुजरना होगा, और यह गुजरना भारत की धज्‍जियां उड़ा रहा है। ऐसा नहीं कि पैट्रोल की बढ़ती खपत के लिए देश के नागरिक जिम्‍मेदार हैं, वे तो बेचारे अपने पैसे को वाहनों पर खर्च कर रहे हैं, ताकि देश को रैवेन्‍यु मिल सके, देश के अंदर वाहनों का कारोबार करने वाली कंपनियों को मजबूती मिल सके, अगर सरकार चाहे तो पब्‍िलक ट्रांसपोर्ट को मजबूत बना सकती है। टोकियो जैसा भारी जनसंख्‍या वाला शहर अगर ट्रैफिक समस्‍या से उलझता नहीं तो कारण है कि वहां पर पब्‍लिक ट्रांसपोर्ट बेहद बेहतरीन है। लोग पब्‍लिक ट्रांसपोर्ट में जाना पसंद करते हैं, पर्सनल गाड़ी लेकर जाने की बजाय। मगर भारत में पर्सनल गाड़ी पर ज्‍यादा विश्‍वास है, क्‍यूंकि पब्‍लिक ट्रांसपोर्ट, मतलब सरकारी, और सरकारी शब्‍द भारतीयों को एक ही जगह अच्‍छा लगता है, केवल नौकरियों में, दूसरी जगह कहीं नहीं, क्‍यूंकि सरकारी नौकरी, चिंताओं से मुक्‍त। बारिश आये, तूफान आये, मंदी का दौर आए, लेकिन कभी वेतन नहीं रुकेगा, रुका तो ब्‍याज समेत आयेगा।

रुपये के गिरते स्‍तर से परेशान देश। जिम्‍मेदार सरकार। जो रुपया देशी प्‍याज के सामने कमजोर हो सकता है, वे डॉलर के आगे सिर कैसे उठाएगा। जिस देश में बाबा रासलीला रचाते हों, वहां पर नेताओं पर रासलीला को लेकर उंगली उठाना, मूर्खता होगी, क्‍यूंकि राजाओं के समय से विलासता शासन करने वालों का जन्‍म सिद्ध अधिकार रही है। डॉलर की औकत, प्‍याज, और पैट्रोल के सामने कुछ नहीं। थोड़ा सा अभियान हम भी कर सकते हैं।