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Black Money - काला धन, मोदी सरकार और इंद्र की अप्सराएं

Publish In Swarn AaBha
भारत की जनता को लुभावना किसी बच्चे से अधिक मुश्किल नहीं और यह बात भारतीय नेताओं एवं विज्ञापन कंपनियों से बेहतर कौन जान सकता है। इस बात में संदेह नहीं होना चाहिए कि वर्ष २०१४ में हुए देश के सबसे चर्चित लोक सभा चुनाव लुभावने वायदों एवं मैगा बजट प्रचार के बल पर लड़े गए। इस प्रचार के दौरान खूबसूरत प्रलोभनों का जाल बुना गया, जो समय के साथ साथ खुलता नजर आ रहा है।

देश में सत्ता विरोधी माहौल था। प्रचार के दम पर देश में सरकार विरोधी लहर को बल दिया गया। प्रचार का शोरगुल इतना ऊंचा था कि धीमे आवाज में बोला जाने वाला सत्य केवल खुसर फुसर बनकर रहने लगा। जनता मुंगेरी लाल की तरह सपने देखने लगी एवं विश्वास की नींद गहरी होती चली गई कि अब तर्क की कोई जगह न बची। जो ऊंचे स्वर बार बार दोहराया गया, वो ही सत्य मालूम आने लगा। इस देश की जनता को पैसे की भाषा समझ आती है और विपक्षी पार्टी ने इसी बात को बड़े ऊंचे सुर में दोहराया, जो जनता को पसंद भी आ गया।

नौ जनवरी को यूट्यूब पर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक भाषण को अपलोड किया गया था, जिसमें उन्होंने तत्कालीन सरकार पर धावा बोलते हुए कुछ यूं कहा था, ‘‘ये जो चोर-लुटेरों के पैसे विदेशी बैंकों में जमा हैं न, उतने भी हम एक बार ले आये न, तो हिंदुस्तान के एक-एक गरीब आदमी को मुफ्त में 15-20 लाख रुपये यूं ही मिल जायेंगे। ये इतने रुपये हैं..। सरकार आप चलाते हो और पूछते मोदी को हो कि काला धन कैसे वापस लायें? जिस दिन भाजपा को मौका मिलेगा, एक-एक पाई हिंदुस्तान में वापस आयेगी और इस धन को हिंदुस्तान के गरीबों के काम में लगाया जायेगा।’’

मगर हैरानी उस दिन हुई जब २ नवंबर २०१४ रविवार को माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आकाशवाणी प्रसारण पर जनता से दूसरी बार रूबरू होते हुए 'मन की बात' प्रोग्राम में कहा, ''कालाधन कितना है, इसके बारे में न मुझे मालूम है, न सरकार को मालूम है, किसी को पता नहीं है। पिछली सरकार को भी इसकी जानकारी नहीं थी। मैं आंकड़ों में नहीं उलझना चाहता कि यह एक रूपया है, लाख है, करोड़ है या अरब रुपए है। बस कालाधन वापस आना चाहिए।''

उम्मीद तो यह थी कि सत्ता पाने के बाद चुनावी सभा में सुनने वाला स्वर पहले से अधिक प्रगाढ़ होगा, लेकिन मिला उम्मीद के विपरीत। सरकार में आते ही नरेंद्र मोदी के तेवरों में नरमी नजर आने लगी। समय बीतने लगा, जनता का ध्यान दूसरे मामलों की तरफ खींचने की कोशिश की जाने लगी। 'स्वच्छ भारत अभियान' उसकी कड़ी का एक हिस्सा है। मगर सरकार को समझना होगा कि काला धन, महंगाई एवं बाहरी सुरक्षा जैसे मुद्दों पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। काले धन पर तो बिल्कुल नहीं, क्योंकि सत्ता तक पहुंचाने में इस मुद्दे का बहुत बड़ा योगदान है।

राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ मीडिया कर्मी पुण्य प्रसून वाजपेयी के अनुसार आज से 25 बरस पहले पहली बार वीपी सिंह ने बोफोर्स घोटाले के कमीशन का पैसा स्वीस बैंक में जमा होने का जिक्र अपनी हर चुनावी रैली में किया था। इस काले धन के अश्वमेघ पर सवार होकर वीपी पीएम बन गए, मगर बोफोर्स घोटाले का एक भी पैसा स्वीस बैंक से भारत नहीं आया। सबसे हैरानीजनक बात तो यह है कि इस अश्वमेघ घोड़े पर सवार होकर गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश की सत्ता तक पहुंच गए। मगर अब उनकी सरकार का रवैया भी पुरानी संप्रग सरकार से अधिक अच्छा नहीं है। देश से काला धन बाहर भेजने वालों की सूची को सार्वजनिक न करने के लिए विदेशों के साथ संधि का हवाला दिया जाता है, जो केवल एक बहाना है। देश हित की बात करने वाली सरकार देश विरोधी तत्वों का नाम उजागर करने से पैर पीछे क्यों खींचती है ? इस मामले में यूटर्न क्यूं लेती है ?

जनता को काले धन का अर्थ केवल इतना समझ आता है कि घोटालों से की कमाई को विदेशों में छुपाना होता है। मगर काला धन केवल विदेशों में हो यह कहना भी उचित नहीं, देश के अंदर भी काला धन बहुत है। काला धन वो पैसा है, जो आप ने अज्ञात स्रोत से प्राप्त किया है एवं उसके सामने आप ने सरकार को कर प्रदान नहीं किया। देश के बड़े बड़े घराने अरबों का कर चोरी करते हैं, जिसको अन्य स्रोतों के जरिए पुनः अपने कारोबार विस्तार में लगाते हैं, ताकि उनका कारोबार निरंतर प्रफुल्लित हो।

एक नौकरीपेशा व्यक्ति लगभग अपने सभी कर अदा करता है, क्योंकि उसके पास कानूनविद नहीं हैं, और उसके पास इतना धन भी नहीं होता, जिसको बचाने के लिए वो किसी कानूनविद को तैनात करे। पिछले दिनों एक वकील से मुलाकात हुई, वकील के अनुसार एक बिजनसमैन अपने ग्रुप के अंतर्गत बहुत सारी कंपनियां बनाता है एवं उनमें कर्मचारियों की संख्या उन नियमों को ध्यान में रखकर करता है, जो उसको सरकारी कर अदा करने से बचाते हैं। इस तरह उसकी आमदनी में इजाफा होता है, मगर यह एक तरह से कर चोरी करने का तरीका है एवं चोरी करने वाला एक तरीके से काला धन एकत्र करता है, जिसको वो किसी बैंक में जमा नहीं करता, बल्कि किसी अन्य स्रोत के जरिये पुनः अपने कारोबार में निवेश करवाता है।

यदि देश की सरकार काले धन के खिलाफ असल रूप में काम करना चाहती है तो उसको देश के कारोबारियों के खिलाफ लोहा लेना होगा, जो कोई भी राजनीतिक पार्टी लेने से डरेगी। वर्ष २०१४ के लोक सभा चुनावों का शोर विदेशों तक में सुनाई दिया। प्रचार प्रसार पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए गए। सवाल उठता है कि आखिर प्रचार प्रसार के लिए इतना पैसा आया कहां से ? राजनीतिक पार्टियों को चंदा कहां से आता है ? इसके पीछे कौन सी लॉबी काम करती है ? अभी चुनाव कमिशन ने राजनीतिक पार्टियों को अपना चंदा सार्वजनिक करने को कहा था तो सभी विरोधी पार्टियां एक सुर में हो गई एवं चुनाव आयोग को अपना आदेश वापिस लेने के लिए कहने लगी। आखिर डर किसी बात से लगता है ? कहीं चुनाव प्रचार में लगने वाला धन काला तो नहीं ? क्योंकि ईमानदारों के पास तो जरूरतें पूरी करने के लिए पैसा नहीं, राजनीतिक पार्टियों का पेट भरने के लिए कहां से होगा ? राजनेता एक तरह से बेरोजगार एवं वालंटियर होते हैं, मगर जैसे ही नेताओं को सत्ता मिलती है तो उनके कच्चे मकान आलीशान महलों में तबदील हो जाते हैं ? यदि इस पैसे का हिसाब मांगा जाए तो शायद देश को उसका काला धन मिल सकता है ? एवं स्विस की बैंक में पड़ा काला धन, वैसा ही है,  जैसी इंद्र की अप्सराएं, जो किसी ने देखी नहीं, लेकिन उन अप्सराओं के साथ गृहस्थ जीवन भोगने के लिए लोग अपना वास्तविक गृहस्थ तक त्याग देते हैं। भारतीय जनता को उस बच्चे की भांति नहीं होना चाहिए, तो चांद को पाने की कामना करता है, उसको वास्तविकता को समझना चाहिए। काला धन देश के भीतर ही इतना घूम रहा है, यदि उसको सही व्यवस्था बनाकर रोक दिया जाए तो देश का भला हो सकता है। देश की सरकारों ने कर लगाए, लेकिन उससे बचने के लिए कुछ कानूनविद पैदा कर दिए। देश के सरकारी ही नहीं बल्कि प्राइवेट संस्थानों में निष्पक्षता के साथ सोशिल ओडिट होनी चाहिए। हिसाब किताब में पारदार्शिता होनी चाहिए। यदि ऐसा हो जाए तो शायद काला धन ढ़ूंढ़ने के लिए देश की जनता को स्विस बैंक की तरफ देखने की जरूरत न पड़े। मगर इस तरह का संभव होना मुश्किल है, क्योंकि कारोबारी परिवारों ने राजनीतिक पार्टियों को बड़े स्तर पर हाइजैक कर लिया है। यह कारण है कि चुनावी रैलियों में हुंकार भरने वाले नेता भी सत्ता में आने के बाद नरम होने लग जाते हैं।

मुझे लगता है कि काला धन किसी बैंक में नहीं मिलेगा, चाहे वो भारतीय बैंक हो या स्विस बैंक क्योंकि जिसको पैसे से पैसा बनाने की लत लग जाए, वो बैंक के मामूली ब्याज से पैसे को नहीं बढ़ाएगा, बल्कि वो अपने कारोबार में उसको निवेश कर कर दुगुना करता रहेगा। देश में बाहर से निवेश होने वाले पैसे पर भी सरकार को पैनी निगाह रखनी होगी, कहीं यह भारत में हुए घोटालों का पैसा ही तो भारत में किसी अन्य व्यक्ति द्वारा तो निवेश नहीं किया जा रहा है। भारत में यदि विदेशी कंपनी भी निवेश करती है तो उसके पैसे के स्रोत की पूरी जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए।

ध्यान रहे कि बैंकों का लेन देन तो आज नहीं तो कल ट्रेस हो सकता है, मगर दो नंबर का पैसा हमेशा बिना हिसाब किताब के गुप्त रास्तों से सीमाएं पार करता है।

मीडिया कवरेज़ पर उठ रहे सवाल

हमारे प्रधानमन्त्री जी अमेरिका दौरे पर है। आइये कुछ
सच्चाइयों से अवगत कराये।

भारतीय मीडिया

1. नरेंद्र मोदी जी का भव्य स्वागत किया गया।
* जब कि स्वागत के समय मात्र भारतीय मूल के पांच अफसर
और एक अमेरिकन प्रोटोकॉल उपस्थित थे।

2. नरेंद्र मोदी जी के लिए कढ़ी सुरक्षा व्यवस्था।
* जब कि एयरपोर्ट से होटल तक मोदी जी अपनी गाडी से
अमेरिकन सुरक्षा व्यवस्था के बिना ही गए। कोई भी अमेरिकन
पुलिस की मोटर साइकिल नहीं थी।

3. मोदी जी का अमेरिकन वासियो ने आथित्य स्वागत किया।
* जब की अमेरिका दौरे का पूरा खर्च भारत ने किया। उनके ठहरने
तक का खर्चा भारतीय दूतावास ने उठाया।

4. आइये देखे वहाँ के लोग और वहाँ के अखबार क्या कहते है।
* न्यू यॉर्क टाइम्स में उनके आने का उल्लेख तक नहीं है। 2002
के दंगो के कारण वहा की कोर्ट द्वारा सम्मन दिए जाने का विवरण
है।
* वाशिंगटन पोस्ट ने उनका मज़ाक उड़ाते हुए लिखा है -
"India’s Modi begins rock star-like U.S. tour" ,
यानि हमारे प्रधानमंत्री की तुलना वहाँ के नाचने - गाने वालों से
की है।

* वाशिंगटन पोस्ट ने यह भी लिखा है की भारत के प्रधानमंत्री के
अमेरिका दौरे से कोई भी महत्तवपूर्ण समझौता (अनुबंध) होने
की संभावना नहीं है।

5. "मैडिसन स्क्वायर गार्डन" जहाँ मोदी जी ने रिवॉल्विंग स्टेज
पर एक रॉक स्टार की तरह भाषण दिया वह भारतीय मूल के
व्यक्तियों (भाजपाई) द्वारा भुकतान करके किराये पर
लिया गया है । वहाँ की सरकार का कोई योगदान नहीं है ।

6. हमारे प्रधानमन्त्री के जापान दौरे के दौरान वहाँ इसी तरह
का माहोल था। जापान के सबसे ज्यादा लोकप्रिय न्यूज़ पेपर -
टोक्यो न्यूज़ पेपर ने उनके जापान आने की खबर मात्र 80sq
cm में पूरी कर दी। हमारे मीडिया ने ऐसा दिखाया जैसे की हमारे
प्रधानमंत्री जी ने पूरा जापान फ़तेह किया है ।

*चीन के प्रधानमंत्री के भारत आने पर हमारी मीडिया ने
ऐसा दिखाया कि जैसे भगवान धरती पर आ गए है और
वो भी अंगूठा दिखा कर चले गए।
.
.
भारत का मीडिया 150 अरब लोगो को उल्लू बना रहा है किसके
इशारे पर ?

