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उंगली उठाने से पहले जरा सोचे

बुधवार को स्थानीय फायर बिग्रेड चौंक पर समाज सेवी संस्थाओं की ओर से हिन्दुस्तानी भ्रष्टाचार के खिलाफ जागरूकता रैली का आयोजन किया गया, जिसमें मैं भी शामिल हुआ। हाथों में जागरूकता फैलाने वाले बैनर पकड़े हम सब सडक़ के एक किनारे खड़े थे, और उन बैनरों पर जो लिखा था, वह आते जाते राहगीर तिरछी नजरों से पढ़कर अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे। इतने में मेरे पास खड़े एक व्यक्‍ति की निगाह सामने दीवार पर लटक रहे धार्मिक संस्था के एक फलेक्‍स पर पड़ी, जिस पर लिखा हुआ था, हम बदलेंगे युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा, उन्होंने मेरा ध्यान उस तरफ खींचते हुए कहा कि वह शब्‍द बहुत कम हैं, लेकिन बहुत कुछ कहते हैं। अपने लेखन से सागर में गागर तो कई लेखकों ने भर दिया, लेकिन हमारा जेहन उनको याद कितनी देर रखता है, अहम बात तो यह है। हमारे हाथों में पकड़े हुए बैनरों पर लिखे नारों की अंतिम पंक्‍ति भी कुछ यूं ही बयान करती है, न रिश्वत लें, न रिश्वत दें की कसम उठाएं, जो बैनर तैयार करते समय मेरे दिमाग से अचानक निकली थी। किसी पर उंगली उठानी, सडक़ों पर निकल कर प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करनी हमारी आदत में शुमार सा हो गया था, लेकिन हम क्‍यों नहीं सोचते के जब हम किसी पर उंगली उठाते हैं तो तीन उंगलियां हमारी तरफ होती हैं, जो हमको याद करवाती हैं कि कुछ दोष तो हमारा भी है, सारा दोष सरकारी सिस्टम का नहीं। हम सिस्टम का बहुत बड़ा हिस्सा हैं, अगर हम सिस्टम को बरकरार रखते हैं, तो ही सिस्टम ठीक रह सकता है, क्‍योंकि सिस्टम बनाने वाले मुट्‌ठी भर लोग हैं, लेकिन उसको संभालकर रखने वाले व बिगाडऩे वाले करोड़ों में हैं। अगर हम रिश्वत देते हैं, तो सामने वाला रिश्वत लेता है। हम अगर नशा पैदा करते हैं, तो हमीं से कुञ्छ लोग बेचते हैं, कुछ लोग खाते हैं। गलियों में सीवरेज का पानी फैल जाता है, तो लोग सडक़ों पर उतर आते हैं, नगर पालिकाओं, नगर निगमों व सरकारों के खिलाफ नारेबाजी करते हैं। लेकिन नारेबाजी करने से पूर्व वह एक दफा भी नहीं सोचते हैं कि आखिर नालियां व सीवरेज बंद क्‍यों होते हैं। प्लास्टिक के लिफाफे इस्तेमाल करने के बाद हम कहां फेंकते हैं? कभी सोचा है! वह लिफाफे ही सीवरेज व्यवस्था को प्रभावित कर देते हैं। जरा सोचो, सीवरेज व्यवस्था प्रभावित होने से हम इतने क्रोधित हो जाते हैं तो जिस तरह भूमि में प्लास्टिक दिन प्रति दिन फेंके जा रहे हैं, एक दिन धरती की सोखने की क्षमता खत्म हो जाएगी, तब क्‍या होगा, किसके खिलाफ नारेबाजी करेंगे। सिस्टम केञ् खिलाफ, कौन से सिस्टम के खिलाफ, जो हम से बनता है, जिसका हम हिस्सा हैं। बेहतर होगा, धार्मिक बोर्ड पर लिखी पंक्‍तियों का अनुसरण करें, जिसमें लिखा था, हम बदलेंगे युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा।

शहीदे आजम व उसकी छवि

जब दिल्ली में बैठे हुक्मरान कहते हैं कि शहीदे आजम भगत सिंह हिंसक सोच के व्यक्ति थे, तो भगत सिंह को चाहने वाले, उनको आदर्श मानने वाले लोग दिल्ली के शासकों कोसने लगते हैं, लेकिन क्या यह सत्य नहीं कि शहीदेआजम की छवि को उनके चाहने वाले ही बिगाड़ रहे हैं।

अभी कल की ही बात है, एक स्कूटर की स्पिटनी वाली जगह पर लगे एक टूल बॉक्स पर भगत सिंह की तस्वीर देखी, जो भगत सिंह के हिंसक होने का सबूत दे रही थी। यह तस्वीर हिन्दी फिल्म अभिनेता सन्नी दिओल के माफिक हाथ में पिस्टल थामे भगत सिंह को प्रदर्शित कर रही थी। इस तस्वीर में भगत सिंह को निशाना साधते हुए दिखाया गया, जबकि इससे पहले शहर में ऐसी तमाम तस्वीरें आपने देखी होंगी, जिसमें भगत सिंह एक अधखुले दरवाजे में पिस्टल लिए खड़ा है, जो शहीदे आजम की उदारवादी सोच पर सवालिया निशान लगती है। जब महात्मा गांधी जैसी शख्सियत भगत सिंह जैसे देश भगत पर उंगली उठाती है तो कुछ सामाजिक तत्व हिंसक हो उठते हैं, तलवारें खींच लेते हैं, लेकिन उनकी निगाह में यह तस्वीर क्यों नहीं आती, जो भगत सिंह की छवि को उग्र साबित करने के लिए शहर में आम वाहनों पर लगी देखी जा सकती हैं।

यहां तक मुझे याद है, या मेरा अल्प ज्ञान कहता है, शायद भगत सिंह ने अपने साथियों के साथ मिलकर केवल सांडरस को उड़ाया था, वो भी शहीद लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए, इसके अलावा किसी और हत्याकांड में भगत सिंह का नाम नहीं आया। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर फिर भगत सिंह की ऐसी ही छवि क्यों बनाई जा रही है, जो नौजवानों को हिंसक रास्ते की ओर चलने का इशारा कर रही हो। ऐसी तस्वीरें क्यों नहीं बाजार में उतारी जाती, जिसमें भगत सिंह को कोई किताब पढ़ते हुए दिखाया जाए। उसको एक लक्ष्य को हासिल करने वाले उस नौजवान के रूप में पेश किया जाए, जो अपने देश को गोरों से मुक्त करवाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा चुका है। भगत सिंह ने हिंसक एक बार की थी, लेकिन उसका ज्यादातर जीवन किताबें पढ़ने में गुजरा है। भगत सिंह किताबें पढ़ने का इतना बड़ा दीवाना था कि वो किताब यहां देखता वहीं से किताब कुछ समय के लिए पढ़ने हेतु ले जाता था। जब भगत सिंह को फांसी लगने वाली थी, तब भी वो किसी रूसी लेखक की किताब पढ़ने में व्यस्त थे, भगत सिंह की जीवनी लिखने वाले ज्यादातर लेखकों का यही कहना है।

फिर भी न जाने क्यों पंजाब में भगत सिंह की उग्र व हिंसक सोच वाली तस्वीरों को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। पंजाब अपने बहादुर सूरवीरों व मेहमाननिवाजी के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है, लेकिन कुछ कथित उग्र सोच के लोगों के कारण पंजाब की साफ सुथरी छवि को ठेस लगी है, हैरत की बात तो यह कि बाहरी दुश्मनों को छठी का दूध याद करवाने वाला पंजाब अपने ही मुल्क में ब्लैकलिस्टड है, जिसके बारे में यहां के गृहमंत्री को भी पता नहीं।

हमारी राज्य सरकार, पानी की रॉल्यटी को लेकर पड़ोसी राज्यों से तू तू मैं मैं कर रही है, लेकिन वो भी उस पानी के लिए जो कुदरत की देन है, जिसमें पंजाब सरकार का कुछ भी योगदान नहीं, ताकि आने वाले चुनावों में लोगों को एक बार फिर से मूर्ख बनाया जाए कि हमारा पानी के मुद्दे पर संघर्ष जारी है। यह सरकार पंजाब को खुशहाल, बेरोजगारी व भुखमरी मुक्त राज्य क्यों नहीं बनाने की तरफ ध्यान दे रही, कल तक बिहार को सबसे निकम्मा राज्य गिना जाता था, लेकिन वहां हो रहा विकास बिहार की छवि को राष्ट्रीय स्तर पर सुधार रहा है, मगर पंजाब सरकार राज्य पर लगे ब्लैकलिस्टड के धब्बे को हटाने के लिए यत्न नहीं कर रही, यह धब्बा भगत सिंह पर लगे हिंसक सोच के व्यक्तित्व के धब्बे जैसा है, जिसको सुधारना हमारे बस में है। जितना क्रांतिकारी साहित्य भगत सिंह ने पढ़ा था, उतने के बारे में तो उनके प्रशंसकों ने सुना भी नहीं होगा। शर्म से सिर झुक जाता है, जब भगत सिंह की हिंसक तस्वीर देखता हूं, जिसमें उसके हाथ में पिस्टल थमाया होता है। चित्रकारों व अन्य ग्राफिक की दुनिया से जुड़े लोगों से निवेदन है कि भगत सिंह की उस तस्वीर की समीक्षा कर देखे व उस तस्वीर को गौर से देखें, जिसमें वो लाहौर जेल के प्रांगण में एक खटिया पर बैठा है, एक सादे कपड़ों में बैठे हवलदार को कुछ बता रहा है, क्या उसके चेहरे पर कहीं हिंसा का नामोनिशान नजर आता है। अगर भगत सिंह हिंसक सोच का होता तो दिल्ली की असंबली में बम्ब फेंककर वो धुआं नहीं फैलाता, बल्कि लाशों के ढेर लगाता, लेकिन भगत सिंह का एक ही मकसद था, देश की आजादी, सोए हुए लोगों को जगाना, लेकिन मुझे लगता है कि सोए हुए लोगों को जगाना समझ में आता है, लेकिन उन लोगों को जगाना मुश्किल है, जो सोने का बहाना कर रहे हैं, उस कबूतर की तरह जो बिल्ली को देखकर आंखें बंद कर लेते है, और सोचता है कि बिल्ली चली गई।
भगत सिंह जैसे शहीदों ने देश को गोरों से तो आजाद करवा दिया, लेकिन गुलाम होने की फिदरत से आजाद नहीं करवा सके। भगत सिंह जैसे सूरवीरों ने अपनी कुर्बानी राष्ट्र के लिए दी, ना कि किसी क्षेत्र, भाषा व एक विशेष वर्ग के लिए, लेकिन सीमित सोच के लोग, उनको अपना कहकर उनका दायरा सीमित कर देते हैं, जबकि भगत सिंह जैसे लोग यूनीवर्सल होते हैं। भगत सिंह की बिगड़ती छवि को बचाने के लिए वो संस्थाएं आगे आएं, जो भगत सिंह पर होने वाली टिप्पणी को लेकर मारने काटने पर उतारू हो जाती हैं।

