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वो मासूम सी लड़की

वो मासूम सी लड़की मुझसे जुदा हो जाए।
बस ख्वाबों में आए, और खुदा हो जाए।

मैं ही जानता हूं पागल दिल को संभाला है कैसे।
उनकी चाहत को बच्चों की तरह पाला है कैसे।

कभी सूखा पड़ा तो कभी बाढ़ आई
हौंसले ​गिराने आफत हर बार आई

हा​लत देखकर आशिकों की अब मैं, हैप्पी यूं ही परेशान नहीं होता
पता है मुझे, किसी की याद में डूबकर उभरना आसान नहीं होता

आओ हंसते हुए मिलने की, दुश्मनों पर मेहरबानी करते हैं।
चलो आज हैप्पी, हम भी कुछ तूफानी करते हैं।

बंद कमरों में रोना बंद कर ​दिया, क्यूंकि नीर ए अश्क फर्श सोखता नहीं,
हैप्पी अगर जमीं पीती अश्क मेरे, तो आंखों से बहता दरिया मैं रोकता नहीं

कहीं विलेन न बन जाएं

बरिया की नई नई नौकरी लगी थी। बरिया बेहद मेहनती युवा था। काम के प्रति इतना ईमानदार कि पूछो मत, लेकिन बरिया जहां नौकरी करता था, वहां कुछ कम चोर भी थे। बरिया साधारण युवा नहीं जानता था कि जमाना बदल चुका है। मक्‍खनबाजों का जमाना है। काम वालों की भी जरूरत है, क्‍यूंकि घोड़ों की भीड़ में गधे भी चलते हैं। बरिया सबसे अधिक काम करता। वो हर रोज अपने हमरुतबाओं से अधिक वर्क काम करता, जैसे गधा कुम्‍हार के लिए।

मगर कुछ दिनों बाद बरिया निराश रहने लगा। उसको लगा, उसके साथी सारा दिन गपशप मारते हैं, वो कार्य करता है, लेकिन उसका बॉस उसको उतना ही मानता है, जितना के उसके हमरुतबाओं को। बरिया उदास परेशान कई दिनों तक तो रहा, लेकिन अब उसके भीतर बैठा इंसान सब्र खोने लगा। वो कुछ भी बर्दाशत करने को तैयार नहीं था। वो अगले दिन बॉस के टेबल पर पहुंचा। उसने अपने हमरुतबाओं के कार्यशैली की भरपूर निंदा की, जो उसका बॉस अच्‍छी तरह पहले से जानता था। बॉस भी मन ही मन में सोच रहा था, अगर वो काम करने लायक होते तो तेरी जरूरत किसे थी। बॉस ने ध्‍यान से शिकायत को सुना।

इस दिन के बाद बरिया को शिकायतों की लत लग गई। छोटी छोटी बातों पर शिकायत करना जारी हो गया। अंत में बॉस के मन में बरिया की नकारात्‍मक छवि बन गई। बरिया निरंतर शिकायतों की वजह से अपनी गुणवत्‍ता और काम के प्रति ईमानदारी खो बैठा। जब एप्रेजल करने का समय आया तो बरिया उस वक्‍त हैरान रह गया, जब उसके बॉस ने उसको कहा, बरिया जितना समय तुमने दूसरों की गलतियां गिनने और गिनाने में गुजारा, काश उतना समय अपने कार्य को और बेहतर बनाने में लगाया होता तो शायद आज मुझे तुम्‍हारा शत प्रतिशत एप्रेजल करने में भी कोई दिक्‍कत न होती, मगर तुम्‍हारी कार्य शैली तो उनसे भी ज्‍यादा खराब हो गई। बरिया उदास कांफ्रेंस रूम से बाहर निकल गया। मगर बरिया की कहानी बहुत से युवाओं के लिए पथ प्रदर्शक बन गई।

बरिया की कहानी से नसीहत लेते हुए अगर आप ऑफिस में बहुत अच्‍छा काम करते हैं, तो आपको बहस करने से बचना चाहिए। फालतू की बातों एवं शिकायतों से गलत छवि बनती है। अगर आप उच्‍चाधिकारियों को प्रभावित करना चाहते हैं, तो फोकट की बातें करने की बजाय आपको काम करके खुद को साबित करना चाहिए। सिर्फ खुद के बारे में दलीलें देते रहने से लोग आपसे परेशान हो जाते हैं और एक समय ऐसा आता है कि वे आपकी बातों पर गौर करना बंद कर देते हैं। यह बहुत बुरी स्‍थिति होती है। आप में हीरो है। यह तो केवल आपका काम बता सकता है। इसलिए बेकार की बातों में पड़ कर कहीं विलेन न बन जाएं।

टिप बॉक्‍स का कमाल


खाना खाने के बाद टिप देना स्‍टेटस बन चुका है, अगर आप ने खाना खाने के बाद टिप न दी तो शायद आपको महसूस होगा कि आज मैंने बड़े होटल में खाना नहीं खाया, वैसे टिप देना बुरी बात नहीं, इससे सर्विस देने वाले का मनोबल बढ़ता है। मगर आज तक आपने टिप केवल उस व्‍यक्‍ित को दी, जो आपके पास अंत में बिल लेकर आता है, शायद बिल देने वाला वह व्‍यक्‍ित नहीं होता, जो आपको खाने के दौरान सर्विस दे रहा होता है।

पिछले दिनों मैं जेबीएम कंपनी के मुख्‍यालय अपने काम से गया हुआ था, वहां पर शाम को एमडी अशोक मंगुकिया जी बोले, आज आपको एक बेहतरीन जगह पर खाना खिलाने के लिए लेकर जाता हूं, वहां की सर्विस व खाना दोनों की बेहतरीन हैं। उनकी बात से मुझे इंदौर सरवटे बस स्‍टेंड स्‍िथत गुरुकृपा होटल की याद आ गई, जिसकी सर्विस और खाना असल में तारीफ लायक है। सूरत के आरटीओ कार्यालय के निकट स्‍िथत सासुमा गुजराती रेस्‍टोरेंट में पहुंचते ही एमडी ने वेटर को खाना लाने के लिए इशारा किया, वह खाना लेने चला गया, लेकिन मैं खाने का स्‍वाद नहीं ले सकता था, क्‍योंकि मेरा उस दिन उपवास था, ऐसे में मैं इधर उधर, नजर दौड़ा रहा था, इतने में मेरी निगाह रेस्‍टोरेंट में मुख्‍य काउंटर पर पड़े टिप बॉक्‍स पर गई, और मैंने तत्‍काल कहा, एमडी जी, यहां फर्स्‍ट सर्विस का मुख्‍य कारण वह टिप बॉक्‍स है, जो सबको बराबर पैसे बांटता है, जिसके कारण, कर्मचारियों का मनोबल बना रहता है, और उनकी काम के प्रति रुचि कम नहीं होती।

मेरे खयाल से ऐसे टिप बॉक्‍स बड़े बड़े होटलों में होने चाहिए, क्‍योंकि टिप देने वाले तो टिप देते ही हैं, फिर क्‍यूं न उनके द्वारा दी गई राशि वहां काम करने वाले प्रत्‍येक व्‍यक्‍ित को मिले, चाहे वह रसोई में खाना परोसने वाला हो, चाहे वह टेबल पर खाना लाने वाला हो। मुझे टिप बॉक्‍स वाला विचार अच्‍छा लगा, लेकिन आप इसके बारे में क्‍या कहते हैं, जरूर लिखिए।

अपराधग्रस्‍त जीवन या सम्‍मानजनक जीवन


जिन्‍दगी में ज्‍यादा लोग अपराधबोध के कारण आगे नहीं बढ़ पाते, जाने आने में उनसे कोई गलती हो जाती है, और ताउम्र उसका पल्‍लू न छोड़ते हुए खुद को कोसते रहते हैं, जो उनके अतीत को ही नहीं वर्तमान व भविष्‍य को भी बिगाड़कर रख देता है, क्‍योंकि जो वर्तमान है, वह अगले पल में अतीत में विलीन हो जाएगा, और भविष्‍य जो एक पल आगे था, वह वर्तमान में विलीन हो जाएगा। जिन्‍दगी को खूबसूरत बनाने के लिए चाणक्‍य कहते हैं, 'तुमसे कोई गलत कार्य हो गया, उसकी चिंता छोड़ो, सीख लेकर वर्तमान को सही तरीके से जिओ, और भविष्‍य संवारो।'

ऐसा करने से केवल वर्तमान ही नहीं, आपका भविष्‍य और अतीत दोनों संवरते चले जाएंगे। किसी ने कहा है कि गलतियों के बारे में सोच सोचकर खुद को खत्‍म कर लेना बहुत बड़ी भूल है, और गलतियों से सीखकर भविष्‍य को संवार लेना, बहुत बड़ी समझदारी। मगर हम जिस समाज में पले बढ़े हैं, वहां पर किताबी पढ़ाई हम को जीवन जीने के तरीके सिखाने में बेहद निकम्‍मी पड़ जाती है, हम किताबें सिर्फ इसलिए पढ़ते हैं, ताकि अच्‍छे अंकों से पास हो जाएं एवं एक अच्‍छी नौकरी कर सकें। मैं पूछता हूं क्‍या मानव जीवन केवल आपको नौकरी कर पैसे कमाने के लिए मिला है, नहीं बिल्‍कुल नहीं, जीवन आपको जीने के लिए मिला है, और सबसे अच्‍छा जीवन वह है जो किसी की सेवा में लग जाए। आप नौकरी करते हैं, बहुत जल्‍द उब जाते हैं, फिर कुछ नया करने की ओर दौड़ते हैं, कभी सोच क्‍यूं, क्‍यूंकि आपके पास नौकरी करने के पीछे कोई मकसद नहीं, पैसा आदमी तब तक कमाता है, जब तक उसको यह आभास नहीं हो जाता कि पैसे से भी ज्‍यादा कुछ और जरूरी है, पर वह इस बात को समझ नहीं पाता।

अगर आप डॉक्‍टर हैं, अगर आप इंजीनियर हैं, तो आपको एक मकसद ढूंढना होगा कि इस पेशे से हम समाज को क्‍या दे सकते हैं, हो सकता है कि आप ने कभी पैसा कमाने के चक्‍कर में कुछ गलत कर दिया हो, मगर जीवन लम्‍बा है, इसलिए उस अपराधबोध को भूलकर आज से एक नई शुरूआत करें, यकीन करें, जिन्‍दगी आज से ही खूबसूरत हो जाएगी। मैं कुछ ऐसे लोगों को भी जानता हूं, जो प्‍यार में चोट खाने के बाद खुद को कोसते हुए जिन्‍दगी से मूंह मोड़ लेते हैं, क्‍यूंकि उनको आभास होने लगता है कि उन्‍होंने जिन्‍दगी में बहुत बड़ा अपराध कर दिया, जबकि यह सिर्फ एक मानसिक स्‍थिति है, जिसको बदलने से जीवन बदल सकता है।

आप अपराधबोध के साथ मरना पसंद करेंगे या उस भूल को भूलकर एक मकसदपूर्ण जीवन जीते जीते अंतिम सांस छोड़ना पसंद करेंगे, फैसला आपके हाथ में है।