प्रियंका की चुप्‍पी पर अटका कांग्रेस का अधिग्रहण

16वीं लोक सभा के चुनावों में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी को मिले जोरदार जनादेश के बाद राजनीति पार्टियों में उठ पटक का दौर जारी है। इस बार के चुनावों ने राजनीतिक परिदृश्‍य को बदलकर रख दिया, लेकिन ताजुब की बात है कि आज भी राजनीतिक पार्टियां उस जद हैं, जिसके कारण हारी थी। इस जनादेश में अगर सबसे बड़ा झटका किसी पार्टी को लगा है, वो है कांग्रेस। देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को विपक्ष में बैठने के लिए भी गठनबंधन की जरूरत होगी।

जब देश की सबसे बड़ी एवं लम्‍बे समय तक शासन करने वाली पार्टी की यह दुर्दशा हो जाए तो पार्टी के भीतर से विरोधी सुर उठने तो लाजमी हैं। जो नेता चुनावों से पहले दबी जुबान में बोलते थे, आज वो सार्वजनिक रूप से अपना दर्द प्रकट कर रहे हैं। और दिलचस्‍प बात तो यह है कि विरोधी सुर उनके खिलाफ हैं, जिनके इस्‍तीफे को पार्टी हाईकमान ने स्‍वीकार करने मना कर दिया।

कल जिसके नेतृत्‍व में चुनाव लड़ा जा रहा था, आज उसके खिलाफ आवाजें उठ रही हैं। बड़ी की शर्मनाक हार के बाद ऐसा होना था। लेकिन इन्‍हीं आवाजों में एक आवाज परिवार सदस्‍य प्रियंका गांधी के पक्ष में उठ रही है। यह आवाज कह रही है कि प्रियंका गांधी में संभावनाएं हैं। वो पार्टी में जान फूंक सकती हैं। हालांकि, पार्टी नेता अच्‍छी तरह जानते हैं कि इन चुनावों को नरेंद्र मोदी ने दो चीजों के आधार पर लड़ा।

एक पाकिस्‍तान और दूसरा जी। जी से मतलब है कि जीजाजी। राहुल गांधी के जीजाजी, प्रियंका के पति देव। नरेंद्र मोदी की पूरी मुहिम जीजा जी के आस पास थी। जीजा जी काफी चर्चा में रहे, हालांकि जीजा जी को कोई सरकारी जमीन अलाट नहीं की गई। जीजा जी के खिलाफ अभी जांच शुरू हुई है। ऐसे में कांग्रेस में प्रियंका वाड्रा को लेकर आना, आखिर कांग्रेस के लिए कहां तक ठीक होगा।

क्‍या इतनी बड़ी हार के बाद भी कांग्रेस वंशवाद से बाहर निकलने को तैयार नहीं ? क्‍या आज भी कांग्रेस के पास कोई ऐसा नेता नहीं, जो नरेंद्र मोदी की तरह खात्‍मे की कगार पर खड़ी कांग्रेस को जीवन दान दे सके ? इसमें कोई दो राय नहीं कि राहुल गांधी राजनीति में रस नहीं लेते। इस बात को बड़े बड़े कांग्रेसी नेता मानते हैं।

अगर राहुल गांधी को राजनीति में रस नहीं, अगर उनके भीतर क्षमता नहीं नेतृत्‍व की, तो क्‍यूं कांग्रेस गांधी परिवार से अलग नहीं होना चाहिए ? जिस तरह अब राहुल गांधी से निराश हुए कांग्रेसी नेता प्रियंका गांधी से अपनी उम्‍मीद बांध रहे हैं, उसको देखकर लगता है कि बहुत जल्‍द वाड्रा परिवार कांग्रेस का अधिग्रहण कर लेगा।

अधिग्रहण शब्‍द का इस्‍तेमाल इसलिए, क्‍यूंकि प्रियंका गांधी व रॉबर्ट वाड्रा राजनीतिज्ञ नहीं हैं, उन्‍होंने कांग्रेस में जमीन स्‍तर से काम शुरू नहीं किया। उन्‍होंने कारोबार किया। पैसे कमाए। कई निदेशक पहचान नंबरों के लिए निवेदन किया। कारोबार में किसी चीज को अपने कब्‍जे में लेना अधिग्रहण कहलाता है।

अब देखना है कि वाड्रा परिवार इस अधिग्रहण के लिए तैयार होगा कि नहीं, कांग्रेसी नेता तो अपनी तरफ से हाथ बढ़ा चुके हैं। बस डील डन होने में प्रियंका की हां बाकी है। यह सौदा भी लाभ से जुड़ा है। अगर प्रियंका अधिग्रहण करती हैं तो कांग्रेस को मुनाफा होने की संभावना है और लोक सभा चुनावों में हुए नुकसान की भरपाई हो सकती है।

Publicly Letter : गृहमंत्री ​सुशील कुमार शिंदे के नाम

नमस्कार, सुशील कुमार शिंदे। खुश होने की जरूरत नहीं। इसमें कोई भावना नहीं है, यह तो खाली संवाद शुरू करने का तरीका है, खासकर आप जैसे अनेतायों के लिए। नेता की परिभाषा भी आपको बतानी पड़ेगी, क्यूंकि जिसको सोशल एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया के शब्दिक ​अ​र्थ न पता हों, उसको अनेता शब्द भी समझ में आना थोड़ा सा क​ठिन लगता है। नेता का इंग्लिश अर्थ लीडर होता है, जो लीड करता है। हम उसको अगुआ भी कहते हैं, मतलब जो सबसे आगे हो, उसके पीछे पूरी भीड़ चलती है।
 
अब आप के बयान पर आते हैं, जिसमें आप ने कहा कुचल देंगे। इसके आगे सोशल मीडिया आए या इलेक्ट्रोनिक मीडिया। कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, क्यूंकि कुचल देंगे तानाशाही का प्रतीक है या किसी को डराने का। आपके समकालीन अनेता सलमान खुर्शीद ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को नंपुसक कहा, क्यूंकि वो दंगों के दौरान शायद कथित तौर पर अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पाए, लेकिन जब मुम्बई पर हमला हुआ था, तब आपके कुचल देंगे वाले शब्द किस शब्दकोश में पड़े धूल चाट रहे थे, तब कहां थे सलमान खुर्शीद जो आज नरेंद्र मोदी को नपुंसक कह रहे हैं।

इलेक्ट्रोनिक मीडिया को तो शायद आप पैसे खरीद लें, क्यूंकि उसको पूंजीपति चलाते हैं, जो विज्ञापन के लिए काम कर सकते हैं, लेकिन सोशल मीडिया को कुचलना आपके हाथ में नहीं, क्यूंकि इसको खरीदना आपके बस की बात नहीं। सोशल मीडिया का शब्दिक अर्थ भी समझा देता हूं, लोगों का मंच। जो लोग सरकार बनाने की हिम्मत रखते हैं, उनको कुचलना आपके लिए उतना ही मुश्किल है, जितना घोड़े का घास के साथ दोस्ताना बनाए रखना।

आपके बयान बदलने से एक बात तो पता चलती है कि आप थोथी धमकियां देते हैं। वरना, अपने बयान पर अटल रहते, और मीडिया को कुचल देते, आज तक आप गूगल व फेसबुक से जानकारियां हासिल नहीं कर पाए, कुचलने की बात करते हैं। क्या किसी की अ​भिव्यक्ति को दबाना असैवंधानिक नहीं ? आपको इलेक्ट्रोनिक मीडिया व सोशल मीडिया का अंतर पता नहीं, तो संवैधानिक व गैर संवैधानिक का अंत क्या खाक पता चलेगा।

आजकल मोदी जी ने खूब अपना पुराना धंधा पकड़ा हुआ है। अपने पुराने दिनों को याद कर रहे हैं, इससे शायद उनको चुनावी फायदा मिल जाए, लेकिन अगर आप ने गृहमंत्री होकर कांस्टेबल वाली हरकतें न छोड़ी तो कांग्रेस को भाजपा वाले कुचल देंगे। और सलमान खुर्शीद को अच्छे से उनके बयान का अर्थ भी समझा देंगे।

जय रामजी की। इसका अर्थ बात शुरू करना भी होता है और संवाद बंद करना भी। जहां लिखा है, वहां इसका अर्थ संवाद बंद करना है। फिर से जय रामजी की। 

एक ख़त आम आदमी पार्टी के नाम

नमस्कार। सबसे पहले आप को बधाई शानदार शुरूआत के लिए। कल जब रविवार को न्यूज चैनलों की स्क्रीनें, क्रिकेट मैच के लाइव स्कोर बोर्ड जैसी थी, तो मजा आ रहा था, खासकर दिल्ली को लेकर, दिल्ली में कांग्रेस का पत्ता साफ हो रहा था, तो भाजपा के साथ आप आगे बढ़ रहे थे, लेकिन दिलचस्प बात तो यह थी कि चुनावों से कुछ दिन पहले राजनीति में सक्रिय हुई पार्टी बाजी मारने में सफल रही,हालांकि आंकड़ों की बात करें तो भाजपा शीर्ष है, मगर बात आप के बिना बनने वाली नहीं है। यह बात तो आपको भी पता थी कि कुछ समीकरण तो बिगड़ने वाला है, मगर आप ने इतने बड़े फेरबदल की उम्मीद नहीं की थी। अगर आपको थोड़ी सी भी भनक होती तो यकीनन सूरत ए हाल कुछ और होता। आप प्रेस के सामने आए, बहुत भावुक थे, होना भी चाहिए, ऐसा क्षण तो बहुत कम बार नसीब होता है। अब आप को अपने कार्यालय के बाहर एक शेयर लिखकर रखना चाहिए,

मशहूर हो गया हूं तो जाहिर है दोस्तो, अब कुछ इलजाम मेरे स​र भी आएंगे
जो गुरबत में अक्सर नजर चुराते थे, अब देने बधाई मेरे घर भी आएंगे

मगर अब आप विपक्ष में बैठने की बात कर रही है, जो सही नहीं। नतीजे आप ने बदले हैं, मुख्यमंत्री को आप पार्टी ने हराया है, तो यकीनन सत्ता आप के हाथों में होनी चाहिए। गेंद को बीजेपी के पाले में धकेलने का मतलब दिल्ली की जनता के साथ किए वचनों से किनारा करना है। अगर कांग्रेस व भाजपा को उखाड़ना चाहते थे, लेकिन अब सत्ता से छीनकर दूसरे को देना चाहते हैं। न इंसाफी है। क्यूंकि आटे में नमक जितना तो गुनाह माफ है। पूरी सत्ता पुरानी पार्टी के हाथ में देने से अच्छा है, कुछ कांग्रेसियों को साथ ले लो, क्यूंकि राजनी​ति में अच्छे लोग भी होते हैं। मैं फिर कहता हूं, आप को सत्ता संभालनी चाहिए, राजनीति व जंग में सब जायज है। अगर आप अब पीछे हटते हैं तो शायद दिल्ली की जनता के साथ न इंसाफी होगी, क्यूंकि आप का विपक्ष में बैठना, स्वयं को सुरक्षित करना होगा। क्यूंकि आप के ज्यादातर राजनीतिक प्रतिनिधि राजनीति से दूर रहे हैं, उनको प्रजातंत्र में शासन करना अभी से नहीं आएगा, शायद इसलिए आप सत्ता के लोभी नजर नहीं आ रहे, या फिर वह एक माहौल बना रहे हैं, ताकि जनता का समर्थन मिल जाए, व बड़ी सुखद के साथ कांग्रेस के साथ चले जाएं।

केजरीवाल अब आप सत्ता से केवल एक फैसला दूर हैं, लेकिन मैं भी जानता हूं, और आप भी कि फैसले लेने से अधिक चुनौतीपूर्ण कार्यकाल होगा, क्यूंकि आप को उन वायदों पर पूरा उतरना होगा, जो सीना ठोक कर किए हैं, अगर भाजपा आती है तो उनको पांच साल सुरक्षित रहने का मौका मिल जाएगा, और राजनीति में स्वयं को परिपक्व कर पाएंगे। मगर मैं दूसरे नजरिये से सोचता हूं, अनाड़ी आदमी संभालकर वाहन चाहता है, तो धीमा चलता है, मगर अच्छा चलता है, अगले साल देश में क्रांति का बिगुल बज सकता है, अगर आप विपक्ष की बजाय सत्ता संभालें। आपको सकारात्मक रहना है तो विपक्ष के साथ रहें, अपनी रखें, व उनकी सुनें।   

मगर मेरा निजी ख्याल है कि आप केजरीवाल को राजनीति में उतरने के बाद, इतना स्नेह व समर्थन पाने के बाद अब कदम पीछे नहीं हटाना चाहिए, उनको कांग्रेस के साथ दिल्ली में सरकार बनाते हुए आगे बढ़ना चाहिए, इससे दो फायदे होंगे, उनके नेताओं को भी कुछ सीखने को मिलेगा, और आपको भी कांग्रेस के अनुभवियों से सीखने को मिलेगा।

आप के साहस को सलाम। मगर अब आप को वह फैसला लेना है, जो दिल्ली के लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। विपक्ष में बैठकर शायद मांगों को पूरा करवाना वैसा ही जैसे मनमोहन सिंह के निजी तरीकों को सोनिया गांधी की मंजूरी के बाद लागू करना, सत्ता आप को अपने हाथ में लेनी चाहिए। रोटी तो दिल्ली वासियों ने परोस दी है, लेकिन निवाला तोड़कर मुंह में स्वयं को डालना होगा, दिल्लीवासियों के विश्वास का कर्ज अदा करना होगा।

