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किरदार ही नहीं एके हंगल का जीवन भी था आदर्श

जब पूरा परिवार अंग्रेजों के लिए नौकरी कर रहा था, तब एके हंगल साहेब ने अपने अंदर आजादी की ज्‍योति को प्रज्‍वलित किया। एके हंगल साहेब ने अंग्रेजों के रहमो कर्म पर पलने की बजाय, अपनी मेहनत की कमाई के चंद रुपयों पर जीवन बसर करना ज्‍यादा बेहतर समझा। उन्‍होंने कपड़ा सिलाई का काम सीखकर टेलरिंग का काम शुरू किया एवं साथ साथ रंगमंच से दिल लगा लिया। आजादी की लड़ाई में योगदान के लिए उनको पाकिस्‍तान की जेलों में करीबन दो साल तक रहना पड़ा।

वो रोजी रोटी के लिए मुम्‍बई आए। कहते हैं कि जब एके हंगल साहेब मुम्‍बई आए तो उनके पास केवल जीवन गुजारने के लिए बीस रुपए थे। यहां पर वो टेलरिंग के साथ साथ रंगमंच से जुड़े रहे। एक दिन उनके अभिनय ने स्व. बासु भट्टाचार्य का दिल मोह लिया, जिन्‍होंने उनको अपनी फिल्म तीसरी कसम में काम करने के लिए ऑफर दिया। इस फिल्‍म से ए के हंगल सफर ने रुपहले पर्दे की तरफ रुख किया, मगर वो फिल्‍मों में नहीं आना चाहते थे, लेकिन एक के बाद एक ऑफरों ने उनको वापिस लौटने नहीं दिया। उन्‍होंने अपने फिल्‍मी कैरियर में करीबन 255 फिल्‍मों में अभिनय किया। इसमें से करीबन 16 फिल्‍में उन्‍होंने बॉलीवुड के पहले सुपर स्‍टार स्‍वर्गीय राजेश खन्‍ना के साथ की।

एके हंगल साहेब ने जब फिल्‍म दुनिया में कदम रखा, तब उनकी उम्र करीबन चालीस के आस पास थी, इसलिए उनको पिता या बड़े भाई के रोल करने को मिलते थे, वो इस छवि को तोड़ना चाहते थे, मगर पूरी तरह असफल रहे। उन्‍होंने तीसरी कसम में राज कपूर के बड़े भाई का रोल किया तो दूसरी फिल्‍म गुड्डी में जय बच्‍चन के पिता बने। इसके बाद उन्‍होंने कई बेहतरीन फिल्‍मों में काम किया, जिनमें नमक हराम, बावर्ची, गुड्डी, अभिमान, शोले जैसी फिल्‍में शामिल हैं। उनके द्वारा फिल्‍म शोले में बोला गया संवाद, भाई इतना सन्‍नाटा क्‍यूं है, लोगों को आज भी याद है। उनके किरदारों में असलीपन होता था, क्‍यूंकि वो हर किरदार को चुनौती के रूप में लेते थे, वो किरदार की गहराई तक जाते थे, वो किरदार किस धर्म का है, किस क्षेत्र के व्‍यक्‍ित से जुड़ा हुआ है, हर पहलू पर निगाह रखते थे।

अंतिम समय एके हंगल साहेब मधुबाला नामक धारावाहिक में नजर आए, जो क्‍लर्स टीवी पर प्रसारित हो रहा है। 1 फरवरी 1917 को पैदा हुए एके हंगल की 13 अगस्त को बाथरूम में फिसल जाने से दाहिनी जांघ की हड्डी टूट गई थी, जिसके चलते उनको 16 अगस्त को सांताक्रूज स्थित अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां पर उन्‍होंने 26 अगस्‍त 2012 को अपनी अंतिम सांस ली। हिन्‍दी सिने जगत के इस आदर्श पुरुष को नमन।

अपनी आत्मकथा, 'द लाइफ एंड टाइम ऑफ एके हंगल' में हंगल साहेब ने अपनी जिन्‍दगी के कई अनछूहे पहलूओं पर प्रकाश डाला है।