बच्चों को दोष देने से बेहतर होगा उनके मार्गदर्शक बने

कुलवंत हैप्पी/ गुड ईवनिंग
सेक्‍स एजुकेशन को शिक्षा प्रणाली का हिस्सा बनाया जाए, का जब भी मुद्दा उठता है तो कुछ रूढ़िवादी लोग इसके विरोध में खड़े हो जाते हैं, उनके अपने तर्क होते हैं, लागू करवाने की बात करने वालों के अपने तर्क। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि इस मुद्दे पर सहमति बन पानी मुश्किल है। मुश्किल ही नहीं, असंभव लगती है। आज के समाज में जो घटित हो रहा है, उसको देखते हुए सेक्‍स एजुकेशन बहुत जरूरी है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि इसको शिक्षा प्रणाली का ही हिस्सा बनाया जाए। इसको लागू करने के और भी विकल्प हो सकते हैं, जिन पर विचार किया जाना अति जरूरी है। अब तक समाज दमन से व्यक्‍ति की सेक्‍स इच्छा को दबाता आया है, लेकिन अब सब को बराबर का अधिकार मिल गया, लड़कियों को घर से बाहर कदम रखने का अधिकार। ऐसे में जरूरी हो गया है कि बच्चों को उनको अन्य अधिकारों के बारे में भी सजग किया जाए, और आज के युग में यह हमारी जिम्मेदारी भी बनती है, ताकि वह कहीं भी रहे, हम को चिंता न हो। वह जिन्दगी में हर कदम सोच समझ कर उठाएं। आए दिन हम अखबारों में पढ़ते हैं कि एक नाबालिगा एक व्यक्‍ति के साथ भाग गई। आखिर दोष किसका, बहकाने वाले का, अभिभावकों का या फिर उस लड़की का, जो काम में अंधी होकर घर वालों के दमन से डरती हुई, चुपचाप किसी अज्ञात के साथ भाग गई, जिसको वह कुछ समय से जानती है। प्रत्येक व्यक्‍ति को पता है कि समाज में या चल रहा है, लेकिन वह भूल जाता है कि उसका परिवार, उसके परिवार का हर परिजन इस समाज का हिस्सा है। जो घटना आज उसकी आंखों के सामने घटित हुई, वह कल उसके घर में भी हो सकती है। फिर कहें दोष किसका। दोष् हमारा ही है, हम समाज को पूरी तरह से जानते हैं, लेकिन उस समाज को बचाने के लिए कोई कदम उठाने की बजाय उदासीनता को अपनाना अधिक पसंद करते हैं। जहां तक मेरी अब तक की उम्र का तुजुर्बा कहता है, ज्‍यादातर नाबालिग लड़कियां हवश के भूखे भेड़ियों की भेंट चढ़ती हैं, खासकर आठवीं से दसवीं कक्षा की छात्राएं। इसका भी एक वैज्ञानिक कारण है, क्‍योंकि इस उम्र में लड़कियों के हर्मोन्स आदि चेंज होते हैं। उनको कुछ नया अनुभव होता है, जो उन्होंने आज तक अनुभव नहीं किया होता, जैसे ही इस दौर में वह किसी के संपर्क में आती हैं, तो बहक जाती हैं। यहां पर उनको एक दोस्त की जरूरत होती है, जो उसको सही तरह से गाइड करे, उनको सही रास्तों की पहचान करवाए। मगर हिन्दुस्तान में माताएं सदैव माताएं बनकर रहती हैं, उनको दोस्त बनने की आदत नहीं पड़ी, और बच्चे सिनेमा से जो सीखते हैं, उसको जिन्दगी में लागू करने की कोशिश करने लगते हैं, जिसके नतीजे बेहद बुरे होते हैं, योंकि हिन्दुस्तान में बनने वाली फिल्में हमेशा अधूरी होती है, भगवान श्रीकृष्ण कथा सी, जो अभिमान्यू ने मां के पेट में सुनी, और चक्करव्यू में फंस गया। हिन्दुस्तान की फिल्में हमेशा किशोर व युवा पीढ़ी को चक्करव्यूह में फंसाकर छोड़ देती है। चलते चलते इतना कहूंगा कि समाज को दमन से नहीं, बल्कि सही विचारधाराओं से बचाया जा सकता है।

उंगली उठाने से पहले जरा सोचे

बुधवार को स्थानीय फायर बिग्रेड चौंक पर समाज सेवी संस्थाओं की ओर से हिन्दुस्तानी भ्रष्टाचार के खिलाफ जागरूकता रैली का आयोजन किया गया, जिसमें मैं भी शामिल हुआ। हाथों में जागरूकता फैलाने वाले बैनर पकड़े हम सब सडक़ के एक किनारे खड़े थे, और उन बैनरों पर जो लिखा था, वह आते जाते राहगीर तिरछी नजरों से पढ़कर अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रहे थे। इतने में मेरे पास खड़े एक व्यक्‍ति की निगाह सामने दीवार पर लटक रहे धार्मिक संस्था के एक फलेक्‍स पर पड़ी, जिस पर लिखा हुआ था, हम बदलेंगे युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा, उन्होंने मेरा ध्यान उस तरफ खींचते हुए कहा कि वह शब्‍द बहुत कम हैं, लेकिन बहुत कुछ कहते हैं। अपने लेखन से सागर में गागर तो कई लेखकों ने भर दिया, लेकिन हमारा जेहन उनको याद कितनी देर रखता है, अहम बात तो यह है। हमारे हाथों में पकड़े हुए बैनरों पर लिखे नारों की अंतिम पंक्‍ति भी कुछ यूं ही बयान करती है, न रिश्वत लें, न रिश्वत दें की कसम उठाएं, जो बैनर तैयार करते समय मेरे दिमाग से अचानक निकली थी। किसी पर उंगली उठानी, सडक़ों पर निकल कर प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करनी हमारी आदत में शुमार सा हो गया था, लेकिन हम क्‍यों नहीं सोचते के जब हम किसी पर उंगली उठाते हैं तो तीन उंगलियां हमारी तरफ होती हैं, जो हमको याद करवाती हैं कि कुछ दोष तो हमारा भी है, सारा दोष सरकारी सिस्टम का नहीं। हम सिस्टम का बहुत बड़ा हिस्सा हैं, अगर हम सिस्टम को बरकरार रखते हैं, तो ही सिस्टम ठीक रह सकता है, क्‍योंकि सिस्टम बनाने वाले मुट्‌ठी भर लोग हैं, लेकिन उसको संभालकर रखने वाले व बिगाडऩे वाले करोड़ों में हैं। अगर हम रिश्वत देते हैं, तो सामने वाला रिश्वत लेता है। हम अगर नशा पैदा करते हैं, तो हमीं से कुञ्छ लोग बेचते हैं, कुछ लोग खाते हैं। गलियों में सीवरेज का पानी फैल जाता है, तो लोग सडक़ों पर उतर आते हैं, नगर पालिकाओं, नगर निगमों व सरकारों के खिलाफ नारेबाजी करते हैं। लेकिन नारेबाजी करने से पूर्व वह एक दफा भी नहीं सोचते हैं कि आखिर नालियां व सीवरेज बंद क्‍यों होते हैं। प्लास्टिक के लिफाफे इस्तेमाल करने के बाद हम कहां फेंकते हैं? कभी सोचा है! वह लिफाफे ही सीवरेज व्यवस्था को प्रभावित कर देते हैं। जरा सोचो, सीवरेज व्यवस्था प्रभावित होने से हम इतने क्रोधित हो जाते हैं तो जिस तरह भूमि में प्लास्टिक दिन प्रति दिन फेंके जा रहे हैं, एक दिन धरती की सोखने की क्षमता खत्म हो जाएगी, तब क्‍या होगा, किसके खिलाफ नारेबाजी करेंगे। सिस्टम केञ् खिलाफ, कौन से सिस्टम के खिलाफ, जो हम से बनता है, जिसका हम हिस्सा हैं। बेहतर होगा, धार्मिक बोर्ड पर लिखी पंक्‍तियों का अनुसरण करें, जिसमें लिखा था, हम बदलेंगे युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा।

'मिस्त्र में जनाक्रोश जिम्मेदार कौन' विषय पर विचार गोष्ठी आयोजित


जिम्मेदार : अमेरिकी रणनीति व अन्य अरब देशों में फैला जनाक्रोश
बठिंडा। बठिंडा विकास मंच द्वारा 'मिस्त्र में जनाक्रोश जिम्मेदार कौन' विषय पर विचार गोष्ठी शिव मंदिर स्ट्रीट में लेखक व समाज शास्त्री राजिंदर चावला की अध्यक्षता में आयोजित की गई, जिसमें प्रोफेसर एन के गोसाई मुख्य प्रवक्‍ता के तौर पर उपस्थित हुए। विचार चर्चा शुरू करते हुए बठिंडा विकास मंच के अध्यक्ष राकेश नरूला ने कहा कि वर्तमान राष्ट्रपति के दिन अब गिने चुने रह गए लगते हैं, पिछले तीन दशकों से उन्होंने फौलादी मुट्ठी व फौजी बूट का इस्तेमाल कर विपक्ष को दबाया है, वहां आज स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि आम आदमी जी जान पर खेलकर सड़कों पर उतर आया है। प्रिंसिपल एनके गोसाई ने कहा कि एक जमाने में मिस्त्र की साख अंतर्राष्ट्रीय मंच पर थी, मिस्त्र के राष्ट्रपति नासिर ने न सिर्फ स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण किया बल्कि उसके बाद हुए हमलों में साम्राज्‍यवादियों के दांत खट्टे किए, जबकि मिस्त्र ने आसवान बांध का निर्माण किया तो अरबों का सिर गर्व से उंच्चा हो गया। हजारों साल पहले बने पिरामिड इस बात के गवाह हैं कि मिस्त्र की संस्कृति प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है, उपनिवेशिक काल में मिस्त्र पर फ्रांसीसी व ब्रिटिश प्रभाव पड़ा, इसलिए वह पश्चिमी तौर तरीकों वाला बना, इस कारण उसे अमरीकी दलाल कहा जाने लगा, अब वहां आपातकाल जैसी स्थिति बन गई है एवं उद्योग पूरी तरह अस्त व्यस्त हो गया, जिसका बुरा प्रभाव अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पड़ा है। सबसे बड़े कपास उत्पादक देश में अब यह आलम है कि जनता राष्ट्रपति हुस्‍नी मुबारक के खून की प्यासी हो गई है, इसके पीछे कट्टर पंथी इस्लामिक बिरादरी का हाथ भी हो सकता है, क्‍योंकि लेबनान में हिजबुला की सक्रियता मिस्त्र को आशंकित करती रही है, मिस्त्र में ही नहीं अन्य अरब देशों में जैसे अलजीरिया, मौरक्को, जार्डन आदि में भी जनता जागरूक होकर तानाशाही विरूद्ध आजादी का बिगुल बजा चुकी है, इस सभी का प्रभाव मिस्त्र पर पड़ा, जिसके कारण मिस्त्र में जनाक्रोश हुआ। राजिंदर चावला ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि मौजूदा हालात के लिए कुटिल अमेरिकी रणनीति भी जिम्मेदार है, अमरीका अब समझ चुका है कि भ्रष्ट व कुनबाप्रस्त हुस्नी मुबारक अब अधिक दिन सत्‍ता में रहने वाले नहीं, इसलिए अब उन्हें अमेरिकी सहयोग नहीं मिल रहा है, यह तो तय है कि अमेरिकी हकूमत हुस्नी मुबारक के जाने के पक्ष में है, वह यह भी प्रयास करेंगे कि नया राष्ट्रपति आए वह उनके कहने में हो व उनके इशारों पर चले। अमेरिका के करीबी माने जाने वाले मिस्त्र के वैज्ञानिक नॉबेल पुरस्कार विजेता अल वरदोई मिस्त्र में सक्रिय हो गए हैं, वे कह रहे हैं कि यदि मिस्त्र की जनता उन्हें राष्ट्रपति की जिम्मेदारी सौंपेगी तो वे इसे स्वीकार करेंगे। सेवा राम सिंगला ने कहा कि मिस्त्र की बरबादी के लिए अमेरिकी नीतियां भी जिम्मेदार हैं। मध्यपूर्व के तेल भंडार पर कब्‍जा बनाए रखने की अमेरिकी रणनीति से मिस्त्र में इस तरह के हालात पैदा हुए हैं। इस समय बहुत सारे अरब देशों में जनाक्रोश फैला हुआ है, जिसका फायदा सीधे तौर पर अमेरिका को होगा।