बाकी जीत आपकी, फैसला आपका। देश इंतजार में है। मैं भी। चलते चलते एक और शेयर आपके नाम।

हक़ीकत की तह तक पहुँच तो गए लेकिन सच में ख़ुद को उतारेंगे कैसे।
न जीने की चाहत, न मरने की हसरत यूँ दिन ज़िन्दगी के गुज़ारेंगे कैसे।

fact 'n' fiction : प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जगह लेंगे एलके आडवाणी

यह फाइल फोटो है, जो गूगल सर्च के जरिये प्राप्‍त हुई।
भारतीय जनता पार्टी द्वारा हाशिये पर धकेल दिए गए नेता एलके आडवाणी बहुत जल्‍द संप्रग सरकार में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जगह लेंगे, हालांकि इस मामले में आधिकारिक मोहर लगना अभी बाकी है।

गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदीमय हुई भारतीय जनता पार्टी द्वारा दरकिनार कर दिए गए नेता एलके आडवाणी की ओर से अधिवक्‍ता फेकु राम भरोसे ने संयुक्‍त प्रगतिशील गठबंधन की कोर्ट में जनहित याचिका दायर करते हुए मांग की है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के शेष बचे हुए कार्यकाल का पूरा जिम्‍मा देश के सशक्‍त व सीनियर नेता एलके आडवाणी को सौंपा जाये, ताकि आजाद भारत के नागरिकों राजनीति पर भरोसा बना रहे। वरना, उनको लगेगा कि यहां पर करियर नाम की कोई चीज नहीं है। राजनीति में सपने देखने वाले बर्बाद हो जाते हैं। अगर ऐसी धारणा एक बार बन गई तो आपका सबसे बड़ा राजनीतिक दुश्‍मन नरेंद्र मोदी जीत जायेगा, जिसने पिछले दिनों कहा था कि सपने देखने वाले बर्बाद हो जाते हैं।

सूत्रों ने जानकारी देते हुए बताया कि याचिकाकर्ता के वकील ने संप्रग अदालत के सामने दलील पेश की कि देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह किसी भी समय त्‍याग पत्र देने के लिए तैयार हैं, अगर संप्रग चेयरपर्सन उनको ग्रीन सिग्‍नल दें तो।

उधर, संप्रग की ओर से संभावित पीएम के पद उम्‍मीदवार राहुल गांधी ने भी स्‍पष्‍ट कर दिया है कि वे अपने सपनों को मारकर जनता के सपनों को साकार करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं, और एलके आडवाणी देश के सीनियर सिटीजन हैं, ऐसे में उनका सपना भी राहुल गांधी को पूरा करना चाहिए।

इस बाबत जब देश की सबसे बड़ी फर्जी न्‍यूज एजेंसी 'फेकटॉक' ने गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे से संपर्क साधा तो उन्‍होंने कहा कि रामू श्‍यामू और धामू कोई भी पीएम पद का उम्‍मीदवार हो सकता है, क्‍यूंकि पप्‍पू कान्‍ट डांस, साला! पप्‍पू, राहुल गांधी को सोशल मीडिया द्वारा दिया गया प्‍यार का नाम है।

उधर, गुप्‍त सूत्रों ने बताया है कि एलके आडवाणी अपना सपना पीएम कुर्सी...कुर्सी को पूरा करने के लिए बहुत जल्‍द सोनिया गांधी से मुलाकात करने वाले हैं। उनके करीबियों ने कोरियर के जरिये सोनिया गांधी को एक सीडी भेजी है, ताकि बैठक से पहले दोनों गुटों को मित्रभाव पैदा हो सके। इस सीडी का एक नमूना आप यहां देख सकते हैं।



पिछले दिनों एलके आडवाणी की खास मानी जाने वाली लोकसभा में विपक्ष नेता सुषमा स्‍वराज ने प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठकर निरीक्षण किया और बताया है कि कुर्सी बेहद आराम दायक है, और एक सीनियर सिटीजन उस पर आराम से बैठ सकता है।

दलील और स्‍थितियों के मद्देनजर तो ऐसा लगता है कि 'आदमी आदमी के काम आता है' की तर्ज पर संप्रग सरकार पिछले दो बार से पीएम पद की रेस में शामिल रह चुके एलके आडवाणी की भावनाओं को समझेगी, और उनको संप्रग सरकार में मनमोहन सिंह की जगह प्रदान करेगी। बाकी तो राम ही राखै।


कुलवंत हैप्‍पी, संचालक Yuvarocks Dot Com, संपादक Prabhat Abha हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र, उप संपादक JanoDuniya Dot Tv। पिछले दस साल से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय, प्रिंट से वेब मीडिया तक, और वर्तमान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की छाया में।

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सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को 'पत्र' लिखा

सोनिया गांधी, संयुक्‍त प्रगतिशील गठबंधन की चेयरपर्सन ने देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखा, लेकिन यह कोई प्रेम पत्र नहीं था। यह पत्र आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्‍ति नागपाल के निलम्‍बन को लेकर लिखा गया, इस पत्र में सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह से आग्रह किया, 'सरकार आईएएस अधिकारी के साथ किसी तरह की नइंसाफी न होने दे, और सरकार ने अब तक इस मामले में क्‍या काईवाई की उसकी जानकारी मांगी।'

जब सोनिया गांधी के पत्र की ख़बर सामने आई तो दिमाग का चक्‍का घूमा। खयाल आया कि आजकल सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बीच पति पत्‍नि वाला मनमुटाव हो गया क्‍या ? जैसे टीवी सीरियलों में होता है, जब पति पत्‍नि में अनबन हो जाती है तो टि्वटर नमूना पर्चियों का सहारा लेते हैं एक दूसरे को अपनी बात कहने के लिए, वैसे तो साधारण परिस्‍थितियों में रिमोट होम मिनिस्‍टर के हाथ में ही होता है, होम मिनिस्‍टर कहने भर से काम चल जाएगा, मुझे यकीन है।

सोनिया गांधी, जिन पर अक्‍सर आरोप लगता है कि संप्रग सरकार को मनमोहन सिंह नहीं, स्‍वयं सोनिया गांधी चलाती हैं, शायद वैसे ही जैसे बड़े बड़े अधिकारी कार की पिछली सीट पर बैठकर कार चालक को दिशा बताते हुए गाड़ी चलाते रहने का आदेश देते हैं, लेकिन ऐसा मामला अभी तक सामने नहीं आया, जिसमें कार चालक को किसी मालिकन या मालिक ने चिट पर लिखकर गाड़ी चलाने का आदेश दिया हो। हां, तब ऐसा जरूरत होता है, जब मालिकन या मालिक किसी अन्‍य काम में व्‍यस्‍त हों, और ड्राइवर को किसी जगह भेजना हो।

ऐसे में सवाल उठता है कि सोनिया गांधी आजकल कहां व्‍यस्‍त हैं, और मनमोहन सिंह, जोकि देश के प्रधानमंत्री हैं, को अकेले छोड़ दिया, जब लोक सभा चुनाव सिर पर हैं, और विरोधी पार्टियां दुष्‍प्रचार के लिए छोटे छोटे बहाने ढूंढ रही हैं। राहुल गांधी भी लापता हैं। ऐसे में तार से काम चलाया जा रहा है। दुर्गा शक्‍ति की गूंज जब टेलीविजन वालों ने पूरे देश में फैला दी, तब सोनिया गांधी की आंख खुली, शायद गलती से कोई न्‍यज चैनल रिमोट दबाते दबाते चल गया होगा, या दरवाजे के नीचे से कटिंग रहित समाचार पत्र पहुंच गया होगा।

चलो अच्‍छा है। सोनिया गांधी को इस बहाने लिखने का मौका तो मिला। चाहे मनमोहन सिंह को निर्देशित करता पत्र ही सही, मीडिया वाले अब रिमोट भूल पत्र संचालित प्रधानमंत्री कह सकते हैं। अगर सोनिया गांधी ने ऐसे कदम पहले उठा लिए होते तो शायद पिछले महीने बंद होने वाली टेलीग्राम सेवा बच जाती। देशभर में 14 जुलाई रात 9 बजे से 160 साल पुरानी टेलीग्राम  सेवा बंद हो गई।

सोनिया गांधी ने पत्र लिखा तो सबसे बड़ा दुख समाजवादी पार्टी को हुआ, जो केवल नाम से समाजवादी है, चरित्र से पूरी समझौतावादी। सोनिया गांधी तो अच्‍छी तरह जानती हैं। मामला कोई भी हो, समाजवादी पार्टी का एक ही नारा रहता है, हमारा काम करोगे तो समर्थन मिलेगा, वरना आपका हर बिल जन विरोधी होता है।

सीबीआई की दुर्दशा के पीछे जितनी कांग्रेस सरकार जिम्‍मेदार है, उससे कई गुना तो समाजवादी पार्टी जिम्‍मेदार है, जो संप्रग सरकार पर दबाव बनाकर, सीबीआई की गरिमा को चोटिल कर देती है। सुनने में आया है कि सीबीआई मुलायम सिंह पर लगे हैसियत से ज्‍यादा संपत्‍ति बनाने के मामले में चार बार आगे पीछे हो चुकी है। अब फिर चुनाव सिर पर हैं, अब फिर बैकफुट पर जाने की तैयारी है। सीबीआई वाला मामला तो ठीक है, लेकिन सोनिया गांधी के पत्र पर पहली प्रतिक्रिया इस पार्टी की आई, और समाजवादी पार्टी के नेता नरेश कुमार अग्रवाल ने सोनिया गांधी को दो पत्र और लिखने की सिफारिश की है, लेकिन यह पत्र दुर्गाशक्‍ति नागपाल निलम्‍बन के संबंध में नहीं, बल्‍कि आईएएस खेमका व राजस्‍थान के दो अधिकारियों के साथ हुई नइंसाफी के लिए। वहीं, भाजपा की मीनाक्षी लेखी ने कहा, ‘अगर सोनिया गांधी को दुर्गा नागपाल के निलंबन की इतनी चिंता है, तो उन्हें आईएएस अधिकारी अशोक खेमका के मामले पर भी गौर करना चाहिए, जिसका राबर्ट वाड्रा के भूमि सौदे की जांच करने पर तबादला किया गया।’  खेमका का तो 44 बार तबादला किया जा चुका है।  

सोनिया गांधी ने पत्र पर उठते हुए सवालों और विवादों को देखते हुए रविवार, 4 अगस्‍त 2013 को प्रण तो किया होगा कि अपने रिमोट में सैल डाल दिए जाएं तो अच्‍छा होगा, वरना इस बार की तरह घर की बात हर बात बाहर चली जाएगी।

दिल्‍ली अभी दूर है 'नरेंद्र भाई'

भले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम आज देशभर में ही नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर लोकप्रियता की सभी हदें पार कर चुका है, लेकिन इसको आगामी लोक सभा चुनावों के लिए सफलता की गारंटी कदापि नहीं माना जा सकता। आंकड़ों की धरातल को सही से देखे बिना भले ही भाजपा या उसके समर्थक सत्ता पर बैठने का ख्वाब संजो रहे हों, क्योंकि आंकड़े वैसे नहीं, जैसे भाजपा सोच रही है, आंकड़े विपरित हैं, खासकर भाजपा की सोच से। हां, अगर कोई करिश्मा हुआ तो जरूर भाजपा को २०१४ में सत्ता का स्वाद चखने का मौका मिल सकता है। वैसे ज्यादातर उम्मीद करना बेईमानी होगी, क्यूंकि आज स्थितियां १९९८ या १९९९ वाली नहीं हैं, जब भाजपा अन्य सहयोगी पार्टियों की सहायता से सिंहासन पर बैठी थी। अटलबिहारी वाजपेई जैसा एक सशक्त और दूरदर्शी सोच का व्यक्ति भाजपा का अगुवाई कर रहा था।

अब भाजपा नरेंद्र मोदी के जरिए उस इतिहास को दुहराना चाहती है। मगर नरेंद्र मोदी को पार्टी के शीर्ष नेता व अन्य भाजपा के मुख्यमंत्री तक नहीं सहज से ले पा रहे तो जनता से कैसी उम्मीद की जा सकती है, खासकर उस समुदाय से, जो नरेंद्र मोदी को आज भी मन ही मन में मुस्लिम समुदाय के लिए खतरे के रूप में देखता है। सच कहें तो आज नरेंद्र मोदी के आगे २००९ से कहीं अधिक चुनौतियां हैं, क्यूंकि  समय के साथ साथ भाजपा के कई संगी साथी एनडीए छोड़कर चले गए, खासकर जद यू के जाने बाद भाजपा को अगला चुनाव कुछ सहयोगियों के सहारे लडऩा होगा। जनता दल यूनाइटेड, जिसके अध्यक्ष शरद यादव हैं, ऐसी १३वीं पार्टी थी, जिसने भाजपा का साथ छोड़ा। अब एनडीए में केवल शिवसेना, शिरोमणि अकाली बादल और छोटी छोटी आठ पार्टियां हैं, जिनके पास या तो एक एक सांसद है या बिल्कुल नहीं। शिवसेना के पास मौजूदा समय में ११ तो शिअद के पास केवल ४ सांसद हैं जबकि भाजपा के पास 117 सांसद हैं। हालांकि सरकार बनाने के लिए २७३ के आंकड़े को छूना होता है।