हल स्थाई हो, अस्थाई नहीं

कुछ महीने पहले देश की एक अदालत ने केंद्र से राय मांगी थी कि क्या वेश्यावृत्ति को मान्यता दे दी जाए, यानि इसको अपराध के दायरे से बाहर कर दिया जाए, क्योंकि देश में वेश्यावृत्ति बढ़ती जा रही है। इस मुद्दे पर अदालत द्वारा केंद्र से राय मांगने का सीधा अर्थ है, अगर किसी चीज को कानून रोकने में असफल हो रहा है तो उसको मान्य दे दी जाए, ताकि अदालत का भी कीमत समय बच जाए। किसी मुश्किल का कितना साधारण हल है, कि उसको वैध करार दे दिया जाए, जिसको रोकने में कानून असफल है। कोर्ट ने एक बार भी केंद्र से नहीं कहा कि वेश्यावृत्ति की पीछे के कारणों का पता लगाने के लिए एक टीम का गठन किया जाए। कोर्ट ने सवाल नहीं उठाया कि क्यों कभी पुलिस प्रशासन ने कोर्ट में वेश्यावृत्ति में लिप्त महिलाओं के दूसरे पक्ष को उजागर नहीं किया। आखिर वेश्यावृत्ति हो क्यों रही है? आखिर क्यों देश की महिलाएं अपने जिस्म की नुमाईश लगा रही हैं?। अगर कोर्ट इन सवालों में से एक भी सवाल को केंद्र से पूछती तो केंद्र अदालती कटघरे में आ खड़ा नजर आता, क्योंकि वेश्यावृत्ति के बढ़ते रुझान के लिए हमारी सरकारें भी जिम्मेदार हैं, जो निम्न वर्ग को केवल वोटों के लिए इस्तेमाल करती हैं और उनके उत्थान के लिए कोई कार्य नहीं करती। ऐसे में पेट की आग बुझाने के लिए गरीब घरों की महिलाएं लोगों के बिस्तर गर्म करने के लिए निकल पड़ती हैं। अब तो वेश्यावृत्ति में कालेज की लड़कियां भी शुमार हो रही हैं, कारण है कि वो सुविधाओं भरी जिन्दगी जीना चाहती हैं। हम समस्याओं को जड़ से नहीं बल्कि बाहरी स्तर से हल करने के तरीके खोजते हैं। अभी कल की ही बात है, मेरा किसी काम को लेकर धोबियाना रोड़ पर जाना हुआ, श्री गुरूनानक देव स्कूल के पास सड़क पर दोनों तरफ आने जाने के लिए एक आधिकारिक रास्ता है, लेकिन उसको प्रशासन ने बंद कर दिया। बंद करने का कोई भी छोटा मोटा कारण हो सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि किसी नेता के आगमन पर उसको बंद किया हो, और फिर प्रशासन को खुलवाना भूल गया हो। प्रशासन ने वो रास्ता तो बेरियर लगाकर बंद कर दिया, क्योंकि ट्रैफिक पुलिस के पास कर्मचारियों की कमी तो हो सकती है, पर बेरियरों की नहीं। इसका अंदाजा पॉलिथीनों की तरह जगह जगह बिखरे पड़े मुसीबतों को जन्म दे रहे बेरियरों से लगाया जा सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि वो रास्ता हादसों का कारण बन रहा हो इसलिए बंद कर दिया गया, लेकिन क्या ऐसा करना जायज है, अगर जायज है तो बरनाला रोड़ को सबसे पहले बंद कर देना चाहिए, जिसको खूनी रास्ते के नाम से भी पुकारा जाता है। प्रशासन ने उक्त दस बारह फुट के रास्ते को बंद कर दिया, लेकिन लोगों ने एक फूट चौड़ा रास्ता उससे थोड़ा से आगे डिवाईडर तोड़कर बना लिया। शायद प्रशासन भूल गया कि नदी के बहा को कभी दीवारें निकालकर नहीं रोका जा सकता, क्योंकि पानी अपने रास्ते खुद बनाना जानता है। जनता भी पानी के बहा जैसी है। गलियों में बने हम्प भी इसी बात की ताजा उदाहरण हैं। स्थानीय शहरी इलाकों की गलियों में बने हम्प लोगों के वाहनों की स्पीड को तो कम नहीं कर पा रहे, लेकिन लोगों का ध्यान जरूर खींच रहे हैं। जब मनचले वहां आकर जोर से ब्रेक मारते हैं, और ब्रेक लगने के वक्त निकालने वाली वाहन के पुर्जों की आवाज लोगों का ध्यान खींचती है। हम समस्या की जड़ को खत्म करने की बजाय बाहरी स्तर पर काम करते हैं, जिनके नतीजे हमेशा ही शून्य रहते हैं। मानो लो, देश भर के सरकारी स्कूलों की चारदीवारी को आलीशान बना दिया जाए, क्या वो देश की शिक्षा प्रणाली के दुरुस्त होने का प्रमाण होगा, नहीं क्योंकि वो सुधार केवल बाहरी रूप से हुआ है। अगर देश की शिक्षा प्रणाली का सुधार करना है तो उसकी जड़, मतलब टीचर को ऐसे प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए कि वो एक पढ़े लिखे इंसान के साथ एक समझदार व्यक्ति को स्कूल से बाहर रुखस्त करे। वरना देश की अदालत हर बार किसी न किसी अपराध को अपराध मुक्त करने पर सरकार से राय मांगेगी।

रक्षक से भक्षक तक

सर जी, वो कहता है कि उसको एसी चाहिए घर के लिए। वो का मतलब था डॉक्टर, क्योंकि मोबाइल पर किसी से संवाद करने वाला व्यक्ति एक उच्च दवा कंपनी का प्रतिनिधि था, जो शहर में उस कंपनी का कारोबार देखता था। इस बात को आज कई साल हो गए, शायद आज उसके संवाद में एसी की जगह एक नैनो कार आ गई होगी या फिर से भी ज्यादा महंगी कोई वस्तु आ गई होगी, क्योंकि शहर में लगातार खुल रहे अस्पताल बता रहे हैं कि शहर में मरीजों की संख्या बढ़ चुकी है, जिसके चलते दवा कारोबार में इजाफा तो लाजमी हुआ होगा।

आप सोच रहें होंगे कि मैं क्या पहेली बुझा रहा हूँ, लेकिन यह किस्सा आम आदमी की जिन्दगी को बेहद प्रभावित करता है, क्योंकि इस किस्सा में भगवान को खरीदा जा रहा है। चौंकिए मत! आम आदमी की भाषा में डॉक्टर भी तो भगवान का रूप है, और उक्त किस्सा एक डॉक्टर को लालच देकर खरीदने का ही तो है। कितनी हैरानी की बात है कि पैसे मोह से बीमार डॉक्टर शारीरिक तौर पर बीमार व्यक्तियों का इलाज कर रहे हैं।

इस में कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि दवा कंपनियों के पैसे से एशोआराम की जिन्दगी गुजारने वाले ज्यादातर डॉक्टर अपनी पसंदीदा कंपनियों की दवाईयाँ ही लिखकर देते हैं, जिसकी मार पड़ती है आम आदमी पर, क्योंकि दवा कंपनियां डॉक्टर को दी जाने वाली सुविधाओं का खर्च भी तो अपने ही उत्पादों से निकालेंगी।

पैसे के मोह से ग्रस्त डॉक्टरी पेशा भी बुरी तरह बर्बाद हो चुका है, अब इस पेशे में ईमानदार लोग इतने बचें, जितना आटे में नमक या फिर समुद्र किनारे नजर आने वाला आईसबर्ग (हिमखंड), ज्ञात रहे कि आइसबर्ग का 90 फीसदी हिस्सा पानी में होता है, और दस फीसदी पानी के बाहर, जो नजर आता है।

अब ज्यादातर डॉक्टरों का मकसद मरीजों को ठीक करना नहीं, बल्कि रेगुलर ग्राहक बनाना है, ताकि उनकी रोजी रोटी चलती रहे, और वो जिन्दगी को पैसे के पक्ष से सुरक्षित कर लें, पैसे की लत ऐसी लग गई है कि आम लोग सरकारी नौकरियाँ तलाशते हैं, डॉक्टर खुद के अस्पताल खोलने के बारे में सोचते हैं। मुझे याद है, जब मेरी माता श्री बीमार हुई थी, उसका मानसा के एक सरकारी अस्पताल से चल रहा था, वो पहले से चालीस फीस ठीक हो गई थी, अचानक उस युवा डॉक्टर ने सरकारी नौकरी छोड़कर खुद को अस्पताल खोल लिया, और मेरी माता की दवाई अब उसके अस्पताल से आनी शुरू हो गई, वो पहले महीने भर में बुलाता था, अब हफ्ते भर में। और मोटी फीस लेने लगा था, लेकिन कुछ हफ्तों बाद उसकी तबीयत फिर से पहले जैसी हो गई, क्योंकि अब उस डॉक्टर का मकसद खुद की आमदन बढ़ाना था, ना कि मरीज को तंदरुस्त कर घर भेजना।

लोगों ने डॉक्टर को भगवान की उपमा दी है, लेकिन अब उस भगवान के मन में इतना खोट आ गया है कि अब वो भगवान अपने दर पर आने वाले मानवों के अंगों की तस्करी करने से भी पीछे नहीं हट रहा। इतना ही नहीं, कभी कभी तो भगवान इतना क्रूर हो जाता है कि शव को भी बिन पैसे परिजनों के हवाले नहीं करता। और तो और रक्त के लिए भी अब वो निजी ब्लड बैंकों की पर्चियां काटने लगा है, आम आदमी का शोषण अब उसकी आदत में शुमार हो गया है। अपनी रक्षक की छवि को उसने भक्षक की छवि में बदल दिया।

पंजाबी भाषा और कुछ बातें

अपने ही राज्य में बेगानी सी होती जा रही है पंजाबी भाषा, केवल बोलचाल की भाषा बनकर रह गई पंजाबी, कुछ ऐसा ही महसूस होता है, जब सरकारी स्कूलों के बाहर लिखे 'पंजाबी पढ़ो, पंजाबी लिखो, पंजाबी बोलो' संदेश को देखता हूँ। आजकल पंजाब के ज्यादातर सरकारी स्कूलों के बाहर दीवार पर उक्त संदेश लिखा आम मिल जाएगा, जो अपने ही राज्य में कम होती पंजाबी की लोकप्रियता को उजागर कर रहा है, वरना किसी को प्रेरित करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।

पंजाबी भाषा केवल बोलचाल की भाषा बनती जा रही है, हो सकता है कि कुछ लोगों को मेरे तर्क पर विश्वास न हो, लेकिन सत्य तो आखिर सत्य है, जिस से मुँह फेर कर खड़े हो जाना मूर्खता होगी, या फिर निरी मूढ़ता होगी। पिछले दिनों पटिआला के बस स्टॉप पर बस का इंतजार करते हुए मेरी निगाह वहाँ लगे कुछ बोर्डों पर पड़ी, जो पंजाबी भाषा की धज्जियाँ उड़ा रहे थे, उनको पढ़ने के बाद लग रहा था कि पंजाबी को धक्के से लागू करने से बेहतर है कि न किया जाए, जो चल रहा है उसको चलने दिया जाए।