धन काला है या नहीं पहले इसकी जांच हो - बूटा सिंह

बठिंडा। पंजाब की बिहार से तुलना किसी भी स्तर पर हो ही नहीं सकती, वहां और यहां के हालातों में जमीं आसमान का फर्क है, यह शब्‍द बिहार के पूर्व राज्यपाल व एनसीएससी के चेयरमैन बूटा सिंह ने स्थानीय सर्किट हाउस में समाचार पत्र टरूथ वे के प्रतिनिधि कुलवंत हैप्‍पी से हुई विशेष बातचीत के दौरान कहे, जोकि बलराम जाखड़ के बेटे सुरेंद्र जाखड़ के भोग में शामिल होने के लिए आए थे। शिरोमणि अकाली दल के तेज तर्रार नेता व पंजाब उप मुख्‍यमंत्री सुखबीर सिंह बादल द्वारा पंजाब में बिहार की तर्ज पर दोहराव की बात कहे जाने के संबंध में जब बूटा सिंह से सवाल पूछा गया तो उन्होंने अपने पुराने दिनों की तरफ लौटते हुए कहा कि बिहार और पंजाब में तुलना करना गलत है। बिहार की तुलना तो अन्य राज्यों से भी नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि बिहार पर सबसे लम्‍बे समय तक राज लालू व उसके रिश्तेदारों ने किया, वहां की सरकारी संपत्‍त‍ि पर उनका एकाधिकार था एवं वहां नीतिश कुमार के आने से पूर्व कानून नाम की कोई चीज नहीं थी, जबकि पंजाब व अन्य राज्यों में किसी भी पार्टी की सरकार के दौरान ऐसे हालात पैदा नहीं हुए, जो लालू व उसके रिश्तेदारों के शासनकाल दौरान बिहार में पैदा हो गए थे, नीतिश कुमार के आने के बाद बिहार में कानून व्यवस्था सुचारू हुई एवं उसी के कारण नीतिश कुमार ने वहां पर वापसी की। उन्होंने अपने पुराने दिन याद करते हुए कहा, 'उन्हें याद है कि जब वह राज्यपाल थे तो बिहार में सरकार के नुमाइंदों को शपथ दिलाने के लिए राज्यभवन के दरवाजे खोलकर कई दिनों तक बैठे रहे थे, लेकिन वहां शपथ ग्रहण करने के लिए कोई भी नुमाइंदा नहीं पहुंचा एवं बिना शपथ ग्रहण किए सरकार चलती रही, जिसके बाद उन्होंने राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजी। ऐसे हालातों देश भर के किसी भी राज्य में पैदा नहीं हुए। ऐसे में पंजाब से बिहार की तुलना दूर दूर तक सही नजर नहीं आती।' सुलग रहे काले धन के मुद्दे पर कांग्रेस का बचाव करते हुए श्री सिंह ने कहा, 'कौन कहता है कि केंद्र में कांग्रेस सरकार है, ध्यान से देखें, वहां कांग्रेस सरकार नहीं बल्कि यूपीए सरकार है, और ऐसे में अकेली कांग्रेस पर उंगली उठाना जायज नहीं।' उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, यह जरूरी नहीं कि विदेशों में पड़ा हुआ पैसा काला धन ही हो, इस की सीबीआई व अन्य जांच एजेंसियों से जांच करवानी चाहिए कि वह धन काला है या नहीं। उन्होंने कहा कि स्विस की बैंकों को विश्‍व बैंक से गोपनीयता कायम रखने के अधिकार प्राप्त हैं, ऐसे में वहां की बैंकें किसी भी व्यक्‍ति की जानकारी डिस्कलोज नहीं कर सकती, और जो जानकारी सरकार को मिली है, वह किसी व्यक्‍ति द्वारा लीक की हुई जानकारी है, जिसको किसी भी स्तर पर सही नहीं ठहराया जा सकता, इसलिए इस मामले में सरकार थोड़ी सी सर्तकता बरत रही है। एक अन्य सवाल का जवाब देते हुए बूटा सिंह ने कहा कि कांग्रेस का भविष्य उज्जवल है, क्‍योंकि कांग्रेस ही भारत में सबसे बड़ी पार्टी है, जबकि अन्य राजनीतिक पार्टियों का दायरा सीमित है। कुछ खत्म हो चुकी हैं एवं कुछेक राज्यों तक सीमित है। उन्होंने कहा कि अगर हिन्दुस्तान में संविधान को जीवंत रखना है तो केंद्र में एकल सरकार का आना जरूरी है, एवं यह कांग्रेस पार्टी के बिना कोई और कर नहीं सकता। इसके अलावा कांग्रेस पार्टी की अपनी विचारधारा है एवं कांग्रेस पार्टी आज भी उन्हीं सिद्धांतों पर अग्रसर है, जिनको स्वराज से पूर्व पार्टी संस्थापकों ने स्थापित किया था। इस मौके पर उनके साथ राजीव गांधी लोक भलाई मंच के चेयरमैन डॉक्‍टर सतपाल भटेजा, कांग्रेस प्रदेश कमेटी सचिव टहल सिंह संधू, सुखजीत सिंह नीना आदि उपस्थित थे।

सुंदर मुंदरीए को मिले गए दुल्ला भट्टी

सुंदर मुंदरीए हो, तेरा कौन बेचारा, ओ दुल्ला भट्टी वाला। यह लोहड़ी का लोकप्रिय गीत तो लोहड़ी के त्योहार के आस पास आम सुनाई पड़ता है, लेकिन पिछले कई दशकों से यह गीत केवल एक औपचारिकता मात्र बना हुआ था, क्‍योंकि सुंदर मुंदरियां तो हर वर्ष पैदा होती रहीं, लेकिन उनकी कदर करने वाला दुल्ला भट्‌टी किसी मां की कोख से नहीं जन्मा। किसी ने सच ही कहा कि आखिर बारह वर्ष बाद तो रूढ़ी की भी सुन ली जाती है, यह तो फिर भी कन्याएं हैं, इनकी तो सुनी जानी जायज थी। दुल्ले भट्टी की मृत्यु के दशकों बाद ही सही, लेकिन इन सुंदर मुंदरियों को दुल्ले भट्टी जैसे महान लोग मिलने शुरू हो गए। लड़कों की लोहड़ी, नव विवाहित जोड़ों की लोहड़ी तो पंजाब में हर लोहड़ी के दिन मनाई जाती है, लेकिन दुल्ले भट्टी के बाद लड़कियों की लोहड़ी मनाने का रुझान मर गया, क्‍योंकि लड़कियों को लड़कों से कम आंका जाने लगा, जबकि गुरूओं पीरों ने इनकी कोख से जन्म लिया एवं उन गुरूओं पीरों ने भी औरत को पूजनीय तक बताया, मगर समाज ने समाज को चलाने वाली कन्या को ही भुला दिया। समय ने करवट बदली, आज से करीब चार पांच साल पहले बठिंडा की समाज सेवी संस्था सुरक्षा हेल्पर रजि. बठिंडा के चेयरमैन शाम कुमार शर्मा ने लोहड़ी को एक अलहदा ढंग से मनाने का फैसला लिया, उस फैसले ने लोहड़ी धीयां दी उत्सव को जन्म दिया, और इस संस्था की ओर से हर साल लोहड़ी धीयां दी उत्सव मनाना शुरू क्‍या किया गया कि शहर की आबोहवा बदलने लगी, आज आलम यह है कि लोग लड़कों की लोहड़ी कम व लड़कियों की लोहड़ी सामूहिक तौर पर द्गयादा मनाने लगे हैं। साल 2010, 9 जनवरी को स्थानीय बहमन दीवाना रोड़ स्थित गुडविल पलिक स्कूल के प्रांगण में सुरक्षा हेल्पर, बठिंडा विकास मंच व गुडविल सोसायटी की ओर से एक लोहड़ी धीयां दी पांचवां लोहड़ी उत्सव मनाया गया। इस समारोह में करीब 150 के करीब कन्याओं को उपहार देकर सम्मानित किया गया एवं उनकी सामूहिक लोहड़ी बड़ी हर्षेल्लास के साथ मनाई। यह समारोह तो केवल एक शुरूआत थी, इसके बाद महानगर में अन्य संस्थाओं ने भी लोहड़ी धीयां दी मनाने के लिए बीड़ा उठा लिया। बठिंडा महानगर में एक छोटी सी संस्था के द्वारा शुरू किए इस प्रयत्न ने बहुत जल्द अपना असर दिखाया और लोगों में लड़की के प्रति भी सम्मान पैदा किया। इतना ही नहीं, गत दिवस गांव नथाना में पहुंची सांसद बीबी हरसिमरत कौर बादल ने भी समाज से अपील की कि लड़कियों की लोहड़ी मनाने वाले लोगों को उत्साहित करें एवं वहीं लड़कियों की पहली लोहड़ी मनाने वाले दम्पतियों को सम्मानित किया जाए। श्रीमति बादल की इस अपील से कयास लगाया जा सकता है कि लोहड़ी धीयां दी किस तरह समाज का हिस्सा बनती जा रही है। लड़कियों की लोहड़ी मनाने की कड़ी को आगे बढ़ाते हुए मालवा हेरिटेज फाउंडेशन की ओर से स्थानीय खेल परिसर के समीप स्थित बनावटी गांव जयपालगढ़ में 105 कन्याओं की लोहड़ी बड़ी धूमधाम से मनाई गई। वहीं दूसरी तरह नवयुग स्पोर्ट्स कल्चर एंड वेलफेयर सोसायटी बठिंडा की ओर से 13 जनवरी को जीटी रोड़ स्थित समरहिल कान्वेंट स्कूल में 31 कन्याओं की लोहड़ी मनाई जा रही है। इस तरह के प्रयत्न यहां लड़कियों को समाज में बनता सम्मान दिलाने के लिए कारगार सिद्ध होंगे, वहीं दूसरी तरफ कन्या भ्रूण हत्या व दहेज जैसी सामाजिक बुराईयों को भी खत्म करेंगे। सुरक्षा हेल्पर की ओर से जो कदम कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए उठाया गया था, वह आज सार्थक सिद्ध हो रहा है। ऐसे में सुरक्षा हेल्पर के लिए यह पंक्‍ित कहना कोई गलत बात न होगी कि मैं तो अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर लोग मिलते गए और कारवां बनता गया।