जब १९९८ और १९९९ में भाजपा अटल बिहारी वापपेयी के नेतृत्व में चुनाव लड़ी थी। संजीदा, समझदार और अनुभवी राजनेता की छवि रखने वाले वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर उसे दोनों बार सत्ता हासिल हुई थी, भले ही पहली सरकार १३ दिन चली, लेकिन अगली सरकार १ सीट का इजाफा करते हुए १८३ का आंकड़ा छूने में सफल हुई, और अन्य पाॢटयों के सहयोग से सरकार बनाने में सफल रही और एक सफल कार्याकाल पूरा किया। अब स्थितियां पहले जैसी नहीं, पहली बात अब एनडीए पूरी तरह टूटकर बिखर चुका है, दूसरी बात अटलबिहारी वाजपेयी जितनी अहमियत नरेंद्र मोदी को उनकी पार्टी में नहीं मिल रही, यहां पर उनका मुकाबला कांग्रेस से कम अपने साथियों से ज्यादा है, वरना नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार समिति अध्यक्ष बनने पर इतना होहल्ला न होता। भाजपा के हाथ में केवल कुछ राज्य हैं, जिनसे उम्मीद की जा सकती है, जिसमें मध्यप्रदेश, ३६गढ़, राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा आदि। जद यू से अलग होने के बाद बिहार भाजपा के खाते से निकल चुका है। ४२ लोक सभा सीटों वाले पश्चिमी बंगाल में भाजपा केवल एक सीट के साथ बनी हुई है, लेकिन वह सीट पर जसवंत सिंह की है, जो नरेंद्र मोदी के कट्टर विरोधी बताए जाते हैं, हालांकि १९९९ में इस राज्य से भाजपा को 2 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। जब भाजपा को यह सीटें नसीब हुई थी, तब उसका और तृणमूल कांग्रेस का गठबंधन था। मगर अब रिश्ते वैसे नहीं, जैसे पुराने दिनों में हुआ करते थे। पश्चिमी बंगाल में एक चौथाई मतदान मुस्लिम है। ऐसे में अपनी कुर्सी बनाए रखने के लिए तृणमूल कांग्रेस कहीं न कहीं, आगे चलकर कांग्रेस के साथ समझौता तो कर सकती है, लेकिन नरेंद्र मोदी की अगुवाई को शायद ही मंजूर करे। वैसे नरेंद्र मोदी पश्चिमी बंगाल से टाटा को गुजरात खींच रहे, कहीं न कहीं, यह बात भी पश्चिमी बंगाल के लोगों को खलती है।

कर्नाटक का हाल तो पिछले दिनों देखने को मिला। भाजपा को इस बार कर्नाटका से भी कुछ ज्यादा की उम्मीद करना बेईमानी होगा। येदियुरप्पा अगर भाजपा में फिर से लौटते हैं तो भी भाजपा कर्नाटका में फिलहाल तो करिश्मा नहीं कर सकती, क्यूंकि जनता का मन भाजपा से उठ चुका है। २८ लोक सभा सीटों वाले इस क्षेत्र से भाजपा को २००९ में १८ सीटें नसीब हुई थी, लेकिन इस बार इनकी संख्या नीचे गिरने की पूरी संभावना है, क्यूंकि यहां कांग्रेस ने सत्ता वापसी कर ली है। उड़ीसा जहां २१ लोक सभा सीटें हैं,  वहां पर भाजपा के पास मौजूदा समय में एक भी सांसद नहीं, उड़ीसा का मुख्यमंत्री नवीन पटनायक नरेंद्र मोदी को अच्छा प्रशासक नहीं मानता, और २००९ में संघ की गतिविधियों से तंग आकर नवीन पटनायक ने भाजपा से नाता तोड़ लिया था, ऐसे में उसका भाजपा के साथ खड़े होना मुश्किल है, क्यूंकि यहां के नतीजे ईसाई समुदाय प्रभावित करता है, जो संघ को पसंद नहीं करता, और संघ के बिना बीजेपी चल नहीं सकती।

देश में सर्वाधिक लोक सभा सीटें रखने वाले उत्तरप्रदेश में भाजपा को करिश्मा करना होगा। केवल यह राज्य किसी भी पार्टी का नसीब बदल सकता है, क्यूंकि यहां पर देश की ८० लोक सभा की सीटें हैं, लेकिन यहां मुश्किल यह है कि इस क्षेत्र में क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा है, जो किसी भी सहारा को सहारा देती है, लेकिन कई शर्तों के साथ। बीएसपी और सपा, दोनों का यहां बहुत बोलबाला है, और दोनों पाॢटयों के शीर्ष नेता खुद प्रधानमंत्री की सीट पर बैठने के ख्वाब देखते हैं। यह समझौतावादी लोग कांग्रेस के साथ इसलिए चले जाते हैं, यहां सौदेबाजी का काफी संभावनाएं रहती हैं, लेकिन भाजपा के साथ इस तरह की सौदेबाजी करना पा मुश्किल होगा। इस क्षेत्र में भाजपा ने सबसे बेहतरीन प्रदर्शन १९९८ में किया था, जब उसको ५९ सीटें मिली थी, उसके बाद इस आंकड़े को भाजपा कभी छू नहीं पाई, मौजूदा समय में भाजपा के पास केवल नौ सीट हैं।

महाराष्ट्र, जहां पर लोक सभा की ४८ सीटें हैं। मगर भाजपा के खाते में केवल ९ सीटें हैं। इस बार स्थिति यों की त्यों बनी रह सकती है। इस राज्य में एनडीए सहयोगी शिवसेना है, जिसके पास मौजूदा समय में ११ सांसद हैं, लेकिन बाल ठाकरे को खो देेने के बाद राज ठाकरे का उभरना, कहीं न कहीं शिव सेना को पीछे धकेलेगा। जिस तरह का रु$ख शिव सेना के मौजूदा अध्यक्ष उद्धव ठाकरे नरेंद्र मोदी के बारे में अपनाए हुए हैं। ऐसे में इस दल के भी एनडीए से बाहर होने के चांस हैं, क्यूंकि भाजपा के संभवत: पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे दोनों में से किसी एक को चुन सकते हैं, जिसका प्रदर्शन बेहतर हुआ, लेकिन उससे पूूर्व भाजपा का प्रदर्शन बेहतर होना लाजमी है। अन्ना हजारे इस राज्य से संबंध रखते हैं, वे नरेंद्र मोदी की आलोचना सार्वजनिक मंचों से कर रहे हैं, और ऐसे में अपनु मानस, महाराष्ट्रीयन लोग नरेंद्र मोदी के चेहरे से दूरी बना सकते हैं।

आंंध प्रदेश में भाजपा के पास एक भी सांसद नहीं, हालांकि भाजपा ने ४२ लोक सभा सीटों वाले इस क्षेक में अपनी शाख जमाने के लिए २००९ में ३७ उम्मीदवार उतारे थे। अटल बिहारी वापपेयी की सरकार के वक्त यहां की पार्टी टीडीपी का बहुत बड़ा हाथ था। मगर २००४ में टीडीपी और भाजपा का  रिश्ता टूट गया था, अगर अब भी यह रिश्ता बनता है तो कोई ज्यादा फायदा नहीं मिलने वाला, क्यूंकि टीडीपी भी अपनी चमक को खोती जा रही है। वहां पर संभावना यह की जा सकती है कि भाजपा जगमोहन रेड्डी की नई पार्टी के साथ चुनाव लड़ सकती है, जो पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वाईएसआर रेड्डी की मौत के बाद उनके पुत्र ने बनाई है। तेलुगु देशम पार्टी तीसरे फ्रंट की तरफ रुख कर सकती है। वैसे यह क्षेत्र कांग्रेस के प्रभाव वाला है। तमिलनाडु में लोक सभा की ३९ सीटें हैं। यहां पर दो पाॢटयां सक्रिय हैं, एक डीएमके  और एआईएडीएमके। एम करुणानिधि और जयललिता दोनों यहां के रूसख वाले नेता हैं। जयललिता का रूझान नरेंद्र मोदी की तरफ है। दोनों में रिश्ते अच्छे हैं। मगर यहां पर डीएमके किस तरह का प्रदर्शन करती है, उस पर चुनाव समीकरण बनेंगे। दोनों पर्टियां मौकाप्रस्त हैं। अपनी शर्तों पर समर्थन देती और खींच लेती हैं।

नरेंद्र मोदी को अगर सत्ता हासिल करनी है तो उसको एक जादू आंकड़ा हासिल करना होगा। अकेली भाजपा को २०० से अधिक सीटें बटोरनी होंगी। भाजपा को गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़,   दिल्ली, यूपी, बिहार एक बेहतरीन प्रदर्शन करना होगा। यहां से आने वाले आंकड़े भाजपा की किस्मत बदल सकते हैं। मौजूदा समय में भाजपा के नहीं, बल्कि एडीए के पास केवल 138 सीटें हैं। अगर भाजपा एक जागड़ू सरकार के साथ सत्ता में कदम रखती है तो देश की हालत में कोई सुधार होने की उम्मीद नहीं दिखती, और यह सरकार हमेशा एक बनावटी सांस प्रणाली यंत्र पर चलेगी, जो किसी भी समय अगले चुनावों की नौबत पैदा कर सकती है। क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है। सबसे अहम बात अगर नरेंद्र मोदी को सत्ता हासिल करनी है तो उसको एक राज्य के साथ खुद को जोड़े रखने से परहेज करना होगा। नरेंद्र मोदी का चेहरा, जो ब्रांड बन चुका है, लेकिन मध्यप्रदेश के चुनाव प्रचार में इस चेहरे को गायब कर दिया गया, क्यूंकि गुजरात सरकार और मध्यप्रदेश सरकार पर कई मोर्चों पर युद्ध शुरू है। इन दिनों शेरों के स्थानांतरित को लेकर अदालती युद्ध चल रहा है। ऐसे में मध्यप्रदेश के लोग नरेंद्र मोदी को स्वीकार नहीं कर सकते, क्यूंकि वे उसकी सरकार का नेतृत्व करते हैं, जो शेरों के स्थानांतरित को लेकर अदालत के कटघरे में खड़ी है। ऐसे में शिवराज चौहान अपनी सरका बचाने के लिए नरेंद्र मोदी से दूर बनाए रखना ज्यादा बेहतर समझते हैं। यकीनन यह चुनाव कहीं न कहीं आगामी लोक सभा चुनावों पर व्यापक असर डालेंगे।

”लेखक कुलवंत हैप्‍पी, युवारॉक्‍स डॉट कॉम व हिन्‍दी साप्‍ताहिक समाचार पत्र प्रभात आभा के संपादक व जानो दुनिया डॉट टीवी में बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं।”

यह लेख 27 जुलाई 2013 के प्रभात आभा एडिशन में प्रकाशित हुआ है।

देना ‘बब्‍बर थाली’, वो ’12′ वाली

मुम्‍बई के बाहरी रेलवे स्‍टेशनों पर ट्रेनों को आगे बढ़ने से रोक दिया गया है, और साथ में कुछ उड़ानों को उतरने पर रोक लगा दी गई है। इसके अलावा मुम्‍बई के बॉर्डर को पूरी तरह सील कर दिया गया, ताकि अन्‍य क्षेत्र के लोग मुम्‍बईया सीमा के भीतर घुस न सकें, खासकर तब तक जब तक स्‍थिति सामान्‍य न हो जाए। स्‍थिति उस समय तनावपूर्ण हो गई, जब देश के एक राजनेता के एक बयान के बाद हर कोई ‘बब्‍बर थाली’ की  तलाश में मुम्‍बई की तरफ निकल पड़ा।

मुम्‍बई के होटलों के बाहर हाउसफुल के बोर्ड लटकते हुए देखे गए। कहीं कहीं तो बब्‍बर थाली के लिए लोगों में हिंसक झड़प के समाचार भी मिले हैं। मुम्‍बई के हर होटल पर बब्‍बर थाली की मांग बढ़ रही है, हर किसी जुबान पर है ‘देना बब्‍बर थाली, वो ’12′ वाली। हालांकि ऐसी कोई थाली मुम्‍बई के जीरो स्‍टार ढाबे से लेकर फाइव स्‍टार होटल में कहीं भी नहीं उपलब्‍ध, ऐसा नहीं कि ग्राहकों की बढ़ी तादाद के कारण ऐसा हुआ, बल्‍कि ऐसी कोई थाली है ही नहीं।

दरअसल इस थाली की मांग ‘राजनेता’ राज बब्‍बर के बयान के बाद बढ़ी, जिसमें उन्होंने 12 रुपये में भर पेट खाना मिलने की बात कही थी। हालांकि बाद में राज बब्‍बर के करीबियों ने बताया कि एक दिन राज बब्‍बर दोपहर का खाना खाने के लिए मुम्‍बई के एक होटल में गए थे, वहां उन्‍होंने जम कर खाना खाया। जब बिल देने की बारी आई तो होटल के मालिक ने राज बब्‍बर से केवल 12 रुपये लिए, यह 12 रुपये खाने के नहीं, बल्‍कि शागुन के थे। वैसे तो शागुन में 11 रुपये दिए जाते हैं, लेकिन उस दिन राज साहिब के पास एक रुपया छूटा नहीं था, ऐसे में उन्‍होंने दो का सिक्‍का दिया और कहा, चलो एक रुपया टिप समझ कर रख लेना।

कुछ करीबियों का तो यह भी कहना है कि जब वे लंदन से मुम्‍बई शिवाजी टर्नीमल पर उतरे तो उनको काफी भूख लगी हुई थी। ऐसे में वे पास के किसी होटल में खाने के लिए गए। खाना खाने के बाद जब बिल देने की बारी आई तो जेब में राज बब्‍बर ने हाथ डाला, डॉलर निकले, होटल मालिक ने डॉलर देखकर कहा, जनाब केवल 12 दे दीजिए।