अभी पिछले दिनों की ही तो बात है, जब एक समारोह में संबोधित कर रहे राज्य के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को अचानक अहसास हुआ कि पाकिस्तान व हिन्दुस्तान में संपर्क भाषा पंजाबी भी है, जिसके बाद उन्होंने अपना भाषण पंजाबी में दिया, चलो एक अच्छी बात है। लेकिन ऐसा भी तो हो सकता है कि किसी ने पीछे से कह दिया हो, साहेब! आप तीसरे देश की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। दोष बादल साहेब का नहीं, दोष तो हमारा है, जो खुद की भाषा में बात करने को अपनी बे-इज्जती समझते हैं। हमारे राज्य की तो छोड़ो देश के नेता भी हिन्दी में शपथ लेने से कतराते हैं, और कहते हैं कि हिन्दुस्तान की संपर्क भाषा हिन्दी बने। इससे कुछ दिन पहले ही, राज्य के एक पंजाबी समाचार पत्र में लेखिका डा.हरशिंदर कौर का लेख प्रकाशित हुआ था, जिसमें लेखिका ने अपने साथ हुई घटना का उल्लेख करते हुए पंजाबी सेवक का पट्टा पहनकर घूमने वालों पर जोरदार कटाक्ष किया था।

पंजाबी भाषा को अगर कायम रखना है, तो सरकार को कानून बनाने की नहीं बल्कि भाषा को लोकप्रिया बनाने की जरूरत है। पंजाबी गीत संगीत ने पंजाबी को विश्वव्यापी तो बना दिया, लेकिन केवल बोलचाल में, लेखन में नहीं। अगर लेखन में भी इसको लोकप्रियता दिलानी है तो सरकार को साहित्यकारों की तरफ ध्यान देना होगा। पंजाबी फिल्मों के साथ साथ फिर से पंजाबी रंगमंच को जिन्दा करना होगा, ताकि लोगों को एक बार फिर से पंजाबी लेखन की तरफ खिंचा जा सके।

पंजाबी फिल्म एकम में जब नायिका नायक को अपने शौक के बारे में बताते हुए कुछ विदेशी लेखकों का नाम लेती है, जिन्हें वे रूटीन में पढ़ती है, तो नायक उसकी इस बात पर कटाक्ष करते हुए कहता है कि कभी पंजाबी लेखकों को भी पढ़ लिया करो। स्टेट्स सिम्बल के चक्कर में पंजाबी अपने ही राज्य में हाशिए पर खड़ी नजर आ रही है। कॉलेजों से निकलते ही विद्यार्थी भूल जाते हैं कि उन्होंने कॉलेज में किन किन पंजाबी लेखकों को पढ़ा, और आगे किन किन को पढ़ना है, क्योंकि उनके लिए पढ़ाई का मतलब डिग्री हासिल करना, और उस डिग्री के बलबूते पर नौकरी हासिल करना। ऐसे में भाषा व संस्कृति को बचा पाना बेहद मुश्किल ही नहीं, असंभव भी है।

कुलवंत हैप्पी
76967 13601

चीन का एक और काला अध्याय

बाघों की सुरक्षा को लेकर भारत में चिंतन किया जा है। मोबाइल संदेशों के मार्फत उनको बचाने के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं, कुछ दिनों बाद 7 अप्रैल टाईगर प्रोजेक्ट स्थापना दिवस है, बाघ बचाओ परियोजना की स्थापना 7 अप्रैल 1973 हुई। इस स्थापना भी कोई खास रंग नहीं ला सकती, यही कारण है कि भारत में बाघों की संख्या 1411 रह गई है। जहाँ भारत में बाघ बचाओ के लिए एसएमएस किए जा रहे हैं, वहीं भारत से आबादी और ताकत के मुकाबले में आगे निकल चुका चीन उन बाघों को अपने स्वार्थ के लिए खत्म किए जा रहा है।

ऐसा ही कुछ खुलासा डेली मेल नामक वेबसाईट में प्रकाशित एक खबर में किया गया है। डेली मेल में प्रकाशित ख़बर के अनुसार चीन के गुइलिन शहर में एक ऐसा फार्म है जहां अनुमानों के मुताबिक करीब 1500 बाघ बाजार में उपयोग के लिए पाले जा रहे हैं। इन बाघों की हड्डियों से शराब तैयार की जा रही है, पहले तो चीन केवल दवाईयाँ तैयार करता था इनकी हड्डियों से। गौरतलब है कि यह संख्या दुनिया में आज बचे कुल बाघों की संख्या की आधी है। एक ही पिंजरे में कई-कई बाघों को रखा जा रहा है और मौत ही इनकी नियति है।

जबकि इस काले अध्याय के सामने आने से पहले वन्य जीव संरक्षण संगठन की निदेशक इ यान ने बताया था कि दक्षिण पश्चिमी युन्नान प्रांत में करीब 10 बाघ, तिब्बत में 15 और पश्चिमोत्तर जिलिन और हिलोगजियान प्रांत में करीब 20 बाघ बचे हैं। यान ने कहा कि दक्षिणी चीन में बाघ तो संभवत: विलुप्त हो चुका है। उन्होंने कहा कि बाघों की संख्या कम होना दुखद है। तिब्बत और दक्षिण में इनकी संख्या में गिरावट आ रही है, उन्होंने बताया कि पूर्वात्तर में बाघ की संख्या फिलहाल स्थिर है और कुछ प्रयासों से इनकी संख्या बढाई गई है लेकिन यह बहुत कम है।

डेली मेल के खोजी पत्रकार Richard Jones In Guilin को दाद देता हूँ, जिसने साँप की बिल में हाथ डालकर सच को बाहर निकाला, चीन जैसा देश अभिव्यक्ति को दबाने के हर बड़ा कदम उठाता है। वहाँ अभिव्यक्ति को कुचल दिया जाता है, ऐसे में अगर कोई सच को बाहर निकाल लाए, उसको दाद देनी तो बनती है। हिन्दुस्तानी पत्रकारों से तो बेहतर ही हैं, विदेशी खोजी पत्रकार, वो किसी को आग में झुलसते हुए देख अपनी पत्रकारिता की शौर्य तो प्रकट नहीं करते। एक इंसान जिन्दा जल रहा है, हिन्दुस्तानी पत्रकार उसका वीडियो उतारकर गर्व महसूस करते हैं, वो किसी जीवंत सीन को कैप्चर जो कर रहे हैं, थू ऐसे घटिया सोच के पत्रकारों पर। शर्म आती है, भारतीय पत्रकारिता को देखते हुए। इसको पत्रकारिता नहीं, कायरता कहिएगा जनाब। एक दूसरे को संदेश भेजकर चुप मत बैठो, एक जनमत तैयार करो, अगर बाघों को बचाना है, नहीं तो टाईगर प्रोजक्ट केवल प्रोजेक्ट बनकर रह जाएगा। हर देशों को अपनी सरकारों पर दबाव बनाना होगा, और उन सरकारों को चीन जैसे घटिया सोच के देश पर दबाव बनाना होगा।

 भार
कुलवंत हैप्पी

एक गुमशुदा निराकार की तलाश

इस दुनिया में इंसान आता भी खाली हाथ है और जाता भी, लेकिन आने से जाने तक वो एक तलाश में ही जुटा रहता है। तलाश भी ऐसी जो खत्म नहीं होती और इंसान खुद खत्म हो जाता है। वो उस तलाश के साथ पैदा नहीं होता, लेकिन जैसे ही वो थोड़ा सा बड़ा होता है तो उसको उस तलाश अभियान का हिस्सा बना दिया जाता है, जिसको उसके पूर्वज, उसके अभिभावक भी नहीं मुकम्मल कर पाए, यह तलाश अभियान निरंतर चलता रहता है। जिसकी तलाश है, उसका कोई रूप ही नहीं, कुछ कहते हैं कि वो निराकार है। कितनी हैरानी की बात है इंसान उसकी तलाश में है, जिसका कोई आकार ही नहीं। इस निराकार की तलाश में इंसान खत्म हो जाता है, लेकिन उसका अभियान खत्म नहीं होता, क्योंकि उसने अपने खत्म होने से पहले इस तलाश अभियान को अपने बच्चों के हवाले कर दिया, जिस भटकन में वो चला गया, उसकी भटकन में उसके बच्चे भी चले जाएंगे।

ऐसा सदियों से होता आ रहा है, और अविराम चल भी रहा है तलाश अभियान। खोजना क्या है कुछ पता नहीं, वो है कैसा कुछ पता नहीं, हाँ अगर हमें पता है तो बस इतना कि कोई है जिसको हमें खोजना है। वो हमारी मदद करेगा, मतलब उसकी तलाश करो और खुद की मदद खुद करने का यत्न मत करो। मुझे मनुष्य और मृग में कोई ज्यादा फर्क नहीं लगता है, मनुष्य की तरह मृग भी कस्तूरी की तलाश में जंगल में भटकते भटकते मर जाता है, जबकि कस्तूरी तो उसकी नाभी में ही होती है। जैसे मृग की नाभी में कस्तूरी होती है, वैसे ही मनुष्य आत्मा में प्रमात्मा का वास होता है।

इसके बारे में लाईफ पॉजिटिव की संपादिका सुमा वर्गीज ने अगस्त 2009 के अंक में बहुत सुंदर शब्दों में कुछ ऐसे लिखा है। मनुष्य को बनाने और उसे ईश्वर की खोज करने और ईश्वर को जानने का कार्य सौंप कर परमात्मा एक बड़ी उलझन में फंस गए। उनके सामने जो समस्या थी कि वह यह थी कि वह कहाँ जाकर छिपे जहां मनुष्य उन्हें आसानी से न ढूँढ सके, पर्वत में जाकर छिपें या गहरे समुद्र में या मेघों के बीच उड़ते रहें, वह जाएं तो जाएं कहां? आखिरकार उन्हें अपनी उलझन का समाधान मिल ही गया। "मैं आदमी की आत्मा में निवास करूंगा" उन्होंने कहा, "क्योंकि यही एक जगह है, जहां मनुष्य मुझे ढूँढ निकालने की सोच भी नहीं सकेगा"।

सच में कुछ ऐसा ही हुआ, जिन्होंने परमात्मा को जाना है, उन्होंने भीतर से ही जानना है। अगर परमात्मा जंगलों में होते तो शेरों चीतों अन्य जानवरों को मिल जाते, अगर परमात्मा समुद्र में होते तो मछलियों को मिल जाते, अगर परमात्मा आसमां में मेघों के संग उड़ रहे होते तो शायद पक्षियों परिंदों से मिल जाते। मगर परमात्मा ने ऐसी जगह ढूँढ ली, जहाँ पहुंचने के लिए इंसान को खुद के भीतर उतरना होगा, लेकिन वो ऐसा करने में हमेशा असफल हुआ, क्योंकि उसको बाहरी दुनिया ने अंदर लौटने का मौका ही नहीं दिया, तलाश की जिम्मेदारी इतनी सख्त कर दी कि वो दिशाविहीन बस चले जा रहा है। अंत कहाँ है, उसको पहुंचना कहाँ है कोई पता नहीं। उसकी यात्रा का मृत्यु के अलावा कोई अंत है, उसको खुद को पता नहीं बस चले जा रहा है। इस तलाश को रोकने के लिए हम इतना यत्न कर सकते हैं कि हम जिस तलाश में भटक रहे हैं, उस तलाश में नई पीढ़ी को भटकनें से रोकें, अगर एक भी भटकने से बच गया तो समझो। अब कारवां शुरू हो चुका है।