लोहड़ी उत्सव 'लोहड़ी धीयां दी' छोड़ गया अमिट छाप



कन्या भ्रूण हत्या को रोकने का प्रयास था 'लोहड़ी धीयां दी' : शर्मा
बठिंडा । सुरक्षा हैल्पर 'रजि.', बठिंडा विकास मंच, गुडविल सोसायटी बठिंडा ने शहर की अन्य समाज सेवी संस्थाओं के साथ मिलकर लोगों को कन्या भ्रूण के नुक्‍सान प्रति जागरूक करने के लिए गत रविवार को यहां गुडविल पलिक हाई स्कूल परस राम बठिंडा में लोहड़ी धीयां दी नामक लोहड़ी उत्सव का आयोजन किया। यह आयोजन रविवार सुबह 11 बजे से दोपहर दो बजे तक चला। कार्यक्रम में सुरक्षा हैल्पर के चेयरमैन व टरूथ वे टाइम्स के संपादक शाम कुमार शर्मा व बठिंडा विकास मंच के अध्यक्ष राकेश नरूला ने बताया कि कार्यक्रम में एक वर्ष से कम आयु की सौ के लगभग परिवारों की बच्चियों को तोहफे दिए गए। इस अवसर पर मुख्यातिथि नेशनल अवार्डी अनिल सर्राफ ने कहा कि हम लोग भ्रूण हत्या रोकने की बात तो करते हैं परन्तु उस पर खुद अमल करने से कतराते हैं। अगर सही तरीके से हमें भ्रूण हत्या रोकनी है तो महिलाओं को आगे आना होगा। इसके लिए त्याग की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अगर आज किसी बहन के भाई नहीं तो उसकी शादी में कई रूकावटें पैदा होती हैं ऐसा यों? रूकावटें खड़ी करने वाली भी हमारी माताएं व बहनें ही हैं। यह पाप भी भ्रूण हत्या से कम नहीं। दहेज लेना भी भ्रूण हत्या को बढ़ावा देना है। समाजसेवी पवन सिंगला ने कहा कि अगर हमने भ्रूण हत्या रोकनी है तो कन्यायों को समाज में लड़के से बढ़कर सम्मान देना होगा। उसे शिक्षित करना होगा ताकि शादी के बाद अगर जरूरत पड़े तो वह अपना परिवार चला सके या अपने परिवार को सहारा दे सकें। 

इस मौके पर एक सवाल का जवाब देते हुए टरूथ वे टाइम्स के संपादक व सुरक्षा हेल्पर के चेयरमैन शाम कुमार शर्मा ने बताया कि आज से करीबन पांच साल पूर्व कन्या भ्रूण हत्या होने के कारण पंजाब भर में लिंग अनुपात अंतर बढ़ता जा रहा था, आए दिन अखबारों की सुर्खियों में लिंग अनुपात के अंतर संबंधी खबरें पढ़ने के बाद कन्या भ्रूण हत्या के विरोध में कदम उठाने का विचार मन में उपजा और इस विचार की उपज थी लोहड़ी धीयां दी। इस समारोह में सेवानिवृत अधीक्षक अभियंता आर सी लूथरा, योग शिक्षक राधे श्याम, बाबा हरी हर, गुडविल के पी के बांसल, इन्द्रजीत गुप्ता, भाविप के प्रो. गुप्ता, प्रिंसीपल एन के गोसांईं, आसरा वेल्फेयर सोसायटी के संस्थापक रमेश मेहता, जसपा के सुरव्श गोयल, भाजपा के नवीन सिंगला एडवोकेट , बठिंडा विकास मंच के नवनीत सिंगला , विनोद गुप्ता , रमेश सरडाना आईसी -स्पाईसी होटल वाले, अशोक कुमार धुन्‍नीके वाले , गुरमीत सिंह सिधू , पूर्व पार्षद विजय शर्मा , स्कूल की प्रिंसीपल शिमला सिंगला , सभ्याचारिक कार्यक्रम प्रभारी श्रीमति राजवीर कौर, स्कूल स्टाफ व अनरू लोग उपस्थित थे। स्कूल के प्रांगण में लोहड़ी डाली गई व आए अतिथियों व परिवारों के लिये जलपान का प्रबंध भी किया गया।

सावधान! गैस गीजर बन सकता है मौत का कारण


गैस गीजर ले चुका है कई लोगों की जिन्दगी : पठानियां
एनडब्‍ल्यूएस ने की लोगों को सतर्क रहने की अपील

बठिंडा। सर्दीयों के मौसम में ठंड से बचने के लिए लोगों द्वारा गर्म पानी के इस्तेमाल हेतु बाथरूम में लगे गैस गीजरों व कोयले वाली अंगीठियों का प्रयोग घरों में आम ही किया जाता है। इन दिनों में हमारी छोटी सी लापरवाही किसी बड़ी घरेलू घटना को अंजाम दे सकती है। घरों में बाथरूम में लगे गैस गीजर या सर्दियों दौरान प्रयोग की जाने वाली कोयले की अंगीठियाँ लोगों की लापरवाही तथा अज्ञानता के कारण मौत का सामान बन सकती है। इनकी इस्तेमाल संबंधी विशेष् तौर पर सावधान रहने की जरूरत है। पिछले सालों के दौरान कई लोग बाथरूम में नहाते समय बाथरूम में लगे गैस गीजरों की जहरीली गैस चढ़ने के कारण मौत के मुँह में चले गये या चलती फिरती जिन्दा लाश में तदील हो गए। यह खलासा सेंट जॉन के ट्रेनिंग सुपरवाईजर नरेश पठानिया ने समाजसेवी संस्था नौजवान वेलफेयर सोसाईटी के वालंटिरयों को जानकारी देते हुए किया। उन्होंने आगे बताया कि बंद बाथरूमों में नहाने के लिये गर्म पानी इस्तेमाल हेतु जब इन गैस गीजरों का प्रयोग कर रहें होतें हैं तो इन गैस गीजरों के बर्नरों से पैदा हो रही आग के कारण आसीजन की खपत होती है तथा कार्बन डाईआक्‍साईड की मात्रा बढ़ जाती है। तंग जगह वाले बाथरूम जिनमें ताजी हवा आने जाने के प्रबंध न हो तो वहाँ जहरीली गैस कार्बन मोनोआक्‍साईड गैस पैदा होती है। कार्बन मोनोआक्‍साईड एक रंगहीन तथा गंदहीन गैस होने के साथ बेहद जहरीली गैस है, जो इंसान के लिये मौत का कारण बन सकती है। यह जहरीली गैस खून के अंदर आसीजन को पहुँचाने की समर्था को घटाती है और शरीर के अंदर विभिन्ना अंग आसीजन की कमी के कारण प्रभावित होतें हैं। दिल तथा दिमाग को जरूरत के अनुसार आसीजन न मिलने के कारण व्यक्ति अर्द्ध या गहरी बेहोशी (कोमा) में चला जाता है और अगर देर हो जाए तो व्यक्ति की मौत तक हो सकती है। इस गैस के चढ़ने से व्यक्ति में कमजोरी, थकावट, सिर दर्द, धुंधला दिखना, चक्कर आना, दिमागी असंतुलन, छाती में दर्द, घबराहट होना, लड प्रैशर कम होना, सांस उखड़ना व उल्टी आदि लक्ष्ण पैदा होतें हैं। व्यक्ति बेहोश होकर गिर पड़ता है व सांस प्रणाली बंद हो जाने से मौत भी हो सकती है। श्री पठानिया ने बताया कि इस घरव्लू घटना का दुखदायी पहलू यह भी है कि परिवार के दूसरे सदस्यों को इस घटना का बड़ी देर के बाद पता चलता है योंकि पीड़ित धीरे धीरे बेहोशी की हालत में चला जाता है और अपनी बिगड़ती हालत के बारे में किसी को बता भी नहीं पाता। पीड़ित को परिवारिक सदस्यों द्वारा बाथरूम के दरवाजे तोड़ कर बाहर निकालना पड़ता है। इसके इलावा उन्होने बताया कि सर्दी से बचने के लिये कई बार लोग बंद कमरों के अंदर अंगीठी लगा कर सो भी जातें हैं। इसके प्रति भी हमारी अज्ञानता तथा लापरवाही मौत का कारण बन सकती है। नरेश पठानिया ने नौजवान वेलफेयर सोसाईटी के वालंटियरों को अपील की, कि इन दिनों गैस गीजरों तथा अंगीठियों से होने वाले इन घरव्लु हादसों के बचाव हेतु लोगों को जागरूक करवें ताकि किमती जानें बचाई जा सके। उन्होने वालंटियरों को ऐसी दुर्घटना घटित हो जाने के मौके पर दी जाने वाली प्राथमिक सहायता और सावधानियों के संबंध में बताया कि गैस गीजरों पर दी गई हिदायतों की पालना करवें। अगर गीजर को बाहर ही लगाया जाये तो बेहतर है। अगर गीजर बाथरूम के अंदर लगा है तो ताजी हवा के आने जाने का रास्ता आवश्य हो या आगजास्ट फैन लगा हो। बाथरूम में नहाने गये परिवारिक सदस्य के प्रति सचेत रहें। जहरीली गैस चढ़ने पर पीड़ित को तुरंत खुली जगह पर ले जाओ। गैस खुद को न चढ़े इसलिये अपना मुँह ढक कर अंदर जायें। बेहोशी की हालत में पीड़ित को टेड़ा कर दो ताकि उल्टी वगैराह अंदर जा कर सांस नली में रूकावट पैदा न करें। हर दस मिनट बाद सांस चैक करतें रहें तथा पीड़ित को शांत व गर्म रखे। बेहोश व्यक्ति के मुँह में कोई भी तरल पदार्थ पानी आदि न दें। जल्दी ही ऐम्बुलैंस का प्रबंध करके पीड़ित को नजदीकी अस्पताल में ले जायें। वेंटीलेटर की सहायता से आसीजन देने की जरूरत पड़ सकती है। बच्चों में बड़ों की अपेक्षा खतरा और अधिक होता है, इसलिये नहाते समय उनपर विशेष् ध्यान देने की जरूरत होती है। नौजवान वैल्फेयर सोसाईटी के अध्यक्ष सोनू माहेश्वरी ने लोगों से अपील की, कि सर्दियों के दिनों में बंद कमरों के अंदर कोयले वाली अंगीठियां, स्टोप, हीटर आदि का इस्तेमाल ने करें। उन्होंने नरेश पठानिया को आभार प्रकट करते हुए भरोसा दिलाया कि संस्था की ओर से द्गयादा से ज्‍यादा लोगों को ऐसे हादसों के प्रति जागरूक किया जायेगा।

..खिड़की, बंद मत करना!