राज बब्‍बर खुश हो उठे वाह केवल 12 में इतना अच्‍छा खाना, दरअसल उनको याद ही नहीं रहा कि उन्‍होंने जो 12 का भुगतान किया, वे रुपये नहीं, बल्‍कि डॉलर थे। इस बातों को अभी कुछ दिन ही बीते थे कि अचानक राज बब्‍बर की नई कंपनी, यानि कि कांग्रेस ने घोषणा की कि गरीबों को सस्‍ता खाना उपलब्‍ध करवाने के लिए फूड सिक्‍यूरिटी बिल लाना अति जरूरी है। फूड सिक्‍यूरिटी बिल की बात राज बब्‍बर तक पहुंची तो उनको फूड से याद आया अपना पुराना अनुभव, वैसे भी लोग कहते हैं या तो आप बीती कहिए या जग बीती। ऐसे में राज बब्‍बर ने आप बीती कह डाली, लेकिन वे क्‍लीयर करना भूल गए कि मुम्‍बई में उन्‍होंने 12 रुपये का खाना कैसे और कब खाया था। दरअसल उपरोक्‍त कहानी, राज बब्‍बर के बयान सी है, जिसका जमीनी स्‍तर बिल्‍कुल नहीं, केवल ख्‍याली पुलाव टाइप है।

मगर राज बब्‍बर के इस बयान से हैरानी होती है कि जब टमाटर का रेट 60 से ऊपर चल रहा हो, जब एक किलो गोभी खरीदते वक्‍त सौ का नोट खप जाए, ऐसे में आप 12 रुपये में पेट भर खाने की बात स्‍थितियों का मजाक उड़ाने भर से अधिक नहीं हो सकता। वैसे ही इन दिनों कांग्रेस नेताओं को राहुल गांधी की बात समझ में नहीं आ रही, जिसको वे प्रधानमंत्री बनाने की बात कह रहे हैं। राहुल गांधी से याद आया, उनके एक प्रिय चाचा श्री हैं, जिनको लोग दिग्‍गी राजा के नाम से जानते हैं, वे मंदसौर में एक जनसभा को संबोधन कर रहे थे तो उन्‍होंने राहुल गांधी की अति करीबी को सौ टंच का माल कहकर बाजार में आग लगा दी। सबसे दिलचस्‍प बात तो यह थी कि यह शब्‍द खासकर तब एक फब्‍ती सा लगता है जब आप बात को चबकर कह रहे हों, जैसे कि दिग्‍गविजय सिंह ने अपने भाषण में कहा, वे तो राहुल गांधी और सोनिया गांधी का दिल जीत चुकी हैं। वे तो सबसे आगे हैं। वे हैं सौ टंच का माल, मैं तो पुराना जौहरी हूं।

यह बात किसी से नहीं छुपी कि राहुल गांधी के करीबियों में मीनाक्षी नटराजन का नाम आता है। लेकिन यह करीबियां कहां तक है, ये बात तो वे दोनों ही बता सकते हैं, लेकिन दिग्‍गी का बयान कुछ और संकेत कर रहा है। अगर मीडिया नरेंद्र मोदी के पिल्‍ले के पीछे के अर्थ ढूंढ़ सकता है तो दिग्‍गविजय सिंह तो बहुत गहरी बात कह गए। चलो जाने भी दो, हम तो निकले थे 12 रुपये वाली, बब्‍बर थाली लेने, लेकिन यह थाली मिलती कहां है, हमारे तो यहां दबेली, बड़ा पाव भी 15 रुपये में मिलता है, जो दो खाये बिन पेट नहीं भरता।

राहुल गांधी : तुम आये तो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला

राहुल गांधी, युवा चेहरा। समय 2009 लोक सभा चुनाव। समय चार साल बाद । युवा कांग्रेस उपाध्‍यक्ष बना पप्‍पू। हफ्ते के पहले दिन कांग्रेस की मीडिया कनक्‍लेव। राहुल गांधी ने शुभारम्‍भ किया, नेताओं को चेताया वे पार्टी लाइन से इतर न जाएं। वे शालीनता से पेश आएं और सकारात्‍मक राजनीति करें। राहुल गांधी का इशारा साफ था। कांग्रेसी नेता अपने कारतूस हवाई फायरिंग में खत्‍म न करें। राहुल गांधी, जिनको ज्‍यादातर लोग प्रवक्‍ता नहीं मानते, लेकिन वे आज प्रवक्‍तागिरी सिखा रहे थे।

दिलचस्‍प बात तो यह है कि राहुल गांधी ख़बर बनते, उससे पहले ही नरेंद्र मोदी की उस ख़बर ने स्‍पेस रोक ली, जो मध्‍यप्रदेश से आई, जिसमें दिखाया गया कि पोस्‍टर में नहीं भाजपा का वो चेहरा, जो लोकसभा चुनावों में भाजपा का नैया को पार लगाएगा। सवाल जायजा है, आखिर क्‍यूं प्रचार समिति अध्‍यक्ष को चुनावी प्रचार से दूर कर दिया, भले यह प्रचार लोकसभा चुनावों के लिए न हो। कहीं न कहीं सवाल उठता है कि क्‍या शिवराज सिंह चौहान आज भी नरेंद्र मोदी को केवल एक समकक्ष मानते हैं, इससे अधिक नहीं। सवाल और विचार दिमाग में चल रहे थे कि दूर से कहीं चल रहे गीत की धुनें सुनाई पड़ी, ‘तुम आये तो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला, जाने कितने दिनों के बाद, गली में आज चाँद निकला’ चांद से याद आता है राहुल गांधी का चेहरा, जो कुछ महीने पहले जयपुर में नजर आया था, और आज सोमवार को नजर आ रहा है। शायद दूर कहीं ये गीत सही वक्‍त पर बजा रहा है। काश यह गीत राहुल गांधी के समारोह के आस पास बजता तो राहुल आज की होट स्टोरी होते।

राहुल गांधी ने जमीनी राजनीति पर उतर कर बेटिंग करने को कहा। यकीनन कांग्रेस के लिए यह बहुत बेहतरीन सुझाव है, वैसे भी कहते हैं कि सुबह का भूला शाम को घर आए तो उसको भूला नहीं कहते, अगर कांग्रेस आज भी अपने ग्रामीण क्षेत्र के वोटरों को संभाल ले तो हैट्रिक लगा सकती है। कांग्रेस ने जयपुर में मंथन किया था, शायद वे जमीनी नहीं था। अगर होता तो कांग्रेस अपने कारतूसों को हवाई फायरिंग में खराब करने से बेहतर सही दिशा में खर्चती। कांग्रेस के दामन में दाग बहुत हैं, लेकिन कांग्रेस अपनी योजनाओं के सर्फ एक्‍सल से धो सकती है।

कांग्रेस केंद्र में है। उसके द्वारा शुरू की गई, योजनाएं एक अच्‍छी पहल हैं। केंद्र सरकार ने इन योजनाओं को लागू करने के लिए करोड़ों रुपए राज्‍य सरकारों को दिए, लेकिन राज्‍य सरकारों की गड़बड़ियों के कारण योजनाएं पिट गई, और दोष पूरा कांग्रेस के सिर मढ़ दिया गया। मिड डे मिल, जो आज चर्चा का कारण है, क्‍या उसमें केंद्र का दोष है ? नहीं, दोष है राज्‍य सरकारों का जो उसको अच्‍छी तरह से लागू नहीं कर पा रही। मनरेगा, रोजगार की गारंटी भी निश्‍चत एक अच्‍छी पहल है, लेकिन राज्‍य सरकारों की अनदेखी के कारण धूल फांक रही है, बदनामी की कल्‍ख कांग्रेस के माथे, हालांकि कुछ घोटालों के आरोपी नेता या मंत्री जेल की हवा तक खा चुके हैं।

कांग्रेस की समस्‍या है कि वे सोशल मीडिया को समझ नहीं पा रही। दरअसल कांग्रेस पुराने ढर्रे पर चल रही है, और भाजपा इस कमजोरी का फायदा उठाते हुए पूरी तरह सोशल मीडिया को कैप्‍चर कर रही है। कहते हैं कि सोशल मीडिया 160 लोकसभा सीटों को प्रभावित करता है। उसकी पहुंच 12 करोड़ भारतीयों तक है। मगर सोशल मीडिया पर एक बाज की नजर है, जो देश के 80 करोड़ लोगों तक पहुंच बनाए हुए है। जी हां, इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया। आज देश का इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया, मोदी की ब्रांडिंग कर रहा है। कांग्रेस किसी सहमे हुए बच्‍चे की तरह, डरी हुई किसी कोने में खड़ी पूरा तमशा देख रही है।

उसके कई कारण हैं। सबसे पहले कांग्रेस के पास एक दमदार प्रवक्‍ता नहीं। राहुल गांधी युवा पीढ़ी को प्रेरित करता था, लेकिन पिछले कुछ समय से उसकी चुप्‍पी ने युवा पीढ़ी को निराश किया, और युवा पीढ़ी का बहाव नरेंद्र मोदी की तरफ ऑटोमेटिक मुड़ गया। नरेंद्र मोदी के पास राजनीति में लम्‍बा संघर्ष, एक आदर्श राज्‍य की पृष्‍ठभूमि, 11 साल का नेतृत्‍व अनुभव है। राहुल के पास एक मां है, जो उसकी दादी की तरह दमदार प्रवक्‍ता नहीं। संप्रग के पास प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह है, जिसको लोग कथित तौर पर सोनिया गांधी संचालित टेलीविजन कहते हैं। जब भी उनसे राहुल गांधी के पीएम बनने के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब एक था आज कहो, आज पीछे हट जाता हूं, मतलब साफ है, वे केवल मास्‍क हैं।

राहुल गांधी की कलावती पटकथा हिट हुई तो युवा आइकन बन गए। कलावती के बाद राहुल गांधी की कोई पटकथा हिट नहीं हुई। उसका प्रभाव खत्‍म होने लगा। सोशल मीडिया ने उसको पप्‍पू करार दे दिया। राहुल गांधी ने जो कदम आज उठाया है, उस बच्‍चे की तरह, जो पेपरों से कुछ दिन पहले तैयारी करने बैठता है, नतीजा जो भी आए, अगर राहुल का मंत्र सफल हुआ तो शायद 2014 में अख़बारों की सुर्खियां यह शीर्षक बन सकता है ‘पप्‍पू पास हो गया”।

ईद के चांद की तरह नजर आने वाला राहुल गांधी शायद आम चांद की तरह नजर आए, और जो सोच वे कभी कभी जनता के सामने रखते हैं, वे प्रत्‍येक दिन रखे, हफ्ते, महीने में रखे तो स्‍थितियां बदल सकती हैं।

और वे गीत भी शायद कभी इतना रिलेवेंट न लगे, जो आज कहीं दूर से कानों में पड़ रहा है, जख्‍म फिल्‍म का पूजा भट्ट पर फिल्‍माया गया गीत ”तुम आये तो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला जाने कितने दिनों के बाद, गली में आज चाँद निकला”

राजनाथ सिंह, नरेंद्र मोदी और भाजपा की स्‍थिति

''राह में उनसे मुलाकात हो गई, जिससे डरते थे वो ही बात हो गई''  विजय पथ फिल्‍म का यह गीत आज भाजपा नेताओं को रहकर का याद आ रहा होगा, खासकर उनको जो नरेंद्र मोदी का नाम सुनते ही मत्‍थे पर शिकन ले आते हैं।

देश से कोसों दूर जब न्‍यूयॉर्क में राजनाथ सिंह ने अपना मुंह खोला, तो उसकी आवाज भारतीय राजनीति के गलियारों तक अपनी गूंज का असर छोड़ गई। राजनाथ सिंह, भले ही देश से दूर बैठे हैं, लेकिन भारतीय मीडिया की निगाह उन पर बाज की तरह थी। बस इंतजार था, राजनाथ सिंह के कुछ कहने का, और जो राजनाथ सिंह ने कहा, वे यकीनन विजय पथ के गीत की लाइनों को पुन:जीवित कर देने वाला था।

दरअसल, जब राजनाथ सिंह से पीएम पद की उम्‍मीदवारी के संबंधी सवाल पूछा गया तो उनका उत्तर था, मैं पीएम पद की उम्‍मीदवारी वाली रेस से बाहर हूं। मैं पार्टी अध्‍यक्ष हूं, मेरी जिम्‍मेदारी केवल भाजपा को सत्ता में बिठाने की है, जो मैं पूरी निष्‍ठा के साथ निभाउंगा। यकीनन, नरेंद्र मोदी आज सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं, अगर भाजपा सत्ता हासिल करती है तो वे पीएम पद के उम्‍मीदवार होंगे।

दूर देश में बैठे राजनाथ सिंह को इस बात का अंदाजा भी नहीं होगा, ऐसे कैसे हो सकता है कि उनके मुंह से निकले यह शब्‍द भारत में बैठे उनके कुछ मित्रों को अग्‍निबाण से भी ज्‍यादा नागवार गुजरेंगे। क्‍यूंकि भूल गए वे गोवा बैठक के बाद की उस हलचल को, जो एलके आडवाणी के इस्‍तीफे से पैदा हुई थी।

भारतीय मीडिया के बीच अक्‍सर इस बात संबंधी पूछे सवाल पर पार्टी बैठकर फैसला करेगी कह निकले वाले राजनाथ सिंह क्‍यूं भूल गए कि आज का मीडिया सालों पुराना नहीं, जो ख़बर को प्रकाशित करने के लिए किसी बस या डाक खाने से आने वाले तार का इंतजार करता रहेगा, आज तो आपने बयान दिया नहीं कि इधर छापकर पुराना, और चलकर घिस जाता है।

