Showing posts with label गुरूमंत्रा. Show all posts
Showing posts with label गुरूमंत्रा. Show all posts

कहीं विलेन न बन जाएं

बरिया की नई नई नौकरी लगी थी। बरिया बेहद मेहनती युवा था। काम के प्रति इतना ईमानदार कि पूछो मत, लेकिन बरिया जहां नौकरी करता था, वहां कुछ कम चोर भी थे। बरिया साधारण युवा नहीं जानता था कि जमाना बदल चुका है। मक्‍खनबाजों का जमाना है। काम वालों की भी जरूरत है, क्‍यूंकि घोड़ों की भीड़ में गधे भी चलते हैं। बरिया सबसे अधिक काम करता। वो हर रोज अपने हमरुतबाओं से अधिक वर्क काम करता, जैसे गधा कुम्‍हार के लिए।

मगर कुछ दिनों बाद बरिया निराश रहने लगा। उसको लगा, उसके साथी सारा दिन गपशप मारते हैं, वो कार्य करता है, लेकिन उसका बॉस उसको उतना ही मानता है, जितना के उसके हमरुतबाओं को। बरिया उदास परेशान कई दिनों तक तो रहा, लेकिन अब उसके भीतर बैठा इंसान सब्र खोने लगा। वो कुछ भी बर्दाशत करने को तैयार नहीं था। वो अगले दिन बॉस के टेबल पर पहुंचा। उसने अपने हमरुतबाओं के कार्यशैली की भरपूर निंदा की, जो उसका बॉस अच्‍छी तरह पहले से जानता था। बॉस भी मन ही मन में सोच रहा था, अगर वो काम करने लायक होते तो तेरी जरूरत किसे थी। बॉस ने ध्‍यान से शिकायत को सुना।

इस दिन के बाद बरिया को शिकायतों की लत लग गई। छोटी छोटी बातों पर शिकायत करना जारी हो गया। अंत में बॉस के मन में बरिया की नकारात्‍मक छवि बन गई। बरिया निरंतर शिकायतों की वजह से अपनी गुणवत्‍ता और काम के प्रति ईमानदारी खो बैठा। जब एप्रेजल करने का समय आया तो बरिया उस वक्‍त हैरान रह गया, जब उसके बॉस ने उसको कहा, बरिया जितना समय तुमने दूसरों की गलतियां गिनने और गिनाने में गुजारा, काश उतना समय अपने कार्य को और बेहतर बनाने में लगाया होता तो शायद आज मुझे तुम्‍हारा शत प्रतिशत एप्रेजल करने में भी कोई दिक्‍कत न होती, मगर तुम्‍हारी कार्य शैली तो उनसे भी ज्‍यादा खराब हो गई। बरिया उदास कांफ्रेंस रूम से बाहर निकल गया। मगर बरिया की कहानी बहुत से युवाओं के लिए पथ प्रदर्शक बन गई।

बरिया की कहानी से नसीहत लेते हुए अगर आप ऑफिस में बहुत अच्‍छा काम करते हैं, तो आपको बहस करने से बचना चाहिए। फालतू की बातों एवं शिकायतों से गलत छवि बनती है। अगर आप उच्‍चाधिकारियों को प्रभावित करना चाहते हैं, तो फोकट की बातें करने की बजाय आपको काम करके खुद को साबित करना चाहिए। सिर्फ खुद के बारे में दलीलें देते रहने से लोग आपसे परेशान हो जाते हैं और एक समय ऐसा आता है कि वे आपकी बातों पर गौर करना बंद कर देते हैं। यह बहुत बुरी स्‍थिति होती है। आप में हीरो है। यह तो केवल आपका काम बता सकता है। इसलिए बेकार की बातों में पड़ कर कहीं विलेन न बन जाएं।

बुजुर्ग की खुशी का रहस्य

मैं कभी नहीं भूल सकता, एक बड़ा सा घर, और वो बुजुर्ग, जो सुबह सुबह मुझे गैलरी में खड़ा मिलता है। मैं उसको देखता हूँ, वो मुझे देखता है। हल्की सी मुस्कान का आदान प्रदान होता है दोनों में, और फिर मैं आगे बढ़ जाता हूँ, बिना कुछ बोले। इस तरह की वार्तालाप कई दिनों तक चलती है हम दोनों में, लेकिन एक दिन होठों की मुस्कान छोटे से बोलते संवाद में बदलती है, और मैं पूछ बैठता हूँ, आपकी खुशी का राज क्या है? मैं जानना चाहता हूँ, दुनिया में मुझे हर शख्स दुखी मिलता है, लेकिन आपका चेहरा देखते ही दुनिया भर के दुखी लोग मेरी आँख से ओझल हो जाते हैं, क्यों?। जवाब में वो बुजुर्ग उंगली का इशारा सामने की ओर करता है, यहाँ पर सरकारी जमीं पर एक झुग्गी बनी हुई है, जिसमें कम से कम पाँच लोग रहते हैं मुर्गे मुर्गियों (कॉक एंड हैनकॉक) के साथ।

इससे बड़ी दुर्घटना क्या होगी?


लेखक कुलवंत हैप्पी
जिन्दगी सफर थी, लेकिन लालसाओं ने इसको रेस बनाकर रख दिया। जब सफर रेस बनता है तो रास्ते में आने वाली सुंदर वस्तुओं का हम कभी लुत्फ नहीं उठा पाते, और जब हम दौड़ते दौड़ते थक जाते हैं अथवा एक मुकाम पर पहुंचकर पीछे मुड़कर देखते हैं तो बहुत कुछ छूटा हुआ नजर आता है। उसको देखकर हम फिर पछताने लगते हैं, और हमें हमारी जीत भी अधूरी सी लगती है। अगर जिन्दगी को सफर की तरह लेते और रफतार धीमे रखते तो शायद मंजिल तक पहुंचने में देर होती, लेकिन दुर्घटना न होती। उससे बड़ी दुर्घटना क्या होगी, रूह का दमन हो जाए, और हड्डियों का साँचा बचा रह जाए। जिन्दगी जैसे खूबसूरत सफर को हम दौड़ बनाकर रूह का दमन ही तो करते हैं, जिसका अहसास हमको बहुत देर बाद होता है। जो इस अहसास को देर होने से पहले महसूस कर लेते हैं, वो इस सफर के पूर्ण होने पर खुशी से भरे हुए होते हैं, उनके मन में अतीत के लिए कोई पछतावा नहीं होता।

पिछले दिनों बीबीसी की हिन्दी वेबसाईट पर रेणु अगाल का भूटान डायरी सिरलेख से लिखा एक लेख पढ़कर इसलिए अच्छा लगा क्योंकि उन्होंने अपने लेख के मार्फत दुनिया के विकासशील देशों को आईना दिखाने की कोशिश की, जो आर्थिक मजबूती की होड़ में अपने असली धन (प्रकृति) को बर्बाद किए जा रहे हैं।

बीबीसी संवाददाता रेणु अगाल लिखती हैं कि दक्षिण एशिया के ज़्यादातर देशों में अभी तापमान ने कीर्तिमान खड़ा कर रखा है, ऐसे में पहाड़ों से घिरे खुशनुमा मौसम का लुत्फ़ ही अलग है, और भूटान के माहौल का मज़ा सभी अतिथि उठाते दिख रहे है। यहाँ अपने पारंपरिक कपड़ों, पुराने डिजाइन की लकड़ी पर साज सज्जा कर बनाए मकान सभी सहेज के रखे गए हैं। यहाँ तक की सरकार अपनी देश की पहचान बनाए रखने और अपने संस्कृति को बचाने के लिए ज्यादा पर्यटकों को भी नहीं आने देती। हर सैलानी को दो सौ डॉलर रोज़ देने पड़ते है यानि दुनिया का सबसे महंगा पर्यटक स्थल आप भूटान को कह सकते है। यहाँ तक की पड़ोसी नेपाल से आने वाले लोगों को भी यहाँ ज्यादा पसंद नहीं किया जाता, पर भारतीयों को न तो यहाँ डॉलर देने पड़ते है और न ही उन्हें वैमनस्य से लोग देखते है।

थोड़े की ज़रूरत है...