आध्यत्मिक लोग दुनिया को सराय कहते हैं, और विचारक इसको रंगमंच। दोनों ही अपने जगह बिल्कुल सही हैं, क्योंकि दोनों का अपना अपना नजरिया है। कारोबारी लोग इसको रिले ट्रेक भी कहते हैं, और कुछ बाजार भी। अगर खुले दिमाग से सोचा जाए, तो सब के सब सही नजर आएं, और वो हैं भी। एक बगीचे में तीन लोग सैर के लिए गए। जब वो बाहर आ रहे थे तो बगीचे के प्रवेश द्वार पर खड़े कर्मचारी ने एक एक से पूछा, आप ने बगीचे में क्या क्या देखा? सब ने उसको बताया, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि उन तीनों ने जो देखा, वो अलग अलग था, जबकि वो गए तो एक साथ ही थे। साहित्यकार की निगाह वहां खिले रहे पड़े पौधों पर गई, उद्यमी की निगाह इसको और बेहतर कैसे बनाए जाए पर गई और जबकि तीसरे व्यक्ति की निगाह वहां की निकम्मे प्रबंधन पर गई। जैसे हाथ की उंगली एक जैसी नहीं हो सकती, वैसे ही व्यक्तियों की सोच का एक होना मुश्किल है। एक आम बात जो हम सबके साथ घटित होती है। आप कुछ नया करने की सोच रहे हैं, उदाहरण के तौर पर कारोबार ही। जैसे आप इस बात को किसी के सामने रखोगे, वो पहले ही कह देगा मत करना, बहुत मुश्किल है। सामने वाले की पहली प्रतिक्रिया कुछ ऐसी ही होगी, सचमुच। अगर आप उससे पूछेंगे कि आसान क्या है, वो बता, तो उसके पास जवाब नहीं होगा, जबकि ज्यादातर लोग पूछते ही नहीं पलटकर। जो व्यक्ति कहता है, तुम यह मत करो, जोखिम है, उसको न तो खुद पर भरोसा है और न आप पर। वो असफलता से डरा हुआ है, जबकि असफलता नामक कोई चीज दुनिया में नहीं, जो लोग आज सफल हैं, और सफलता की शिखर की तरफ बढ़ रहे हैं, वो लोगों की परवाह नहीं करते, क्योंकि उनकी निगाह लक्ष्य पर है, न कि सड़क किनारे पड़े पत्थर पर। आप देखा होगा, जब कोई व्यक्ति नया नया साईकिल चलाना सीखता है, तो उसका साइकिल पूरी सड़क छोड़कर एक सड़क किनारे पड़े छोटे से पत्थर से जा टकराता है। पता है क्योंकि उसका ध्यान उस छोटे से पत्थर पर था, न कि दस फुट चौड़ी सड़क पर। वो व्यक्ति साइकिल सीखते समय कई दफा गिरता है, लेकिन साईकिल चलाना बंद नहीं करता, क्योंकि तब उसके जेहन में असफलता नहीं अनुभव घुसा होता है। तब तक आपको कोई नहीं असफल कर सकता जब तक आप असफलता को अनुभव मानते हैं, जो एडिशन ने बल्ब बनाने के बाद कहा था, जब एडिशन से पूछा गया कि आप दस हजार बार असफल हुए, आपको कैसा लगता है, तो एडिशन का जवाब था, मैं कभी असफल नहीं हुआ, वो तो मेरे अनुभव थे, जिसके द्वारा मुझे पता चला कि इन दस हजार तरीकों से कभी भी बल्ब ईजाद नहीं किया जा सकता। इसलिए अगर सफलता की चोटी को चुंबन देना है, तो मुकाबला खुद से करना सीखो। जो कल किया है, आज उससे बेहतर करना सीखो। अगर दिल कभी हौसला हारने लगे तो बेसबॉल के उस खिलाड़ी की तरफ एक बार देख लेना, जो दस में से छह गेंदों को केवल टच कर पाता है। एक बार एक लड़का बेसबॉल का अभ्यास कर रहा था, उसने गेंद को अपने हाथों से कई दफा उछाला और खुद के बल्ले से ही टच करने की कोशिश की, वो गेंद को टच करने में विफल रहा। वो हताश होकर बैठा, जब उसने शांत दिमाग से सोचा कि आखिर गेंद किसने उछाली थी? जवाब भीतर से मिला मैंने ही, तो उसके कहा कि अगर अच्छा शॉट नहीं लगा सकता, अच्छी गेंद तो फेंक सकता हूं। ऐसी हजारों उदाहरण हैं, जो हम को बताती हैं कि लकीर का फकीर बनने बेहतर है, अपने सही हुनर को पहचानो। हिन्दी फिल्म जगत के जाने माने फिल्म निर्माता निर्देशक सुभाष घई मुम्बई में हीरो बनने गया था, लेकिन किस्मत ने कहा, तुम हीरो खुद तो नहीं बन सकते, लेकिन हीरो ईजाद कर सकते हो। सुभाष घई ने हिन्दी फिल्म जगत को ऐसे चेहरे दिए, जो कई दशकों तक फिल्म जगत पर राज करते रहे। इसलिए कहता हूँ, दोस्तो सूर्य निकलते हैं, बस सोच घर की खिड़की बंद मत करना।

शहीदे आजम व उसकी छवि

जब दिल्ली में बैठे हुक्मरान कहते हैं कि शहीदे आजम भगत सिंह हिंसक सोच के व्यक्ति थे, तो भगत सिंह को चाहने वाले, उनको आदर्श मानने वाले लोग दिल्ली के शासकों कोसने लगते हैं, लेकिन क्या यह सत्य नहीं कि शहीदेआजम की छवि को उनके चाहने वाले ही बिगाड़ रहे हैं।

अभी कल की ही बात है, एक स्कूटर की स्पिटनी वाली जगह पर लगे एक टूल बॉक्स पर भगत सिंह की तस्वीर देखी, जो भगत सिंह के हिंसक होने का सबूत दे रही थी। यह तस्वीर हिन्दी फिल्म अभिनेता सन्नी दिओल के माफिक हाथ में पिस्टल थामे भगत सिंह को प्रदर्शित कर रही थी। इस तस्वीर में भगत सिंह को निशाना साधते हुए दिखाया गया, जबकि इससे पहले शहर में ऐसी तमाम तस्वीरें आपने देखी होंगी, जिसमें भगत सिंह एक अधखुले दरवाजे में पिस्टल लिए खड़ा है, जो शहीदे आजम की उदारवादी सोच पर सवालिया निशान लगती है। जब महात्मा गांधी जैसी शख्सियत भगत सिंह जैसे देश भगत पर उंगली उठाती है तो कुछ सामाजिक तत्व हिंसक हो उठते हैं, तलवारें खींच लेते हैं, लेकिन उनकी निगाह में यह तस्वीर क्यों नहीं आती, जो भगत सिंह की छवि को उग्र साबित करने के लिए शहर में आम वाहनों पर लगी देखी जा सकती हैं।

यहां तक मुझे याद है, या मेरा अल्प ज्ञान कहता है, शायद भगत सिंह ने अपने साथियों के साथ मिलकर केवल सांडरस को उड़ाया था, वो भी शहीद लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए, इसके अलावा किसी और हत्याकांड में भगत सिंह का नाम नहीं आया। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर फिर भगत सिंह की ऐसी ही छवि क्यों बनाई जा रही है, जो नौजवानों को हिंसक रास्ते की ओर चलने का इशारा कर रही हो। ऐसी तस्वीरें क्यों नहीं बाजार में उतारी जाती, जिसमें भगत सिंह को कोई किताब पढ़ते हुए दिखाया जाए। उसको एक लक्ष्य को हासिल करने वाले उस नौजवान के रूप में पेश किया जाए, जो अपने देश को गोरों से मुक्त करवाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा चुका है। भगत सिंह ने हिंसक एक बार की थी, लेकिन उसका ज्यादातर जीवन किताबें पढ़ने में गुजरा है। भगत सिंह किताबें पढ़ने का इतना बड़ा दीवाना था कि वो किताब यहां देखता वहीं से किताब कुछ समय के लिए पढ़ने हेतु ले जाता था। जब भगत सिंह को फांसी लगने वाली थी, तब भी वो किसी रूसी लेखक की किताब पढ़ने में व्यस्त थे, भगत सिंह की जीवनी लिखने वाले ज्यादातर लेखकों का यही कहना है।

फिर भी न जाने क्यों पंजाब में भगत सिंह की उग्र व हिंसक सोच वाली तस्वीरों को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। पंजाब अपने बहादुर सूरवीरों व मेहमाननिवाजी के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है, लेकिन कुछ कथित उग्र सोच के लोगों के कारण पंजाब की साफ सुथरी छवि को ठेस लगी है, हैरत की बात तो यह कि बाहरी दुश्मनों को छठी का दूध याद करवाने वाला पंजाब अपने ही मुल्क में ब्लैकलिस्टड है, जिसके बारे में यहां के गृहमंत्री को भी पता नहीं।

हमारी राज्य सरकार, पानी की रॉल्यटी को लेकर पड़ोसी राज्यों से तू तू मैं मैं कर रही है, लेकिन वो भी उस पानी के लिए जो कुदरत की देन है, जिसमें पंजाब सरकार का कुछ भी योगदान नहीं, ताकि आने वाले चुनावों में लोगों को एक बार फिर से मूर्ख बनाया जाए कि हमारा पानी के मुद्दे पर संघर्ष जारी है। यह सरकार पंजाब को खुशहाल, बेरोजगारी व भुखमरी मुक्त राज्य क्यों नहीं बनाने की तरफ ध्यान दे रही, कल तक बिहार को सबसे निकम्मा राज्य गिना जाता था, लेकिन वहां हो रहा विकास बिहार की छवि को राष्ट्रीय स्तर पर सुधार रहा है, मगर पंजाब सरकार राज्य पर लगे ब्लैकलिस्टड के धब्बे को हटाने के लिए यत्न नहीं कर रही, यह धब्बा भगत सिंह पर लगे हिंसक सोच के व्यक्तित्व के धब्बे जैसा है, जिसको सुधारना हमारे बस में है। जितना क्रांतिकारी साहित्य भगत सिंह ने पढ़ा था, उतने के बारे में तो उनके प्रशंसकों ने सुना भी नहीं होगा। शर्म से सिर झुक जाता है, जब भगत सिंह की हिंसक तस्वीर देखता हूं, जिसमें उसके हाथ में पिस्टल थमाया होता है। चित्रकारों व अन्य ग्राफिक की दुनिया से जुड़े लोगों से निवेदन है कि भगत सिंह की उस तस्वीर की समीक्षा कर देखे व उस तस्वीर को गौर से देखें, जिसमें वो लाहौर जेल के प्रांगण में एक खटिया पर बैठा है, एक सादे कपड़ों में बैठे हवलदार को कुछ बता रहा है, क्या उसके चेहरे पर कहीं हिंसा का नामोनिशान नजर आता है। अगर भगत सिंह हिंसक सोच का होता तो दिल्ली की असंबली में बम्ब फेंककर वो धुआं नहीं फैलाता, बल्कि लाशों के ढेर लगाता, लेकिन भगत सिंह का एक ही मकसद था, देश की आजादी, सोए हुए लोगों को जगाना, लेकिन मुझे लगता है कि सोए हुए लोगों को जगाना समझ में आता है, लेकिन उन लोगों को जगाना मुश्किल है, जो सोने का बहाना कर रहे हैं, उस कबूतर की तरह जो बिल्ली को देखकर आंखें बंद कर लेते है, और सोचता है कि बिल्ली चली गई।
भगत सिंह जैसे शहीदों ने देश को गोरों से तो आजाद करवा दिया, लेकिन गुलाम होने की फिदरत से आजाद नहीं करवा सके। भगत सिंह जैसे सूरवीरों ने अपनी कुर्बानी राष्ट्र के लिए दी, ना कि किसी क्षेत्र, भाषा व एक विशेष वर्ग के लिए, लेकिन सीमित सोच के लोग, उनको अपना कहकर उनका दायरा सीमित कर देते हैं, जबकि भगत सिंह जैसे लोग यूनीवर्सल होते हैं। भगत सिंह की बिगड़ती छवि को बचाने के लिए वो संस्थाएं आगे आएं, जो भगत सिंह पर होने वाली टिप्पणी को लेकर मारने काटने पर उतारू हो जाती हैं।