भार
कुलवंत हैप्पी

भारत की सबसे बड़ी दुश्मन

कुछ दिन पहले गुजरात प्रवास के दौरान हिम्मतनगर से 29 किलोमीटर दूर स्थित ईडर गया दोस्त से मिलने। ईडर शहर को पत्थर के बीचोबीच बसा देखकर घूमने का मन हुआ। वहाँ एक बहुत ऊंची पत्थरों से बनी हुई पहाड़ी है..जिस पर एक राजा का महल है, जो आजकल खण्डहर हो चुका है। उसके बीच लगा सारा कीमत सामान निकाल लिया गया है। बस वहाँ अगर कुछ बचा है तो केवल और केवल प्रेमी युगलों के नाम, जिनके बारे में कुछ पता नहीं कि वो इन नामों की तरह आज भी साथ साथ हैं या फिर नहीं। सारी दीवारें काली मिली..जैसे दीवारें न हो कोई रफ कापी के पन्ने हों। कुछ कुछ तो ऐसे जिद्दी आशिक भी यहाँ आए, जिन्होंने दीवारों को कुरेद कुरेद नाम लिखे।। तल से काफी किलोमीटर ऊंची इस पहाड़ी पर खण्डहर राजमहल के अलावा दो जैन मंदिर, हिन्दु देवी देवताओं के मंदिर और मुस्लिम पीर बाबा का पीरखाना भी। राजमहल जहाँ आज अंतिम साँसें ले रहा है, वहीं श्वेताम्बर जैन मंदिर का करोड़ों रुपए खर्च कर पुन:निर्माण किया जा रहा है। वहाँ मुझे महावीर की याद आती, जो निर्वस्त्र रूप में मुझे कहीं जगह मिल चुके हैं प्रतिमा के रूप में। महावीर की निर्वस्त्र मूर्ति देखकर मैं आज तक हँसा नहीं, हाँ, लेकिन उक्त मंदिर निर्माण को देखकर महावीर की मूर्ति को याद करते हुए सोच रहा था कि महावीर की मूर्ति से जैन धर्म के लोग शिक्षा क्यों नहीं लेते कि निर्वस्त्र आए थे और निर्वस्त्र जाना है। जिसके लिए लोग दिन रात मरते फिरते हैं, उन सुविधाओं को महावीर ने त्याग दिया था, लेकिन आज उस बुद्ध पुरुष के लिए इतने महंगे आलीशान मंदिर बनाने की क्या जरूरत आन पड़ी है। मंदिरों पर पानी की तरह पैसे बहाना केवल जैन धर्म में ही नहीं, हर धर्म में है। हर धर्म लगा हुआ है अपने धर्म को ऊंचा करने में। जीरा मंडी के रूप में विश्व प्रसिद्ध गुजरात का ऊंझा शहर श्री उमिया माता मंदिर के कारण भी बहुत प्रसिद्ध है। पिछले साल नबम्वर दिसम्बर में वहाँ धार्मिक कार्यक्रम हुआ था। सुना है कि उसमें शामिल होने वालों ने करोड़ों रुपए सिर्फ पूजन के वक्त पहली दूसरी कतार में बैठने के लिए खर्च किए। उस अनुमान से इस मंदिर में चढ़वा अरबों में पहुंचा होगा। भारत में और भी ऐसे सैंकड़ों मंदिर हैं जिनका रोज का चढ़वा लाखों तक तो पहुंच ही जाता होगा। अगर सब धर्मों के मंदिरों में आने वाले पैसे को समाज कल्याण के काम में लगा दिया जाए तो हिन्दुस्तान की शकल रातों रात बदल सकती है। मगर ऐसा होता नहीं। ऐसा तब जाकर होगा। जब हम बाहरी रूप की बजाय भीतरी रूप से धार्मिक हो जाएंगे। जब हम धर्म को व्यवसाय से अहलदा कर लेंगे। धर्म के सही अर्थों की पहचान कर लेंगे। जब एक दूसरे के धर्म को नीचा दिखाना बंद कर देंगे। सभी धर्म उठाकर देख लो। एक ही बात कहते हैं मोह, अंहकार, लोभ, क्रोध और माया त्याग करो। तुम सुखी हो जाओगे। लेकिन धर्म को मानने वालों ने उसकी पालना करने की बजाय उसके विपरीत जाकर काम शुरू कर दिया। भगवान को भी माया जाल में फँस लिया। उसको भी मोह दे दिया। तुम लाखों दो भगवान और हम तुम्हें हजारों देंगे। ऐसी धार्मिकता से बाहर आने की जरूरत है। महावीर की प्रतिमा को जिसने गौर से देखा होगा। उसको जिन्दगी का असली सच समझ में आ गया होगा। अंत कुछ भी साथ नहीं जाता, जब दुनिया से सिकंदर गया उसके हाथ भी खाली थे, हजारों बार सुनना होगा और ताली बजाई होगीं। वाह वाह करते घर चलेंगे होंगे। लेकिन गौर नहीं किया, बात को सुना तो सही, लेकिन अमल नहीं किया। भारत की सबसे बड़ी दुश्मन है हमारी भीतरी अधार्मिकता।

भार
कुलवंत हैप्पी

गायब हो रहे हैं टिप्पणी बॉक्स

आज सब ब्लॉगरों को पढ़ने की इच्छा थी, लिखने की बिल्कुल नहीं। लेकिन जब पढ़ते पढ़ते पी.सी.गोदियाल जी के ब्लॉग पर पहुंचा तो क्या देखता हूँ कि टिप्पणी बॉक्स गायब है। अब वहाँ पर अपने विचार भी व्यक्त नहीं कर सकता। अब उनके ब्लॉग पर नहीं लिख सकता कि उन्होंने कितना अच्छा लिखा है और कितना साधारण लिखा है। ऐसे ही और कई ब्लॉग हैं, जो ऐसा करने से मना कर देते हैं। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि टिप्पणी बॉक्स गायब हो रहे हैं। ये ब्लॉगवुड है, बठिंडा नहीं कि नगर निगम वालों ने रात को सीवरेजों के ढक्कन लगाए और सुबह होते ही गायब हो गए। यहाँ टिप्पणी बॉक्स खुद हटाए जाते हैं। ऐसा नहीं कि टिप्पणी बॉक्स गलती से गायब हो गए, इनको सोच समझकर एक लम्बे अध्ययन के बाद गायब किया गया है। शायद उन्होंने अध्ययन में पाया कि हमारे कुछ टिप्पणीकर्ता अपने ब्लॉग पते देने के लिए इन टिप्पणी बॉक्सों का गलत इस्तेमाल करते हैं, कहीं कहीं तो पाया गया है कि लेख कुछ और होता है और टिप्पणी कुछ और।

पिछले दिनों ब्लॉगवुड में घुघूती बासूती ब्लॉग पर लिखी एक पोस्ट भी कुछ ऐसा ही बयान करती थी। क्या उस पोस्ट में घुघूती बासूती ने खुद ही पढ़ लीजिए।
 



आप एक पोस्ट लिखते हैं यह बताते हुए कि आपकी भैंस मर गई।
टिप्पणी आती है गुड।
आप एक पोस्ट लिखते हैं यह बताते हुए कि आपके पिताजी मर गए।
टिप्पणी आती है गुड।
आप एक पोस्ट लिखते हैं यह बताते हुए कि आपके ऊपर मुकदमा किया गया है।
टिप्पणी आती है गुड।
आप एक पोस्ट लिखते हैं यह बताते हुए कि आप अब ब्लॉगिंग से सन्यास ले रहे हैं।
टिप्पणी आती है गुड।
आप एक पोस्ट लिखते हैं यह बताते हुए कि आप टिप्पणी करने वालों की ठुकाई करेंगे।
टिप्पणी आती है गुड।

अरे भइया कुछ तो 'वेरी गुड' लायक भी होगा! क्या वेरी गुड के लिए अपने पूरे खानदान को मरवाना होगा या भैंसो के पूरे तबेले को? बात यह है कि बचपन से 'वेरी गुड' पाने की आदत पाली हुई है, जब भी अध्यापक बिना 'वेरी' वाला 'गुड' देते थे तो मन असन्तुष्ट ही रहता था, आज भी यह बीमारी लगी ही हुई है।

घुघूती बासूती

एक दिन अन्य ब्लॉगर साथी से बात हुई तो उसने कहा, मैंने टिप्पणी बॉक्स इसलिए बंद कर दिया क्योंकि यहाँ गिव इन टेक का मस्ला है, एक हाथ लो और दूसरे हाथ दो। कुछ टिप्पणी बॉक्स तो ऐसी घटनाओं के कारण बंद हो गए, लेकिन कुछ ब्लॉग इन टिप्पणी बॉक्सों की वजह से बंद हो गए। किसी ने अपनी प्रतिक्रिया जरा सख्ती से दे डाली तो सामने वाला कोर्ट केस करने की धमकी दे डालता है। इतना ही नहीं कुछ लोग तो ब्लॉग बंद कर अपने अपने घरों को चले गए।


बस अंत में इतना ही कहूँगा दोस्तो, जितना मीठा डालोगे, उतनी मिठास आएगी।


भार
कुलवंत हैप्पी

मिल्क नॉट फॉर सेल


आज गुरूवार को सुबह माताजी के दर्शनों के लिए अम्बाजी गया, वहाँ पर माता जी का बहुत विशाल मंदिर है, इस मंदिर में माता जी के दर्शनों के लिए दूर दूर से भक्त आते हैं। मातृदर्शन के बाद वापसी में जब मैं खेड़ब्रह्मा पहुंचा तो मेरी नजर सामने जा रहे एक दूध वाहन पर पड़ी, जिसके पीछे लिखा हुआ था "मिल्क नॉट फॉर सेल"। जिसका शायद हिन्दी में अर्थ दूध बेचने के लिए नहीं, कुछ ऐसा ही निकलता है। इस पंक्ति को पढ़ते ही जेब से मोबाइल निकाला और फोटो खींच डाली।

इस लाइन ने मुझको बारह तेरह साल पीछे धकेल दिया स्कूल के दिनों में। उन दिनों मैंने एक किताब में पढ़ा था कि पाकिस्तान में एक गुजरांवाला नामक गाँव है, जहाँ पर लोग दूध और पूत नहीं बेचते थे। गुजरांवाला के अलावा भी बहुत से ग्रामीण क्षेत्रों में दूध और पूत नहीं बेचे जाते थे, लेकिन आज दूध भी बिकता है और पूत भी। लोग आज अपने घर का सारा दूध डेयरी में डालकर खुद चाय पीते हैं, उस बिके हुए दूध से आज उनके घर चलते हैं। एक समय था जब गाँव में किसी के घर दामाद आता तो आस पड़ोस से दूध के लोटे बिन मंगाए ही आ जाते और विवाह शादियों में दूध खरीदना नहीं पड़ता था, बस एक बार लाउंड स्पीकर में बुलाने की जरूरत पड़ती थी कि फलाँ घर में शादी है, बस फिर क्या शाम तक दूध की नहर बहनी शुरू हो जाती थी, लेकिन समय बदल गया है, अब गाँवों में भी दूध का काल पड़ने लगा है।