यहाँ की सरकार का फ़लसफा थोड़ा अलग है. थोड़ा है, थोडे की ज़रूरत है और थोड़ा ही काफ़ी है। भूटान सरकार सीमित संख्या में पर्यटकों को आने देती है। सोच के देखिए कि अगर आपका नज़रिया ऐसा हो जाए तो न आप पैसे के पीछे भागेंगे, न आप जीवन की दौड़ में किसी को मात देने में व्यस्त होंगे। आप कमाएँगे और मौज करेंगे। न ब्लड प्रेशर, न दिल का दौरा, बस होठों पर मुस्कान और गुलाबी गाल। ऐसे जीवन का मजा लेने के लिए ही सही आप भूटान आ सकते हैं और अगर नहीं तो अगली बार जिन्दगी की मार धाड़ में जुटने के पहले सोचिएगा क्या वाकई यह सब जरूरी है।

चर्चा विराम का नुस्खा : अधजल गगरी छलकत जाय

लेखक कुलवंत हैप्पी 


यह कहावत तब बहुत काम लगती है, जब खुद को ज्ञानी और दूसरे को मूर्ख साबित करना चाहते हों। अगर आप चर्चा करते हुए थक जाएं तो इस कहावत को बोलकर चर्चा समाप्त भी कर सकते हैं मेरी मकान मालकिन की तरह। जी हाँ, मेरी जब जब भी मेरी मकान मालकिन के साथ किसी मुद्दे पर चर्चा होती है तो वे अक्सर इस कहावत को बोलकर चर्चा को विराम दे देती है। इसलिए अक्सर मैं भी चर्चा से बचता हूँ, खासकर उसके साथ तो चर्चा करने से, क्योंकि वो चर्चा को बहस बना देती है, और आखिर में उक्त कहावत का इस्तेमाल कर चर्चा को समाप्त करने पर मजबूर कर देती है। मुझे लगता है कि चर्चा और बहस में उतना ही फर्क है, जितना जल और पानी में या फिर आईस और स्नो में।

कभी किसी ने सोचा है कि सामने वाला अधजल गगरी है, हम कैसे फैसला कर सकते हैं? क्या पता हम ही अधजल गगरी हों? मुझे तो अधजल गगरी में भी कोई बुराई नजर नहीं आती। कुछ लोगों की फिदरत होती है, हमेशा सिक्के के एक पहलू को देखने की। कभी किसी ने विचार किया है कि अधजल गगरी छलकती है तो सारा दोष उसका नहीं होता, कुछ दोष तो हमारे चलने में भी होगा। मुझे याद है, जब खेतों में पानी वाला घड़ा उठाते थे, तो वहाँ भरा हुआ भी छलकता था, और अध भरा  भी छलकता था, क्योंकि खेतों में जमीं समतल नहीं होती, जब जमीं समतल नहीं होगी, तो हमारे पाँव भी सही से जमीं पर नहीं टिक पाएंगे।

अधजल गगरी से याद आया, हमारे गाँव में लाजो-ताजो नामक दो बहनें रहती थी, वो पानी भरने के लिए गाँव से बाहर कुएं पर जाती थी, दूसरी महिलाओं की तरह। तब तो गाँव के रास्ते भी कच्चे थे, स्वाभिक था ऐसे में पाँव पर मिट्टी का पाऊडर लगना। ताजो का घड़ा बिल्कुल नया था, जबकि लाजो के घड़े के ऊपर वाले हिस्से में छोटा सा सुराख था, इसलिए वो हमेशा अपने घड़े को अधभरा रखती। जब वो घड़ा लेकर चलती तो पानी घड़े के भीतर छलकता, ऐसे में कुछ पानी जमीं पर गिर जाता और कुछ उसके जिस्म पर, जो उसके जिस्म को ठंड पहुंचाता। ताजो का घड़ा, लाजो के सुराख वाले घड़े को देखकर अक्सर सोचता, एक तो मुझसे आधा पानी लाता है, ऊपर से लाजो को भिगोता है, फिर भी मुझसे ज्यादा लाजो इसकी तरफ ज्यादा ध्यान देती है। कुछ समय बाद सुराख वाला घड़ा टूट गया, उसके टूटने पर लाजो को वैसा ही सदमा पहुंचा, जैसा किसी अपने के चले जाने पर पहुंचता है। रोती हुई लाजो को दूसरे घड़े ने सवाल किया कि तुम इसके लिए क्यों रो रही हो, ये घड़ा तो अक्सर तुम्हें भिगोता था, और पानी भी मुझसे आधा लाता था। तो लाजो ने कहा, "तुम्हें याद है, जब तुम हमारे घर नए नए आए थे"। घड़ा बोला," हाँ, मुझे याद है"। लाजो ने कहा, "तुमने देखा था तब उस रास्ते को जहाँ से हम रोज गुजरते हैं'। घड़ा ने कहा, 'हाँ', तब वो बिल्कुल घास रहित था"। घास रहित शब्द सुनते ही लाजो ने कहा, "अगर उस रास्ते पर घास उग आई है, तो सिर्फ और सिर्फ इस सुराख वाले घड़े के कारण, अगर ये घड़ा छलकता न, तो कभी भी उस रास्ते पर आज सी हरियाली न आती"। इतना सुनते ही दूसरा घड़ा चुप हो गया।

जरूरी नहीं कि श्री गुरू ग्रंथ साहिब, बाईबल, गीता और कुरान का तोता रटन करने वाला ज्ञानी हो, ऐसा भी तो हो सकता है कि कोई व्यक्ति इन सब धार्मिक ग्रंथों की अच्छी अच्छी बातें ग्रहण कर, अच्छी तरह से अपने जीवन में उतार ले। इस मतलब यह तो न होगा कि सामने वाले के पास अल्प ज्ञान है, सिर्फ इस आधार पर कि उसको पूरे ग्रंथ याद नहीं। मुझे लगता है, जितना उसके पास है, वो उसके लिए काफी है, क्योंकि वो तोता रटन करने की बजाय, उसको समझकर जीवन में उतरा रहा है, जो लोग तोता रटन पर जोर देते हैं, वो धार्मिक होकर भी ताजो के भरे हुए घड़े की तरह किसी दूसरे का फायदा नहीं कर सकते, और ताजो की घड़े की तरह अधजल वाले लाजो के घड़े से ईष्या करते रहते हैं। ग्रंथों में ईष्या को त्यागने के बारे में सिखाया गया है, लेकिन तोता रटन करने वाला क्या जाने इस ज्ञान को।

नित्यानंद सेक्स स्केंडल के बहाने कुछ और बातें


लेखक कुलवंत हैप्पी
नई दिल्ली से इंदौर तक आने वाली मालवा सुपरफास्ट रेलगाड़ी की यात्रा को मैं कभी नहीं भूल सकता, अगर भूल गया तो दूसरी बार उसमें यात्रा करने की भूल कर बैठूँगा। इस यात्रा को न भूलने का एक और दूसरा भी कारण है। वो है, हमारे वाले कोच में एक देसी साधू और उसकी विदेशी चेली का होना। साधू चिलम सूटे का खाया हुआ 32 साल का लग रहा था, जबकि उसके साथ साधुओं का चोला पहने बैठी वो लड़की करीबन 25-26 की होगी। उन दोनों की जोड़ी पूरे कोच मुसाफिरों का ध्यान खींच रही थी, हर कोई देखकर मेरी तरह शायद हैरत में पड़ा सोच रहा था कि आखिर ऐसी कौन सी नौबत आई होगी कि भरी जवानी में साधुओं का साथ पसंद आ गया, और वो भी चिलमबाज साधु का। मैं एक और बात भी सोच रहा था कि अगर एक महिला साथी ही चाहिए तो गृहस्थ जीवन में क्या बुराई है? जिसको त्यागकर लोग साधु सन्यासी बन जाते हैं। शायद जिम्मेदारियों से भाग खड़े होने का सबसे अच्छा तरीका है साधु बन जाना। स्वर्ग सा गृहस्थ जीवन छोड़कर पहले साधु बनते हैं, फिर समाधि छोड़कर संभोग की तरफ आते हैं, और जन्म देते हैं सेक्स स्केंडल को।

स्वामी नित्यानंद जी आजकल सेक्स स्केंडल के कारण ही तो चर्चाओं में हैं। आज तक तो उनके बारे में कभी सुना नहीं था, लेकिन वो सेक्स स्केंडल के कारण चर्चा में आए, और हमारे ज्ञान में बढ़ोतरी कर दी कि कोई नित्यानंद नामक स्वामी दक्षिण में भी हुए हैं। शायद आपको याद होगा कि सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के संत गुरमति राम रहीम सिंह भी इस कारण चर्चा में आए थे। उन पर भी छेड़छाड़, बलात्कार जैसे आरोप लगे हैं। जब भी सेक्स स्केंडल में किसी संत महात्मा को लिप्त देखता हूँ तो सोचता हूँ कि हमारी सोच पर पड़ा हुआ पर्दा कब हटेगा? हम बाहरी पहनावे पर कब तक यकीन करते रहेंगे? गिद्दड़ शेर की खाल पहनने से शहर तो नहीं हो जाता, और कोई भगवा पहन लेने से साधु तो नहीं हो जाता? कोई दो तीन अच्छे प्रवचन देने से भगवान तो नहीं हो जाता? लेकिन क्या करें, हम सब आसानी से चाहते हैं। जब नित्यानंद जैसे मामले सामने आते हैं तो हम आहत होते हैं। मुझे लगता है हम कभी आहत नहीं होंगे, अगर हम गुरू को भी मिट्टी के बने घड़े की तरह ठोक बजाकर देखें, लेकिन हम व्यक्ति को भगवान मानते वक्त कभी भी उसका निरीक्षण करना पसंद नहीं करते? अगर निरीक्षण करने का समय होता तो आत्मनिरीक्षण न कर लेते।