बेशकीमती गाड़ियां व प्रेस लेबल

शहर में बहुसंख्या में घूम रही हैं बेशकीमती गाड़ियां, जिन पर लिखा है प्रेस। हैरत की बात तो यह है कि संवाददाता वर्ग खुद भी असमंजस में है कि आखिर इतनी बेशकीमती गाड़ियां आखिर किस मीडिया ग्रुप की हैं। शीशों पर आल इंडिया परमिट की तरह प्रेस का लेबल चस्पाकर घूमने वाली गाड़ियां, मीडिया में काम करने वालों के लिए कई सालों से अनसुलझी पहेली की तरह हैं। जी हां, शहर में घूम रही हैं ऐसी दर्जनों बेशकीमती गाड़ियां, जिन पर लिखा है प्रेस, और कोई नहीं जानता प्रेस का लेबल लगा घूम रही इन बेशकीमती गाड़ियों के काले शीशों के उस पार आखिर है कौन। यह कौन पिछले कई सालों से मीडिया कर्मियों के लिए गणित का सवाल बन चुका है।

सूत्र बताते हैं कि मीडिया जगत तो इस लिए स्तम्ब है, क्योंकि मीडिया कर्मी अच्छी तरह जानते हैं, बठिंडा के इक्का दुक्का मीडियाकर्मियों को छोड़कर बठिंडा के किसी भी मीडिया कर्मी के पास ऐसे वाहन नहीं, जिनकी कीमत सात आठ लाख के आंकड़ों को पार करती हो। इस तरह कुछ अज्ञात लोगों का प्रेस लेवल लगाकर घूमना, शहर वासियों के लिए भी किसी मुसीबत का कारण बन सकता है, क्योंकि ट्रैफिक पुलिस कर्मी गाड़ी पर प्रेस लिखा देकर वाहन को बेलगाम घूमने की आजादी दे देते हैं। डर कहीं यही आजादी, किसी दिन मुसीबत न बन जाए। याद रहे कि काफी महीने पहले दिल्ली के समीप पुलिस ने एक आतंकवादियों को जानकारी मुहैया करवाने वाले व्यक्ति को गिरफ्तार किया था, जो खुद को संवाददाता बताकर शहर में संवेदनशील इलाकों में बड़े आराम से आ जा सकता है।

अगर ऐसा दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में हो सकता है तो बठिंडे जैसे महानगर में क्यों नहीं, क्या हम सांप निकलने के बाद लकीर को पीटने की आदत त्याग के लिए तैयार नहीं। क्या हम उठते हुए धूएं को देखकर कुछ नहीं करना चाहते, जब तक वो भयानक आग में न तब्दील हो जाए। पिछले दिनों स्थानीय एक मल्टीप्लेक्स में पहुंचे फिल्म अभिनेता जिम्मी शेरगिल ने कहा था कि पायरेसी से एकत्र होने वाला पैसा आतंकवाद को जाता है, क्या प्रेस का लेबल रेवड़ियों की तरह बांटना किसी पायरेसी से कम है। क्या पता कोई प्रेस का लेबल लगाकर काले शीशों के पीछे कुछ काले कारनामों की संरचना कर रहा हो। काला धन हमेशा काले कारोबार में इस्तेमाल होता है, और काले धन ही किसी भी देश के विनाश के लिए कारण बनता है।

आज से कुछ साल पहले तत्कालीन डीआईजी ने प्रेस वालों से उनके वाहनों के नम्बर मांगे थे। मीडिया कर्मियों ने बड़े उत्साह के साथ अपने वाहनों के नम्बर उक्त विभाग को लिखकर भेजे थे, शायद तब भी मीडिया कर्मी इस समस्या को लेकर चिंतित थे। लेकिन वो योजना पूरी तरह लागू न हो सकी, कुछ मीडिया कर्मियों की बजाय से। मीडिया कर्मियों की ओर से भेजी गई सूचियों को देखने के बाद यकीनन तत्कालीन शीर्ष पदस्थ पुलिस अधिकारी हैरत में एक बार तो जरूर पड़ा होगा, यह देखकर कि जो सूची आई है, उस में ज्यादातर वाहन दो पहिया है, और उनकी गाड़ी के आगे से गुजरने वाली गाड़ियां तो बेशकीमती होती हैं, जिन पर लिखा होता है प्रेस।

इसमें भी कोई दो राय नहीं, मीडिया में काम करने वाले कुछ लोगों ने अपने रिश्तेदारों को भी प्रेस लिखवाकर घूमने का परमिट दे रखा है। कुछ ऐसे ही मीडिया कर्मी मीडिया के बुद्धजीवियों के लिए समस्या बने हुए हैं। भले ही उनकी मात्रा मीडिया कम है, लेकिन मीडिया का अक्स बिगाड़ने में वो काफी कारगार सिद्ध हो रहे हैं। मैं नितिन सिंगला, साथी कुलवंत हैप्पी के साथ गुडईवनिंग पंजाब का सच बठिंडा।

आज सफल है, मंथली गुरूमंत्र

सुबह सुबह आम आदमी एनपी अपने दूध वाले पर रौब झाड़ते हुए कहता है कि आजकल दूध काफी पतला आ रहा है और कुछ मिले होने का भी शक है। एनपी की बात को ठेंगा दिखाते हुए दूध वाला कहता है, आपको दूध लेना है तो लो, वरना किसी ओर से लगवा लो, दूध तो ऐसा ही मिलेगा। एनपी सिंह कहां कम था उसने दूध वाले के पैर निकाले के लिए कहा, तुमको पता नहीं, मैं सेहत विभाग में हूँ, तेरे दूध का सैंपल भरवा दूंगा। सेर को सवा सेर मिल गया, दूध वाला बोला...तेरे सेहत विभाग को हर महीने पैसे भेजता हूँ, मंथली देते हूँ, किसकी हिम्मत है, जो मेरे दूध का सैंपल भरे। दूध वाले के पैरों तले से तो जमीं नहीं सरकी, लेकिन एनपी के होश छू मंत्र हो गए। आज मंथली का जमाना है, आज के युग में सही काम करने वाले को भी मंथली भेजनी पड़ती है। मंथली लेने में सेहत विभाग ही नहीं, अन्य विभाग भी कम नहीं। जैसे मोबाइल के बिन आज व्यक्ति खुद को अधूरा समझता है, वैसे ही ज्यादातर सरकारी उच्च पदों पर बैठे अधिकारी खुद को मंथली बिना अधूरा सा महूसस करते हैं। बुरा काम करने वाले तो मंथली देते ही हैं, लेकिन यहां तो अच्छा उत्पाद बनाने वालों को भी मंथली देनी पड़ती है। शहर के एक व्यस्त बाजार में बेहद प्रसिद्ध मिठाई की दुकान के मालिक को केवल इस लिए मंथली देनी पड़ती है, क्योंकि वो सरकारी पचड़े में पड़ना नहीं चाहता, जबकि उसके उत्पाद अच्छे है, सर्वोत्तम हैं। मगर वो एक बात अच्छी तरह जानता है कि अगर पैसा घटिया माल को अच्छा साबित कर सकता है तो कोई भी सरकारी अधिकारी अच्छे माल को बुरा साबित कर सकता है। शहर में जाली रजिस्ट्रियों के तमाम मामले आए दिन सुर्खियों में आते हैं, वो भी तो मंथलियों के नतीजे हैं, वरना किसी की रजिस्ट्री किसी ओर के नाम कैसे चढ़ सकती है। गलती एक बार होती है, बार बार नहीं, मगर मंथली एक ऐसा गुरमंत्र है, जो गलत वस्तु को सही सिद्ध कर देगा, जिसकी लाठी उसकी भैंस साबित कर देगा। मंथली की मोह जाल से तो पत्रकारिता जगत के लोग भी अछूते नहीं, सुनने में तो यहां तक आया है कि सेहत विभाग से लेकर तहसील तक से पत्रकारिता की दुनिया के कुछ लोगों को मंथली आती है, शायद बुराई पर पर्दा डाले रखने के लिए। पैसे की दौड़ ने मानव को किसी भट्ठी में झोंक दिया, वो आज खुद भी नहीं समझ पा रहा, आखिर उनकी दौड़ कहां तक है? जबकि वो भली भांति जानता है कि अंतिम समय मिलने वाले कफन के जेब भी नहीं होती। जब एक आम आदमी ने कारोबारी रूप में मोटरसाईकल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने वाले वर्ग के एक व्यक्ति से पूछा कि तुम्हारे वाहनों की हालत इतनी खास्ता होने के बावजूद भी क्या ट्रैफिक पुलिस तुम्हारा चालान नहीं भरती, तो वो बड़े खुशनुमा मिजाज में कहता है, आप से क्या चोरी, एसोसिएशन हर महीने तीस साल रुपए का माथा टेकती है, तब जाकर हरी झंडी मिलती है सड़कों पर। ज्यादातर सरकारी विभागों का आलम तो ऐसा है कि पैसा फेंको...मैं कुछ भी करूंगा। एक किस्सा याद आ रहा है, जो पासपोर्ट विभाग से जुड़ा हुआ है। पासपोर्ट बनाने के लिए कॉमन मैन कतार में खड़ा अपनी बारी का इंतजार कर रहा था, एजेंट आते थे, और काम करवा कर चले जाते थे, लेकिन वो बाहर कतार में खड़ा इंतजार करता रहा। जब उसकी बारी आई तो उसने अपने कागजात मैडम के आगे किए, मैडम ने कागजातों को टोटलने के बाद कहा..बच्चे का पता पहचान पत्र कहां है, कॉमन मैन कहता है, मैं उसका पिता हूँ, मेरा पता ही तो उसका पता है। लेकिन हम कैसे मानें कि यह तुम्हारा सही पता है। तो कॉमन मैन कहता है कि मेरा पता इस विभाग की ओर से पहले चैक किया गया है, और पासपोर्ट भी यहां से ही जारी हुआ है। मगर वो मैडम एक बात पर ही अटकी रही, बच्चे का पता पहचान पत्र लेकर आओ। कॉमन मैन चिंता में डूब वहां से उलटे कदम निकल लिया, यह सोचते हुए आखिर कौन सा पता। सरकारी दफ्तरों में एजेंटों की घुसपैठ भी तो मंथली के गुरुमंत्र की ताजा मिसाल है। मंथली के गुरुमंत्र ने आम आदमी के हितों को पैरों तले कुचलकर रख दिया।

