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"हारने के लिए पैदा हुआ हूं"

नॉर्मन विन्‍सेंट पील अपनी पुस्‍तक "पॉवर आफ द प्‍लस फेक्‍टर" में एक कहानी बताते हैं, "हांगकांग में काउलून की घुमावदार छोटी सड़कों पर चलते समय एक बार मुझे एक टैटू स्‍टूडियो दिखा। टैटुओं के कुछ सैंपल खिड़की में भी रखे हुए थे। आप अपनी बांह या सीने पर एंकर या झंडा या जलपरी या ऐसी ही बहुत सी चीजों के टैटू लगा सकते थे, परंतु मुझे सबसे ज्‍यादा अजीब बात यह लगी कि वहां पर एक टैटू था, जिस पर छह शब्‍द लिखे हुए थे, "हारने के लिए पैदा हुआ हूं"। अपने शरीर पर टैटू करवाने के लिए यह भयानक शब्‍द थे। हैरानी की स्‍िथति में मैं दुकान में घुसा और इन शब्‍दों की तरफ इशारा करके मैंने टैटू बनाने वाले चीनी डिजाइनर से पूछा क्‍या कोई सचमुच इस भयानक वाक्‍य हारने के लिए पैदा हुआ हूं वाले टैटू को अपने शरीर पर लगाता है? उसने जवाब दिया, हां कई बार

मैंने कहा, परंतु मुझे यकीन नहीं होता कि जिसका दिमाग सही होगा वह ऐसा करेगा।

चीनी व्‍यक्‍ित ने अपने माथे को थपथपाया और टूटी फूटी इंग्‍लिश में कहा, शरीर पर टैटू से पहले दिमाग में टैटू होता है।

लेखक इस कहानी के मार्फत कहना चाहता है, जो हम को मिलता है, वो हमारे नजरिए की देन होता है, क्‍योंकि दुनिया में जितनी भी चीजों का अविष्‍कार हुआ, उन्‍होंने सबसे पहले आदम के दिमाग में जन्‍म लिया। इसलिए हमेशा सकारात्‍मक सोच रखो, तो सकारात्‍मक नतीजे मिलेंगे।

साभार :  जॉन सी मैक्‍सवेल की किताब "अपने भीतर छुपे लीडर को कैसे जगाएं"।

जीवन खत्‍म हुआ तो जीने का ढंग आया

जीवन खत्‍म हुआ तो जीने का ढंग आया 
 शमा बुझ गई जब महफिल में रंग आया,
मन की मशीनरी ने सब ठीक चलना सीखा, 
बूढ़े तन के हरेक पुर्जे में जंग आया, 
फुर्सत के वक्‍त में न सिमरन का वक्‍त निकाला, 
उस वक्‍त वक्‍त मांगा जब वक्‍त तंग आया, 
जीवन खत्‍म हुआ तो जीने का ढंग आया। 
जैन मुनि तरूणसागर जी की किताब से