पूत तो पंजाब में इस कदर बिकते हैं कि पूछो मत, लाखों रुपए में मनमर्जी का दुल्हा पसंद कर लो। जमीन अच्छी खासी दहेज में मिल रही हो तो लड़की में जितने भी दोष हैं, सब कबूल हैं। मुझे याद है, मेरे रिश्तेदार ने अपनी दो बेटियोँ की शादियाँ की, एक पर पाँच लाख और दूसरी पर पंद्रह लाख रुपए खर्च किए। अब उनके दो बेटे भी शादी लायक हो गए हैं, उनका मूल्य तय हो चुका है तीस से पैंतीस लाख।

ऐसा नहीं कि इनकी इतनी कीमत कोई नहीं लगाएगा। अगर बेचने वाले हैं तो खरीदने वालों की भी कमी नहीं। लेकिन इनकी सौदेबाजी उन मासूम लड़कियों पर भारी पड़ती है, जिनके अभिभावकों के पास अपनी बेटी को विदा करने के लिए लाखों रुपए नहीं। लड़की के ससुराल वालों को देने के लिए मारुति 800 या इंडिका नहीं। आज पूत भी बिकता है और दूध भी बिकता है।
भार
कुलवंत हैप्पी

भारत का एक आदर्श गाँव "कपासी"

चप्पे चप्पे कोने कोने की ख़बर देने का दावा करते हुए भारतीय ख़बरिया टैलीविजन थकते नहीं, लेकिन सच तो यह है कि मसाला ख़बरों के दायरे से बाहर निकलते ही नहीं। वरना, भारत के जिस आदर्श गाँव के बारे में, अब मैं बताने जा रहा हूँ, उसका जिक्र कब का कर चुके होते टैलीविजन वाले। इस गाँव को मैंने खुद तो देखा नहीं, लेकिन पत्रकार एवं लेखक स्वयं प्रकाश द्वारा लिखित किताब "जीना सिखा दिया" से उसके बारे में पढ़ा जरूर है।

श्री स्वयं प्रकाश द्वारा लिखित किताब जीना सिखाया दिया में इस गाँव के बारे में पढ़ने के बाद इसको भारत को आदर्श गाँव कहना कोई अतिशोक्ति न होगी, जो पूने से 120 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। और इस गाँव का नाम कपासी है।

किताब में लिखे अनुसार कपासी पूरी तरह नशामुक्त गाँव है, भारत में शायद ही कोई गाँव नशे की लपेट में आने से बचा हो। लेखक बताते हैं कि इस गाँव में चौबीस घंटे बिजली रहती है, क्योंकि यहाँ बिजली चोरी की आदत नहीं लोगों को, जबकि आम तौर पर भारतीय गाँवों में बिजली बामुश्किल 8 घंटे मिलती है, चाहे वहाँ बिजली चोरी होती हो या न, उनको गाँवों को छोड़कर जो आज भी बिजली से महरूम हैं।

इस गाँव में प्राकृतिक खेती होती है, जो आज के समय में किसानों के लिए एक प्रेरणास्रोत से कम नहीं। पंजाब को कृषि प्रधान सूबा कहा जाता है, लेकिन आज वहाँ के किसान भी ज्यादा उपज हासिल करने के लिए आँखें बंद कर रसायनों का इस्तेमाल जोर शोर से कर रहे हैं, जिससे अन्न नहीं ज़हर पैदा होता है। भारतीय किसानों और खबरिया चैनलों में एक समानता नजर आती है। वो यह है कि किसान ज्यादा उपज लेने के चक्कर में फसल को जहर बना रहा है और खबरिया चैनल टीआरपी के चक्कर में अपने असली मार्ग से भड़क रहे हैं।

इस गाँव में विदेशी लोग अध्यन करने आते हैं, लेकिन भारतीय चैनल कब पहुंचेंगे इस गाँव में अध्यन करने के लिए पता नहीं। इन निज खबरिया चैनलों की तरह हमारी सरकार भी सो रही है, वरना वो इस गाँव को पूरे भारत में फैलाकर जन जन को भी एक आदर्श देश बनाने के लिए प्रेरणा दी जा सकती है। पूरा भारत न बदले तो कोई बात नहीं, लेकिन कुछ तो बदले। कहीं से तो शुरूआत हो।

लेखक बताते हैं कि इस गाँव में करीबन 27 बाँध हैं, जो खुद लोगों द्वारा खुद के पैसे से बनाए गए, इन बाँधों को बनाने के लिए करीबन 25 हजार रुपए खर्च आए। लेखक कहता है कि अगर इन बाँधों का निर्माण प्रशासन करता तो खर्च करीबन एक लाख होता, लेकिन मुझे लगता है कि लाखों खर्च होते, पर कभी बाँध न बन पाते।

इस गाँव में लड़ाई झगड़े नहीं होते, जिसके कारण खाकी वाले इस गाँव में केसों की छानबीन करने नहीं आते। हाँ, अगर कुछ आता है तो शुद्ध हवा, वो गाँव के चारों ओर लगे पेड़ों की वजह से। इस गाँव को बदलने का श्रेय आर्ट ऑफ लिविंग संस्थान या फिर डा. माधव ए पॉल को जाता है।

अगर आप पुने के आस पास रहते हैं तो इस गाँव में एक बार जरूर जाकर आईएगा, और बताईएगा अपने अनुभव।

आभार
कुलवंत हैप्पी


ऑस्कर में नामांकित 'कवि' का एक ट्रेलर और कुछ बातें

कुछ दिन पहले दोस्त जनकसिंह झाला के कहने पर माजिद माजिदी द्वारा निर्देशित एक इरानी फिल्म चिल्ड्रन इन हेवन का कुछ हिस्सा देखा था और आज ऑस्कर में नामांकित हुई एक दस्तावेजी फिल्म 'कवि' का ट्रेलर देखा। इन दोनों को देखने के बाद महसूस किया कि भारतीय फिल्म निर्देशक अभी बच्चे हैं, कच्चे हैं।

चाहे वो राजकुमार हिरानी हो, चाहे विशाल भारद्वाज। इन दोनों महान भारतीय निर्देशकों ने अपनी बात रखने के लिए दूसरी बातों का इस्तेमाल ज्यादा किया, जिसके कारण जो कहना था, वो किसी कोने में दबा ही रह गया। जहाँ थ्री इडियट्स एक मनोरंजन फिल्म बनकर रह गई, वहीं इश्किया एक सेक्सिया फिल्म बनकर रह गई।

संगीतकार विशाल भारद्वाज की छत्रछाया के तले बनी अभिषेक चौबे निर्देशित फिल्म इश्किया अंतिम में एक सेक्सिया होकर रह जाती है। किसी फिल्म के सेक्सिया और मजाकिया बनते ही कहानी का मूल मकसद खत्म हो जाता है। और लोगों के जेहन में रह जाते हैं कुछ सेक्सिया सीन या फिर हँसाने गुदगुदाने वाले संवाद।

ऐसे में एक सवाल दिमाग में खड़ा हो जाता है कि क्या करोड़ खर्च कर हम ऐसी ही फिल्म बना सकते है, जो समाज को सही मार्ग न दे सके। क्या कम पैसे और ज्यादा प्रतिभा खर्च कर एक स्माइली पिंकी या कवि फिल्म नहीं बना सकते।

उम्दा निर्देशन के लिए लोग आदित्य चोपड़ा को याद करते हैं, लेकिन क्या आदित्य चोपड़ा दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे का दूसरा हिस्सा दिखा सकेंगे, जहाँ पर अधूरा सच तिलमिला रहा है। फिल्म निर्देशक आदित्य चोपड़ा की फिल्म दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे भारतीय युवाओं को वहाँ तक ही पहुंचाती है, यहाँ तक भगवान श्री कृष्ण की कथा अभिमन्यु को। जो हाल अभिमन्यु का हुआ था, वो भी भारतीय युवा पीढ़ी का होता है।

राजू बन गया 'दी एंग्री यंग मैन'

"शाहरुख खान और अमिताभ बच्चन" हिन्दी फिल्म जगत के वो नाम बन गए, जो सदियों तक याद किए जाएंगे। आपसी कशमकश के लिए या फिर बेहतरीन अभिनय के लिए। दोनों में उम्र का बहुत फासला है, लेकिन किस्मत देखो कि चाहे वो रुपहला पर्दा हो या असल जिन्दगी का रंगमंच। दोनों की दिशाएं हमेशा ही अलग रही हैं, विज्ञापनों को छोड़कर। रुपहले पर्दे पर अमिताभ बच्चन के साथ जितनी बार शाहरुख खान ने काम किया, हर बार दोनों में ठनी है। चाहे गुरूकुल के भीतर एक प्रधानाचार्य एवं आजाद खयालात के शिक्षक के बीच युद्ध, चाहे फिर घर में बाप बेटे के बीच की कलह। अक्सर दोनों किरदारों में ठनी है। असल जिन्दगी में भी दोनों के बीच रिश्ते साधारण नहीं हैं, ये बात तो जगजाहिर है। रुपहले पर्दे पर तो शाहरुख खान का किरदार हमेशा ही अमिताभ के किरदार पर भारी पड़ता रहा है, लेकिन मराठी समाज को बहकाने वाले ठाकरे परिवार को करार जवाब देकर शाहरुख खान ने असल जिन्दगी में भी बाजी मार ली है।
कहने को तो अमिताभ बच्चन के नाम के साथ "दी एंग्री यंग मैन" का टैग लगा हुआ है, लेकिन असल जिन्दगी में उन्होंने हमेशा न्यू टैग 'बिग बी' का इस्तेमाल किया और करते भी हैं। "बिग बी" का असली अर्थ "बिग बिजनसमैन" मैं उस दिन समझा था, जब श्रीमति बच्चन के बयान पर अमिताभ बच्चन ने दो हाथ जोड़कर एक गली के गुंडे से माफी माँग ली थी, वो भी सिर्फ इसलिए कि उनके बेटे की आने वाली फिल्म द्रोण को व्यापारिक हानि न सहन करनी पड़े। वैसे बिग बी का दूसरा अर्थ बिग बच्चन हो नहीं सकता, क्योंकि उनके पिता हिन्दी साहित्य की जान थे। उस वक्त अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग के जरिए विदेश से ही माफी माँग ली थी, जबकि पूरी घटना का अमिताभ बच्चन को पता भी न था। उस घटना को मीडिया वालों ने भी गलत ढंग से दिखाया था, जिसका एक नमूना यहाँ देख सकते हैं। मैंने घटना के वक्त न्यूज चैनलों पर आ रही करवेज को देखा था, जिसमें दिखाया गया था कि प्रियंका और अभिषेक बच्चन इंग्लिश में बोल रहे थे, जिसके कारण जय बच्चन ने लोगों की भावनाओं को भाँपते हुए हिन्दी में बोलने की जरूरत समझी। अगर वैसा न होता तो प्रियंका चोपड़ा भी जय बच्चन के पीछे पीछे दोहराती हुई नजर न आती।
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आज शाहरुख खान भी उस मोड़ पर खड़ा है, जहाँ पर अमिताभ बच्चन थे, उनकी भी फिल्म रिलीज होने वाली थी, और अब शाहरुख की फिल्म भी रिलीज होने वाली है। मगर शाहरुख ने बिग बी की तरह घुटने नहीं टेके, उसने साफ शब्दों में कह डाला कि मैं माफी नहीं माँगूगा। शाहरुख खान ने अपने बयान पर अटल रहने का जो फैसला लिया है, वो ठाकरे परिवार के लिए किसी तमाचे से कम नहीं। राजू, राहुल के किरदार रुपहले पर्दे पर निभाने वाले शाहरुख खान के भीतर दी एंग्री यंग मैन न जाने कहां से जाग आया, चलो कहीं से भी आया, लेकिन एक आवाज तो उठी, जो ठाकरे को मुंह तोड़ जवाब दे सके।
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ठाकरे परिवार आजकल सबको नसीहत देने लगा हुआ है और मुम्बई को अपनी जंगीर बना लिया है। अभिवक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटा जा रहा है, लेकिन मुंह तोड़ जवाब आज तक किसी ने नहीं दिया। जब मुकेश अम्बानी ने कहा कि मुंबई किसी एक की नहीं है बल्कि हर भारतीय की है, तो उसको नसीहत दे डाली कि तुम बिजनस पर ध्यान दो, राजनीति मत करो।
इतना ही नहीं, जब महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर ने कहा "मैं मराठी हूं, मुझे मराठी होने पर गर्व है लेकिन मुंबई पूरे भारत की है और मैं भारत के लिए खेलता हूं।" तो उसको नसीहत देने के लिए बाला साहिब ठाकरे ने सामना के दो पन्ने काले कर डाले, और कहा कि तुम खेल पर ध्यान दो।
क्या देश को चलाने का ठेका ठाकरे परिवार ने ले रखा है? जो जवाब शाहरुख खान ने शिव सेना को दिया है,वो शिव सेना के लिए किसी तमाचे से कम नहीं, अगर अंत तक शाहरुख उस पर अटल रहे, तो अमिताभ का 'दी एंग्री यंग मैन' का फीता मैं शाहरुख खान के कंधे पर सजा दूँ, कोई और सजाए भले ही न सजाए।

दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति के नाम 'खुला पत्र'


समय था 26 जनवरी 2010,  दो देशों के राष्ट्रपति दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रिक देश की राजधानी नई दिल्ली में एक साथ बैठे हुए थे। एक भारत की महिला राष्ट्रपति और दूसरा दक्षिण कोरिया का पुरुष राष्ट्रपति। इन दोनों में समानता थी कि दोनों राष्ट्रपति हैं, दोनों एक ही मंच पर हैं, और तो और दोनों की चिंता का मूल कारण भी एक ही चीज से जुड़ा हुआ है, लेकिन उस चिंता से निटपने के लिए यत्न बहुत अलग अलग हैं, सच में।
दक्षिण कोरिया की समस्या भी आबादी से जुड़ी है, और भारत की भी। भारत बढ़ती हुई आबादी को लेकर चिंतित है तो दक्षिण कोरिया अपनी सिमटती आबादी को लेकर। यहाँ भारत को डर है कि आबादी के मामले में वो अपने पड़ोसी देश चीन से आगे न निकल जाए, वहीं दक्षिण कोरिया को डर है कि वो अपने पड़ोसी देश जापान से भी आबादी के मामले में पीछे न रह जाए। अपनी समस्या से निपटने के लिए जहाँ भारत में पैसे दे देकर पुरुष नसबंदी करवाई जा रही है, वहीं दक्षिण कोरिया में दफ्तर जल्दी बंद कर घर जाने के ऑर्डर जारी किए गए हैं, और तो और, ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले दम्पतियों को पुरस्कृत किया जा रहा है।
देश के गणतंत्रता दिवस के मौके पर ऐसे दो देश एक साथ थे, जो आबादी को लेकर चिंतित हैं, एक घटती को और एक बढ़ती आबादी को लेकर। आज से कई दशकों पहले भारत में भी कुछ ऐसा ही हाल था, जिस घर में जितनी ज्यादा संतानें, उसको उतना अच्छा माना जाता था। मैं दूर नहीं जाऊंगा, सच में दूर नहीं जाऊंगा। मेरी नानी के घर सात संतानें थी और मेरी दादी के घर छ:, जबकि दादा की आठ, क्योंकि मेरे दादा की दो शादियाँ हुई थी। जितना मेरे दादा-नाना ने अपने समय में परिवार को फैलाने में जोर दिया, उतना ही अब हम महंगाई के जमाने में परिवार को सीमित करने में जोर लगा रहे हैं।
गणतंत्रता दिवस के मौके पर अब जब दक्षिण कोरिया राष्ट्रपति ली म्यूंग बाक भारत यात्रा पर आएं हैं, तो वो केवल नई दिल्ली के राजपथ का नजारा देखकर न जाएं, मेरी निजी राय है उनको। इस यात्रा के दौरान उन्हें भारत की पूरी यात्रा करनी चाहिए, उनको बढ़ती आबादी के बुरे प्रभाव देखकर जाने चाहिए, ताकि कल को म्यूंग का पड़पोता आगे चलकर ऐसा न कहे कि मेरे पड़दादा ने फरमान जारी किया था, आबादी बढ़ाओ, और आज की सत्ताधारी सरकार कह रही है कि आबादी घटाओ।
मुझे यहाँ पर एक चुटकला याद आ रहा है। एक ट्रेन में एक गरीब व्यक्ति भीख माँगता घूम रहा था, उसके कपड़े बहुत मैले थे, वो कई दिनों से नहाया नहीं था। उसकी ऐसी हालत देखकर एक दरिया दिल इंसान को दया आई, और उसने उसको सौ का नोट निकालकर देना चाहा। सौ का नोट देखते ही वो भिखारी बिना किसी देरी के बोला, साहिब कभी मैं भी ऐसे ही दरिया दिल हुआ करता था। इसलिए मेरी दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति को निजी राय है कि वो दरियादिली जरा सोचकर दिखाए, वरना भारत होने में उसको भी कोई ज्यादा समय न लगेगा, वैसे अगर वहाँ काम करने वालों के कमी महसूस हो रही है तो भारत में बेरोजगारों की भी एक बड़ी फौज है, वो चाहें तो जाते जाते भारत का भला कर जाएं।

जय हिन्द

दोषी कौन औरत या मर्द?

जब श्री राम ने सीता मैया को धोबी के कहने पर घर से बाहर निकल दिया, तब सीता रूप में चुप थी औरत। जब जीसस को प्रभु मान लिया गया, और मरियम को कुछ ईसाईयों ने पूजने लायक न समझा, तब मरियम रूप में चुप थी औरत। मुस्लिम समुदाय ने औरतों को पर्दे में रहने का हुक्म दे दिया, तब मुलिस्म महिला के रूप में चुप थी औरत। बस औरत का इतना ही कसूर है। अगर वो तब सहन न करती तो आज कोई विवाद न होता, और आजादी की बात न आती।

कल एक महोदय का लेख पढ़ा, जिसमें लिखा था कि महिलाओं का कम कपड़े पहनकर निकलना छेड़खानी को आमंत्रित करना है। जैसे ही लेख पढ़ा दिमाग खराब हो उठा। समझ नहीं आया कि आखिर लिखने वाला किस युग का युवा है। एक ही पल में औरत पर पाबंदी लगा रहा है, जैसे आज भी औरत इसकी दासी हो। ऐसे लोग हमेशा सिक्के का एक पहलू देखते हैं, और शुरू कर देते हैं सलाह देना।

बड़े बड़े कुछेक साधू संत महात्माओं ने अपने निकट महिलाओं को नहीं आने दिया, इसका मतलब ये मत समझो कि वो महान थे। इसलिए उन्होंने ऐसा किया, बल्कि सत्य तो ये है कि वो औरत का सामना कर ही न सकते थे, औरत को देखते ही उनका मन कहीं डोल न जाए, इसलिए वो औरत से दूर रहते थे। सन्यासी जंगल तप के लिए क्यों जाता है, वो औरत की छवि को दिमाग से निकालने के लिए, लेकिन वो ऐसा कर पाने में हमेशा असफल होता है। वो जब तक औरत से दूर है, तब तक वो ठीक है, लेकिन जब वो औरत के सामने आता है तो खुद को संभाल भी नहीं पाता। तुम औरत को दोष मत दो। तुम अपने भीतर काम के बीज को खत्म ही नहीं कर सकते, इसलिए औरत को देखते ही तिलमिलाना शुरू कर देते हो। और फिर सारा दोष औरत के सिर पर मढ़ा देना तो सब अच्छी तरह जानते हैं। वो बुरी कैसे हो सकती है, जिसने पीरों पैगम्बरों संत महात्माओं को जन्म दिया हो।

कम कपड़े पहनकर लड़कियाँ इसलिए नहीं निकलती कि आते जाते लड़के उन पर फब्तियां कसें, बल्कि वो इसलिए पहनती हैं कि आज उसका चलन है। असल में परिवर्तन जीवन का नियम है, और इस बदलाव को समय के साथ स्वीकार करना सीखना होगा। क्या आज भी हम कच्चे मकानों में रहते हैं? क्या आज भी हमारे घर दीयों की रौशनी से जगमगाते हैं? क्या आज भी हम चूल्हे पर बनी हुई रोटी खाते हैं? क्या आज भी मर्द पहले की तरह स्वदेशी कपड़े पहनते हैं? अगर सबका जवाब नहीं है तो औरत पर ये सब क्यों थोपा जाए। उसकी कोख से जनने वाले उसी पर पाबंदी क्यों लगाते हैं?

अगर कोई लड़की कम कपड़े पहनकर निकलती है और कोई लड़का कमेंट्स करता है तो उसके लिए लड़की नहीं बल्कि लड़का जिम्मेदार है। वो दोषी है। उसके भीतर का काम जाग उठा है। अगर मर्द खुद को दोषमुक्त करना चाहता है तो खुद को ऐसा कर ले, कि अगर औरत मर्दों की तरह कपड़े उतार कर भी घूमे तो उसको कोई फर्क न पड़े। एक और सवाल जब कभी बहन या भाभी बच्चे को दूध पिला रही होती है, क्या तब वैसा ख्याल दिमाग में आता है, जैसा कि वैसी ही अवस्था में बैठी किसी अन्य महिला को देखकर आता है।

अंत में कुछ सवाल करता हुआ मैं उस युवक की बात मान लेता हूं, अगर महिला पर्दे में भी रहेगी तो क्या पुरुष की नजरें, उसकी कमर के ठुमकों पर आकर नहीं अटकेगी? क्या उसकी उभरी हुई छाती पर जाकर नहीं अटकेंगी। अगर तुम्हारा उत्तर है कि "हाँ अटकेंगी" है, तो अब क्या इन दोनों चीजों को औरत के शरीर अलग कर देना चाहिए। बोलो क्या करें? दोष किसका है?

क्या हो पाएगा मेरा देश साक्षर ऐसे में?