मुझे याद आ रही है लुधियाना के पास स्थित एक श्री गुरूद्वारा साहिब की घटना। वहाँ हर रोज सुबह चार बजे गुरुबाणी का उच्चारण होता है, सभी श्री गुरूद्वारा साहिबों की तरह। एक सुबह एक गाँव वाले की निगाह श्री गुरू ग्रंथ साहिब के बीचोबीच पड़े मोबाइल पर पड़ गई, और उस मोबाइल में अश्लील वीडियो चल रहा था। यह सिलसिला कब से चल रहा था, इसका तो पता नहीं, लेकिन जब पकड़ा गया तो गाँवों ने ग्रंथी की खूब धुनाई की। ऐसी घटनाएं मजिस्दों, मंदिरों, गुरूद्वारों, चर्चाओं एवं डेरों में आम मिल जाएंगी। फिर भी कोई नहीं सोचता आखिर ऐसा क्यों होता? ऐसा इसलिए होता है कि हम बाहरी तौर से कुछ भी अपना लेते हैं, लेकिन भीतर तक जा ही नहीं पाते। कपड़ों की तरह हम भगवान बदलते रहते हैं। जिस संत की हवा हुई, हम उसकी के द्वार पर खड़े होने लगते हैं, नफा मिले तो ठीक, नहीं तो नेक्सट।

एक और घटना याद आ रही है, जो ओशो की किताब में पढ़ी थी, एक जगह ओशो ध्यान पर भाषण दे रहे थे, उनके पास एक व्यक्ति आया और बोला मैं सेक्स को त्यागना चाहता हूँ, तो ओशो ने कहा, जब आज से कुछ साल पहले मैं सेक्स पर बोल रहा था, तो तुम भाग खड़े हुए थे, और आज मैं ध्यान पर बोल रहा हूँ तो सेक्स से निजात पाने की विधि पूछने आए हो। इस वार्तालाप से मुझे तो एक बात ही समझ में आती है कि आप जितना जिस चीज से भागोगे, वो उतना ही तुम्हारे करीब आएगी। उतना ही ज्यादा तुम्हें बेचैन करेगी।

असल में सृष्टि सेक्स की देन है, लेकिन केवल मनुष्य ने सेक्स को भूख बना लिया। वो इस भूख से निजात पाने के लिए सन्यास जैसे रास्ते तैयार करता है और एक दिन उस व्यक्ति की तरह उस भूख को मिटाने के लिए कुछ भी खा जाता है, जो घर छोड़कर रेगिस्तान में इसलिए चला गया कि वो भूख से निजात पा सके। जब उसे घर से गए हुए काफी दिन हो गए तो पत्नि ने कहा, हाल चाल तो पूछ लूँ कहाँ हैं? कैसे हैं? उसने एक चिट्ठी और कुछ फूल भेजे। कुछ दिनों बाद पति का जवाब आया, "मैं बढ़िया हूँ, और तुम्हारे भेजे हुए फूल बेहद स्वादिष्ट थे"। ज्यादातर साधु सन्यासी ऐसे ही हैं, जो सेक्स की भूख से निजात पाने के लिए औरत से दूर भागते हैं, लेकिन वो भूल जाते हैं कि वो भूख को भयानक रूप दे रहे हैं।

जब भयानक भूख सेक्स स्केंडल के रूप में सामने आती है तो केस दर्ज होते हैं। उम्र भर की कमाई हुई इज्जत मिट्टी में मिल जाती हैं। दूध का दूध पानी का पानी हो जाता है। कितनी हैरानी की बात है कि जन्म मृत्यु के चक्कर मुक्त करने वाले खुद मौत से कितना डरते हैं। उनका कोर्ट में पेश न होना बताता है। अगर वो जन्म मृत्यु के चक्कर से मुक्त हैं तो कोर्ट में खड़े क्यों नहीं हो जाते, सच को हँसकर गले क्यों नहीं लगाते। इसलिए मैं कहता हूँ कि मखमली लिबास ओढ़कर भाषण देना बहुत आसान है। मंसूर की तरह अल्लाह का सच्चा आशिक होना बेहद मुश्किल है।

जीत है डर के आगे

लेखक कुलवंत हैप्पी

ड्यू
के टीवी विज्ञापन की टैग-लाईन 'डर के आगे जीत है' मुझे बेहद प्रभावित करती है, नि:संदेह औरों को भी करती होगी। सच कहूँ तो डर के आगे ही जीत है, जीत को हासिल करने के लिए डर को मारना ही पड़ेगा, वरना डर तुम को खा जाएगा।

पिछले दिनों रिलीज हुई फिल्म "माई नेम इज खान" में एक संवाद है 'डर को इतना मत बढ़ने दो कि डर तुम्हें खा जाए'।

असलियत तो यही है कि डर ने मनुष्य को खा ही लिया है, वरना मनुष्य जैसी अद्भुत वस्तु दुनिया में और कोई नहीं।


मौत का डर, पड़ोसी की सफलता का डर, असफल होने का डर, भगवान द्वारा शापित कर देने का डर, जॉब चली जाने का डर, गरीब होने का डर, बीमार होने का डर। सारा ध्यान डर पर केंद्रित कर दिया, जो नहीं करना चाहिए था। एक बार मौत के डर को छोड़कर जिन्दगी को गले लगाने की सोचो। एक बार मंदिर ना जाकर किसी भूखे को खाना खिलाकर देखो। एक बार असफलता का डर निकालकर प्रयास करके देखो। असफलता नामक की कोई चीज ही नहीं दुनिया में, लोग जिसे असफलता कहते हैं वो तो केवल अनुभव।

अगर थॉमस अलवा एडीसन असफलता को देखता, तो वो हजारों बार कोशिश ना करता और कभी बल्ब ईजाद न कर पाता।

दुनिया के सबसे बड़े तानाशाहों में हिटलर का नाम शुमार है। क्या आपको पता है? वो भीतर से डर का भरा हुआ था। ओशो की एक किताब में दर्ज है कि हिलटर की एक प्रेमिका थी, लेकिन उसने अपनी प्रेमिका को पास नहीं आने दिया, क्योंकि उसको डर था अगर कोई धोखे से उसको मार गया तो उसका सारा किया कराया खत्म हो जाएगा। वो किसी को अपने कंधे पर हाथ तक रखने नहीं देता था। आप जानकर हैरान होंगे, मरने के कुछ समय पहले, जब मौत पक्की हो गई थी, जब बर्लिन पर बम गिरने लगे, एवं हिटलर जिस तलघर में छिपा हुआ था, उसके सामने दुश्मन की गोलियाँ गिरने लगी, और दुश्मनों के पैरों की आवाज बाहर सुनाई देने लगी, द्वार पर युद्ध होने लगा और जब हिटलर को पक्का हो गया कि मौत निश्चित है, अब मरने से बचने का कोई उपाय नहीं है, तो उसने पहला काम यह किया कि एक मित्र को भेजा और कहा कि जाओ आधी रात को उस औरत को ले आओ। शादी कर लूँ।

मित्र ने कहा, यह कोई समय नहीं शादी करने का? हिटलर ने कहा, अब कोई भय नहीं है, अब कोई भी मेरे निकट हो सकता है, अब मौत बहुत निकट है। अब मौत ही करीब आ गई है, तब किसी को भी निकट लिया जा सकता है।

इसलिए कहता हूँ, डर को मारकर आगे बढ़े, मुझे तो डर अंधेरे का समानार्थी शब्द ही नजर आता है, अगर आप अंधेरे को देखकर रूक जाएंगे तो रोशनी से आप रूबरू न हो पाएंगे। रोशनी ही तो सफलता है। चमक ही तो सफलता है। डर रखना है तो ऐसा रखो कि हमारे कार्य हमारी छवि को धूमिल न कर दें। ऐसा डर भी आपको सफलता की ओर लेकर जाएगा। लेकिन अच्छे काम को करने से डरना, आपको असफलता और निराशा की तरफ लेकर जाएगा।

ओशो सेक्स का पक्षधर नहीं

लेखक कुलवंत हैप्पी
खेतों को पानी दे रहा था, और खेतों के बीचोबीच एक डेरा है, वैसे पंजाब के हर गाँव में एकाध डेरा तो आम ही मिल जाएगा। मेरे गाँव में तो फिर भी चार चार डेरे हैं, रोडू पीर, बाबा टिल्ले वाला, डेरा बाबा गंगाराम, जिनको मैंने पौष के महीने में बर्फ जैसे पानी से जलधारा करवाया था, रोज कई घड़े डाले जाते थे उनके सिर पर, और जो डेरा मेरे खेतों के बीचोबीच था, उसका नाम था डेरा बाबा भगवान दास। गाँव वाले बताते हैं कि काफी समय पहले की बात है, गाँव में बारिश नहीं हो रही थी, लोग इंद्र देव को खुश करने के लिए हर तरह से प्रयास कर रहे थे, लेकिन इंद्रदेव बरसने को तैयार ही नहीं था। दुखी हुए लोग गाँव में आए एक रमते साधु भगवान दास के पास चले गए। उन्होंने उनसे बेनती बगैरह किया।