राजनाथ सिंह, ने पहले पत्ते दिल्‍ली की बजाय गोवा में खोले, शायद राजनाथ सिंह ने उनके लिए विकल्‍प खुला रखा था, जो इस फैसले से ज्‍यादा हताश होने वाले थे, क्‍यूंकि तनाव के वक्‍त खुली हवा में सांस लेना, टहलना, बीच के किनारे जाकर मौज मस्‍ती करना बेहतर रह सके।

अब वे न्‍यूयॉर्क पहुंचकर अपने पत्‍ते खोलते हैं, ताकि उनके भारत लौटने तक पूरा मामला किसी ठंडे बस्‍ते में पड़ जाए, और वे नरेंद्र मोदी को दिए हुए अपने वायदे पर कायम रह सकें। शायद अब तो सहयोगी पार्टियों को अहसास तो हो गया होगा कि नरेंद्र मोदी के अलावा भाजपा के पास 2014 के लिए कोई और विकल्‍प नहीं है।

अगर अब भी किसी को शक है तो वे अपना भ्रम बनाए रखे, क्‍यूंकि भ्रम का कोई इलाज नहीं होता, और अंत आप ठंडी सांस लेते हुए पानी की चंद घूंटों के साथ, कुर्सी पर पीठ लगाकर गहरी ध्‍यान अवस्‍था में जाकर, विजय पथ के उस गीत को आत्‍मसात करें, ''राह में उनसे मुलाकात हो गई, जिससे डरते थे वो ही बात हो गई''।

भाजपा का खेल, टेस्‍ट मैच के अंतिम दिन सा

क्रिकेट के मैदान पर अक्‍सर जब दो टीमें होती हैं, खेलती हैं तो यकीनन दोनों टीमें अपना बेहतर प्रदर्शन देने के लिए अपने स्‍तर पर हरसंभव कोशिश करती हैं, ताकि नतीजे उनकी तरफ पलट जाएं, लेकिन भारतीय राजनीति की पिच पर वैसा नजारा नहीं है। यहां तो केवल भारतीय जनता पार्टी, जो एनडीए की सबसे बड़ी और अगुवाईकर्ता पार्टी है, खेल रही है, पूरा ड्रामा रच रही है। अहम मुद्दों पर चर्चा कर पक्ष को हराने की बजाय उसका पूरा ध्‍यान मैच के अंदर खलन पैदा कर सुर्खियां बटोरना है, वे एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाते हुए नजर नहीं आ रही, वे केवल एक राज्‍य के विकास के दम पर राजनीति ब्रांड बना चुके चेहरे के इस्‍तेमाल पर सत्ता हथियाना चाहती है। भाजपा का रवैया केवल उस टेस्‍ट टीम सा है, जो टेस्‍ट मैच के अंतिम दिन समय बर्बाद करने के लिए हर प्रकार का हथकंड़ा अपनाती है।

भाजपा ने पहला ड्रामा रचा। जब राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक गोवा में होनी थी। कुछ नेताओं ने वहां जाने से इंकार कर दिया, तो कुछ ने अनचाहे मन से वहां जाना बेहतर समझा। ख़बरों में थी भाजपा, और विरोधी टीम के इक्‍का दुक्‍का बयानबाज नेता। इस बैठक के साथ भाजपा को मीडिया सामान्‍य भाव से लेता कि एलके आडवाणी ने इस्‍तीफे का पैंतरा चल दिया। मीडिया के अगले कुछ दिन और उसकी भेंट चढ़ गए। अंत होते होते एलके आडवाणी अपने फैसले से पलटे, किसी टीवी सीरियल के किरदार की तरह।

नरेंद्र मोदी की एलके आडवाणी से दूरियां, करीबियां चर्चा में बनीं रही। इस दौरान किसी बेहतर प्रदर्शन कर रहे गेंदबाज की तरह नरेंद्र मोदी मीडिया में स्‍पेस बनाते चले गए। कहते हैं कि जब वक्‍त अच्‍छा हो तो दूसरों की गलतियां भी आपके उभार के लिए कारगार सिद्ध होती हैं, खास नरेंद्र मोदी के मामले में कुछ ऐसा ही हुआ है। वे एक अच्‍छे मुख्‍यमंत्री हैं, कोई शक नहीं, लेकिन क्‍या कांग्रेस के पास ऐसे मुख्‍यमंत्री नहीं, बिल्कुल हैं, लेकिन उसके पास मीडिया में हौवा पैदा करने वाले नेता नहीं।

उसके नेता मीडिया में आने से डरते हैं, जो आते हैं, उनकी बोल चाल इतनी खराब है कि उनके मुंह से निकले बोल भाजपा को कम कांग्रेस को ज्‍यादा नुकसान पहुंचाते हैं। लादेन जी, आपदा पर्यटन या मौत का सौदागर जैसे शब्‍द भाजपा की नहीं, बल्‍कि कांग्रेसी नेताओं की देन हैं, जो सोशल मीडिया में कांग्रेस की खिल्‍ली उड़ाने के लिए काफी हैं।

वहीं, मीडिया नरेंद्र मोदी के बयानों पर ध्‍यान देने की बजाय उनके मुंह से निकले शब्‍दों के पीछे की सोच को पकड़ने की कोशिश करता है, जो ख़बर की शकल ले लेते हैं। बुर्के की जगह नरेंद्र मोदी शायद घुंघट भी कह सकते थे, लेकिन नहीं, उन्‍होंने बुर्का कहा, बुर्का उस समुदाय से जुड़ा है, जिसका नरेंद्र मोदी को सबसे कट्टर माना जाता है, भले ही नहीं, मोदी कहते हों कि वे देश को एक साथ आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं।

पिछले कई महीनों से चल रहे ड्रामे के आज वाले एपिसोड में नरेंद्र मोदी को 19 टीमें और मिल गई, हालांकि भाजपा इस की घोषणा बीते हुए कल में कर सकती थी, लेकिन उसने धारावाहिक की तरह, अपने फैसले पर रहस्‍य बनाए रखा, ताकि कांग्रेस के खाते से एक दिन हो छीन लिया जाए। कुल मिलाकर भाजपा टेस्‍ट मैच के अंतिम दिन वाली गेम खेल रही है, कैसे भी रहता वक्‍त गुजर जाए, और मैच उनके खाते में पहुंच जाए।

कांग्रेसियों का 'ब्रह्मचर्य व्रत'

कहते हैं जो पकड़ा गया वो चोर बड़ा। जो समय रहते स्‍वीकार कर गया वो सबसे बड़ा महान, जैसे कि मोहनदास कर्म चंद गांधी। मगर अफसोस है कि अब कांग्रेसी नेताओं को स्‍वीकार करने का मौका ही नहीं मिलता या तो लड़कियां आत्‍म हत्‍या कर नेताओं को बेनकाब कर देती हैं या फिर कुछ साल बाद गलतियां पुत्रों का जन्‍म लेकर जग जाहिर हो जाती हैं।

शायद महात्‍मा गांधी की परंपरा को कांग्रेसी नेता बरकरार रखने की कोशिश में लगे हुए हैं, भले दूसरी तरफ सत्‍ता में बैठी कांग्रेस महिलाओं की सुरक्षा का पूरा पूरा जिम्‍मा उठाने का भरोसा दिला रही है। कथित तौर पर कुछ महीनों से ब्रह्मचर्य का व्रत, जिससे हम बलात्‍कार भी कह सकते हैं,  कर रहे एक नेता विक्रम सिंह ब्रह्मा को क्षुब्‍ध महिलाओं ने असम में पीट डाला, और कांग्रेस को एक बार फिर शर्मिंदा होना पड़ा। शायद कांग्रेस शर्मिंदा न होती। अगर आज हमारे राष्‍ट्रपिता की तरह विक्रम सिंह ब्रहमा भी जनता के बीच आकर महिला के साथ किए अपने ब्रह्मचर्य व्रत की स्‍वीकृति करते।

जैसे गांधी जी ने एक पत्र में लिखा था कि 'मुझे मालूम है कि शिविर के सभी लोग जानते हैं कि मनु मेरी खाट में साझेदारी करती है। वैसे भी मैं छुपाकर कुछ नहीं करना चाहता हूं। मैं इसको विज्ञापित नहीं कर रहा हूँ। यह मेरे लिए अत्यंत पवित्र चीज है। संदेह और अविश्वास को दूर करने के लिए फरवरी 1947 में गांधीजी ने नोआखाली की एक प्रार्थना सभा में मनु के साथ बिस्तर की साझेदारी की बात सबके सामने रखी। लेकिन यह नहीं बतलाया कि इस साझेदारी में मनु वस्त्रहीन अवस्था में होती थी।

कुछ माह पहले गीतिका नामक लड़की ने आत्‍महत्‍या कर ली और पीछे एक सुसाइड नोट छोड़ गई, जिसमें लिखा था कि उनकी आत्‍महत्‍या के पीछे कांग्रेसी नेता का हाथ है। यकीनन यह मामला भी महिला के साथ शारीरिक प्रयोग का था, जिसमें महिला को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। मगर जब आरोपी नेता का जन्‍मदिवस आया तो एक अन्‍य कांग्रेसी नेता ने कहा, 'गोपाल कांडा ने गलती से गलत नौकर रख लिया था'। यकीनन गीतिका मनु सी न थी, ईमानदार पैरोकार न था।

कांग्रेस के दिग्‍गज नेताओं में शुमार एनडी तिवारी, जो तीन बार उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री भी रह चुके हैं, को ब्रह्मचर्य व्रत प्रयोग उस समय महंगा पड़ गया, जब हाईकोर्ट ने डीएनए रिपोर्ट के आधार पर रोहित शेख़र को उनका पुत्र मान लिया। एनडी तिवारी ने इसको एक साजिश बताया तो वहीं डीएनए टेस्ट रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद उज्ज्वला शर्मा ने कहा था, जो सच्चाई केवल वह जानती थीं, अब वह सच्चाई पूरी दुनिया के सामने आ गई है। यह सच की जीत है और उनके बेटे के मां के प्रति प्रेम की जीत है।

कथित तौर पर पिछले वर्ष कांग्रेस के फायरब्रांड वकील नेता अभिषेक मनु सिंघवी को भी उनके चालक ने ब्रह्मचर्य व्रत प्रयोग करते हुए एक वीडियो में कैच कर लिया था। इस वीडियो के रिलीज होने के बाद बात सामने आई कि वो वकील महिला को बदले में उच्‍च पदवी देने वाले थे। कांग्रेसी नेता अपने प्रेरणास्रोत एवं देश के राष्‍ट्रपिता के प्रयोग करने की कोशिश करते हुए पकड़े जाते हैं। उनको जनता महात्‍मा गांधी बनने से रोक लेती है। वैसे तो राहुल गांधी भी इस तरह के आरोप को झेल चुके हैं।

आज रात एनडीटीवी पर प्राइम टाइम शो देखते हुए एक सवाल सुनने को मिला कि महाभारत से द्रोपदी चीरहरण को हटा देना चाहिए। मुझे लगता है कि देश के राष्‍ट्रपिता की कुछ ऐसी स्‍वीकृतियों को भी नहीं हटा देना चाहिए।

समाचार पत्रों में 'दिल्‍ली जनाक्रोश'

पूरा दिन हिन्‍दी इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया ने दिल्‍ली जनाक्रोश को कवरेज दी। इस जनाक्रोश को घरों तक पहुंचाया। वहीं अगले दिन सोमवार को कुछेक हिन्‍दी समाचार पत्रों ने दिल्‍ली जनाक्रोश को सामान्‍य तरीके से लिया, जबकि कुछेक ने जनाक्रोश को पूरी तरह उभारा। भारतीय मीडिया के अलावा दिल्‍ली जनाक्रोश पर हुए पुलिस एक्‍शन को विदेश मीडिया ने भी कवरेज दिया।

इंग्‍लेंड के गॉर्डियन ने अपने अंतर्राष्‍ट्रीय पृष्‍ठ पर 'वी वांट जस्‍टिस' एवं 'किल देम' जैसे शब्‍द लिखित तख्‍तियां पकड़ रोष प्रकट कर रही लड़कियों की फोटो के साथ, किस तरह पुलिस ने उनको खदेड़ने के लिए आंसू गैस एवं पानी की बौछारों का इस्‍तेमाल किया, समाचार प्रकाशित कर इंग्‍लेंड की जनता को भारतीय पुलिस रवैया से अवगत करवाया।

वहीं, न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स ने अपने डिजीटल संस्‍कार में दिल्‍ली जनाक्रोश की ख़बर को 'रोष प्रदर्शन हिंसा में बदला' के शीर्षक तले प्रकाशित किया। इस रिपोर्ट अंदर रविवार को हुए पूरे घटनाक्रम का बड़ी बारीकी से लिखा गया है। ख़बर में बताया गया कि किस तरह लोग दिल्‍ली में एकत्र हुए। किस तरह इस जनाक्रोश में राजनीतिक पार्टियों ने घुसना शुरू किया एवं किस तरह शक्‍ति बल के जरिए इस प्रदर्शन को दबाने की कोशिश की गई। उन्‍होंने पुलिस के प्रति रोष प्रकट करते हुए कुछ प्रदर्शनकारियों की बातों को भी विशेषता से प्रकाशित गया, जैसे के पुलिस से जनता का सवाल करना, आप जहां क्‍यूं नहीं आए, हमारे साथ क्‍यूं नहीं खड़े हुए एवं जो हुआ क्‍या आप से गुस्‍साए नहीं।

