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औरत का दर्द-ए-बयां

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शायद आज की मेरी अभिव्यक्ति से कुछ लोग असहमत होंगे। मेरी उनसे गुजारिश है कि वो अपना असहमत पक्ष रखकर जाएं। मैं उन सबका शुक्रिया अदा करूंगा। मुझे आपकी नकारात्मक टिप्पणी भी अमृत सी लगती है। और उम्मीद करता हूं, आप जो लिखेंगे बिल्कुल ईमानदारी के साथ लिखेंगे। ऐसा नहीं कि आप अपक्ष में होते हुए भी मेरे पक्ष में कुछ कह जाएं ताकि मैं आपके ब्लॉग पर आऊं। बेनती है, जो लिखें ईमानदारी से लिखें।


(1)
दुख होता है सबको
अब जब मर्द के नक्शे कदम*1 चली है औरत
क्यों भूलते हो
सदियों तक आग-ए-बंदिश में जली है औरत

*1 मर्दों की तरह मेहनत मजदूरी, आजादपन, आत्मनिर्भर

(2)
आज अगर पेट के लिए बनी वेश्या,
तुमसे देखी न जाए
जबरी बनाते आए सदियों से उसका क्या।
बनाने वाले ने की जब न-इंसाफी *1
तो तुमसे उम्मीद कैसी
तुम तो सीता होने पर भी देते हो सजा।

1* शील, अनच्छित गर्भ ठहरना

(3)
निकाल दी ताउम्र हमने गुलाम बशिंदों की तरह
चाहती हैं हम भी उड़ना शालीन परिंदों की तरह
लेकिन तुम छोड़ दो हमें दबोचना दरिंदों की तरह

(4)
घर की मुर्गी दाल बराबर तुम्हें तो लगी अक्सर
फिर भी तेरे इंतजार में रात भर हूं जगी अक्सर
न बाप ने सुनी, न पति ने और न बेटो…

वो चाहती हैं होना टॉपलेस

पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान में आतंकवाद खत्म और स्थापित करने की बातें करने वाले अमेरिका में एक ऐसी चिंगारी सुलग रही है, जो आग का रूप धारण करते ही कई देशों के लिए खतरा बन जाएगी। जी हां, मैं तो उसको आग ही कहूंगा, क्योंकि जब मैं दूर तक देखता हूं तो मुझे उसके कारण तबाही के सिवाए और कुछ नहीं दिखाई देता, बेशक में बहुत ही खुले दिमाग का व्यक्ति हूं, शायद ओशो से भी ज्यादा फ्री माईंड का। मगर वहीं, दूसरी तरफ में उस समाज को देखता हूं जो चुनरी और बुर्का उतराने पर भी लाशों के ढेर लगा देता है। ऐसी स्थिति में उसको 'आग' ही कहूंगा। वैसे आग के बहुत अर्थ हैं। हर जगह पर उसका अलग अलग अर्थ होता है। गरीब के चूल्हे में आग जले, मतलब उसको दो वक्त की रोटी मिले। तुमको बहुत आग लगी है मतलब बहुत जल्दी है। उसमें बहुत आग है, ज्यादातर बिगड़ैल लड़की के बारे में इस्तेमाल होता है,  कहने भाव जो सेक्स के लिए मरे जा रही हों। आग को जोश भी कहते हैं, और कभी कभी कुछ लोग जोश में होश खो बैठते हैं, जैसे ज्यादा आग तबाही का कारण भी बन जाती है, वैसे ही ज्यादा जोश भी किसी आग से कम नहीं होता। मैं इसकी आग की बात कर रहा हूं। अमेरिका क…

औरत

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दुख-सुख, उतार-चढाव देखे सीता बन
हर तरह की जिन्दगी जी है औरत ने।

कभी सुनीता तो कभी कल्पना बन
जमीं से आसमां की सैर की है औरत ने।।

बन झांसी की रानी
लड़ी जांबाजों की तरह जंग औरत ने।

कभी मदर टैरेसा बन
भरे औरों के जीवन में रंग औरत ने॥

बेटी, बहू और मां बन
ना-जाने कितने रिश्ते निभाए औरत ने।

परिवार की खुशी के लिए
आपने अरमानों के गले दबाए औरत ने॥

जिन्दगी के कई फलसफे
ए दुनिया वालों पढ़ी है औरत।

फिर भी न जाने क्यों
चुप, उदास, लाचार खड़ी है औरत॥

मीरा, राधा और इन्हें जब जनी है औरत।
फिर क्यों औरत की दुश्मन बनी है औरत॥