ह्यूमन एंटी वायरस

हर बात को लेकर विरोधाभास तो रहता ही है, जैसे आपने किसी को कहते हुए सुना होगा "मुफ्त में कोई दे, तो ज़हर भी खा लें", वहीं किसी को कहते हुए सुना होगा "मुफ्त में कोई दवा भी न लें, सलाह तो दूर की बात"। हम मुफ्त में मिला ज़हर खा सकते हैं, लेकिन मुफ्त में मिली एक सही सलाह कभी निगलना नहीं चाहेंगे। फिर भी मुझ जैसे पागलों की देश में कमी नहीं, जो मुफ्त की सलाह देने में यकीन रखते हैं, जबकि वो जानते हैं कि मुफ्त की सलाह मानने वाले बहुत कम लोग हैं। इसकी स्थिति वैसी ही है जैसे किसी के प्रति सकारात्मक नजरिया, कोई आपसे कहे वो व्यक्ति बुरा है, आप नि:संदेह मान लेंगे, लेकिन अगर कोई कहे बहुत अच्छा है तो संदेह प्रकट हो जाएगा, स्वर्ग को लेकर संदेह हमेशा ही रहा है, लेकिन नरक को लेकर कोई संदेह नहीं।

मानो लो आप अपनी मस्त कार में जा रहे हैं, कार में बैठे हुए आप केवल कार के भीतर ही निगाहें रखें लाजमी तो नहीं, आप बाहर की ओर की देख रहें होते हैं, कार की जगह बस भी मान सकते हैं कोई फर्क नहीं पड़ता। आपको बाहर रोड़ पर एक महिला के पास खड़ा एक रोता हुआ बच्चा दिखाई पड़ता है, और वो रो रहा है, वो बहुत गंदा दिखाई पड़ रहा है कई दिनों से मानो नहाया न हो, और उसकी माँ उसके रोने की ओर ध्यान न देकर सिर्फ पत्थर तोड़ने में लगी हुई है। आप उसकी स्थिति को देखकर उसके प्रति विचारक हमदर्दी प्रकट करने लगते हैं अपने ही भीतर, वो बच्चा वहीं रो रहा है, लेकिन आपकी कार या बस उससे आधा किलोमीटर दूर निकल आई, लेकिन मानसिक तौर पर वो बच्चा आपके साथ ही चल रहा है। आप भीतर ही भीतर क्रोध से भरे जा रहे हैं, आपके विचार आपको गुस्सैल बना रहे हैं, देश के सिस्टम के प्रति आप भीतर ही भीतर चिल्लाने लगते हैं, अचानक आपसे कोई पूछता है कहाँ जाना है ड्राईवर या कंडक्टर। आप क्रोधित हैं, लाजमी है कि आपकी बोली भी वैसी ही होगी, आपका जवाब सुनकर सामने वाला भी क्रोधित हो उठेगा। उसकी आवाज में आया रुखपन आपको चुभने लगेगा काँटे की तरह।

आपको पता है ऐसा क्यों हुआ? जब आपने उस बच्चे को देखा तो आपके भीतर नकारात्मकता घुस गई, वायरस घुस गया, अब जो भी वस्तु उससे लगेगी वो वायरस युक्त हो जाएगी। ऐसे में आपका व्यवहार बिगड़ेगा, आपका व्यवहार बिगड़ेगा, तो आप का आस पड़ोस ख़राब होवेगा, जब वो प्रभावित होवेगा तो आप कैसे नहीं प्रभावित होंगे। आपको माहौल से नफरत होने लगेगी, आपका दम घुटने लगेगा। ऐसे में आपको जीवन नरक लगेगा, जो उस घटना से पहले स्वर्ग लग रहा था। अगर कम्प्यूटर के लिए एंटी वायरस बना है तो मानव के लिए भी एंटी वायरस है। आपके पास दो विकल्प हैं, एक तो उसी समय विचार को त्याग दें या फिर आप बस या कार से उतरकर, जो कुछ आपके पास है, उसका कुछ हिस्सा उस मासूम को दें आएं। फिर उसके चेहरे पर एक मुस्कान आएगी, जिसको देखकर आपकी मुस्कान डबल हो जाएगी, अब आपके साथ लगने वाली हर वस्तु वायरस मुक्त हो जाएगी। आपका व्यवहार अच्छा होगा, तो आपका आस पास अच्छा होगा, और जीवन फिर से स्वर्ग की ओर बढ़ेगा। मेरे कहने का सिर्फ इतना अर्थ है विचारों को त्याग कर सिर्फ और सिर्फ करनी में यकीन रखो, कभी दुखी न होगे। भारत से अच्छा दुनिया में कोई स्वर्ग नहीं, लेकिन भारत को नरक बनाया है नकारात्मक विचारों ने, फालतू की चर्चाओं ने। जो अपने पास है उसकी कदर नहीं, लेकिन पड़ोसी की पत्नि अच्छी लगती है। दुखी होने के कारण तो हम खुद ईजाद करते हैं, फिर दोषी दूसरे को कहते हैं, जब दिमाग में तो हर समय पड़ोसन रहेगी, तो पत्नि से अच्छे से पेश कैसे आओगे, और तुम अच्छे न होगे तो सामने से अच्छा वो मिले कैसे संभव है।

प्रिय नोट : किताबी ज्ञान कहकर नकारे वालों को मेरा सलाम। बस उनसे इतना कहूँगा, कंठस्थ और आत्मसात में अंतर समझना सीख जाएं, उनका भी भला होगा, और आस पास वालों का भी भला होगा।

आभार
कुलवंत हैप्पी

मन की बातें...जो विचार बन गई

  1. हँसता हुआ चेहरा, खिलता हुआ फूल, उगता हुआ सूर्य व बहता हुआ पानी रोज देखने की आदत डालो। मुस्कराना आ जाएगा। -: कुलवंत हैप्पी
  2. श्वर को आज तक किसी ने परिभाषित नहीं, लेकिन जो मैंने जाना, वो ईश्वर हमारे भीतर है, और कला ही उसका असली रूप है। तुम्हारी कला ही तुम को सुख शांति यश और समृद्धि दे सकती है। जो तुम ईश्वर से पाने की इच्छा रखते हो। -: कुलवंत हैप्पी
  3. बॉस की झूठी जी-हजूरी से अच्छा है, किसी गरीब को सच्चे दिल से थैंक्स कहना। क्योंकि यहाँ प्रकट किया धन्यवाद तुम्हें आत्मिक शांति देगा। -: कुलवंत हैप्पी
  4. गर इंवेस्टमेंट करना ही है, तो क्यों न प्रेम किया जाए, ताकि जब रिटर्न हो, तो हमें कागज के चंद टुकड़ों से कुछ बेहतर मिले। :-कुलवंत हैप्पी
  5. हे ईश्वर, जो भी तुमने मुझे दिया, वो मेरे लिए अत्यंत दुर्लभ है। मैं उसके लिए तेरा सदैव शुक्रिया अदा करता हूँ।:-कुलवंत हैप्पी
आभार
कुलवंत हैप्पी

आओ चलें आनंद की ओर

हिन्दुस्तान में एक परंपरा सदियों से चली आ रही है, बचपन खेल कूद में निकल जाता, और जवानी मस्त मौला माहौल के साथ। कुछ साल परिवार के लिए पैसा कमाने में, अंतिम में दिनों में पूजा पाठ करना शुरू हो जाता है, आत्मशांति के लिए। हम सारी उम्र निकाल देते हैं, आत्म को रौंदने में और अंत सालों में हम उस आत्म में शांति का वास करवाना चाहते हैं, कभी टूटे हुए, कूचले हुए फूल खुशबू देते हैं, कभी नहीं। टूटे हुए फूल को फेवीक्विक लगाकर एक पौधे के साथ जोड़ने की कोशिश मुझे तो व्यर्थ लगती है, शायद किसी को लगता हो कि वो फूल जीवित हो जाएगा। और दूसरी बात। हमने बुढ़ापे को अंतिम समय को मान लिया, जबकि मौत आने का तो कोई समय ही नहीं, मौत कभी उम्र नहीं देखती। जब हम बुढ़ापे तक पहुंच जाते हैं, तब हमें क्यों लगने लगता है हम मरने वाले हैं, इस भय से हम क्यों ग्रस्त हो जाते हैं। क्या हमने किसी को जवानी में मरते हुए नहीं देखा? क्या कभी हमने नवजात को दम तोड़ते हुए नहीं देखा? क्या कभी हमने किशोरावस्था में किसी को शमशान जाते हुए नहीं देखा? फिर ऐसा क्यों सोचते हैं  कि बुढ़ापा अंतिम समय है, मैंने तो लोगों को 150 वर्ष से भी ज्यादा जीते हुए देखा है, और वो भी तंदरुस्ती के साथ। मेरी माँ की बुआ करीबन 109 साल की होकर इस दुनिया से गई थी। हमने साठ सतर साल की उम्र को ही क्यों अंतिम सीमा मान लिया, हमने क्यों निर्धारित कर लिया कि हमारा अंतिम समय है। अगर सोचना ही है तो ऐसा सोचो कि आज का दिन अगर हमारा अंतिम दिन होता तो हम समाज को क्या देकर जाते, हम क्या क्या करते, हम किससे मिलते। करना ही है तो ऐसा अवलोकन करो।

