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क्‍या मैं अपने प्रति ईमानदार हूं?


'जॉन सी मैक्‍सवेल' की किताब 'डेवल्‍पिंग द लीडर विदिन यू' के हिन्‍दी संस्‍करण 'अपने भीतर छुपे लीडर को कैसे जगाएं' में प्रकाशित एडगर गेस्‍ट की कविता 'क्‍या मैं अपने प्रति ईमानदार हूं?' बहुत कुछ कहती है, मेरे हिसाब से अगर इस कविता का अनुसरण किया जाए तो जीवन स्‍वर्ग से कम तो नहीं होगा, और अंतिम समय जीवन छोड़ते वक्‍त किसी बात का अफसोस भी नहीं होगा, जबकि ज्‍यादातर लोग अंतिम सांस अफसोस के साथ लेते हुए दुनिया को अलविदा कहते हैं।

क्‍या मैं अपने प्रति ईमानदार हूं ?

मुझे अपने साथ रहना है, और इसलिए
मैं इस लायक बनना चाहता हूं कि खुद को जानूं
गुजरते वक्‍त के साथ मैं चाहता हूं
हमेशा अपनी आंखों में आंखें डालकर देखना
मैं नहीं चाहता डूबते सूरज के साथ खड़े रहना
और अपने किए कामों के लिए खुद से नफरत करना
मैं अपनी अलमारी में रखना नहीं चाहता
अपने बारे में बहुत से रहस्‍य
और आते जाते यह सोचने की मूर्खता नहीं करना चाहता
कि मैं सचमुच किस तरह का आदमी हूं
मैं छल की पोशाक नहीं पहनना चाहता
मैं सिर उठाकर बाहर जाना चाहता हूं
परंतु दौलत और शोहरत के इस संघर्ष में
मैं चाहता हूं कि खुद को पसंद करूं
मैं खुद की तरफ देखकर यह नहीं सोचना चाहता
कि मैं शोखीबाज हूं, झूठा हूं और खोखला नाटक कर रहा हूं
मैं खुद की निगाह से कभी नहीं छुप सकता
मैं वह देखता हूं जो दूसरे कभी नहीं देख सकते
मैं वह जानता हूं जो दूसरे कभी नहीं जान सकते
मैं कभी अपने आपको मूर्ख नहीं बना सकता, और इसलिए
चाहे जो हो, मैं बनना चाहता हूं
आत्‍मसम्‍मान से पूर्ण और मुक्‍त अंतरात्‍मा वाला।

और चलते चलते इतना ही कहूंगा कि
जब धन नष्‍ट होता है तो कुछ नष्‍ट नहीं होता, जब स्‍वास्‍थ्‍य नष्‍ट होता है तो थोड़ा सा नष्‍ट होता है, जब चरित्र नष्‍ट होता है तो सब कुछ नष्‍ट हो जाता है।