पाकिस्‍तान द डॉन तो निरंतर दिल्‍ली घटनाक्रम को प्रकाशित कर रहा है। कल बाद दोपहर से द डॉन ने इस ख़बर को अपने होमपेज पर नम्‍बर तीन पर रखा, जबकि मुख्‍य लीड में पाकिस्‍तान नेता की ख़बर थी, जिनकी एक बम्‍ब धमाके में मौत हो गई, जिनको कल पूरे रीति रिवाजों के साथ खाके सुपुर्द किया गया।

अगर भारतीय समाचार पत्रों की बात करें तो अमर उजाला ने सचिन की ख़बर को प्रमुखता से लिया, लेकिन अख़बार के पहले तीन कॉलम दिल्‍ली जनाक्रोश को दिए। वहीं राजस्‍थान पत्रिका ने सचिन की ख़बर को नम्‍बर दो पर रखते हुए दिल्‍ली जनाक्रोश की ख़बर को 'छावनी बना इंडिया गेट' शीर्षक के तले प्रमुखता से प्रकाशित किया।

कड़के की ठंड में उबलती रही दिल्‍ली के शीर्षक तले दैनिक जागरण ने इस घटनाक्रम से जुड़ी तमाम ख़बरों को प्रकाशित किया एवं अंत बॉटम में 'क्रिकेट के भगवान ने किया एकदिवसीय का परित्‍याग' से सचिन तेंदुलकर को भी स्‍पेस दिया।

वहीं, दैनिक हिन्‍दुस्‍तान ने एक भावुक करती छवि के साथ 'डंडे बरसे, बिगड़े हालत' ख़बर को प्रमुखता से प्रकाशित किया।

अंत मीडिया कवरेज पर राज्‍य सभा चैनल पर मीडिया मंथन में कई तरह के सवाल उठाए गए। इसमें कहा गया कि मीडिया ने जनाक्रोश को भड़काने का प्रयास किया। मीडिया भी कहीं न कहीं इस गुस्‍से की लय में बह गया। अंत कोई कुछ भी कहे। देश की सरकार को इस झटके की जरूरत थी। इस मीडिया ने जो जनाक्रोश को कवरेज दिया, वो काफी सराहनीय थे, वरना दिल्‍ली की क्ररूरता जो कैमरों के सामने भी कम न हुई, वो कैमरों से परे कितना कहर बरपाती, इसका अंदाजा लगाना बेहद मुश्‍किल है।

चलते चलते इतना कहूंगा। हमारी इज्‍जत गई, अब तो शर्म करो दिल्‍ली के हुक्‍मरानों।

गुजरात विस चुनाव 2012 बनाम नरेंद्र मोदी

गुजरात विधान सभा चुनाव 2012 पर भारत की ही नहीं, बल्‍कि विश्‍व की निगाह टिकी हुई है, क्‍यूंकि नरेंद्र मोदी हैट्रिक बनाने की तरफ अग्रसर हैं, और उनका प्रचार प्रसार राष्‍ट्रपति बराक ओबामा का प्रचार कर चुकी पीआर एजेंसी के पास है, जो प्रचार पसार के लिए नए नए हथकंडे अपनाने के लिए बेहद तेज है। इतना प्रचार तो आदित्‍य चोपड़ा और आमिर ख़ान भी नहीं कर पाते, जितना प्रचार नरेंद्र मोदी का हो रहा है। अक्षय कुमार की तरह मीडिया की नजरंदाजी के बावजूद अपनी उपस्‍थिति दर्ज करवाने में कामयाब रहे नरेंद्र मोदी, आज सबसे ज्‍यादा चर्चित नेता हैं।

आख़िर कैसे देते हैं हर बात का जवाब

नरेंद्र मोदी एक दिन में सबसे ज्‍यादा प्रचार रैलियां करने वाले शायद भारत के पहले नेता होंगे, फिर भी वो हर भाषण का पलटकर जवाब दे रहे हैं। इसके पीछे एक ही कारण है कि मोदी ने अपने आस पास ऐसे लोगों का घेरा बनाया हुआ है जो मीडिया के संपर्क में हैं, कुछ मीडिया संस्‍थान तो विरोधी नेताओं द्वारा अलग अलग स्‍थानों पर दिए गए, बयानों की कॉपियां पल पल नरेंद्र मोदी तक पहुंचाते हैं, और मोदी कभी भी पटकथा तैयार कर रैली को संबोधित नहीं करते, वो कांग्रेस के बयानों पर चुटकी लेते हुए जनता को अपनी तरफ आकर्षित कर लेते हैं, सबसे बड़ी बात यह है कि वो गुजराती हैं, जिसके कारण उनका संपर्क जनता से बहुत आसानी से हो जाता है, जबकि कांग्रेस के पास बड़े नेताओं में केवल और केवल हिन्‍दी भाषी हैं, जो कहीं न कहीं गुजरात की धरती पर फेल हो रहे हैं।

त्रिकोणी लड़ाई में फायदे की संभावना
पिछले चुनावों में कांग्रेस वर्सेस भाजपा थी, लेकिन इस बार चुनाव मैदान में नरेंद्र मोदी, कांग्रेस एवं गुजरात परिवर्तन पार्टी में त्रिकोणी लड़ाई है। इस लड़ाई में कहीं न कहीं नरेंद्र मोदी को बहुत बड़ा फायदा होने वाला है, क्‍यूंकि कुछ ऐसा समीकरण पंजाब विधान सभा के भीतर तब बना था, जब प्रकाश सिंह बादल के भतीजे मनप्रीत सिंह बादल शिअद का साथ छोड़ते हुए अलग पार्टी का निर्माण कर चुनाव मैदान में कूद गए थे। अंत जनता में ऐसे कयास लगाए जाने लगे कि मनप्रीत सिंह बादल आगे चलकर कांग्रेस के साथ समझौता कर सकते हैं, सकारात्‍मक माहौल से सीधा नकारात्‍मक माहौल मनप्रीत सिंह बादल की पार्टी के प्रति बन गया, अंत प्रकाश सिंह बादल फिर से पंजाब के मुख्‍यमंत्री बने और मनप्रीत सिंह बादल की पार्टी खाता भी न खोल सकी। अब कुछ दिन पहले मणिनगर विधान सभा सीट से नरेंद्र मोदी के खिलाफ खड़े अपने उम्‍मीदवार को जीपीपी ने इस लिए वापिस ले लिया, क्‍यूंकि वहां पर कांग्रेस ने संजीव भट्ट की पत्‍नि को टिकट दे दिया। इस बात से नाराज हुए जीपीपी प्रत्‍याशी ने भाजपा का दामन थाम लिया। पहले उम्‍मीद थी कि नरेंद्र मोदी अपने पुराने आंकड़े को कायम ही रख पाएंगे, मगर अब लग रहा है कि नरेंद्र मोदी 130 सीटों तक भाजपा को खींच कर ले जाएंगे।

युवा मतदाताओं की अधिक तादाद
जहां नरेंद्र मोदी वीडियो कांफ्रेंस के जरिए ग्राम पंचायतों तक पहुंचे, वहीं गूगल हैंगआऊट, यूट्यूब एवं फेसबुक के जरिए युवा वर्ग को आकर्षित करने में पूरी तरह सफल रहे। इस बार युवा मतदाताओं की संख्‍या बेहद ज्‍यादा है, जो नतीजे पटलने के लिए बेहद अहम रोल अदा करेगी। पहले पड़ाव का चुनाव प्रचार खत्‍म हो गया, और पहले पड़ाव के लिए मतदान 13 दिसम्‍बर को होने वाला है।

सुन सनकर तंग आए ''देश का अगला...........?"

कांग्रेस, हम ने कल लोक सभा में एफडीआई बिल पारित करवा दिया। अब हम गुजरात में भी अपनी जीत का परचम लहराएंगे। मीडिया कर्मी ने बीच में बात काटते हुए पूछा, अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, अगर मध्‍याविधि चुनाव हों तो।  अगर देश का प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह जनता से बातचीत नहीं करेगा तो, मीडिया तो ऐसे सवाल पूछता ही रहेगा।

                                          नोट  पेंट की एड का पॉलिटिकल वर्जन

देश के लोकतंत्र में शायद पहली बार हो रहा है कि बात बात पर एक सवाल उभरकर सामने आ जाता है ''देश का अगला प्रधान मंत्री कौन होगा ?'' यह बात तब हैरानीजनक और कांग्रेस के लिए शर्मजनक लगती है जब चुनावों में एक लम्‍बा समय पड़ा हो, और बार बार वो ही सवाल पूछा जाए कि ''देश का अगला प्रधान मंत्री कौन होगा ?'' जब इस मामले से जोर पकड़ा था तो देश के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था, ''कांग्रेस जब भी कहे, मैं राहुल गांधी के लिए खुशी खुशी कुर्सी छोड़ने को तैयार हूं, मैं जब तक इस पद पर हूं, अपना दायित्‍व निभाता रहूंगा''।

देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भले देश की स्‍थिति से अनजान हों, मगर कांग्रेस की स्‍थिति से अच्‍छी तरह अवगत हैं, कांग्रेस की स्‍थिति चीन जैसी है, जो अंदर ही अंदर कई टुकड़ों में बांटा हुआ है, लेकिन बाहर से एक संगठित राष्‍ट्र। राहुल गांधी को कुछ मक्‍खनबाज नेता प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं, खासकर दिग्‍गविजय सिंह। पीएम बनना तो सोनिया भी चाहती थी, लेकिन रास्‍ते में एक पहाड़ आता है, जिसका नाम सुब्रह्मण्यम स्वामी, जिसको फांदकर पीएम की कुर्सी तक जान राहुल गांधी एवं सोनिया के लिए आसान नहीं, और दूसरी बात, जो मंत्री पद की जिम्‍मेदारी लेने से डरता है, वो देश के महत्‍वपूर्ण पद की जिम्‍मेदारी कैसे उठाएगा ?

देश का अगला प्रधान मंत्री कौन होगा ? सवाल को सुनते सुनते मनमोहन सिंह अपना दूसरा कार्यकाल पूरा कर जाएंगे, लेकिन यह बेहद शर्मनाक हादसा होगा, जब देश में निरंतर चल रही सरकार से एक ही सवाल बार बार पूछा जा रहा हो कि देश का अगला प्रधान मंत्री कौन होगा ?। कांग्रेस ने तो अपना पल्‍लू यह कहते हुए झाड़ लिया कि उनके रीति नहीं पीएम पद का उम्‍मीदवार घोषित करना, लेकिन विदेशी पत्रिका इकोनोमिस्‍ट ने कांग्रेस की ओर से अगले प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पी चिदंबरम को देखने का साहस किया है। इस पद के दूसरे मजबूत दावेदार कांग्रेस की ओर से राष्‍ट्रपति पद तक पहुंच चुके हैं।

उधर, भारतीय जनता पार्टी जो कल तक नरेंद्र मोदी के नाम को नकार रही थी, वो आज उसको प्रधान मंत्री पद का उम्‍मीदवार मानने से इंकार नहीं कर रही, क्‍यूंकि भाजपा अब विपक्ष में बैठकर ऊब चुकी है, वो नहीं चाहती कि अगले कुछ साल फिर विपक्ष में बैठना पड़े। सुषमा स्‍वराज ने कहा है कि भाजपा के पास पीएम के बहुत सारे उम्‍मीदवार हैं, लेकिन यह भाजपा की कमजोरी नहीं, शक्‍ति है, जिस तरह सुषमा स्‍वराज ने लोक सभा में अपने भाषणों से भारतीय जनता पार्टी को आम जनता तक पहुंचाया, वो भाजपा के लिए काफी कारगार सिद्ध हो सकता है।

चलते चलते - मनमोहन सिंह को नैतिक तौर पर अपने पद से इस्‍तीफा दे देना चाहिए, क्‍यूंकि देश की जनता एक सवाल को सुन सुन कर तंग आ गई, भले ही वो नहीं आए या फिर एक दमदार पीएम की भूमिका निभाएं, किसी परिवार सेवक की नहीं।

राजनीति में ''एफडीआई''

भारतीय राजनीति किस तरह गंदगी हो चुकी है। इसका तारोताजा उदाहरण कल उस समय देखने को मिला, जब एफडीआई का विरोध कर रही बसपा एवं सपा, ने अचानक वोटिंग के वक्‍त बॉयकॉट कर दिया, और सरकार को एफडीआई पारित करने का मौका दे दिया, जिसे सत्‍ता अपनी जीत और विपक्ष अपनी नैतिक जीत मानता है, हैरानी की बात है कि यह पहला फिक्‍सिंग मैच है, जहां कोई खुद को पराजित नहीं मान रहा।

राजनीतिज्ञों का मानना है कि एफडीआई के आने से गुणवत्‍ता वाले उत्‍पाद मिलने की ज्‍यादा संभावना है। अगर विदेशी कंपनियों की कार्यप्रणाली पर हमें इतना भरोसा है तो क्‍यूं न हम राजनीति में भी एफडीआई व्‍यवस्‍था लाएं। वैसे भी सोनिया गांधी देश में इसका आगाज तो कर चुकी हैं, भले ही वो शादी कर इस देश में प्रवेश कर पाई। मगर हैं तो विदेशी।

अगर राजनीति में एफडीआई की व्‍यवस्‍था हो जाए, तो शायद हमारे देश के पास मनमोहन सिंह से भी बढ़िया प्रधान मंत्री आ जाए, राजनीति दलों को चलाने वाला उत्‍तम उत्‍पाद मतलब कोई पुरुष या महिला आ जाए। अगर राजनीति में एफडीआई का बंदोबस्‍त हो जाता है तो ऐसे में पूर्ण संभावना है कि पाकिस्‍तान के आसिफ जरदारी भी भारत में अपना विस्‍तार करना चाहेंगे, क्‍यूंकि उनके पास ''दस प्रतिशत कमिशन'' का बेहतरीन टैग है।

बसपा एवं सपा कह रही है कि उन्‍होंने बॉयकॉट कर के बहुत बड़ा कदम उठाया है जनता हित में, लेकिन उनकी गैर हाजिरी ने सत्‍ता पक्ष को मजबूत किया, जो मैच फिक्‍सिंग की निशानी है। अगर विरोध करना था तो वोटिंग के जरिए  क्‍यूं नहीं किया। सुनने में तो यह भी आया है कि कांग्रेस ने महाराष्‍ट्र में बाबा साहेब अम्‍बेडकर की स्‍मारक को हरी झंडी इसलिए दिखाई, क्‍यूंकि बसपा ने अंदर खाते कांग्रेस का समर्थन किया।

अगर यूं मैच फिक्‍सिंग कर लोक सभा में बिल पारित करने हैं, तो टीवी पर लाइव प्रसारण कर देश की जनता को उल्‍लू बनाना बंद किया जाए। आज से कुछ साल बाद कोई नेता किताब लिखेगा, उसमें इस मैच फिक्‍सिंग का खुलासा होगा, तब तक जनता इस मैच फिक्‍सिंग के केवल कयास लगाती रहेगी।

आम आदमी का तोड़

यह तो बहुत ही न इंसाफी है। ब्रांड हम ने बनाया, और कब्‍जा केजरीवाल एंड पार्टी करके बैठ गई। आम आदमी की बात कर रहा हूं, जिस पर केजरीवाल एंड पार्टी अपना कब्‍जा करने जा रहे हैं। गुजरात में चुनाव सिर पर हैं, कांग्रेस अपने चुनाव प्रचार में चीख चीख कर कह रही थी, कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ।

मगर आम आदमी तो केजरीवाल एंड पार्टी निकली, जिसकी कांग्रेस के साथ कहां बनती है, सार्वजनिक रूप में, अंदर की बात नहीं कह रहा। अटकलें हैं कि कांग्रेस बहुत शीघ्र अपने प्रचार स्‍लोगन को बदलेगी। मगर आम आदमी का तोड़ क्‍या है?