चलते चलते मुझे श्री शरद कोकास के ब्लॉग पर जीवन की ओर लेकर जाने वाली एक बहुत बढ़िया कविता मिली है, जिसको मैं आप सबके सामने रखना चाहूंगा। यह कविता आपको आनंद की ओर लेकर जाएगी, आनंद आपको ताउम्र भीतर से युवा रखेगा, आपको युवा रहने के लिए बाहरी मेकअप की जरूरत न पड़ेगी। कविता को पढ़ने के साथ साथ महसूस भी करना। उसके भीतर रहस्य को जानना बेहद जरूरी है।
अपना हाथ दो मुझे

दो अपना हाथ और अपना प्रेम दो मुझे
अपना हाथ दो मुझे और मेरे साथ नाचो
बस एक इकलौता फूल
इस से ज़्यादा कुछ नहीं
हम बने रहेंगे
बस एक इकलौता फूल.
साथ नाचते हुए मेरे साथ एक लय में
तुम गीत गाओगे मेरे साथ
हवा में फ़क़त घास
इस से ज़्यादा कुछ नहीं
हम बने रहेंगे
हवा में फ़क़त घास.
उम्मीद है मेरा नाम और गु़लाब तुम्हारा
लेकिन अपने अपने नामों को खो कर हम दोनों मुक्त हो जाएंगे
पहाड़ियों पर बस एक नृत्य
इस से ज़्यादा कुछ नहीं
हम बने रहेंगे
पहाड़ियों पर बस एक नृत्य

गाब्रीएला मिस्त्राल

भार
कुलवंत हैप्पी

धन्यवाद के बाद थप्पड़ रसीद

मोटर साईकल पर सवार होकर मैं और मेरा मित्र जनकसिंह झाला रेलवे स्टेशन की तरफ जा रहे थे। सड़क पर मोटर कारों के अलावा काफी साईकिल भी चल रहे थे। उन साइकिलों को देखते ही एक किस्सा याद आ गया मेरे मित्र को, जैसे किसी बच्चे को खेलते देखकर हमारी आँखों के सामने हमारा बचपन जीवंत हो जाता है। उसने चलते चलते मुझे बताया कि जब वो नया नया साईकिल चलाना सीखा था, तो एक दिन अचानक उसका साईकिल एक बूढ़ी महिला से टकरा गया, वो महिला धड़म्म से जमीं पर गिरी। वो भागने की बजाय उस महिला को खड़ी कर उसके घर तक छोड़ने गया, जिसका घर में पास ही था। घर पहुंचे तो माँ के साथ हुए हादसे की बात सुनकर उस बूढ़ी महिला के बेटे ने सबसे पहले मेरे मित्र को धन्यवाद किया, क्योंकि वो उसकी माता को उसके घर तक छोड़ने आया था। और तुरंत ही पूछा,"माँ जिसने तुम्हारे बीच साईकिल मारा, वो कौन था?"। माँ ने कहा, "इसका ही साइकिल था, जो मुझे घर तक छोड़ने आया है"। उस नौजवान लड़के ने जितने प्यार के साथ धन्यवाद कहा था, उतनी ही बेरहमी से घर छोड़ने गए मेरे मित्र की गाल पर थप्पड़ रसीद कर दिया। वास्तव में हमारी अहिंसा, हमारी धार्मिकता और हमारी कृतज्ञता बस इतनी है। इससे ज्यादा कुछ नहीं। हम जो बाहरी रूप से हैं, वो भीतर से नहीं। हम रोज स्नान करते हैं, बाहर बाहर से। अगर वो भीतर से धन्यवाद प्रकट कर रहा होता तो, वो बाद में थप्पड़ रसीद न करता, उसको याद ही न रहा कि वो दो मिनट पहले तो धन्यवाद कहकर हटा है, और अभी थप्पड़ रसीद कर रहा है।
भार
कुलवंत हैप्पी

"स्वप्न दिवस" और "सपनों की बात"

दुनिया में इंसान दो तरह के होते हैं। इस वाक्य को माय नेम इज खान में सुना होगा या उससे पहले भी कई दफा सुना होगा। वैसे देखा जाए तो सिक्के के भी दो पहलू होते हैं, लेकिन मैं बात करने जा रहा हूँ सपनों की, क्योंकि 11 मार्च को ड्रीम डे है मतलब स्वप्न दिवस। इंसान की तरह सपनों की भी दो किस्में होती हैं, एक जो रात को आते हैं, और दूसरे जो हम सब दिन में संजोते हैं। रात को मतलब नींद में आने वाले सपने बिन बुलाए अतिथि जैसे होते हैं। सुखद भी, दुखद भी। लेकिन जो खुली आँख से सपने हम सब देखते हैं, वो किसी मंजिल की तरफ चलने के लिए, कुछ बनने के लिए, कुछ कर गुजरने के लिए प्रेरित करते हैं।

कुछ लोगों कहते हैं कि स्वप्न सच नहीं होते, लेकिन अगर गौर से देखा जाए तो हर सफल इंसान कहता है कि मैंने बचपन में ऐसा ही सपना संजोया था। मुझे दोनों ही सही लगते हैं, क्योंकि जो सफल हुए वो खुली आँख से देखे हुए सपनों की बात कर रहे हैं, जो कुछ लोग कह रहे हैं कि स्वप्न सत्य नहीं होते वो नींद में अचानक आने वाले सपनों की बात कर रहे हैं।


रात को आने वाले स्वप्न फिल्म जैसे होते हैं, उनमें कुछ भी घटित हो सकता है। आप अकेले किसी फिल्मी हीरो की तरह सात आठ लोगों को एकसाथ पीट रहे हैं। आप बिना किसी कठिनाई के सफलता की शिखर पर पहुंच गए। हर तरफ आपकी चर्चा हो रही है। ऐसे स्वप्न आपको स्कून देते हैं, लेकिन कुछ कुछ स्वप्न आपकी नींद में विघ्न भी डालते हैं, आप काँपकर बिस्तर से उठ खड़े होते हैं। जब कि खुली आँख के स्वप्नों को पूरा करने के लिए सख्त मेहनत की जरूरत होती है, विश्वास की जरूरत होती है। वो रात में आए ख्वाब जैसे नहीं होते। नींद में आए स्वप्न को सिर्फ तुम महसूस कर सकते हो, लेकिन खुली आँख का स्वप्न जब पूरा होता है तो उसमें न जाने कितने लोग शरीक होते हैं, कितने ही चेहरों पर खुशी का जलाल होता है। कितनी ही आँखों में अजब चमक आ जाती है।

इसलिए स्वप्न देखना मुझे तो बुरी बात नहीं लगती, लेकिन रात के स्वप्न से बेहतर है कि आप दिन में खुली आँख से अपने सपने देखें, और उनको पूरा करने के लिए रणनीति बनाएं और परिश्रम करें। आज स्वप्न दिवस है, क्यों न इस बहाने अपने सपनों की समीक्षा की जाए? क्यों न देखा जाए कि हम कहाँ तक पहुंचे हैं? मेरी नजर में स्वप्न के बिन जीवन अधूरा है, जैसे खुशबू के बिन फूल की सुंदरता भी अधूरी सी लगती है। अगर मुम्बई की रफ्तार किसी भी मौसम में मंद नहीं पड़ती तो इसके पीछे मुम्बईवासियों की रोजमर्रा की जरूरतों से ज्यादा उनके स्वप्न हैं, जो वो खुली आँख से देखते हैं। वो स्वप्न ही उनको रुकने नहीं देते, वो स्वप्न ही उनकी रफ्तार को बनाए रखते हैं।

भार
कुलवंत हैप्पी

एक गुमशुदा निराकार की तलाश

इस दुनिया में इंसान आता भी खाली हाथ है और जाता भी, लेकिन आने से जाने तक वो एक तलाश में ही जुटा रहता है। तलाश भी ऐसी जो खत्म नहीं होती और इंसान खुद खत्म हो जाता है। वो उस तलाश के साथ पैदा नहीं होता, लेकिन जैसे ही वो थोड़ा सा बड़ा होता है तो उसको उस तलाश अभियान का हिस्सा बना दिया जाता है, जिसको उसके पूर्वज, उसके अभिभावक भी नहीं मुकम्मल कर पाए, यह तलाश अभियान निरंतर चलता रहता है। जिसकी तलाश है, उसका कोई रूप ही नहीं, कुछ कहते हैं कि वो निराकार है। कितनी हैरानी की बात है इंसान उसकी तलाश में है, जिसका कोई आकार ही नहीं। इस निराकार की तलाश में इंसान खत्म हो जाता है, लेकिन उसका अभियान खत्म नहीं होता, क्योंकि उसने अपने खत्म होने से पहले इस तलाश अभियान को अपने बच्चों के हवाले कर दिया, जिस भटकन में वो चला गया, उसकी भटकन में उसके बच्चे भी चले जाएंगे।

ऐसा सदियों से होता आ रहा है, और अविराम चल भी रहा है तलाश अभियान। खोजना क्या है कुछ पता नहीं, वो है कैसा कुछ पता नहीं, हाँ अगर हमें पता है तो बस इतना कि कोई है जिसको हमें खोजना है। वो हमारी मदद करेगा, मतलब उसकी तलाश करो और खुद की मदद खुद करने का यत्न मत करो। मुझे मनुष्य और मृग में कोई ज्यादा फर्क नहीं लगता है, मनुष्य की तरह मृग भी कस्तूरी की तलाश में जंगल में भटकते भटकते मर जाता है, जबकि कस्तूरी तो उसकी नाभी में ही होती है। जैसे मृग की नाभी में कस्तूरी होती है, वैसे ही मनुष्य आत्मा में प्रमात्मा का वास होता है।