कुलवंत हैप्पी
पंजाब का सच
76967-13601

शायद उलझन में इंद्रदेव

जब वो मल्हार राग में शिव स्तुति गाती है तो इंद्रदेव इतने खुश होते हैं कि पूरे क्षेत्र को जलमग्न कर देते हैं। उसका जन्म गजियाबाद के एक अमीर परिवार में हुआ था और उसका ब्याह भी एक अमीर घर में, लेकिन वो सादगी भरा जीवन जीने में विश्वास करती थी, वो आज जिन्दा है या नहीं पता नहीं, लेकिन जब इंद्रदेव को खुश करना होता तो लोग उसके द्वार जाते थे। कुछ ऐसा ही किस्सा बता रहा था संकट मोचन मंदिर के निकट एक बिजली की दुकान पर एक भद्र पुरुष। आज से पहले तानसेन के बारे में तो सुना था कि वो दीपक राग गाकर दीए जला देते थे, लेकिन उक्त किस्सा पहली दफा सुनने में आया, हो सकता है सच भी हो और काल्पनिक भी। मगर हम इंद्रदेव को मनाने के लिए तरह तरह के ढंग तो अपनाते ही हैं। मुझे याद है जब हम गांव में रहते थे, सावन का महीना बीतते वाला होता, और गांव में एक बूंद पानी तक न टपकता, तब लोग इंद्र देव को खुश करने के लिए डेरा बाबा भगवान दास में पहुंचकर चावलों का यज्ञ करते, और इंद्रदेव खुश हो भी जाता था। इस डेरे का इतिहास भी तो बारिश से जुड़ा हुआ है। एक बार की बात है कि गांव में बारिश नहीं हो रही थी, और लोग इंद्र देव को मनाने के लिए तरह तरह के पैंतरे अजमा रहे थे। इन दिनों गांव के खेतों में एक साधु आया हुआ था, गांवों ने उनसे बिनती बगैरह किया, उन्होंने संतों के कहने अनुसार सब कुछ किया। जब गांव वासी डेरे में पहुंचे तो संत बोले 'तुम लोग छत्रियां क्यों नहीं लेकर आए, लोग चकित रह गए, धूप चढ़ी हुई है, बादलों का नामोनिशान नहीं, संत कहीं पागल तो नहीं हो गया। जैसे यज्ञ खत्म होने के किनारे पहुंचा तो बादल ऐसे बरसे कि गांव वासी संत के चरणों में जा गिरे। यह तो बस एक विश्वास की बात है, अगर विश्वास है तो धन्ने भगत जैसे पत्थरों से भगवान के दीदार कर लेते हैं। पिछले दो दिनों से इंद्रदेव बठिंडा में बरसने के लिए उतावला है, लेकिन न जाने क्या सोच कर खुद को रोके हुए है। हो सकता है कि बठिंडा नगर निगम व नहरी विभाग की खामियों से इंद्रदेव अच्छी तरह अवगत हैं। पिछले हफ्ते इंद्रदेव ने बठिंडा वासियों को खुश करने की छोटी सी कोशिश की थी, लेकिन नतीजा शहर में अधिकतर क्षेत्रों में बारिश का पानी जमा हो गया। लोगों को आने जाने में दिक्कतें पेश आने लगी। इतना ही नहीं, कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में तो बारिश के पानी के कारण रजबाहे टूट गए, किसानों की खड़ी फसलें बर्बाद हो गई। इंद्रदेव तो पिछले दो दिन से निरंतर बरसने के मूड में है, लेकिन नहरी विभाग व नगर निगम की कार्यगुजारी के चलते इंद्रदेव का बरसना भी लोगों पर भारी पड़ सकता है। वैसे इंद्रदेव ने लोगों को थोड़ी सी राहत देने के लिए हवाओं में नमी भर दी है। पंजाब में अब तक इंद्रदेव जहां जहां अभी तक बरसा है, वहां से फसलों के बर्बाद होने की ख़बर आ रही हैं, चाहे वो पटिआला हो या दोआबे का क्षेत्र। सरकारों व निगमों की कार्यगुजारी के बाद इंद्रदेव को एक कुम्हार की कहानी याद आ रही होगी, या तो बर्तन वाली या फिर फसल वाली। एक कुम्हार के दो बेटियां होती हैं, दोनों की शादी एक ही गांव में हुई होती है, एक बार उन से मिलने के लिए कुम्हार उस गांव जाता है। पहली बेटी से मिलता है जो एक कुम्हार के साथ ही ब्याही होती है, वो खुश है कि उसके बर्तन सूखने वाले हैं, और इंद्रदेव नहीं बरसे। वो यहां अपनी दूसरी बेटी के घर जाता जो एक किसान को ब्याही होती है। वो दुखी है, क्योंकि इंद्रदेव अभी तक बरसा नहीं था। वो अपने पिता से कहती है कि दुआ करो रब्ब से बारिश हो जाए। कुम्हार असमंजस में पड़ जाता है कि आखिर किस को बचा लूं और किसको डुबो दूं। कुछ ऐसी ही स्थिति में शायद इंद्रदेव उलझा हुआ है।

हल स्थाई हो, अस्थाई नहीं

कुछ महीने पहले देश की एक अदालत ने केंद्र से राय मांगी थी कि क्या वेश्यावृत्ति को मान्यता दे दी जाए, यानि इसको अपराध के दायरे से बाहर कर दिया जाए, क्योंकि देश में वेश्यावृत्ति बढ़ती जा रही है। इस मुद्दे पर अदालत द्वारा केंद्र से राय मांगने का सीधा अर्थ है, अगर किसी चीज को कानून रोकने में असफल हो रहा है तो उसको मान्य दे दी जाए, ताकि अदालत का भी कीमत समय बच जाए। किसी मुश्किल का कितना साधारण हल है, कि उसको वैध करार दे दिया जाए, जिसको रोकने में कानून असफल है। कोर्ट ने एक बार भी केंद्र से नहीं कहा कि वेश्यावृत्ति की पीछे के कारणों का पता लगाने के लिए एक टीम का गठन किया जाए। कोर्ट ने सवाल नहीं उठाया कि क्यों कभी पुलिस प्रशासन ने कोर्ट में वेश्यावृत्ति में लिप्त महिलाओं के दूसरे पक्ष को उजागर नहीं किया। आखिर वेश्यावृत्ति हो क्यों रही है? आखिर क्यों देश की महिलाएं अपने जिस्म की नुमाईश लगा रही हैं?। अगर कोर्ट इन सवालों में से एक भी सवाल को केंद्र से पूछती तो केंद्र अदालती कटघरे में आ खड़ा नजर आता, क्योंकि वेश्यावृत्ति के बढ़ते रुझान के लिए हमारी सरकारें भी जिम्मेदार हैं, जो निम्न वर्ग को केवल वोटों के लिए इस्तेमाल करती हैं और उनके उत्थान के लिए कोई कार्य नहीं करती। ऐसे में पेट की आग बुझाने के लिए गरीब घरों की महिलाएं लोगों के बिस्तर गर्म करने के लिए निकल पड़ती हैं। अब तो वेश्यावृत्ति में कालेज की लड़कियां भी शुमार हो रही हैं, कारण है कि वो सुविधाओं भरी जिन्दगी जीना चाहती हैं। हम समस्याओं को जड़ से नहीं बल्कि बाहरी स्तर से हल करने के तरीके खोजते हैं। अभी कल की ही बात है, मेरा किसी काम को लेकर धोबियाना रोड़ पर जाना हुआ, श्री गुरूनानक देव स्कूल के पास सड़क पर दोनों तरफ आने जाने के लिए एक आधिकारिक रास्ता है, लेकिन उसको प्रशासन ने बंद कर दिया। बंद करने का कोई भी छोटा मोटा कारण हो सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि किसी नेता के आगमन पर उसको बंद किया हो, और फिर प्रशासन को खुलवाना भूल गया हो। प्रशासन ने वो रास्ता तो बेरियर लगाकर बंद कर दिया, क्योंकि ट्रैफिक पुलिस के पास कर्मचारियों की कमी तो हो सकती है, पर बेरियरों की नहीं। इसका अंदाजा पॉलिथीनों की तरह जगह जगह बिखरे पड़े मुसीबतों को जन्म दे रहे बेरियरों से लगाया जा सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि वो रास्ता हादसों का कारण बन रहा हो इसलिए बंद कर दिया गया, लेकिन क्या ऐसा करना जायज है, अगर जायज है तो बरनाला रोड़ को सबसे पहले बंद कर देना चाहिए, जिसको खूनी रास्ते के नाम से भी पुकारा जाता है। प्रशासन ने उक्त दस बारह फुट के रास्ते को बंद कर दिया, लेकिन लोगों ने एक फूट चौड़ा रास्ता उससे थोड़ा से आगे डिवाईडर तोड़कर बना लिया। शायद प्रशासन भूल गया कि नदी के बहा को कभी दीवारें निकालकर नहीं रोका जा सकता, क्योंकि पानी अपने रास्ते खुद बनाना जानता है। जनता भी पानी के बहा जैसी है। गलियों में बने हम्प भी इसी बात की ताजा उदाहरण हैं। स्थानीय शहरी इलाकों की गलियों में बने हम्प लोगों के वाहनों की स्पीड को तो कम नहीं कर पा रहे, लेकिन लोगों का ध्यान जरूर खींच रहे हैं। जब मनचले वहां आकर जोर से ब्रेक मारते हैं, और ब्रेक लगने के वक्त निकालने वाली वाहन के पुर्जों की आवाज लोगों का ध्यान खींचती है। हम समस्या की जड़ को खत्म करने की बजाय बाहरी स्तर पर काम करते हैं, जिनके नतीजे हमेशा ही शून्य रहते हैं। मानो लो, देश भर के सरकारी स्कूलों की चारदीवारी को आलीशान बना दिया जाए, क्या वो देश की शिक्षा प्रणाली के दुरुस्त होने का प्रमाण होगा, नहीं क्योंकि वो सुधार केवल बाहरी रूप से हुआ है। अगर देश की शिक्षा प्रणाली का सुधार करना है तो उसकी जड़, मतलब टीचर को ऐसे प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए कि वो एक पढ़े लिखे इंसान के साथ एक समझदार व्यक्ति को स्कूल से बाहर रुखस्त करे। वरना देश की अदालत हर बार किसी न किसी अपराध को अपराध मुक्त करने पर सरकार से राय मांगेगी।

रक्षक से भक्षक तक

सर जी, वो कहता है कि उसको एसी चाहिए घर के लिए। वो का मतलब था डॉक्टर, क्योंकि मोबाइल पर किसी से संवाद करने वाला व्यक्ति एक उच्च दवा कंपनी का प्रतिनिधि था, जो शहर में उस कंपनी का कारोबार देखता था। इस बात को आज कई साल हो गए, शायद आज उसके संवाद में एसी की जगह एक नैनो कार आ गई होगी या फिर से भी ज्यादा महंगी कोई वस्तु आ गई होगी, क्योंकि शहर में लगातार खुल रहे अस्पताल बता रहे हैं कि शहर में मरीजों की संख्या बढ़ चुकी है, जिसके चलते दवा कारोबार में इजाफा तो लाजमी हुआ होगा।

आप सोच रहें होंगे कि मैं क्या पहेली बुझा रहा हूँ, लेकिन यह किस्सा आम आदमी की जिन्दगी को बेहद प्रभावित करता है, क्योंकि इस किस्सा में भगवान को खरीदा जा रहा है। चौंकिए मत! आम आदमी की भाषा में डॉक्टर भी तो भगवान का रूप है, और उक्त किस्सा एक डॉक्टर को लालच देकर खरीदने का ही तो है। कितनी हैरानी की बात है कि पैसे मोह से बीमार डॉक्टर शारीरिक तौर पर बीमार व्यक्तियों का इलाज कर रहे हैं।

इस में कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि दवा कंपनियों के पैसे से एशोआराम की जिन्दगी गुजारने वाले ज्यादातर डॉक्टर अपनी पसंदीदा कंपनियों की दवाईयाँ ही लिखकर देते हैं, जिसकी मार पड़ती है आम आदमी पर, क्योंकि दवा कंपनियां डॉक्टर को दी जाने वाली सुविधाओं का खर्च भी तो अपने ही उत्पादों से निकालेंगी।

पैसे के मोह से ग्रस्त डॉक्टरी पेशा भी बुरी तरह बर्बाद हो चुका है, अब इस पेशे में ईमानदार लोग इतने बचें, जितना आटे में नमक या फिर समुद्र किनारे नजर आने वाला आईसबर्ग (हिमखंड), ज्ञात रहे कि आइसबर्ग का 90 फीसदी हिस्सा पानी में होता है, और दस फीसदी पानी के बाहर, जो नजर आता है।