वैसे क्रिएटिव लोगों के पास दिमाग बहुत होता है, और नेताओं के पास पैसा। यह दोनों मिलकर कोई तोड़ निकालेंगे, कि आखिर आम आदमी को दूसरे किस नाम से पुकार जाए। वैसे आज से कुछ साल पूर्व रिलीज हुई लव आजकल में एक नाम सुनने को मिला था, मैंगो पीप्‍पल।

अगर आम आदमी मैंगो पीप्‍पल बन भी जाता है तो क्‍या फर्क पड़ता है। पिछले दिनों एक टीवी चैनल का नाम बदल गया था। हुआ क्‍या, हर जगह एक ही बात लिखी मिली, सिर्फ नाम बदला है। वैसा ही सरकार का रवैया रहने वाला है आम आदमी के प्रति।
आम आदमी की बात सब करते हैं, लेकिन उसके लिए काम कोई नहीं करता। स्‍वयं आम आदमी ही नहीं करता। सरकारी दफ्तरों में बैठा कर्मचारी या अधिकारी आम आदमी नहीं, लेकिन फिर भी वो आम आदमी के काम नहीं आता, जब तक आम आदमी, आम फीस से ज्‍यादा नहीं देता। आम आदमी को कुर्सी पर बैठा आम आदमी इस तरह ऊपर से नीचे घूर के देखता है, जैसे काम के लिए आया व्‍यक्‍ित किसी बाहर दुनिया से आया हो।

एक आम आदमी को दूसरा आम आदमी लूट रहा है, चाहे वो आम वाला हो या सेब वाला क्‍या फर्क पड़ता है। अमीरों के हाथ में एप्‍पल "मोबाइल" है तो गरीब रेहड़ी वाले से जाकर मैंगो का भाव भी नहीं पूछता, कहीं वो गले ही न पड़ जाए।

सड़क पर खड़ा ट्रैफिक कर्मचारी किसी वीआईपी इलाके से नहीं आता, लेकिन वो भी शाम तक जेब भरने के तरीके ढूंढता है। उसकी नजर के सामने से सैंकड़ों व्‍हीकल गुजरते हैं, एक ही नियम तोड़ते हुए, लेकिन वो कुछेक को रोकता है। कुछ आम आदमी मोबाइल पर वीआईपी से बात करवाकर निकल जाते हैं तो कुछ गांधी छाप देकर।

आम आदमी सब्‍जी लेने निकलता है, वो सब्‍जी वाले आम आदमी से जिरहा करता है, लेकिन सरकार के खिलाफ झंडा उठाने के लिए समय नहीं। देश की जनसंख्‍या किसी ने बढ़ाई वीआईपी लोगों ने या आम आदमी ने। जॉब्‍स के लिए पैसे की सिफारिश कौन करता है वीआईपी या आम आदमी। गांधीछाप देकर जॉब्‍स पर लगा आम आदमी, आम आदमी से गांधीछाप की उम्‍मीद करता है।

आम आदमी का तोड़ आम आदमी के पास है, और किसी के पास नहीं।

खुर्शीद और कांग्रेसी ता ता थैय्या

वाकई, अब तो यकीन हो गया है कि कांग्रेस महासचिव दि‍ग्विजय सिंह की दिमागी हालत ठीक नहीं है. उन्हें स्पेशल ट्रीटमेंट दिए जाने की दरकार है. वे कहते हैं कि सलमान खुर्शीद और उनकी पत्नी ने शालीनता से  सारे सवालों का जवाब दे दिया है ऐसे में खुर्शीद के खिलाफ कुछ करने को बचता ही नहीं है. गलत केजरीवाल हैं खुर्शीद नहीं. (लाल रंग के शब्दों पर ख़ास ध्यान दें.)

इसी को कहते हैं, पहले चोरी फिर सीना ज़ोरी. चोरों को यह ध्यान में रखने की ज़रूरत है कि अब माना बदल गया है. अब 'सीसीटीवी कैमरा' है, जो चोर को पकड़वाने में बड़ा मददगार है. पर... चोर हैं कि पुराने ढर्रे पर चोरी किए चले जा रहे हैं. सिनेमा भी नहीं देखते. धूम और धूम 2 देखी होती तो चोरी का कोई नया तरीका इज़ाद करते. खैर..

हाल ही में एक रिपोर्ट सामने आई है. इसमें कहा गया है कि डॉ. ज़ाकिर हुसैन मेमोरियल ट्रस्ट ने ऐसे गांवों में भी कैंप लगा दिए जो वास्तव में हैं ही नहीं. वाह क्या बात है.

यहां दो संभावनाएं नज़र आती हैं -

एक संभावना यह है कि वे गांव हैं और भारत सरकार अभी तक उन तक पहुंच नहीं पाई है, उन्हें पहचान नहीं पाई है. हो सकता है कि सलमान जी का ट्रस्ट वहां पहुंच गया हो. अगर ऐसा है तो फिर वह सूची भी सच्ची है, जिसमें ऐसे नाम हैं, जिनका कोई वजूद नहीं होने की बात कही जा रही है. फिर तो सलमान खुर्शीद साहब ने बड़ा ही नेक काम किया है. ख़ुदा ने उनके लिए ज़न्नत में एक सीट अभी से तय कर दी होगी. पर इस संभावना में कोई संभावना नज़र नहीं आती.

दूसरी और ज़्यादा विश्वसनीय संभावना यह है कि गांव है ही नहीं. अगर गांव हैं ही नहीं और वे लोग भी नहीं हैं, जिन्हें लाभ दिए जाने की बात कही जा रही है तो फिर कांग्रेसी महासचिव और पार्टी के बाकी नेता अरविंद केजरीवाल को झूठा कैसे कह रहे हैं. आरोपों को नकार देने से ही अपराध मुक्त नहीं हुआ जा सकता. कांग्रेस के सभी बड़े नेता खुर्शीद का पक्ष ले चुके हैं. अब दिग्गी भला क्यों पीछे रहें. चलो, इनके बयान का इंतज़ार था, सो आ गया. कांग्रेसी लोग सिर्फ केजरीवाल को ही झूठा नहीं बता रहे, बल्कि मीडिया, अफसरों और तमाम उन विकलांगों को भी झूठा बता रहे हैं, जो सलमान खुर्शीद और उनके ट्रस्ट के खिलाफ़ खड़े हैं. या मैं कहूं कि कांग्रेसी सच को झुठलाने की कोशिश कर रहे हैं. और यदि सलमान खुर्शीद सच झुठलाने की कोशिश कर रहे हैं तो अल्लाह तआला ने जहन्नम में खुर्शीद साहब की सीट का अरेंजमेंट करवा दिया होगा. उनके लिए अलग ख़ास किस्म के अज़ाब (ट्रीटमेंट) तैयार करवा रहे होंगे. अलग ख़ास किस्म का इसलिए क्योंकि विकलांगों का हक़ खा जाना भी एक तरह का अलग अपराध है.

तो दोस्तो आपकी कौन सी संभावना प्रबल नज़र आती है?
एक छोटी सी बात और. इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा तो 70 लाख को बहुत कम रकम मानते हैं. पर मैं एक छोटा सा कैलकुलेशन बताना चाहता हूं. मान लो एक आम आदमी एक महीने में 20 हज़ार रुपए कमाता है. साल भर में कमाएगा 20 हज़ार गुणा 12. मतलब 2 लाख 40 हजार. अब सत्तर लाख कमाने में उसे कितने साल लगेंगे? कम से कम 29 साल. मतलब एक आदमी अगर 20 साल की उम्र में कमाना शुरू कर दे तो 50 साल का होकर 70 लाख रु कमा चुका होगा. इस महंगाई में अगर वह 10 हज़ार रुपए महीना भी बचा ले तो वह 50 साल की उम्र तक 30 लाख रुपए बचा पाएगा. 30 लाख में एक घर खरीदना भी संभव नहीं है. तो बेनी साहब को यह गणित क्यों समझ में नहीं आता?? अरे हां, समझ में कैसे आएगा, कभी आम आदमी की तरह संघर्ष किया हो तो समझ में आए. माइंड इट.

यह लेख मलखान सिंह, जो कि उम्‍दा ब्‍लॉगर हैं, और रफ्तार डॉट कॉम में कार्यरत हैं, द्वारा लिखा गया है, इस को युवा सोच युवा खयालात  प्रबंधन ने  उनके दुनाली ब्‍लॉग से लिया है, जोकि नवभारत टाइम्‍स पर संचालित है। 


कैग की जीरो या मैडम का अंडा

कपूर खानदान की लाडली करीना कपूर ने जब अपनी फिगर के आगे जीरो लगाया, तो कई अभिनेत्रियों की नींद उड़ गई, जैसे फायर की आवाज सुनते ही पेड़ से पंछी एवं कई अभिनेत्रियों को पेक अप बोलना पड़ा।

जब 2012 में कैग ने अपनी रिपोर्ट में जीरो लगाई तो कांग्रेस के हाथ पैर पीले पड़ गए और कांग्रेस ने कैग की रिपोर्ट को जीरो बताते हुए कि कैग को जीरो लगाने की आदत है, कह डाला।

इतना कहने से कांग्रेस का पीछा कहां छूटने वाला था। शून्‍य ऑवर होने से पहले ही संसद 'जीरो लगाने के मुद्दे' को लेकर बुधवार तक स्‍थगित हो गई। कांग्रेस भले ही कहती रहे 'कैग को जीरो लगाने की आदत है', मगर विपक्ष एक बात पर अड़िंग है कि देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने पद से अस्‍तीफा दें, जो अपनी उदासीनता के चलते हीरो से जीरो हो चुके हैं।

यह जीरो कांग्रेस को जीरो करने में कितना रोल अदा करने वाली है, यह बात तो आगामी लोक सभा चुनावों में ही सामने आएगी। जिस तरह के माहौल कांग्रेस के खिलाफ बन रहा है, ऐसे में कांग्रेस को जीरो में जाने की जरूरत है, मतलब शून्‍य में जाने की जरूरत है, जिसको आध्‍यत्‍मिक गुरू ध्‍यान कहते हैं।

कांग्रेस को ध्‍यान में जाने की जरूरत है। उसको सोचना होगा। इस जीरो से कैसे उभरा जाए। यह जीरो अगर उपलब्‍धियों में लगे तो किसी को नहीं खटकती, मगर यह जीरो जब घाटों में लगती है तो बवाल होता है। जैसे अच्‍छे वक्‍त में होने वाली गलतियां मजाक कहलाती हैं, और बुरे वक्‍त में मजाक भी गलतियां कहलाता है।

जीरो को अंडा भी बोलते हैं, मगर वो शरारती बच्‍चे, जो गम में भी मस्‍ती का फंडा ढूंढ लेते हैं, जब उनसे कोई पूछता है, आज का टेस्‍ट कैसा रहा तो वो बड़े मजाक भरे मूड में कहते हैं, मैडम ने अंडा दिया है।

मगर अब कांग्रेस ने कैग को अंडा दे दिया, क्‍यूंकि कैग ने कांग्रेस की कारगुजारी देखते हुए उसको अंडा दे दिया। इस अंडे से पनप विवाद देखते हैं आने वाले दिनों में क्‍या रुख लेगा? क्‍या देश के अंडरअचीवर मनमोहन सिंह अपने पद से अस्‍तीफा देंगे? या अब भी वो जनपथ की तरफ देखते रहेंगे, जिसके पीछे भी जीरो लगती है। मतलब दस जनपथ। हो सकता है जीरो से क्षुब्‍ध कांग्रेस अब जनपथ दस को एक में बदलने का मन बना ले। और बाद में विज्ञापन आए, बस नाम बदला है, काम नहीं।