इसके बारे में लाईफ पॉजिटिव की संपादिका सुमा वर्गीज ने अगस्त 2009 के अंक में बहुत सुंदर शब्दों में कुछ ऐसे लिखा है। मनुष्य को बनाने और उसे ईश्वर की खोज करने और ईश्वर को जानने का कार्य सौंप कर परमात्मा एक बड़ी उलझन में फंस गए। उनके सामने जो समस्या थी कि वह यह थी कि वह कहाँ जाकर छिपे जहां मनुष्य उन्हें आसानी से न ढूँढ सके, पर्वत में जाकर छिपें या गहरे समुद्र में या मेघों के बीच उड़ते रहें, वह जाएं तो जाएं कहां? आखिरकार उन्हें अपनी उलझन का समाधान मिल ही गया। "मैं आदमी की आत्मा में निवास करूंगा" उन्होंने कहा, "क्योंकि यही एक जगह है, जहां मनुष्य मुझे ढूँढ निकालने की सोच भी नहीं सकेगा"।

सच में कुछ ऐसा ही हुआ, जिन्होंने परमात्मा को जाना है, उन्होंने भीतर से ही जानना है। अगर परमात्मा जंगलों में होते तो शेरों चीतों अन्य जानवरों को मिल जाते, अगर परमात्मा समुद्र में होते तो मछलियों को मिल जाते, अगर परमात्मा आसमां में मेघों के संग उड़ रहे होते तो शायद पक्षियों परिंदों से मिल जाते। मगर परमात्मा ने ऐसी जगह ढूँढ ली, जहाँ पहुंचने के लिए इंसान को खुद के भीतर उतरना होगा, लेकिन वो ऐसा करने में हमेशा असफल हुआ, क्योंकि उसको बाहरी दुनिया ने अंदर लौटने का मौका ही नहीं दिया, तलाश की जिम्मेदारी इतनी सख्त कर दी कि वो दिशाविहीन बस चले जा रहा है। अंत कहाँ है, उसको पहुंचना कहाँ है कोई पता नहीं। उसकी यात्रा का मृत्यु के अलावा कोई अंत है, उसको खुद को पता नहीं बस चले जा रहा है। इस तलाश को रोकने के लिए हम इतना यत्न कर सकते हैं कि हम जिस तलाश में भटक रहे हैं, उस तलाश में नई पीढ़ी को भटकनें से रोकें, अगर एक भी भटकने से बच गया तो समझो। अब कारवां शुरू हो चुका है।


भार
कुलवंत हैप्पी

"युवा" बनाम "तुम हवा"

मय के साथ साथ "युवा" शब्द का अर्थ भी बदलता जा रहा है, कल तक युवा का मतलब केवल नौजवान से था या कहें युवावस्था से, लेकिन आज युवा का अर्थ उम्मीदों का नया सवेरा और कुछ कर गुजरने वाला व्यक्ति है। "युवा" शब्द में वैसा ही परिवर्तन देखने को मिल रहा है, जैसा "प्रेम" शब्द में देखने को मिल रहा है। पहले "प्रेम" का मतलब एक लड़की और लड़के के बीच का रिश्ता, लेकिन अब प्रेम का अर्थ विशाल हो रहा है। लोग समझने लगें हैं प्रेम के असली अर्थ को, मतलब प्रेम किसी भी वस्तु से हो सकता है चाहे वो संजीव हो और चाहे वो निर्जीव।

प्रेम की तरह युवा का अर्थ भी बहुत विशाल हो गया, अब युवा का अर्थ है वो व्यक्ति जो कुछ कर गुजरने का जोश या फिर लोगों की उम्मीदों को पूरा करने का इरादा रखता हो। याद करो वो समय जब अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर बराक ओबामा बैठा था, तो क्या वो युवावस्था में था, नहीं लेकिन फिर भी लोगों ने उसको युवा की संज्ञा दी। इतना ही नहीं  35 साल का राहुल गांधी भी जनता को युवा ही नजर आता है। इसके अलावा 38 साल का जीवन बसर करने वाले श्री स्वामी विवेकानंद जी कभी युवावस्था से बाहर नहीं निकले, वो भी अंत समय तक युवा रहे।

ओशो कहता था कि हिन्दुस्तान में युवा पैदा नहीं होते, बल्कि बच्चे या बुजुर्ग पैदा होते हैं। ऐसा नहीं कि ओशो के समय में कोई यौवन अवस्था तक नहीं पहुंच पाता था, युवा अवस्था में सब पहुंचते थे, लेकिन सोच से युवा नहीं होते थे। ओशो की नजर में युवा होना केवल युवा अवस्था में पहुंचना मात्र नहीं था।

आज सबसे ज्यादा प्रचलन में युवा शब्द है। युवा शब्द इतना लोकप्रिय हो रहा है कि लोगों को अपनी तरफ खिंचने के लिए कुछ कंपनियाँ अपने ब्रांडों के नाम भी युवा रख रही हैं, कुछ ने तो रख दिए हैं। कंपनियाँ कुछ नया नहीं करने वाली, वो तो अपनी दुकानदारी चला रही हैं, लेकिन एक संदेश जरूर दे रही हैं कि लोगों को अब युवा से उम्मीद है। ऐसे में केवल शब्द के प्रचलन से क्या होगा। युवाशक्ति का इस्तेमाल तो करना ही होगा, तभी जाकर युवा शब्द का वर्तमान अर्थ सार्थक होगा, वरना युवा फिर से एक किशोर अवस्था के बाद की स्थिति का संकेत बनकर रह जाएगा।

युवा शब्द कैसे पैदा हुआ? इसके बारे में तो मुझे पता नहीं, लेकिन मैंने तो युवा शब्द का जन्म दो भाषाओं के दो शब्दों को जोड़कर किया गया, एक इंग्लिश का you और दूसरा पंजाबी का वा। यू का अर्थ तो हम सब जानते हैं तुम और वा का अर्थ है हवा। मतलब तुम हवा। हवा की कोई सीमा नहीं होती और उसको कैद नहीं किया जा सकता है। हवा अपने साथ खुशबूओं को बहा ले जाती है, और चारों दिशाओं में फैला देती है। ऐसे ही युवाओं को अच्छे विचारों को दुनिया में फैला देना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं कि हवा बदबू को भी अपने साथ खींचकर ले जाती है। वो हवा के बस में नहीं, लेकिन हमारे बस में है कि हम सिर्फ अच्छे विचारों को दूर दूर तक फैलाएं।
भार
कुलवंत हैप्पी

एक संवाद, जो बदल देगा जिन्दगी


धूप की चिड़िया मेरे आँगन में खेल रही थी, और मेरी माँ की उंगलियाँ मेरे बालों में, जो सरसों के तेल से पूरी तरह भीगी हुई थी। इतने में एक व्यक्ति घर के भीतर घुस आया, वो देखने में माँगने वाला लगता था। उसने आते ही कहा "माता जी, कुछ खाने को मिलेगा"। घर कोई आए और भूख चला जाए हो नहीं सकता था। मेरी माँ ने मेरी बहन को कहा "जाओ रसोई से रोटी और सब्जी लाकर दो"। वो रोटी और एक कटोरी में सब्जी डालकर ले आई। उसने खाना खाने के बाद और जाने से पहले कहा "मैं हाथ भी देख लेता हूं"। मेरी माँ ने मेरा हाथ आगे करते हुए कहा "इस लड़के का हाथ देकर कुछ बताओ"। उसने कहा "वो हाथ दो, ये हाथ तो लड़कियाँ दिखाती हैं"। उसने हाथ की लकीरों को गौर से देखा, फिर मेरे माथे की तरफ देखा। दोनों काम पूरे करने के बाद बोला "तुम्हारा बच्चा बहुत बड़ा आदमी बनेगा"। वो ही शब्द कहे, जो हर माँ सुनना चाहती है

पढ़ें : बंद खिड़की के उस पार

उस बात को आज 14 साल हो चले हैं, उस माँ का बेटा बड़ा आदमी तो नहीं बना, लेकिन चतुर चोर बन गया, जो अच्छी चीजों को बिना स्पर्श किए चुरा लेता है। जनाब! लड़कियों के दिल नहीं, बल्कि कुछ अच्छे संदेशवाहक शब्द एवं पंक्तियाँ, ताकि इतर की तरह उनको हवा में फैला सके, और सब उसकी खुशबू का आनंद ले सके। एक चोरी, जो मैंने आज से कुछ साल पहले की थी, लेकिन आज उसको सार्वजनिक करने जा रहा हूँ। उम्मीद करता हूँ कि मैं अपने मकसद में कामयाब हूँ। बात है कुछ साल पहले की, जब मैं और मेरी छमकछल्लो दीपावली के मौके शाहरुख खान की फिल्म 'ओम शांति ओम' देखने सिनेमाहाल में गए, फिल्म तो कुछ खास न थी परंतु उस फिल्म में एक संवाद था, जो दिल को छू गया। उसको सुनने के बाद दिल ने कहा "लिखने वाले ने कितनी शिद्दत से लिखा होगा"।