हिन्दुस्तान में गाँवों को देश की रूह कहा जाता है, लेकिन उस रूह की तरफ कोई देखने के लिए तैयार नहीं। देश की उस रूह में रहने वाले किसान सरकार की अनदेखियों का शिकार होकर आत्महत्याएं कर रहे हैं और बच्चे अपने अधूरे ख्वाबों के साथ अपनी जिन्दगी का सफर खत्म कर देते हैं। देश के पूर्व राष्ट्रपति श्री कलाम 2020 तक सुनहरे भारत का सपना देखते हैं, वैसे ही जैसे कि 1986 के बाद से क्रिकेट प्रेमी विश्वकप जीतने का सपना देख रहे हैं। पिछले दिनों प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि भारत विश्व के नक्शे पर अपनी अनोखी पहचान बना रहा है, इसमें शक भी कैसा? चीन के बाद जनसंख्या में भारत का नाम ही आता है। जहां जनसंख्या होगी, वहां बाजार तो होगा ही और कोई बनिया अपने ग्राहक को बुरा भलां कैसे कहेगा? श्री सिंह जी विश्व के नक्शे से नजर हटाते हुए आप भारत के नक्शे पर नजर डालिए, उस नक्शे के भीतर जाते हुए देश की रूह पर नजर दौड़ाईए, जहां देश के लिए अनाज पैदा करने वाला व्यक्ति एक वक्त भूखा सोता है। जहां पर बच्चों में प्रतिभाएं तो हैं, लेकिन उनको निखारने के लिए सुविधाएं नहीं। जहां गरीबी का अजगर उनके सपनों को आए दिन निगल जाता है। कभी जाकर देखो देश की रूह के भीतर जहां स्कूल केवल चारदीवारी बनकर रह गए हैं, टीचरों का नामोनिशान तक नहीं। कैसी है देश की शिक्षा प्रणाली कि गांव से पढ़कर निकला हुआ टीचर किसी गाँव के स्कूल में पढ़ाना ही पसंद नहीं करता। मुझे याद है जब एक बार पंजाबी की टीचर ने अपनी बदली किसी दूसरी जगह करवा ली थी, और उसकी जगह एक नए टीचर को हमारे स्कूल में तैनात किया गया था, लेकिन हुआ क्या, वो टीचर कभी स्कूल आया ही नहीं और छ: महीनों के भीतर अपनी ऊंची पहुंच के चलते उसने अपनी बदली कहीं दूसरी जगह करवा ली। रूह को मैं जड़ कहता हूं, अगर वो जड़ ही कमजोर हो गई तो किसी पेड़ का खड़े रहना असंभव है। देश की घटिया शिक्षा प्रणाली का एक और किस्सा, चार पांच गांव में एक स्कूल जो बारहवीं तक है। वहां दाखिला लेने पहुंचे तो स्वेटर बुन रही कुछ महिला टीचरों ने कहा, तुम किसी और स्कूल में दाखिला क्यों नहीं ले लेते? यहां अच्छी पढ़ाई नहीं होती। हो सके तो तुम लोग मंडी में किसी प्राईवेट स्कूल में दाखिला ले लो। क्या बात है! जिस स्कूल में टीचर ही ऐसे होंगे, तो बच्चों का भविष्य क्या होगा आप सोच सकते हैं। उस स्कूल में एक ही टीचर काम का था, जो कभी किताब देखकर नहीं पढ़ाता था, उसका मानना था जिन्दगी में कभी रट्टा मत मारो। अगर रट्टा मारोगे तो तुम जिन्दगी के असली अध्याय को कभी समझ न पाओगे। बस वो ही एक अकेला टीचर था, जो बिना किताब के पढ़ाता, बाकी टीचर तो आँख मूंदकर पढ़ाते थे, एक बच्चा ऊंची ऊंची पढ़ता और बाकी सब किताबों पर निगाहें टिका लेते। कोई सवाल जवाब नहीं, बस पढ़ते जाओ समझ आए चाहे न। क्या ऐसी शिक्षा प्रणाली देश को किसी सफलता की तरफ लेकर जा सकती है। देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं, कहते हर किसी को सुनता हूँ, लेकिन वो प्रतिभाएं आखिर हैं कहाँ? गरीब का अजगर, सरकार की लोक विरोधी नीतियाँ उन प्रतिभाओं को उभरने से पहले ही मार देती हैं। शिक्षा नीति में सुधार करना है तो पहले देश की रूह यानि गाँवों के स्कूलों को सुधारो। शहरी अभिभावक नम्बरों के खेल में उलझकर रह गए और गांव के गरीब अपने बच्चों को हस्ताक्षर करने योग्य ही कर पाते हैं?

आओ बनाएं "ऑल इंडिया एंटी-रेप फ्रंट"

टेनिस खिलाडी रुचिका गिरहोत्रा हत्या प्रकरण पर एक लेख पढ़ने के बाद मन में खयाल आया कि रुचिका जैसी हजारों बच्चियों को इंसाफ दिलाने के लिए क्यों न एक "ऑल इंडिया एंटी-रेप फ्रंट" बनाया जाए। इस कार्य को शिखर तक केवल ब्लॉगर जगत ही लेकर जा सकता है, क्योंकि आज भारत में से ही नहीं विदेशों में बैठे हुए भारतीय भी ब्लॉगिंग के कारण एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। ब्लॉगर एकता ही बलात्कार पीड़ित महिलाओं को इंसाफ दिला सकती है और उनको जिन्दगी जीने का फिर से एक मौका दे सकती हैं, ताकि रुचिका जैसे लड़कियां अपनी जिन्दगी से हाथ न धोएं। इनके हक में कलम घसीटने के अलावा इनके के लिए जमीनी स्तर पर भी काम किया जाना चाहिए। दिल्ली, मुम्बई, छतीसगढ़, गुजरात, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, असम, पश्चिमी बंगाल भारत के हर कोने में ब्लॉगर बैठे हुए हैं, जो ऐसी घटनाओं को देखते हुए ही कलम उठा लेते हैं। इतना ही नहीं, इन ब्लॉगरों में बहुत सारे डॉक्टर, बिजनसमैन, वकील, पत्रकार आदि पेशों से जुड़े हुए हैं, जो बलात्कार पीड़ित महिलाओं को इंसाफ दिला सकते हैं, मेरी आप सब से गुजारिश है कि कहीं से भी चुनो बस एक समाज सेवक चुनो, नेता नहीं और चलो शुरू करो एक ऐसा फ्रंट जो मासूम बच्चियों की जिन्दगियों से खेलने वालों को ऐसा सबक सिखाए, आने वाले कुछ सालों में इस फ्रंट की जरूरत ही न महसूस हो और हर महिला, बच्ची आजाद परिंदों की तरह सड़कों पर घूम सके। कलम घसीटते घसीटते अब कुछ पाँव भी घसीटना शुरू कर दे, तभी आपकी ब्लॉगिंग सार्थक होगी।

शौचालय से सोचालय तक


कल शाम श्रीमती वर्मा जी का अचानक फोन आया "आप जल्दी से हमारे घर आओ"। मैं उसकी वक्त सोचते हुए दौड़ा कि आखिर ऐसी कौन सी आफत आन खड़ी हुई कि उनको मुझे फोन लगाकर बुलाना पड़ा। मेरे घर से पाँच मिनट की दूरी पर श्रीमान वर्मा जी का घर है, मैंने अपने पैरों की चाल बढ़ाते हुए शीघ्रता के साथ उनके घर की तरफ बढ़ने की कोशिश की। दरवाजा खटखटाने की जरूरत न पड़ी, क्योंकि श्रीमती वर्मा ने दरवाजा खोलकर ही रखा था। मैंने देखा उनका रंग उड़ा हुआ था, जैसे कोई बड़ी वारदात हो गई हो। घर में फैले सन्नाटे को तोड़ते हुए मेरे स्वर श्रीमती वर्मा के कानों तक गए आखिर बात क्या हुई"। मेरी तरफ देखते हुए काँपते होठों से श्रीमति वर्मा बोली "मुझे बोले चाय बनाओ, मैं अभी आया"। "आखिर गए कहां, और कुछ बताकर गए कि नहीं" मैंने बात काटते हुए झट से कहा। श्रीमति वर्मा तुरंत बोली "कहीं नहीं गए"। "अगर कहीं गए ही नहीं तो टेंशन कैसी" मैंने कहा। "टेंशन इस बात की है कि वो पिछले दो घंटों से शौचालय में घुसे हुए हैं, मैंने कई दफा दरवाजा खटखटाया, लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आ रहा" अपनी आवाज को जोर लगाकर गले से बाहर फेंकते हुए श्रीमति वर्मा ने कहा। "क्या चाय से पहले आपका उनके साथ कोई झगड़ा हुआ था या किसी बात को लेकर मनमुटाव आदि" मैंने अपने चेहरे के हावभाव बदलते हुए श्रीमति वर्मा से पूछा। "वो सुबह से कम्प्यूटर के साथ चिपके हुए थे, आजकल उनको ब्लॉगिंग का नशा जो चढ़ा हुआ है" श्रीमति वर्मा ने कुछ उखड़े अंदाज में आते हुए कहा। "क्या बात है! वर्मा जी ने भी ब्लॉग शुरू कर दी" मैंने थोड़े उत्साह के साथ पूछा। "क्यों आपको भी इसकी लत लगी हुई है" श्रीमति वर्मा ने मेरी तरफ देखते हुए कहा। "नहीं! नहीं! मेरा तो दूर दूर तक इसके साथ कोई बावास्ता नहीं" हड़बड़ाहट में उत्तर देते हुए कहा। "जाने से पहले वो क्या कर रहे थे कुछ याद है" मैंने बात को पलटते हुए पूछा। 'हाँ...हाँ..याद आया वो किसी ललित शर्मा का ब्लॉग पढ़ रहे थे" श्रीमति वर्मा ने कुछ सोचते हुए कहा। " श्रीमति वर्मा जी फिर तो मुझे निकला चाहिए" मैंने अपने बालों में हाथ फेरते हुए और मुंद मुंद मुस्कराते हुए कहा। श्रीमति वर्मा ने बिना किसी देरी के कहा "और उनको क्यों निकालेगा"। "अब वो अपने भीतर की कला को बाहर निकालकर ही बाहर निकलेंगे" मैंने दरवाजे की ओर कदम बढ़ते हुए कहा। "श्रीमान शर्मा जी मैं कुछ समझी नहीं, आप क्या कहना चाहते हैं" श्रीमति वर्मा चेहरे पर अनजाने से हाव भाव लाते हुए पूछा। "शायद आपने ललित शर्मा का लेख नहीं पढ़ा" मैंने उनकी तरफ गंभीरता से देखते हुए कहा। ' ललित शर्मा जी कौन है? आखिर उन्होंने ऐसा क्या लिख दिया, जो शौचालय के भीतर उनको पिछले दो घंटों से बंद किए हुए है" उन्होंने टेबल पर रखे चल रहे कम्प्यूटर की तरफ बढ़ते हुए कहा। 'आप निश्चिंत रहें वो जल्द ही बाहर आ जाएंगे, फिलहाल मैं जा रहा हूं" मैंने श्रीमान वर्मा के घर का दरवाजा बंद करते हुए कहा। रात निकल गई श्रीमान वर्मा के घर से कोई फोन नहीं आया, जिसका मतलब था सब ठीक है कहते हैं न नो न्यू गूड न्यूज। अगली सुबह करीबन दस बजे के आसपास ऑफिस जाने से पहले मैं श्रीमान वर्मा जी के घर गया, देखा तो वर्मा जी टेबल पर उदास बैठे थे। "अब क्या हुआ" मैंने उनके पास जाकर कहा। 'पिछले एक घंटे से शौचालय जाने के लिए तरस रहा हूं, लेकिन तुम्हारी भाभी निकलने का नाम नहीं ले रही और इधर सूली पर जान अटकी हुई है" ज्यादा जोर न लगाते हुए रोता हुआ चेहरा बनाकर श्रीमान वर्मा जी बोले..उनकी स्थिति देखने लायक थी। "आखिर हुआ क्या" मैंने श्रीमान वर्मा की बाजू को पकड़ कर हिलाते हुए पूछा। 'तुमने उसको ललित शर्मा वाला लेख "जंगल कोठा का हिट मन्तर-इस्तेमाल करके देखो!" पढ़ने के लिए कह होगा कल जब मैं शौचालय में था, बस सारा खेल बिगड़ गया" श्रीमान वर्मा ने चेहरे को टेबल पर रखी बाजू पर टिकाते हुए कहा। 'अब आप पहेली ही पाते रहोगे कि कुछ साफ साफ भी बताओगे" मैंने थोड़ा गुस्से होते हुए कहा। "उसको आज कॉलेज में भाषण देना है और वो भाषण लिखने के लिए शौचालय में घुसी बैठी है और इधर जान निकले जा रही है" बहुत दयनीय हालत में श्रीमान वर्मा ने कहा। श्रीमान वर्मा की आंखों में बस आंसू नहीं निकले थे, बाकी तो कोई कसर न बची थी रोने में। 'अच्छा! अच्छा! अब समझ आया कि तुम्हारा शौचालय अब सोचालय बन चुका है" कुछ मजा लेते हुए मैंने कहा। इतने में दरवाजा खुलने की आवाज आई, फिर क्या था श्रीमान वर्मा जी ऐसे भागे कि जैसे कि आखिर निकलती हुई ट्रेन के पीछे कोई दूर का मुसाफिर भागता है। जितना दुखदायी श्रीमान वर्मा का चेहरा था, उससे कई गुना ज्यादा खुशनुमा चेहरा लेकर श्रीमति वर्मा जी शौचालय की तरफ से आई। "देखा कितनी जल्दी पड़ी है इनको, इनके पास तो सारा दिन ही पड़ा है सोचने के लिए, मुझे तो अभी कॉलेज जाना है" श्रीमति वर्मा ने मेरी तरफ देखते हुए कहा। मैंने "हाँ...हाँ में उत्तर देते हुए मन ही मन में सोचा कि अगर श्रीमति वर्मा जी कहीं आपने थोड़ी सी भी और देर कर दी होती तो श्रीमान वर्मा जी का सारा का सारा ज्ञान यहीं पर निकल जाता और बाद में लगाते रहते पोचा कि बाहर बैठकर ही क्यों नहीं सोचा।