अब ज्यादातर डॉक्टरों का मकसद मरीजों को ठीक करना नहीं, बल्कि रेगुलर ग्राहक बनाना है, ताकि उनकी रोजी रोटी चलती रहे, और वो जिन्दगी को पैसे के पक्ष से सुरक्षित कर लें, पैसे की लत ऐसी लग गई है कि आम लोग सरकारी नौकरियाँ तलाशते हैं, डॉक्टर खुद के अस्पताल खोलने के बारे में सोचते हैं। मुझे याद है, जब मेरी माता श्री बीमार हुई थी, उसका मानसा के एक सरकारी अस्पताल से चल रहा था, वो पहले से चालीस फीस ठीक हो गई थी, अचानक उस युवा डॉक्टर ने सरकारी नौकरी छोड़कर खुद को अस्पताल खोल लिया, और मेरी माता की दवाई अब उसके अस्पताल से आनी शुरू हो गई, वो पहले महीने भर में बुलाता था, अब हफ्ते भर में। और मोटी फीस लेने लगा था, लेकिन कुछ हफ्तों बाद उसकी तबीयत फिर से पहले जैसी हो गई, क्योंकि अब उस डॉक्टर का मकसद खुद की आमदन बढ़ाना था, ना कि मरीज को तंदरुस्त कर घर भेजना।

लोगों ने डॉक्टर को भगवान की उपमा दी है, लेकिन अब उस भगवान के मन में इतना खोट आ गया है कि अब वो भगवान अपने दर पर आने वाले मानवों के अंगों की तस्करी करने से भी पीछे नहीं हट रहा। इतना ही नहीं, कभी कभी तो भगवान इतना क्रूर हो जाता है कि शव को भी बिन पैसे परिजनों के हवाले नहीं करता। और तो और रक्त के लिए भी अब वो निजी ब्लड बैंकों की पर्चियां काटने लगा है, आम आदमी का शोषण अब उसकी आदत में शुमार हो गया है। अपनी रक्षक की छवि को उसने भक्षक की छवि में बदल दिया।

पंजाबी भाषा और कुछ बातें

अपने ही राज्य में बेगानी सी होती जा रही है पंजाबी भाषा, केवल बोलचाल की भाषा बनकर रह गई पंजाबी, कुछ ऐसा ही महसूस होता है, जब सरकारी स्कूलों के बाहर लिखे 'पंजाबी पढ़ो, पंजाबी लिखो, पंजाबी बोलो' संदेश को देखता हूँ। आजकल पंजाब के ज्यादातर सरकारी स्कूलों के बाहर दीवार पर उक्त संदेश लिखा आम मिल जाएगा, जो अपने ही राज्य में कम होती पंजाबी की लोकप्रियता को उजागर कर रहा है, वरना किसी को प्रेरित करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।

पंजाबी भाषा केवल बोलचाल की भाषा बनती जा रही है, हो सकता है कि कुछ लोगों को मेरे तर्क पर विश्वास न हो, लेकिन सत्य तो आखिर सत्य है, जिस से मुँह फेर कर खड़े हो जाना मूर्खता होगी, या फिर निरी मूढ़ता होगी। पिछले दिनों पटिआला के बस स्टॉप पर बस का इंतजार करते हुए मेरी निगाह वहाँ लगे कुछ बोर्डों पर पड़ी, जो पंजाबी भाषा की धज्जियाँ उड़ा रहे थे, उनको पढ़ने के बाद लग रहा था कि पंजाबी को धक्के से लागू करने से बेहतर है कि न किया जाए, जो चल रहा है उसको चलने दिया जाए।

अभी पिछले दिनों की ही तो बात है, जब एक समारोह में संबोधित कर रहे राज्य के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को अचानक अहसास हुआ कि पाकिस्तान व हिन्दुस्तान में संपर्क भाषा पंजाबी भी है, जिसके बाद उन्होंने अपना भाषण पंजाबी में दिया, चलो एक अच्छी बात है। लेकिन ऐसा भी तो हो सकता है कि किसी ने पीछे से कह दिया हो, साहेब! आप तीसरे देश की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। दोष बादल साहेब का नहीं, दोष तो हमारा है, जो खुद की भाषा में बात करने को अपनी बे-इज्जती समझते हैं। हमारे राज्य की तो छोड़ो देश के नेता भी हिन्दी में शपथ लेने से कतराते हैं, और कहते हैं कि हिन्दुस्तान की संपर्क भाषा हिन्दी बने। इससे कुछ दिन पहले ही, राज्य के एक पंजाबी समाचार पत्र में लेखिका डा.हरशिंदर कौर का लेख प्रकाशित हुआ था, जिसमें लेखिका ने अपने साथ हुई घटना का उल्लेख करते हुए पंजाबी सेवक का पट्टा पहनकर घूमने वालों पर जोरदार कटाक्ष किया था।

पंजाबी भाषा को अगर कायम रखना है, तो सरकार को कानून बनाने की नहीं बल्कि भाषा को लोकप्रिया बनाने की जरूरत है। पंजाबी गीत संगीत ने पंजाबी को विश्वव्यापी तो बना दिया, लेकिन केवल बोलचाल में, लेखन में नहीं। अगर लेखन में भी इसको लोकप्रियता दिलानी है तो सरकार को साहित्यकारों की तरफ ध्यान देना होगा। पंजाबी फिल्मों के साथ साथ फिर से पंजाबी रंगमंच को जिन्दा करना होगा, ताकि लोगों को एक बार फिर से पंजाबी लेखन की तरफ खिंचा जा सके।

पंजाबी फिल्म एकम में जब नायिका नायक को अपने शौक के बारे में बताते हुए कुछ विदेशी लेखकों का नाम लेती है, जिन्हें वे रूटीन में पढ़ती है, तो नायक उसकी इस बात पर कटाक्ष करते हुए कहता है कि कभी पंजाबी लेखकों को भी पढ़ लिया करो। स्टेट्स सिम्बल के चक्कर में पंजाबी अपने ही राज्य में हाशिए पर खड़ी नजर आ रही है। कॉलेजों से निकलते ही विद्यार्थी भूल जाते हैं कि उन्होंने कॉलेज में किन किन पंजाबी लेखकों को पढ़ा, और आगे किन किन को पढ़ना है, क्योंकि उनके लिए पढ़ाई का मतलब डिग्री हासिल करना, और उस डिग्री के बलबूते पर नौकरी हासिल करना। ऐसे में भाषा व संस्कृति को बचा पाना बेहद मुश्किल ही नहीं, असंभव भी है।

कुलवंत हैप्पी
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विशाल रक्तदान शिविर...आंकड़ों की दौड़

"आप रक्तदान न करें, तो बेहतर होगा" एक चौबी पच्चीस साल का युवक एक दम्पति को निवेदन कर रहा था, जिसके चेहरे पर चिंता स्पष्ट नजर आ रही थी, क्योंकि वो जिस रक्तदाता के साथ आया था, वो एक कुर्सी पर बैठा निरंतर उल्टियाँ कर रहा था, जिसको बार बार एक व्यक्ति जमीन पर लेट के लिए निवेदन कर रहा था। युवक की बात सुनते ही महिला के साथ आया उसका पति छपाक से बोला, यह तो बड़े उत्साह के साथ खून दान करने के लिए आई है। महिला के चेहरे पर उत्साह देखने लायक था, उस उत्साह को बरकरार रखने के लिए मैंने तुरंत कहा, अगर आप निश्चय कर घर से निकले हो तो रक्तदान जरूर करो, लेकिन यहाँ का कु-प्रबंधन देखने के बाद मैं आप से एक बात कहना चाहता हूँ, अगर पहली बार रक्तदान करने पहुंचे हैं तो कृप्या रक्तदान की पूरी प्रक्रिया समझकर ही खूनदान के लिए बाजू आगे बढ़ाना, वरना किसी छोटे कैंप से शुरूआत करें। वो रजिस्ट्रेशन फॉर्म के बारे में पूछते हुए आगे निकल गए, लेकिन मेरे कानों में अभी भी एक आवाज निरंतर घुस रही थी, वो आवाज थी एक सरदार जी की, जो निरंतर उल्टी कर रहे व्यक्ति को लेट के लिए निवेदन किए जा रहा था, लेकिन कुर्सी पर बैठा आदमी आर्मी पर्सन था, वो अपनी जिद्द से पिछे हटने को तैयार नहीं था। यह दृश्य पटियाला के माल रोड स्थित सेंट्रल लाइब्रेरी के भीतर आयोजित पंजाब युवक चेतना मंच के विशाल रक्तदान शिविर का था। इस विशाल रक्तदान शिविर में जाने का मौका बठिंडा की एक प्रसिद्ध रक्तदानी संस्था के कारण नसीब हुआ, लेकिन विशाल रक्तदान शिविर के कु-प्रबंधन को देखने के बाद, मेरी आँखों के सामने उन अभिभावकों की छवि उभरकर आ गई, जो अंकों की दौड़ में बच्चों को लगाकर उनको मानसिक तौर से बीमार कर देते हैं, और उनको पढ़ाई बोझ सी लगने लगती है। इस शिविर में अंकों की नहीं, शायद आंकड़ों की दौड़ थी, दौड़ कोई भी हो, दौड़ तो आखिर दौड़ है। दौड़ में आँख लक्ष्य पर होती है, शरीर के कष्ट को रौंद दिया जाता है जीत के जश्न तले। इस शिविर में रक्तदाताओं के लिए उचित प्रबंध नहीं था, शिविर को जल्द खत्म करने के चक्कर में रक्तदातों को पूरी प्रक्रिया से वंचित रखा जा रहा था, जिसका नतीजा वहाँ उल्टियाँ कर रहे रक्तदाताओं की स्थिति देखकर लगाया जा सकता था। बाहरी गर्मी को देखते हुए भले ही रक्तदान शिविर का आयोजन एसी हाल में किया गया था, जो देखने में किसी सिनेमा हाल जैसा ही था, पुराने समय में जो स्थिति टिकट खुलते वक्त बाहर देखने को नसीब होती थी, कल वो मुझे इस एसी हाल के भीतर रिफ्रेशमेंट वितरण के मौके देखने को मिली, रक्तदाता रिफ्रेशमेंट के लिए एक दूसरे को धक्के मार रहे थे, यह विशाल शिविर के कु-प्रबंधन का एक हिस्सा था। विशाल शिविरों का आयोजन रक्तदान लहर को आगे बढ़ाने के मकसद से किया जाता है, लेकिन कल वाला रक्तदान शिविर तो रक्तदान की लहर को झट्का देने वाला ज्यादा लग रहा था, एक सौ फीसदी विकलांग रक्तदाता वहाँ की स्थिति देखकर रजिस्ट्रेशन फॉर्म भरने के बाद जमा करवाने का हौसला नहीं कर सका, जो इससे पहले दर्जनों बार खूनदान कर चुका है। ऐसे विशाल शिविर रक्तदान की लहर को प्रोत्साहन देने की बजाय ठेस पहुंचाते हैं। छोटा परिवार सुखी परिवार की तर्ज पर चलते हुए ऐसे विशाल शिविरों से तो बेहतर है कि छोटे शिविर लगाओ, ताकि रक्तदान की लहर को कभी वैसाखियों के सहारे न चलना पड़े, जो आज अपने कदमों पर निरंतर दौड़ लगा रही है। चलते चलते एक और बात जो रक्तदाताओं के लिए अहम है, "रक्तदान शिविरों में रक्तदान करने वाले व्यक्तियों को रक्तदान करने की पूरी प्रक्रिया से अवगत होना चाहिए, ताकि उक्त विशाल शिविर में हुई अस्त व्यस्तता से बचा जा सके।"