पढ़ें : बसंत पंचमी के बहाने कुछ बातें

वो संवाद था 'हमारी हिन्दी फिल्मों की तरह हमारी जिन्दगी में आखिर तक सब कुछ ठीक हो जाता है, और अगर ऐसा न हो तो समझो फिल्म अभी बाकी है मेरे दोस्त'। इंसान की आदत है कि वो बुरे वक्त के आते ही घुटने टेक देता है। उस स्थिति के साथ दो चार हाथ करने की क्षमता खो देता है। वो ऐसे उसके सामने हथियार डाल देता है, जैसे युद्ध के मैदान में कोई बुजदिल हमलावर, क्योंकि योद्धा कभी हथियार नहीं डालता। बुरे वक्त में इंसान को लगने लगता है कि अब उसका अच्छा वक्त कभी नहीं आएगा, लेकिन ये गलत धारणा है क्योंकि अगर आपका अच्छा वक्त नहीं रहा तो आपका बुरा वक्त भी चिरस्थायी नहीं है। अगर हमारी जिन्दगी में बुरा वक्त न आए तो हमें दुखों को सहन करने का ढंग नहीं आता, इसलिए जब बुरा वक्त पड़े तो मेरे दोस्तों सोचो फिल्म अभी बाकी है। ये शब्द आपको याद दिलाएंगे कि बुरे वक्त के बाद अच्छा वक्त हमेशा आता है, जैसे कि दिन के बाद रात और रात के बाद दिन।

पढ़ें : जब मुश्किल आई, माँ की दुआ ने बचा लिया

जाते जाते बस इतना ही कहूँगा कि एक दफा अकबर ने बीरबल से कहा कि तुम कुछ ऐसा लिखो, जिसको गम में पढ़े तो खुशी हो और खुशी में पढ़े तो गम हो। बीरबल ने तुरंत लिख दिया "ये वक्त गुजर जाएगा"।

कल+आज= सुनहरा भविष्य


कुछ लोगों को आपने अतीत से नफरत होती है, क्योंकि वह सोचते हैं कि अतीत को देखने से उनको उनका बीता हुआ बुरा कल याद आ जाएगा, किंतु मेरी मानो तो अतीत को इंसान नहीं संवार सकता परंतु अतीत इंसान को सीख देकर उसके आने वाले कल को जरूर सुधार सकता है।

आपने अकसर सुना या पढ़ा होगा कि उसने इस सफलता के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा, ये बहुत गलत बात होती है, लिखने वाले और सुनाने वाले को क्या पता उसने अपने हर लम्हे में अतीत को याद किया या नहीं, उसके मन में लिखते या सुनाते समय जो आया उसने लिख और सुनाया दिया, लेकिन खरा सच तो ये है कि सफल इंसान हमेशा आपने अतीत से कुछ न कुछ सीखते हुए सफलता की ओर कदम बढ़ता है। इस कहावत को मैंने तो जन्म न दिया कि 'दूध का जला, छाछ फूंक कर पीता है'। दूध का जला अतीत है, उसको पता चल गया कि दूध गर्म होगा तो मुँह फिर जलेगा। ये वाला अतीत उसका अनुभव हो गया, उसके लिए भविष्य में काम आ रहा है। अतीत में जो हुआ वो अनुभव ही होता, बस उससे कुछ सीखने की जरूरत है। जैसे कि हम जब एक बार पत्थर से ठोकर खाकर गिरते हैं तो दूसरी बार ध्यान से चलते हुए आगे बढ़ते है, हमें पता है कि जब हम गिरे थे तो वह क्षण हमारे लिए कितना बुरा था, मगर सोचो उसने हमें ध्यान से चलना तो सिखाया, इसलिए अतीत को याद रखना बहुत अच्छा है क्योंकि वह आपको भविष्य के लिए सुचेत करता है।

जो लोग अतीत को याद नहीं करते वो बार बार गलतियाँ करते हैं और पछ्ताते हैं, शायद 1947 के विभाजन की बात तो सबको याद होगी, जिनको वो कतलेआम और लहू से लथपथ लाशें जमीं पर पड़ी हुई याद न थी, वे लोग ही 1984, 1993 जैसे घटनाक्रम को अंजाम देते हैं, अगर उनको 1947 वाला कतलेआम याद होता, उस कतलेआम में बेटों की लाशों पर चीखती माताओं की चीख पुकार याद होती, सुहागनों की टूटती चूड़ियों की आवाज याद होती तो वे लोग उसको दूसरी बार न दोहराते, उन लोगों के दिमाग में महज बदले की आग थी, जिसमें वह खुद तो जले ही कुछ मासूमों को भी जला दिया, अगर वो सोचते कि उस कतलेआम में जब उनके माता पिता या भाई बहन जले होंगे तो तब उन पर या उनके अन्य परिजनों पर क्या गुजरी होगी, क्या पता वो ये सोचकर आपने अंदर के शैतान को मारकर प्यार के रंग में रंग जाते. इसलिए अतीत देखो वो तुम्हारा आइना है।

टीम वर्क मीन्स मोर वी एंड लैस मी

आज बात करते हैं एक और चोरी की, जो मैंने एक इंदौर के टीआई स्थित गिफ्ट शॉप में से की। बात है उस दिन की, जब मैं और मेरी छमक छल्लो घूमने के लिए घर से निकले और चलते चलते स्थानीय टीआई पहुंच गए, टीआई मतलब इंदौर का सबसे बड़ा मॉल। मेरी छमक छल्लो की नजर वहां एक गिफ्ट शॉप पर पड़ी, मेरी चोरी करने की कोई मंशा नहीं थी और नाहीं कोई गिफ्ट शिफ्ट खरीदने की, बस उसके साथ ऐसे ही चल दिया।

जैसे हम दुकान के अंदर गए तो वहां पर बहुत सारे सुन्दर सुन्दर गिफ्ट पड़े हुए थे, जिनको देखकर हर इंसान की आंखें भ्रमित हो जाती और दिल ललचा जाता है। मैं भी अन्य लोगों की तरह हर गिफ्ट को बड़ी गंभीरता से देख रहा था परंतु इसी दौरान मेरी नज़र एक बड़े कॉफी पीने वाले कप पर गई, मैंने उस कप को नहीं चुराया बल्कि उसके ऊपर लिखी एक पंक्ति को चुरा लिया। वो पंक्ति 'टीम वर्क मीन्स मोर वी एंड लैस मी' ये थी।

दुकान में गिफ्ट देख रही मेरी छमक छल्लो को मैंने पास बुलाया और कहा कि इस पंक्ति को पढ़कर सुनना, उसने पढ़ा और मुस्करा दिया क्योंकि वह जानती है कि मैं जानबुझकर उसको इस तरह के अच्छे संदेशवाहक वाक्य को पढ़ने को कहता हूं। दरअसल, मैंने भी जानबुझकर उसको पढ़ाया था क्योंकि जब हम किसी कार्यालय काम करते हैं तो वहां टीम वर्क स्थापित करने की काफी जरूरत होती है और ऐसे में इस तरह के वाक्य स्थिति को समझ के लिए काफी फायदेमंद साबित होते हैं।

अगर हम टीम वर्क में यकीन नहीं करते तो हम दुखी होते हैं, पता है क्यों, क्योंकि हम आपने काम की तुलना अन्य साथी जनों से करने लग जाते हैं, जिसके चलते हमारे अंदर गलत ख्याल जन्म लेने लगते हैं। इसके चलते काम पर असर पड़ता है, इसलिए टीम वर्क पर ही विश्वास करके चलो क्योंकि तुम या मैं अकेला कुछ नहीं कर सकता, अगर ऐसा होता तो हम किसी कंपनी में काम न कर रहे होते और हम अपने कारोबार में भी अन्य कर्मचारी न रखते। तुम किसी और को देखकर खुद की क्षमता को कम मत करो क्योंकि तुम्हारा काम तुम्हारी जिन्दगी संवारेगा और दूसरे काम का उसकी जिन्दगी। हो सके तो अपने साथी को साथ लेकर आगे बढ़ने की कोशिश करो, क्या पता वह आपके प्रोत्साहन से काम करने लग जाए।

मैं टीम वर्क पर विश्वास करता हूं, पिछले दिनों मेरी टीम किसी निजी मतभेद के चलते टूट गई थी परंतु मैं फिर से उसको पटरी पर लाने के लिए संघर्षशील हो गया, इस दौरान मेरा साथ किसी और ने नहीं बल्कि ओम शांति ओम के संवाद फिल्म अभी बाकी है मेरे दोस्त ने दिया। इस संवाद ने मुझे बताया कि कोई बात नहीं तुम लगे रहो, जल्द ही अच्छा वक्त आएगा और वह आया।

नोट : इस लेख को बहुत पहले लिखा गया था, लेकिन युवा सोच युवा खयालात पर पहली बार प्रकाशित हो रहा है।