खुद के लिए कबर खोदने से कम न होगा


ऑफिस शौचाल्य के भीतर मैं आईने के सामने खड़ा अपने हाथ पोंछ रहा था कि मेरे कानों में एक आवाज आई कि कैसी है पारूल "मेरी गर्भवती पत्नी", मैंने कहा सर जी बहुत बढ़िया है और अगले महीने मैं पिता बन जाऊंगा, जो भी हो बस एक ही काफी है लड़का या लड़की। इतना सुनते ही उन्होंने कहा कि हम "हिन्दु" एक एक पैदा करेंगे और वो "मुस्लिम" चार चार पैदा करेंगे तो अपने ही देश में हम अल्पसंख्यक होकर रह जाएंगे। अब तो चुप और शांत बैठे हैं, वो हम पर भारी पड़ जाएंगे। इस बात से मुझे एक सर्वे याद आ गया, जिसमें कहा गया था कि विश्व में हर चौथे आदमी मुस्लिम है। मैंने इस बात का जिक्र किया, और हम शौचालय से बाहर आ गए, जहां सब लोग मजदूरों की तरह काम कर रहे थे, उन मजदूरों में भी शामिल हूं। सर जी द्वारा कहे शब्द मेरे दिमाग के आसमान पर बादलों की तरह मंडराते रहे, शुक्रवार "25 दिसम्बर 2009" की रात मुझे जब नींद नहीं आ रही थी, तो मैंने रात के करीब पौने दो बजे अपने पीसी को ऑन किया और लिखने बैठ गया, शायद इस बोझ को दिमाग से हटाने के बाद नींद आ जाए। मैं उनकी बात से सहमत नहीं हूं, शायद अन्य हिन्दुवादी सोच के लोग कहेंगे कि वो सही थी, वो भी सिर्फ इस लिए उनके मन में भी भय है, जो कभी दो धर्मों को एक सूत्र में नहीं बंधने देता। बिल्कुल सत्य है कि मैं उनकी बात को आज की स्थिति में स्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि जिस तरह महंगाई बढ़ रही है, जिस तरह रोजगार कम हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में बड़ा परिवार खुद के लिए कबर खोदने से ज्यादा और कुछ न होगा। बढ़ती हुई जनसंख्या किसी भी एक विशेष समुदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए खतरा है, मुझे नहीं लगता कि मेरे इस तर्क से कोई असहमत होगा। अगर मैं उक्त सीनियर पर्सन की बात को मान लूं तो मुझे बढ़ती ही मुस्लिम आबादी तो शायद न मारे, यकीनन मेरी गरीबी और बढ़ती मंहगाई ही मुझे मार डालेगी। आनी तो आखिर सबको मौत ही है, मारने वाला तो केवल साधन है। मुझे याद है, जब वो सर्वे रिपोर्ट रिलीज हुई थी तो मुस्लिम समुदाय के एक व्यक्ति ने उसको बड़े गर्व के साथ अपने ब्लॉग पर डाला था, लेकिन वो इसके दूसरे पहलू को समझ न सका। उसने एक पहलू देखा और खुशी के मारे मेंढक की तरह उछलने कूदने लगा। उसने एक बार भी न सोचा कि उसकी समुदाय के लोग महिलाओं को बच्चे पैदा करने की मशीन बनाए हुए हैं। उस समुदाय की महिलाओं के साथ अन्याय हो रहा है। वो न समझ सका कि उसकी बहन, उसकी पत्नी एवं उसकी माँ भी उसकी समुदाय का हिस्सा हैं। समुदाय कोई भी हो, प्रसव पीड़ा का दर्द तो सब महिलाओं को एक सा ही होता है। उसने उस रिपोर्ट को देखकर एक बार भी न सोचा कि उन महिलाओं के कलियों से कोमल अरमानों को कैसे कुचल दिया जाता है। जनसंख्या का बढ़ना खुशी की नहीं अफसोस की बात है। उसने कभी उन रिर्पोटों को नहीं पढ़ा होगा, जिसमें आए दिन लिखा जाता है कि पाकिस्तान में आज इतने लोग मारे गए, अफगानिस्तान में इतने मारे गए, वो भी तो उनकी समुदाय के ही लोग हैं। जब वो दूसरा पहलू देखेगा तो सोचेगा कि शायद अब अपनी समुदाय को बचाने के लिए कुछ किया जाए, उनको बढ़ती संख्या के कु-फायदे समझाए जाएं। मुस्लिम समुदाय में भी बहुत से पढ़े लिखे लोग हैं, जो जानते हैं कि बढ़ती संख्या उनके के लिए भी खतरा है। कई पढ़े लिखे एवं समझदार मुस्लिम घरों में मैंने एक दो बच्चे देखें हैं। शायद वो भी मेरी तरह ही इस स्लोगन पर विश्वास करते हो "छोटा परिवार सुखी परिवार", असल में ही जिसने भी इस स्लोगन को तैयार किया होगा, कसम से वो व्यक्ति बहुत सकारात्मक सोच रखता होगा। उसने दुनिया के लिए एक बहुत शानदार और बढ़िया काम किया है। जिस तरह जनसंख्या बढ़ रही है, उसको देखते हुए मुझे ओशो की एक किताब में दर्ज एक बात याद आती है कि अलबर्ट आइंस्टीन से पूछा गया तीसरे विश्व युद्ध के बारे में आप क्या कुछ कहना चाहते हैं? उन्होंने उत्तर दिया कि मुझे अफसोस है कि मैं तीसरे विश्व युद्ध के बारे में तो कुछ भी नहीं कह सकता, लेकिन यदि तुम चौथे के बारे में जानना चाहते हो तो मैं कुछ बता सकता हूं। प्रश्न पूछने वाले ने थोड़ी देर सोचने के बाद पूछा कि चलो आप चौथे विश्व युद्ध के बारे में ही कुछ बता दो...तो उन्होंने उत्तर दिया, उसके बारे में मैं तो इतना ही कह सकता हूं कि चौथा विश्वयुद्ध कभी नहीं होगा।

औरत का दर्द-ए-बयां


शायद आज की मेरी अभिव्यक्ति से कुछ लोग असहमत होंगे। मेरी उनसे गुजारिश है कि वो अपना असहमत पक्ष रखकर जाएं। मैं उन सबका शुक्रिया अदा करूंगा। मुझे आपकी नकारात्मक टिप्पणी भी अमृत सी लगती है। और उम्मीद करता हूं, आप जो लिखेंगे बिल्कुल ईमानदारी के साथ लिखेंगे। ऐसा नहीं कि आप अपक्ष में होते हुए भी मेरे पक्ष में कुछ कह जाएं ताकि मैं आपके ब्लॉग पर आऊं। बेनती है, जो लिखें ईमानदारी से लिखें।


(1)
दुख होता है सबको
अब जब मर्द के नक्शे कदम*1 चली है औरत
क्यों भूलते हो
सदियों तक आग-ए-बंदिश में जली है औरत

*1 मर्दों की तरह मेहनत मजदूरी, आजादपन, आत्मनिर्भर

(2)
आज अगर पेट के लिए बनी वेश्या,
तुमसे देखी न जाए
जबरी बनाते आए सदियों से उसका क्या।
बनाने वाले ने की जब न-इंसाफी *1
तो तुमसे उम्मीद कैसी
तुम तो सीता होने पर भी देते हो सजा।

1* शील, अनच्छित गर्भ ठहरना

(3)
निकाल दी ताउम्र हमने गुलाम बशिंदों की तरह
चाहती हैं हम भी उड़ना शालीन परिंदों की तरह
लेकिन तुम छोड़ दो हमें दबोचना दरिंदों की तरह

(4)
घर की मुर्गी दाल बराबर तुम्हें तो लगी अक्सर
फिर भी तेरे इंतजार में रात भर हूं जगी अक्सर
न बाप ने सुनी, न पति ने और न बेटों ने
तो क्या सुननी थी मेरी चारदीवारी और गेटों ने

(5)
मैं करूं तो शील भंग होता है,
परम्पराएं टूटती हैं इस तहखाने की
काम से देर रात लौटूं,
तो निगाहें बदल जाती हैं जमाने की

(6)
तुम इंद्र बन नचाओ ठीक,
हम शौक से कदम थपथपाए
वो भी गुनाह हो गया
तुमने रखे रिश्ते हजारों से
हमने एक से बना
तो सब कुछ फनां हो गया
इस पंक्ति में मैंने हीर को देखा है, जो रांझा से बेहद प्यार करती है, लेकिन जब वो घरवालों बताती है तो उनका जवाब होता है कि हम बर्बाद हो गए। प्रेम कोई गुनाह नहीं, फिर भी अगर लड़की कहे तो गुनाह है, अगर वहां बेटा हो तो कोई बात नहीं, सोचेंगे।

ज्यादातर औरतें हमेशा एक में ही विश्वास करती हैं। उनको किसी दूसरे का प्रेम नहीं छलता। दूसरे का प्रेम उनको छलता है, जो अनदेखी का शिकार होती हैं, जिनको उनका पति केवल सेक्सपूर्ति की मशीन बनाकर रखता है।