विचलित होना छोड़ दो


तुम विचलित होना छोड़ दो। सफलता तुम्हारे कदम चुम्मेगी। कुछ ऐसा ही मेरा मानना है। तुम्हारा विचलित होना, किसी और के लिए नहीं केवल स्वयं तुम्हारे के लिए नुक्सानदेह है, जैसे कि क्रोध। विचलित होना तो क्रोध से भी बुरा है। विचलित मन तुम्हारे मनोबल को खत्म करता है। जब मनोबल न बचेगा, तो तुम भी न बचोगे। खुद के अस्तित्व को बचाने के लिए तुम को विचलित होना छोड़ना होगा, तभी तुम सफलता को अर्जित पर पाओगे।

आए दिन नए नए ब्लॉगर्स को बड़े जोश खरोश के साथ आते देखता हूं, लेकिन फिर वो ऐसे गायब हो जाते हैं, जैसे कि मौसमी मेंढ़क। इसके पीछे ठोस कारण उनके मन का अस्थिर अवस्था में चले जाना है। वो ब्लॉग ही इस धारणा से शुरू करते हैं कि हमसे अच्छा कोई नहीं। वो जैसे ही कोई पोस्ट डालेंगे तो टिप्पणियां ऐसे आएंगी, जैसे कि सावन मास में पानी की बूंदें। लेकिन ऐसा नहीं होता तो विचलित हो जाते हैं, और वहीं ब्लॉग अध्याय को बंद कर देते हैं। अगर उनका मन स्थिर हो जाए, और वो निरंतर ब्लॉगिंग करें तो शायद उनको सफलता मिल जाए, लेकिन पथ छोड़ने से कभी किसी को मंजिल मिली है, जो उनको मिलेगी। कई मित्र मेरे पास आते हैं, और कहते हैं कि ब्लॉग शुरू करना है और वो ऐसा करते भी हैं। लेकिन उक्त कारण से हताशा होकर वो ब्लॉगिंग को निरंतर नहीं रख पाते। ऐसे विचलित होते रहोगे कि तो किसी भी काम में सफलता हाथ न लगेगी।

एक किस्सा याद आता है। एक युवा गीतकार अपने हस्तलिखत गीतों की डायरी लेकर एक नामी गायक के पास गया। उसने गायक को अपने गीत दिखाए। गायक ने गीत देखे और कहा कि तुम्हारे विचार तो बहुत शानदार हैं, लेकिन इनको संवारना पड़ेगा। उस गायक ने उसके गीत न गाए। शायद वो गीत उस की गायन क्षमता के अनुकूल न थे। इस बात से युवा गीतकार हताश न हुआ, बल्कि उस युवा गीतकार ने गायक की एक बात अपने पल्ले बांध ली, जिसने उसका कभी मनोबल टूटने नहीं दिया। वो बात थी, तुम शौक से लिखते हो तो नतीजों की अपेक्षा मत करना। वरना तुम शौक से भी हाथ धो बैठोगे। कुछ दिनों बाद उस युवा गीतकर को रक्तदान पर एक गीत लिखने का ऑफर आया। उसने रक्तदान पर पांच मिनट में एक गीत लिखा, और वो रिकार्ड भी हो गया। इसके बाद उसने गीत मां शेरां वाली की भेंटें लिखी। कहते हैं कि सब का वक्त आता है, जब आता है तो तुम्हें उसकी उम्मीद भी नहीं होती। उसका लिखा गीत जब रिकार्ड हुआ तो उसको हर तरफ से वाह वाह मिलने लगी। इस गीत के बाद उसने उस सुखद पल का अहसास किया, जो उसने कभी सोचा न था। मंजिल कहती है कि तुम बढ़ो तो सही, मैं भी तेरी ओर चल दूंगी।

कैमरॉन की हसीं दुनिया 'अवतार'

शौचालय और बेसुध मैं

अहिंसा का सही अर्थ

'प्रेम'। जी हां, अहिंसा का सही अर्थ प्रेम है, लेकिन समाज ने इस शब्द का दूसरा अर्थ निकाल लिया कि किसी को मारना हिंसा होता है और न मारने की अवस्था अहिंसा, लेकिन गलत है। अहिंसा का अर्थ प्रेम। महावीर ने अहिंसा शब्द का इस्तेमाल किया, उन्होंने प्रेम का इस्तेमाल नहीं किया, क्योंकि प्रेम शब्द लोगों के जेहन में उस समय काम वासना के रूप में बसा हुआ था। लेकिन बाद में ओशो ने अहिंसा को प्रेम शब्द के रूप में पेश किया, क्योंकि अब स्थिति फिर बदल चुकी थी। लोगों ने अहिंसा का गलत अर्थ निकाल लिया था। मतलब किसी को नहीं मारना अहिंसा है। लेकिन ओशो कहते हैं कि अहिंसा का असली अर्थ प्रेम ही है, जो महावीर सबको समझाना चाहते थे। तुम जीव को नहीं मारते, तो मतलब तुम हिंसा नहीं कर रहे, ये तो गलत धारणा है। तुम को लगता है कि अगर तुमने जीव को मार दिया तो तुमसे जीव हत्या हो जाएगी और तुम नर्क के भोगी हो जाओगे। जहां पर तुमको दुख मिलेंगे, ये तो स्वार्थ एवं डर हुआ, अहिंसा तो न हुई। अगर तुम जीव से प्रेम करने लगो तो तुम उसके साथ इतना जुड़ जाओगे कि उसको मारे का ख्याल तक न आएगा, अब भी तो तुम अहिंसा के रास्ते पर हो। प्रेम करने से अहिंसा बदल तो न जाएगी। बस सोच बदलने की जरूरत है। अहिंसा का अर्थ प्रेम है, डर नहीं। तुम प्रेम करो। अहिंसा तो तुम्हारे साथ खुद हो लेगी। अगर तुम सोचते हो कि तुम किसी को मारते नहीं और तुम अहिंसा के पुजारी हो गए,तो तुम गलत हो। अगर कल को रास्ते में जाते हुए तुमको कोई गाली देने लगा तो तुम फिर से गुस्से हो जाओगे और उसको मारोगे। तब तो तुम हिंसक हो जाओगे। ये तो वैसा हुआ कि जैसे एक बंजर जमीं पर कुछ बीज गिरे हुए हैं, जो बारिश के आते फिर से हरे हो गए। वैसे ही तुम्हारे भीतर छुपी हुई हिंसा। तुम को अहिंसक होने के लिए प्रेम की जरूरत है। जब तुम प्रेम करने लगोगे, तो तुम खुद ब खुद अहिंसक हो जाओगे। हिंसा से बिल्कुल परे। प्रेम डर से नहीं दिल से होता है। तुम को डर से अहिंसक नहीं, प्रेम से अहिंसक बनो।

इंसान की पहचान, उसकी बातें

जैसे हीरे की पहचान जौहरी को होती है, वैसे ही इंसान की परख इंसान को. बस आप को सामने वाली बातों को ध्यान से सुनना है, जब वो किसी और से बात कर रहा हो. इस दौरान इंसान की मानसिकता किसी ना किसी रूप में सामने आई जाती है. आप ने देखा होगा कि कुछ लोगों को आदत होती है कि वो अपने एक सहयोगी या बोस के जाते उसकी बुराई करनी शुरू कर देते हैं तो उस पर आप विश्वास करके खुद को धोखा दे रहे हैं क्योंकि वो उस इंसान की फितरत है. जब आप न होंगे तो आपकी बुराई किसी और इंसान के सामने करेगा.

एक छोटी सी कहानी मेरी जिन्दगी से कहीं न कहीं जुड़ी हुई है, जो मैं इस बार आपसे सांझी करना चाहूंगा, कहते हैं जब तक आदमी किसी वस्तु को चखता नहीं तब तक उसको स्वाद का पता नहीं चलता. एक बार की बात है कि दो लड़कियां और दो लड़के आपस में बातें कर रहे थे, उसके बीच प्यार और दोस्ती का टोपिक था, लड़के कहते हैं कि प्यार और दोस्ती दिखावे की होती है जबकि लड़कियां इस बात पर अड़िंग थी कि प्यार और दोस्ती दोनों ही जिन्दगी में अहम स्थान रखतें हैं.

इसमें दोनों की बात सही थी क्योंकि लड़के अपनी फितरत बता रहे थे और लड़कियां अपनी. लड़कियों को प्यार और दोस्ती में विश्वास नज़र आ रहा था जबकि उन लड़कों की निगाह में दोस्ती और प्यार पैसे अथवा स्वार्थ के लिए किया जाता है. इस छोटी सी नोंक झोंक से लड़कों की असलियत सामने आ गई कि इनकी दोस्ती केवल पैसे अथवा स्वार्थ के लिए है. ये बात सच भी निकली, जो दोनों लड़के थे, उन में दोस्ती है, पर दोस्ती वाली बात नहीं, ये हकीकत मैंने अपनी आंखों से देखी है.

दोनों एक दूसरे की मदद नहीं करते बल्कि टांग खींचने में लगे रहते हैं. जबकि वो दोनों लड़कियां कल तक एक दूसरे दूर दूर थीं, परंतु उस घटना ने दोनों को समीप पहुंचा दिया. जिस इंसान की फितरत में हो दगा देना, वो वफा अपने सगे बाप से भी नहीं कर सकता,
आभार
कुलवंत हैप्पी